पराजय के इस दौर में
हितेन्द्र पटेल
भारतीय समाज इतना वैविध्यपूर्ण और जटिल है कि इसे सांख्यिकीय आधार पर नहीं समझा जा सकता. पर, अगर नीयत साफ हो तो इस समाज में व्याप्त सामाजिक और आर्थिक विषमता और इस समाज की आंतरिक शक्ति को समझने के लिए साक्षात्कार ही काफी है. गाँधी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे मनीषियों ने इस समाज को समझने और इसमें परिवर्तन हेतु कभी भी सरकारी सर्वेक्षण और रिपोर्टों की जरूरत महसूस नहीं की. विवेकानंद , गाँधी, जयप्रकाश, विनोबा आदि लोगों के लिए देश को जानने समझने के लिए लोगों से देशाटन के दौरान मिलना ही यथेष्ट था. यह आधुनिक यूरोपीय बोध से जन्मा कॉमन सेंस है कि संख्या और सांख्यिकी से ही समाज को समझा और उसकी प्रगति के लिए सरकारी नीति बनायी जा सकती है. नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह या निलकेनी तक संख्या और सांख्यिकी की इस सत्ता और औचित्य को लेकर सहमति है. इस लॉजिक को मान लेने के बाद सब कुछ संख्या-बल और राजनीति पर ही केन्द्रित हो सकती थी और वही बात आज भारत में हो रही है. यह एक दिलचस्प बात है कि जिस आधार पर भारतीय राष्ट्रवाद की 'खोज' या प्रतिष्ठा हुई थी उसी को नकारने के लिए आज होड मची हुई है. राष्ट्रवाद को लेकर कांग्रेस के भीतर भी एक गुणात्मक परिवर्तन हुआ है. 2001 में जब जाति के आधार पर गणना की बात चली तो इस दल ने विरोध किया. अब 2011 में अन्य दलों के साथ कांग्रेस भी इस पक्ष में हो गई है कि जाति के आधार पर जनगणना जरूरी है! यानि पिछले दस सालों में ऐसा कुछ हुआ है जिसके कारण यह बात मान ली गयी कि जाति की गणना सरकारी नीति निर्धारण के लिए आवश्यक है. यानि वर्ग नहीं वर्ण के आधार पर भारतीय समाज को समझा जा सकता है. यह बात भारतीय राजनीति में लोहिया ने अपने जीवन के अंतिम दशक में राजनैतिक दबाव के कारण प्रतिष्ठित की. (उनके चिंतन में इस विषय पर मौलिक और विषद चिंतन है जिसमें लोग उतरना नहीं चाहते) लेकिन, इस बात को वास्तविक रूप से पिछले दो दशकों में बहुत भोंडे ढंग से प्रचारित किया गया. जाति अब राजनीति का धर्म के साथ एक मान्य अस्त्र बन गया. कोई भी पार्टी अब इस बात के ऊपर नहीं उठ सकती. ऐसे में सबको लग रहा है कि जाति के आधार पर जनगणना से बात साफ हो जाएगी और सरकार को नीति निर्धारण के लिए एक स्पष्ट आधार मिल जाएगा. कुछ सवर्ण दल और राष्ट्रवादी विचार के लोग इसका विरोध नीतिगत कारणों से कर रहे हैं, लेकिन कुल मिलाकर देश में यह बात स्वीकृत सी हो गई है कि जातियों के संख्या निर्धारण में कोई हर्ज़ नहीं है. यह आधुनिक इतिहास की एक विडंबना ही कही जायेगी कि जाति को मिटाते मिटाते देश की सरकार के नीति निर्धारक आधार के रूप में जाति को स्वीकार कर लिया गया है! आज समय आ चुका है जब लोग गाँधी को बनिया, रवीन्द्रनाथ को ब्राह्मो -ब्राह्मण, जयप्रकाश को कायस्थ, सहजानंद को भूमिहार, अंबेडकर को महार कहकर सोचें कि इसमें बुराई क्या है! इस तरह की सोच अब और शक्तिशाली होने वाले हैं. यह औपनिवेशिक आधुनिक यूरोपीय सोच की जीत और उदार भारतीय राष्ट्रवादी सोच के पराजय की सूचना देने वाले समय की शुरूआत है.
अंग्रेज़ी शासन के दौरान जो भारत के संबंध में धारणा बनी उसके मूल में यह बात थी कि भारतीय समाज मूलत: धर्म और जाति पर आधारित समाज है जो बदलाव को नहीं स्वीकारता. स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान जो प्रधान विचारधारात्मक संघर्ष उभर कर सामने आया वह यही था कि एक प्रकार की शक्तियाँ इन धर्म और जातीय पहचानों को केन्द्रीय मानती थी (जिसमें साम्प्रदायिक दल, ब्रिटिश हुकूमत और पुनरूत्थानवादी शक्तियाँ एक ओर थी और कांग्रेस एवं वामपंथी समूह (समाजवादी और साम्यवादी) दूसरी ओर. भारतीय पहचान के विकास के दौर में , कम से कम 1890 से 1935 तक , यह ध्रुवीकरण कुछ इस तरह होता रहा कि यह संभावना बनने लगी कि भारत भी अन्य विकसित समाजों की तरह इन प्राक-आधुनिक सामाजिक बंधों की जगह राष्ट्रीय पहचान की ओर बढेगा. धीरे-धीरे यह जाति का जोर खत्म होगा और लोग आधुनिक पहचान के साथ सामाजिक जीवन व्यतीत करेंगे. 1931 के बाद जाति के आधार पर जनगणना भी नहीं हुई और अभी भी किस जाति के कितने लोग हैं इसे जानने के लिए या अनुमान करने के लिए 1931 की जनगणना को ही आधार बनाया जाता है. समस्या का नया सन्दर्भ तब बना जब स्वतंत्रता के बाद सरकार के नीति निर्धारण के लिए जातीय आधार को रखा गया. संकट यह था कि नीति निर्धारण के मामले में जाति को आधार बनाए रखा गया और जातीय आँकडे जनगणना के साथ उपलब्ध करने को देश की एकता के लिए खतरा माना गया ! यह एक विडंबनापूर्ण स्थिति थी.
जाति और उसका समाज में स्थान भारत में परिवर्तनशील रहा है. कौन 'ऊँची' और कौन 'नीची' जाति है इसको लेकर कभी भी एकमत नहीं रहा. एक ही जाति के भीतर सैकडों उपजातियाँ रही हैं जिनमें आपस में रोटी-बेटी का संबंध सहज नहीं था. ब्राह्मण, राजपूत के अतिरिक्त किसी भी जाति को देश भर में ऊँची जाति के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता था. कौन जाति के किस पायदान पर है इस बात को तूल जिस समय से दिया जाने लगा उसी समय से जाति का प्रश्न बडा प्रश्न बन गया. इतिहासकारों ने पिछले तीस वर्षों में बहुत विस्तार से इसका विश्लेषण किया है कि कैसे 1871 और 1881 के बाद जनगणना ने जातियों के बीच अपनी जाति के संगठन और अधिकारों के प्रति सचेतनता के दायित्त्व बोध को बढाया और इन पहचानों को स्थानीय सन्दर्भ से उठाकर राज्य और राष्ट्रीय सन्दर्भ प्रदान किया. जाति का प्रश्न इतना उलझा हुआ रहा है कि लगभग हर गणना करने वाले ने इस काम को करने में बहुत समस्याओं का सामना किया. हर टेबुल के साथ अन्य जातियाँ, जिन जातियों के नाम नहीं है आदि नाम से टेबुल बनाए जाते थे. कई जगहों पर जाति पूछने पर लोग अपने काम को बताते थे ! यह निश्चित है कि इस देश के बहुत सारे लोगों को अपनी जाति बताने में कठिनाई थी. पर, सरकार का आदेश था कि हर किसी की एक जाति होनी ही चाहिए इसलिए एक आदमी के साथ एक जाति का उल्लेख जरूरी थी. 1917 के बाद संकट और गहराया जब पिछडी जातियों के समूहों को एक साथ लाकर सरकारी हस्तक्षेप की शुरूआत हुई. माँटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार ने इसको वैधानिक आधार दिया और 1935 के एक्ट ने इसपर मुहर लगा दी. इस बीच दक्षिण के राज्यों में हुए दलित जातियों के आन्दोलनों, फूले, अंबेडकर एवं नायकर आदि के प्रयत्नों ने इसको सामाजिक और राजनैतिक वैधता दी. कहा जा सकता है कि अंग्रेजों ने फूट डालो और शासन करो की नीति के तहद इस तरह के विखंडनकारी सोच को बढाया और कांग्रेस के नेतृत्व में जारी राष्ट्रीय आन्दोलन की हवा निकालने की कोशिश की. लेकिन, सच्चाई यह भी है कि जिस तरह के हालात थे उसमें किसी भी सरकार के लिए निम्न जातियों के लोगों के लिए अलग व्यवस्था की बात करना उचित ही था.
यह बात आज कुछ विद्वान कह रहे हैं कि अगर जाति के आधार पर अगर जनगणना हुई तो देश में फूट पडेगी और लोगों में जातीयता की भावना और बढेगी. यह सही ही है. देश का हर नागरिक अगर बाध्य हो कि उसे अपनी जाति के साथ अपनी पहचान को नत्त्थी करना पडे तो यह बात सही ही होती है कि अगर सब कुछ करके भी अंतत: इसका उत्तर देना पडे कि आपकी जाति क्या है, तो हमने क्या किया?
आज की बदली परिस्थिति में जाति को लेकर हुई लोहिया युग की राजनीति का सकारात्मक पक्ष भी नहीं है. लोहिया ने जो जाति को आधार बना कर कांग्रेस विरोध की राजनीति को मजबूती दी थी उसमें आरक्षण का प्रश्न और पिछडों का उभार केन्द्रीय था. लोहिया की दृष्टि भारतीय राजनीति की दिशा को समझ रही थी और वे देश को लोकतांत्रिकीकरण के अगले चरण के लिए तैयार कर रहे थे जिसमें पिछडे भी शक्तिशाली हो रहे थे. सही विश्लेषण और नीति से शुरू हुए पिछडावाद का बाद में जो पतन लालूवाद और मुलायमवाद में हुआ उसको ध्यान में रखने पर एकबारगी यह भय तो होता ही है कि इन नेताओं के हाथों अगर जाति की संख्या का खेल नामक गोटी आ जाये तो ये देश में मार-काट मचा देंगे. लेकिन, सौभाग्य से यह अतिपिछडावाद अब उतना गैर-जिम्मेदार नहीं रह सकता. कुछ उलट फेर के बाद अब लोगों में जिस प्रकार की अपेक्षा का वातावरण तैयार हो चुका है उसको देखते हुए यह नहीं लगता कि अब फिर से अंध-पिछडावाद राजनीति पर हावी हो सकेगा. सौभाग्य की बात यह भी है कि पिछडों के नेताओं में 'विकास' और जनोन्मुखता की भावना जोर पकड रही है. फिर भी नीतिश कुमार जैसे नेताओं को कब पासवान और लालू मिलकर पटखनी दे दें कोई नहीं बता सकता. फिर भी यह तो लगता ही है कि अगर लालू जी की पार्टी आ भी गयी तो भी वो पुराने दिनों वाली निश्चिंती उन्हें नहीं प्राप्त होगी. यह एक शुभ संकेत है कि झारखंड में भी आदिवासी राजनैतिक क्षितिज पर कई नेता उभर रहे हैं. उसी तरह पिछडों में भी नेताओं की अब कोई कमी नहीं है.
[ऐसी परिस्थिति में जाति की गणना की तरफ अगर अंतत: जाना ही पडे तो कम से कम दो तीन सावधानियों को ध्यान में रखा जाए. सबसे पहले यह ध्यान देना चाहिए कि जाति की गणना के दौरान मीडिया और राजनेताओं को सावधान होकर काम करना होगा. मीडिया अगर इस बात को गलत तरीके से पेश करने लगे तो सरकार को अपना दायित्व पालन करना होगा. इस देश का अंग्रेज़ी मीडिया ही देश में सबसे ज़्यादा संशय का वातावरण बनाता आया है. आपको याद होगा प्रणय राय आदि ने जब चुनाव विश्लेषण को फैशनेबुल बनाया तो वे जाति के आधार पर वोट पैटर्न को समझने और समझाने लगे थे. धीरे धीरे इस तरह के लैपटॉपी लोगों ने चुनाव परिणामों के बारे में भविष्यवाणी करने के 'वैज्ञानिक' विश्लेषण को करोडों का कारोबार बना दिया. पूरी संभावना है कि अंग्रेज़ी मीडिया इस नये मुद्दे पर बाबा लोगों को बिठाकर बहस करके देश को यह संदेश देंगे कि यह सब कुछ इस लिए हो रहा है क्योंकि सरकार जानना चाहती है कि किस जाति के कितने लोग हैं और सरकार उनको लेकर क्या नीति निर्धारित कर सकती है. सबकुछ इतना सरकार पर आधारित होता जा रहा है कि समाज के मत पर कोई ध्यान नहीं देना चाहता. हिन्दी मीडिया कुल मिलाकर अंग्रेज़ी मीडिया का भदेस संस्करण बनता जा रहा है और वैकल्पिक मीडिया का भविष्य तय नहीं हो पा रहा है. ऐसे में इस विषय पर तमाम बहसों के बाद की तय राय वही होगी जो सरकार चाहेगी. ]
इस निराश कर देने वाली बात को रखते हुए एक बात कहना चाहूंगा. तृतीय विश्व के देशों के लिए यह एक चुनौती है कि वे दिखलायें कि वे भी अन्य सभी समाजों की तरह विकल्प और परिवर्तन को स्वीकार करते हैं. धर्म के मामले में कम से कम धर्मांतरण करके या अपने को नास्तिक घोषित करके एक नागरिक एक विकल्प ढूंढ सकता है. जाति के मामले में क्या विकल्प है? और फिर जिस परिवार में एक से अधिक जातियाँ आ जुटी हैं वे क्यों एक जाति में ही अपनी पहचान ढूढने के लिए राज्य द्वारा अभिशप्त हों? कोई भी व्यक्ति किसी जाति में जन्म लेकर श्रेष्ठ या निम्न नहीं होता. इस बात को अगर हम मान लें तो फिर जाति को तो सिर्फ मिटाए जाने की सोचना चाहिए. आधुनिक भारत में जाति को कमजोर करने और उसे कम प्रभावी बनाने के लिए साठ बरस का चालीस साल का समय 'ऊँची' जातियों को मिला लेकिन वे अपने दंभ और मूर्खता के कारण यह नहीं समझ पाए कि अब समय पिछडों को आगे लाने का है. मंडल कमीशन के बाद जिस तरह से जातिवादी राजनीति को बल मिला उसके कारण ही भारतीय होने की पहचान कमजोर हुई और अपनी जाति की पहचान शक्तिशाली हुई. इस परिणाम के लिए तथाकथित ऊँची जातियों का औद्धत्य (औडासिटी) जिम्मेदार है जिसने लंठ पिछडावाद को राजनैतिक रूप से शक्तिशाली बना दिया. सिर्फ नयी रौशनी की एक आदर्शवादी उम्मीद अब बची है जो देश के किसी किसी कोने से कभी कभी दिखलाई पडती है. भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति लोगों में आस्था अगर सच्ची होगी तो इन प्रयासों को जन समर्थन मिलेगा . नहीं तो जाए भैंस पानी में ... .
