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Sunday, 26 October 2014

कार्पोरेट भारत में भाषा का प्रश्न

 कार्पोरेट भारत में भाषा का प्रश्न

हिन्दी भारत के भास/उहे एक राष्ट्र के आसा हम ओकरो भंडार बडाइब/ओहू में बोलब ओ गाइब तबो न छोडब आपन बोली/चाहे केहु मारे गोली।’ मनोरंजनप्रसाद सिंह की इन पंक्तियों के पीछे की दृष्टि से आज भारत बहुत आगे आ गया लगता है। राष्ट्र निर्माण के जिस स्वप्न के साथ हिन्दी का प्रचार प्रसार हुआ था उसमें हिन्दी को देश की सम्पर्क भाषा के रूप में देखना एक सहज स्वाभाविक राष्ट्रीय संकल्प था। वह सपना क्यों टूटा यह यहाँ विचारणीय नहीं है लेकिन इस बात को याद रखे बिना कि हिन्दी हमारे राष्ट्रीय स्वप्न के साथ जुड़ा हुआ है, भारतीय भाषाओं के स्वतन्त्र भारत में अधिकार पर बात करना सम्भव नहीं है। आखिर क्यों एक कवि जो अपनी बोली के लिए गोली खाने के लिए तैयार है वह नि:संकोच हिन्दी को भारत (देश) की भाषा मानता है? ऐसे सैकड़ों–हजारों विद्वान लोग थे जो अपनी-अपनी भाषा पर पूरा अभिमान रखते हुए हिन्दी को देश की भाषा के रूप में सहज रूप से स्वीकार कर रहे थे। जब से राष्ट्र निर्माण का संकल्प इस देश में आया उसी समय से हिन्दी को ही यह स्थान दिया गया। इसकी शुरूआत बंगाल में हुई बनारस या पटना में नहीं हुई यह ध्यान दिलाना भी अनुचित नहीं होगा। गाँधी युग में अच्छी तरह से स्वीकार कर लिया गया। देश के स्वाधीन होने के बाद जिस तरह अँग्रेजी को हटाकर हिन्दी को प्रतिष्ठित करने के सिद्धान्त को नेहरूवियन आधुनिक उदार सोच ने स्थगित किया उसपर बहुत चर्चा की जा चुकी है। यह गलत था या सही इसपर कोई मन्तव्य दिए बिना यह कहना सही होगा कि इस समय लिये गये निर्णयों से आखिरकार अँग्रेजी इस देश में शक्तिशाली होती गयी और अब यह उस समय से ज्यादा स्वीकृत है जिस समय अँग्रेजों की हुकूमत थी। मीनाक्षी मुखर्जी समेत कई विद्वानों ने इस अँग्रेजी की भारत में बढ़ती शक्ति को लेकर आश्चर्य व्यक्त किया है। इस विषय पर इस छोटे आलेख में पिछले डेढ़ सौ सालों में भाषा के प्रश्न पर हुए परिवर्तनों पर एक टिप्पणी की गयी है और अन्त में वर्तमान समय में उभर रहे विकल्पों पर एक मन्तव्य दिया गया है।
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यह अब एक ‘क्लिशे’ हो गया है कि अगर चीन, जापान, फ्रांस, रूस और जर्मनी जैसे देशों का पूरा काम (तकनीकी जरूरत समेत) अपनी-अपनी भाषाओं में हो जाता है तो आखिरकार भारत का काम क्यों नहीं चल सकता। इस बात के समर्थन और विरोध में दशकों से कहा सुना जाता रहा है लेकिन कोई हल नहीं निकल सका। स्थिति यह हो गयी कि रवीन्द्रनाथ टैगोर की भाषा बंग्ला भी अँग्रेजी दबाव में लगातार आती गयी, हिन्दी की तो बात छोड़ ही दें। ऐसे स्थिति आ गयी कि तकनीकी और समाज विज्ञान के क्षेत्र में ही नहीं साहित्य और धर्म के क्षेत्र में भी अँग्रेजी आने लगी। राजनीति, धर्म और पत्रकारिता सभी क्षेत्रों में अँग्रेजी का वर्चस्व बढ़ने लगा। अब इस स्थिति में कुछ गुणात्मक किस्म के परिवर्तन हुए हैं जिससे समीकरण बदले हैं। इस नयी परिस्थिति में भारतीय भाषाओं के सामने एक नये विकल्प का संसार खुलता दीख रहा है इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए। यह याद रखा जाना चाहिए कि बंकिम–रवीन्द्रनाथ या भारतेन्दु–प्रेमचन्द की औपनिवेशिक ‘राष्ट्रीय दुनिया’ अब नहीं है। उस समय के आदर्श अब जितने भी मोहक लगते हों वे हमारे लिए पर्याप्त नहीं हैं। अँग्रेजी का जो विरोध था वह अँग्रेजी हुकूमत के साथ जुड़ा हुआ था। एक राष्ट्र को कैसा होना चाहिए इसके बारे में सोचते हुए इंटेलिजेंसिया (इसे सुविधा के लिए हिन्दी में स्वीकार कर लिया जा सकता है) ने एक राष्ट्रीय स्वप्न का ताना-बाना बुना जिसमें एक स्वाधीन राष्ट्र के लिए अपनी भाषा का महत्त्व बना। उसकी खोज शुरू हुई और इस दौरान ही अँग्रेजी के स्थान पर एक स्तर पर हिन्दी और अन्य स्तरों पर हिन्दी समेत सभी भारतीय भाषाओं को रखकर सोचने का विकल्प उभरा। हिन्दी को सम्पर्क भाषा के रूप में देखने का जो आधार बना उसमें राष्ट्र के बनने के पूर्व के समय के सामूहिकता के आधारों–धर्म, धार्मिक पुस्तकें, धार्मिक स्थल आदि का महत्त्व है। जो हिन्दू मानस के थे उनके लिए संस्कृत सबसे ऊपर थी, पर विभिन्न कारणों से हिन्दी उनके लिए सबसे मान्य देश की सम्पर्क भाषा बन कर उभरी। हिन्दी के राष्ट्रीय विकल्प बन जाने का कारण हिन्दी के लोग नहीं थे यह याद रखें। हिन्दी किसी भी तरह से कई अन्य भारतीय भाषाओं से बेहतर स्थिति में नहीं थी। हिन्दी को सबसे बड़ी भाषा इसलिए माना गया क्योंकि यह हमारे राष्ट्रीय स्वप्न का हिस्सा थी।
