पराजय के इस दौर में
हितेन्द्र पटेल
भारतीय समाज इतना वैविध्यपूर्ण और जटिल है कि इसे सांख्यिकीय आधार पर नहीं समझा जा सकता. पर, अगर नीयत साफ हो तो इस समाज में व्याप्त सामाजिक और आर्थिक विषमता और इस समाज की आंतरिक शक्ति को समझने के लिए साक्षात्कार ही काफी है. गाँधी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे मनीषियों ने इस समाज को समझने और इसमें परिवर्तन हेतु कभी भी सरकारी सर्वेक्षण और रिपोर्टों की जरूरत महसूस नहीं की. विवेकानंद , गाँधी, जयप्रकाश, विनोबा आदि लोगों के लिए देश को जानने समझने के लिए लोगों से देशाटन के दौरान मिलना ही यथेष्ट था. यह आधुनिक यूरोपीय बोध से जन्मा कॉमन सेंस है कि संख्या और सांख्यिकी से ही समाज को समझा और उसकी प्रगति के लिए सरकारी नीति बनायी जा सकती है. नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह या निलकेनी तक संख्या और सांख्यिकी की इस सत्ता और औचित्य को लेकर सहमति है. इस लॉजिक को मान लेने के बाद सब कुछ संख्या-बल और राजनीति पर ही केन्द्रित हो सकती थी और वही बात आज भारत में हो रही है. यह एक दिलचस्प बात है कि जिस आधार पर भारतीय राष्ट्रवाद की 'खोज' या प्रतिष्ठा हुई थी उसी को नकारने के लिए आज होड मची हुई है. राष्ट्रवाद को लेकर कांग्रेस के भीतर भी एक गुणात्मक परिवर्तन हुआ है. 2001 में जब जाति के आधार पर गणना की बात चली तो इस दल ने विरोध किया. अब 2011 में अन्य दलों के साथ कांग्रेस भी इस पक्ष में हो गई है कि जाति के आधार पर जनगणना जरूरी है! यानि पिछले दस सालों में ऐसा कुछ हुआ है जिसके कारण यह बात मान ली गयी कि जाति की गणना सरकारी नीति निर्धारण के लिए आवश्यक है. यानि वर्ग नहीं वर्ण के आधार पर भारतीय समाज को समझा जा सकता है. यह बात भारतीय राजनीति में लोहिया ने अपने जीवन के अंतिम दशक में राजनैतिक दबाव के कारण प्रतिष्ठित की. (उनके चिंतन में इस विषय पर मौलिक और विषद चिंतन है जिसमें लोग उतरना नहीं चाहते) लेकिन, इस बात को वास्तविक रूप से पिछले दो दशकों में बहुत भोंडे ढंग से प्रचारित किया गया. जाति अब राजनीति का धर्म के साथ एक मान्य अस्त्र बन गया. कोई भी पार्टी अब इस बात के ऊपर नहीं उठ सकती. ऐसे में सबको लग रहा है कि जाति के आधार पर जनगणना से बात साफ हो जाएगी और सरकार को नीति निर्धारण के लिए एक स्पष्ट आधार मिल जाएगा. कुछ सवर्ण दल और राष्ट्रवादी विचार के लोग इसका विरोध नीतिगत कारणों से कर रहे हैं, लेकिन कुल मिलाकर देश में यह बात स्वीकृत सी हो गई है कि जातियों के संख्या निर्धारण में कोई हर्ज़ नहीं है. यह आधुनिक इतिहास की एक विडंबना ही कही जायेगी कि जाति को मिटाते मिटाते देश की सरकार के नीति निर्धारक आधार के रूप में जाति को स्वीकार कर लिया गया है! आज समय आ चुका है जब लोग गाँधी को बनिया, रवीन्द्रनाथ को ब्राह्मो -ब्राह्मण, जयप्रकाश को कायस्थ, सहजानंद को भूमिहार, अंबेडकर को महार कहकर सोचें कि इसमें बुराई क्या है! इस तरह की सोच अब और शक्तिशाली होने वाले हैं. यह औपनिवेशिक आधुनिक यूरोपीय सोच की जीत और उदार भारतीय राष्ट्रवादी सोच के पराजय की सूचना देने वाले समय की शुरूआत है.
अंग्रेज़ी शासन के दौरान जो भारत के संबंध में धारणा बनी उसके मूल में यह बात थी कि भारतीय समाज मूलत: धर्म और जाति पर आधारित समाज है जो बदलाव को नहीं स्वीकारता. स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान जो प्रधान विचारधारात्मक संघर्ष उभर कर सामने आया वह यही था कि एक प्रकार की शक्तियाँ इन धर्म और जातीय पहचानों को केन्द्रीय मानती थी (जिसमें साम्प्रदायिक दल, ब्रिटिश हुकूमत और पुनरूत्थानवादी शक्तियाँ एक ओर थी और कांग्रेस एवं वामपंथी समूह (समाजवादी और साम्यवादी) दूसरी ओर. भारतीय पहचान के विकास के दौर में , कम से कम 1890 से 1935 तक , यह ध्रुवीकरण कुछ इस तरह होता रहा कि यह संभावना बनने लगी कि भारत भी अन्य विकसित समाजों की तरह इन प्राक-आधुनिक सामाजिक बंधों की जगह राष्ट्रीय पहचान की ओर बढेगा. धीरे-धीरे यह जाति का जोर खत्म होगा और लोग आधुनिक पहचान के साथ सामाजिक जीवन व्यतीत करेंगे. 1931 के बाद जाति के आधार पर जनगणना भी नहीं हुई और अभी भी किस जाति के कितने लोग हैं इसे जानने के लिए या अनुमान करने के लिए 1931 की जनगणना को ही आधार बनाया जाता है. समस्या का नया सन्दर्भ तब बना जब स्वतंत्रता के बाद सरकार के नीति निर्धारण के लिए जातीय आधार को रखा गया. संकट यह था कि नीति निर्धारण के मामले में जाति को आधार बनाए रखा गया और जातीय आँकडे जनगणना के साथ उपलब्ध करने को देश की एकता के लिए खतरा माना गया ! यह एक विडंबनापूर्ण स्थिति थी.
जाति और उसका समाज में स्थान भारत में परिवर्तनशील रहा है. कौन 'ऊँची' और कौन 'नीची' जाति है इसको लेकर कभी भी एकमत नहीं रहा. एक ही जाति के भीतर सैकडों उपजातियाँ रही हैं जिनमें आपस में रोटी-बेटी का संबंध सहज नहीं था. ब्राह्मण, राजपूत के अतिरिक्त किसी भी जाति को देश भर में ऊँची जाति के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता था. कौन जाति के किस पायदान पर है इस बात को तूल जिस समय से दिया जाने लगा उसी समय से जाति का प्रश्न बडा प्रश्न बन गया. इतिहासकारों ने पिछले तीस वर्षों में बहुत विस्तार से इसका विश्लेषण किया है कि कैसे 1871 और 1881 के बाद जनगणना ने जातियों के बीच अपनी जाति के संगठन और अधिकारों के प्रति सचेतनता के दायित्त्व बोध को बढाया और इन पहचानों को स्थानीय सन्दर्भ से उठाकर राज्य और राष्ट्रीय सन्दर्भ प्रदान किया. जाति का प्रश्न इतना उलझा हुआ रहा है कि लगभग हर गणना करने वाले ने इस काम को करने में बहुत समस्याओं का सामना किया. हर टेबुल के साथ अन्य जातियाँ, जिन जातियों के नाम नहीं है आदि नाम से टेबुल बनाए जाते थे. कई जगहों पर जाति पूछने पर लोग अपने काम को बताते थे ! यह निश्चित है कि इस देश के बहुत सारे लोगों को अपनी जाति बताने में कठिनाई थी. पर, सरकार का आदेश था कि हर किसी की एक जाति होनी ही चाहिए इसलिए एक आदमी के साथ एक जाति का उल्लेख जरूरी थी. 1917 के बाद संकट और गहराया जब पिछडी जातियों के समूहों को एक साथ लाकर सरकारी हस्तक्षेप की शुरूआत हुई. माँटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार ने इसको वैधानिक आधार दिया और 1935 के एक्ट ने इसपर मुहर लगा दी. इस बीच दक्षिण के राज्यों में हुए दलित जातियों के आन्दोलनों, फूले, अंबेडकर एवं नायकर आदि के प्रयत्नों ने इसको सामाजिक और राजनैतिक वैधता दी. कहा जा सकता है कि अंग्रेजों ने फूट डालो और शासन करो की नीति के तहद इस तरह के विखंडनकारी सोच को बढाया और कांग्रेस के नेतृत्व में जारी राष्ट्रीय आन्दोलन की हवा निकालने की कोशिश की. लेकिन, सच्चाई यह भी है कि जिस तरह के हालात थे उसमें किसी भी सरकार के लिए निम्न जातियों के लोगों के लिए अलग व्यवस्था की बात करना उचित ही था.
यह बात आज कुछ विद्वान कह रहे हैं कि अगर जाति के आधार पर अगर जनगणना हुई तो देश में फूट पडेगी और लोगों में जातीयता की भावना और बढेगी. यह सही ही है. देश का हर नागरिक अगर बाध्य हो कि उसे अपनी जाति के साथ अपनी पहचान को नत्त्थी करना पडे तो यह बात सही ही होती है कि अगर सब कुछ करके भी अंतत: इसका उत्तर देना पडे कि आपकी जाति क्या है, तो हमने क्या किया?
आज की बदली परिस्थिति में जाति को लेकर हुई लोहिया युग की राजनीति का सकारात्मक पक्ष भी नहीं है. लोहिया ने जो जाति को आधार बना कर कांग्रेस विरोध की राजनीति को मजबूती दी थी उसमें आरक्षण का प्रश्न और पिछडों का उभार केन्द्रीय था. लोहिया की दृष्टि भारतीय राजनीति की दिशा को समझ रही थी और वे देश को लोकतांत्रिकीकरण के अगले चरण के लिए तैयार कर रहे थे जिसमें पिछडे भी शक्तिशाली हो रहे थे. सही विश्लेषण और नीति से शुरू हुए पिछडावाद का बाद में जो पतन लालूवाद और मुलायमवाद में हुआ उसको ध्यान में रखने पर एकबारगी यह भय तो होता ही है कि इन नेताओं के हाथों अगर जाति की संख्या का खेल नामक गोटी आ जाये तो ये देश में मार-काट मचा देंगे. लेकिन, सौभाग्य से यह अतिपिछडावाद अब उतना गैर-जिम्मेदार नहीं रह सकता. कुछ उलट फेर के बाद अब लोगों में जिस प्रकार की अपेक्षा का वातावरण तैयार हो चुका है उसको देखते हुए यह नहीं लगता कि अब फिर से अंध-पिछडावाद राजनीति पर हावी हो सकेगा. सौभाग्य की बात यह भी है कि पिछडों के नेताओं में 'विकास' और जनोन्मुखता की भावना जोर पकड रही है. फिर भी नीतिश कुमार जैसे नेताओं को कब पासवान और लालू मिलकर पटखनी दे दें कोई नहीं बता सकता. फिर भी यह तो लगता ही है कि अगर लालू जी की पार्टी आ भी गयी तो भी वो पुराने दिनों वाली निश्चिंती उन्हें नहीं प्राप्त होगी. यह एक शुभ संकेत है कि झारखंड में भी आदिवासी राजनैतिक क्षितिज पर कई नेता उभर रहे हैं. उसी तरह पिछडों में भी नेताओं की अब कोई कमी नहीं है.
[ऐसी परिस्थिति में जाति की गणना की तरफ अगर अंतत: जाना ही पडे तो कम से कम दो तीन सावधानियों को ध्यान में रखा जाए. सबसे पहले यह ध्यान देना चाहिए कि जाति की गणना के दौरान मीडिया और राजनेताओं को सावधान होकर काम करना होगा. मीडिया अगर इस बात को गलत तरीके से पेश करने लगे तो सरकार को अपना दायित्व पालन करना होगा. इस देश का अंग्रेज़ी मीडिया ही देश में सबसे ज़्यादा संशय का वातावरण बनाता आया है. आपको याद होगा प्रणय राय आदि ने जब चुनाव विश्लेषण को फैशनेबुल बनाया तो वे जाति के आधार पर वोट पैटर्न को समझने और समझाने लगे थे. धीरे धीरे इस तरह के लैपटॉपी लोगों ने चुनाव परिणामों के बारे में भविष्यवाणी करने के 'वैज्ञानिक' विश्लेषण को करोडों का कारोबार बना दिया. पूरी संभावना है कि अंग्रेज़ी मीडिया इस नये मुद्दे पर बाबा लोगों को बिठाकर बहस करके देश को यह संदेश देंगे कि यह सब कुछ इस लिए हो रहा है क्योंकि सरकार जानना चाहती है कि किस जाति के कितने लोग हैं और सरकार उनको लेकर क्या नीति निर्धारित कर सकती है. सबकुछ इतना सरकार पर आधारित होता जा रहा है कि समाज के मत पर कोई ध्यान नहीं देना चाहता. हिन्दी मीडिया कुल मिलाकर अंग्रेज़ी मीडिया का भदेस संस्करण बनता जा रहा है और वैकल्पिक मीडिया का भविष्य तय नहीं हो पा रहा है. ऐसे में इस विषय पर तमाम बहसों के बाद की तय राय वही होगी जो सरकार चाहेगी. ]
इस निराश कर देने वाली बात को रखते हुए एक बात कहना चाहूंगा. तृतीय विश्व के देशों के लिए यह एक चुनौती है कि वे दिखलायें कि वे भी अन्य सभी समाजों की तरह विकल्प और परिवर्तन को स्वीकार करते हैं. धर्म के मामले में कम से कम धर्मांतरण करके या अपने को नास्तिक घोषित करके एक नागरिक एक विकल्प ढूंढ सकता है. जाति के मामले में क्या विकल्प है? और फिर जिस परिवार में एक से अधिक जातियाँ आ जुटी हैं वे क्यों एक जाति में ही अपनी पहचान ढूढने के लिए राज्य द्वारा अभिशप्त हों? कोई भी व्यक्ति किसी जाति में जन्म लेकर श्रेष्ठ या निम्न नहीं होता. इस बात को अगर हम मान लें तो फिर जाति को तो सिर्फ मिटाए जाने की सोचना चाहिए. आधुनिक भारत में जाति को कमजोर करने और उसे कम प्रभावी बनाने के लिए साठ बरस का चालीस साल का समय 'ऊँची' जातियों को मिला लेकिन वे अपने दंभ और मूर्खता के कारण यह नहीं समझ पाए कि अब समय पिछडों को आगे लाने का है. मंडल कमीशन के बाद जिस तरह से जातिवादी राजनीति को बल मिला उसके कारण ही भारतीय होने की पहचान कमजोर हुई और अपनी जाति की पहचान शक्तिशाली हुई. इस परिणाम के लिए तथाकथित ऊँची जातियों का औद्धत्य (औडासिटी) जिम्मेदार है जिसने लंठ पिछडावाद को राजनैतिक रूप से शक्तिशाली बना दिया. सिर्फ नयी रौशनी की एक आदर्शवादी उम्मीद अब बची है जो देश के किसी किसी कोने से कभी कभी दिखलाई पडती है. भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति लोगों में आस्था अगर सच्ची होगी तो इन प्रयासों को जन समर्थन मिलेगा . नहीं तो जाए भैंस पानी में ... .
[Sablog, June 2010]
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Friday, 10 September 2010
Friday, 21 August 2009
जाति का प्रश्न
जाति का प्रश्न
औपनिवैशिक उत्तरभारतीय परिदृश्य (1880-1930)
हिन्दी समाज के बौद्धिकों ने इस समाज के सबसे बडे प्रश्न- जाति पर जिस तरह से सोचा विचारा है उसपर हाल के वर्षों में समाज शास्त्रियों का ध्यान गया है. सन्दर्भ चाहे 1857 का हो, नवजागरण का हो, साम्पदायिकता का हो या फिर राष्ट्रवाद का जाति के प्रश्न को सामने रखने की कोशिश लगातार हो रही है. तेलगु, तमिल, मलयालम और सबसे अधिक मराठी साहित्य के श्रोतों का उपयोग कर नये सोच के साथ इन भाषिक समाजों के ‘इंटेलिजेंसिया’ वर्ग की विचारधारा के विभिन्न स्तरों की बहुस्तरीय पडताल अभी जारी है. आज अत्यंत सक्रिय दलित साहित्य आन्दोलन के कुछ विचारकों के अनुसार “ हिन्दी नवजागरण के लेखक धार्मिक रूढियों से बँधे दिखाई देते हैं, इसीलिये वहाँ ‘वर्ण व्यवस्था’ का विरोध नहीं समर्थन है.” [1] हिन्दी में एक दिलचस्प बात यह देखी जाती है कि ज्यों ज्यों नवजागरण का प्रभाव बढा जाति के प्रश्न पर सीधी तरह से तीखी टिप्पणी से, सन्दर्भ विवेचन से बचने का चलन बढता गया. जाति के उल्लेख कम होने के पीछे इन समाजों में जाति का कम महत्त्व पूर्ण होना नहीं था बल्कि राष्ट्रवाद के एक खास तरह के सोच का परिणाम था जिसके अंतर्गत यह माना जाने लगा कि बोध और रचनात्मक स्तर पर जातिवादी (कास्टिस्ट) सन्दर्भ को लाने से हमारी राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में बाधा उत्पन्न होती है. निश्चित रूप से जाति का विरोध प्रेमचन्द से पहले भी था और कुछ हिन्दी बौद्धिक जाति को इस देश के विकास में एक बडी बाधा मानते थे, लेकिन अधिकतर हिन्दी लेखक जाति के प्रश्न पर वर्णाश्रमी प्रभाव से मुक्त नहीं थे और इस समाज में जाति की विभीषका के प्रति उतने सचेत साहित्य में नहीं दिखलाई पडते जितनी की ज़रूरत थी. प्रेमचन्द, राहुल, चतुरसेन शास्त्री और कुछ लेखकों में जाति के प्रश्न पर बैचैनी दिखलाई पडती है लेकिन आज ऐसा प्रतीत होता है कि कुल मिलाकर हिन्दी के लेखकों को जाति पर और अधिक गहरे जाकर विचार करना चाहिये था. जब फणीश्वर नाथ रेणु की अमर कहानी में बूढा मिरदंगिया एक ब्राह्मण को प्यार से बेटा कह देता है तो गांव के लडकों ने घेरकर उसे मारने की तैयारी कर ली क्योंकि “ बहरदार होकर ब्राह्मण के बच्चे को बेटा कहेगा? मारो साले बुड्ढे को घेरकर ! मृदंग फोड दो!” रेणु की अद्भुत अपूर्व शैली में यह आया है कि “ मिरदंगिया ने हँसकर कहा था, “ अच्छा, इस बार माफ कर दो सरकार ! अब से आप लोगों को बाप ही कहूंगा!” बाद में नागार्जुन ने इस हँसी को ‘फेड’ होते देखा और उसकी जगह एक क्रोध को जन्मते देखा और कहा- “दलित माओं के सब बच्चे अब बागी होंगे”. ( हरिजन गाथा)
यह सब उस दौर तक ही हो चुका था जब दलित साहित्य हिन्दी में नहीं आया था और न ही राजनैतिक रूप से शक्तिशाली दलित- पिछडों के उत्थान के बाद इस तरह की बातों को कहने का चलन शुरू हुआ.
