Showing posts with label पूर्वांचल. Show all posts
Showing posts with label पूर्वांचल. Show all posts

Saturday, 28 August 2010

गनीमत है व्योम जी ने बंगाल को इस बार बख्सा !

कोलकाता के एक हिंदी कथाकार की भविष्यवाणियाँ पढते हुए कुछ समय बीत गया है. मुझे लगता है इस कथाकार की बातों को मित्रों के बीच रखा जाना चाहिए. लोगों को मज़ा आयेगा. हो सकता है इन बातों में अगर 'मेरिट' होगा (जिसे मुझ जैसा आदमी समझ नहीं पा रहा) तो लोग मुझे समझने में मदद करेंगे. ये महाशय नाम बदल बदल कर कभी राधेलाल तो कभी व्योम तो कभी दुबे बनकर अपने फ्यूचरिस्टिक सोच का प्रचार कर रहे हैं. बडी मेहनत कर रहे हैं पर हाय रे हिंदीवाले पूर्वांचली वे इन बातों को अभी तक ठीक से समझ नहीं सक रहे.
क्या हैं ये विचार. बातें तो उन्होंने बहुत घिनौने तरीके से भी कही हैं लेकिन ब्लॉग की गरिमा को ध्यान में रखते हुए एक ही छोटी टिप्पणी दे रहा हूं. आशा है लोग इस महान व्यक्ति के महान उद्गारों को समझने में मेरी मदद करेंमन भर आया,ग्लानि और पाप बोध के हिमालय के नीचे दबा पडा हूं। सचमुच हम औरत को ऐसे रखते हैं,दबा कर ,कुचल कर,बिस्तर और चादर की तरह…फिर अपने चारो ओर नजर दौडाई।


विश्वास के साथ कह सकता हूं कि ऐसा मैंने देखा नहीं-हो सकता है -वो नजर ही अल्लाह ने ना बख्शी हो। यह क्या प्रांत विशेष ,भाषा विशेष का सच हो सकता है,या भारत में यूनिवर्सल सच है। बिहार का सच पूरे भारत का सच नहीं है।पूरे हिंदी प्रदेश में भी साम्य नहीं है। कस्बे का सच महानगर का सच नहीं है। काम-काजी महिलाओं का सच सारी औरतों का सच ना हो?पढी लिखी होने के अपने पचडे हों,मह्त्वाकांक्षा क्या -क्या नहीं करवाती। महत्वाकांक्षा ना कह कर लालच-लोभ भी कह सकते हैं। अनप्रोडक्टिव महिला-पुरुष को कैरियर बनाने के लिये दुष्चक्र में फंसना पडता है। स्त्री थोडी ज्यादा वलनरेवल है ,पुरुष से। ये समस्या ‘गो पट्टी’ की ज्यादा है,मीडीया,कॉलेज,सरकारी नौकरी ,हिंदी,कस्बा,

(प्रदेश का नाम लेना ठीक नहीं होगा),ये सब मिल कर एक गोल बनाते हैं-जहां ये बीमारी महामारी का रूप ले चुकी है। बंगाल में ऐसा नहीं होता,शायद हरियाणा-राजस्थान,पंजाब में भी नहीं। दक्षिण भारत में भी नहीं । अब जिनके लिये अकादमिक कैम्पस ही भारत है,उनकी बात अलग है। जहां दूसरे रोजगार हैं,इटरप्योनोरशिप है ,उन्हें इस गलाजत के बगैर भी डिग्निटी सुलभ है। सरकारी नौकरी पाना जब लॉटरी लगने जैसा हो गया है,तो फिर लॉटरी की कीमत भी वसूली जाना घोर अपराध नहीं है। 5 साल जाने दीजिये सरकारी नौकरियों के लिये ‘सुपारी किलर’ तैनात होंगे। रेल मंत्रालय अगर गरीब मुल्क में 5-10 लाख मुवाअजा देने लगे तो लोग बाप -भाईयों-माता-बहनों को रेल से धक्का देकर हत्या पर उतारू होंगे। गरीब मुल्क है ना,खाई चौडी हो रही है,और पूरा समाज इस खाई में गिर कर मरेगा। :ps:सांसदों का वेतन पांच गुना बढ गया है,दुनिया के सरकारी चाकर एक हों।इंक्लाब जिंदाबाद

गे.
टिप्पणी देखें-

Tuesday, 10 August 2010

माफी मांगें विष्णु खरे

विभूति नारायण राय ने तो माफी मांग ली अब देखना है विष्णु खरे क्या करते हैं

विभूति नारायण राय ने 'छिनाल' शब्द का आपत्तिजनक प्रयोग किया और उन्हें प्रतिवाद के सामने अंतत: माफी मांगनी पडी. जिसने भी वह इंटरव्यू ठीक से पढा होगा उन्हें यह पता होगा कि उस टिप्पणी का एक संदर्भ था, लेकिन उनके वक्तव्य से युवा लेखिकाओं की भावना को ठेस लगती है इस आरोप के कारण ही राय को प्रतिवाद के सम्मुखीन होना पडा. इस तर्क को अगर माना जाए तो विष्णु खरे के लेख से तो हिन्दी समाज के तमाम लोगों का ही अपमान करने की कोशिश की गयी है. जिस असभ्य तरीके से खरे ने पूर्वांचल के युवा लेखकों के बारे में एक आपत्तिजनक शब्द का प्रयोग किया है उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए कम है.



