Showing posts with label दैनिक जागरण. Show all posts
Showing posts with label दैनिक जागरण. Show all posts

Friday, 27 November 2009

Dainik Jagaran, 26 November, 2009

दैनिक जागरण में प्रकाशित हारिल उपन्यास पर हुई भागलपुर में विचारगोष्ठी के उपरांत दिए गए साक्षात्कार के कुछ अंश.

हर युग जन्म देता है अपनी नैतिकता : हितेन्द्र



मैं मूलत: इतिहासकार हूं। कुछ बातें मस्तिष्क में चल रही थीं, जिन्हें साहित्यिक विधा में ही कहा जा सकता था। इसी कारण यह उपन्यास लिखा गया। यह प्रशांत के अंत‌र्द्वंद्व की कहानी है।
[हितेंद्र पटेल जन्म 1968 संप्रति : रवींद्र भारती विवि, कोलकाता जवाहर लाल नेहरू विवि से इतिहास में पीएचडी दो दर्जन शोध आलेख प्रकाशित इतिहास की दो किताबें 1857 : भारत का पहला मुक्ति संग्राम और खुदीराम बोस प्रकाशित आधुनिक बिहार पर थीसिस]

आपको उपन्यास लिखने की प्रेरणा कहां से मिली?

पिछले आठ-दस सालों से बहुत सारी चीजें दिमाग में चल रही थीं, जिन्हें व्यक्त करने के लिए उपन्यास का सहारा लिया। आपके पसंदीदा लेखक कौन हैं? लियो टाल्सटाय, इवान तुर्गनेव, प्रेमचंद, फणीश्र्वरनाथ रेणु और निर्मल वर्मा।
साहित्य में स्त्री और देह विमर्श मजबूरी क्यों बनती जा रही है?
यह महत्वपूर्ण सवालों के लिए जरूरी है, पर जिस ओर यह अग्रसर हो रहा है, वह चिंता का विषय है। उसे परोसने में साहित्यिक उदारता का अभाव दिख रहा है। आधुनिकता के इस दौर में साहित्य का क्या महत्व रह गया है? साहित्य तो बचा रहेगा, भले ही इसका स्वरूप बदल जाए। साहित्य मानवीय मूल्यों को केंद्र में रख कर रचा जाता है। अब साहित्य के लिए अक्षर ज्ञान भी जरूरी नहीं रह गया है। अब टीवी और फिल्मों की सहायता से अनपढ़ लोग भी साहित्य को समझ सकते हैं, ऐसा मेरा मानना है। युवा रचनाशीलता और नैतिक मूल्यों में क्या संबंध है? हर युग अपनी नैतिकताओं को जन्म देता है और नये मूल्य पुराने लोगों को चिंता में डालता है। यह नैसर्गिक है।
साहित्य में कहानी को छोड़ कर अन्य विधाएं नजर क्यूं नहीं आ रही हैं? मुझे ऐसा नहीं लगता है। उपन्यास लेखन का क्षेत्र सूना क्यूं होता जा रहा है? संभवत: पुराने किस्म के उपन्यास अब कम लिखे जा रहे हैं। वैश्र्वीकरण के कारण यह परिवर्तन आया है। अब महाआख्यानों (मेटानरेटिव) का नहीं, लघु आख्यानों का समय है।
साहित्य का विचारधारा से क्या संबंध है? इन दिनों हिंदी लेखन में दोनों का संबंध बहुत स्वस्थ रूप में नहीं रह गया है। उत्कृष्ट साहित्य विचारधारा का अतिक्रमण करता है। साहित्य भविष्य में स्त्री-पुरुष के आपसी संबंधों को किस रूप में देखेगा? भविष्य में साहित्य के क्षेत्र में स्त्री-पुरुषों के संबंधों में और खुलापन दिखेगा। यह तय नहीं हो पा रहा है कि यह समाज वैश्र्वीकरण की चुनौती को किस हद तक स्वीकार करेगा! स्त्री-पुरुष संबंध समानता की ओर बढ़ेंगे, तभी स्वस्थ समाज का निर्माण हो पाएगा।
साहित्य में अश्लीलता क्यूं आती जा रही है?
कोई रचनाकार विषय-वस्तु को ध्यान में रख कर ऐसे प्रसंगों को लाता है, जो समय को समझने में सहायक हों। किसी पाठक को वह अश्लील लगता है या नहीं, यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। समाज में जो कुछ हो रहा है, उसे साहित्य सिर्फ चित्रित करता है।
आपके उपन्यास को पढ़ कर लगता है कि आपने पुस्तकालयों में काफी समय गुजारा है! पुस्तकों से मेरा संबंध कपड़ों और भोजन की तरह है।
उपन्यास में आध्यात्मिकता की बात कहां से सूझी? मनुष्य के जीवन में आध्यात्मिकता की भूख होती है। आधुनिक जीवन में स्पेस का संकुचन उसे परेशान करता है और वह आध्यात्मिकता की ओर बढ़ता है।
उपन्यास में विनायक की बेटी के साथ आपने अन्याय क्यूं किया?
यह समय पूरी कहानी कहने की नहीं है। कई लोगों ने मुझे कहा कि इस उपन्यास के कई पृष्ठ लेखक ने अपने पास रख लिए हैं। [प्रस्तुति : आनंद कुमार सिंह, दैनिक जागरण]