[Sablog, June 2010]
Friday, 10 September 2010
हिंसा से प्रभावित होने वालों को भी हिंसक होने का अधिकार नहीं
"हिंसा से प्रभावित होने वालों को भी हिंसक होने का अधिकार नहीं."
प्रश्न: हिंसा में जिस वृद्धि की बात की जा रही है, उसे कौन बढा रहा है?
उत्तर : इस प्रश्न का उत्तर देने के पहले मैं कुछ बातों पर पाठकों का ध्यान दिलाना चाहूंगा. हिंसा एक हद तक बुखार की तरह है. जैसे बुखार अपने आप कोई रोग नहीं है बल्कि एक संकेत है किसी बीमारी का. जैसे ही वह बीमारी ठीक होगी बुखार अपने आप उतर जाएगा. हिंसा को समाज में व्याप्त बुराई के संकेत के रूप में भी देखा जा सकता है. समस्या तब अधिक हो जाती है जब इस प्रश्न पर राज्य-सत्ता जैसे संस्थान को जोडकर इस पर विचार किया जाता है. राज्य प्रभुत्त्वशाली वर्ग के हितों के हिसाब से ही काम करता है. इस राज्य को एक विशेषाधिकार प्राप्त है. यही वह चीज है जिसके कारण यह सबसे शक्तिशाली है. वह अधिकार है 'हिंसा का अधिकार'. सभी संस्थाओं में सिर्फ इसे यह अधिकार है कि यह हिंसा कर सकती है. आधुनिक युग में, जिसमें राज्य-सत्ता के अधिकार सबसे व्यापक हैं, किसी को आत्महत्या का भी अधिकार नहीं है. सामान्यत: यह माना जाता है कि राज्य उस देश के समस्त नागरिकों की सामूहिक इच्छा का प्रतिनिधित्त्व करता है. समस्या तब होती है जब राज्यसत्ता अपनी वैधता को खो दे, यानि जब राज्य अपनी शक्ति का दुरूपयोग करके नागरिकों की सामूहिक इच्छा का अनादर करके शासन करने की कोशिश करे. विख्यात वामपंथी चिंतक फ्रांज फेनन मानते थे कि 'उपनिवेशवाद हिंसा है अत: इसके खिलाफ हिंसा का प्रयोग सर्वथा उचित है". दुनिया के तमाम क्रांतिकारी विचारकों का मत भी यही है कि जब राज्य जनता का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहा हो और अपने को बचाने के लिए उसके पास उपलब्ध शक्ति- हिंसा का सहारा लेने लगे तो वह अपने शासन के अधिकार को खो देता है. ऐसे में राज्य सत्ता के खिलाफ हिंसा का प्रयोग वैध है. युद्ध में शत्रु के द्वारा प्रयुक्त अस्त्र के हिसाब से ही युद्ध किया जाता है. अत: अनुचित राज्य सत्ता को अपदस्थ करने के लिए हिंसा का रास्ता ही सही रास्ता है. इसी तर्क के कारण फेनन अल्जीरिया के क्रांतिकारियों द्वारा औपनिवेशिक शासन के खिलाफ हिंसा का प्रयोग बिल्कुल सही मानते हैं.
इस के विपरीत गाँधी जैसे विचारक हैं जो हिंसा को हर रूप में गलत मानते हैं. उनकी दृष्टि में अगर औपनिवेशिक शक्तियाँ हिंसा का प्रयोग करती हैं तो इसका उत्तर प्रति हिंसा से देने का अर्थ है पहली शक्ति द्वारा हिंसा के प्रयोग का औचित्य सिद्ध करना. अगर हम हिंसा का विरोध अहिंसा से करेंगे तो हिंसा करने वाला या तो बदलेगा या उसके बल प्रयोग की नैतिकता खत्म होगी. इस प्रकार का अनैतिक बल प्रयोग चल नहीं सकता.
मुझे लगता है गाँधी की बात बहुत गहरी है और इसे ठीक से समझने की जरूरत है. देखा जाए तो जब से लोकतंत्रात्मक व्यवस्था दुनिया में आयी है, किसी भी देश की राज सत्ता अपने देश की आम जनता की इच्छा के विरूद्ध नहीं जा सकती. सिर्फ तानाशाही और फासिस्ट राज्य सत्ता ही जनता की इच्छा का अनादर करने का जोखिम उठाती है. अगर इस बात को मान लिया जाए तो गाँधी का कहा हुआ बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है. यह ज्यादा कारगर तरीका है. हालाँकि यह भी कहना पडेगा कि किसी और औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ गाँधी का अहिंसात्मक आन्दोलन इतना प्रभावी नहीं भी हो सकता था. आप बर्मा का उदाहरण भी ले सकते हैं. चाहे तो तिब्बत का भी उदाहरण ले सकते है जिसमें गाँधीवादी प्रकार के राजनैतिक आन्दोलनों को वह सफलता नहीं मिली जो भारत में संभव हो सकी.
अब आपके प्रश्न के उत्तर की ओर जाया जाए. आपने विषय को प्रस्तावित करते हुए बहुत ही सही लक्षित किया है कि "मनोरचना में विवेक और कल्याण का दायरा सिकुडता जा रहा है." यही वह बात है जिससे बात शुरू की जा सकती है. यह क्यों हो रहा है? क्या इससे इतर कुछ और हो सकता था? मुझे लगता है आधुनिक सोच इससे इतर कुछ और कर ही नहीं सकता था. अपने देश में इस संबंध में ज्यादा चर्चा नहीं होती कि आखिरकार आधुनिक यूरोपीय सोच के दायरे में इस देश की सोच को क्यों 'रिड्यूस' किया जाता रहा है. यूरोप में सौ से भी ज्यादा सालों से यह बात समझी जाती रही है कि आधुनिकता के भीतर भयानक विध्वंसकारी तत्त्व हैं जो हमारे मन को 'वेस्टलैंड' में बदल देंगे और विवेकशील मनुष्य एक उपभोक्ता 'बायो मास' में तब्दील हो जाएगा. यूरोप या पश्चिम विश्व नहीं है लेकिन वही मान लिया गया है. आज साहित्य से लेकर आर्थिक,-राजनैतिक, सामाजिक सांस्कृतिक, वैचारिक-भाषिक, धार्मिक-आध्यात्मिक, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, परिवार पडोस, राष्ट्र-राज्य , चेतन-अवचेतन, मीडिया-फिल्म, लोक-विश्व, न्याय-नैतिकता आदि सभी क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा जारी है. यह प्रतिस्पर्द्धा ही तो हमें अपने आंतरिक विवेक से विच्छिन्न करके हमसे वही करवाती है जिसे करते हुए हम अपने लिए ही 'अजनबी' बन जाते हैं. हमारी सारी लडाई हमारे अपने भीतर एक हिंसा का अनंत सिलसिला रचती है जिसमें हम जन्म से लेकर मृत्यु (और उसके बाद भी) टँगे रहते हैं. मार्टिन हाइडेगर की कई स्थापनाओं से असहमत होते हुए भी मुझे लगता है उनके सोच ने आधुनिक मनुष्य की विडंबना को ठीक से पकडा है. जिसे सार्त्र 'नथिंगनेस' कहते हैं वही तो हमारे आधुनिक की नियति है. आप फ्रैंकफुर्त स्कूल के विद्वानों को पढते हुए महसूस करेंगे कि आधुनिक 'मैकेनिकल' मनुष्य के प्रति पश्चिम में भी चिंता रही है. जब मार्कुज 'वन डायमेंशनल मैन' लिखते हैं तो इस बात का पूरा विवरण हमारे पास उपलब्ध हो जाता है कि यही पश्चिमी मनुष्य को होना था. राम मनोहर लोहिया ने इस बात पर बहुत ही सुंदर टिप्पणी की थी. लेकिन, इन सबके बावजूद भारत समेत पूरी दुनिया वही खेल खेल रही है. प्रतिस्पर्द्धा को अवगुण मानने की दृष्टि हमारी भारतीय सोच का प्रधान तत्त्व रहा है इसका स्मरण कराना भी अब इस देश में पिछडेपन का चिह्न माना जाता है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. दुनिया भर में शांति के इस दौर में करोडों लोग हिंसा का शिकार हो रहे हैं और सब कुछ आधुनिक बनने और आगे बढने के लिए अपरिहार्य माना जा रहा है. आधुनिक पश्चिमी सोच का वैश्विक वैचारिक वर्चस्व इस जगत की भयानक हिंसा के मूल में है.
2. हिंसा किसके हित में है?
उत्तर: हिंसा करने वाला समझता है कि वह अपने हित में हिंसा कर रहा है लेकिन यह भ्रामक है. एक स्थूल उदाहरण लें. स्टालिन ने, हिटलर ने, सद्दाम हुसैन ने, बुश ने जो हिंसा की वह अपने लोगों के हित में की है. उनका हाल क्या हुआ. जिसके लिए किया उनका क्या हुआ? इतिहासकार एरिक हॉब्सबाम पूरी दुनिया के बीसवीं सदी के इतिहास का एक यथासंभव सटीक विश्लेषण करके इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि दुनिया में निकट भविष्य में शांति की कोई संभावना नहीं है. वे जो आंकडे देते हैं वे चौंकाने वाले हैं. वे कहते हैं कि आधुनिक "बीसवीं शताब्दी आज तक की सबसे हिंसक शताब्दी रही है. युद्ध से संबंधित हिंसा में कुल 18 करोड 70 लाख लोग मारे गये हैं... इस शताब्दी में युद्ध अनवरत चलता रहा है. ... द्वितीय विश्वयुद्द का कोई समापन नहीं हुआ (जैसा कि अमूमन युद्ध के बाद होता है). जाहिर है, युद्ध द्वारा किसी भी स्थाई समाधान नहीं हुआ है. किसी अफगानिस्तान या इराक तक को युद्ध की हिंसा के द्वारा सबक नहीं सिखाया जा सका. किसी का हित सधा हो, लगता नहीं है. जिन संगठनों ने हिंसा के द्वारा अपनी जनता के लिए अपनी सरकारों से हिंसा के द्वारा मुकाबला किया है उनसे भी कुछ नहीं बन पडा. नेपाल से लेकर श्री लंका तक के नजदीकी उदाहरण यही संदेश देते हैं कि इस तरह के हिंसक राजनैतिक प्रयास फौरी सफलताएं भले ही पा लें, इसके दूरगामी परिणाम शुभ नहीं होते. अफ्रीका में विभिन्न देशों में हिंसात्मक गतिविधियों से जुडे संगठनों का हाल तो और भी भयानक है. वहाँ लाखों लोग मर रहे हैं और किसी का कोई भला नहीं हो रहा है. क्या इस बात की चर्चा की ज़रूरत है कि लश्करे तोईबा और अन्य इस्लामिक हिंसा में विश्वास करने वाले संगठनों से सबका (विशेषकर मुसलमानों का) कितना अहित किया है? वामपंथी हिंसा में विश्वास करने वालों से भी किसी का हित नहीं हुआ है.
3. हर क्षेत्र में केंन्द्रीयकरण की प्रवृत्ति ने हिंसा को नहीं बढाया है?
उत्तर: इसमें कोई संदेह नहीं है. इसको समझने के लिए दो उदाहरणों को पास पास रखकर समझा जा सकता है. कश्मीर में जिस तरह से केन्द्र ने शांति बहाल करने की कोशिश की और आतंकवादी गतिविधियों को समाप्त करने की कोशिश की उसमें सफलता तभी मिलनी शुरू हुई (जितनी भी मिली है) जब स्थानीय राजनैतिक प्रक्रिया शुरू की गई. केन्द्र अपने बूते यह नहीं कर पाया. सख्ती करके भी नहीं. पंजाब में भी यही हुआ. आज खालिस्तान आन्दोलन जैसा खतरनाक आन्दोलन खत्म हुआ जब स्थानीय लोगों ने इसमें पहल की. असम में भी यही हुआ. केन्द्र के बल से किसी भी आन्दोलन को दबाना बहुत मुश्किल है. बाहरी ताकत लगाकर दबाव तो बनाया जा सकता है लेकिन स्थायी रूप से प्रभावी समाधान नहीं दिया जा सकता. अमरीका ने अफगानिस्तान और इराक के उदाहरण से यह पाठ सीखा है.
4. हिंसा की कितनी जरूरत राष्ट्र-राज्य को है?