जिसे हम गाँधी युग कहते हैं उसमें इस स्वप्न को जब रूप दिया गया भाषा का प्रश्न उलझने लगा। इस प्रश्न को दो स्तरों पर सुलझाने की कोशिश हुई - जनता के साथ संवाद में यह मान्य हुई। इससे हिन्दी को महत्त्व मिला इसमें सन्देह नहीं। भारत के सभी हिस्सों में हिन्दी ही जनता और उनके राष्ट्रीय नेताओं के बीच की भाषा बनी। लेकिन, नेताओं, बडे लोगों ने अपने घर और आपस के संवाद के लिए, ज्ञानार्जन के लिए अँग्रेजी को ही मान्य बनाया। लगभग सभी बड़े नेता, पूँजीपति और विद्वान आदि अँग्रेजी के साथ ही रहे। इस सन्दर्भ में गाँधी ने कुछ दबाव बनाया और हिन्दी प्रदेश के नेताओं के साथ हिन्दी में संवाद करना शुरू किया। यह दिलचस्प है कि गोविन्द बल्लभ पन्त जैसे हिन्दी प्रदेश के नेता ने गाँधी से अँग्रेजी में पत्राचार करना चाहा और दूसरी ओर से दबाव बनने पर अनिच्छा से हिन्दी में पत्र लिखना शुरू किया। काँग्रेस के बडे़ नेताओं में सिपर्फ राजेन्द्र प्रसाद थे जिन्होंने हिन्दी को सहज रूप से स्वीकार किया। उन्होंने अपनी आत्मकथा हिन्दी में लिखी, अन्य बडे़ नेताओं ने अँग्रेजी में। इस देश में एलिट अपने लिए नेताओं का चुनाव बड़ी सावधानी से करते हैं। उस दौर से लेकर 1990 के दशक तक एलिट किसी देशी नेता को अपना समर्थन देने से येन–केन प्रकारेण बचना चाहता है। गाँधी के मामले में वह मजबूर था इसलिए उसे ‘थोड़ा सनकी’ मानते हुए भी समर्थन देने के लिए तैयार हुआ क्योंकि वह ‘अच्छे आदमी’ थे। (ये इतिहासकार बरूण दे के शब्द हैं) यह खासा दिलचस्प है कि वामपन्थ के लगभग सभी बडे़ नेता, काँग्रेस के अधिकांश बडे़ नेता आदि अँग्रेजी से अपनी भाषाओं की तुलना में अधिक निकट थे। यानी, जनता के लिए भारतीय भाषा और एलिट के लिए अँग्रेजी (अपनी भाषा के साथ) यही आदर्श विकल्प था। बिहार के एक विद्वान हैं – शैबाल मित्र। उन्होंने एक दिलचस्प लेख लिखा है जिसमें उन्होंने कहा है कि बिहार में पारम्परिक इंटेलिजेंसिया के लिए भाषा अँग्रेजी थी। (यहाँ पारम्परिक का उपयोग समाजशास्त्रीय केटेगरी के रूप में है।) जो इस देश की भाषा के साथ थे उसे वे कॉकटेली इंटेलिजेंसिया कहते हैं। इस बात से भड़कने की जरूरत नहीं है। बिहार जैसे राज्य में सभी बडे़ विद्वान हिन्दी जानते हुए अँग्रेजी में ही काम करते रहे यह एक सच है। अब आप राहुल सांकृत्यायन का नाम न लें, वे एक अपवाद हैं। राहुल भाषा के मामले में बहुत ही लोकतान्त्रिक थे। वे 1926 में भी जनता के साथ उसकी अपनी बोली में राजनैतिक संवाद करना चाहते थे। राजेन्द्र प्रसाद आदि हिन्दी में भाषण देते थे। उन्हीं सभाओं में राहुल (तब रामोदर दास) छपरा की बोली में भाषण देते थे और जनता में वही ज्यादा लोकप्रिय होता था। बंगाल में यह प्रवृत्ति थोड़ी कम थी लेकिन वहाँ भी प्राथमिकता अँग्रेजी को ही दी जाती रही। इस देश के इंटेलिजेंसिया का जब कोई सम्यक विश्लेषण होगा यह साफ हो जाएगा कि यह अँग्रेजी की तरफ झुकी हुई रही है। चाहे उर्दू की ‘उँची दुनिया’ हो या पिफर बांग्ला का सांस्कृतिक संसार हो सब तरफ अँग्रेजी को ही बढ़त मिली हुई थी। प्रमाण के लिए समर सेन और तपन रायचैधरी की आत्मकथाएँ पढ लें। लेकिन उस समय राष्ट्रीय दबाव इतना अधिक था कि यह सबकुछ उभर कर नहीं आया। अकादमिक जगत का कोई भी आदमी इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि साहित्य के सीमित संसार ने भाषिक और अकादमिक का एक ‘नीचा नगर’ बनाया जिसके अलावा सब जगह अँग्रेजी को बढ़त मिली हुई थी। पर, सरकारी नीति निर्माण में सिद्धान्तत: अँग्रेजी को धीरे-धीरे हटना था सरकारी नीति के कारण भारतीय भाषाओं को कम से कम अँग्रेजी के समतुल्य स्थान देने की बाध्यता थी। इसी कारण हिन्दी को आगे आने का एक मौका बना। नेहरू के नेतृत्व में एक उदार उत्तर–औपनिवेशिक राष्ट्रीय दौर शुरू हुआ जिसमें अँग्रेजी को बने रहने का मौका मिला। इस देश में अँग्रेजी अगर इस शक्तिशाली रूप में बनी हुई है तो उसके लिए मैकॉले को श्रेय दिया जाता है लेकिन उसके साथ नेहरू का नाम भी लिया जाना चाहिए। हालाँकि यह भी एक सच है कि मैकॉले और नेहरू ने किसी बदनीयती से ऐसा नहीं किया था। वे जिस वैचारिक संसार से आते थे वहाँ से अँग्रेजी को इसी रूप में देखा जा सकता था।
उदार उत्तर–औपनिवेशिक दौर जब तक चला (कह सकते हैं अस्सी के दशक तक यह चला) इस देश के एलिट सुविधाजनक स्थिति में रहे। हर स्तर पर अँग्रेजी के साथ चलने के फायदे बने रहे। एकबारगी तो ऐसा लगा कि पूँजीपति वर्ग पूरी तरह से उदार एलिट के तर्कों से ही चलने के लिए तैयार हो गया है। यही वह दौर था जब सलमान रूश्दी जैसे लेखक ने मैकॉले जैसा भयानक वक्तव्य दिया जिसमें भारतीय साहित्य को लगभग अँग्रेजी साहित्य में घटा देने की भयावह कोशिश की गयी थी। वह उदारवाद का स्वर्णिम काल था जब लगा कि बाजार भी उनके साथ है। जितने नये शिक्षण संस्थान बने सबमें यही पाठ दोहराया गया कि अँग्रेजी के सिवा कोई विकल्प नहीं। ऐसी बातें कॉमन सेंस का हिस्सा बनने लगीं जिसमें यह निहित था कि जाने अंजाने अँग्रेजों ने भारत को अँग्रेजी में काबिलियत देकर भारत को चीन समेत अन्य देशों की तुलना में बढ़त दे दी है। यानी, अँग्रेजी हमारी ताकत है। यही वह दौर था जब हिन्दी के बड़े कवि (जिन्हें साहित्य जगत का सबसे बडा सम्मान मिल चुका है) ने उदारता से कहा कि वे अँग्रेजी को एक भारतीय भाषा मानते हैं।
