मुस्लिम लीग और साम्प्रदायिक राजनीति पर डॉ गिरीश पाण्डेय की इतिहास पुस्तक का लोकार्पण भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ के एन दुबे ने भागलपुर के सुंदरवती महिला कॉलेज में किया. इस अवसर पर बडी संख्या में स्थानीय विद्वान एवं आमंत्रित वक्ता उपस्थित थे. यह एक अत्यंत जरूरी किताब है जिसमें साम्प्रदायिक राजनीति के उन पक्षों पर प्रामाणिक दस्तावेजों की मदद से गंभीरतापूर्वक विचार किया गया है. डॉ दीपक मलिक ने इसकी भूमिका में इस पुस्तक की गुणवत्ता पर विचार किया है.वे लिखते हैं- " इस पुस्तक में उपनिवेशिक दौर में राष्ट्रवाद, उपनिवेशी राज्य और साम्प्रदायिकता के जटिल अंतर्संपर्कों की गहन पडताल की है."
मित्र गण इस पुस्तक को पढकर हिंदी में ऐसी पुस्तक के प्रकाशन के लिए प्रसन्न होंगे.
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Saturday, 18 December 2010
Thursday, 20 August 2009
साम्प्रदायिकता, राष्ट्रवाद और साहित्य
बिहार में साम्प्रदायिकता, राष्ट्रवाद, साहित्य और जातिवाद
हिन्दी प्रदेश के इतिहासलेखन की एक बडी समस्या यह है कि इसे समाज के इतिहास को इसके अपने साहित्य और इस भाषा के स्रोतों की सहायता से कम और इतिहासलेखन के पाश्चात्य अकादमिक मानदंडों के आधार पर अधिक लिखा गया है. इस कारण से इस समाज के इतिहास के दो संस्करण हमें उपलब्ध होते हैं; एक ऐसा इतिहास जिसे हिन्दी प्रदेश के साहित्य और पत्रकारों ने राष्ट्रीय दृष्टि से सोचते हुए निर्मित किया और दूसरा जो इतिहास की अकादमिक समझ से निर्मित किया गया है. इन दोनों इतिहासों का लगभग स्वतंत्र सा अस्तित्व बना रहा है. एक विद्वान ने कहा है कि हिन्दी प्रदेश के दो इतिहास हैं- एक जो साहित्यिक दृष्टि से लिखा गया और दूसरा ऐतिहासिक दृष्टि से. दोनों को एक साथ रखकर कम विचार किया गया है. [1] इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्य इन दोनों दृष्टियों को पास लाकर एक ऐसे इतिहास को तीन विचारधाराओं- राष्ट्रीय, साम्प्रदायिक और जातिवादी के विकास और अंतर्संपर्कों पर विचार करना है.
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतने बडे हिन्दी प्रदेश में इतिहास लेखन के प्रति एक उदासीनता का भाव रहा है. एक बड़ा कारण यह है कि स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों में इतिहास के बारे में जो कुछ पढाया जाता है उसके साथ अध्ययनकर्ताओं का कोई लगाव होना मुश्किल है. जिस इतिहास बोध से भारतीय महान इतिहासकारों ने लिखा है वह मूलत: भारत को एक आधुनिक, पश्चिमी, अकादमिक दृष्टि से लिखा गया है और लगभग हर स्तर पर पश्चिमी ऐतिहासिक दृष्टि को वरियता प्रदान करती है. राष्ट्रवाद, सामुदायिकता, आधुनिक भाषा आदि का जिस रूप में विकास पश्चिमी देशों में पिछले तीन चार शताब्दियों में हुआ उसके आधार पर सामाजिक परिवर्तनों को समझने का जो माडल बना उसे ही आधार बनाकर भारतीय समाज को समझने की कोशिश होती रही है. ऐसा क्यों है और किस प्रकार औपनिवेशिक विचारधाराएं स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात भी सक्रिय और प्रभावी रही हैं इसकी विस्तृत चर्चा यहां संभव नहीं. यहां इस ओर सिर्फ संकेत भर किया जा सकता है कि भारत में प्रभावी तीनों तरह की दृष्टियां- राष्ट्रवादी, औपनिविशिक और मार्क्सवादी आधुनिक विचारधारा से प्रभावित हैं और इन तीनों दृष्टियों ने आधुनिकता को लाने वाली शक्तियों की तरफ से ही अपने अपने हिसाब से ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है. इन तीनों के लिए औपनिवेशिक भारत में आती हुई प्रगतिशील आधुनिकता और प्रतिक्रियावादी सामाजिक शक्तियों ( धार्मिक शक्तियां समाहित) के बीच के संघर्ष को ध्यान में रखा गया है.