उत्तर: मैं पहले भी कह चुका हूँ कि राज्य का अस्तित्व हिंसा के बल पर ही है. यह अकारण नहीं है कि तोलस्तोय और गाँधी समेत बहुत सारे शांतिप्रिय नेताओं और चिंतकों ने राष्ट्र-राज्य को जरूरी नहीं समझा. वे अगर इसके नाश के लिए तैयार न भी हुए हों तो भी यह तो चाहते ही थे कि इसका दखल लोगों के जीवन में कम से कम हो.
वैसे देखा जाए तो राष्ट्र राज्य जानबूझ कर नहीं मजबूरी में हिंसा करता है. पर यह मजबूरी ऐसी है कि इसके बिना उसका कोई औचित्य रहेगा ही नहीं. आम वामपंथी दृष्टि के अनुसार राज्य का प्रधान दायित्व है 'हैव्स" को " हैव नाट्स" से बचाना और यथास्थिति को बनाए रखना. उदारनैतिक दृष्टि के अनुसार राज्य का दायित्व है नागरिकों की स्वतंत्रता की, उसकी संपत्ति की रक्षा करना और जहाँ तक संभव हो कम से कम हस्तक्षेप करना. सीमा पर रक्षा, पुलिस और डाक व्यवस्था के अलावा किसी भी मामले में राज्य की उपस्थिति को उदारवादी नापसंद करते हैं. कुल मिलाकर फासिस्ट और अन्य प्रकार के तानाशाहों ने ही राज्य की जरूरत को जरूरी समझा है.
राज्य है तो हिंसा है और एक हद तक राज्य की हिंसा को तब तक सही माना जाता है जब तक राज्य को आम जनता की ओर से वैधता प्राप्त है. अगर राज्य कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए या देश की सीमा की सुरक्षा के लिए या फिर किसी गंभीर आंतरिक खतरे का मुकाबला करने के लिए हिंसा का सहारा लेती है तो जनता उस हिंसा को उचित मान लेती है. श्री लंका की वर्तमान सरकार द्वारा जिस हिंसक तरीके से एल टी टी का जाफना से सफाया किया गया उसका श्री लंका की जनता ने समर्थन किया.
5. संगठित हिंसा की समाप्ति किस संगठित विचार या प्रयास से संभव है?
उत्तर: कुछ वर्ष पूर्व विख्यात दो दार्शनिकों -देरिदा और हैबरमास ने इस पर विचार किया था. उसके आधार पर एक विद्वान ने यह सुझाव दिया कि जो शोषित हैं उन्हें भी हिंसा का अधिकार नहीं है. हैबरमास कहते हैं कि इस बात को समझने की जरूरत है कि " बीइंग द सब्जेक्ट ऑव वायलेंस गिव्स अस नो राइट टू बी वायलेंट इन रिटर्न'. यह एक उपयोगी टिप्पणी है. स्पष्ट है कि यह मत गाँधी के विचारों के बहुत निकट है. कई लोगों को यह बात कुछ अटपटी लग सकती है. हम अपने सहज बोध से जानते हैं कि हिंसा आत्म-रक्षार्थ भी किया जाता है और अपने अधिकार के लिए भी कभी कभी हिंसा होती है. भारतीय संदर्भ में हाल ही में अरूंधती राय ने जन-जातियों के साथ राज्य द्वारा किए जा रहे अन्यायों के सन्दर्भ में जन-जातियों द्वारा किए गये हिंसा को उचित ठहराया है. देश के विभिन्न हिस्सों में माओवादियों द्वारा किए जा रहे हिंसक आन्दोलनों के समर्थन में भी कुछ लोगों ने लिखा है. इस बात को केन्द्र में रखकर विचार करना उचित होगा. हैबरमास एक अन्य बात को भी इस सन्दर्भ में जोडते हैं जो उनके पूरे वक्तव्य को स्पष्ट करता है. वे कहते हैं- "हिंसा के परित्याग के लिए यह जरूरी है कि लोग यह समझें कि कहीं भी किसी के ऊपर हो रही हिंसा को वे अपने ऊपर हो रहे आघात के लिए लें". [इस संबंध में और विस्तार के लिए देखें- एल. जी. बोरादरी (Borradori), फिलासफी इन ए टाइम ऑव टेरर :डायलॉग विद जुर्गेन हैबरमास एंड जॉक देरिदा (2003)] हैबरमास इस सन्दर्भ में दो बातों का उल्लेख करना नहीं भूलते; उनके अनुसार आधुनिक समाज ने पारंपरिक समाज को ध्वस्त तो कर दिया लेकिन उसका विकल्प तैयार नहीं किया. आतंकवाद आधुनिकता का निगेटिव पक्ष है जिसका उदय इस कारण से हुआ है क्योंकि आधुनिकता ने जो दर्द पैदा किया उसकी दवा का इंतजाम नहीं किया. आतंकवाद एक आधुनिक युग की समस्या है. यह प्राक आधुनिक युगों की हिंसा से भिन्न है. पहले हिंसा का खत्म होना तय था चाहे वह जितना भी भयावह हिंसा क्यों न हो. आज आतंकवाद की हिंसा से भी ज्यादा समस्या पैदा करने वाली बात यह है किसी भी समय फिर से हो सकने वाली हिंसा की आशंका है. 9/11 के बाद अमरीका जितनी भी व्यवस्था कर ले वह इस भय से मुक्त नहीं हो सकता कि ऐसी घटना कभी भी कहीं भी घट सकती है. यह बात और भी भुलाना कठिन है कि अमरीका ने ही ओसामा बिन लादेन को शीत युद्ध के दौरान ट्रेनिंग दी थी और 9/11 के आतंकियों ने पश्चिमी देशों में ही जहाज उडाने की ट्रेनिंग ली थी.
मुझे लगता है हैबरमास की इन बातों से संगठित हिंसा की समाप्ति की ओर एक जरूरी पहल संभव है.
इसमें संदेह नहीं कि जन-जातियों के साथ अन्याय लगातार हुए हैं और इस अन्याय में राज्य की भी भूमिका रही है. जिस प्रकार अमानवीय तरीकों से जन-जातियों को उनके वास-स्थानों से विस्थापित किया जाता रहा है और जिस प्रकार उनकी गरीबी बढी है उसे देखते हुए कई लोगों को लगता है कि उनका प्रतिवाद- चाहे हिंसक हो तो भी समर्थन योग्य है. दूसरी ओर एक अन्य प्रकार की परिस्थिति में बंगाल के कुछ इलाकों में राज्य समर्थित शासक दल द्वारा चलाए जा रही संगठित हिंसा का जिस तरह प्रतिवाद हुआ है उसके संदर्भ में भी यह कहा जा सकता है कि एकमात्र हिंसक तरीके से ही शासक दल के अत्याचार और वैज्ञानिक तरीके से चलाए जा रहे दलीय आतंकवाद का डटकर मुकाबला किया जा सकता था. इस प्रसंग में दो तीन बातों का उल्लेख जरूरी है. बंगाल के जंगल महल इलाके में आज से 30 बरस पहले सभी दलों के समर्थक थे. कुछ कांग्रेसी थे कुछ समाजवादी थे और कुछ कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थक थे. पिछले दिनों यह पता चला कि अब इस इलाके में एक ही दल है -सी पी एम बाकी सबको खत्म कर दिया गया है. पता चला है कि येन केन प्रकारेण- छल-बल-कौशल से लेकर क्रूर हिंसा तक के प्रयोग द्वारा यहाँ सी पी एम के विरोधियों का सफाया कर दिया गया. सी पी एम का दबदबा इतना बढ गया था कि कुछ लोकप्रिय विरोधी दल के नेताओं का खून कराने के बाद भी पार्टी के नेताओं का कुछ नहीं हुआ. लोगों में पार्टी का भय इतना अधिक हो गया था कि लोग डर के मारे मुंह नहीं खोलते थे. ऐसे में धीरे धीरे एक विरोध जन जातियों में पैदा हुआ और जब मौका मिला सी पी एम के नेताओं और समर्थकों का सफाया शुरू हुआ. अब बदले हुए माहौल में सी पी एम के समर्थकों ने पहली बार जाना कि जान का भय क्या होता है. इस भय ने धीरे धीरे सी पी एम विरोधियों में साहस पैदा किया और विभिन्न इलाकों में सी पी एम के आतंक पैदा करने वाले दलीय आतंकवाद को हिंसक तरीके से चुनौती दी. अब इस प्रकार की हिंसा को कैसे देखा जाए?
इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि इस व्याख्या में दम है. आज सी पी एम बंगाल में रक्षात्मक मुद्रा में दिखलाई पड रही है तो इसका बडा कारण सी पी एम की न दिखलाई पडने वाली हिंसा (जिसने विरोधियों को आतंकित कर रखा था) का वैसा ही जवाब दिया जाना है. इन जन जातियों के नेताओं के प्रति सहानुभूति रखते हुए भी यह कहना पडेगा कि इस रास्ते से न कोई समाधान होगा और न ही जन जातियों को कोई राहत ही मिलेगी. होना यह चाहिए कि किसी मजबूरी में हिंसात्मक आन्दोलनों में आए लोगों को जैसे ही सुयोग मिले लोकतांत्रिक पद्धति की प्रक्रियाओं से जोड लिया जाना चाहिए. ऐसे उदाहरण दुनिया में बहुत हैं जिसमें हिंसा का रास्ता छोडकर लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुडे हैं. मिश्र से लेकर फिलिस्तीन तक ऐसे उदाहरण देखे जा सकते हैं. इस देश में पिछले वर्षों में नक्सलवादी आंदोलन का बहुत विस्तार हुआ है. आज सरकार इस तरह के आंदोलनों को देश की सुरक्षा के लिए बडा खतरा मान रही है और युद्ध स्तर पर इसका मुकाबला करने के लिए अपनी फौज को इस काम में लगाए हुए है. आए दिन नक्सली और सेना के बीच की मुठभेडों में दोनों ओर से मारे गये लोगों की तस्वीरें अखबारों में दिखलाई पडती हैं. ऐसे में कभी कभी लगता है कि अब इस देश के एक बडे हिस्से में राज्य और नक्सली अपने अपने अधिकार के लिए खूनी लडाईयाँ चलती रहेंगी. यह हो भी सकता है. लेकिन, यह अंतत: राज्य के द्वारा नक्सलियों के दमन में ही समाप्त होगा. इस बात को अगर ठीक से समझ लिया जाए तो संभव है देश के शांति प्रिय नेताओं की पहल का लाभ लेकर नक्सली लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल हों और अपना राजनैतिक आंदोलन चलाते रहें. अगर ऐसा नहीं हुआ तो सैकडों- हजारों पुलिसकर्मी और नक्सली इस हिंसा की भेंट चढ जायेंगे.
निश्चित ही राज्य को भी इसमें पहल करनी पडेगी. इतिहासकार हॉब्सबाम बताते हैं कि दुनिया के बहुत सारे देशों में राज्य सत्ता के समानांतर कई सत्ताएं उभर गयी हैं जो राज्य की सामरिक शक्ति से होड लेती हैं. उनका दमन राज्य कर ही ले यह जरूरी नहीं, जब तक ऐसा नहीं होता शांति बहाल नहीं हो सकती. राज्य अगर सिर्फ दमन करने के इरादे से काम करेगा तो संभव है यह कठिन प्रमाणित हो. ऐसे में दोनों ओर से पहल होनी चाहिए. मीडिया और संस्कृतिकर्मियों का भी यह दायित्व है कि वह हिंसा के मार्ग को एक विकल्प के रूप में देखने प्रवृत्ति का विरोध करे और लोगों में यह जागरूकता पैदा करे कि हिंसा से स्थायी राजनैतिक समाधान संभव नहीं. साथ ही राज्य पर भी दबाव बनाए कि हर तरह की हिंसा को आपराधिक हिंसा न माने और ऐसा सामाजिक माहौल बनाए जिसमें भय और अविश्वास कम हो. एक आधुनिक दृष्टि रखने वाली सरकार और आधुनिक बनने की होड में पिली जनता में यह विवेक तभी आ सकता है जब इस समाज और संस्कृति के उदात्त तत्त्वों के प्रति लोगों की जागरूकता बढे. चाहे जितना भी कठिन हो यह याद रखा जाना चाहिए कि इसी देश में सौ साल पहले एक अहिंसक राजनैतिक आंदोलन हुआ था जो विश्व का सबसे बड स्वाधीनता संग्राम था
प्रश्न: हिंसा में जिस वृद्धि की बात की जा रही है, उसे कौन बढा रहा है?
