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Thursday, 20 August 2009

जाति का प्रभाव

इन दिनों देश भर में एक ऐसा दौर चल रहा है जिसमें किसी भी बात पर ठहर कर गहराई से विचार करने का चलन खत्म सा होता जा रहा है. फटाफट काम करो, सोचो विचारो मत और आगे बढो! कोई चीज़ अच्छी लगती है? ठीक है. अपने को अच्छा लगाओ और आगे बढो, ज़्यादा मत सोचो. सोचना बुरी बात है. अभी ब्लाग में प्रभाष जोशी का एक इंटरव्यू पढा. क्रिकेट, पत्रकारिता आदि विषयों पर जोशी जी खुल कर बोले हैं. लेकिन एक ऐसा प्रसंग आ गया जिसमें वे सती के प्रसंग को भारतीय परंपरा से जोड बैठे और ऐसे बोलते दिखाई दिए मानो वे सती जैसे अमानवीय प्रथा का समर्थन कर रहे हों. ऐसे समय में कोफ्त होती है. लेकिन फिर ठहर कर सोचने का मन करता है कि आखिर उन जैसे महान व्यक्ति को यह बात क्यों नहीं खटकती कि इस तरह का सोच हमें उस ओर ले जा सकता है जिससे हम बडी मुश्किल से निकल पाए हैं. यह बात सनझने की है कि एक ब्राह्मण अगर यह बात कहने लगे कि आखिर ब्राह्मण कहने और उसपर गर्वित होने में बुराई क्या है तो बहुत सारे गैर ब्राह्मणों के लिए यह नागवार हो उठता है. ब्राह्मण सिर्फ एक जाति का नाम ही नहीं है. इसके स्मरण मात्र से एक पूरी जीवन दर्शन भी उभर आता है. हमारे क्रिकेट इतिहास के सभी बडे नाम एक ही जाति से क्यों आते हैं जैसे प्रश्न का उत्तर अगर कोई इस तरह से देने लगे कि इसके पीछे एक जाति की एक लम्बी तैयारी होती है जो एक दिन में संभव नहीं, तो यह बात उस तरह की बात हो जाती है कि एक अंग्रेज यूं ही सारी दुनिया का शासक नहीं बन गया. हम सब जानते हैं कि किसी भी प्रजाति का मनुष्य बुनियादी रूप से दूसरे मनुष्य समूहों से इतना भिन्न नहीं होता कि उसकी क्षमताएं अलग अलग जीन के आधार पर समझी जा सके. यह कुत्तों की प्रजातियों की तरह का मामला नहीं होता.