इतिहास दृष्टि
सामान्य प्रवृत्तियां
भारतीय सामाजिक विकास में मुख्य बाधाएं
नये भारत के भविष्य के प्रति दृष्टिकोण्
औपनिवेशिक दृष्टि
भारतीय समाजों को विभाजित मानना, अंग्रेज़ी शासन को आधुनिक शक्तियों द्वारा चालित मानना, भारतीय मध्यवर्ग को पाश्चात्य शिक्षा से दीक्षित होने के बाद अपने स्वार्थ के लिए अंग्रेज विरोधी मानना आदि
जातिवाद, धार्मिक अंधविश्वास, भारतीय समाज की जडता, आधुनिक शिक्षा और विज्ञान के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण, विकसित देशों से सीखने के बजाय उनके खिलाफ षडयंत्रकारी दृष्टिकोण आदि
भारत एक स्वंप्रभु राष्ट्र बनने में अक्षम और भीतरी विभाजनकारी शक्तियों के आपसी संघर्षों के कारण इसका एक राष्ट्र राज्य के रूप में विकास कठिन.
मार्क्सवादी दृष्टि
औपनिवेशिक दृष्टि की सभी प्रमुख प्रवृत्तियों को मानते हुए औपनिवेशिक युग को आर्थिक रूप से शोषणकारी मानना और इसके खिलाफ श्रमिकों और किसानों के संगठन को महत्त्व देना, इस क्रम में कांग्रेस द्वारा चलाए जा रहे राष्ट्रीय आन्दोलन को अपर्याप्त मानना क्योंकि ये अंतत: बुर्जुआ स्वार्थों की ही वकालत करते थे.
औपनिवेशिक दृष्टि की सभी प्रवृत्तियों को मानते हुए औपनिवेशिक शासन को भी इसके लिए जिम्मेदार मानना. हिन्दू साम्प्रदायिकता के प्रति ये कठोर थे और उन्हें ये समाज में अलगाव पैदा करने वाले और औपनिवेशिक शासकों के सहयोगी के रूप में देखते थे.
बुर्ज़ुआ गणतंत्र के रूप में इसका विकास विरोधाभासों को लेकर चलने के कारण ज्यादा टिकाऊ नहीं और समाजवादी भविष्य के लिए मार्ग प्रशस्त करने के लिए किसानों और मजदूरों के संगठन के साथ ही प्रतिक्रियावादी सांप्रदायिक और जातिवादी शक्तियों के विरूद्ध लगातार संघर्ष ज़रूरी.
उदारवादी राष्ट्रवादी दृष्टि
औपनिवेशिक दृष्टि की सभी प्रमुख प्रवृत्तियों को मानते हुए औपनिवेशिक युग को आर्थिक रूप से शोषणकारी मानना और इसके खिलाफ पूरे राष्ट्र को संगठित होने को सकारात्मक मानना.
औपनिवेशिक दृष्टि की सभी प्रवृत्तियों को मानते हुए औपनिवेशिक शासन को भी इसके लिए जिम्मेदार मानना. मार्क्सवादी दृष्टि से अंतर यह है कि इस दृष्टि के केन्द्र में उभरता हुआ मध्यवर्ग है जो पाश्चात्य ज्ञान से दीक्षित होकर, नये सोच को आत्मसात करके उदार समाज के प्रति सचेष्ट थे. हिन्दू मुसलमान सम्पर्क के बारे में इस दृष्टि के अनुसार अलगाव हाल के वर्षों में आया है और दोनों धर्मों के मानने वालों के बीच कोई वैमनष्य नहीं है.
राष्ट्र-राज्य के रूप में उदारवादी नेतृत्व में देश में एक शक्तिशाली राष्ट्र राज्य का निर्माण ज़रूरी.
जाहिर है कि इन सभी दृष्टियों कुछ बुनियादी अंतर होने के बावजूद एक बड़ा साम्य यह दिखलाई पडता है कि ये सभी एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में भारत के उभरने को एक सही मानते हैं और देश के भीतर जातिवादी और साम्प्रदायिक शक्तियों को देश की प्रगति के मार्ग में एक बडी बाधा मानते हैं.