उत्तर : इस प्रश्न का उत्तर देने के पहले मैं कुछ बातों पर पाठकों का ध्यान दिलाना चाहूंगा. हिंसा एक हद तक बुखार की तरह है. जैसे बुखार अपने आप कोई रोग नहीं है बल्कि एक संकेत है किसी बीमारी का. जैसे ही वह बीमारी ठीक होगी बुखार अपने आप उतर जाएगा. हिंसा को समाज में व्याप्त बुराई के संकेत के रूप में भी देखा जा सकता है. समस्या तब अधिक हो जाती है जब इस प्रश्न पर राज्य-सत्ता जैसे संस्थान को जोडकर इस पर विचार किया जाता है. राज्य प्रभुत्त्वशाली वर्ग के हितों के हिसाब से ही काम करता है. इस राज्य को एक विशेषाधिकार प्राप्त है. यही वह चीज है जिसके कारण यह सबसे शक्तिशाली है. वह अधिकार है 'हिंसा का अधिकार'. सभी संस्थाओं में सिर्फ इसे यह अधिकार है कि यह हिंसा कर सकती है. आधुनिक युग में, जिसमें राज्य-सत्ता के अधिकार सबसे व्यापक हैं, किसी को आत्महत्या का भी अधिकार नहीं है. सामान्यत: यह माना जाता है कि राज्य उस देश के समस्त नागरिकों की सामूहिक इच्छा का प्रतिनिधित्त्व करता है. समस्या तब होती है जब राज्यसत्ता अपनी वैधता को खो दे, यानि जब राज्य अपनी शक्ति का दुरूपयोग करके नागरिकों की सामूहिक इच्छा का अनादर करके शासन करने की कोशिश करे. विख्यात वामपंथी चिंतक फ्रांज फेनन मानते थे कि 'उपनिवेशवाद हिंसा है अत: इसके खिलाफ हिंसा का प्रयोग सर्वथा उचित है". दुनिया के तमाम क्रांतिकारी विचारकों का मत भी यही है कि जब राज्य जनता का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहा हो और अपने को बचाने के लिए उसके पास उपलब्ध शक्ति- हिंसा का सहारा लेने लगे तो वह अपने शासन के अधिकार को खो देता है. ऐसे में राज्य सत्ता के खिलाफ हिंसा का प्रयोग वैध है. युद्ध में शत्रु के द्वारा प्रयुक्त अस्त्र के हिसाब से ही युद्ध किया जाता है. अत: अनुचित राज्य सत्ता को अपदस्थ करने के लिए हिंसा का रास्ता ही सही रास्ता है. इसी तर्क के कारण फेनन अल्जीरिया के क्रांतिकारियों द्वारा औपनिवेशिक शासन के खिलाफ हिंसा का प्रयोग बिल्कुल सही मानते हैं.
इस के विपरीत गाँधी जैसे विचारक हैं जो हिंसा को हर रूप में गलत मानते हैं. उनकी दृष्टि में अगर औपनिवेशिक शक्तियाँ हिंसा का प्रयोग करती हैं तो इसका उत्तर प्रति हिंसा से देने का अर्थ है पहली शक्ति द्वारा हिंसा के प्रयोग का औचित्य सिद्ध करना. अगर हम हिंसा का विरोध अहिंसा से करेंगे तो हिंसा करने वाला या तो बदलेगा या उसके बल प्रयोग की नैतिकता खत्म होगी. इस प्रकार का अनैतिक बल प्रयोग चल नहीं सकता.
मुझे लगता है गाँधी की बात बहुत गहरी है और इसे ठीक से समझने की जरूरत है. देखा जाए तो जब से लोकतंत्रात्मक व्यवस्था दुनिया में आयी है, किसी भी देश की राज सत्ता अपने देश की आम जनता की इच्छा के विरूद्ध नहीं जा सकती. सिर्फ तानाशाही और फासिस्ट राज्य सत्ता ही जनता की इच्छा का अनादर करने का जोखिम उठाती है. अगर इस बात को मान लिया जाए तो गाँधी का कहा हुआ बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है. यह ज्यादा कारगर तरीका है. हालाँकि यह भी कहना पडेगा कि किसी और औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ गाँधी का अहिंसात्मक आन्दोलन इतना प्रभावी नहीं भी हो सकता था. आप बर्मा का उदाहरण भी ले सकते हैं. चाहे तो तिब्बत का भी उदाहरण ले सकते है जिसमें गाँधीवादी प्रकार के राजनैतिक आन्दोलनों को वह सफलता नहीं मिली जो भारत में संभव हो सकी.
अब आपके प्रश्न के उत्तर की ओर जाया जाए. आपने विषय को प्रस्तावित करते हुए बहुत ही सही लक्षित किया है कि "मनोरचना में विवेक और कल्याण का दायरा सिकुडता जा रहा है." यही वह बात है जिससे बात शुरू की जा सकती है. यह क्यों हो रहा है? क्या इससे इतर कुछ और हो सकता था? मुझे लगता है आधुनिक सोच इससे इतर कुछ और कर ही नहीं सकता था. अपने देश में इस संबंध में ज्यादा चर्चा नहीं होती कि आखिरकार आधुनिक यूरोपीय सोच के दायरे में इस देश की सोच को क्यों 'रिड्यूस' किया जाता रहा है. यूरोप में सौ से भी ज्यादा सालों से यह बात समझी जाती रही है कि आधुनिकता के भीतर भयानक विध्वंसकारी तत्त्व हैं जो हमारे मन को 'वेस्टलैंड' में बदल देंगे और विवेकशील मनुष्य एक उपभोक्ता 'बायो मास' में तब्दील हो जाएगा. यूरोप या पश्चिम विश्व नहीं है लेकिन वही मान लिया गया है. आज साहित्य से लेकर आर्थिक,-राजनैतिक, सामाजिक सांस्कृतिक, वैचारिक-भाषिक, धार्मिक-आध्यात्मिक, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, परिवार पडोस, राष्ट्र-राज्य , चेतन-अवचेतन, मीडिया-फिल्म, लोक-विश्व, न्याय-नैतिकता आदि सभी क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा जारी है. यह प्रतिस्पर्द्धा ही तो हमें अपने आंतरिक विवेक से विच्छिन्न करके हमसे वही करवाती है जिसे करते हुए हम अपने लिए ही 'अजनबी' बन जाते हैं. हमारी सारी लडाई हमारे अपने भीतर एक हिंसा का अनंत सिलसिला रचती है जिसमें हम जन्म से लेकर मृत्यु (और उसके बाद भी) टँगे रहते हैं. मार्टिन हाइडेगर की कई स्थापनाओं से असहमत होते हुए भी मुझे लगता है उनके सोच ने आधुनिक मनुष्य की विडंबना को ठीक से पकडा है. जिसे सार्त्र 'नथिंगनेस' कहते हैं वही तो हमारे आधुनिक की नियति है. आप फ्रैंकफुर्त स्कूल के विद्वानों को पढते हुए महसूस करेंगे कि आधुनिक 'मैकेनिकल' मनुष्य के प्रति पश्चिम में भी चिंता रही है. जब मार्कुज 'वन डायमेंशनल मैन' लिखते हैं तो इस बात का पूरा विवरण हमारे पास उपलब्ध हो जाता है कि यही पश्चिमी मनुष्य को होना था. राम मनोहर लोहिया ने इस बात पर बहुत ही सुंदर टिप्पणी की थी. लेकिन, इन सबके बावजूद भारत समेत पूरी दुनिया वही खेल खेल रही है. प्रतिस्पर्द्धा को अवगुण मानने की दृष्टि हमारी भारतीय सोच का प्रधान तत्त्व रहा है इसका स्मरण कराना भी अब इस देश में पिछडेपन का चिह्न माना जाता है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. दुनिया भर में शांति के इस दौर में करोडों लोग हिंसा का शिकार हो रहे हैं और सब कुछ आधुनिक बनने और आगे बढने के लिए अपरिहार्य माना जा रहा है. आधुनिक पश्चिमी सोच का वैश्विक वैचारिक वर्चस्व इस जगत की भयानक हिंसा के मूल में है.
2. हिंसा किसके हित में है?
उत्तर: हिंसा करने वाला समझता है कि वह अपने हित में हिंसा कर रहा है लेकिन यह भ्रामक है. एक स्थूल उदाहरण लें. स्टालिन ने, हिटलर ने, सद्दाम हुसैन ने, बुश ने जो हिंसा की वह अपने लोगों के हित में की है. उनका हाल क्या हुआ. जिसके लिए किया उनका क्या हुआ? इतिहासकार एरिक हॉब्सबाम पूरी दुनिया के बीसवीं सदी के इतिहास का एक यथासंभव सटीक विश्लेषण करके इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि दुनिया में निकट भविष्य में शांति की कोई संभावना नहीं है. वे जो आंकडे देते हैं वे चौंकाने वाले हैं. वे कहते हैं कि आधुनिक "बीसवीं शताब्दी आज तक की सबसे हिंसक शताब्दी रही है. युद्ध से संबंधित हिंसा में कुल 18 करोड 70 लाख लोग मारे गये हैं... इस शताब्दी में युद्ध अनवरत चलता रहा है. ... द्वितीय विश्वयुद्द का कोई समापन नहीं हुआ (जैसा कि अमूमन युद्ध के बाद होता है). जाहिर है, युद्ध द्वारा किसी भी स्थाई समाधान नहीं हुआ है. किसी अफगानिस्तान या इराक तक को युद्ध की हिंसा के द्वारा सबक नहीं सिखाया जा सका. किसी का हित सधा हो, लगता नहीं है. जिन संगठनों ने हिंसा के द्वारा अपनी जनता के लिए अपनी सरकारों से हिंसा के द्वारा मुकाबला किया है उनसे भी कुछ नहीं बन पडा. नेपाल से लेकर श्री लंका तक के नजदीकी उदाहरण यही संदेश देते हैं कि इस तरह के हिंसक राजनैतिक प्रयास फौरी सफलताएं भले ही पा लें, इसके दूरगामी परिणाम शुभ नहीं होते. अफ्रीका में विभिन्न देशों में हिंसात्मक गतिविधियों से जुडे संगठनों का हाल तो और भी भयानक है. वहाँ लाखों लोग मर रहे हैं और किसी का कोई भला नहीं हो रहा है. क्या इस बात की चर्चा की ज़रूरत है कि लश्करे तोईबा और अन्य इस्लामिक हिंसा में विश्वास करने वाले संगठनों से सबका (विशेषकर मुसलमानों का) कितना अहित किया है? वामपंथी हिंसा में विश्वास करने वालों से भी किसी का हित नहीं हुआ है.
3. हर क्षेत्र में केंन्द्रीयकरण की प्रवृत्ति ने हिंसा को नहीं बढाया है?
उत्तर: इसमें कोई संदेह नहीं है. इसको समझने के लिए दो उदाहरणों को पास पास रखकर समझा जा सकता है. कश्मीर में जिस तरह से केन्द्र ने शांति बहाल करने की कोशिश की और आतंकवादी गतिविधियों को समाप्त करने की कोशिश की उसमें सफलता तभी मिलनी शुरू हुई (जितनी भी मिली है) जब स्थानीय राजनैतिक प्रक्रिया शुरू की गई. केन्द्र अपने बूते यह नहीं कर पाया. सख्ती करके भी नहीं. पंजाब में भी यही हुआ. आज खालिस्तान आन्दोलन जैसा खतरनाक आन्दोलन खत्म हुआ जब स्थानीय लोगों ने इसमें पहल की. असम में भी यही हुआ. केन्द्र के बल से किसी भी आन्दोलन को दबाना बहुत मुश्किल है. बाहरी ताकत लगाकर दबाव तो बनाया जा सकता है लेकिन स्थायी रूप से प्रभावी समाधान नहीं दिया जा सकता. अमरीका ने अफगानिस्तान और इराक के उदाहरण से यह पाठ सीखा है.
4. हिंसा की कितनी जरूरत राष्ट्र-राज्य को है?
उत्तर: मैं पहले भी कह चुका हूँ कि राज्य का अस्तित्व हिंसा के बल पर ही है. यह अकारण नहीं है कि तोलस्तोय और गाँधी समेत बहुत सारे शांतिप्रिय नेताओं और चिंतकों ने राष्ट्र-राज्य को जरूरी नहीं समझा. वे अगर इसके नाश के लिए तैयार न भी हुए हों तो भी यह तो चाहते ही थे कि इसका दखल लोगों के जीवन में कम से कम हो.
वैसे देखा जाए तो राष्ट्र राज्य जानबूझ कर नहीं मजबूरी में हिंसा करता है. पर यह मजबूरी ऐसी है कि इसके बिना उसका कोई औचित्य रहेगा ही नहीं. आम वामपंथी दृष्टि के अनुसार राज्य का प्रधान दायित्व है 'हैव्स" को " हैव नाट्स" से बचाना और यथास्थिति को बनाए रखना. उदारनैतिक दृष्टि के अनुसार राज्य का दायित्व है नागरिकों की स्वतंत्रता की, उसकी संपत्ति की रक्षा करना और जहाँ तक संभव हो कम से कम हस्तक्षेप करना. सीमा पर रक्षा, पुलिस और डाक व्यवस्था के अलावा किसी भी मामले में राज्य की उपस्थिति को उदारवादी नापसंद करते हैं. कुल मिलाकर फासिस्ट और अन्य प्रकार के तानाशाहों ने ही राज्य की जरूरत को जरूरी समझा है.
राज्य है तो हिंसा है और एक हद तक राज्य की हिंसा को तब तक सही माना जाता है जब तक राज्य को आम जनता की ओर से वैधता प्राप्त है. अगर राज्य कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए या देश की सीमा की सुरक्षा के लिए या फिर किसी गंभीर आंतरिक खतरे का मुकाबला करने के लिए हिंसा का सहारा लेती है तो जनता उस हिंसा को उचित मान लेती है. श्री लंका की वर्तमान सरकार द्वारा जिस हिंसक तरीके से एल टी टी का जाफना से सफाया किया गया उसका श्री लंका की जनता ने समर्थन किया.
5. संगठित हिंसा की समाप्ति किस संगठित विचार या प्रयास से संभव है?