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बाजार और पूँजीवाद की अनिश्चितता ही उसकी शक्ति है। उदार पूँजीवाद के भीतर से नये तर्क उभरे और एक नये समीकरण ने जन्म ले लिया। उदार उत्तर–औपनिवेशिक दौर के महानायक वे लोग थे जो एक ऐसे एलिट को शक्तिशाली बना रहे थे जिनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने मुनाफे को देश के साथ साझा करने में पीछे नहीं हटेंगे। संजय बारू ने मनमोहन सिंह के सम्बन्ध में जो किताब लिखी है उसमें भी यही तर्क उभरता है। उत्तर–औपनिवेशिक कॉरपोरेट युग, जिसकी शुरूआत इस देश में हो चुकी है, ने एक नया समय शुरू किया है जिसमें देशी भाषाओं को बाजार की ओर से अधिक शक्तिशाली बनाया जाना शुरू हुआ। यह एक पेचीदा बात है जिसको वे नहीं समझ सकते जो अभी भी पिछले दोनों दौर के तर्कों के सहारे ही हल ढूँढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।
यह नया समय शक्तिशाली बनने के नये स्वप्न के साथ लगातार आक्रामक होता जा रहा है। संयोग से यह समय इस देश में राजनैतिक रूप से उस विचारधारा के लोगों के नियन्त्रण में है जिसके स्वप्न की भाषा राष्ट्रीय है और वे शक्ति के देशी भावों के साथ चलना चाहते हैं। इस युग में आर्थिक और सांस्कृतिक जगतों को अलगाया जा रहा है। आर्थिक रूप से उन्नत होना जिनका ध्येय है उनको इस समय के राजनैतिक स्वरों से कम असुविधा हो रही है। उन्हें लग रहा है कि यह वह राजनैतिक नेतृत्व है जो उनके आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनने को काम्य मानता है। वह अगर सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्रों में अनुदार भी रहे तो भी उसे विशेष परेशानी नहीं होती है। चीन के मॉडल की सफलता के बाद इस मॉडल का जोर बढ़ा है। इसमें राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्वतन्त्रता का हनन बहुत चुभने वाला नहीं रह जाता, बशर्ते आर्थिक विकास सुनिश्चित हो। लेकिन इस प्रोजेक्ट को सफल बनाने में लगे राजनैतिक नेतृत्व के लिए यह पूरा मामला ‘राष्ट्रीय’ है, ‘सांस्कृतिक’ है। वह देश को साफ–सुथरा, विकास से युक्त, सुखी और शक्तिशाली बनाना चाहता है।
वर्तमान भारत पर सोचते हुए एक इतिहास के विद्यार्थी को दो प्रसंगों को याद करने की छूट मिलनी चाहिए। प्रथम, फ्रांस की राज्य–क्रान्ति का प्रसंग और द्वितीय, बिस्मार्क का युग। फ्रांस की क्रान्ति इसलिए शुरू हुई क्योंकि राजा के पास आर्थिक विकल्प नहीं बचे थे और वह उस व्यवस्था द्वारा पोषित शक्तिशाली वर्गों से अधिक योगदान की अपेक्षा करता था जिसके लिए शक्तिशाली समूह तैयार नहीं थे। उससे आर्थिक संकट गहराया और क्रान्ति शुरू हुई, कई वर्षों तक चली और अन्तत: विप्लवी समाज फ्रांस ने एक निरंकुश अधिनायक को सत्ता सौंप दी जो मुकुट को अपनी तलवार की नोक से उठाकर अपने सिर पर रखना सही मानता था और जो ‘असम्भव को मूर्खों की डिक्शनरी का शब्द मानता था’। बिस्मार्क ने जर्मनी को आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनाया और कहा जाना चाहिए कि औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप इंग्लैंड ने जो कुछ सौ सालों में हासिल करके अपनी बढ़त बनायी थी उसको खारिज करते हुए बीस तीस सालों में जर्मनी ने इंग्लैंड के बराबर अपनी औद्योगिक क्षमता को बढ़ा दिया। उस बिस्मार्क ने इंजीनियरों को विद्वानों से बड़ा माना और नौजवानों को संदेश दिया – ‘परिश्रम, परिश्रम और परिश्रम!’ उस ‘लौह पुरूष’ ने ही तो महान जर्मनी के ऐतिहासिक संकल्प को पूरा किया।
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इस दौर में कॉरपोरेट को काम करने वाले एक ‘हिन्दू बिस्मार्क’ की जरूरत थी। लोकतन्त्र के रूप में भारत की जो तस्वीर बनती दिखती है उसमें सबकुछ ऐसे ही चला तो सबकुछ बदल जाएगा। देश शक्तिशाली बनेगा, आर्थिक रूप से बनेगा, पूँजी का वर्चस्व बढे़गा, राजनीति में गुणात्मक बदलाव होंगे और देश की जनता के इतिहास और उसकी अपनी बोली–वाणी को महत्त्व मिलेगा। इस दौर में अँग्रेजी का वर्चस्व टूटना चाहिए। अब बाजार यह मान चुका है कि इस देश में विकास के लिए भारतीय भाषाओं का महत्त्व अँग्रेजी से अधिक है। वह इस ‘मास’ (आमलोग) को विकास में शामिल करके अपना विस्तार करना चाहता है। पूँजी के विस्तार के इस दौर में अखबारों में छपे मार्केट ट्रैंड को समझाने वाले कुछ दिनों से बार बार यह कह रहे थे कि इस देश की भाषा का ही भविष्य है। लेकिन इस नये समय में, इस (नये) ‘देश’ में देश की भाषा कैसी होगी इसे कैसे बनाया–बढ़ाया जाएगा यह इस बात पर निर्भर है कि देश की नयी इंटेलिजेंसिया कैसा व्यवहार करती है। आपने देखा होगा कि इन दिनों क्रिकेट की कमेंट्री अब वे लोग कर रहे हैं जिनकी भाषा (अँग्रेजी के अलावा) बांग्ला, तमिल, तेलुगु और मराठी है।
और अन्त में, यूपीएससी की परीक्षा के सम्बन्ध में जो आन्दोलन चल रहा था उसके बारे में दो शब्द। क्या किसी को भी यह लगता था कि यह आन्दोलन ‘सफल’ नहीं होगा? इसका ‘सफल’ होना तय था। ठीक वैसे ही जैसे पड़ोसी देश की एक रैडिकल लेखिका को लम्बे समय का वीसा दिया जाना! लगता है वे तमाम संस्थाएँ और पद–प्रतिष्ठान आदि ही अपनी शक्ति खोते जाएँगे जो पिछले दौर में शक्ति के केन्द्र हुआ करते थे। क्या आपको लगता है कि यूपीएससी, योजना आयोग या यूजीसी उतने शक्तिशाली रह सकेंगे? अगर लगता है तो आप अभी भी उदार औपनिवेशिक राष्ट्रीय युग के साथ चिपके हुए हैं। उदार अँग्रेजीपरस्तों की दीनता अभी नहीं दिख रही है साफ साफ, थोडे़ दिनों बाद दिखने लगेगी। ये बात और है कि ऐसा होना काम्य है या नहीं। 
(यह आलेख 'सबलोग' के सितंबर 2014 अंक में प्रकाशित है।)