इस आलेख में हिन्दी ‘इंटेलिजेंसिया’ के नवजागरण के दौर में जाति को लेकर जो सोच रहा था उसपर कुछ उदाहरणों के उल्लेख द्वारा संकेत करने का प्रयास किया गया है. बहुधा यह कहा जाता है कि कुछ अतिउत्साही दलित लेखक नवजागरण को छोटा बनाने की कोशिश करते हैं और साक्ष्य न होते हुए भी इस दौर के हिन्दी बौद्धिकों पर उलटी सीधी टिप्पणियां करते रहते हैं. उन्नसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में निचली जातियों –खासकर पिछडी जातियों के उभार के प्रति जो ब्राह्मणवादी नज़रिया था उसका कितना और किस तरह का प्रतिफलन हिन्दी साहित्य में हमें मिलता है इसकी जांच करना भी इस पर्चे का उद्देश्य है. इसी विवाद का एक दूसरा पक्ष यह है कि किस प्रकार औपनिवेशिक दौर में जातियों के पायदान में ऊपर उठने के लिये निचली जातियों में 1890 के बाद से 1911 तक होड लगी हुई थी और निचली जातियों के नेता अपना जातीय इतिहास लिखकर अपनी जाति का एक गौरवपूर्ण इतिहास लिखकर यह बतलाने में लगे थे कि कैसे वे ब्राह्मण, क्षत्रिय थे और बाद में अन्यायपूर्ण तरीके से उन्हें निचली जाति का बना दिया गया. मैंने अन्यत्र इस प्रसंग की विस्तार से चर्चा की है.[2] इस आलेख में राष्ट्रीय बनने के दौर में उत्तर भारतीय समाज के बौद्धिकों में निचली जातियों के उत्थान के दौर में उनके प्रति भावों की साहित्यिक अभिव्यक्तियों को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है.
1
निचली जातियों और अगडी जातियों को साथ लेकर हिन्दू एकता की बात उन्नसवीं शताब्दी के आठवें दशक में भी कही जाती थी. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की पत्रिका हरिश्चन्द्र मैगज़ीन के अप्रिल 1874 अंक में एक लेख छपा था- ‘पबलिक ओपिनियन’ जिसमें ब्राह्मण से लेकर शूद्र तक सबको लेकर एक वर्णाश्रम हिन्दू धर्म के आदर्श की बात की गयी थी. इसके अनुसार हिन्दु जातियों के आपसी फूट के कारण सब (हिन्दू) “ बल सत्यानाश में मिल गया और यह बात ध्यान से बाहर हो गई कि हिन्दू भी कभी एक मत थे.” [3] इस लेख के लेखक का प्रस्ताव था कि “ धर्म और व्यवहार को एक में न सानैं.” [4]लोगों को अलग अलग विश्वासों को मानने का हक है लेकिन जहाँ “ व्यौहार का काम पडै सब एक हो जाओ और जब अपने हित की बात आवैं तब एक सी आवाज़ दो.”[5] इस तरह के उदाहरण भारतेन्दु से लेकर माधव प्रसाद मिश्र और अयोध्याप्रसाद हरिऔध इत्यादि साहित्यकारों की लेखनी में सहज ही मिल जाते हैं जहां हिन्दुओं की एकता के लिये सभी हिन्दुओं- ब्राह्मणों से लेकर शूद्रों तक – के बीच एकता की बात कही जाती थी. लेकिन, विभिन्न जातियों के बीच जो तनाव समाज में था उसके कारण ज्यों ज्यों निचली जातियों के लोग अपना इतिहास लिखने लगे और अपने को ऊँची जातियों के समतुल्य बताने लगे तनाव बढा. इन निचली जातियों के सामुदायिक इतिहास पर कम काम हुआ है, लेकिन उन्नसवीं शताब्दी में ऊँची जाति के लोग भी यह मानते थे कि दुसाध जाति के लोग राज करते थे. बाद में इस तरह की उदार इतिहास दृष्टि का लोप हो गया. उदाहरण के तौर पर पुराने मुंगेर जिले के गिद्धौर के एक क्षत्रिय राजा का जीवन चरित लिखते हुए एक प्रसिद्ध क्षत्रिय विद्वान ने लिखा है: “पहले इस देश में 816 वर्ष बहेलिये वा दुसाध राज्य करते रहे सम्बत 1123 में राजा विक्रम सिंह चन्दैल अगोरी बरदी से यहां आए और श्री बैद्यनाथ जी की कृपा से निंगुरिया नामी दुसाध को मार राज्य ले लिया तब से आज तक बराबर इनके वंश में राज्य चला आता है, इस राज्य के आधीन चान्दन, चकाई, विस्तहाजरी, और बहुत से फुटकर महाल हैं.[6]
औपनिवेशिक दौर में निचली जाति के उत्थान के प्रति अवज्ञा का भाव शुरू से था. विद्वान लेखक भी कभी कभी इस बात से बडे परेशान होते थे कि नीच लोग अंग्रेज़ी राज में कुछ ज़्यादा ही बढ चढ गये हैं. रामदीन सिंह ने एक खराब नीति की चर्चा करते हुए एक अन्य क्षत्रिय सुधारक के हवाले से कहलाया है कि “यह (खराब) नीति तो ब्राह्मण क्षत्री की नहीं है हाँ चंडाल चमार कसाई की अवश्य है.”[7] आगे कहा गया है- “ बाबू हितनारायण सिंह बराबर कहा करते थे कि नीचोँ से सर्वदा बचना चाहिए क्योंकि अब वह समय नहीं रहा कि जिस में वर्ण विचार हो और अंग्रेज़ अमलदारी होने से सब धन बाईस पसेरी अर्थात सब बराबर हो गये बल्कि नीच ही लोग बढ चढ गये तो उनसे एक दो बात परहेज ही करना ही हमलोगों को उचित है और समय ही देखकर काम करना बहुत अच्छी बात है. क्योँकि सरकारी कर्मचारी लोग यही जानते हैं कि ब्राह्मण क्षत्री ही वैश्य शूद्र पर ज्यादती करते हैं. इसलिए सब किसी को उचित है कि दुष्ट और कांटा से बचाकर रहना ही भला है न तो भली भांति उनका मुंह तोडना ही भला है... खाल काँटा इन दुनहु को , दोई जगत उपाय / जूतन ते मुख तोडिबो , रहिबो दूर बचाय”[8] इस भाव को और स्पष्ट करते हुए रामदीन सिंह ने जोडा है- “आज कल यही हाल देखने में आता है शहरों में दूकानदारों से कुछ कहो तो चट गाली दे देते हैं, कुंजरिन से बोलो तो तो वह भी फटकारती है भले मनुष्यों का कहीं भी गुजर बिना गम खाये नहीं हो सकता है.”[9]
रामदीन सिंह ने यह भी लिखा है कि “ यह तो सब कोई जानते हैं कि जैसी विपत्ति आजकल क्षत्रियों पर है वैसी और किसी और किसी जाति पर नहीं.”[10] वे इस विपत्ति का मुकाबला करने के लिये क्षत्रियों के लिये एक पत्रिका शुरू करते हैं जिसके विज्ञापन का घोषणा पत्र में वे बतलाते हैं कि जिस प्रकार यूरोप वासियोँ, बंगालियों और बिहार के कायस्थों ने पढ-लिख कर, समाचार पत्र निकाल कर उन्नति की है उसी प्रकार देश के क्षत्रियों को एक होकर आग आना चाहिये. वे याद दिलाते हैं कि “कायस्थ लोग तीन युगों (सतयुग, त्रेता और द्वापर) से शूद्र थे. अब क्षत्रिय हो गये... ऐ मेरे प्यारे क्षत्रिय सपूतों, कुछ भी तो सोचो कि हमारे कुल में रघु, राम, युधिष्ठिर, अर्जुन और कर्ण प्रभृति कैसे कैसे महापुरूष हो गये हैं ...धिक्कार है हमारे क्षत्रित्व पर कि कायस्थ प्रभृति नीच वर्ग बडे बडे स्थानों पर नीयत होते हैं और हमारे बन्धु-बान्धव प्यादगीरी कर केवल 3 या 4 मुद्रा में पलायन करते हैं.”[11]
क्षत्रियों में अपनी जाति की दशा को लेकर जो भाव था उसको प्रकट करने में हिन्दी के बौद्धिक मुखर थे. क्षत्रिय पत्रिका ने 1882 में एक लेख प्रकाशित किया जिसका एक अंश देखें: “ क्या...क्षत्री कभी जागेंगे... अपने ही सहवासी शूद्रों (कायस्थ जो अब क्षत्री कहलाने लगेगी हैं) को देखिये कि कहां तक उन्नति कर गये जिस राज दरबार में देखिये जुत्थ के जुत्थ यही नज़र आते हैं... (कायस्थों ) पहले तो शूद्र से रूपया खर्च कर क्षत्री कहलाये अब तो तलवार धरें बान धरें बहादुर उपाधि भी मिलने लगी... गवर्नमेंट से बहादुरी इन्हीं कायस्थ कलाल , कलवार, बनिये को मिलती है.” [12]
हिन्दी नवजागरण के एक महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व रामदीन सिंह के इन उद्धरणों को उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं सदी के हिन्दी क्षेत्र के सवर्ण लेखक, समाज सुधारकों के विचारों के साथ रखा जा सकता है. उस दौर में राष्ट्रवाद, जाति के प्रति प्रेम और अपने सम्प्रदाय (धर्म) के भावों के बीच एक सहज किस्म का सम्पर्क था. जाति का प्रयोग इन तीनों- धर्म, राष्ट्र और जाति तीनों के लिये होता था.[13] बडी सहजता से विद्वान लोग जाति सूचक भाषा का प्रयोग करते थे. यहां एक दो उदाहरणों की चर्चा की जा सकती है. बाल कृष्ण भट्ट हिन्दी के महान लेखक और संपादक के रूप में सुविख्यात हैं. पहले के समय और वर्तमान के बीच आये अंतर को वे इस भाषा में व्यक्त करते हैं- “ उस समय ब्राह्मण तीनों वर्ण के लोगों को अपनी मूठी में किये थे, किसी को सामर्थ्य न थी कि इनसे आँख मिला सके. अब इस समय बनिया बक्काल भी ब्राह्मण बना चाहते हैं, और काछी कुनबी क्षत्री. सच है, ‘धोबी के घर धरमदास हैं ब्राह्मण पूत मदारी.”[14] खुद रामदीन सिंह ने खड्गविलास प्रेस, पटना से 1891 में द्विज पत्रिका अर्थात “ब्राह्मण ,क्षत्रिय और वैश्य को सुधारने वाली पाक्षिक” पुस्तिका निकाली थी. दिलचस्प बात यह है कि इसमें जो छपता था वह देश के हित से संबंधित होता था और किसी जाति के पक्ष में इसमें कुछ नहीं छपता था. इस पत्रिका का प्रकाशन लगातार होता रहा. इसमें छपने वाली सामग्री को ध्यान से पढने से प्रतीत होता है कि उस समय के लेखकों के बीच इतिहास बोध के निर्माण किस रूप में हो रहा था. एक उदाहरण देखें-“ ...बहुत शताब्दियां बीती जब बंगाल में कोल और सौंताल आदि असभ्य जाति के लोग बसते थे पर ब्राह्मण धर्मावलंबी हिन्दू लोगों ने पंजाब और उच्च भारतवर्ष को विजय कर के अंत में बंग देश की ओर पदार्पण किया और आदिम निवासियों को वशीभूत कर के बहुतेरों को जंगल पहाड़ का मार्ग बताया तथा कुछ लोगों को अपना दास बना के रक्खा इन विजयी हिन्दुओं के पुरोहित ब्राह्मण थे इस से यह ब्राह्मण धर्मावलंबी कहलाए यह मध्य एशिया निवासिनी प्रबल प्रतापशालिनी आर्य जाति के लोग थे यही आर्य जाति उच्च कुल के वर्तमान हिन्दुओं की मूल थी इसी जाति के भिन्न भिन्न भाग मध्य एशिया से पश्चिम की यात्रा करके यूरोप में जा बसे जिनसे अंगरेज़ फ्रेंच जर्मन इत्यादि बहुत सारी यूरोपीय जाति उत्पन्न हुईं.[15] इस दौरान हिन्दी के कुछ प्रकाशित ग्रंथों में भी कुछ ऐसे वाक्य मिलते हैं जिनमें ‘नीची जाति’ के प्रति, उसके आगे बढकर सम्मान पाने की लालसा के प्रति एक तिरस्कार का भाव है. इन पंक्तियों पर ध्यान दें: “ कुंवर सिंह को लोग बाबू कुंवर सिंह कहते थे. ‘बाबू’ की पदवी उन दिनों ऐसी सस्ती न थी जैसी आज कल हो गयी है कि उजले कपडों से कोइरी चमार तक बाबू बन जाते हैं.”[16]
जाति के सन्दर्भ के प्रयोग हिन्दी साहित्य में कम होने लगे और प्रेमचन्द के युग में इसका प्रयोग बहुत कम होने लगा. लेकिन उसके पहले यह बहुत आम था. यह वह दौर था जब नवजागरण के पुरोधाओं को वर्ण-व्यवस्था के नियमों के पालन और राष्ट्र के नवनिर्माण में कोई विरोधाभास नज़र नहीं आता था. कुछ उदाहरणों से उनके विचारों को समझा जा सकता है. अपने समय की प्रतिष्ठित हिंदी पत्रिका सुदर्शन के संपादक और एक प्रतिष्ठित साहित्यकार माधव मिश्र ने एक कथा का उल्लेख किया है. इस कथा में जोधपुर के महाराज से बादशाह अकबर ने पूछा कि हिन्दू किस को कहते हैं? महाराज के एक सामंत से जब महाराज ने पूछा तो उसने कहा कि इसका उत्तर तो कोई भी साधारण आदमी दे देगा. मामूली आदमी की खोज की गयी और एक नाई को लाया गया. उसने इस प्रश्न के उत्तर में कहा- “ हिन्दू वह है जो गो ब्राह्मण की पूजा करे और उनमें श्रेष्ठ वह है जो उनकी रक्षा करने में प्राणों तक की परवाह न करे. नाई के कथन से संतुष्ट होकर महाराज ने बादशाह अकबर के सामने हिन्दू की यूं व्याख्या की- “ ...किसी हिन्दू के घर में आग लग जाय और वह इतनी प्रचण्ड हो उठे कि या तो वह अपने कुढंगे कुपढ ब्राह्मण ही को जो उस मकान में पडा हुआ ज़िन्दगी के अंतिम सांस ले रहा हो, बचा ले, किम्बा अपनी लूढी लँगडी बूढी बांझ गऊ ही की, जो वहां उस समय बँध रही हो, रक्षा कर ले. अथवा अपने बुढापे की लकडी , घर के चिराग एकमात्र पुत्र ही के प्राण रख ले. कारण कि समय की इतनी न्यूनता हो कि एक की रक्षा के पश्चात दूसरे की रक्षा असंभव जान पडती हो! अग्नि की ज्वाला में दूसरे के भस्म हो जाने का निश्चय हो चुका हो. ऐसी कठिन अवस्था में जो वीर पुरूष सुत सम्पत्ति का मोह छोड उस अकर्मण्य ब्राह्मण बा बूढी गऊ के प्राणों की रक्षा में तत्पर हो, वही श्रेष्ठ हिन्दू है और साधारण वे हैं जो इन दोनों की पूजा करते हैं. (कहते हैं कि , उस दिन से बादशाह ने गो वध बन्द कर दिया था).” [17] कथा के उपरांत लेखक का संदेश है कि अगर किसी घर में एक मरनासन्न ब्राह्मण, एक बूढी गाय और एकलौता बेटा हो और आग लग जाये तो जो सच्चा वीर हिन्दू होगा वह पहले ब्राह्मण और बूढी गाय को बचायेगा. एक अन्य उदाहरण भी दिया जा सकता है जिसमें वे कहते हैं कि एक अग्रवाल वैश्य ब्राह्मण के विरूद्ध अपशब्द का प्रयोग नहीं कर सकता यह काम किसी नीच का ही हो सकता है. उनकी पत्रिका में छपा था कि कांग्रेस सही अर्थों में राष्ट्रीय नहीं है क्योंकि वहां वर्णाश्रम धर्म का पालन नहीं होता. लेखक के अनुसार सभा में ब्राह्मण की उपस्थिति ज़रूरी है और अध्यक्ष भी उसे ही होना चाहिये. एक जगह लेखक बहुत आहत होता है कि एक वैश्य अध्यक्षता कर रहा है जबकि शास्त्र के हिसाब से उसे कोषाध्यक्ष होना चाहिये.[18]
इस तरह के विचारों के पक्षधर लोगों की संख्या कम नहीं थी. 1920 के दशक में गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आन्दोलन के शक्तिशाली होने के दौर में भी उत्तर भारत के बहुत सारे हिस्सों में सच्चे हिन्दू के आदर्श को लेकर हिन्दू राजनैतिक संगठकों के बीच हुई बहसों को देखकर यह कहना गलत न होगा कि वर्णाश्रम आदर्श के प्रति इन महान लोगों की अटूट आस्था थी. वस्तुत: यह प्रस्तावित करना सही होगा कि शिष्ट साहित्य और पत्रकारिता के दायरे से जाति का परोक्ष रूप से चले जाने के इस दौर में जाति के सम्बन्ध में राष्ट्र्वादी चिंतन ने यह मन बनाया कि जाति व्यक्तिगत चीज़ है और इसके बारे में ज़्यादा हो हल्ला करना राष्ट्र्वाद के लिये ठीक नहीं है. इसी दौर के इस बोध के साथ जाति की सीधा चर्चा साहित्य और पत्रकारिता में कम हो गयी. अब बलवंत भूमिहार जैसे उपन्यास, जिनमें जाति का उल्लेख बडी सहजता से होता था, लिखने का दौर खत्म हो गया था. ऐसा नहीं था कि समाज में जातिवादी विमर्श खत्म हो गये हों. बल्कि यह कहना उचित होगा कि जाति को लेकर एक उग्र किस्म का संघर्ष यादवों और भूमिहारों के बीच जनेऊ पहनने को लेकर इसी दौर की घटना है.[19] भूमिहारों को ब्राह्मण मनवाने के लिये जिस तीव्रता से स्वामी सहजानन्द ने इस दौर में आन्दोलन किया था उससे सामान्य परिचय भी यह बतलाने के लिये पर्याप्त है कि जातीय आधार पर तीखी नोंक झोंक 1920 के दशक में जारी थी.[20]विभिन्न जातीय इतिहासों के विश्लेषण से भी यह साफ है कि समाज में जाति के प्रश्न पर जातियों के बीच तीव्र प्रतिद्वन्दिता चल रही थी.
