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Thursday, 20 August 2009
जिन्ना के बारे में भ्रम
जिन्ना साहब एक खांटी एलिट थे. अपने पूरे राजनैतिक जीवन में एक बार किसी सभा में उनके शरीर पर ह्ल्का सा धक्का लगा था. इतिहासकार अमलेन्दु दे बताते हैं कि वे चर्चिल से किसी बिचौलिए के माध्यम से सम्पर्क में बने रहे. वे किस तरह के व्यक्ति थे इसके लिए एक बात का उल्लेख किया जा सकता है. उनके एक करीबी दोस्त थे जिसकी 17-18 साल की बेटी (जिन्ना की उम्र से तिहाई की) थी. जिन्ना ने दोस्ती की परवाह न करते हुए उससे विवाह किया क्योंकि यह प्रेम का मामला था. जब खुद उनकी बेटी ने अपना प्रेम विवाह करना चाहा तो कट्टर बाप की तरह उसे घर से निकाला और अंत तक उसका मुंह नहीं देखा. यह एक मिसाल है. इस तरह के तमाम उदाहरण वोलपर्ट की पुस्तक में मिल सकते हैं जो यह बतलाने के लिए पर्याप्त हैं कि जिन्ना गांधी जैसे व्यक्तियों की तुलना में अनुदार और अहंकारी किस्म के व्यक्ति थे.
भारतीय मुसलमान, जिन्ना और इकबाल
जिन्ना का जिन्न फिर से जाग गया है. किसी को भी बी जे पी को पीटने का मन करे तो उसे जिन्ना का गुणगान शुरू कर देना चाहिए. यह नहीं मानने का कोई कारण नहीं है कि जिन्ना ने भारत विभाजन का दु:स्वप्न सच किया. एक टी वी बहस में बंगाल के दो इतिहासकार सुरंजन दास और अमलेन्दु दे आज विचार कर रहे थे. दे का मत था कि जिन्ना के दिमाग में पाकिस्तान का जहर इकबाल ने 1936 में भरा! दास 1941 के पहले के दौर के दंगों का वर्गीय चरित्र समझा रहे थे और कह रहे थे कि किसी युग को किसी व्यक्ति के आधार पर नहीं समझा जाना चाहिए. अब यह पूछने का मन हो रहा है कि फिर नेहरू युग और गांधी युग का क्या होगा? इतिहास में कभी कभी कडवा सच भी मानना पडता है. यह मानना चाहिए कि मुसलमानों की ओर से जिन्ना का समर्थन इतना स्पष्ट हो गया था कि कांग्रेस के नेताओं - नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद और पटेल आदि को आभास हो गया कि अखंड भारत की स्वाधीनता संभव नहीं. इस विस्फोटक परिस्थिति के निर्माण में जिन्ना की भूमिका निर्णायक थी. 'डायरेक्ट एक्शन' के लिए दिए गये भाषण में जिन्ना क्या भारतीय इतिहास के एक विलेन की तरह नहीं बोले? क्या लाख कहने पर भी गांधी हत्या के बाद वे गांधी को महान हिन्दू नेता ही नहीं कहते रहे? किसी भी तरह वे हिन्दू की जगह व्यक्ति कहने को तैयार नहीं हुए.ऐसे व्यक्ति को आज जिस तरह जसवंत सिंह नेहरू और पटेल की तुलना में तरजीह दे रहे हैं तो क्या कहा जाए!
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जसवंत सिंह की किताब
यह सचमुच बहुत आश्चर्यजनक है कि जसवंत सिंह की बर्खास्तगी के प्रसंग में देश भर में जो बहस उभर कर सामने आयी उसमें जिन्ना, पटेल, नेहरू आदि को लेकर बातें ही ज्यादा हुईं, इतिहास लेखन के बारे में बहुत कम सोचा गया. पश्चिमी देशों की नकल पर नामी गिरामी लोग किताबें लिखने लगे हैं और इस प्रक्रिया में अपनी पात्रता के बारे में नहीं सोच रहे हैं. जसवंत सिंह कोई संस्मरण लिख सकते हैं, उपन्यास, कहानी या कविता लिख सकते हैं, लेकिन भारत विभाजन पर अगर कोई पुस्तक लिखेंगे तो उस पुस्तक को उसी रूप में पढा जाना चाहिए जिस तरह से यशवंत सिन्हा यदि बंग्लादेश मुक्ति युद्ध पर लिखते तो पढा जाता. अगर आप गौर से देखें तो आपको साफ दिखेगा कि इस पुस्तक को सामने लाते हुए जसवंत सिंह अपनी पार्टी का कोई खयाल नहीं रख रहे थे. उनकी पार्टी एक कठिन दौर से गुजर रही थी पर उन्होंने यह जरूरी समझा कि वामपंथी नामवर सिंह, जेठमलानी और उदारवादी चिंतक मेघनाद देसाई को मंच पर बुलाकर जिन्ना पर अपनी लिखी पुस्तक का लोकार्पण करायें. उनकी पार्टी अगर उन्हें निकालती है तो हमें उतना ही दुख होना चाहिए जितना सोमनाथ चटर्जी को सी पी एम से निकालने पर हुआ था. सोमनाथ चटर्जी का तो फिर भी कुछ 'केस' था, जसवंत सिंह तो यह काम टाल ही सकते थे. जो लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रश्न से इसको जोड कर देख रहे हैं वे यह नहीं समझ रहे कि जसवंत सिंह का इस तरह का किताब लिखना राजनैतिक रूप से अपनी पार्टी का तर्पण करना था. वे सबकुछ जानबूझ कर ही कर रहे होंगे. ऐसे में जिन्ना के बारे में फिर से विचार करना और विभाजन के बारे में अपनी अपनी राय जाहिर करना एक बोगस बात है. जो बात सिंह कह रहे हैं वह बहुत सालों से आयशा जलाल जैसे इतिहासकार कह रहे हैं. कोई नई बात नहीं है. आप बताएं कि अर्जुन सिंह अपनी उपेक्षा से खिन्न होकर स्वतंत्रता के बाद के भारत निर्माण पर एक किताब लिखें और उसमें नेहरू को छोटा बनाकर लोहिया का गुणगान करें तो कांग्रेस पार्टी क्या करेगी? जसवंत सिंह के बहाने बी जे पी को पीटने का काम राजनैतिक दल करें यह तो ठीक है लेकिन इतिहासकारों को इस फिजूल की बहस से बचना चाहिए.
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