बिहार के महान नेता राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी पुस्तक में यह माना है कि 1906-07 तक साम्प्रदायिकतावाद कोई बुरा शब्द नहीं था और लोग अपने को हिन्दू या मुसलमान कहने में किसी प्रकार की असुविधा का अनुभव नहीं करते थे. उस समय तक गांधीवाद का ‘सुपर कम्युनल’ राष्ट्रवादी विचारधारा का विकास हिन्दुओं में नहीं हुआ था.[2] राष्ट्रवाद, साम्प्रदायिकता और जातिवाद के अंतर्संपर्क की ऐतिहासिक व्याख्याओं में बिहार अब तक उपेक्षित सा रहा है. अब तक के अध्ययनों में पूरा ध्यान बनारस, इलाहाबाद आदि से प्रकाशित सामग्रियों के आधार पर अधिकतर विद्वानों ने यह दिखलाने का प्रयास किया है कि साम्प्रदायिकता राष्ट्रवाद के साथ साथ एक विचारधारा के रूप में विकसित होती गयी. इसकी शुरूआत दो आन्दोलनों- हिन्दी आन्दोलन (या नागरी लिपि आन्दोलन) और गौरक्षा आन्दोलन के माध्यम से हुई.[3]
[1] वसुधा डालमिया
[2] राजेन्द्र प्रसाद, इंडिया डिवाइडॆड ( बम्बई: हिंद किताब, 1946), 17.
[3] ज्ञान पाण्डेय, वसुधा डालमिया, किंग, आलोक राय ...
हिन्दी प्रदेश के इतिहासलेखन की एक बडी समस्या यह है कि इसे समाज के इतिहास को इसके अपने साहित्य और इस भाषा के स्रोतों की सहायता से कम और इतिहासलेखन के पाश्चात्य अकादमिक मानदंडों के आधार पर अधिक लिखा गया है. इस कारण से इस समाज के इतिहास के दो संस्करण हमें उपलब्ध होते हैं; एक ऐसा इतिहास जिसे हिन्दी प्रदेश के साहित्य और पत्रकारों ने राष्ट्रीय दृष्टि से सोचते हुए निर्मित किया और दूसरा जो इतिहास की अकादमिक समझ से निर्मित किया गया है. इन दोनों इतिहासों का लगभग स्वतंत्र सा अस्तित्व बना रहा है. एक विद्वान ने कहा है कि हिन्दी प्रदेश के दो इतिहास हैं- एक जो साहित्यिक दृष्टि से लिखा गया और दूसरा ऐतिहासिक दृष्टि से. दोनों को एक साथ रखकर कम विचार किया गया है. [1] इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्य इन दोनों दृष्टियों को पास लाकर एक ऐसे इतिहास को तीन विचारधाराओं- राष्ट्रीय, साम्प्रदायिक और जातिवादी के विकास और अंतर्संपर्कों पर विचार करना है.
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतने बडे हिन्दी प्रदेश में इतिहास लेखन के प्रति एक उदासीनता का भाव रहा है. एक बड़ा कारण यह है कि स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों में इतिहास के बारे में जो कुछ पढाया जाता है उसके साथ अध्ययनकर्ताओं का कोई लगाव होना मुश्किल है. जिस इतिहास बोध से भारतीय महान इतिहासकारों ने लिखा है वह मूलत: भारत को एक आधुनिक, पश्चिमी, अकादमिक दृष्टि से लिखा गया है और लगभग हर स्तर पर पश्चिमी ऐतिहासिक दृष्टि को वरियता प्रदान करती है. राष्ट्रवाद, सामुदायिकता, आधुनिक भाषा आदि का जिस रूप में विकास पश्चिमी देशों में पिछले तीन चार शताब्दियों में हुआ उसके आधार पर सामाजिक परिवर्तनों को समझने का जो माडल बना उसे ही आधार बनाकर भारतीय समाज को समझने की कोशिश होती रही है. ऐसा क्यों है और किस प्रकार औपनिवेशिक विचारधाराएं स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात भी सक्रिय और प्रभावी रही हैं इसकी विस्तृत चर्चा यहां संभव नहीं. यहां इस ओर सिर्फ संकेत भर किया जा सकता है कि भारत में प्रभावी तीनों तरह की दृष्टियां- राष्ट्रवादी, औपनिविशिक और मार्क्सवादी आधुनिक विचारधारा से प्रभावित हैं और इन तीनों दृष्टियों ने आधुनिकता को लाने वाली शक्तियों की तरफ से ही अपने अपने हिसाब से ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है. इन तीनों के लिए औपनिवेशिक भारत में आती हुई प्रगतिशील आधुनिकता और प्रतिक्रियावादी सामाजिक शक्तियों ( धार्मिक शक्तियां समाहित) के बीच के संघर्ष को ध्यान में रखा गया है.