Wednesday, 9 November 2011

An Unfortunate Case of Ragging in a Girls’ Hostel of Burdwan University

An Unfortunate Case of Ragging in a Girls’ Hostel of Burdwan University

Yesterday, I was communicated about a very unfortunate case of ragging of some girls of the University of Burdwan, West Bengal. It was reported that four students of of M A first year (First Semester) had been living in a Girls’ Hostel where they were constantly harassed by their seniors. Coming from poor background and unexposed to urabn life-styles and etiquettes, these poor girls were taunted and ridiculed since they had come to the Hostel. The girls suffered but they tolerated this with the expectation that soon all this would end. But, this continued and this became more nasty and unbearable. They were physically harassed, constantly abused, called ‘Biharis, Hindibhashis’ who come to Bengal to cheat and capture the assets of the Bengalis, having no manners befitting a civilized human being and so on. It started with the coming of these girls in the Hostel in middle of October. After two weeks of constant harassment, two of these left the hostel and returned to their home, which is near Asansol. (Their friends say they have left their studies.)The other two remained in the Hostel and they faced the worst treatment. Finally, when all this became absolutely unbearable (the horrifying details of which can not be written here), these students dared to report to their Department teachers. Shocked, the teachers verified the report and found these newcomers’ report dependable. They, however, were reluctant to make it a big issue as this might take a Hindustani-Bengali overtones as the students who were being ragged were all Hindi speaking girls (called Hindusthanis in Bengal ) and the group which did it was all Bengali. But, as the application was so genuine, the teachers approached to the University authorities which took this case sympathetically and appropriately. It is said that an enquiry committee would be constituted and the guilty would be punished. While this was going on, one of these two unfortunate girls, unable to bear the pressure, broke down and so vulnerable she became physically that she was rushed to Burdwan Medical College where she is under treatment.
Meanwhile, the offenders, had decided to dilute the case by bringing charges of theft on these girls on 5th November when they came to know that these girls have reported this to their department teachers. Suddenly, this issue became the issue of stealing and the offenders – these two girls- must be punished ! It is interesting that the mobile and the keys of these girls have been snatched from them and they had been physically assaulted by a group of senior students. The charge is that these girls had stolen a half pant of a senior student!
In the late evening, when the incident became known to media people they flashed this news to all channels and this whole issue had been known to the public.
My worry is that what will happen to these two (and other two who had left the Hostel anticipating that worse is coming) girls. Will they be able to convince their poor family members that they should continue their studies living in the Hostel? I am worried.
This whole issue is very sensitive. The politicization of Bengal public space is so acute that every issue is an issue of politics and it may be the case where two political groups would take sides and the whole issue will become a matter of politics where the powerful group’s view would prevail.
Third worry is that the whole episode would leave a lasting impression in the minds of young girls of the Hostel and the University. One of the key issues of the complain of the girl was that only we four- Hindi speaking girls were targeted and no other fresher was subject of this ragging. Why? The four girls have been born and brought up in Bengal.

We sincerely wish the University authorities would take appropriate step so that incidents like these do not occur in future.

Friday, 7 October 2011

समृद्ध और संस्कृतिहीन हिन्दी समाज के संपन्न वर्ग और बुद्धिजीवियों से अपेक्षाएँ (एक फौरी, आधी अधूरी टिप्पणी)

हिन्दी के बुद्धिजीवी

मराठी या बंगाली बुद्धिजीवियों की तरह अपने समाज से जुडे हुए नहीं हैं. यह निष्कर्ष निकलता है एक सेमिनार का जिसमें हिन्दी समाज के चार बडे विद्वान हिस्सा लेते हैं. गौतम नवलखा का मत है कि "1998 से ही सरकार ने यह मान लिया है कि माओवादी आंदोलन सामाजिक समस्या नहीं बल्कि एक कानून और व्यवस्था की समस्या है! सरकार सुधार और दमन को एक साथ चला रही है. सरकार मानती है कि माओवादी आंदोलन को कमजोर करना दूसरे आन्दोलनों को कमजोर करने की पहली शर्त है. इस लिए सभी वाम ताकतों को सरकार के इस खेल को समझना चाहिए. आज मात्र एक आंदोलन के बल पर क्रांति नहीं हो सकती. जब सभी वाम पार्टियों का ‘विजन’ एक है तो सभी को मिल कर काम करना चाहिए. दूसरे वाम दलों को सोचने की जरूरत है कि यदि माओवादी आंदोलन कमजोर होता है तो देर सबेर उन पर भी संकट आएगा. सभी को अपनी अपनी कमजोरी को बांटना चाहिए. अपने अंतर्विरोधों को विचार विमर्श के जरिये हल करना चाहिए. मार्क्सवाद व्यवहार का सिद्धांत है. और हमें व्यवहार के जरिये काम को आगे ले जाना होगा."

समयांतर के सम्पादक और लेकिन दरवाजा के लेखक पंकज बिष्ट मानते हैं कि हिन्दी में एक भी लेखक नहीं है जो अपने समाज से जुडा है. सब बस सरकारी तंत्र के सामने भीख माँगने वाले याचक हैं. सारे लेखक- पत्रकार सरकार के द्वारा खरीदे जा रहे हैं. हिन्दी समाज में कोई भी तेंदुलकर जैसा जनता का आदमी नहीं है जो कह सके कि अगर उसके पास बंदूक होती तो वह मोदी को गोली मार देते. आनंद स्वरूप वर्मा के हिसाब से देश में 'रीकालॉनाइजेशन' की प्रक्रिया चल रही है. इस क्षेत्र के तमाम देशों में सिर्फ नेपाल है जहाँ औपनिवेशिक दबाव नहीं है. भाषा और संस्कृति का इलाका दक्षिणपंथियों के हवाले छोडकर वामपंथियों ने बडी गलती की है. गाँधीवादी हिमांशु कुमार के अनुसार - "गाँधी ने कहा था कि अंग्रेजियत चली जाये अंग्रेज रह जाये. यह उन्होंने इसलिए कहा था कि वे समझते थे कि अंग्रेजो का विकास का मॉडल गरीब जनता के खिलाफ है. वह मिडिल क्लास पैदा करता है जो श्रमजीवी किसान जनता पर बोझ होती है. अंग्रेजों के आने से पहले भारत में मिडिल क्लास नहीं था. गाँधी ने कहा कि विकास का अंग्रेजी मॉडल दूसरे देश की जनता का क़त्ल करता है. भारत देश किसका क़त्ल करेगा? लेकिन नेहरु ने उसी मॉडल को अपनाया. आज सेना बस्तर पहुँच गई है!"

मीडिया विशेषज्ञ दिलीप मंडल को लगता है कि कारपोरेट मीडिया में काम करने वाला बुद्धिजीवी जनता का बुद्धिजीवी नहीं हो सकता है. प्रशांत राही (उत्तराखंड के वामपंथी कार्यकर्त्ता) ने देश में दो विकास के मॉडलों- माओवादी और गाँधीवादी- की चर्चा की और कहा कि बुद्धिजीवी या तो राज्य के साथ रहे या जन-आन्दोलन के साथ.
इन विश्लेषणों में सच का एक हिस्सा तो है लेकिन इसमें पूरा विश्लेषण नहीं है. बुद्धिजीवी अगर विजय तेंदुलकर की तरह यह बोले कि अगर उनके पास बंदूक होती तो वे मोदी को गोली मार देते एक ऐसा वक्तव्य है जिसको एक बैचैन बुद्धिजीवी की एक परेशानी में दी गयी टिप्पणी के अतिरिक्त कुछ मानना युक्तिसंगत न होगा.