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बीसवीं सदी में राष्ट्रवादी आन्दोलन के लोकोन्मुखी होने के बाद दो आदर्शों – वर्णाश्रमी सनातनी हिन्दू का आदर्श और हिन्दुओं की राष्ट्रीय एकता का स्वप्न- के बीच तनातनी का एक दिलचस्प दौर शुरू हुआ. 1920 के बाद, खासकर मालाबार दंगों के बाद हिन्दू धर्मावलंबियों के रक्षार्थ हिन्दू नेताओं ने यह देख लिया कि एक आदर्शों का नवीकरण ज़रूरी है. मदन मोहन मालवीय जैसे लोगों को यह लगा कि हिन्दू संगठनों के साथ अस्पृश्य समझी जाने वाली जातियों और अन्य पिछडी जातियों को जोडा जाना चाहिये. उन्हें जिस तरह के विरोध का सामना करना पडा वह स्पष्ट कर देता है कि हिन्दू कट्टरवादी आदर्शों के प्रति अभी भी बहुत सारे लोग कटिबद्ध थे. मदन मोहन मालवीय की छवि एक कट्टर सनातनी हिंदू की है. उन्होंने हिन्दू महासभा की स्थापना की और सारे देश के हिन्दुओं को राजनैतिक रूप से संगठित करने का प्रयास किया. लेकिन हिन्दु समुदाय के असली सनातनी, वर्णाश्रमी हिन्दुओं की और से उंन्हें जिसमें तरह से ‘नया आर्यसमाजी’, ‘हिन्दु धर्म के शत्रु’ के रूप में प्रचारित किया गया वह कम दिलचस्प नहीं है. मालवीय का मत था कि हिन्दु राष्ट्रीय एकता के लिये सवर्ण और निम्न जातियों को एक साथ आना होगा. वे एक सावधान हिन्दू थे जो वर्णाश्रम के आदर्शों में राष्ट्र हित हेतु एक लचीलेपन की जरूरत को समझ रहे थे. उनका कथन था कि उँची जाति के लोगों को चाहिये कि चमार आदि जाति के लोगों को अपनी सभाओं में आने दें और अपने बराबर नहीं लेकिन नीचे बैठने दें. लेकिन दूसरी और ऎसे हिन्दुओं की कमी नहीं थी जो इस तरह के उँच नीच के जाने को हिन्दुपन की क्षय समझ रहे थे. अन्यत्र इस विषय पर चर्चा हुई है जिसमें हिन्दू राष्ट्र्वाद के इस दो धाराओं के बीच के अंतर को रेखांकित किया गया है.[21] एक ओर मालवीय जैसे लोग थे जो हिन्दू एकता की खातिर वर्णाश्रम धर्म को छोडे बिना छोटी जात के लोगों को साथ लेने की मुहिम चला रहे थे तो दूसरी ओर ऐसे लोग भी थे जो इसमें धर्म की हानि समझ रहे थे. इस तरह के लोग सनातन धर्म पताका फहरा रहे थे. 1926 में भी जब कांग्रेस के नेतृत्व में राष्ट्रीय आन्दोलन शक्तिशाली हो चुका था सनातनियों की पत्रिकाएं लगातार यह कह रही थीं कि वर्णाश्रम को छोडने से देश धर्म भ्रष्ट हो जायेगा. मालवीय की हिन्दु महासभा के प्रति भी उनके मन में कोई आदर नहीं है और वे मालवीय की सबको साथ लेकर चलने की इच्छा को सही नहीं मानते. ‘हिन्दू महासभा का रहस्य’ नामक एक लेख में कहा गया है-
“ ...मालवीय जी, पण्डित दीन दयाल शर्म्मा आदि के सनातन धम्मानुकूल विचारों को ही हम लोग प्रमाण मानते हैं, उनके व्यक्तित्व को नहीं.... सर्वप्रियता प्राप्त करने के पीछे (वे) बडे बड़ी काम बिगाड डालते हैं. ...(वे) लाला लाजपत राय और दरभंगा महाराज के धार्मिक विचारों का सम्मिलन ...करना चाहते हैं! इसी को कहते हैं दक्षिणी ध्रुव को उत्तरी ध्रुव और पश्चिमी गोलार्द्ध को पूर्वी गोलार्द्ध से मिलाना और दो नावों पर चढना.”[22] मालवीय की चेष्टाओं पर भी उनका विश्वास नहीं. उन्हें खेद है कि मालवीय के हिन्दू विश्वविद्यालय में संस्कृत की प्रधानता नहीं है और वहां “क्वींस कालेज की तरह भी संस्कृत का प्राधान्य नहीं रहा और वहां के विद्यार्थी बिस्कुट, शोरबा और अंडा गले के नीचे उतारते हैं.”[23] इसी लेख में कुछ और बातों पर विचार किया गया है जिसे देखना उचित होगा. सनातन धर्मियों के अनुसार शुद्धि कर हिन्दू सभा का वर्ण संकरता फैलाना अनुचित है. हिन्दू सभा की आलोचना करते हुए सनातन धर्म पताका ने लिखा-“ जब एक बार गो मांस या शूकर मांस खा लेने से ही हमारे धर्म शास्त्रों में दीर्घ-काल व्यापिनी विकट तपस्या का प्रायश्चित्त है तब जिन चमार आदि अस्पृश्यों के पचास पुश्तों से अभक्ष्य भक्षण हो रहा है , उन्हें कैसे हम अपने कूओं से जल भरने दें या एक पंक्ति में बैठाकर श्वांस सूघें. इनके सिवा जब कांग्रेस, आर्य समाज आदि ने शुद्धि अछूतोद्धार आदि का प्रस्ताव पास कर सुधारकों के लिये दरवाजा खोलना दिया है, तब इन्हें हिन्दू सभा में घुसेडने की क्या आवश्यकता है ! किंतु कुछ औंधी खोपडी के मुठ्ठी भर सुधारकों की रूचि रखने के लिये मालवीय जी ने ऐसे धर्म विरूद्ध प्रस्तावों का अनुमोदन कर सनातन भाईयों के मताधिक्य और श्रेष्ठत्व की उपेक्षा की और उनकी विमल विचार –माला में खलबली मचा दी है. पहले तो यों ही आर्यसमाजियों और ईसाइयों ने अछूतों को भडकाकर गांवों में सनातनियों से लडने वाली एक पार्टी खडी कर दी थी, दूसरे हिन्दू सभा ने ऐसे उपेक्षणीय विषयों को उठा कर उसके कर्णधारों ने अस्पृश्यों और सनातनियों के बीच सारे देश में बराबर के लिये रणभूमि तय्यार कर दी.”[24]
इस लेख में अंतत: यह कहा गया कि “ हिन्दू महासभा एक स्वार्थमयी और रहस्य पूर्ण संस्था भी बनी जा रही है.” [25] यह देखना आज बहुत दिलचस्प है कि हिन्दू सभा के समर्थक किस तरह अछूतों को हिन्दू मनवाने के लिये लड रहे थे और हिन्दु धर्म के रखवाले उन्हें खडी-खोटी सुना रहे थे. हिन्दू सभा और सनातन धर्म के पंडितों के बीच के शास्त्रार्थ इस प्रसंग में बहुत उपयोगी सिद्ध होटल हैं. यहां एक दो प्रसंगों की चर्चा की जा सकती है. छपरा जिले में हिन्दू सभा की ओर से बोलते हुए बाबू चन्द्रिका प्रसाद ने कहा- “ हाय हाय बडे शोक की बात है कि हिन्दू जाति डोम मेहतरों को अपने में मिलाना नहीं चाहती, इनके न मिलाने से बडी दुर्दशा हो गयी. औरंगज़ेब ने ... मंदिर तोड डाले...कायर हिन्दुओं ने विश्वनाथ का दूसरा मंदिर बनवा लिया, सोमनाथ का मंदिर तोड दिया गया. यदि उस समय डोम और मेहतर हिन्दू जाति के अन्दर होते तो ये लडके बचा लेते.... नहीं मालूम अब हिन्दू जाति की क्या दशा होगी. इस हिन्दू धर्म ने कणाद जैसे नास्तिकों को अपने में रक्खा उसको तो निकाला ही नहीं फिर डोम मेहतरों को कैसे निकाल सकता है.” सनातनियों की ओर से बोलते हुए पं. कालूराम शास्त्री ने कहा कि जब तक क्षत्रिय समाप्त नहीं हो गये सोमनाथ का मंदिर लूटा नहीं जा सका. जब क्षत्रिय न बचा सके तो उसे डोम मेहतर क्या बचा पाते. शास्त्र के श्लोकों का अर्थ बताते हुए शास्त्री जी ने कहा कि “ ब्राह्मणी के साथ शूद्र का संसर्ग होने से जो संतान होती है उसका नाम चाण्डाल है. वह लोहे के और शीशे के जेवर पहिरे, गले में बद्धी बांधे, कांख में पेटी रक्खे, दिन के पूर्वार्द्ध में नगर का पाखाना साफ करके उत्तरार्द्ध में नगर में न जाय ये इकट्ठे होकर नगर के बाहर नैर्ऋत्य कोण में रहें ऐसा न करें तो दण्डनीय हैं.” फिर बोले- “ पाराशर स्मृति में लिखा है कि यदि चाण्डाल का दर्शन हो जावे तो सूर्य का अवलोकन करो और यदि चाण्डाल का स्पर्श हो जावे तो पहिरे हुए वस्त्रों को धोओ और स्नान करो. यह धर्म शास्त्र की आज्ञा है कोई भी आस्तिक हिन्दू इसमें चीं चपट नहीं कर सकता.”
चन्द्रिका प्रसाद हिन्दु सभाई थे और वे ताड गये कि ज़्यादा शास्त्रार्थ करने की अपेक्षा कुछ ऐसी बातें कहनी चाहिये जिससे हिन्दु हित की बात प्रमुख हो जाये. बोले जायेंगे, हिन्दुओं की रक्षा के लिये इन्हें अपने में मिलाना होगा. इस पर कालूराम शास्त्री के वचन में थोडी नर्माई आयी लेकिन फिर भी पाराशर स्मृति का एक श्लोक उद्धृत करना नहीं भूले जिसका अर्थ था- “ चाण्डाल के घट का जल यदि कोई द्विजाति भूलकर पी ले तो फौरन कै कर देना चाहिये कै करके समस्त जल को निकाल दे तथा फिर प्राजापत्य उपवास करे यदि उस जल को उसी समय न निकाल दिया जाये तो फिर कृच्छ सांतपन करना चाहिये...” मामले को थोडा दूसरा रूख देते हुए शास्त्री जी ने कहा कि मामला शूद्रों का नहीं है- श्वपच शूद्रों में पाँच भेद हैं तथा शास्त्रों में पांचों के साथ पृथक पृथक व्यवहार है- बल्कि चाण्डालों और श्वपचों का है. अंतत: शास्त्री जी उस आम सभा में बोले- “ मनु की व्यवस्था देखिये- चाण्डालों तथा श्वपचों का निवास ग्राम के बाहर हो तथा इनके पात्र अश्पृश्य हैं तथा इनका धन कुत्ता तथा गदहा है. इनके कपडे मुरदों के वस्त्र वा पुराने चिथडे हों तथा फूटे बर्तनों में भोजन लोहे के आभूषण तथा घूमना स्वभाव [ यह इनका लक्षण है]. धर्मानुष्ठान के समय में इन [चाण्डाल और श्वपच इत्यादि] के साथ देखना बोलना आदि व्यवहार न करे. उनका व्यवहार तथा विवाह बराबर वालों के साथ हो. इनको खपरे आदि में रखकर अलग से पराधीन अन्न देना चाहिये तथा वे रात को ग्रामों तथा नगरों में न घूमें ...”
इस शास्त्रार्थ में क्या हुआ इसपर सनातन धर्म पताका का मंतव्य था –“ आज के शास्त्रार्थ में हिन्दू सभा ने वह पछाड खाई है कि यदि इसमें शर्मदार सभासद होंगे तो फिर कभी शास्त्रार्थ का नाम न लेंगे निर्लज्जों की तो कथा ही भिन्न है.” [26]
इस पूरे प्रकरण को इसके सन्दर्भ में देखना उचित होगा. विद्वानों ने उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सनातनी और सुधारवादी हिन्दूवादी धाराओं के टकरावों की पर्याप्त चर्चा की है. मैक्लेन ने कहा है कि उस दौर में हिन्दू बनाम मुसलमान के बजाय सनातनी और सुधारवादियों के बीच ज़्यादा तीव्र संघर्ष चल रहा था.[27] इस दौर में हिन्दुओं को एकजुट करने के प्रयास आन्दोलनों –हिन्दी और गो-रक्षा- के दौर में तो हुआ ही एक प्रकार से राष्ट्रीय सोच का एक हिन्दू संस्करण भी लिखने पढने वाले वर्ग ने तैयार कर दिया. जिस समय राष्ट्र्वादी सोच आकार ले रहा था उसी दौर में एक साम्प्रदायिक सोच भी तैयार हो रहा था.[28] लेकिन, विद्वानों का ध्यान इस और कम गया है कि इसी दौर में एक सवर्णवादी पाठ भी तैयार हुआ. पूरे इतिहास पर उनकी दृष्टि, समाज के पिछडे समुदायों के प्रति रवैया तथा प्रगति के संबंध में उनकी धारणा इन सभी मामलों में उन्नसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के पहले तीन दशक में यह कोशिश लगातार हुई कि उत्तर भारतीय समाज में सनातनी या वर्णाश्रमी मूल्य बोध बना रहे. अधिकतर सनातनी लोग यह सोचते थे कि “बुरे दिन” आ गये हैं और सुधारवादी चक्कर में पडकर कोरी- चमार भी ब्राह्मण बनने के “ धर्म विरोधी” स्वप्न देखने लगे हैं. [29] फिर भी सुधारवादी आन्दोलनों और बाद में कांग्रेस के नेतृत्व में हुए जनांन्दोलनों के कारण समाज में निम्न जातियों की भागीदारी महत्त्वपूर्ण होने लगी. धीरे धीरे सनातनी विद्वान भी हिन्दू के भीतर निचली जातियों को लेकर सोचने लगे. 1907 में लिखे गये एक भाषण में अयोध्या प्रसाद हरिऔध ने “बीस करोड हिन्दू के राष्ट्र” की बात की.[30] मालवीय हिन्दू एकता के लिये निचली जातियों को साथ लेकर चलने के हिमायती थे हालांकि सबको बराबर मान कर नहीं. वे समझाते थे कि विवाहादि जैसे सामाजिक व्यवहार में जाति के नियमों का पालन अवश्य होना चाहिये लेकिन सभाओं में निचली जाति के लोगों को समकक्ष नहीं पर नीचे बैठने दिया जाय. उनका मानना था कि नीची जाति के लोग इसी से प्रसन्न हो जायेंगे और हिन्दु एकता का आदर्श उपस्थित हो जायेगा. 1922 में गया की एक सभा में यह कहा कि अगर ब्राह्मणों को सभा में उच्च आसन दिया जाय तो रैदासों को भी नीचे बैठने दिया जाये.[31] उनके अनुसार द्विजों द्वारा इस तरह की उदारता से ही निचली जाति के लोग संतुष्ट हो जायेंगे. अपनी बात को समझाने के लिये वे पुराण की एक कथा सुनाते हैं कि एक बार एक राजा एक गांव से होकर गुजर रहे थे. उस गांव में एक अहीर के घर कथा हुई थी और प्रसाद वितरण हो रहा था. राजा ने अहीर के हाथ से प्रसाद ग्रहण नहीं किया क्योंकि अहीर नीच जात का माना जाता था. घर लौटकर राजा ने देखा कि उसके सारे पुत्र बीमार पड गये हैं. इस कथा के माध्यम से मालवीय ने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि किसी भी भक्त का निरादर प्रभु सहन नहीं कर सकते भले ही भक्त नीच अहीर ही क्यों न हो.[32] नेताओं में कुछ ऐसे लोग भी थे जो किसी भी सूरत में वर्णाश्रमी आदर्शों को छोडने को तैयार नहीं थे. इस तरह के लोगों में सबसे बड़ा नाम था दरभंगा महाराज का जिनके विचारों पर एक दृष्टि डालना युक्तिसंगत होगा. जनवरी 1923 में बम्बई की एक बड़ी सभा में उन्होंने कहा कि “ शोभा, प्रतिष्ठा, गौरव और जीवन इसी में है कि सच्चे हिन्दू की हैसियत से सत्य सनातन धर्म कि रक्षा करते हुए संसार के आगे बढें. उसी को हिन्दू जाति की उन्नति कहेंगे ...जिस जातीय व्यवस्था की आपके पूर्व पुरूषों ने धन, जन और जीवन सभी कुछ देकर रक्षा की है वह व्यवस्था जीवित रहेगी.” [33]
कतिपय संस्मरणों में बीसवीं सदी के दूसरे दशक में हिन्दी प्रदेश में जात पात के नियमों का कैसा आतंक था इस बात का पता चलता है. 1915 की गर्मियों में जमालपुर बाज़ार में एक मैथिल ब्राह्मण, जिसने आर्य समाज को स्वीकार कर लिया था, ने घोषणा की कि वह एक कुएँ से निकाल कर एक अछूत के हाथ से पानी पीकर लोगों को दिखलायेंगे कि इससे कोई प्रलय नहीं होता है. मैथिल पंडितों के भय दिखाने के बावजूद जब मोहित मिश्र (शर्मा) न डिगे तो देखा गया कि क्रुद्ध भीड के सामने किसी की हिम्मत न हो रही थी कि आगे बढे और कुएं से पानी निकालकर शर्मा को पानी दे. वहां कई आर्य समाजी नौजवान भी खडे थे. पर “ कहीं लोग पानी भरने वाले को ही न मार दें- युग युग से जो काम वर्जित है उसे अचानक उठकर कर देने का साहस कोई नहीं जुटा पा रहा था. स्त्रियां दूर दूर से , अपने घरों की खिडकियों से झांककर, यह तमाशा देख रही थीं. ‘ पता नहीं आज क्या हो जाए? धर्म का नाश होने पर तो यह धरती भी नष्ट हो सकती है. भूचाल आ जाएगा, महामारी फैल जाएगी’ तब हिम्मत कौन करे? मोहित शर्मा के बहुत ललकारने पर, हाथ पकड कर खींचने पर श्यामला साह तेली तथा एक दो सूडी, कलवार भी इनारे की जगत पर आ चढे.” ... उन दिनों डोम चमार आदि जातियों की तो बात ही नहीं उठती थी , बनिया जाति के ही कुछ शाखा के कुछ लोगों का पानी नहीं चलता था” हजारों लोगों के सामने एक साहसी ब्राह्मण आर्य समाजी युवक मोहित मिश्र को इस साहस के लिये कितने कष्ट उठाने पडे उसके बारे में जानने पर आज विश्वास करना कठिन होगा.[34]
उपसंहार में यह कहना अनुचित न होगा कि 1920 के दशक तक भी राष्ट्रवादी हिन्दू नेतृत्व जाति के प्रश्न पर वर्णाश्रमी व्यवस्था से विमुख होकर् अपने सामाजिक संगठन को नहीं समझ पा रहा था. लोकशक्ति के युग के आने की सूचना गांधी के नेतृत्व में चल रहे आन्दोलनों से हो चुकी थी और संख्या का समीकरण हर राजनैतिक समीकरण के लिये प्रभावी सिद्ध हो रहा था. ऐसे समय में भी मदन मोहन मालवीय जैसे प्रतिष्ठित हिन्दू नेताओं और उनके संगठन हिन्दू महासभा को जिस तरह से विरोध का सामना करना पड रहा था वह यह बतलाने के लिये काफी था कि सनातनी बज्र पुरातनपंथी वर्णाश्रमी समर्थकों की कमी उस समय भी यह नहीं देख सक रही थी कि अब नया युग आ गया है और नया समाज बन रहा है. वह कैसा युग था इसको व्यक्त करने के लिये अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं जिससे प्रमाणित होता है कि तमाम प्रगतिशील तत्त्वों के साथ हिन्दी में ब्राह्मणवादी सोच प्रभावी रूप से उपस्थित था. यह ऐतिहासिक महत्त्व की बात है कि यह सोच बाद के वर्षों में परोक्ष रूप से धीरे धीरे कम दिखाई देने लगा. यह ‘छुप जाना’ था या खत्म हो जाना था, यह जांच का विषय है.