इतिहास दृष्टि
सामान्य प्रवृत्तियां
भारतीय सामाजिक विकास में मुख्य बाधाएं
नये भारत के भविष्य के प्रति दृष्टिकोण्
औपनिवेशिक दृष्टि
भारतीय समाजों को विभाजित मानना, अंग्रेज़ी शासन को आधुनिक शक्तियों द्वारा चालित मानना, भारतीय मध्यवर्ग को पाश्चात्य शिक्षा से दीक्षित होने के बाद अपने स्वार्थ के लिए अंग्रेज विरोधी मानना आदि
जातिवाद, धार्मिक अंधविश्वास, भारतीय समाज की जडता, आधुनिक शिक्षा और विज्ञान के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण, विकसित देशों से सीखने के बजाय उनके खिलाफ षडयंत्रकारी दृष्टिकोण आदि
भारत एक स्वंप्रभु राष्ट्र बनने में अक्षम और भीतरी विभाजनकारी शक्तियों के आपसी संघर्षों के कारण इसका एक राष्ट्र राज्य के रूप में विकास कठिन.
मार्क्सवादी दृष्टि
औपनिवेशिक दृष्टि की सभी प्रमुख प्रवृत्तियों को मानते हुए औपनिवेशिक युग को आर्थिक रूप से शोषणकारी मानना और इसके खिलाफ श्रमिकों और किसानों के संगठन को महत्त्व देना, इस क्रम में कांग्रेस द्वारा चलाए जा रहे राष्ट्रीय आन्दोलन को अपर्याप्त मानना क्योंकि ये अंतत: बुर्जुआ स्वार्थों की ही वकालत करते थे.
औपनिवेशिक दृष्टि की सभी प्रवृत्तियों को मानते हुए औपनिवेशिक शासन को भी इसके लिए जिम्मेदार मानना. हिन्दू साम्प्रदायिकता के प्रति ये कठोर थे और उन्हें ये समाज में अलगाव पैदा करने वाले और औपनिवेशिक शासकों के सहयोगी के रूप में देखते थे.
बुर्ज़ुआ गणतंत्र के रूप में इसका विकास विरोधाभासों को लेकर चलने के कारण ज्यादा टिकाऊ नहीं और समाजवादी भविष्य के लिए मार्ग प्रशस्त करने के लिए किसानों और मजदूरों के संगठन के साथ ही प्रतिक्रियावादी सांप्रदायिक और जातिवादी शक्तियों के विरूद्ध लगातार संघर्ष ज़रूरी.
उदारवादी राष्ट्रवादी दृष्टि
औपनिवेशिक दृष्टि की सभी प्रमुख प्रवृत्तियों को मानते हुए औपनिवेशिक युग को आर्थिक रूप से शोषणकारी मानना और इसके खिलाफ पूरे राष्ट्र को संगठित होने को सकारात्मक मानना.
औपनिवेशिक दृष्टि की सभी प्रवृत्तियों को मानते हुए औपनिवेशिक शासन को भी इसके लिए जिम्मेदार मानना. मार्क्सवादी दृष्टि से अंतर यह है कि इस दृष्टि के केन्द्र में उभरता हुआ मध्यवर्ग है जो पाश्चात्य ज्ञान से दीक्षित होकर, नये सोच को आत्मसात करके उदार समाज के प्रति सचेष्ट थे. हिन्दू मुसलमान सम्पर्क के बारे में इस दृष्टि के अनुसार अलगाव हाल के वर्षों में आया है और दोनों धर्मों के मानने वालों के बीच कोई वैमनष्य नहीं है.
राष्ट्र-राज्य के रूप में उदारवादी नेतृत्व में देश में एक शक्तिशाली राष्ट्र राज्य का निर्माण ज़रूरी.
जाहिर है कि इन सभी दृष्टियों कुछ बुनियादी अंतर होने के बावजूद एक बड़ा साम्य यह दिखलाई पडता है कि ये सभी एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में भारत के उभरने को एक सही मानते हैं और देश के भीतर जातिवादी और साम्प्रदायिक शक्तियों को देश की प्रगति के मार्ग में एक बडी बाधा मानते हैं.