बुद्धिजीवी आखिर कौन है ? यह हमारे समाज में किस हैसियत में है? क्या हिन्दी का बुद्धिजीवी समाज में ऐसी हैसियत रखता है कि वह समाज का नेतृत्व कर सके ?
हिन्दी समाज में सबसे अधिक जनता के साथ खडे होने का श्रेय उस समय के बुद्धिजीवियों को है जिन्हें हम भारतेन्दु युग कहते हैं. जिस निष्ठा के साथ कठिन परिस्थितियों में लेखक पत्रकारों ने काम किया वह अतुलनीय है. लेकिन हुआ समाज से उन्हें समर्थन नहीं मिला. आप देख लीजिए किस तरह वे लोग गये. कुछ लोग तो फटेहाली में मरे. गाँधी युग में बुद्धिजीवी राजनीतिज्ञों के पीछे या साथ साथ चलने वाले लोग ही बने रह सके. उनमें से भी जो लोग रैडिकल थे वे पीछे छूट गये. आपने से कईयों ने राधामोहन गोकुल जी का नाम सुना होगा. उनके बारे में पढते हुए इस हिन्दी समाज के संपन्न और संस्कृतिहीन लोगों की कृतघ्नता का पता चलता है. जब तक राजनेताओं ने किसी की सुध न ली कोई लेखक सम्मान का अधिकारी न हुआ. स्वामी सहजानंद का उदाहरण सामने आता है. उनसे बड़ा जनता का आदमी शायद ही कोई हुआ हो. लगभग अप्रासंगिक हो गये. भला हो उनकी जाति के नेताओं का जिन्होंने उन्हें जिलाए रखा.
आज़ादी के बाद हिन्दी का बुद्धिजीवी हाशिए पर ही रहा. समाज का नेतृत्व नेताओं के पास ही रहा. बुद्धिजीवी समाज के द्वारा पोषित हों तब तो वे वैसा कुछ कर सकें जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती है. बंग्ला समाज अपने बुद्धिजीवियों के प्रति संवेदनशील रहा है. शमशेर के स्तर का कोई कवि बंग्ला में इतनी परेशानी में कभी नहीं रहेगा. मुक्तिबोध की बात न ही करें. आज आलोक धंवा घनघोर संकट में हैं. उनको जब लटकने के लिए एक रस्सी मिली तो उन्हें न जाने क्या क्या कहा जाने लगा. पूरे समाज में वही बुद्धिजीवी सामान्य तरीके से रह पाया जिसके पास कोई नौकरी हो या वह किसी बडे परिवार से आता हो. ऐसे में बुद्धिजीवी पर ठीकरा फोडना एक तरह से अनुचित है. समाज के नेतागण, बडे लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं. कैसा समाज है हमारा ? बंगाल के हर घर ने टैगोर, बंकिम और शरत से लेकर जीवनानंद तक को सँजोया. महाश्वेता देवी आसमान से नहीं टपकीं. वे जब नवयुवती थी तब झाँसी जाकर लक्ष्मीबाई पर शोध कर सकती थीं. ऐसा समाज उन्हें मिला. और अपना हिन्दी समाज ? ज्यादा न ही बुलवायें .
बुद्धिजीवी सॉफ्ट टारगेट हैं . इसलिए जिसको जो मन में आता है वह उनपर जो चाहे बोल सकता है.

अब वापस उस जगह लौटा जाए जहाँ से बात शुरू हुई थी. इस देश में एक अतिवाम धारा है जिसके लिए बुद्धिजीवी की भूमिका तय है. वह यह आशा करते हैं कि बुद्धिजीवी सडकों पर उतरें, कंधे पर बंदूकें हों और वे हर उस कृत्य का समर्थन करें जिसे इस धारा की मुक्ति वाहिनी कर रही है. जो भी ऐसा नहीं करें वे बुद्धिजीवी नहीं सत्ता के हाथों बिके हुए हैं. इस धारा की धार को अर्द्ध -शताब्दी तक देखने-झेलने के बाद जनता उनके साथ जाने को तैयार नहीं. इसकी जिम्मेदारी किसकी ? निश्चित रूप से बुद्धिजीवी की ! वे ही नहीं समझते कि दरअसल माओवादी जनता के लिए लड रहे हैं और राज्य के खिलाफ उनका हर खूनी संघर्ष जायज है, जरूरी है. लेखक की किताब नहीं खरीदी जाती तो उसके लिए लेखक दोषी है. ऐसी किताबें क्यों नहीं लिखता जिसे जनता खरीदे ? विकास के मॉडल में माओवादी और गाँधीवादी मॉडल (पता नहीं यह बायनरी कैसे बनती है) के बीच बुद्धिजीवी को सीधे सीधे माओवाद के समर्थन में उतर जाना चाहिए. कार्पोरेट के लोग झूठे हैं (संरचनात्मक कारणों से !) और दक्षिण एशिया के तमाम देशों में एक ही आदर्श देश है जो औपनिवेशिकता के सांस्कृतिक दबावों से मुक्त है और वह है नेपाल !! इस तरह के जन-ज्वार में बहते हुए प्रबुद्धों के साथ हिन्दी के बुद्धिजीवी न बहें तो धिक्कार है उनपर !

Friday, 10 June 2011

Random thoughts on Indian Intelligentsia 1

Something is terribly wrong in the Indian intelligentsia; the way it reacts to issues which, by all means, constitute and define Indianness. Forget about the knowledge of traditions of the land now known as India the average modern educated Indian does not even care to know how the role of caste, community and language have shaped the course of Indian history in recent centuries. Even the much celebrated Indian Nationalism is not adequately discussed. When Sudipto Kaviraj wrote in one of his articles that Indians became nationalists not in English but in Indian languages such as Bengali, Tamil, Marathi ,Hindi and other Indian languages he was hitting the deck, to use the term of modern cricket. What it means actually ? It leads to the making of Indian Nationalism in the nineteenth and early twentieth centuries. The likes of Bankimchandra, Bharatendu Harischandra, Rabindra Nath Tagore, Sarat , to name only a few,  had been creating and articulating a notion of Indian Nation which was a modern notion but they grounded on Indian traditions. It is only natural that they talked of Hinduness, own culture, own history and so on the  a way an Indian intellectual is expected to do. With the coming of Britain returned liberals most of whom were lawyers by training the emphasis changed. Now,  a new discourse developed which was more suitable for the westernised intelligentsia. The presence of Gandhi was a big problem for the liberals as he was essentially grounded on Indian values and had a great following. The 1920s was the turning point when a new discourse of Indianness emerged which sought to redefine Indian Nationalism. This new modern construction was later blossomed into what is generally known as 'Nehruvian discovery of India'.
It is commonly said that Gandhi was the central figure of India in the first half of twentieth century. This may be true for the whole of India but for elites the real man who mattered most was Nehru. He was the real face of Indian Nationalism for the elites.
Nehru was a well intentioned and remarkable man. By any standard he was a great man but, he was the face of liberal India only to promote a vision of India which was suitable for western educated intelligentsia of India. He was a prisoner of his own vision; a man who was a nationalist, a westernised man and man whose ideology was close to socialist ideology. He was mistrusted by traditionalists and the socialists throughout his life but he successfully flirted with both these ideologies.
The only time Nehru had faced a serious challenge when Lohia mounted attack on him and his policies. But, as Lohia was seen as a threat by liberals Nehru survived and Lohia had to be contended with disgruntled groups and backward caste support base.