उत्तर: कुछ वर्ष पूर्व विख्यात दो दार्शनिकों -देरिदा और हैबरमास ने इस पर विचार किया था. उसके आधार पर एक विद्वान ने यह सुझाव दिया कि जो शोषित हैं उन्हें भी हिंसा का अधिकार नहीं है. हैबरमास कहते हैं कि इस बात को समझने की जरूरत है कि " बीइंग द सब्जेक्ट ऑव वायलेंस गिव्स अस नो राइट टू बी वायलेंट इन रिटर्न'. यह एक उपयोगी टिप्पणी है. स्पष्ट है कि यह मत गाँधी के विचारों के बहुत निकट है. कई लोगों को यह बात कुछ अटपटी लग सकती है. हम अपने सहज बोध से जानते हैं कि हिंसा आत्म-रक्षार्थ भी किया जाता है और अपने अधिकार के लिए भी कभी कभी हिंसा होती है. भारतीय संदर्भ में हाल ही में अरूंधती राय ने जन-जातियों के साथ राज्य द्वारा किए जा रहे अन्यायों के सन्दर्भ में जन-जातियों द्वारा किए गये हिंसा को उचित ठहराया है. देश के विभिन्न हिस्सों में माओवादियों द्वारा किए जा रहे हिंसक आन्दोलनों के समर्थन में भी कुछ लोगों ने लिखा है. इस बात को केन्द्र में रखकर विचार करना उचित होगा. हैबरमास एक अन्य बात को भी इस सन्दर्भ में जोडते हैं जो उनके पूरे वक्तव्य को स्पष्ट करता है. वे कहते हैं- "हिंसा के परित्याग के लिए यह जरूरी है कि लोग यह समझें कि कहीं भी किसी के ऊपर हो रही हिंसा को वे अपने ऊपर हो रहे आघात के लिए लें". [इस संबंध में और विस्तार के लिए देखें- एल. जी. बोरादरी (Borradori), फिलासफी इन ए टाइम ऑव टेरर :डायलॉग विद जुर्गेन हैबरमास एंड जॉक देरिदा (2003)] हैबरमास इस सन्दर्भ में दो बातों का उल्लेख करना नहीं भूलते; उनके अनुसार आधुनिक समाज ने पारंपरिक समाज को ध्वस्त तो कर दिया लेकिन उसका विकल्प तैयार नहीं किया. आतंकवाद आधुनिकता का निगेटिव पक्ष है जिसका उदय इस कारण से हुआ है क्योंकि आधुनिकता ने जो दर्द पैदा किया उसकी दवा का इंतजाम नहीं किया. आतंकवाद एक आधुनिक युग की समस्या है. यह प्राक आधुनिक युगों की हिंसा से भिन्न है. पहले हिंसा का खत्म होना तय था चाहे वह जितना भी भयावह हिंसा क्यों न हो. आज आतंकवाद की हिंसा से भी ज्यादा समस्या पैदा करने वाली बात यह है किसी भी समय फिर से हो सकने वाली हिंसा की आशंका है. 9/11 के बाद अमरीका जितनी भी व्यवस्था कर ले वह इस भय से मुक्त नहीं हो सकता कि ऐसी घटना कभी भी कहीं भी घट सकती है. यह बात और भी भुलाना कठिन है कि अमरीका ने ही ओसामा बिन लादेन को शीत युद्ध के दौरान ट्रेनिंग दी थी और 9/11 के आतंकियों ने पश्चिमी देशों में ही जहाज उडाने की ट्रेनिंग ली थी.
मुझे लगता है हैबरमास की इन बातों से संगठित हिंसा की समाप्ति की ओर एक जरूरी पहल संभव है.
इसमें संदेह नहीं कि जन-जातियों के साथ अन्याय लगातार हुए हैं और इस अन्याय में राज्य की भी भूमिका रही है. जिस प्रकार अमानवीय तरीकों से जन-जातियों को उनके वास-स्थानों से विस्थापित किया जाता रहा है और जिस प्रकार उनकी गरीबी बढी है उसे देखते हुए कई लोगों को लगता है कि उनका प्रतिवाद- चाहे हिंसक हो तो भी समर्थन योग्य है. दूसरी ओर एक अन्य प्रकार की परिस्थिति में बंगाल के कुछ इलाकों में राज्य समर्थित शासक दल द्वारा चलाए जा रही संगठित हिंसा का जिस तरह प्रतिवाद हुआ है उसके संदर्भ में भी यह कहा जा सकता है कि एकमात्र हिंसक तरीके से ही शासक दल के अत्याचार और वैज्ञानिक तरीके से चलाए जा रहे दलीय आतंकवाद का डटकर मुकाबला किया जा सकता था. इस प्रसंग में दो तीन बातों का उल्लेख जरूरी है. बंगाल के जंगल महल इलाके में आज से 30 बरस पहले सभी दलों के समर्थक थे. कुछ कांग्रेसी थे कुछ समाजवादी थे और कुछ कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थक थे. पिछले दिनों यह पता चला कि अब इस इलाके में एक ही दल है -सी पी एम बाकी सबको खत्म कर दिया गया है. पता चला है कि येन केन प्रकारेण- छल-बल-कौशल से लेकर क्रूर हिंसा तक के प्रयोग द्वारा यहाँ सी पी एम के विरोधियों का सफाया कर दिया गया. सी पी एम का दबदबा इतना बढ गया था कि कुछ लोकप्रिय विरोधी दल के नेताओं का खून कराने के बाद भी पार्टी के नेताओं का कुछ नहीं हुआ. लोगों में पार्टी का भय इतना अधिक हो गया था कि लोग डर के मारे मुंह नहीं खोलते थे. ऐसे में धीरे धीरे एक विरोध जन जातियों में पैदा हुआ और जब मौका मिला सी पी एम के नेताओं और समर्थकों का सफाया शुरू हुआ. अब बदले हुए माहौल में सी पी एम के समर्थकों ने पहली बार जाना कि जान का भय क्या होता है. इस भय ने धीरे धीरे सी पी एम विरोधियों में साहस पैदा किया और विभिन्न इलाकों में सी पी एम के आतंक पैदा करने वाले दलीय आतंकवाद को हिंसक तरीके से चुनौती दी. अब इस प्रकार की हिंसा को कैसे देखा जाए?
इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि इस व्याख्या में दम है. आज सी पी एम बंगाल में रक्षात्मक मुद्रा में दिखलाई पड रही है तो इसका बडा कारण सी पी एम की न दिखलाई पडने वाली हिंसा (जिसने विरोधियों को आतंकित कर रखा था) का वैसा ही जवाब दिया जाना है. इन जन जातियों के नेताओं के प्रति सहानुभूति रखते हुए भी यह कहना पडेगा कि इस रास्ते से न कोई समाधान होगा और न ही जन जातियों को कोई राहत ही मिलेगी. होना यह चाहिए कि किसी मजबूरी में हिंसात्मक आन्दोलनों में आए लोगों को जैसे ही सुयोग मिले लोकतांत्रिक पद्धति की प्रक्रियाओं से जोड लिया जाना चाहिए. ऐसे उदाहरण दुनिया में बहुत हैं जिसमें हिंसा का रास्ता छोडकर लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुडे हैं. मिश्र से लेकर फिलिस्तीन तक ऐसे उदाहरण देखे जा सकते हैं. इस देश में पिछले वर्षों में नक्सलवादी आंदोलन का बहुत विस्तार हुआ है. आज सरकार इस तरह के आंदोलनों को देश की सुरक्षा के लिए बडा खतरा मान रही है और युद्ध स्तर पर इसका मुकाबला करने के लिए अपनी फौज को इस काम में लगाए हुए है. आए दिन नक्सली और सेना के बीच की मुठभेडों में दोनों ओर से मारे गये लोगों की तस्वीरें अखबारों में दिखलाई पडती हैं. ऐसे में कभी कभी लगता है कि अब इस देश के एक बडे हिस्से में राज्य और नक्सली अपने अपने अधिकार के लिए खूनी लडाईयाँ चलती रहेंगी. यह हो भी सकता है. लेकिन, यह अंतत: राज्य के द्वारा नक्सलियों के दमन में ही समाप्त होगा. इस बात को अगर ठीक से समझ लिया जाए तो संभव है देश के शांति प्रिय नेताओं की पहल का लाभ लेकर नक्सली लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल हों और अपना राजनैतिक आंदोलन चलाते रहें. अगर ऐसा नहीं हुआ तो सैकडों- हजारों पुलिसकर्मी और नक्सली इस हिंसा की भेंट चढ जायेंगे.
निश्चित ही राज्य को भी इसमें पहल करनी पडेगी. इतिहासकार हॉब्सबाम बताते हैं कि दुनिया के बहुत सारे देशों में राज्य सत्ता के समानांतर कई सत्ताएं उभर गयी हैं जो राज्य की सामरिक शक्ति से होड लेती हैं. उनका दमन राज्य कर ही ले यह जरूरी नहीं, जब तक ऐसा नहीं होता शांति बहाल नहीं हो सकती. राज्य अगर सिर्फ दमन करने के इरादे से काम करेगा तो संभव है यह कठिन प्रमाणित हो. ऐसे में दोनों ओर से पहल होनी चाहिए. मीडिया और संस्कृतिकर्मियों का भी यह दायित्व है कि वह हिंसा के मार्ग को एक विकल्प के रूप में देखने प्रवृत्ति का विरोध करे और लोगों में यह जागरूकता पैदा करे कि हिंसा से स्थायी राजनैतिक समाधान संभव नहीं. साथ ही राज्य पर भी दबाव बनाए कि हर तरह की हिंसा को आपराधिक हिंसा न माने और ऐसा सामाजिक माहौल बनाए जिसमें भय और अविश्वास कम हो. एक आधुनिक दृष्टि रखने वाली सरकार और आधुनिक बनने की होड में पिली जनता में यह विवेक तभी आ सकता है जब इस समाज और संस्कृति के उदात्त तत्त्वों के प्रति लोगों की जागरूकता बढे. चाहे जितना भी कठिन हो यह याद रखा जाना चाहिए कि इसी देश में सौ साल पहले एक अहिंसक राजनैतिक आंदोलन हुआ था जो विश्व का सबसे बड स्वाधीनता संग्राम था
Saturday, 28 August 2010
गनीमत है व्योम जी ने बंगाल को इस बार बख्सा !
कोलकाता के एक हिंदी कथाकार की भविष्यवाणियाँ पढते हुए कुछ समय बीत गया है. मुझे लगता है इस कथाकार की बातों को मित्रों के बीच रखा जाना चाहिए. लोगों को मज़ा आयेगा. हो सकता है इन बातों में अगर 'मेरिट' होगा (जिसे मुझ जैसा आदमी समझ नहीं पा रहा) तो लोग मुझे समझने में मदद करेंगे. ये महाशय नाम बदल बदल कर कभी राधेलाल तो कभी व्योम तो कभी दुबे बनकर अपने फ्यूचरिस्टिक सोच का प्रचार कर रहे हैं. बडी मेहनत कर रहे हैं पर हाय रे हिंदीवाले पूर्वांचली वे इन बातों को अभी तक ठीक से समझ नहीं सक रहे.
क्या हैं ये विचार. बातें तो उन्होंने बहुत घिनौने तरीके से भी कही हैं लेकिन ब्लॉग की गरिमा को ध्यान में रखते हुए एक ही छोटी टिप्पणी दे रहा हूं. आशा है लोग इस महान व्यक्ति के महान उद्गारों को समझने में मेरी मदद करेंमन भर आया,ग्लानि और पाप बोध के हिमालय के नीचे दबा पडा हूं। सचमुच हम औरत को ऐसे रखते हैं,दबा कर ,कुचल कर,बिस्तर और चादर की तरह…फिर अपने चारो ओर नजर दौडाई।
विश्वास के साथ कह सकता हूं कि ऐसा मैंने देखा नहीं-हो सकता है -वो नजर ही अल्लाह ने ना बख्शी हो। यह क्या प्रांत विशेष ,भाषा विशेष का सच हो सकता है,या भारत में यूनिवर्सल सच है। बिहार का सच पूरे भारत का सच नहीं है।पूरे हिंदी प्रदेश में भी साम्य नहीं है। कस्बे का सच महानगर का सच नहीं है। काम-काजी महिलाओं का सच सारी औरतों का सच ना हो?पढी लिखी होने के अपने पचडे हों,मह्त्वाकांक्षा क्या -क्या नहीं करवाती। महत्वाकांक्षा ना कह कर लालच-लोभ भी कह सकते हैं। अनप्रोडक्टिव महिला-पुरुष को कैरियर बनाने के लिये दुष्चक्र में फंसना पडता है। स्त्री थोडी ज्यादा वलनरेवल है ,पुरुष से। ये समस्या ‘गो पट्टी’ की ज्यादा है,मीडीया,कॉलेज,सरकारी नौकरी ,हिंदी,कस्बा,
(प्रदेश का नाम लेना ठीक नहीं होगा),ये सब मिल कर एक गोल बनाते हैं-जहां ये बीमारी महामारी का रूप ले चुकी है। बंगाल में ऐसा नहीं होता,शायद हरियाणा-राजस्थान,पंजाब में भी नहीं। दक्षिण भारत में भी नहीं । अब जिनके लिये अकादमिक कैम्पस ही भारत है,उनकी बात अलग है। जहां दूसरे रोजगार हैं,इटरप्योनोरशिप है ,उन्हें इस गलाजत के बगैर भी डिग्निटी सुलभ है। सरकारी नौकरी पाना जब लॉटरी लगने जैसा हो गया है,तो फिर लॉटरी की कीमत भी वसूली जाना घोर अपराध नहीं है। 5 साल जाने दीजिये सरकारी नौकरियों के लिये ‘सुपारी किलर’ तैनात होंगे। रेल मंत्रालय अगर गरीब मुल्क में 5-10 लाख मुवाअजा देने लगे तो लोग बाप -भाईयों-माता-बहनों को रेल से धक्का देकर हत्या पर उतारू होंगे। गरीब मुल्क है ना,खाई चौडी हो रही है,और पूरा समाज इस खाई में गिर कर मरेगा। :ps:सांसदों का वेतन पांच गुना बढ गया है,दुनिया के सरकारी चाकर एक हों।इंक्लाब जिंदाबाद
गे.