[1] ओम प्रकाश वाल्मीकि, ‘1857 और हिन्दी नवजागरण’, प्रगतिशील वसुधा- 76, वर्ष 4, अंक 4, जनवरी-मार्च 2008, पृ. 170. हिन्दी नवजागरण के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों के संतुलित अध्ययन के लिये ज़ोर देने पर बल एक अरसे से दिया जाता रहा है. हिन्दी के बहुत सारे समाजशास्त्रीय पद्धति से परिचित आलोचकों ने इस विषय पर लिखा है. हिन्दी नवजागरण के महत्त्व को स्वीकारते हुए भी मैनेजर पाण्डेय जैसे समीक्षक इसके नकारात्मक पक्ष को भी ध्यान रखने की ज़रूरत पर बल देते हैं. (देखें- मैनेजर पाण्डेय, साहित्य और इतिहास दृष्टि (दिल्ली: वाणी प्रकाशन, 2000), पृ. 191.
[2] हितेन्द्र पटेल, ‘ज़ाति का प्रश्न’, देवेन्द्र चौबे, साहित्य का नया समाजशास्त्र, (दिल्ली: किताब घर, 2006).
[3] हरिश्चन्द्र मैगज़ीन, 15 अप्रिल, 1874, पृ. 198.
[4] वही, पृ, 199.
[5] वही, पृ. 199.
[6] हेतुकर झा (सं) बाबू रामदीन सिंह रचित बिहार दर्पण, (दरभंगा: महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउण्डेशन,1996 [1882], पृ.134.
[7] वही, पृ. 142-43.
[8] वही, पृ. 148.
[9] वही, पृ. 148.
[10] वही, पृ. 138.
[11] क्षत्रिय पत्रिका,1880,
[12] रामचरित्र सिंह, क्षत्रिय पत्रिका, खण्ड 2, संख्या 3,4,1882, पृ. 28. इस लेख में लेखक का उद्देश्य कायस्थों या अन्य किसी जाति की निन्दा करना नहीं था बल्कि क्षत्रियों को इस बात के लिये तैयार करना था कि बदलते समय में अगर वे बंगाली, मद्रासी और कायस्थों की तरह उन्नति नहीं करेंगे तो उनका कोई मान सम्मान नहीं रहेगा.
[13] मैने अन्यत्र इस विषय पर विस्तार से चर्चा की है. देखें- हितेन्द्र पटेल, ‘कम्युनलिज्म एण्ड इंटेलिजेंसिया इन लेट नाइंटींथ एण्ड अर्ली ट्वेंटीथ सेंचुरीज बिहार’(शोध प्रबंध, इतिहास अध्ययन केन्द्र, ज. ने. वि., 2007), अध्याय 5.
[14] बालकृष्ण भट्ट, निबंधावली. पृ.
[15] द्विज पत्रिका , संख्या 25, 1891. यह पत्रिका साहब प्रसाद सिंह द्वारा खड्गविलास प्रेस, बांकीपुर (पटना) से प्रकाशित होती थी. इस पत्रिका ने बंग देश का भूगोल और इतिहास पुस्तक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित किया था. इस इतिहास पुस्तक में जाति का उल्लेख बहुत सहजता से लोगों के वर्णन में किया जाता था. विशेष रूप से द्रष्टव्य है इस पुस्तक का ‘हिन्दू शासन’ खंड. इस खंड में उल्लेख किया गया है कि बंगाल में कुलीनता का प्रचलन कैसे शुरू हुआ- “ राजा आदिशूर (इन्होंने 974 ई के इधर उधर सिंहासनारोहन किया था) ने भारत के जिन जिन प्रदेशों में बौद्ध धर्म का प्राबल्य नहीं हुआ था उन उन प्रदेशों से अच्छे अच्छे पंडित बुलाने का संकल्प लिया.... कन्नौज से पाँच ब्राह्मण- भट्ट नारायण, दक्ष, श्री हर्ष, छांदोड और वेदगर्भ (बुलाए गये).यही कुलीन बंगाली ब्राह्मणों के आदि पुरूष हैं. इन के साथ एक एक कायस्थ जाति के सेवक थे वही कुलीन कायस्थों के के पूर्व पुरूष हैं.... आदिशूर ने जिन ब्राह्मणों और कायस्थों कन्नौज से बुलाया था उन की संतान को श्रेणी बद्ध करना सुयश का बड़ा भारी कारण हुआ किस की क्या मर्यादा है यह स्थिर करके बल्लाल सेन ने कुलीनता की प्रथा चलाई.”
[16] नगेन्द्र नाथ गुप्त, अमर सिंह (पुणे: संवाद प्रकाशन, 2008), पृ. 13. यह पुस्तक मूलत: 1895 में बांग्ला में लिखी गयी थी और इसका हिन्दी अनुवाद प्रतापनारायण मिश्र ने किया था. खड्ग विलास प्रेस , बांकीपुर (पटना) से इसका प्रकाशन बारह वर्षों बाद हो सका. फरवरी 2008 में संवाद प्रकाशन, पुणे ने इस पुस्तक को फिर से प्रकाशित किया है.
[17] माधव मिश्र, ‘ पिञ्जरपोल’, सचित्र माधव मिश्र निबन्ध माला परिशिष्ट खण्ड (सं. चतुर्वेदी द्वारकाप्रसाद शर्मा एवं झावरमल्ल शर्मा) (प्रयाग: इंडियन प्रेस लिमिटेड, 1935), पृ.25.
[18] माधव मिश्र संपादित सुदर्शन पत्रिका में जून 1900 के अंक में यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि हिन्दुओं को चाहिये कि वे सिर्फ उन्हीं राष्ट्रीय संगठनों को हिन्दुओं की राष्ट्रीय संस्था मानें जहां वर्णाश्रम धर्म के नियमों का पालन होता हो.
[19] हेतुकर झा, ‘लोअर कास्ट पेजेंट्स एंड अपर कास्ट्स ज़मीदार्स इन बिहार, 1921-25’, इंडियन इकानामिक एंड सोशल हिस्ट्री रिव्यू, 14,4, 1977.
[20] स्वामी सहजानंद जैसे महान किसान नेता ने अपना सामाजिक जीवन एक जाति के नेता के रूप में किया था. वे भूमिहारों को ब्राहमण का दर्ज़ा दिलाने के लिये लड रहे थे. उनके शुरूआती लेखन में जातिवादी सोच को स्पष्टत: देखा जा सकता है. (देखें- सहजानंद, भूमिहार ब्राह्मण परिचय, बनारस, 1916 एवं ब्राह्मण समाज की स्थिति, बनारस, प्रकाशन वर्ष का उल्लेख नहीं).
[21] देखें Hitendra Kumar Patel, ‘The Intelligentsia and the Question of Caste in Bihar in the Late Nineteenth and Early Twentieth Centuries’, in Raj Sekhar Basu & S. Dasgupta (eds.), Narratives of the Excluded (Kolkata: K. P. Bagchi, 2008).
[22] सनातन धर्म पताका, मुरादाबाद, संख्या 2, वर्ष 26, 1926, पृ. 28-29. यह मासिक पत्रिका 1900 से मुरादाबाद से निकलती थी.
[23] पूर्वोक्त पृ. 30.
[24] सनातन धर्म पताका, वर्ष 26, संख्या 2, पृ. 30-31.
[25] पूर्वोक्त, पृ. 33.
[26] सनातन धर्म पताका, वर्ष 26, पृ. 14.
[27] विस्तार से चर्चा के लिये देखें- John Mclane, Indian Nationalism And The Early Congress (Princeton:1977). इस सम्बन्ध में अन्य उपयोगी जानकारी के लिये देखें- W. Jones Kenneth, Socio Religious Reform Movements In British India (Cambridge University Press, 1994), Vasudha Dalmia, The Nationalization Of Hindu Traditions (Delhi and Calcutta: Oxford University Press, 1997).
[28] Gyanendra Pandey, Construction of Communalism , Delhi, OUP, 1992.
[29] बनारस और अन्य उत्तर भारतीय नगरों और कलकत्ता से निकलने वाले पत्रों में तो इस तरह के हज़ारों उदाहरण दिये ही जा सकते हैं, बिहार की कुछ पत्रिकाएं भी 1888 के बाद से इस तरह के भावों को स्पष्टत: व्यक्त कर रही थी. उदाहरण के लिये देखें सारन सरोज के जून और दिसम्बर 1888 के अंक.
[30] हरिऔध ने 1907 में सनातन धर्म के समर्थन में एक भाषण तैयार किया था जिसे उन्होंने प्रकाशित किया था. इस पुस्तिका की एक फटी हुई कापी राष्ट्रीय पुस्तकालय, कलकत्ता में है.
[31] विस्तृत चर्चा के लिये देखें- ब्राह्मण सर्वस्व, जनवरी, 1923. इस अंक में मालवीय 30 दिसंबर 1922 को गया में दिये गये भाषण को छापा गया था.
[32] वही.
[33] पूरे भाषण के लिये देखें ‘ सनातनधर्मोद्धार का उपाय’, ब्राह्मण सर्वस्व, जनवरी 1923, पृ. 58-63.
[34] विस्तार से जानने के लिये देखें- सावित्री दूबे, जो जाने नहीं गये (दिल्ली: अभिरूचि प्रकाशन, 1997), पृ.19-49.
[ वागर्थ, अगस्त, 2009]
औपनिवैशिक उत्तरभारतीय परिदृश्य (1880-1930)
हिन्दी समाज के बौद्धिकों ने इस समाज के सबसे बडे प्रश्न- जाति पर जिस तरह से सोचा विचारा है उसपर हाल के वर्षों में समाज शास्त्रियों का ध्यान गया है. सन्दर्भ चाहे 1857 का हो, नवजागरण का हो, साम्पदायिकता का हो या फिर राष्ट्रवाद का जाति के प्रश्न को सामने रखने की कोशिश लगातार हो रही है. तेलगु, तमिल, मलयालम और सबसे अधिक मराठी साहित्य के श्रोतों का उपयोग कर नये सोच के साथ इन भाषिक समाजों के ‘इंटेलिजेंसिया’ वर्ग की विचारधारा के विभिन्न स्तरों की बहुस्तरीय पडताल अभी जारी है. आज अत्यंत सक्रिय दलित साहित्य आन्दोलन के कुछ विचारकों के अनुसार “ हिन्दी नवजागरण के लेखक धार्मिक रूढियों से बँधे दिखाई देते हैं, इसीलिये वहाँ ‘वर्ण व्यवस्था’ का विरोध नहीं समर्थन है.” [1] हिन्दी में एक दिलचस्प बात यह देखी जाती है कि ज्यों ज्यों नवजागरण का प्रभाव बढा जाति के प्रश्न पर सीधी तरह से तीखी टिप्पणी से, सन्दर्भ विवेचन से बचने का चलन बढता गया. जाति के उल्लेख कम होने के पीछे इन समाजों में जाति का कम महत्त्व पूर्ण होना नहीं था बल्कि राष्ट्रवाद के एक खास तरह के सोच का परिणाम था जिसके अंतर्गत यह माना जाने लगा कि बोध और रचनात्मक स्तर पर जातिवादी (कास्टिस्ट) सन्दर्भ को लाने से हमारी राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में बाधा उत्पन्न होती है. निश्चित रूप से जाति का विरोध प्रेमचन्द से पहले भी था और कुछ हिन्दी बौद्धिक जाति को इस देश के विकास में एक बडी बाधा मानते थे, लेकिन अधिकतर हिन्दी लेखक जाति के प्रश्न पर वर्णाश्रमी प्रभाव से मुक्त नहीं थे और इस समाज में जाति की विभीषका के प्रति उतने सचेत साहित्य में नहीं दिखलाई पडते जितनी की ज़रूरत थी. प्रेमचन्द, राहुल, चतुरसेन शास्त्री और कुछ लेखकों में जाति के प्रश्न पर बैचैनी दिखलाई पडती है लेकिन आज ऐसा प्रतीत होता है कि कुल मिलाकर हिन्दी के लेखकों को जाति पर और अधिक गहरे जाकर विचार करना चाहिये था. जब फणीश्वर नाथ रेणु की अमर कहानी में बूढा मिरदंगिया एक ब्राह्मण को प्यार से बेटा कह देता है तो गांव के लडकों ने घेरकर उसे मारने की तैयारी कर ली क्योंकि “ बहरदार होकर ब्राह्मण के बच्चे को बेटा कहेगा? मारो साले बुड्ढे को घेरकर ! मृदंग फोड दो!” रेणु की अद्भुत अपूर्व शैली में यह आया है कि “ मिरदंगिया ने हँसकर कहा था, “ अच्छा, इस बार माफ कर दो सरकार ! अब से आप लोगों को बाप ही कहूंगा!” बाद में नागार्जुन ने इस हँसी को ‘फेड’ होते देखा और उसकी जगह एक क्रोध को जन्मते देखा और कहा- “दलित माओं के सब बच्चे अब बागी होंगे”. ( हरिजन गाथा)
यह सब उस दौर तक ही हो चुका था जब दलित साहित्य हिन्दी में नहीं आया था और न ही राजनैतिक रूप से शक्तिशाली दलित- पिछडों के उत्थान के बाद इस तरह की बातों को कहने का चलन शुरू हुआ.
इस आलेख में हिन्दी ‘इंटेलिजेंसिया’ के नवजागरण के दौर में जाति को लेकर जो सोच रहा था उसपर कुछ उदाहरणों के उल्लेख द्वारा संकेत करने का प्रयास किया गया है. बहुधा यह कहा जाता है कि कुछ अतिउत्साही दलित लेखक नवजागरण को छोटा बनाने की कोशिश करते हैं और साक्ष्य न होते हुए भी इस दौर के हिन्दी बौद्धिकों पर उलटी सीधी टिप्पणियां करते रहते हैं. उन्नसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में निचली जातियों –खासकर पिछडी जातियों के उभार के प्रति जो ब्राह्मणवादी नज़रिया था उसका कितना और किस तरह का प्रतिफलन हिन्दी साहित्य में हमें मिलता है इसकी जांच करना भी इस पर्चे का उद्देश्य है. इसी विवाद का एक दूसरा पक्ष यह है कि किस प्रकार औपनिवेशिक दौर में जातियों के पायदान में ऊपर उठने के लिये निचली जातियों में 1890 के बाद से 1911 तक होड लगी हुई थी और निचली जातियों के नेता अपना जातीय इतिहास लिखकर अपनी जाति का एक गौरवपूर्ण इतिहास लिखकर यह बतलाने में लगे थे कि कैसे वे ब्राह्मण, क्षत्रिय थे और बाद में अन्यायपूर्ण तरीके से उन्हें निचली जाति का बना दिया गया. मैंने अन्यत्र इस प्रसंग की विस्तार से चर्चा की है.[2] इस आलेख में राष्ट्रीय बनने के दौर में उत्तर भारतीय समाज के बौद्धिकों में निचली जातियों के उत्थान के दौर में उनके प्रति भावों की साहित्यिक अभिव्यक्तियों को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है.