Tuesday, 10 May 2011

Tarachand Barjatya ke bahane kuchh batein

आज टी वी पर नदिया के पार को देखते हुए लग रहा था कि हमारे देश के फिल्म निर्मात्ताओं को हम कितना कम श्रेय देते हैं. इस तरह की फिल्में क्या साहित्य से कम प्रभावी हैं? एक एक फ्रेम में यह झलकता है कि इस देश के ग्रामीण समाज की कितनी समझ इस फिल्म के निर्माता-निर्देशकों को रही है. आज जब चारों ओर यह समझाया जा रहा है कि सब तरफ बस अंग्रेजी और पश्चिमी ज्ञान के बिना कुछ बनना बनाना संभव नहीं हमें चाहिए कि हम मुड कर देखें कि स्वदेशी भाव-बोध के लोगों ने कैसे अपना काम किया था. इस देश के मनोरंजन मीडिया पर अंग्रेजीदाँ लोगों का ऐसा वर्चस्व है कि वे अपने वर्ग विशेष के लोगों को पूरे समाज के लिए मनवाने की कोशिश करते हैं. आज व्ही शांताराम, मनोज कुमार और ताराचंद बरजात्या आदि का जिक्र कितना कम होता है ! इन लोगों की चर्चा करते हुए हम एलिटों के विचारधारात्मक प्रभाव को थोडा कम कर सकते हैं.



ताराचन्द बरजात्या का जन्म 10 मई, 1914 को राजस्थान में हुआ था. उन्होंने कोलकाता के विद्यासागर कॉलेज से स्नातक की परीक्षा पास करके 19 वर्ष की आयु में 1933 में मोतीमहल थियेटर में बिना किसी वेतन के एक प्रशिक्षु के रूप में काम करने लगे कडी मेहनत और लगन से उन्होंने अपने मालिक के लिए सफलता अर्जित की. उनकी आर्थिक मदद से ही 14 साल बाद 15 अगस्त 1947 में उन्होंने राजश्री पिक्चर्स प्रा. लिमिटेड की स्थापना की और कम लागत, देशी कलेवर, नये कलाकारों और सार्थक मूल्यों के सहारे फिल्में बनाने लगे. आर्थिक रूप से उन्हें इस बात का लाभ मिला कि उन्होंने जिन फिल्मों के वितरण का अधिकार मिला उनमें अधिकतर खूब चलीं. जिन फिल्म निर्माता निर्देशकों ने उनपर पूरा भरोसा किया उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण नाम मनमोहन देसाई का था जिन्होंने अपनी कई सफल फिल्मों -अमर अकबर अंथोनी ,परवरिश, धरमवीर, कुली आदि फिल्मों के वितरण का अधिकार उन्हें सौंपा. जिन सफल फिल्मों से उन्हें सबसे अधिक लाभ मिला उनमें शोले, , जुगनू,, रोटी, कपड़ा और मकान और विक्टोरिया नं 203 प्रमुख हैं. बडजात्या का एक बड़ा अवदान यह भी है कि उनके माध्यम से दक्षिण भारतीय फिल्म जगत से हिंदी समाज ज्यादा जुड पाया. अपने दक्षिण भारत के फिल्म निर्माण क्षेत्र में अनुभवों के आधार पर उन्हें लगा कि इन क्षेत्रीय फिल्मों को राष्ट्रीय आधार मिलना चाहिए. उन्हें विश्वास था कि दक्षिण भारतीय भाषाओं की सफल फिल्मों को हिन्दी क्षेत्र के दर्शक जरूर पसंद करेंगे. शुरू में जेमिनी, ए वी एम, प्रसाद जैसे बडे निर्माताओं को यह भरोसा नहीं था लेकिन जब ताराचन्द बरजात्या ने उन्हें भरोसा दिलाया और वितरण में मदद का वादा किया तब उन्हें भरोसा हुआ. इस क्रम में हिंदी में चन्द्रलेखा, मिलन, संसार , जीने की राह , ससुराल, राजा और रंक और खिलौना जैसी सफल फिल्में बनी. 1962 में ताराचंद ने अपना स्वतंत्र प्रोडक्शन शुरू किया. इसके बाद एक के बाद एक सफल फिल्मों का सिलसिला शुरू हुआ. आरती (1962) से शुरू हुआ सफर दोस्ती, जीवन-मृत्यु, उपहार, पिया का घर, सौदागर, गीत गाता चल, तपस्या, चितचोर, दुल्हन वही जो पिया मन भाए, अँखियों के झरोखे से, तराना, सावन को आने दो, नदिया के पार, सारांश से होता हुआ मैंने प्यार किया तक चलता रहा. 1992 में उनका देहांत हो गया.

अपनी फिल्मों में वे मानवतावादी भारतीय मूल्यों के प्रति संवेदनशील दिखे. उन्हें लगता था कि देश की भाषा, देशी संगीत और देशी भाव-बोध अगर सार्थक रूप में लोगों के सामने लाया जाए तो लोगों की सराहना मिलेगी. बिल्कुल ऐसा ही हुआ.

एक दूसरी प्रमुख बात यह थी कि वे नये कलाकारों और संगीतकारों को सदैव प्रोत्साहित करते रहे. उन्होंने जिन लोगों को पहला बड़ा ब्रेक दिया उनमें ये नाम शामिल हैं- राखी,जया भादुडी, सारिका, रंजीता, रामेश्वरी, सचिन, अनुपम खेर, अरूण गोविल, माधुरी दीक्षित, सत्येन बोस, बासु चटर्जी, सुधेन्दु राय, लेख टंडन, हीरेन नाग, रवींद्र जैन, बप्पी लाहिडी, उषा खन्ना, येसुदास, हेमलता, सुरेश वाडेकर, शैलैन्द्र सिंह, कविता कृष्णमूर्ति, अनुराधा पौडवाल , उदित नारायण और अलका याज्ञनिक.

अपनी फिल्मों में वे भारतीय समाज के सकारात्मक पक्ष को ज्यादा दिखलाने की कोशिश करते थे. हिंदी का प्रयोग वे शुरू से आखिर तक करते रहे और उनकी फिल्मों में जो नाम दिखलाए जाते थे वे भी हिंदी में ही होते थे.

आज भी उनके पुत्र सूरज बडजात्या हिंदी फिल्म जगत के विरल लोगों में हैं जो स्क्रीन-प्ले हिंदी में तय्यार करवाते हैं.