टिप्पणी देखें-
क्या हैं ये विचार. बातें तो उन्होंने बहुत घिनौने तरीके से भी कही हैं लेकिन ब्लॉग की गरिमा को ध्यान में रखते हुए एक ही छोटी टिप्पणी दे रहा हूं. आशा है लोग इस महान व्यक्ति के महान उद्गारों को समझने में मेरी मदद करेंमन भर आया,ग्लानि और पाप बोध के हिमालय के नीचे दबा पडा हूं। सचमुच हम औरत को ऐसे रखते हैं,दबा कर ,कुचल कर,बिस्तर और चादर की तरह…फिर अपने चारो ओर नजर दौडाई।
विश्वास के साथ कह सकता हूं कि ऐसा मैंने देखा नहीं-हो सकता है -वो नजर ही अल्लाह ने ना बख्शी हो। यह क्या प्रांत विशेष ,भाषा विशेष का सच हो सकता है,या भारत में यूनिवर्सल सच है। बिहार का सच पूरे भारत का सच नहीं है।पूरे हिंदी प्रदेश में भी साम्य नहीं है। कस्बे का सच महानगर का सच नहीं है। काम-काजी महिलाओं का सच सारी औरतों का सच ना हो?पढी लिखी होने के अपने पचडे हों,मह्त्वाकांक्षा क्या -क्या नहीं करवाती। महत्वाकांक्षा ना कह कर लालच-लोभ भी कह सकते हैं। अनप्रोडक्टिव महिला-पुरुष को कैरियर बनाने के लिये दुष्चक्र में फंसना पडता है। स्त्री थोडी ज्यादा वलनरेवल है ,पुरुष से। ये समस्या ‘गो पट्टी’ की ज्यादा है,मीडीया,कॉलेज,सरकारी नौकरी ,हिंदी,कस्बा,
(प्रदेश का नाम लेना ठीक नहीं होगा),ये सब मिल कर एक गोल बनाते हैं-जहां ये बीमारी महामारी का रूप ले चुकी है। बंगाल में ऐसा नहीं होता,शायद हरियाणा-राजस्थान,पंजाब में भी नहीं। दक्षिण भारत में भी नहीं । अब जिनके लिये अकादमिक कैम्पस ही भारत है,उनकी बात अलग है। जहां दूसरे रोजगार हैं,इटरप्योनोरशिप है ,उन्हें इस गलाजत के बगैर भी डिग्निटी सुलभ है। सरकारी नौकरी पाना जब लॉटरी लगने जैसा हो गया है,तो फिर लॉटरी की कीमत भी वसूली जाना घोर अपराध नहीं है। 5 साल जाने दीजिये सरकारी नौकरियों के लिये ‘सुपारी किलर’ तैनात होंगे। रेल मंत्रालय अगर गरीब मुल्क में 5-10 लाख मुवाअजा देने लगे तो लोग बाप -भाईयों-माता-बहनों को रेल से धक्का देकर हत्या पर उतारू होंगे। गरीब मुल्क है ना,खाई चौडी हो रही है,और पूरा समाज इस खाई में गिर कर मरेगा। :ps:सांसदों का वेतन पांच गुना बढ गया है,दुनिया के सरकारी चाकर एक हों।इंक्लाब जिंदाबाद
गे.
टिप्पणी देखें-
Tuesday, 10 August 2010
विष्णु खरे की भडास और हिंदी की गरिमा का प्रश्न
विष्णु खरे ने जनसत्ता में 10 और 11 अगस्त को जो कुछ लिखा है उससे और कुछ हुआ हो या नहीं हिंदी की गरिमा को ठेस लगी है. लगभग अराजक तरीके से राय-कालिया प्रश्न को अतिरेकी वक्तव्यों के साथ पेश करते हुए वे यह कह बैठे कि यह महाभारत है और जो उनके (विष्णु 'कृष्ण'?) साथ नहीं हैं वे कौरव दल (राय 'दुर्योधन' ?) के हैं. बगैर सिर पैर के वाक्यों और दक्षिण एशिया के समाज के बारे में सरलीकरणों से लदे इन लेखों में व्यक्तिगत आक्षेपों की ऐसी झडी लगा दी गई है कि पाठक यह समझ ही नहीं पाता है कि मुद्दा क्या है. अब इस वाक्यों को देखिए- " ...कैरियर को गतिशील बनाने के लिए संपादकों, आलोचकों, सहधर्माओं, प्रकाशकों, प्राध्यापकों और निजी तथा सार्वजनिक साहित्यिक-सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों के बीच कुछ ज्यादा ही सक्रिय है- यद्यपि यदि पुरूष लेखक वैसा करते हैं तो स्त्रियां क्यों न करें, लेकिन दक्षिण एशिया में औरत होने की ऎसी ट्रेजिडी है नीच '- और मैं समझता हूं कि नारी गरिमा के लिए कहीं भी अशोभनीय है और नैतिक रूप से संदिग्ध है. महिला लेखक कम से कम पुरूष लेखकों के पतन का अनुकरण न करें."
आप सिर धुनते रह जायेंगे और आपको यह समझ में नहीं आयेगा कि इस कथन को राय के कथन से कितना अलगा कर देखा जा सकता है. अंतर है भी तो कितने का?
अगर इस कथन को उनके उस कथन से जोड कर देखा जाए जिसमें उन्होंने हिंदी के पूर्वांचल (बिहार-उत्तर प्रदेश) के युवा लेखकों के खिलाफ अपनी भडास निकाली है- " दुर्भाग्यवश अब पिछले दो दशकों से हिंदी के पूर्वांचल से अत्यंत महात्वाकांक्षी, साहित्यिक नैतिकता और खुद्दारी से रहित बीसियों हुडकूलल्लू मार्का युवा लेखकों की एक ऐसी पीढी नमूदार हुई है जिसकी प्रतिबद्धता सिर्फ कहीं भी और किन्हीं भी शर्तों पर छपने से है."
क्या बच जाता है कहने को?
यह बहुत अच्छी बात है कि खरे साहब को वेश्या गमन की जरूरत नहीं पडी लेकिन इस बात को इस प्रसंग में लाने का क्या कोई औचित्य है?
हिन्दी से जुडे तमाम संगठनों के बारे में उनकी राय भी अतिरेकी है- "दक्षिण एशिया के वर्तमान सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक पतन के लिए मुख्यत: हिन्दी भाषी समाज यानी तथाकथित हिन्दी बुद्धिजीवी जिम्मेदार और कसूरवार है."
और भी कई ऐसे मुद्दे हैं जिसकी चर्चा इस भडास निकालने वाले आलेख में हैं. हिंदी का आम पाठक इन चर्चाओं से व्यथित होगा. कहते हैं कि विभूति नारायण राय जब कपिल सिब्बल से मिलने गये तो उन्होंने सिब्बल साहब को याद दिलाया कि जब मंटो पर अश्लीलता का मुकदमा चलाया गया था तो सिब्बल के पिता ने उनका केस लडा था. मंत्री जी ने जो उत्तर दिया वह दिलचस्प था- "पर मंटो उपाचार्य नहीं थे."
विष्णु खरे एक पढे लिखे और सम्मानित पत्रकार-चिंतक हैं. एक आम हिंदी वाला जब यह कहता है कि हिंदी विभाग 'चकलाघर' और 'पुरूष-वेश्याओं' के अड्डे हो गये हैं तो उसकी झल्लाहट को, उसकी खीज को समझने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन विष्णु खरे जब इस बात को कहते हैं तो उसके निहितार्थ होते हैं. यह अकारण नहीं है कि अशोक बाजपेयी से लेकर विष्णु खरे तक नामवर सिंह की चुप्पी का उल्लेख कर उसे 'शर्मनाक' घोषित करते हैं. जिस तरह की भाषा का प्रयोग विष्णु खरे ने जनसत्ता के संपादकीय पृष्ठ पर किया है उसे किसी भी तरह से भाषा का नैतिक प्रयोग नहीं कहा जा सकता है.
किसी भी लोकतंत्र में गलती करने और माफी मांगकर भूल सुधार करने का सुयोग होना चाहिए. सिर्फ मृत लोग गलतियां नही करते. जिस तरह से छिनाल शब्द के अनुचित प्रयोग के कारण विभूति नारायण राय और रवीन्द्र कालिया के विरूद्ध लोगों ने विरोध प्रगट किया वह प्रमाणित करता है कि सब लोग सब कुछ बर्दाश्त नहीं करेंगे. लेकिन, यह क्या कि इस ओट में आप एक संपादक को हटाने की और हिंदी के एक विश्वविद्यालय से सभी नैतिकता वाले हिंदी लेखकों के बायकॉट करने वालों का गिरोह तैयार कर लें. और वह भी भद्दे और कुत्सित भाषा में अभियान चलाकर.
जनसत्ता ने इस पूरे मसले पर विरोध का जो अभियान चलाया उसका औचित्य हो सकता है, लेकिन अब इस प्रसंग को सही परिप्रेक्ष्य देने की जरूरत है. इस प्रसंग का जिस तरह एक राजनेता लाभ लेने की सोच सकता है वैसे ही यह सोचना कि जो हमारे दल के साथ मत दे रहा है वही सही है. 'बाकी सब पर नजर रखा जाना चाहिए' वाला विष्णु खरे टाइप सोच अराजक और विध्वंसकारी प्रवृत्तियों को बढावा देगा. इस तरह के प्रचारात्मक लेखन से जनसत्ता की छवि को ठेस पहुंचती है.
[पुनश्च: खरे साहब को लगता होगा कि सिर्फ वही लोग इस प्रसंग में रवीन्द्र कालिया के 'पक्ष' में हस्ताक्षर करेंगे जिन्हें वर्धा का टिकट कटाना है या ज्ञानोदय में छपने की भूख है. मैंने इस भद्दे प्रकरण में हस्ताक्षर करने का निर्णय विष्णु खरे का आलेख (प्रथम भाग) पढने के बाद लिया. मैंने ज्ञानोदय में कभी अपना कुछ छपने नहीं भेजा. एक उपन्यास का ड्राफ्ट भेजा जो दो साल तक ज्ञानपीठ में पडा रहा. विचार भी नहीं किया गया. बाद में एक अन्य प्रकाशक ने इसे छापा. महात्मा गांधी विश्वविद्यालय मैं कभी गया नहीं. राय से मेरा कोई परिचय नहीं है. मैंने यह सिर्फ एक अन्यायपूर्ण तरीके से किए जा रहे अभियान का विरोध करने के लिए किया है. हिंदी में लोकतांत्रिक स्पेस बना रहे और लोग खुल कर बोल सकें, प्रतिवाद कर सकें ऐसी भावना रखता हूं. विष्णु खरे को विद्वान व्यक्ति और बडा कवि मानता हूं. मेरे इस प्रतिवाद का अर्थ उनका असम्मान करना नहीं है.]
हितेन्द्र पटेल इतिहास विभाग, रवींद्र भारती विश्वविद्यालय, 56 ए, बी टी रोड, कोलकाता 60.
विष्णु खरे ने जनसत्ता में 10 और 11 अगस्त को जो कुछ लिखा है उससे और कुछ हुआ हो या नहीं हिंदी की गरिमा को ठेस लगी है. लगभग अराजक तरीके से राय-कालिया प्रश्न को अतिरेकी वक्तव्यों के साथ पेश करते हुए वे यह कह बैठे कि यह महाभारत है और जो उनके (विष्णु 'कृष्ण'?) साथ नहीं हैं वे कौरव दल (राय 'दुर्योधन' ?) के हैं. बगैर सिर पैर के वाक्यों और दक्षिण एशिया के समाज के बारे में सरलीकरणों से लदे इन लेखों में व्यक्तिगत आक्षेपों की ऐसी झडी लगा दी गई है कि पाठक यह समझ ही नहीं पाता है कि मुद्दा क्या है. अब इस वाक्यों को देखिए- " ...कैरियर को गतिशील बनाने के लिए संपादकों, आलोचकों, सहधर्माओं, प्रकाशकों, प्राध्यापकों और निजी तथा सार्वजनिक साहित्यिक-सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों के बीच कुछ ज्यादा ही सक्रिय है- यद्यपि यदि पुरूष लेखक वैसा करते हैं तो स्त्रियां क्यों न करें, लेकिन दक्षिण एशिया में औरत होने की ऎसी ट्रेजिडी है नीच '- और मैं समझता हूं कि नारी गरिमा के लिए कहीं भी अशोभनीय है और नैतिक रूप से संदिग्ध है. महिला लेखक कम से कम पुरूष लेखकों के पतन का अनुकरण न करें."
आप सिर धुनते रह जायेंगे और आपको यह समझ में नहीं आयेगा कि इस कथन को राय के कथन से कितना अलगा कर देखा जा सकता है. अंतर है भी तो कितने का?
अगर इस कथन को उनके उस कथन से जोड कर देखा जाए जिसमें उन्होंने हिंदी के पूर्वांचल (बिहार-उत्तर प्रदेश) के युवा लेखकों के खिलाफ अपनी भडास निकाली है- " दुर्भाग्यवश अब पिछले दो दशकों से हिंदी के पूर्वांचल से अत्यंत महात्वाकांक्षी, साहित्यिक नैतिकता और खुद्दारी से रहित बीसियों हुडकूलल्लू मार्का युवा लेखकों की एक ऐसी पीढी नमूदार हुई है जिसकी प्रतिबद्धता सिर्फ कहीं भी और किन्हीं भी शर्तों पर छपने से है."
क्या बच जाता है कहने को?
यह बहुत अच्छी बात है कि खरे साहब को वेश्या गमन की जरूरत नहीं पडी लेकिन इस बात को इस प्रसंग में लाने का क्या कोई औचित्य है?
हिन्दी से जुडे तमाम संगठनों के बारे में उनकी राय भी अतिरेकी है- "दक्षिण एशिया के वर्तमान सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक पतन के लिए मुख्यत: हिन्दी भाषी समाज यानी तथाकथित हिन्दी बुद्धिजीवी जिम्मेदार और कसूरवार है."
और भी कई ऐसे मुद्दे हैं जिसकी चर्चा इस भडास निकालने वाले आलेख में हैं. हिंदी का आम पाठक इन चर्चाओं से व्यथित होगा. कहते हैं कि विभूति नारायण राय जब कपिल सिब्बल से मिलने गये तो उन्होंने सिब्बल साहब को याद दिलाया कि जब मंटो पर अश्लीलता का मुकदमा चलाया गया था तो सिब्बल के पिता ने उनका केस लडा था. मंत्री जी ने जो उत्तर दिया वह दिलचस्प था- "पर मंटो उपाचार्य नहीं थे."