1
निचली जातियों और अगडी जातियों को साथ लेकर हिन्दू एकता की बात उन्नसवीं शताब्दी के आठवें दशक में भी कही जाती थी. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की पत्रिका हरिश्चन्द्र मैगज़ीन के अप्रिल 1874 अंक में एक लेख छपा था- ‘पबलिक ओपिनियन’ जिसमें ब्राह्मण से लेकर शूद्र तक सबको लेकर एक वर्णाश्रम हिन्दू धर्म के आदर्श की बात की गयी थी. इसके अनुसार हिन्दु जातियों के आपसी फूट के कारण सब (हिन्दू) “ बल सत्यानाश में मिल गया और यह बात ध्यान से बाहर हो गई कि हिन्दू भी कभी एक मत थे.” [3] इस लेख के लेखक का प्रस्ताव था कि “ धर्म और व्यवहार को एक में न सानैं.” [4]लोगों को अलग अलग विश्वासों को मानने का हक है लेकिन जहाँ “ व्यौहार का काम पडै सब एक हो जाओ और जब अपने हित की बात आवैं तब एक सी आवाज़ दो.”[5] इस तरह के उदाहरण भारतेन्दु से लेकर माधव प्रसाद मिश्र और अयोध्याप्रसाद हरिऔध इत्यादि साहित्यकारों की लेखनी में सहज ही मिल जाते हैं जहां हिन्दुओं की एकता के लिये सभी हिन्दुओं- ब्राह्मणों से लेकर शूद्रों तक – के बीच एकता की बात कही जाती थी. लेकिन, विभिन्न जातियों के बीच जो तनाव समाज में था उसके कारण ज्यों ज्यों निचली जातियों के लोग अपना इतिहास लिखने लगे और अपने को ऊँची जातियों के समतुल्य बताने लगे तनाव बढा. इन निचली जातियों के सामुदायिक इतिहास पर कम काम हुआ है, लेकिन उन्नसवीं शताब्दी में ऊँची जाति के लोग भी यह मानते थे कि दुसाध जाति के लोग राज करते थे. बाद में इस तरह की उदार इतिहास दृष्टि का लोप हो गया. उदाहरण के तौर पर पुराने मुंगेर जिले के गिद्धौर के एक क्षत्रिय राजा का जीवन चरित लिखते हुए एक प्रसिद्ध क्षत्रिय विद्वान ने लिखा है: “पहले इस देश में 816 वर्ष बहेलिये वा दुसाध राज्य करते रहे सम्बत 1123 में राजा विक्रम सिंह चन्दैल अगोरी बरदी से यहां आए और श्री बैद्यनाथ जी की कृपा से निंगुरिया नामी दुसाध को मार राज्य ले लिया तब से आज तक बराबर इनके वंश में राज्य चला आता है, इस राज्य के आधीन चान्दन, चकाई, विस्तहाजरी, और बहुत से फुटकर महाल हैं.[6]
औपनिवेशिक दौर में निचली जाति के उत्थान के प्रति अवज्ञा का भाव शुरू से था. विद्वान लेखक भी कभी कभी इस बात से बडे परेशान होते थे कि नीच लोग अंग्रेज़ी राज में कुछ ज़्यादा ही बढ चढ गये हैं. रामदीन सिंह ने एक खराब नीति की चर्चा करते हुए एक अन्य क्षत्रिय सुधारक के हवाले से कहलाया है कि “यह (खराब) नीति तो ब्राह्मण क्षत्री की नहीं है हाँ चंडाल चमार कसाई की अवश्य है.”[7] आगे कहा गया है- “ बाबू हितनारायण सिंह बराबर कहा करते थे कि नीचोँ से सर्वदा बचना चाहिए क्योंकि अब वह समय नहीं रहा कि जिस में वर्ण विचार हो और अंग्रेज़ अमलदारी होने से सब धन बाईस पसेरी अर्थात सब बराबर हो गये बल्कि नीच ही लोग बढ चढ गये तो उनसे एक दो बात परहेज ही करना ही हमलोगों को उचित है और समय ही देखकर काम करना बहुत अच्छी बात है. क्योँकि सरकारी कर्मचारी लोग यही जानते हैं कि ब्राह्मण क्षत्री ही वैश्य शूद्र पर ज्यादती करते हैं. इसलिए सब किसी को उचित है कि दुष्ट और कांटा से बचाकर रहना ही भला है न तो भली भांति उनका मुंह तोडना ही भला है... खाल काँटा इन दुनहु को , दोई जगत उपाय / जूतन ते मुख तोडिबो , रहिबो दूर बचाय”[8] इस भाव को और स्पष्ट करते हुए रामदीन सिंह ने जोडा है- “आज कल यही हाल देखने में आता है शहरों में दूकानदारों से कुछ कहो तो चट गाली दे देते हैं, कुंजरिन से बोलो तो तो वह भी फटकारती है भले मनुष्यों का कहीं भी गुजर बिना गम खाये नहीं हो सकता है.”[9]
रामदीन सिंह ने यह भी लिखा है कि “ यह तो सब कोई जानते हैं कि जैसी विपत्ति आजकल क्षत्रियों पर है वैसी और किसी और किसी जाति पर नहीं.”[10] वे इस विपत्ति का मुकाबला करने के लिये क्षत्रियों के लिये एक पत्रिका शुरू करते हैं जिसके विज्ञापन का घोषणा पत्र में वे बतलाते हैं कि जिस प्रकार यूरोप वासियोँ, बंगालियों और बिहार के कायस्थों ने पढ-लिख कर, समाचार पत्र निकाल कर उन्नति की है उसी प्रकार देश के क्षत्रियों को एक होकर आग आना चाहिये. वे याद दिलाते हैं कि “कायस्थ लोग तीन युगों (सतयुग, त्रेता और द्वापर) से शूद्र थे. अब क्षत्रिय हो गये... ऐ मेरे प्यारे क्षत्रिय सपूतों, कुछ भी तो सोचो कि हमारे कुल में रघु, राम, युधिष्ठिर, अर्जुन और कर्ण प्रभृति कैसे कैसे महापुरूष हो गये हैं ...धिक्कार है हमारे क्षत्रित्व पर कि कायस्थ प्रभृति नीच वर्ग बडे बडे स्थानों पर नीयत होते हैं और हमारे बन्धु-बान्धव प्यादगीरी कर केवल 3 या 4 मुद्रा में पलायन करते हैं.”[11]
क्षत्रियों में अपनी जाति की दशा को लेकर जो भाव था उसको प्रकट करने में हिन्दी के बौद्धिक मुखर थे. क्षत्रिय पत्रिका ने 1882 में एक लेख प्रकाशित किया जिसका एक अंश देखें: “ क्या...क्षत्री कभी जागेंगे... अपने ही सहवासी शूद्रों (कायस्थ जो अब क्षत्री कहलाने लगेगी हैं) को देखिये कि कहां तक उन्नति कर गये जिस राज दरबार में देखिये जुत्थ के जुत्थ यही नज़र आते हैं... (कायस्थों ) पहले तो शूद्र से रूपया खर्च कर क्षत्री कहलाये अब तो तलवार धरें बान धरें बहादुर उपाधि भी मिलने लगी... गवर्नमेंट से बहादुरी इन्हीं कायस्थ कलाल , कलवार, बनिये को मिलती है.” [12]
हिन्दी नवजागरण के एक महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व रामदीन सिंह के इन उद्धरणों को उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं सदी के हिन्दी क्षेत्र के सवर्ण लेखक, समाज सुधारकों के विचारों के साथ रखा जा सकता है. उस दौर में राष्ट्रवाद, जाति के प्रति प्रेम और अपने सम्प्रदाय (धर्म) के भावों के बीच एक सहज किस्म का सम्पर्क था. जाति का प्रयोग इन तीनों- धर्म, राष्ट्र और जाति तीनों के लिये होता था.[13] बडी सहजता से विद्वान लोग जाति सूचक भाषा का प्रयोग करते थे. यहां एक दो उदाहरणों की चर्चा की जा सकती है. बाल कृष्ण भट्ट हिन्दी के महान लेखक और संपादक के रूप में सुविख्यात हैं. पहले के समय और वर्तमान के बीच आये अंतर को वे इस भाषा में व्यक्त करते हैं- “ उस समय ब्राह्मण तीनों वर्ण के लोगों को अपनी मूठी में किये थे, किसी को सामर्थ्य न थी कि इनसे आँख मिला सके. अब इस समय बनिया बक्काल भी ब्राह्मण बना चाहते हैं, और काछी कुनबी क्षत्री. सच है, ‘धोबी के घर धरमदास हैं ब्राह्मण पूत मदारी.”[14] खुद रामदीन सिंह ने खड्गविलास प्रेस, पटना से 1891 में द्विज पत्रिका अर्थात “ब्राह्मण ,क्षत्रिय और वैश्य को सुधारने वाली पाक्षिक” पुस्तिका निकाली थी. दिलचस्प बात यह है कि इसमें जो छपता था वह देश के हित से संबंधित होता था और किसी जाति के पक्ष में इसमें कुछ नहीं छपता था. इस पत्रिका का प्रकाशन लगातार होता रहा. इसमें छपने वाली सामग्री को ध्यान से पढने से प्रतीत होता है कि उस समय के लेखकों के बीच इतिहास बोध के निर्माण किस रूप में हो रहा था. एक उदाहरण देखें-“ ...बहुत शताब्दियां बीती जब बंगाल में कोल और सौंताल आदि असभ्य जाति के लोग बसते थे पर ब्राह्मण धर्मावलंबी हिन्दू लोगों ने पंजाब और उच्च भारतवर्ष को विजय कर के अंत में बंग देश की ओर पदार्पण किया और आदिम निवासियों को वशीभूत कर के बहुतेरों को जंगल पहाड़ का मार्ग बताया तथा कुछ लोगों को अपना दास बना के रक्खा इन विजयी हिन्दुओं के पुरोहित ब्राह्मण थे इस से यह ब्राह्मण धर्मावलंबी कहलाए यह मध्य एशिया निवासिनी प्रबल प्रतापशालिनी आर्य जाति के लोग थे यही आर्य जाति उच्च कुल के वर्तमान हिन्दुओं की मूल थी इसी जाति के भिन्न भिन्न भाग मध्य एशिया से पश्चिम की यात्रा करके यूरोप में जा बसे जिनसे अंगरेज़ फ्रेंच जर्मन इत्यादि बहुत सारी यूरोपीय जाति उत्पन्न हुईं.[15] इस दौरान हिन्दी के कुछ प्रकाशित ग्रंथों में भी कुछ ऐसे वाक्य मिलते हैं जिनमें ‘नीची जाति’ के प्रति, उसके आगे बढकर सम्मान पाने की लालसा के प्रति एक तिरस्कार का भाव है. इन पंक्तियों पर ध्यान दें: “ कुंवर सिंह को लोग बाबू कुंवर सिंह कहते थे. ‘बाबू’ की पदवी उन दिनों ऐसी सस्ती न थी जैसी आज कल हो गयी है कि उजले कपडों से कोइरी चमार तक बाबू बन जाते हैं.”[16]
जाति के सन्दर्भ के प्रयोग हिन्दी साहित्य में कम होने लगे और प्रेमचन्द के युग में इसका प्रयोग बहुत कम होने लगा. लेकिन उसके पहले यह बहुत आम था. यह वह दौर था जब नवजागरण के पुरोधाओं को वर्ण-व्यवस्था के नियमों के पालन और राष्ट्र के नवनिर्माण में कोई विरोधाभास नज़र नहीं आता था. कुछ उदाहरणों से उनके विचारों को समझा जा सकता है. अपने समय की प्रतिष्ठित हिंदी पत्रिका सुदर्शन के संपादक और एक प्रतिष्ठित साहित्यकार माधव मिश्र ने एक कथा का उल्लेख किया है. इस कथा में जोधपुर के महाराज से बादशाह अकबर ने पूछा कि हिन्दू किस को कहते हैं? महाराज के एक सामंत से जब महाराज ने पूछा तो उसने कहा कि इसका उत्तर तो कोई भी साधारण आदमी दे देगा. मामूली आदमी की खोज की गयी और एक नाई को लाया गया. उसने इस प्रश्न के उत्तर में कहा- “ हिन्दू वह है जो गो ब्राह्मण की पूजा करे और उनमें श्रेष्ठ वह है जो उनकी रक्षा करने में प्राणों तक की परवाह न करे. नाई के कथन से संतुष्ट होकर महाराज ने बादशाह अकबर के सामने हिन्दू की यूं व्याख्या की- “ ...किसी हिन्दू के घर में आग लग जाय और वह इतनी प्रचण्ड हो उठे कि या तो वह अपने कुढंगे कुपढ ब्राह्मण ही को जो उस मकान में पडा हुआ ज़िन्दगी के अंतिम सांस ले रहा हो, बचा ले, किम्बा अपनी लूढी लँगडी बूढी बांझ गऊ ही की, जो वहां उस समय बँध रही हो, रक्षा कर ले. अथवा अपने बुढापे की लकडी , घर के चिराग एकमात्र पुत्र ही के प्राण रख ले. कारण कि समय की इतनी न्यूनता हो कि एक की रक्षा के पश्चात दूसरे की रक्षा असंभव जान पडती हो! अग्नि की ज्वाला में दूसरे के भस्म हो जाने का निश्चय हो चुका हो. ऐसी कठिन अवस्था में जो वीर पुरूष सुत सम्पत्ति का मोह छोड उस अकर्मण्य ब्राह्मण बा बूढी गऊ के प्राणों की रक्षा में तत्पर हो, वही श्रेष्ठ हिन्दू है और साधारण वे हैं जो इन दोनों की पूजा करते हैं. (कहते हैं कि , उस दिन से बादशाह ने गो वध बन्द कर दिया था).” [17] कथा के उपरांत लेखक का संदेश है कि अगर किसी घर में एक मरनासन्न ब्राह्मण, एक बूढी गाय और एकलौता बेटा हो और आग लग जाये तो जो सच्चा वीर हिन्दू होगा वह पहले ब्राह्मण और बूढी गाय को बचायेगा. एक अन्य उदाहरण भी दिया जा सकता है जिसमें वे कहते हैं कि एक अग्रवाल वैश्य ब्राह्मण के विरूद्ध अपशब्द का प्रयोग नहीं कर सकता यह काम किसी नीच का ही हो सकता है. उनकी पत्रिका में छपा था कि कांग्रेस सही अर्थों में राष्ट्रीय नहीं है क्योंकि वहां वर्णाश्रम धर्म का पालन नहीं होता. लेखक के अनुसार सभा में ब्राह्मण की उपस्थिति ज़रूरी है और अध्यक्ष भी उसे ही होना चाहिये. एक जगह लेखक बहुत आहत होता है कि एक वैश्य अध्यक्षता कर रहा है जबकि शास्त्र के हिसाब से उसे कोषाध्यक्ष होना चाहिये.[18]
इस तरह के विचारों के पक्षधर लोगों की संख्या कम नहीं थी. 1920 के दशक में गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आन्दोलन के शक्तिशाली होने के दौर में भी उत्तर भारत के बहुत सारे हिस्सों में सच्चे हिन्दू के आदर्श को लेकर हिन्दू राजनैतिक संगठकों के बीच हुई बहसों को देखकर यह कहना गलत न होगा कि वर्णाश्रम आदर्श के प्रति इन महान लोगों की अटूट आस्था थी. वस्तुत: यह प्रस्तावित करना सही होगा कि शिष्ट साहित्य और पत्रकारिता के दायरे से जाति का परोक्ष रूप से चले जाने के इस दौर में जाति के सम्बन्ध में राष्ट्र्वादी चिंतन ने यह मन बनाया कि जाति व्यक्तिगत चीज़ है और इसके बारे में ज़्यादा हो हल्ला करना राष्ट्र्वाद के लिये ठीक नहीं है. इसी दौर के इस बोध के साथ जाति की सीधा चर्चा साहित्य और पत्रकारिता में कम हो गयी. अब बलवंत भूमिहार जैसे उपन्यास, जिनमें जाति का उल्लेख बडी सहजता से होता था, लिखने का दौर खत्म हो गया था. ऐसा नहीं था कि समाज में जातिवादी विमर्श खत्म हो गये हों. बल्कि यह कहना उचित होगा कि जाति को लेकर एक उग्र किस्म का संघर्ष यादवों और भूमिहारों के बीच जनेऊ पहनने को लेकर इसी दौर की घटना है.[19] भूमिहारों को ब्राह्मण मनवाने के लिये जिस तीव्रता से स्वामी सहजानन्द ने इस दौर में आन्दोलन किया था उससे सामान्य परिचय भी यह बतलाने के लिये पर्याप्त है कि जातीय आधार पर तीखी नोंक झोंक 1920 के दशक में जारी थी.[20]विभिन्न जातीय इतिहासों के विश्लेषण से भी यह साफ है कि समाज में जाति के प्रश्न पर जातियों के बीच तीव्र प्रतिद्वन्दिता चल रही थी.