Wednesday, 22 December 2010

अंग्रेजी का बढता दबाव और हिन्दी समाज के बौद्धिकों का दायित्व

बातचीत अंग्रेज़ी में गांधीजी पर हो रही थी. इतिहासकार शाहिद अमीन ने अपना मत रखा कि गांधीगिरी का प्रयोग उचित नहीं है और इस बात के समर्थन में वे एक पुराने गाने से 'दादागिरी नहीं चलने की यहां का उदाहरण दे रहे थे, अचानक गांधी के तुनुकमिज़ाज प्रपौत्र तुषार गांधी भडक गये. तुषार गांधी को शांत करने के लिए अंतत: बरखा दत्त हिन्दी में बोलीं- तुषार, उनको अपनी बात कहने दें. दत्त के हिन्दी में बोलने का सुयोग लेकर शाहिद अमीन हिन्दी में बोलने लगे और माहौल को सामान्य करने के लिए बाबा रामदेव आदि की बातें करने लगे. बातचीत का पूरा माहौल बदल गया. अब तक जो बातचीत एक कॉंवेंटी माहौल में हो रही थी वहां एक पल के लिए सहज वातावरण बन गया. इस तरह के अनुभवों के बाद यह सोचने का मन होता है कि क्या इस देश में यह बातचीत हिन्दी के सहज भाषाई परिवेश में नहीं हो सकती. अगर नहीं तो क्यों? क्यों इस देश के बडे लोग एक दूसरे से अंग्रेजी में इस तरह बातचीत करते हुए दिखाई पडते हैं. टी वी चैनलों पर हम क्यों ऐसा परिवेश तैयार करते हैं कि अधिकतर लोग असहज हो जाएं. देश के बडे लोग भी (राजनेता समेत) जब अंग्रेजी बोलने की कोशिश में असहज होते दिखलाई पडते हैं और धीरे धीरे वे तमाम लोग जो अंग्रेजी में सहज नहीं थे अब अंग्रेजी सीखने के लिए विवश हुए और अब अंग्रेजी में साक्षात्कार देते है तो यह प्रश्न मन में आता ही है कि हम इस देश में ऐसी संस्कृति को क्यों बढावा दे रहे हैं जिसमें इस देश के लोग अपने लोकप्रिय जन-माध्यम में इतना असहज हो जाता हो और इंग्लैण्ड और अमरीका का आदमी पूरी सहजता से भारत के जनमाध्यम में बोलता दिखलाई पडता हो.
हर समय का अपना एक कॉमन सेंस बनता है या बनाया जाता है जिसे उस समय के शक्तिशाली प्रभुवर्ग निर्मित करते हैं. 1990 के बाद से जब से इस देश में वैश्वीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है यह बात मान्य होने लगी है कि अंग्रेजी का ज्ञान हमारे लिए एक वरदान है और जो लोग दुनिया में आगे बढने की कोशिश करना चाहते हैं उनके लिए अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है. यह एक दुष्प्रचार का परिणाम है कि पश्चिम बंगाल की सी पी एम सरकार सहयोगी दलों के विरोध के बावजूद अब सरकारी स्कूलों में अंग्रेज़ी माध्यम से शिक्षा देने की नीति पर अमल कर रही है. अंग्रेजी के बढते वर्चस्व के इस दौर में एक प्रकार की असहजता हर उस नागरिक में लक्षित की जा सकती है जो अंग्रेजी का प्रयोग अपने दैनिक जीवन में करने का अभ्यस्त नहीं है. जिस तरह से अंग्रेजी स्कूलों का जोर बढा है और देश की तमाम नौकरियों के लिए अंग्रेजी को जरूरी सा बनाने की सांस्थानिक कोशिशें तेज हुई हैं उसे देखते हुए इस देश में इस देश में यह एक बहस का मुद्दा बनना चाहिए कि इस युग में शिक्षित भारतीय क्या हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं के बदले अंग्रेजी को इस देश में राजकाज, शिक्षा और दैनिक जीवन में तरजीह देने के लिए तैयार होने की दिशा में बढ रहा है या नहीं.
अंग्रेजी विरोध के आन्दोलन का युग बीत गया लगता है. जिस तरह हमारे सामाजिक जीवन के तीन क्षेत्रों - शिक्षा, मनोरंजन और राजकाज की भाषा के रूप में अंग्रेजी का वर्चस्व बढा है वह एक विचारणीय प्रश्न है. इस बिन्दु पर बहुधा लोग कुछ अतिप्रचलित उदाहरणों, उद्धरणों का प्रयोग करते हैं. जैसे- " कह दो गांधी को वह अंग्रेजी नहीं जानता", " मातृभाषा में ही हमारा स्वस्थ विकास हो सकता है " आदि आदि. इस तरह की बातों को दुहराते हुए, हिन्दी दिवसों का पालन करते हुए इसे अब झुठलाया नहीं जा सकता है कि इस देश में भाषा का मुद्दा एक खतरनाक मोड पर पहुंच गया है.
हिन्दी का भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में "राष्ट्रीय" बनना एक विचारधारात्मक संघर्ष का परिणाम था. कम से कम जब से गांधी जी नेतृत्व में आये थे हिन्दी राष्ट्रीय आन्दोलन की भाषा बन गयी थी. एक बार बाल गंगाधर तिलक कलकत्ता के मछुआ बाज़ार में भाषण देने आए. गांधीजी हिन्दी में बोल चुके थे और तिलक को लगा कि अगर वे अंग्रेजी में बोलेंगे तो जनता पर अपेक्षित प्रभाव पैदा नहीं होगा. वे सार्वजनिक जीवन में पहली बार हिन्दी में बोले और इसका बहुत अच्छा प्रभाव पडा. इसके बाद तिलक हिन्दी में ही बोलने लगे. यह गांधी का ही प्रभाव था. कलकत्ता के शिक्षित लोग एक बार गांधीजी के सोदपुर आने पर उनसे आग्रह करने लगे कि वे हिन्दी में न बोलें. गांधीजी ने उनलोगों को फटकार लगाई और हिन्दी में बोले. वह एक बेहद दिलचस्प अध्याय है जिसमें 1927 में गांधी हिन्दी के पक्ष में इस तरह बोले कि आज का हिन्दी वाला भी शर्मा जाए. अपने आचरण से भी गांधी ने हिन्दी को बहुप्रचारित किया. गोविन्द बल्लभ पंत अल्मोडा में अंग्रेजी माध्यम से पढे थे और वे अंग्रेजी में गांधी को पत्र लिखते थे जिसका उत्तर गांधी हिन्दी में देते थे. शर्म आने पर पंत भी उन्हें हिन्दी में पत्र लिखने लगे. इस तरह के ढेरों उदाहरण दिए जा सकते हैं लेकिन गांधी की भाषा पर कम विचार किया जाता है. इसे विडंबना ही कहना चाहिए कि गांधी के भाषणों और पत्रों का जो संकलन गांधी समग्र में आया है उनमें से अधिकतर पहले छपे अंग्रेजी वाड्गमय के हिन्दी अनुवाद है. मूल रूप से ये भाषण हिन्दी में दिए गए थे!