बिहार के महान नेता राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी पुस्तक में यह माना है कि 1906-07 तक साम्प्रदायिकतावाद कोई बुरा शब्द नहीं था और लोग अपने को हिन्दू या मुसलमान कहने में किसी प्रकार की असुविधा का अनुभव नहीं करते थे. उस समय तक गांधीवाद का ‘सुपर कम्युनल’ राष्ट्रवादी विचारधारा का विकास हिन्दुओं में नहीं हुआ था.[2] राष्ट्रवाद, साम्प्रदायिकता और जातिवाद के अंतर्संपर्क की ऐतिहासिक व्याख्याओं में बिहार अब तक उपेक्षित सा रहा है. अब तक के अध्ययनों में पूरा ध्यान बनारस, इलाहाबाद आदि से प्रकाशित सामग्रियों के आधार पर अधिकतर विद्वानों ने यह दिखलाने का प्रयास किया है कि साम्प्रदायिकता राष्ट्रवाद के साथ साथ एक विचारधारा के रूप में विकसित होती गयी. इसकी शुरूआत दो आन्दोलनों- हिन्दी आन्दोलन (या नागरी लिपि आन्दोलन) और गौरक्षा आन्दोलन के माध्यम से हुई.[3]
[1] वसुधा डालमिया
[2] राजेन्द्र प्रसाद, इंडिया डिवाइडॆड ( बम्बई: हिंद किताब, 1946), 17.
[3] ज्ञान पाण्डेय, वसुधा डालमिया, किंग, आलोक राय ...
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जसवंत सिंह की किताब
यह सचमुच बहुत आश्चर्यजनक है कि जसवंत सिंह की बर्खास्तगी के प्रसंग में देश भर में जो बहस उभर कर सामने आयी उसमें जिन्ना, पटेल, नेहरू आदि को लेकर बातें ही ज्यादा हुईं, इतिहास लेखन के बारे में बहुत कम सोचा गया. पश्चिमी देशों की नकल पर नामी गिरामी लोग किताबें लिखने लगे हैं और इस प्रक्रिया में अपनी पात्रता के बारे में नहीं सोच रहे हैं. जसवंत सिंह कोई संस्मरण लिख सकते हैं, उपन्यास, कहानी या कविता लिख सकते हैं, लेकिन भारत विभाजन पर अगर कोई पुस्तक लिखेंगे तो उस पुस्तक को उसी रूप में पढा जाना चाहिए जिस तरह से यशवंत सिन्हा यदि बंग्लादेश मुक्ति युद्ध पर लिखते तो पढा जाता. अगर आप गौर से देखें तो आपको साफ दिखेगा कि इस पुस्तक को सामने लाते हुए जसवंत सिंह अपनी पार्टी का कोई खयाल नहीं रख रहे थे. उनकी पार्टी एक कठिन दौर से गुजर रही थी पर उन्होंने यह जरूरी समझा कि वामपंथी नामवर सिंह, जेठमलानी और उदारवादी चिंतक मेघनाद देसाई को मंच पर बुलाकर जिन्ना पर अपनी लिखी पुस्तक का लोकार्पण करायें. उनकी पार्टी अगर उन्हें निकालती है तो हमें उतना ही दुख होना चाहिए जितना सोमनाथ चटर्जी को सी पी एम से निकालने पर हुआ था. सोमनाथ चटर्जी का तो फिर भी कुछ 'केस' था, जसवंत सिंह तो यह काम टाल ही सकते थे. जो लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रश्न से इसको जोड कर देख रहे हैं वे यह नहीं समझ रहे कि जसवंत सिंह का इस तरह का किताब लिखना राजनैतिक रूप से अपनी पार्टी का तर्पण करना था. वे सबकुछ जानबूझ कर ही कर रहे होंगे. ऐसे में जिन्ना के बारे में फिर से विचार करना और विभाजन के बारे में अपनी अपनी राय जाहिर करना एक बोगस बात है. जो बात सिंह कह रहे हैं वह बहुत सालों से आयशा जलाल जैसे इतिहासकार कह रहे हैं. कोई नई बात नहीं है. आप बताएं कि अर्जुन सिंह अपनी उपेक्षा से खिन्न होकर स्वतंत्रता के बाद के भारत निर्माण पर एक किताब लिखें और उसमें नेहरू को छोटा बनाकर लोहिया का गुणगान करें तो कांग्रेस पार्टी क्या करेगी? जसवंत सिंह के बहाने बी जे पी को पीटने का काम राजनैतिक दल करें यह तो ठीक है लेकिन इतिहासकारों को इस फिजूल की बहस से बचना चाहिए.
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