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बीसवीं सदी में राष्ट्रवादी आन्दोलन के लोकोन्मुखी होने के बाद दो आदर्शों – वर्णाश्रमी सनातनी हिन्दू का आदर्श और हिन्दुओं की राष्ट्रीय एकता का स्वप्न- के बीच तनातनी का एक दिलचस्प दौर शुरू हुआ. 1920 के बाद, खासकर मालाबार दंगों के बाद हिन्दू धर्मावलंबियों के रक्षार्थ हिन्दू नेताओं ने यह देख लिया कि एक आदर्शों का नवीकरण ज़रूरी है. मदन मोहन मालवीय जैसे लोगों को यह लगा कि हिन्दू संगठनों के साथ अस्पृश्य समझी जाने वाली जातियों और अन्य पिछडी जातियों को जोडा जाना चाहिये. उन्हें जिस तरह के विरोध का सामना करना पडा वह स्पष्ट कर देता है कि हिन्दू कट्टरवादी आदर्शों के प्रति अभी भी बहुत सारे लोग कटिबद्ध थे. मदन मोहन मालवीय की छवि एक कट्टर सनातनी हिंदू की है. उन्होंने हिन्दू महासभा की स्थापना की और सारे देश के हिन्दुओं को राजनैतिक रूप से संगठित करने का प्रयास किया. लेकिन हिन्दु समुदाय के असली सनातनी, वर्णाश्रमी हिन्दुओं की और से उंन्हें जिसमें तरह से ‘नया आर्यसमाजी’, ‘हिन्दु धर्म के शत्रु’ के रूप में प्रचारित किया गया वह कम दिलचस्प नहीं है. मालवीय का मत था कि हिन्दु राष्ट्रीय एकता के लिये सवर्ण और निम्न जातियों को एक साथ आना होगा. वे एक सावधान हिन्दू थे जो वर्णाश्रम के आदर्शों में राष्ट्र हित हेतु एक लचीलेपन की जरूरत को समझ रहे थे. उनका कथन था कि उँची जाति के लोगों को चाहिये कि चमार आदि जाति के लोगों को अपनी सभाओं में आने दें और अपने बराबर नहीं लेकिन नीचे बैठने दें. लेकिन दूसरी और ऎसे हिन्दुओं की कमी नहीं थी जो इस तरह के उँच नीच के जाने को हिन्दुपन की क्षय समझ रहे थे. अन्यत्र इस विषय पर चर्चा हुई है जिसमें हिन्दू राष्ट्र्वाद के इस दो धाराओं के बीच के अंतर को रेखांकित किया गया है.[21] एक ओर मालवीय जैसे लोग थे जो हिन्दू एकता की खातिर वर्णाश्रम धर्म को छोडे बिना छोटी जात के लोगों को साथ लेने की मुहिम चला रहे थे तो दूसरी ओर ऐसे लोग भी थे जो इसमें धर्म की हानि समझ रहे थे. इस तरह के लोग सनातन धर्म पताका फहरा रहे थे. 1926 में भी जब कांग्रेस के नेतृत्व में राष्ट्रीय आन्दोलन शक्तिशाली हो चुका था सनातनियों की पत्रिकाएं लगातार यह कह रही थीं कि वर्णाश्रम को छोडने से देश धर्म भ्रष्ट हो जायेगा. मालवीय की हिन्दु महासभा के प्रति भी उनके मन में कोई आदर नहीं है और वे मालवीय की सबको साथ लेकर चलने की इच्छा को सही नहीं मानते. ‘हिन्दू महासभा का रहस्य’ नामक एक लेख में कहा गया है-
“ ...मालवीय जी, पण्डित दीन दयाल शर्म्मा आदि के सनातन धम्मानुकूल विचारों को ही हम लोग प्रमाण मानते हैं, उनके व्यक्तित्व को नहीं.... सर्वप्रियता प्राप्त करने के पीछे (वे) बडे बड़ी काम बिगाड डालते हैं. ...(वे) लाला लाजपत राय और दरभंगा महाराज के धार्मिक विचारों का सम्मिलन ...करना चाहते हैं! इसी को कहते हैं दक्षिणी ध्रुव को उत्तरी ध्रुव और पश्चिमी गोलार्द्ध को पूर्वी गोलार्द्ध से मिलाना और दो नावों पर चढना.”[22] मालवीय की चेष्टाओं पर भी उनका विश्वास नहीं. उन्हें खेद है कि मालवीय के हिन्दू विश्वविद्यालय में संस्कृत की प्रधानता नहीं है और वहां “क्वींस कालेज की तरह भी संस्कृत का प्राधान्य नहीं रहा और वहां के विद्यार्थी बिस्कुट, शोरबा और अंडा गले के नीचे उतारते हैं.”[23] इसी लेख में कुछ और बातों पर विचार किया गया है जिसे देखना उचित होगा. सनातन धर्मियों के अनुसार शुद्धि कर हिन्दू सभा का वर्ण संकरता फैलाना अनुचित है. हिन्दू सभा की आलोचना करते हुए सनातन धर्म पताका ने लिखा-“ जब एक बार गो मांस या शूकर मांस खा लेने से ही हमारे धर्म शास्त्रों में दीर्घ-काल व्यापिनी विकट तपस्या का प्रायश्चित्त है तब जिन चमार आदि अस्पृश्यों के पचास पुश्तों से अभक्ष्य भक्षण हो रहा है , उन्हें कैसे हम अपने कूओं से जल भरने दें या एक पंक्ति में बैठाकर श्वांस सूघें. इनके सिवा जब कांग्रेस, आर्य समाज आदि ने शुद्धि अछूतोद्धार आदि का प्रस्ताव पास कर सुधारकों के लिये दरवाजा खोलना दिया है, तब इन्हें हिन्दू सभा में घुसेडने की क्या आवश्यकता है ! किंतु कुछ औंधी खोपडी के मुठ्ठी भर सुधारकों की रूचि रखने के लिये मालवीय जी ने ऐसे धर्म विरूद्ध प्रस्तावों का अनुमोदन कर सनातन भाईयों के मताधिक्य और श्रेष्ठत्व की उपेक्षा की और उनकी विमल विचार –माला में खलबली मचा दी है. पहले तो यों ही आर्यसमाजियों और ईसाइयों ने अछूतों को भडकाकर गांवों में सनातनियों से लडने वाली एक पार्टी खडी कर दी थी, दूसरे हिन्दू सभा ने ऐसे उपेक्षणीय विषयों को उठा कर उसके कर्णधारों ने अस्पृश्यों और सनातनियों के बीच सारे देश में बराबर के लिये रणभूमि तय्यार कर दी.”[24]
इस लेख में अंतत: यह कहा गया कि “ हिन्दू महासभा एक स्वार्थमयी और रहस्य पूर्ण संस्था भी बनी जा रही है.” [25] यह देखना आज बहुत दिलचस्प है कि हिन्दू सभा के समर्थक किस तरह अछूतों को हिन्दू मनवाने के लिये लड रहे थे और हिन्दु धर्म के रखवाले उन्हें खडी-खोटी सुना रहे थे. हिन्दू सभा और सनातन धर्म के पंडितों के बीच के शास्त्रार्थ इस प्रसंग में बहुत उपयोगी सिद्ध होटल हैं. यहां एक दो प्रसंगों की चर्चा की जा सकती है. छपरा जिले में हिन्दू सभा की ओर से बोलते हुए बाबू चन्द्रिका प्रसाद ने कहा- “ हाय हाय बडे शोक की बात है कि हिन्दू जाति डोम मेहतरों को अपने में मिलाना नहीं चाहती, इनके न मिलाने से बडी दुर्दशा हो गयी. औरंगज़ेब ने ... मंदिर तोड डाले...कायर हिन्दुओं ने विश्वनाथ का दूसरा मंदिर बनवा लिया, सोमनाथ का मंदिर तोड दिया गया. यदि उस समय डोम और मेहतर हिन्दू जाति के अन्दर होते तो ये लडके बचा लेते.... नहीं मालूम अब हिन्दू जाति की क्या दशा होगी. इस हिन्दू धर्म ने कणाद जैसे नास्तिकों को अपने में रक्खा उसको तो निकाला ही नहीं फिर डोम मेहतरों को कैसे निकाल सकता है.” सनातनियों की ओर से बोलते हुए पं. कालूराम शास्त्री ने कहा कि जब तक क्षत्रिय समाप्त नहीं हो गये सोमनाथ का मंदिर लूटा नहीं जा सका. जब क्षत्रिय न बचा सके तो उसे डोम मेहतर क्या बचा पाते. शास्त्र के श्लोकों का अर्थ बताते हुए शास्त्री जी ने कहा कि “ ब्राह्मणी के साथ शूद्र का संसर्ग होने से जो संतान होती है उसका नाम चाण्डाल है. वह लोहे के और शीशे के जेवर पहिरे, गले में बद्धी बांधे, कांख में पेटी रक्खे, दिन के पूर्वार्द्ध में नगर का पाखाना साफ करके उत्तरार्द्ध में नगर में न जाय ये इकट्ठे होकर नगर के बाहर नैर्ऋत्य कोण में रहें ऐसा न करें तो दण्डनीय हैं.” फिर बोले- “ पाराशर स्मृति में लिखा है कि यदि चाण्डाल का दर्शन हो जावे तो सूर्य का अवलोकन करो और यदि चाण्डाल का स्पर्श हो जावे तो पहिरे हुए वस्त्रों को धोओ और स्नान करो. यह धर्म शास्त्र की आज्ञा है कोई भी आस्तिक हिन्दू इसमें चीं चपट नहीं कर सकता.”
चन्द्रिका प्रसाद हिन्दु सभाई थे और वे ताड गये कि ज़्यादा शास्त्रार्थ करने की अपेक्षा कुछ ऐसी बातें कहनी चाहिये जिससे हिन्दु हित की बात प्रमुख हो जाये. बोले जायेंगे, हिन्दुओं की रक्षा के लिये इन्हें अपने में मिलाना होगा. इस पर कालूराम शास्त्री के वचन में थोडी नर्माई आयी लेकिन फिर भी पाराशर स्मृति का एक श्लोक उद्धृत करना नहीं भूले जिसका अर्थ था- “ चाण्डाल के घट का जल यदि कोई द्विजाति भूलकर पी ले तो फौरन कै कर देना चाहिये कै करके समस्त जल को निकाल दे तथा फिर प्राजापत्य उपवास करे यदि उस जल को उसी समय न निकाल दिया जाये तो फिर कृच्छ सांतपन करना चाहिये...” मामले को थोडा दूसरा रूख देते हुए शास्त्री जी ने कहा कि मामला शूद्रों का नहीं है- श्वपच शूद्रों में पाँच भेद हैं तथा शास्त्रों में पांचों के साथ पृथक पृथक व्यवहार है- बल्कि चाण्डालों और श्वपचों का है. अंतत: शास्त्री जी उस आम सभा में बोले- “ मनु की व्यवस्था देखिये- चाण्डालों तथा श्वपचों का निवास ग्राम के बाहर हो तथा इनके पात्र अश्पृश्य हैं तथा इनका धन कुत्ता तथा गदहा है. इनके कपडे मुरदों के वस्त्र वा पुराने चिथडे हों तथा फूटे बर्तनों में भोजन लोहे के आभूषण तथा घूमना स्वभाव [ यह इनका लक्षण है]. धर्मानुष्ठान के समय में इन [चाण्डाल और श्वपच इत्यादि] के साथ देखना बोलना आदि व्यवहार न करे. उनका व्यवहार तथा विवाह बराबर वालों के साथ हो. इनको खपरे आदि में रखकर अलग से पराधीन अन्न देना चाहिये तथा वे रात को ग्रामों तथा नगरों में न घूमें ...”
इस शास्त्रार्थ में क्या हुआ इसपर सनातन धर्म पताका का मंतव्य था –“ आज के शास्त्रार्थ में हिन्दू सभा ने वह पछाड खाई है कि यदि इसमें शर्मदार सभासद होंगे तो फिर कभी शास्त्रार्थ का नाम न लेंगे निर्लज्जों की तो कथा ही भिन्न है.” [26]
इस पूरे प्रकरण को इसके सन्दर्भ में देखना उचित होगा. विद्वानों ने उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सनातनी और सुधारवादी हिन्दूवादी धाराओं के टकरावों की पर्याप्त चर्चा की है. मैक्लेन ने कहा है कि उस दौर में हिन्दू बनाम मुसलमान के बजाय सनातनी और सुधारवादियों के बीच ज़्यादा तीव्र संघर्ष चल रहा था.[27] इस दौर में हिन्दुओं को एकजुट करने के प्रयास आन्दोलनों –हिन्दी और गो-रक्षा- के दौर में तो हुआ ही एक प्रकार से राष्ट्रीय सोच का एक हिन्दू संस्करण भी लिखने पढने वाले वर्ग ने तैयार कर दिया. जिस समय राष्ट्र्वादी सोच आकार ले रहा था उसी दौर में एक साम्प्रदायिक सोच भी तैयार हो रहा था.[28] लेकिन, विद्वानों का ध्यान इस और कम गया है कि इसी दौर में एक सवर्णवादी पाठ भी तैयार हुआ. पूरे इतिहास पर उनकी दृष्टि, समाज के पिछडे समुदायों के प्रति रवैया तथा प्रगति के संबंध में उनकी धारणा इन सभी मामलों में उन्नसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के पहले तीन दशक में यह कोशिश लगातार हुई कि उत्तर भारतीय समाज में सनातनी या वर्णाश्रमी मूल्य बोध बना रहे. अधिकतर सनातनी लोग यह सोचते थे कि “बुरे दिन” आ गये हैं और सुधारवादी चक्कर में पडकर कोरी- चमार भी ब्राह्मण बनने के “ धर्म विरोधी” स्वप्न देखने लगे हैं. [29] फिर भी सुधारवादी आन्दोलनों और बाद में कांग्रेस के नेतृत्व में हुए जनांन्दोलनों के कारण समाज में निम्न जातियों की भागीदारी महत्त्वपूर्ण होने लगी. धीरे धीरे सनातनी विद्वान भी हिन्दू के भीतर निचली जातियों को लेकर सोचने लगे. 1907 में लिखे गये एक भाषण में अयोध्या प्रसाद हरिऔध ने “बीस करोड हिन्दू के राष्ट्र” की बात की.[30] मालवीय हिन्दू एकता के लिये निचली जातियों को साथ लेकर चलने के हिमायती थे हालांकि सबको बराबर मान कर नहीं. वे समझाते थे कि विवाहादि जैसे सामाजिक व्यवहार में जाति के नियमों का पालन अवश्य होना चाहिये लेकिन सभाओं में निचली जाति के लोगों को समकक्ष नहीं पर नीचे बैठने दिया जाय. उनका मानना था कि नीची जाति के लोग इसी से प्रसन्न हो जायेंगे और हिन्दु एकता का आदर्श उपस्थित हो जायेगा. 1922 में गया की एक सभा में यह कहा कि अगर ब्राह्मणों को सभा में उच्च आसन दिया जाय तो रैदासों को भी नीचे बैठने दिया जाये.[31] उनके अनुसार द्विजों द्वारा इस तरह की उदारता से ही निचली जाति के लोग संतुष्ट हो जायेंगे. अपनी बात को समझाने के लिये वे पुराण की एक कथा सुनाते हैं कि एक बार एक राजा एक गांव से होकर गुजर रहे थे. उस गांव में एक अहीर के घर कथा हुई थी और प्रसाद वितरण हो रहा था. राजा ने अहीर के हाथ से प्रसाद ग्रहण नहीं किया क्योंकि अहीर नीच जात का माना जाता था. घर लौटकर राजा ने देखा कि उसके सारे पुत्र बीमार पड गये हैं. इस कथा के माध्यम से मालवीय ने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि किसी भी भक्त का निरादर प्रभु सहन नहीं कर सकते भले ही भक्त नीच अहीर ही क्यों न हो.[32] नेताओं में कुछ ऐसे लोग भी थे जो किसी भी सूरत में वर्णाश्रमी आदर्शों को छोडने को तैयार नहीं थे. इस तरह के लोगों में सबसे बड़ा नाम था दरभंगा महाराज का जिनके विचारों पर एक दृष्टि डालना युक्तिसंगत होगा. जनवरी 1923 में बम्बई की एक बड़ी सभा में उन्होंने कहा कि “ शोभा, प्रतिष्ठा, गौरव और जीवन इसी में है कि सच्चे हिन्दू की हैसियत से सत्य सनातन धर्म कि रक्षा करते हुए संसार के आगे बढें. उसी को हिन्दू जाति की उन्नति कहेंगे ...जिस जातीय व्यवस्था की आपके पूर्व पुरूषों ने धन, जन और जीवन सभी कुछ देकर रक्षा की है वह व्यवस्था जीवित रहेगी.” [33]
कतिपय संस्मरणों में बीसवीं सदी के दूसरे दशक में हिन्दी प्रदेश में जात पात के नियमों का कैसा आतंक था इस बात का पता चलता है. 1915 की गर्मियों में जमालपुर बाज़ार में एक मैथिल ब्राह्मण, जिसने आर्य समाज को स्वीकार कर लिया था, ने घोषणा की कि वह एक कुएँ से निकाल कर एक अछूत के हाथ से पानी पीकर लोगों को दिखलायेंगे कि इससे कोई प्रलय नहीं होता है. मैथिल पंडितों के भय दिखाने के बावजूद जब मोहित मिश्र (शर्मा) न डिगे तो देखा गया कि क्रुद्ध भीड के सामने किसी की हिम्मत न हो रही थी कि आगे बढे और कुएं से पानी निकालकर शर्मा को पानी दे. वहां कई आर्य समाजी नौजवान भी खडे थे. पर “ कहीं लोग पानी भरने वाले को ही न मार दें- युग युग से जो काम वर्जित है उसे अचानक उठकर कर देने का साहस कोई नहीं जुटा पा रहा था. स्त्रियां दूर दूर से , अपने घरों की खिडकियों से झांककर, यह तमाशा देख रही थीं. ‘ पता नहीं आज क्या हो जाए? धर्म का नाश होने पर तो यह धरती भी नष्ट हो सकती है. भूचाल आ जाएगा, महामारी फैल जाएगी’ तब हिम्मत कौन करे? मोहित शर्मा के बहुत ललकारने पर, हाथ पकड कर खींचने पर श्यामला साह तेली तथा एक दो सूडी, कलवार भी इनारे की जगत पर आ चढे.” ... उन दिनों डोम चमार आदि जातियों की तो बात ही नहीं उठती थी , बनिया जाति के ही कुछ शाखा के कुछ लोगों का पानी नहीं चलता था” हजारों लोगों के सामने एक साहसी ब्राह्मण आर्य समाजी युवक मोहित मिश्र को इस साहस के लिये कितने कष्ट उठाने पडे उसके बारे में जानने पर आज विश्वास करना कठिन होगा.[34]
उपसंहार में यह कहना अनुचित न होगा कि 1920 के दशक तक भी राष्ट्रवादी हिन्दू नेतृत्व जाति के प्रश्न पर वर्णाश्रमी व्यवस्था से विमुख होकर् अपने सामाजिक संगठन को नहीं समझ पा रहा था. लोकशक्ति के युग के आने की सूचना गांधी के नेतृत्व में चल रहे आन्दोलनों से हो चुकी थी और संख्या का समीकरण हर राजनैतिक समीकरण के लिये प्रभावी सिद्ध हो रहा था. ऐसे समय में भी मदन मोहन मालवीय जैसे प्रतिष्ठित हिन्दू नेताओं और उनके संगठन हिन्दू महासभा को जिस तरह से विरोध का सामना करना पड रहा था वह यह बतलाने के लिये काफी था कि सनातनी बज्र पुरातनपंथी वर्णाश्रमी समर्थकों की कमी उस समय भी यह नहीं देख सक रही थी कि अब नया युग आ गया है और नया समाज बन रहा है. वह कैसा युग था इसको व्यक्त करने के लिये अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं जिससे प्रमाणित होता है कि तमाम प्रगतिशील तत्त्वों के साथ हिन्दी में ब्राह्मणवादी सोच प्रभावी रूप से उपस्थित था. यह ऐतिहासिक महत्त्व की बात है कि यह सोच बाद के वर्षों में परोक्ष रूप से धीरे धीरे कम दिखाई देने लगा. यह ‘छुप जाना’ था या खत्म हो जाना था, यह जांच का विषय है.
[1] ओम प्रकाश वाल्मीकि, ‘1857 और हिन्दी नवजागरण’, प्रगतिशील वसुधा- 76, वर्ष 4, अंक 4, जनवरी-मार्च 2008, पृ. 170. हिन्दी नवजागरण के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों के संतुलित अध्ययन के लिये ज़ोर देने पर बल एक अरसे से दिया जाता रहा है. हिन्दी के बहुत सारे समाजशास्त्रीय पद्धति से परिचित आलोचकों ने इस विषय पर लिखा है. हिन्दी नवजागरण के महत्त्व को स्वीकारते हुए भी मैनेजर पाण्डेय जैसे समीक्षक इसके नकारात्मक पक्ष को भी ध्यान रखने की ज़रूरत पर बल देते हैं. (देखें- मैनेजर पाण्डेय, साहित्य और इतिहास दृष्टि (दिल्ली: वाणी प्रकाशन, 2000), पृ. 191.
[2] हितेन्द्र पटेल, ‘ज़ाति का प्रश्न’, देवेन्द्र चौबे, साहित्य का नया समाजशास्त्र, (दिल्ली: किताब घर, 2006).
[3] हरिश्चन्द्र मैगज़ीन, 15 अप्रिल, 1874, पृ. 198.
[4] वही, पृ, 199.
[5] वही, पृ. 199.
[6] हेतुकर झा (सं) बाबू रामदीन सिंह रचित बिहार दर्पण, (दरभंगा: महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउण्डेशन,1996 [1882], पृ.134.
[7] वही, पृ. 142-43.
[8] वही, पृ. 148.
[9] वही, पृ. 148.
[10] वही, पृ. 138.
[11] क्षत्रिय पत्रिका,1880,
[12] रामचरित्र सिंह, क्षत्रिय पत्रिका, खण्ड 2, संख्या 3,4,1882, पृ. 28. इस लेख में लेखक का उद्देश्य कायस्थों या अन्य किसी जाति की निन्दा करना नहीं था बल्कि क्षत्रियों को इस बात के लिये तैयार करना था कि बदलते समय में अगर वे बंगाली, मद्रासी और कायस्थों की तरह उन्नति नहीं करेंगे तो उनका कोई मान सम्मान नहीं रहेगा.
[13] मैने अन्यत्र इस विषय पर विस्तार से चर्चा की है. देखें- हितेन्द्र पटेल, ‘कम्युनलिज्म एण्ड इंटेलिजेंसिया इन लेट नाइंटींथ एण्ड अर्ली ट्वेंटीथ सेंचुरीज बिहार’(शोध प्रबंध, इतिहास अध्ययन केन्द्र, ज. ने. वि., 2007), अध्याय 5.