विष्णु खरे एक पढे लिखे और सम्मानित पत्रकार-चिंतक हैं. एक आम हिंदी वाला जब यह कहता है कि हिंदी विभाग 'चकलाघर' और 'पुरूष-वेश्याओं' के अड्डे हो गये हैं तो उसकी झल्लाहट को, उसकी खीज को समझने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन विष्णु खरे जब इस बात को कहते हैं तो उसके निहितार्थ होते हैं. यह अकारण नहीं है कि अशोक बाजपेयी से लेकर विष्णु खरे तक नामवर सिंह की चुप्पी का उल्लेख कर उसे 'शर्मनाक' घोषित करते हैं. जिस तरह की भाषा का प्रयोग विष्णु खरे ने जनसत्ता के संपादकीय पृष्ठ पर किया है उसे किसी भी तरह से भाषा का नैतिक प्रयोग नहीं कहा जा सकता है.
किसी भी लोकतंत्र में गलती करने और माफी मांगकर भूल सुधार करने का सुयोग होना चाहिए. सिर्फ मृत लोग गलतियां नही करते. जिस तरह से छिनाल शब्द के अनुचित प्रयोग के कारण विभूति नारायण राय और रवीन्द्र कालिया के विरूद्ध लोगों ने विरोध प्रगट किया वह प्रमाणित करता है कि सब लोग सब कुछ बर्दाश्त नहीं करेंगे. लेकिन, यह क्या कि इस ओट में आप एक संपादक को हटाने की और हिंदी के एक विश्वविद्यालय से सभी नैतिकता वाले हिंदी लेखकों के बायकॉट करने वालों का गिरोह तैयार कर लें. और वह भी भद्दे और कुत्सित भाषा में अभियान चलाकर.
जनसत्ता ने इस पूरे मसले पर विरोध का जो अभियान चलाया उसका औचित्य हो सकता है, लेकिन अब इस प्रसंग को सही परिप्रेक्ष्य देने की जरूरत है. इस प्रसंग का जिस तरह एक राजनेता लाभ लेने की सोच सकता है वैसे ही यह सोचना कि जो हमारे दल के साथ मत दे रहा है वही सही है. 'बाकी सब पर नजर रखा जाना चाहिए' वाला विष्णु खरे टाइप सोच अराजक और विध्वंसकारी प्रवृत्तियों को बढावा देगा. इस तरह के प्रचारात्मक लेखन से जनसत्ता की छवि को ठेस पहुंचती है.
[पुनश्च: खरे साहब को लगता होगा कि सिर्फ वही लोग इस प्रसंग में रवीन्द्र कालिया के 'पक्ष' में हस्ताक्षर करेंगे जिन्हें वर्धा का टिकट कटाना है या ज्ञानोदय में छपने की भूख है. मैंने इस भद्दे प्रकरण में हस्ताक्षर करने का निर्णय विष्णु खरे का आलेख (प्रथम भाग) पढने के बाद लिया. मैंने ज्ञानोदय में कभी अपना कुछ छपने नहीं भेजा. एक उपन्यास का ड्राफ्ट भेजा जो दो साल तक ज्ञानपीठ में पडा रहा. विचार भी नहीं किया गया. बाद में एक अन्य प्रकाशक ने इसे छापा. महात्मा गांधी विश्वविद्यालय मैं कभी गया नहीं. राय से मेरा कोई परिचय नहीं है. मैंने यह सिर्फ एक अन्यायपूर्ण तरीके से किए जा रहे अभियान का विरोध करने के लिए किया है. हिंदी में लोकतांत्रिक स्पेस बना रहे और लोग खुल कर बोल सकें, प्रतिवाद कर सकें ऐसी भावना रखता हूं. विष्णु खरे को विद्वान व्यक्ति और बडा कवि मानता हूं. मेरे इस प्रतिवाद का अर्थ उनका असम्मान करना नहीं है.]
हितेन्द्र पटेल इतिहास विभाग, रवींद्र भारती विश्वविद्यालय, 56 ए, बी टी रोड, कोलकाता 60.
माफी मांगें विष्णु खरे
विभूति नारायण राय ने तो माफी मांग ली अब देखना है विष्णु खरे क्या करते हैं
विभूति नारायण राय ने 'छिनाल' शब्द का आपत्तिजनक प्रयोग किया और उन्हें प्रतिवाद के सामने अंतत: माफी मांगनी पडी. जिसने भी वह इंटरव्यू ठीक से पढा होगा उन्हें यह पता होगा कि उस टिप्पणी का एक संदर्भ था, लेकिन उनके वक्तव्य से युवा लेखिकाओं की भावना को ठेस लगती है इस आरोप के कारण ही राय को प्रतिवाद के सम्मुखीन होना पडा. इस तर्क को अगर माना जाए तो विष्णु खरे के लेख से तो हिन्दी समाज के तमाम लोगों का ही अपमान करने की कोशिश की गयी है. जिस असभ्य तरीके से खरे ने पूर्वांचल के युवा लेखकों के बारे में एक आपत्तिजनक शब्द का प्रयोग किया है उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए कम है.
जब से विभूति नारायण राय का इंटरव्यू आया है एक मुहिम जनसत्ता से लेकर तमाम जगहों में शुरू हो गयी है. साहित्य में प्रमाद 1 (जनसत्ता 10 अगस्त) के आते आते यह स्पष्ट हो गया है कि हिन्दी के कुछ लोग अपने राग-द्वेष को छुपाकर अपनी कुंठाओं को व्यक्त करने का ऐसा मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते. विष्णु खरे को एक प्रखर बुद्धिजीवी के रूप में जानने वालों के लिए 'साहित्य में प्रमाद' प्रसंग 'छिनाल प्रसंग' से कम कुत्सित नहीं लगेगा. खरे ने जिस अराजक सोच के साथ विभूति नारायण राय प्रसंग को अपनी कुंठाजनित सोच से जोडा है उसके भौंडे प्रदर्शन को इस लेख में देखकर हिन्दी के एक कवि के ऐसे घोर पतन पर रोया ही जा सकता है. जिस भाषा का प्रयोग उन्होंने हिन्दी के यशस्वी विद्वानों के लिए किया है वह उनकी कुंठाओं को सामने लाने वाला है. खरे ने अंग्रेज़ी की किताबें पढी हैं और यूरोपीय ज्ञान से जुडने के बाद बहुत सारे लोगों को अपने देश के लोग गंवार और अपनी भाषा के विद्वान 'मीडियाकर' लगने लगते हैं. उन्हें मन ही मन इस बात की कचोट रहती है कि उन्हें हिन्दी समाज के लोग वो सब कुछ क्यों नहीं दिलाते जो अंग्रेज़ी वालों को इस देश में मिलता है. मेरा अनुमान है कि विष्णु जी रामविलास शर्मा को बहुत ही 'ओवरैस्टिमेटेड मीडियॉकर' से ज्यादा नहीं मानते होंगे. खरे साहब का यह हाल है कि वे 'विनाश काले विपरीत बुद्धि' तक भी यूनान की कहावत से आते हैं. पता नहीं कैसे खरे इस बात से अपनी बात शुरू करने का दंभ दिखाते हैं कि उन्होंने अपने 'पूर्वाग्रहों ' के कारण विभूति नारायण राय के सानिध्य से बचे ! वह यह बतलाना चाहते हैं कि वे कितने पाक दामन हैं. हिंदी की सारी दुनिया फंतासियों में जीने वाली, कल्पनातीत अपात्र वेतनमान के साथ यौनशोषण को बढावा देने वाली दिखलाई पडती है. यहीं तक नहीं वे मानते हैं कि अनेक हिन्दी विभागों को पुरूष वेश्याओं के चकले बन गये हैं ! हिन्दी की अनैतिक साहित्यिक सत्ता प्रकरण पर आने के पहले वे रामचन्द्र शुक्ल से लेकर सुधीश पचौरी जैसे "अकादमिक बौने छुटभैयों" का उल्लेख करना नहीं भूलते. खरे साहब इस बात के लिए याद किए जाने चाहिए कि उन्हें इस बात का अहसास है कि "दक्षिण एशिया के वर्तमान सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक पतन के लिए मुख्यत: हिन्दी भाषी समाज यानी तथाकथित हिन्दी बुद्धिजीवी जिम्मेदार और कसूरवार है." जिस थाली में खाओ उसी में छेद करो के ऐसे उदाहरण कम ही मिलेंगे.
मुझे लगता है कि विष्णु खरे की सबसे महत्त्वपूर्ण टिप्पणी यह है - " दुर्भाग्यवश अब पिछले दो दशकों से हिंदी के पूर्वांचल से अत्यंत महात्वाकांक्षी, साहित्यिक नैतिकता और खुद्दारी से रहित बीसियों हुडकूलल्लू मार्का युवा लेखकों की एक ऐसी पीढी नमूदार हुई है जिसकी प्रतिबद्धता सिर्फ कहीं भी और किन्हीं भी शर्तों पर छपने से है."
यह कैसे क्षम्य है, इसका जवाब खरे से मांगा जाना चाहिए. यह टिप्पणी कैसे राज ठाकरे की टिप्पणी से गुणात्मक रूप से भिन्न है, और इस टिप्पणी के लिए क्यों विष्णु खरे को माफी नहीं मांगनी चाहिए?
हिन्दी का पूर्वांचल कहां है और कौन कौन से लोग खरे को दिखलाई पड रहे हैं जो हिन्दी के अन्य क्षेत्रों की तुलना में नैतिकता विहीन हैं.
एक बार अगर यह मान भी लिया जाए कि हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि-पत्रकार विष्णु खरे ने अपनी बात दर्द से अपनों से तीखे ढंग से की है तो भी इन वक्तव्यों के पीछे छिपी कुठाएं हमें यह बतलाती हैं कि वे बौखलाए हुए दंभी दिल्ली के ऐसे बुद्धिजीवी हैं जिन्हें इस बात की खबर नहीं है कि ऐसे चालाक-चतुर सठिया गये होने का अंदाजा नहीं है.
हिन्दी विभाग और हिन्दी से जुडी संस्थाएं सबकुछ ठीक से कर रही हैं ऐसा मानने वाला कोई नहीं होगा लेकिन क्या हिंदी के जुडते ही कोई विभाग, कोई संस्थान, कोई राज्य या कोई बुद्धिजीवी घटिया और नैतिकताविहीन हो जाता है? मैकॉले और नीरद चौधरी की संतानें ऐसा कहें तो हम समझ सकते हैं लेकिन एक ऐसे व्यक्ति की कलम से इस तरह के भाव का आना हमें व्यथित करता है.
जनसत्ता में इस तरह के लेख का छपना बगैर प्रतिवाद के नहीं जाना चाहिए. विभूति नारायण राय के प्रसंग में जनसत्ता के साथ चलकर विष्णु खरे अपने अतिवादी अराजक सोच को भी उसके साथ नत्थी करने की जो कोशिश कर रहे हैं वह निंदनीय है. उन्हें माफी मांगनी चाहिए.
विभूति नारायण राय ने 'छिनाल' शब्द का आपत्तिजनक प्रयोग किया और उन्हें प्रतिवाद के सामने अंतत: माफी मांगनी पडी. जिसने भी वह इंटरव्यू ठीक से पढा होगा उन्हें यह पता होगा कि उस टिप्पणी का एक संदर्भ था, लेकिन उनके वक्तव्य से युवा लेखिकाओं की भावना को ठेस लगती है इस आरोप के कारण ही राय को प्रतिवाद के सम्मुखीन होना पडा. इस तर्क को अगर माना जाए तो विष्णु खरे के लेख से तो हिन्दी समाज के तमाम लोगों का ही अपमान करने की कोशिश की गयी है. जिस असभ्य तरीके से खरे ने पूर्वांचल के युवा लेखकों के बारे में एक आपत्तिजनक शब्द का प्रयोग किया है उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए कम है.
जब से विभूति नारायण राय का इंटरव्यू आया है एक मुहिम जनसत्ता से लेकर तमाम जगहों में शुरू हो गयी है. साहित्य में प्रमाद 1 (जनसत्ता 10 अगस्त) के आते आते यह स्पष्ट हो गया है कि हिन्दी के कुछ लोग अपने राग-द्वेष को छुपाकर अपनी कुंठाओं को व्यक्त करने का ऐसा मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते. विष्णु खरे को एक प्रखर बुद्धिजीवी के रूप में जानने वालों के लिए 'साहित्य में प्रमाद' प्रसंग 'छिनाल प्रसंग' से कम कुत्सित नहीं लगेगा. खरे ने जिस अराजक सोच के साथ विभूति नारायण राय प्रसंग को अपनी कुंठाजनित सोच से जोडा है उसके भौंडे प्रदर्शन को इस लेख में देखकर हिन्दी के एक कवि के ऐसे घोर पतन पर रोया ही जा सकता है. जिस भाषा का प्रयोग उन्होंने हिन्दी के यशस्वी विद्वानों के लिए किया है वह उनकी कुंठाओं को सामने लाने वाला है. खरे ने अंग्रेज़ी की किताबें पढी हैं और यूरोपीय ज्ञान से जुडने के बाद बहुत सारे लोगों को अपने देश के लोग गंवार और अपनी भाषा के विद्वान 'मीडियाकर' लगने लगते हैं. उन्हें मन ही मन इस बात की कचोट रहती है कि उन्हें हिन्दी समाज के लोग वो सब कुछ क्यों नहीं दिलाते जो अंग्रेज़ी वालों को इस देश में मिलता है. मेरा अनुमान है कि विष्णु जी रामविलास शर्मा को बहुत ही 'ओवरैस्टिमेटेड मीडियॉकर' से ज्यादा नहीं मानते होंगे. खरे साहब का यह हाल है कि वे 'विनाश काले विपरीत बुद्धि' तक भी यूनान की कहावत से आते हैं. पता नहीं कैसे खरे इस बात से अपनी बात शुरू करने का दंभ दिखाते हैं कि उन्होंने अपने 'पूर्वाग्रहों ' के कारण विभूति नारायण राय के सानिध्य से बचे ! वह यह बतलाना चाहते हैं कि वे कितने पाक दामन हैं. हिंदी की सारी दुनिया फंतासियों में जीने वाली, कल्पनातीत अपात्र वेतनमान के साथ यौनशोषण को बढावा देने वाली दिखलाई पडती है. यहीं तक नहीं वे मानते हैं कि अनेक हिन्दी विभागों को पुरूष वेश्याओं के चकले बन गये हैं ! हिन्दी की अनैतिक साहित्यिक सत्ता प्रकरण पर आने के पहले वे रामचन्द्र शुक्ल से लेकर सुधीश पचौरी जैसे "अकादमिक बौने छुटभैयों" का उल्लेख करना नहीं भूलते. खरे साहब इस बात के लिए याद किए जाने चाहिए कि उन्हें इस बात का अहसास है कि "दक्षिण एशिया के वर्तमान सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक पतन के लिए मुख्यत: हिन्दी भाषी समाज यानी तथाकथित हिन्दी बुद्धिजीवी जिम्मेदार और कसूरवार है." जिस थाली में खाओ उसी में छेद करो के ऐसे उदाहरण कम ही मिलेंगे.