जब से विभूति नारायण राय का इंटरव्यू आया है एक मुहिम जनसत्ता से लेकर तमाम जगहों में शुरू हो गयी है. साहित्य में प्रमाद 1 (जनसत्ता 10 अगस्त) के आते आते यह स्पष्ट हो गया है कि हिन्दी के कुछ लोग अपने राग-द्वेष को छुपाकर अपनी कुंठाओं को व्यक्त करने का ऐसा मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते. विष्णु खरे को एक प्रखर बुद्धिजीवी के रूप में जानने वालों के लिए 'साहित्य में प्रमाद' प्रसंग 'छिनाल प्रसंग' से कम कुत्सित नहीं लगेगा. खरे ने जिस अराजक सोच के साथ विभूति नारायण राय प्रसंग को अपनी कुंठाजनित सोच से जोडा है उसके भौंडे प्रदर्शन को इस लेख में देखकर हिन्दी के एक कवि के ऐसे घोर पतन पर रोया ही जा सकता है. जिस भाषा का प्रयोग उन्होंने हिन्दी के यशस्वी विद्वानों के लिए किया है वह उनकी कुंठाओं को सामने लाने वाला है. खरे ने अंग्रेज़ी की किताबें पढी हैं और यूरोपीय ज्ञान से जुडने के बाद बहुत सारे लोगों को अपने देश के लोग गंवार और अपनी भाषा के विद्वान 'मीडियाकर' लगने लगते हैं. उन्हें मन ही मन इस बात की कचोट रहती है कि उन्हें हिन्दी समाज के लोग वो सब कुछ क्यों नहीं दिलाते जो अंग्रेज़ी वालों को इस देश में मिलता है. मेरा अनुमान है कि विष्णु जी रामविलास शर्मा को बहुत ही 'ओवरैस्टिमेटेड मीडियॉकर' से ज्यादा नहीं मानते होंगे. खरे साहब का यह हाल है कि वे 'विनाश काले विपरीत बुद्धि' तक भी यूनान की कहावत से आते हैं. पता नहीं कैसे खरे इस बात से अपनी बात शुरू करने का दंभ दिखाते हैं कि उन्होंने अपने 'पूर्वाग्रहों ' के कारण विभूति नारायण राय के सानिध्य से बचे ! वह यह बतलाना चाहते हैं कि वे कितने पाक दामन हैं. हिंदी की सारी दुनिया फंतासियों में जीने वाली, कल्पनातीत अपात्र वेतनमान के साथ यौनशोषण को बढावा देने वाली दिखलाई पडती है. यहीं तक नहीं वे मानते हैं कि अनेक हिन्दी विभागों को पुरूष वेश्याओं के चकले बन गये हैं ! हिन्दी की अनैतिक साहित्यिक सत्ता प्रकरण पर आने के पहले वे रामचन्द्र शुक्ल से लेकर सुधीश पचौरी जैसे "अकादमिक बौने छुटभैयों" का उल्लेख करना नहीं भूलते. खरे साहब इस बात के लिए याद किए जाने चाहिए कि उन्हें इस बात का अहसास है कि "दक्षिण एशिया के वर्तमान सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक पतन के लिए मुख्यत: हिन्दी भाषी समाज यानी तथाकथित हिन्दी बुद्धिजीवी जिम्मेदार और कसूरवार है." जिस थाली में खाओ उसी में छेद करो के ऐसे उदाहरण कम ही मिलेंगे.

मुझे लगता है कि विष्णु खरे की सबसे महत्त्वपूर्ण टिप्पणी यह है - " दुर्भाग्यवश अब पिछले दो दशकों से हिंदी के पूर्वांचल से अत्यंत महात्वाकांक्षी, साहित्यिक नैतिकता और खुद्दारी से रहित बीसियों हुडकूलल्लू मार्का युवा लेखकों की एक ऐसी पीढी नमूदार हुई है जिसकी प्रतिबद्धता सिर्फ कहीं भी और किन्हीं भी शर्तों पर छपने से है."

यह कैसे क्षम्य है, इसका जवाब खरे से मांगा जाना चाहिए. यह टिप्पणी कैसे राज ठाकरे की टिप्पणी से गुणात्मक रूप से भिन्न है, और इस टिप्पणी के लिए क्यों विष्णु खरे को माफी नहीं मांगनी चाहिए?

हिन्दी का पूर्वांचल कहां है और कौन कौन से लोग खरे को दिखलाई पड रहे हैं जो हिन्दी के अन्य क्षेत्रों की तुलना में नैतिकता विहीन हैं.

एक बार अगर यह मान भी लिया जाए कि हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि-पत्रकार विष्णु खरे ने अपनी बात दर्द से अपनों से तीखे ढंग से की है तो भी इन वक्तव्यों के पीछे छिपी कुठाएं हमें यह बतलाती हैं कि वे बौखलाए हुए दंभी दिल्ली के ऐसे बुद्धिजीवी हैं जिन्हें इस बात की खबर नहीं है कि ऐसे चालाक-चतुर सठिया गये होने का अंदाजा नहीं है.

हिन्दी विभाग और हिन्दी से जुडी संस्थाएं सबकुछ ठीक से कर रही हैं ऐसा मानने वाला कोई नहीं होगा लेकिन क्या हिंदी के जुडते ही कोई विभाग, कोई संस्थान, कोई राज्य या कोई बुद्धिजीवी घटिया और नैतिकताविहीन हो जाता है? मैकॉले और नीरद चौधरी की संतानें ऐसा कहें तो हम समझ सकते हैं लेकिन एक ऐसे व्यक्ति की कलम से इस तरह के भाव का आना हमें व्यथित करता है.

जनसत्ता में इस तरह के लेख का छपना बगैर प्रतिवाद के नहीं जाना चाहिए. विभूति नारायण राय के प्रसंग में जनसत्ता के साथ चलकर विष्णु खरे अपने अतिवादी अराजक सोच को भी उसके साथ नत्थी करने की जो कोशिश कर रहे हैं वह निंदनीय है. उन्हें माफी मांगनी चाहिए.