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Friday, 4 September 2009

राजेन्द्र यादव -जगदीश्वर विवाद

जगदीश्वर चतुर्वेदी का अपराध यह है कि वे हिन्दी जगत में कुछ ऐसे प्रश्न उठाने की कोशिश कर रहे हैं जिसके लिए हिन्दी जगत तैयार नहीं दिखलाई पडता. हर मामला अगर व्यक्तिगत बनाकर छोड दिया जायेगा तो बहस का जो स्वरूप होगा वही हो जाता है. जगदीश्वर इस चिट्ठे में जो बुनियादी सवाल उठा रहे हैं वह है पाठ और उसके अर्थ का. यहां किस प्रोफेसर ने किसका शोषण किया इस बात को लाने का प्रयोजन ?


राजेन्द्र यादव समेत बहुत सारे बुजुर्ग लेखक नामवर सिंह की लोकप्रियता और उनके विवादों के केन्द्र में रखने की क्षमता के सामने अक्षम हो जाते हैं. ऐसे में वे जाति के नाम पर बहुत ही शानदार हथियार लेकर सूरमा बन बैठे हैं. वे इतिहास मूर्ख हैं यह कहना ठीक नहीं लेकिन जिस आधार पर वे ब्राह्मणों के विशेष गुण – अमूर्त को व्यक्त /साधने की क्षमता आदि- के कायल हो जाते हैं. इस बहाने वे तमाम गैर ब्राह्मण कवियों को हथियार दे देते हैं. अब कोई बडा कवि नहीं बनता है तो सीधा सा कारण है कि वह ब्राह्मण नहीं है और बैठे बैठे निठल्ला चिंतन करने वाली श्रेणी से नहीं आता.

महाराज, कम से कम यह तो सोचा होता कि दूसरे देशों के जो कवि हैं उनपर यह लाजिक क्यों नहीं लगता? क्या भारत की मिट्टी में ऐसा कुछ है कि यह लाजिक सिर्फ यहीं चलता है?

सोशियालाजी में एक फंक्शनलिस्ट स्कूल हुआ करता है जो यह मानता है कि कोई चीज अगर किसी समाज में है तो उसके कारण हैं (वाजिब कारण ). इस दृष्टि के प्रभाव को समझने के लिए यह देखिए कि खुद जगदीश्वर ने यह लिख दिया है कि वेद ब्राह्मणों ने लिखा है! जब वेद लिखे गये थे ब्राहमण कहां थे? वेद व्यास, आदि क्या दुबे चौबे के पूर्वज थे? क्या ऋग वेद कालीन समाज में ब्राहमण जन्म के आधार पर होते थे? कम से कम हमलोग यह नहीं मान सकते कि भारत के समस्त प्राचीन ग्रंथों के रचयिता ब्राहमण लोग थे. कृपया उन्नसवीं सदी में प्राचीन भारत की खोज पर फिर से विचार करिए. (बर्नार्‍ड कोन से लेकर उपिंदर सिंह की पुस्तकें इस मामले में सहायक हो सकती हैं). ब्राहमण जाति के भीतर जो समय के हिसाब से परिवर्तन हुए हैं दुर्भाग्य से इस पर बहुत सोचा नहीं जाता. बिहार के सबसे बडे जमींदार ब्राहमण थे इस बात को भी याद रखिए और बी पी मण्डल (यादव) बहुत बडे जमींदार परिवार के थे. हजारों ऐसे उदाहरण दिए जा सकते हैं जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि जाति परिवर्तन शील है. जाति का क्रिस्टिलाइजेशन औपनिवेशिक कालीन परिघटना है. पर इस ओर जाने से बहुत पढना लिखना पडेगा. कौन जाये. क्यों न सीधे सीधे पहचान को जाति से जोडो और लाठी लेकर कूद पडो. डेमोक्रेसी है, संख्या बल हमारे साथ है जीत हमारी होगी. एडवर्ड सईद का हवाला कई बार दिया जाता है लेकिन आपको याद हो कि खुद सईद ने भारत आने पर अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि ‘आइडेंटिटी बोर्स मी’. इतना तंग आ गये थे उनकी बात को पक़ड कर पहचान के प्रश्न के स्थूलीकरण से !

निवेदन है कि इस बात को देखें कि मूल प्रश्न यह है कि रचना का अर्थ रचना में है या पाठेतर संदर्भों में?

मैं जगदीश्वर चतुर्वेदी से इस बात में सहमत नहीं हूं कि पाठ का अर्थ प्राप्त करने के लिए पाठ से बाहर जाना अनिवार्य है. पाठ के अध्ययन की कई प्रविधियां हैं और आप पाठ को खोलकर उसके अर्थों की एक श्रृंखला पा सकते हैं. मुझे इस सन्दर्भ में एक निवेदन अन्य विद्वान मित्रों से करना है कि सवालों को देखें सवाल करने वाले कभी कभी सही सवाल को थोडे अटपटे ढंग से भी रखें तो भी सवाल को ही महत्त्वपूर्ण मानें, सवाल करने वाले को नहीं. जगदीश्वर एक साथ उन महानों की महानता के सामने प्रश्न खडे कर रहे हैं जो सामने मंच पर भिडते दिखाई पडते हैं लेकिन आपस में उनके बीच एक गहरा रिश्ता है. क्या कारण है कि हिन्दी में अभी भी ये सत्तर अस्सी पार के लोग एजेंडा सेट कर रहे हैं और वो भी बगैर ज्यादा मशक्कत के?