इन बातों को पुराने युग के कॉमन सेंस में इस लिए स्वीकृत माना गया था क्योंकि उस समय राष्ट्रीय स्वप्न और विचारधारा का जोर था जिसमें एक राष्ट्र, एक भाषा की बात को समर्थन था. सुदीप्त कविराज यह स्मरण कराते हैं कि इस देश में राष्ट्रीय स्वप्न ने भारतीय भाषाओं ने अपना स्वरूप तैयार किया था न कि अंग्रेजी में. उत्तर औपनिवेशिक भारत में अंग्रेजी बनी रही और वैश्वीकरण के दौर में तो यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि यह नये 'इंडिया' की भाषा बन जायेगी.
इस ग्लोबल युग में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि इस देश में शासन और शिक्षा की असली भाषा अंग्रेजी ही है. आकडों को दिखला कर यह कहना कि इस देश में शिक्षा की भाषा भारतीय भाषाएं हैं एक छलावा ही है. जिसे हिन्दी माध्यम का स्कूल कॉलेज कहा जाता है वहां हिन्दी के अलावा सबकुछ अंग्रेजी में तैयार पाठ्यक्रमों का अनुवाद ही पढाया जाता है. दो तीन दशक पहले तक शिक्षकों की कोशिशों से कुछ प्रयत्न होते थे कि अन्य विषयों को भी हिन्दी में उचित तरीके से पढाया जाए पर अब सब कुछ मानो अंग्रेजी की नकल पर ही होने लगा है. लगभग हर समाजविज्ञान के क्षेत्र में सभी राष्ट्रीय संस्थाएं अंग्रेजी में काम करती हैं. तकनीकी क्षेत्रों की बात छोड ही दें जहां हिन्दी में काम करने में अपेक्षाकृत रूप में कठिनाई है. इसे क्या कहा जाए कि इतिहास अध्ययन के क्षेत्र में वार्षिक अधिवेशन में कोई भी पर्चा हिन्दी में नहीं छप सकता जबकि विकल्प देने पर कम से कम पचास फीसदी से ज्यादा पर्चे हिन्दी में प्रस्तुत किए जाएंगे. एक बार फ्रांस से पी एच डी किए लाल बहादुर वर्मा हिन्दी में पर्चा पढने लगे तो एक ख्यात हिन्दी भाषी इतिहासकार ने जिस तरह उन्हें घूरा और हतोत्साहित किया उसे वर्मा 'जीवन में न भूलने वाला अनुभव' मानते हैं. दरअसल, हिन्दी पर हमला कई तरह से किया जाता है. इस मुद्दे पर इस देश के एलिट समुदाय में अद्भुत एका है. हिन्दी में लिखे लेखों और पुस्तकों को दर्ज ही नहीं किया जाता. इस बार इंडियन हिस्टॉरिकल इंसटीच्यूट के मुंबई वार्षिक अधिवेशन में अर्चना ढेरे (जो मराठी साहित्य की प्राध्यापिका हैं ) ने एक अविस्मरणीय बीज वक्तव्य हिन्दी में दिया. यह तय मानिए कि इस वक्तव्य को हिन्दी में दिए जाने के कारण कभी भी प्रमुखता से कहीं भी छापा नहीं जाएगा. संभव है इस तरह के वक्तव्य हिन्दी में देने वाले लोग अपवाद के रूप में भी न दिखें. अंग्रेजी एलिट में हिन्दी के विरूद्ध जो एका है उसे समझकर हिन्दी भाषी बौद्धिकों ने तैयारी करने की सख्त जरूरत है. यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस देश में हर भाषा के सम्मान के लिए सबसे ज्यादा तत्पर उस समाज के उदार लोग नहीं हैं. ये उन्नत सोच वाले उदार लोग अंग्रेजी के साथ हैं.
शिक्षा और राजकाज के अतिरिक्त जो इलाका अंग्रेजी की दखल में चला जा रहा है वह इस दौर के सांस्कृतिक संकट को सबसे अच्छी तरह से स्पष्ट करता है. वह क्षेत्र है मनोरंजन का. इस देश में हिन्दी फिल्म और क्रिकेट बहुत लोकप्रिय है. इन दोनों क्षेत्रों में अंग्रेजी ने चोर दरवाजे से अपना वर्चस्व बनाया है. हिन्दी फिल्म का लगभग हर शख्स फिल्म के अलावा बाकी सब जगहों पर अंग्रेजी में बोलता है या बोलना चाहता है. सिर्फ बंगाल में आनंद बाजार ग्रुप की नीतियों के कारण फिल्म जगत के लोग बांग्ला भाषी जनता के लिए हिन्दी में बोलते हैं ! लता मंगेशकर, आशा भौंसले आदि कुछ गायकों को छोडकर कोई छोटी बडी फिल्मी हस्ती हिन्दी में बोलती दिखाई नहीं देती. क्रिकेट की कमेंट्री अब अंग्रेजी में ही होती है. भला हो दूरदर्शन की पुरानी नीतियों का कि एक कोने में एक टी वी दे दिया जाता है जिसे देखकर सुशील दोषी जैसे हिन्दी के यशस्वी कमेंट्रेटर हिन्दी में कमेंट्री करते हैं. यह बात गौर करने की है कि आज भी सुशील दोषी साफ सुथरी हिन्दी में बेहतरीन कमेंट्री करते हैं. हमें उनका कृतज्ञ होना चाहिए. जिन लोगों ने हिन्दी में कमेंट्री की शुरूआत की थी, मसलन अरूण लाल, मोहिन्दर अमरनाथ, मनिंदर सिंह आदि वे सब अब अंग्रेजी में कमेंट्री करने लगे. कपिलदेव जैसे लोग हिंदी कमेंट्री के लिए तैयार नहीं. वे अंग्रेजी कमेंट्री करना चाहते है जिसके लिए चैनल वाले तैयार नही ! हम सब मिलकर अब नहीं चेते और इस तरह के तर्क देते रहे कि बाज़ार तो हिन्दी के साथ है और भले ही अंग्रेजी में बोला जाता हो लेकिन अर्थ ग्रहण हिन्दी में होता है, हम भूल कर रहे हैं. खतरा यहां तक बढ गया है कि हिन्दी के लोग भी अंग्रेजी शैली में सोचने विचारने के अभ्यस्त होने लगे हैं, अपनी हिन्दी छवि को छुपाने लगे हैं. जो लोग हिन्दी के अध्यापक हैं वे जब अंग्रेजी में या अंग्रेजीनुमा हिन्दी में बोलने दिखने की होड में दिखते हैं तो उन तमाम नौजवानों को बेहद निराशा होती है जो इस संकट के दौर में भी अपनी भाषा में काम करना चाहते हैं. हिन्दी समाज के प्रबुद्ध लोगों को इस दिशा में काम करने की संभावनाओं को बढाने की कोशिश करनी चाहिए. तभी वह सहज माहौल हम जन माध्यमों में पाएंगे जो हिन्दी के आते ही सहज ही टी वी के पर्दे पर आ जाता है. पर इस सांस्कृतिक माहौल को हम अपनी भाषा के प्रति दायित्वशील होकर ही हासिल कर सकते हैं.