[14] बालकृष्ण भट्ट, निबंधावली. पृ.
[15] द्विज पत्रिका , संख्या 25, 1891. यह पत्रिका साहब प्रसाद सिंह द्वारा खड्गविलास प्रेस, बांकीपुर (पटना) से प्रकाशित होती थी. इस पत्रिका ने बंग देश का भूगोल और इतिहास पुस्तक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित किया था. इस इतिहास पुस्तक में जाति का उल्लेख बहुत सहजता से लोगों के वर्णन में किया जाता था. विशेष रूप से द्रष्टव्य है इस पुस्तक का ‘हिन्दू शासन’ खंड. इस खंड में उल्लेख किया गया है कि बंगाल में कुलीनता का प्रचलन कैसे शुरू हुआ- “ राजा आदिशूर (इन्होंने 974 ई के इधर उधर सिंहासनारोहन किया था) ने भारत के जिन जिन प्रदेशों में बौद्ध धर्म का प्राबल्य नहीं हुआ था उन उन प्रदेशों से अच्छे अच्छे पंडित बुलाने का संकल्प लिया.... कन्नौज से पाँच ब्राह्मण- भट्ट नारायण, दक्ष, श्री हर्ष, छांदोड और वेदगर्भ (बुलाए गये).यही कुलीन बंगाली ब्राह्मणों के आदि पुरूष हैं. इन के साथ एक एक कायस्थ जाति के सेवक थे वही कुलीन कायस्थों के के पूर्व पुरूष हैं.... आदिशूर ने जिन ब्राह्मणों और कायस्थों कन्नौज से बुलाया था उन की संतान को श्रेणी बद्ध करना सुयश का बड़ा भारी कारण हुआ किस की क्या मर्यादा है यह स्थिर करके बल्लाल सेन ने कुलीनता की प्रथा चलाई.”
[16] नगेन्द्र नाथ गुप्त, अमर सिंह (पुणे: संवाद प्रकाशन, 2008), पृ. 13. यह पुस्तक मूलत: 1895 में बांग्ला में लिखी गयी थी और इसका हिन्दी अनुवाद प्रतापनारायण मिश्र ने किया था. खड्ग विलास प्रेस , बांकीपुर (पटना) से इसका प्रकाशन बारह वर्षों बाद हो सका. फरवरी 2008 में संवाद प्रकाशन, पुणे ने इस पुस्तक को फिर से प्रकाशित किया है.
[17] माधव मिश्र, ‘ पिञ्जरपोल’, सचित्र माधव मिश्र निबन्ध माला परिशिष्ट खण्ड (सं. चतुर्वेदी द्वारकाप्रसाद शर्मा एवं झावरमल्ल शर्मा) (प्रयाग: इंडियन प्रेस लिमिटेड, 1935), पृ.25.
[18] माधव मिश्र संपादित सुदर्शन पत्रिका में जून 1900 के अंक में यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि हिन्दुओं को चाहिये कि वे सिर्फ उन्हीं राष्ट्रीय संगठनों को हिन्दुओं की राष्ट्रीय संस्था मानें जहां वर्णाश्रम धर्म के नियमों का पालन होता हो.
[19] हेतुकर झा, ‘लोअर कास्ट पेजेंट्स एंड अपर कास्ट्स ज़मीदार्स इन बिहार, 1921-25’, इंडियन इकानामिक एंड सोशल हिस्ट्री रिव्यू, 14,4, 1977.
[20] स्वामी सहजानंद जैसे महान किसान नेता ने अपना सामाजिक जीवन एक जाति के नेता के रूप में किया था. वे भूमिहारों को ब्राहमण का दर्ज़ा दिलाने के लिये लड रहे थे. उनके शुरूआती लेखन में जातिवादी सोच को स्पष्टत: देखा जा सकता है. (देखें- सहजानंद, भूमिहार ब्राह्मण परिचय, बनारस, 1916 एवं ब्राह्मण समाज की स्थिति, बनारस, प्रकाशन वर्ष का उल्लेख नहीं).
[21] देखें Hitendra Kumar Patel, ‘The Intelligentsia and the Question of Caste in Bihar in the Late Nineteenth and Early Twentieth Centuries’, in Raj Sekhar Basu & S. Dasgupta (eds.), Narratives of the Excluded (Kolkata: K. P. Bagchi, 2008).
[22] सनातन धर्म पताका, मुरादाबाद, संख्या 2, वर्ष 26, 1926, पृ. 28-29. यह मासिक पत्रिका 1900 से मुरादाबाद से निकलती थी.
[23] पूर्वोक्त पृ. 30.
[24] सनातन धर्म पताका, वर्ष 26, संख्या 2, पृ. 30-31.
[25] पूर्वोक्त, पृ. 33.
[26] सनातन धर्म पताका, वर्ष 26, पृ. 14.
[27] विस्तार से चर्चा के लिये देखें- John Mclane, Indian Nationalism And The Early Congress (Princeton:1977). इस सम्बन्ध में अन्य उपयोगी जानकारी के लिये देखें- W. Jones Kenneth, Socio Religious Reform Movements In British India (Cambridge University Press, 1994), Vasudha Dalmia, The Nationalization Of Hindu Traditions (Delhi and Calcutta: Oxford University Press, 1997).
[28] Gyanendra Pandey, Construction of Communalism , Delhi, OUP, 1992.
[29] बनारस और अन्य उत्तर भारतीय नगरों और कलकत्ता से निकलने वाले पत्रों में तो इस तरह के हज़ारों उदाहरण दिये ही जा सकते हैं, बिहार की कुछ पत्रिकाएं भी 1888 के बाद से इस तरह के भावों को स्पष्टत: व्यक्त कर रही थी. उदाहरण के लिये देखें सारन सरोज के जून और दिसम्बर 1888 के अंक.
[30] हरिऔध ने 1907 में सनातन धर्म के समर्थन में एक भाषण तैयार किया था जिसे उन्होंने प्रकाशित किया था. इस पुस्तिका की एक फटी हुई कापी राष्ट्रीय पुस्तकालय, कलकत्ता में है.
[31] विस्तृत चर्चा के लिये देखें- ब्राह्मण सर्वस्व, जनवरी, 1923. इस अंक में मालवीय 30 दिसंबर 1922 को गया में दिये गये भाषण को छापा गया था.
[32] वही.
[33] पूरे भाषण के लिये देखें ‘ सनातनधर्मोद्धार का उपाय’, ब्राह्मण सर्वस्व, जनवरी 1923, पृ. 58-63.
[34] विस्तार से जानने के लिये देखें- सावित्री दूबे, जो जाने नहीं गये (दिल्ली: अभिरूचि प्रकाशन, 1997), पृ.19-49.
[ वागर्थ, अगस्त, 2009]
Thursday, 20 August 2009
आत्म इतिहास के सहारे प्रति इतिहास की ओर
इतिहास के एक दार्शनिक कॉलिंगवुड की पुस्तक प्कमं वि भ्पेजवतल की एक प्रसिद्ध उक्ति है कि इतिहास मूलतः इतिहासकार के दिमाग में होता है। बीती हुई घटनाओं को इतिहासकार अपनी ऐतिहासिक कल्पना शक्ति से अपने मन (उपदक) में फिर से घटते हुए ÷देख कर' उसका इतिहास लिखता है। इस बात को ध्यान में रख कर कहा जा सकता है कि हर इतिहास अपने युग के हिसाब का ही होता है। इतिहास का एक खाका होता है और उसके इर्द गिर्द वर्तमान संदर्भों से उठ कर आये इतिहास खंड जुड़ते रहते है। इस धारणा के विपरीत एक ÷पाजिटिविस्ट' आग्रह जर्मन इतिहासकार रांके के समय से ही बना रहा है जो इतिहास को पवित्र और वस्तुनिष्ठ मानता है। इस धारणा के लोग ऐतिहासिक सच की वैधता के प्रति संवेदनशील बने रहते हैं। लेकिन, हाल के वर्षों में उत्तर संरचनावादी सोच के आने के बाद और खास तौर से उत्तर आधुनिक विमर्शों के प्रभावी होने के क्रम में यह बात ज्यादा मान्य होने लगी है कि चूंकि इतिहास में जाया नहीं जा सकता इसलिए यह सच के रूप में हमें उपलब्ध नहीं हो सकता। जो इतिहास है उसकी पुनर्प्राप्ति की आकांक्षा प्रयोजनीय है लेकिन उसकी उपलब्धि असम्भव। कुल मिला कर ऐतिहासिक विवरण का ध्येय है − ऐसे सवाल पूछना जिसमें ऐतिहासिक ÷सच' (जिसे सच के रूप में कम ÷सचों' के रूप में बेहतर रूप में समझा जा सकता है) ज्यादा साफ दिखाई दे, ऐतिहासिक ÷सच' के इर्दगिर्द की चीजों पर इस तरह का रोशनी पड़े कि जो ÷सच' है वह दीखने सा लगे। इन्हीं मायनों में ऐतिहासिक अध्ययन का उद्देश्य किसी सत्य का अनुसंधान नहीं है कुछ ऐसे प्रश्न पूछना है जिसमें इतिहास के इलाकों से ज्यादा से ज्यादा हिस्सा हमें दीखे। जाहिर है, इस पूरी प्रक्रिया में हम चाहें या न चाहें अपने वर्तमान को भूतकाल पर प्रक्षेपित करते हैं। इतिहास वर्तमान से ज्यादा जुड़ा है भूतकाल से कम। भूतकाल सिर्फ तथ्य देते हैं। उन तथ्यों को किस प्रकार संयोजित करना है, कहां किसे कितनी प्रमुखता देनी है और क्या निष्कर्ष निकालने हैं यह सब बातें वर्तमान से ही तय होती हैं। एक विद्वान ने प्रस्तावित किया है कि हमारे लिए इस सीमित इतिहास से आगे बढ़ कर यह जानने की कोशिश ज्यादा जरूरी है कि घटनाओं को लोगों ने किस रूप में ÷अपने इतिहासों' में देखा है। भले ही इन इतिहासों में इतिहास की प्रामाणिकता का अभाव हो। यह ज्यादा जरूरी है कि लोगों ने भूतकाल की घटनाओं का ÷आत्म इतिहास' अपने तरीके से लिखने की कोशिश की। इन चेष्टाओं को इतिहास अगर खारिज कर दे तो भी इतिहास को इस प्रश्न का उत्तर देना पड़ेगा कि आखिरकार ये ÷आत्म इतिहास' किन मानकों पर खारिज होंगे और इन मानकों को बनाने वाले कौन हैं?भारतीय समाज के इतिहास लेखन की एक बड़ी असुविधा यह है कि समाज अभी भी सामुदायिक समूहों में बंटा है और समुदायों के इतिहास को इतिहास नहीं माना जाता। उन्नसवीं सदी के आठवें दशक से ही भारतीय समाज में सामुदायिक इतिहास लेखन की परम्परा शुरू हो गयी। तबसे लेकर आज तक लगातार विभिन्न समुदायों (जातियों) ने अपने अपने तरीके से अपना इतिहास (आत्म इतिहास) लिखा है। पहले यह बड़ी जातियों की ओर से आया बाद में उन समुदायों की ओर से भी इतिहास लेखन हुआ जिसे ÷नीची जाति' कहा जाता है।इस प्रसंग में हजारीप्रसाद द्विवेदी की एक बात का उल्लेख करना उचित होगा कि भारत में सबसे निचली और सबसे ऊंची जाति का पता लगाना मुश्किल है। कोई भी ऐसी जाति भारत में नहीं है जो यह मान ले कि वह सबसे नीचे है और कोई भी ऐसी जाति नहीं जिसके सबसे ऊंचे होने को बाकी जातियां मान लें। सभी जातियां अपना अपना इतिहास लिख कर यह प्रमाणित करने में जुटी रही हैं कि वे ऊंची जातियां रही हैं और अगर वे कमजोर हो गयी हैं या पिछड़ी जाति कहलाती हैं तो इसके लिए अन्य जातियों का षडयंत्र जिम्मेदार है। इस तरह के इतिहास लेखन का उद्देश्य भिन्न भिन्न समयों में बदलता रहा है लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि इसका उद्देश्य उस जाति के लोगों में गर्वबोध तैयार करना रहा है। उपेक्षित समुदायों का आत्म इतिहास (संकलन एवं सम्पादन बद्री नारायण, विष्णु महापात्र, अनंत राम मिश्र) इसी तरह के जातीय इतिहास का संकलन है। ये इतिहास उन जातियों के शिक्षित सामुदायिक इतिहासकारों, सक्रिय राजनैतिक बौद्धिकों एवं जाति के साहित्यकारों द्वारा लिखे गये हैं। (पृ.9) इस तरह के इतिहासों का प्रभाव व्यापक हुआ है। उत्तर प्रदेश एवं बिहार में 100 से ज्यादा प्रकाशक दलितों की ऐसी पुस्तिकाएं प्रकाशित कर रहे हैं। (पृ. 10)। किसी किसी पुस्तिका के तो 10-10 संस्करण 5-6 वर्षों में ही छप जाते हैं। एक एक संस्करण 5-5 हजार से कम के नहीं होते। (पृ. 12) ऐसे साहित्य का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य ब्राह्मणवादी साहित्य के प्रतिसाहित्य की रचना भी है। (पृ. 11)इस विषय में किसी बहस के पहले इस पुस्तक की मूल बातों का उल्लेख करना उचित होगा। इस पुस्तक की भूमिका में कहा गया है − ÷÷भारत में उपनिवेशवादी सत्ता अपने शासितों पर सुचारु रूप से शासन करने के लिए ÷कालोनियल डाक्यूमेण्टेशन प्रोजेक्ट' के तहत जनगणना एवं गजेटियर्स के माध्यम से भारतीय समाज में जातियों की सामाजिक अवस्थिति का सर्वे कर उन्हें लिखित कर एक अपरिवर्तनशील सामाजिक अवस्थिति में तब्दील करने लगी तो इस भय से कि अब जाति की जो हाइरेरिकल अवस्थिति तय हो जायेगी, वह बदल नहीं सकती, अनेक जातियों ने अपनी नयी पहचान के दावे करने प्रारम्भ किये।'' (पृ 14) इसके बाद जातियों के बीच दावों को लेकर विभिन्न जातियों के बीच टकराव उभरने लगे। इस प्रक्रिया में अनेक जातियों ने अपना जातीय इतिहास लिखा, जातीय पत्रिाकाएं निकालीं एवं जातीय संगठन गठित किये। हिन्दू धर्म के रक्षार्थ आर्य समाज ने अनेक अछूत, निचली, मध्य जातियों को उच्च कुलों एवं ब्राह्मण के गोत्रों से उत्पन्न बता कर ऐसा इतिहास रचा जिससे इन जातियों का संस्कृतिकरण किया जा सके। इस प्रक्रिया में सदियों से नीचे के पायदान पर ठिठके सामाजिक समूहों को अपने महत्त्व को सिद्ध करने का मौका लगभग पहली बार मिला। बाद में निचली जातियों की अस्मिता निर्माण की यह प्रक्रिया थम सी गयी। 1960 के बाद पुनः इस तरह का इतिहास रचा जाने लगा। ÷÷1984 में उत्तर प्रदेश में बी.एस.पी. के गठन के बाद एवं बहुजन आंदोलन के नव उभार के असर के कारण भी बड़े पैमाने पर निचली जातियों ने अपने जातीय इतिहास लिखे। फर्क यह था कि पूर्व में जहां उनके जातीय इतिहास पर आर्यसमाजियों एवं औपनिवेशिक नृत्तत्त्वशास्त्रिायों ने कार्य किया था, वहीं इस बार खुद उन्हीं के सामुदायिक बुद्धिजीवी उनका इतिहास रच रहे थे।'' (पृ 15)इस पुस्तक के समर्पण में लिखा है − ÷उनको जो अपना इतिहास खुद लिख रहे हैं।' जाहिर है, इस पुस्तक के पीछे इन इतिहास लेखकों के प्रति समर्थन का भाव है, स्वागत का भाव है। एक तरह से यह आग्रह काम कर रहा है कि इन आत्म इतिहासों को भी इतिहास के रूप में देखा जाय। यह कहा गया है कि ÷ये इतिहास अकादमिक इतिहास तो नहीं है किन्तु विभिन्न समुदाय इन्हें अपना इतिहास मानते है।' (पृ 20) अगर यह माना जाय कि भारतीय इतिहास लेखन के ऊपर सवर्णवादी, पुरुषवादी, बुर्जुवा दवाब रहे हैं तो स्पष्टतः ये आत्म इतिहास उपेक्षित जातियों की ओर से आये महत्त्वपूर्ण दस्तावेज हैं। लेकिन, इन्हें इतिहास के स्रोत के रूप में स्वीकार करने की अपनी समस्याएं हैं जिस पर अलग से विचार किया जा सकता है।इस पुस्तक में कुल आठ जातियों का इतिहास संकलित है। प्रथम इतिहास पुस्तक ÷नायि वर्ण निर्णय' (1920) में रेवती प्रसाद शर्मा ने नाइयों को ब्राह्मण तो सिद्ध किया ही है उन्हें सच्चे बनने के लिए प्रेरित किया है। इस निम्न जाति के इतिहास में हिन्दू सवर्णवादी साम्प्रदायिक सोच स्पष्ट रूप में उपस्थित है − ÷÷भारत के दुर्भाग्य से जब से यवनों का राज्य हुआ तो कौन सा अत्याचार था जो इस देशवासियों पर नहीं हुआ? जीते जी जलाया गया, खाल खिचवा कर भुस भरवा दिया गया, बहू बेटियों के बलात धर्म नष्ट किये गये, हमारे शास्त्रा फूंक फूंक कर हम्माम गरम किये गये! गांव के गांव भस्म कर दिये गये। शरीरों पर तेल छिड़क कर आग लगा दी गयी। जिन ब्राह्मणें और क्षत्रिायों में आत्मिक बल था, उन्होंने प्राण दिये परंतु धर्म न दिया।'' (पृ 44)प्राचीन ग्रंथों से लेकर आधुनिक विद्वानों के उद्धरणों से रेवती प्रसाद शर्मा ने नाइयों को ब्राह्मण का ÷सहधर्मा' प्रमाणित किया। एक जगह वे लिखते हैं − ÷÷शिव जी के दो पौत्र हुए ब्रह्मा और नापित। ब्रह्मा ने तो सृष्टि उत्पन्न करने का ठेका (बवदजतंबज) लिया और नापित ने शुद्ध होकर के संसार सागर से पार उतारने की कनजल डयूटी ली। ब्रह्मा और नाई भाई भाई हैं और ब्राह्मण ब्रह्मा के पुत्र हैं। इस हिसाब से नाई ब्राह्मण का चाचा भतीजे का सम्बंध होता है।'' (पृ 94) रेवती प्रसाद शर्मा की इस पुस्तक की मूल स्थापना है कि किसी समय हम महान आर्य संतान थे। पवित्र आर्य संतानें बाद में खंडित होती गयीं और मुसलमानों के अत्याचारों का शिकार हुईं। विक्टोरिया राज में दयानंद के बाद अब सही तरीके से अपने गौरव को फिर से पाने का सुयोग नाइयों ब्राह्मणों को मिला।दूसरी संकलित पुस्तक यशोदा देवी, एम.एल.ए. बिहार की है जिन्होंने साठ के दशक में दुसाधों का इतिहास लिख कर यह प्रमाणित किया है कि दुसाध दरअसल गहलोत राजपूत हैं और दुसाध तो राजस्थान से आये हैं। वे लिखती हैं − ÷÷दुसाध जाति अपने गौरवमय अतीत को भुला कर आज अविद्यारूपी अंधकार में भटक रही है।... स्वर्ग से भी श्रेष्ठ अपनी जननी और जन्मभूमि राजपूताना (मेवाड़) का मोह छोड़ कर बिहार के गयाजी जैसे प्रसिद्ध एवं पवित्र तीर्थस्थान को यवनों से बचाने हेतु राणा लाखा के साथ बिहार में सर्वप्रथम ÷दुसाधों' की सेना आयी थी।... दुसाध निःसंदेह सूर्यवंशी क्षत्रिायों में से गहलोत राजपूतों की एक शाखा है।'' (पृ. 105-106) इस इतिहास में यह बतलाया गया है कि प्रतापी दुसाधों को विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा किस प्रकार दबाया गया और कैसे धर्मपरायण दुसाधों ने ÷यवनों से बचाव के लिए सूअर पाल कर दरवाजे पर रखना जरूरी समझा।' (पृ. 127)आरक्षण के प्रश्न पर लेखिका ने दुसाधों को अनुसूचित जाति की सूची में रखे जाने का समर्थन किया है यह कहते हुए कि ÷अब हमें पददलित होने की वजह से ही ऊपर उठाने के लिए सूची में रखा गया था, अछूत और नीच समझ कर कदापि नहीं।' इस हिसाब से दुसाध का राजपूत होना और अनुसूचित जाति की सूची में होना दोनों एक दूसरे के विरोध में नहीं जाते थे।इस पुस्तक में भी यह देखा जा सकता है कि सवर्ण हिन्दू के देखने और दुसाध समाज के सुधारक के देखने में बहुत समानताएं हैं। लेखिका ने सुधार के लिए जो सुझाव दिये हैं वे हैं : विधवा विवाह, मद्यपान का निषेध, सिनेमा पर प्रतिबंध, शिक्षा, बाल विवाह, स्वयंवर, तिलक दहेज का विरोध। एक स्थान पर नारी के आदर्श पर लिखते हुए यशोदा देवी के विचार हैं − ÷÷सीता, सावित्री, द्रोपदी, कुंती, मीराबाई आदि के त्याग तथा पतिव्रत धर्म को कौन नहीं जानता तथा पद्मिनी आदि अनगिनत नारियों ने अपनी जान की परवाह नहीं कर खुशी खुशी से श्रेष्ठ सतीत्व के रक्षार्थ चिता में जल कर जौहर व्रत का पालन किया।'' (पृ 148)इसके बाद के इतिहासों में एक तरह का ÷पाराडाईम शिफ्ट' है। इन इतिहासों में पुराने आर्यसमाजी दबाव भी कम हुए हैं और ब्राह्मणवादी तर्कों का सहारा कम लिया गया है। इन इतिहासों में कुछ अन्य निम्न श्रेणी के समुदायों के जातीय इतिहास संकलित हैं। इन इतिहासों में दलितों के इतिहास के कुछ स्वर्णिम अध्यायों पर बल दिया गया है। स्पष्टतः बहुजन समाज के शक्तिशाली होने के बाद लिखे गये इन इतिहासों के सरोकार अलग हैं। पासी जाति पर लिखते हुए आर.के. चौधरी पुराने तरह के जातीय इतिहासों को नहीं मानते हैं। इस तरह के मिथकीय इतिहास को वे हास्यास्पद मानते हैं जिनमें कहा जाता है कि पासी की उत्पत्ति परशुराम के पसीने की बूंदों से हुई थी। वे तथ्यों और आधुनिक अध्ययनों के हवाले से अपनी बात कहते हैं। उन्होंने क्रुक्स जैसे लेखकों के हवाले से और जनगणना की रिपोर्टों के आधार पर पासियों का इतिहास लिख कर यह बतलाने का प्रयास किया है कि पासी समाज की कितनी गौरवशाली परम्परा रही है और किस प्रकार 800 साल पहले पूरे लखनऊ, इलाहाबाद और फैजाबाद मंडलों में इस जाति के राजा का शासन था। उन्होंने यह भी बताया है कि पासी राजा को बेदखल करने के लिए मुसलमानों और राजपूतों ने लगातार हमले किये। (पृ 158) अवध के अधिकांश पासियों ने मुसलमानों से बचने का रास्ता निकाला था सूअर पालन कर।इस आत्म इतिहास की भूमिका उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने लिखी है जिसमें उन्होंने लिखा है − ÷÷पासी समाज की गौरवशाली परम्परा रही है। पासी समाज के लोग एक समय अवध के बड़े भूभाग पर शासन करते थे।'' (पृ 155)... दलित वर्ग के शासकों के इतिहास का लेखन आज समय की सबसे बड़ी मांग है।'' मायावती ने जो कुछ इस पुस्तक की भूमिका में लिखा है वह 1997 तक आते आते निम्न जातीय इतिहास के सरोकारों को स्पष्ट कर देता है। अब दलित राजाओं, वीर दलित नायकों नायिकाओं के इतिहास को सामने लाना इतिहासकारों का प्रमुख प्रयोजन हो गया। लाखन पासी से लेकर ऊदा देवी तक पासी समुदास के गौरव को सामने लाना ही लेखक का उद्देश्य हो गया।इस नये प्रकार के दलित इतिहास लेखन को हरमोहन दयाल अपनी पुस्तक ÷वर्ण व्यवस्था और कुरील वंश' में नये धरातल पर ले जाते हैं। डॉ. आम्बेडकर की पुस्तक ॅीव ूमतम जीम ैीनकतें को आधार बना कर (जिसमें इस बात पर बल है कि शूद्र वास्तव में क्षत्रिाय हैं) उन्होंने कुरील वंश का इतिहास लिख कर भारतीय इतिहास लेखन में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। मौजा घाटमपुर जनपद उन्नाव के एक वंश कुरील वंश का इतिहास लिखने में लेखक लगभग सवर्णवादी सोच से मुक्त हो जाता है। लेखक ने दिखाया है कि किस प्रकार कुरील वंश के छब्बा और रामजीवन ने उन्नाव के इलाके में बेगार प्रथा को लगभग समाप्त कर दिया और किस प्रकार इस वंश के लोगों ने समाज की उन्नति में भूमिका अदा की। यह सही अर्थ में एक नये प्रकार का दलित आत्म इतिहास लेखन है जो अपने इर्द गिर्द के इतिहास का अपनी तरह से वर्णन करने की छूट देता है। इस इतिहास लेखन में इतिहास से गर्व खींच कर लाने की व्यग्रता कम है और वर्तमान समय में अपने लोगों के गुणगान करने की इच्छा अधिक। आम्बेडकर से यह सूत्र लेकर कि ऋग्वेद में दरअसल तीन ही वर्ण हैं और शूद्रों को ब्राह्मणों से भी ज्यादा मान सम्मान प्राप्त था और ब्राह्मणों की कुटिल नीति की वजह से शूद्र वर्ण अपने क्षत्रिात्व से गिर कर तीसरे वर्ण वैश्य से भी नीचे एक नया चौथा वर्ण बन गया, लेखक ने एक दिलचस्प इतिहास प्रस्तुत किया है। अगले चार अध्यायों − ÷नागवंशीः हेला की कहानी हेला की जबानी', ÷नागवंशी भगी मातादीन हेला' (सजीवन नाथ), ÷निषाद वंश के कुल गौरव' (अविनाश चौधरी), ÷मेहतर जाति का इतिहास' (एस. एल. सागर), में जिस आत्म इतिहास के दर्शन होते हैं वे भारतीय समाज के अध्ययन के लिए एक नये इतिहास दर्शन की मांग करते हैं। इस प्रकार के इतिहास में मिथक और इतिहास के बीच की दीवार टूट जाती है और लेखक अपनी आकांक्षा को इतिहास में प्रकट करता चलता है। इतिहास से लेखक क्या करना चाहता है इसे इन पंक्तियों से समझा जा सकता है − ÷÷नागवंशीश्रमण संस्कृति के इतिहास को हम दर्शायेंगे / दास बनाया इतिहास मिटा इस राज को हम बतायेंगे/ ...निज इतिहास के अभाव में, समाज अंधा लूला है/ भटक रहा शूद्र अछूत बन, गौरवशाली पथ भूला है/ ... इतिहास होता है जिनका, सम्मान से वो जीते हैं/ जिनका इतिहास मिटा, वे पशु से भी गये बीते हैं/ ...हेला जैसे नागवंशियों की बर्बादी का यही राज रहा/ जब से मिटा इतिहास, न शान मान ताज रहा/ ... जिसके हाथ लगी सत्ता, मनमाना इतिहास लिखाया/ दास गुलाम बनाने को, मेरा असली इतिहास छुपाया/ ... महत्त्व जाना इतिहास का, तो इसमें सर खपाया है/ इतिहास पाने में अपना, दिन रात को लगाया है/ ...इस अपने इतिहास को पाने की चाह में असंख्य लोगों को खोज कर लाया गया है और बतलाया गया है कि ये हेला, निषाद, मेहतर लोग ही भारतीय संस्कृति के जनक हैं। लगभग हर बड़े आख्यान के साथ किसी वैकल्पिक आख्यान को प्रस्तुत करके, अपने समाज से आये महानों (जिनमें एकलव्य, सत्यवती, साईं बाबा, रघु केवट, नारद के निषाद गुरु, हिम्मत सिंह (सिक्ख) से लेकर मातादीन हेला, ऊदा देवी, झलकारीबाई तक शामिल हैं) का उल्लेख करके ये आत्म इतिहास के आईने में अपने समुदाय का चेहरा देखते हैं। इस क्रम में सवर्णवादी इतिहास के महानों की जगह दलित समुदाय से आये नायकों का आख्यान उपस्थित होता है। 1857 के प्रसंग में इन आत्म इतिहास के लेखकों का मानना है कि ÷तमाम शहीद दलित वीरों और वीरांगनाओं को... धूर्त इतिहासकारों ने जानबूझ कर इतिहास के पन्नों में स्थान नहीं दिया।' इनके लिए मंगल पांडेय एक ÷अहंकारी ब्राह्मण' है और (1857 की) क्रांति के सूत्रधार मंगल पांडेय नहीं बल्कि मातादीन भंगी थे।' (पृ 397) इस पुस्तक को पढ़ कर किसी अकादमिक इतिहास के पंडित को यह लग सकता है कि यह इतिहास नहीं है। अपनी जगह से, अपने मन से कुछ भी लिखने को इतिहास कैसे माना जा सकता है? यह तो एक तरह का साहित्य है। इतिहास माने जाने के लिए जरूरी सबूत कहां हैं जो पेश करने पड़ते हैं। पर, यह असली मुद्दा नहीं है। यह सही है कि जो इतिहास यहां पेश किया गया है उसमें स्रोतों की प्रामाणिकता पर ध्यान कम है, पर अगर यह इतिहास नहीं माना जाता है तो फिर यह क्या है? आखिर क्यों इतनी बड़ी संख्या में लोग इसे अपना इतिहास मानना चाहते हैं? इसे इतिहास मानने के कारणों का क्या इतिहास हो सकता है? इन आत्म इतिहासों को अगर इतिहास न भी माना जाय तो भी इनके सहारे ऐतिहासिक कल्पना का इतिहास तो लिखा ही जा सकता है। और फिर इस देश के बहुसंख्यक समुदायों को इतिहास के आईने में अपनी तस्वीर देखने का हक है या नहीं? अगर है तो उसके लिए कैसे प्रयास किया जाए?अगर इसे साहित्य माना जाये तो इस संदर्भ में कुछ बातें कही जा सकती हैं। यह एक प्रसिद्ध उक्ति है कि इतिहास में तथ्यों के अलावा सब झूठ होता है और साहित्य में तथ्यों के अलावा सब कुछ सच होता है। यानि इतिहास से तथ्य लिये जायें और साहित्य से तथ्येतर विवरण। यानि, इतिहास का सच न तो इतिहास के पास है और न ही साहित्य के पास। ÷सच' शायद वह मरीचिका है जिसकी ओर जितना बढ़ेंगे वह उतना ही दूर होता जायेगा। हाइडेगर से लेकर मिशेल फूको तक बहुत सारे दार्शनिकों ने इतिहास की पूरी धारणा पर जिस संरचनात्मक दबाब को दिखाया है उसमें यही बात प्रधान है कि काल विशेष में प्रभावी सोच पद्धति (मचपेजमउम) ही वह प्रभावी माध्यम है जो हमें विशेष तरह से सोचने के लिए बाध्य करता है। एक कालखंड में उस कालखंड की प्रभावी सोच पद्धति यह निर्धारित करती है कि हम क्या सोच सकते हैं और क्या नहीं। हम क्या सोच सकते हैं और क्या नहीं यह हमारे वर्तमान समय द्वारा ही तय होता है। हेडेन व्हाइट ने भी दिखलाया है कि एक लेखक अपने समय के ÷ट्रोप' (ज्तवचम) पर ही अवस्थित होता है।दूसरी ओर, अगर हमारे लिए दलित समाज का इतिहास लेखन जरूरी हो और ऐतिहासिक स्रोतों की अनुपलब्धता हमारे लिए बाधा बन रही हो तो हमें ÷अनाल्स स्कूल' से थोड़ी सीख लेनी चाहिए। जिसे ऐतिहासिक तथ्य मान कर प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाता है वे प्रमाण सामान्यतः प्रभुत्वशाली वर्ग की मिल्कियत हैं। वे ही लेख लिखवाते हैं, अपनी गाथाओं को सुरक्षित रखवाते हैं और उनकी ही कथाएं लिखित रूप में हमारी धरोहर बन कर सुरक्षित रहती हैं। लेकिन ऐसे पात्रों का इतिहास लिखना जो प्रभुत्वहीन समुदायों से आते हैं निश्चिय ही इतिहास में दूसरे रूप में आता है। स्रोतों के अभाव में इनका इतिहास उल्टी यात्रा करता है। इस प्रसंग में मार्क ब्लॉख, लूसियेन फेब्रे जैसे फ्रांसीसी इतिहासकारों द्वारा प्रयुक्त ÷रिग्रेसिव मेथड' का उल्लेख उचित होगा। यह सब जानते हैं कि मार्क ब्लाख और फेब्रे विश्व के महानतम इतिहासकारों में से हैं। उनकी धारणा थी कि संग्रहालयीय तथ्य निर्भर राजनैतिक इतिहास एक आंशिक इतिहास है। पूर्ण इतिहास (ॅीवसम भ्पेजवतल) के लिए हर तरह के स्रोतों और पद्धतियों की मदद लेनी चाहिए। हर सीमा का अतिक्रमण करके, हर प्रकार के स्रोतों की सहायता लेकर वे पूर्ण इतिहास की ओर बढ़ना चाहते थे। वे मानते थे कि फ्रांस में सामाजिक परिवर्तन को समझने के लिए कृषक समुदाय के जीवन में हुए परिवर्तनों का अध्ययन जरूरी है। पर समस्या यह थी कि किसान का इतिहास कैसे लिखा जाये। इस समस्या के निदान के लिए जिस पद्धति का अनुसरण उन्होंने किया उसे अनजाने भूतकाल से चल कर जाने हुए वर्तमान की ऐतिहासिक प्रगतिशील धारणा के विपरीत जाते हुए (वर्तमान) से अजाने (भूतकाल) की यात्रा शुरू की। इसी पद्धति से वैकल्पिक इतिहास की वैकल्पिक व्यवस्था सम्भव हो सकी।अगर इस सूत्र को आधार बनाया जाए तो कहा जा सकता है कि दलितों के इतिहास लेखन के लिए यह बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। ÷वंचितों का आत्म इतिहास' में संकलित इतिहासों को अगर हाल के दशकों में तेजी से शक्तिशाली हुए दलित वर्गों की वर्तमान ऐतिहासिक कल्पना के रूप में भी लिया जाय और यहां से जरूरी सवालों के साथ इतिहास में जाया जाए तो सार्थक पहल होगी। सम्भव है कि जो कल्पित मान लिये गये हैं वे सच के ज्यादा नजदीक हो और जिसे अकादमिक इतिहास मान कर ÷सच्ची दास्तान' मान लिया जाता रहा हो वह आंशिक इतिहास भर हो। हमें यह समझने कि जरूरत है कि इन आत्म इतिहासों को अकादमिक स्वीकृति की जितनी जरूरत है उससे ज्यादा अकादमिक इतिहास को इन आत्म इतिहासों की है। फिलहाल तो इन आत्म इतिहासों के प्रति, जहां तक सम्भव हो, स्वीकार का भाव रखा जाए तो ज्यादा भलाई दीखती है। इससे न सिर्फ इतिहास में प्रयुक्त होने वाले स्रोतों का आह्लादकारी विस्तार होगा बल्कि कुछ ऐसे इलाकों की तरफ जाना सम्भव हो सकेगा जिस ओर इतिहासकार जाने से परहेज करते रहे हैं। हमारे लिए मानसिकता के इतिहास का द्वार खुल सकता है, दलितों के सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन का मार्ग और प्रशस्त हो सकेगा। यह तय है कि दलित उभार के इस वर्तमान समय में दलित वर्ग बगैर इतिहास के तो रहेगा नहीं। दलित जब समाज के इतिहासकारों से इतिहास की मांग करेंगे तो क्या यह सम्भव है कि इतिहास वैसा ही बना रह सकेगा जैसा कि वह अभी है? इतिहास को बदलना होगा और इस दिशा में दलितों के आत्म इतिहास से शुरू करके ज्यादा प्रामाणिक अकादमिक इतिहास लेखन की ओर जाना अभीष्ट होगा।यह एक जरूरी पुस्तक है और इस कार्य को हिन्दी समाज के सामने लाने के लिए बद्री नारायण, विष्णु महापात्र, अनंत राम मिश्र, वनिता सोमवंशी, अमरद्वीप सिंह, मीनू झा, निवेदिता सिंह धन्यवाद के पात्र हैं।उपेक्षित समुदायों का आत्म इतिहास : संकलन एवं सम्पादन : बद्री नारायण, विष्णु महापात्र, अनंतराम मिश्र, प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, मूल्य : 495.00 रु.
[तद्भव-17 , जनवरी 2008 में प्रकाशित ]
[तद्भव-17 , जनवरी 2008 में प्रकाशित ]
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