मुझे लगता है कि विष्णु खरे की सबसे महत्त्वपूर्ण टिप्पणी यह है - " दुर्भाग्यवश अब पिछले दो दशकों से हिंदी के पूर्वांचल से अत्यंत महात्वाकांक्षी, साहित्यिक नैतिकता और खुद्दारी से रहित बीसियों हुडकूलल्लू मार्का युवा लेखकों की एक ऐसी पीढी नमूदार हुई है जिसकी प्रतिबद्धता सिर्फ कहीं भी और किन्हीं भी शर्तों पर छपने से है."
यह कैसे क्षम्य है, इसका जवाब खरे से मांगा जाना चाहिए. यह टिप्पणी कैसे राज ठाकरे की टिप्पणी से गुणात्मक रूप से भिन्न है, और इस टिप्पणी के लिए क्यों विष्णु खरे को माफी नहीं मांगनी चाहिए?
हिन्दी का पूर्वांचल कहां है और कौन कौन से लोग खरे को दिखलाई पड रहे हैं जो हिन्दी के अन्य क्षेत्रों की तुलना में नैतिकता विहीन हैं.
एक बार अगर यह मान भी लिया जाए कि हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि-पत्रकार विष्णु खरे ने अपनी बात दर्द से अपनों से तीखे ढंग से की है तो भी इन वक्तव्यों के पीछे छिपी कुठाएं हमें यह बतलाती हैं कि वे बौखलाए हुए दंभी दिल्ली के ऐसे बुद्धिजीवी हैं जिन्हें इस बात की खबर नहीं है कि ऐसे चालाक-चतुर सठिया गये होने का अंदाजा नहीं है.
हिन्दी विभाग और हिन्दी से जुडी संस्थाएं सबकुछ ठीक से कर रही हैं ऐसा मानने वाला कोई नहीं होगा लेकिन क्या हिंदी के जुडते ही कोई विभाग, कोई संस्थान, कोई राज्य या कोई बुद्धिजीवी घटिया और नैतिकताविहीन हो जाता है? मैकॉले और नीरद चौधरी की संतानें ऐसा कहें तो हम समझ सकते हैं लेकिन एक ऐसे व्यक्ति की कलम से इस तरह के भाव का आना हमें व्यथित करता है.
जनसत्ता में इस तरह के लेख का छपना बगैर प्रतिवाद के नहीं जाना चाहिए. विभूति नारायण राय के प्रसंग में जनसत्ता के साथ चलकर विष्णु खरे अपने अतिवादी अराजक सोच को भी उसके साथ नत्थी करने की जो कोशिश कर रहे हैं वह निंदनीय है. उन्हें माफी मांगनी चाहिए.
Labels:
जनसत्ता,
पूर्वांचल,
विभूति नारायण राय,
विष्णु खरे
Wednesday, 4 August 2010
Sunday, 1 August 2010
जगदीश्वर चतुर्वेदीद्वारा ‘डिजिटल’ मनमोहन सिंह का मूल्यांकन
मनमोहन सिंह जब से प्रधानमंत्री बने हैं। वे मीडिया और विशेषज्ञों की आलोचना में नहीं आते। उन्हें प्रधानमंत्री बने 6 साल से ज्यादा समय हो गया है। मीडिया में ममता बनर्जी,शरद पवार ,प्रफुल्ल पटेल ,डी.राजा ,कांग्रेस के क्षेत्रीय नेताओं ,कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों आदि की आलोचना दिखेगी लेकिन मनमोहन सिंह की आलोचना नहीं मिलेगी। ऐसा क्यों हो रहा है कि आलोचना के केन्द्र से मनमोहन सिंह गायब हैं। आकाश छूती मंहगाई है लेकिन प्रधानमंत्री पर न तो मीडिया हमला कर रहा है और न विपक्ष। असल में मनमोहन सिंह डिजिटल हो गए हैं। उनका डिजिटल इमेज में रूपान्तरण कर दिया गया है। डिजिटल इमेज और राजनीतिक व्यक्तित्व की इमेज में यही अंतर होता है। राजनीतिक इमेज को पकड़ सकते हैं लेकिन डिजिटल इमेज को पकड़ नहीं सकते।
मनमोहन सिंह ने जब पहलीबार ‘यूपीए -1’ के प्रधानमंत्री का दायित्व संभाला तो उस समय दो महत्वपूर्ण बातें घटित हुईं, पहली, सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इंकार किया और मनमोहन सिंह का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया।
दूसरी बड़ी घटना यह हुई कि मनमोहन सिंह सिख थे, नव्य-उदारतावादी नीतियों के निर्माता थे। इनमें उनका सिख होना बेहद महत्वपूर्ण माना गया। यह भी कहा गया कि कांग्रेस कितनी महान पार्टी है कि उसने एक औरत को पार्टी का अध्यक्ष बनाया और एक सिख को प्रधानमंत्री बनाया। ये दोनों ही बातें तथ्य के रूप में सही हैं लेकिन सिख और औरत के नाते सही नहीं हैं। सोनिया को औरत के नाते अध्यक्ष नहीं बनाया गया। मनमोहन सिंह सिख के नाते प्रधानमंत्री नहीं बने। इन दोनों का औरत और सिख वाला रूप सिर्फ प्रतीकात्मक है। असल तो राजनीति है और राजनीतिक इमेज है जिसने इन्हें अध्यक्ष और प्रधानमंत्री बनाया। राजनीति में एक ही अस्मिता होती है वह है राजनीतिज्ञ की। समस्त अस्मिताएं इसमें समा जाती हैं या फिर अप्रासंगिक हो जाती हैं।
मनमोहन सिंह का व्यक्तित्व अनेक गुणों से परिपूर्ण है। वे बेहद विनम्र हैं, सुसंस्कृत है,शिक्षित हैं। नव्य -उदार नीतियों का उन्हें विश्व में बेहतरीन विशेषज्ञ माना जाता है। उन्होंने अपनी नीतियों के कुफल और सुफल दोनों से प्रभावित किया है। मीडिया में मनमोहन सिंह के बारे में न्यूनतम बातें छपती हैं। संभवतः मीडिया में उन्हें सबसे कम कवरेज वाले प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाएगा।
सवाल यह है कि डिजिटल युग में मनमोहन का कोड क्या है ? मनमोहन कोड को खोले बिना उनकी डिजिटल युग की छायाओं की सही भाषा को समझने में मदद नहीं मिलेगी। पहली समस्या है कि क्या मनमोहन कोड जैसी कोई चीज है ? हमारे देश में विद्वानों की कमी नहीं है जो इस तरह के किसी भी कोड की उपस्थिति को अस्वीकार करें।
भारत में सन् 1980 के दौर में पंजाब में जिस तरह का आतंकी दौर था और ब्लू स्टार ऑपरेशन हुआ,श्रीमती गांधी की एक सिख के हाथों हत्या हुई और बाद में संगठित सिख जनसंहार हुआ, उसे देखते हुए मनमोहन सिंह का क्रमशः सत्ता के शिखर पर पहुँचना निश्चित ही बड़ी बात है। लेकिन इस प्रक्रिया में कहीं से भी उनका सिख होना कारक या समस्या नहीं था।
भारत की बहुलतावादी संरचनाएं इतनी ताकतवर हैं कि उन्होंने जाति और धर्म के आधार को कमजोर कर दिया है। धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक संस्कृति का तानाबाना जिस तरह विकसित हुआ है उसने आधुनिक सोच और आधुनिक व्यवहार की मजबूत नींव रखी है। भारत में धार्मिक और साम्प्रदायिक पहचान का वर्चस्व खत्म हुआ है। अब मनमोहन सिंह के पास सिख के नाम पर दाढ़ी और पगड़ी ही चिह्न के रूप में बची है।
सवाल उठता है क्या मनमोहन सिंह को सिख अस्मिता के रूप में देखें ? या फिर उनकी शिक्षा-दीक्षा, उनके जीवनानुभवों की कहानियों, माइथोलॉजी,इमेज,संवेदना,वैज्ञानिक विमर्श आदि को भी देखें। क्या इतनी चीजों को मिलाकर देखने से मनमोहन सिंह का सिखभाव बचा रहेगा ?
क्या मनमोहन के दृश्य और अदृश्य जीवन की इमेजों के आधार पर उनके सिख को परिभाषित कर सकते हैं ?क्या उससे सिख निकलेगा ?मूल समस्या यह है कि क्या मनमोहन सिंह सिख हैं ? इसबार के लोकसभा चुनाव में पंजाब के सिखों ने कांग्रेस को ज्यादा संसदीय सीटें जीताकर दीं। क्या इस तरह की जीत को सिख मनमोहन के व्यक्तित्व से जोड़कर देख सकते हैं ?
कांग्रेस ने अपने प्रचार में सोनिया-मनमोहन और राहुल गांधी के त्रिगुट की इमेज का इस्तेमाल किया था। इस त्रिमूर्ति की विजुअल इमेज किसी भी तरह के नस्ल संबंधी संकेत का प्रचार नहीं करती। लेकिन इस त्रिमूर्ति की इमेज का डिजिटल रूपों में जिस तरह प्रचार किया गया उसमें एक नए किस्म का स्पेस -टाइम संबंध उभकर आया है। नई डिजिटल इमेज एक ही साथ मिथकीय और ऐतिहासिक होती है। अतीतपंथी और भविष्योन्मुखी होती है। तकनीकीपरक और धार्मिक होती है।
मनमोहन सिंह ने अपने प्रचार में बार-बार समृद्ध भारत और समर्थ भारत की बात की है। बार-बार विकासदर को उछाला है। अपने को समृद्धि के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। खासकर पूंजीपति,ह्वाइट कॉलर और मध्यवर्ग के साथ जोड़ा है। इस क्रम में उन्होंने मजदूरों-किसानों की राजनीति को हाशिए पर ड़ालने में सफलता अर्जित की है।
मनमोहन सिंह भारत के अकेले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने कभी मजदूरों-किसानों को सम्बोधित नहीं किया है। मनमोहन की इमेज से मजदूरों-किसानों का दूर रहना जितना दृश्य है उससे भी ज्यादा दृश्यगत है उनका किसानों का ऋण माफ करना। यह ऐसा पैसा था जो डूब गया था,जिसकी वसूली संभव नहीं थी, अतः उसे माफ करके उन्होंने पूंजीवाद के हित में बड़ा कदम उठाया। इस फैसले से किसानों को कम और बैंकों को ज्यादा लाभ पहुँचा है।
मनमोहन कोड की विशेषता है कि उसने गरीबी के यथार्थ विमर्श को वायवीय बना दिया है। गरीबी और अभाव को एकसिरे से अपदस्थ कर दिया है। मनमोहन कोड ने गरीबी और अभाव को अप्रत्यक्ष दानव में रूपान्तरित कर दिया है। जिसके बारे में आप सिर्फ कभी-कभार सुन सकते हैं। मनमोहन कोड के लिए गरीबी और अभाव कभी महान समस्या नहीं रहे। उनके लिए वे ठोस सामाजिक वर्ग भी समस्या नहीं रहे जिनके कारण गरीबी और अभाव कम होने की बजाय बढ़ रहे हैं। मनमोहन कोड ने देश की एकता और अखंडता के लिए सबसे खतरनाक शत्रु के रूप में माओवाद को प्रतिष्ठित किया है। जबकि माओवाद भारत विभाजन या सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा नहीं है।
मनमोहन कोड की काल्पनिक सृष्टि है माओवाद और आतंकी हिन्दू। यह जादुई-मिथकीय शत्रु है। मनमोहन कोड के अनुयायी और प्रचारक माओवाद के बारे में तरह-तरह की दंतकथाएं, किंवदन्तियां आदि प्रचारित कर रहे हैं। मीडिया में माओवाद एक मिथकीय महामानव है। इसी तर्ज पर आरएसएस के नाम पर बहुत सारे आतंकी हिन्दू महामानव पैदा कर दिए गए हैं। ये सारे मनमोहन कोड से सृजित वर्चुअल सामाजिक शत्रु हैं। ये आधे मानव और आधे दानव हैं।
माओवाद और हिन्दू आतंकवाद की रोचक डिजिटल कहानियां आए दिन सम्प्रेषित की जा रही हैं। इन्हें सामाजिक विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। आप जरा गौर से माओवादी नेता किशनजी की कपड़ा मुँह पर ढ़ंके इमेज और हिन्दू आतंकी के रूप में पकड़े गए संतों को ध्यान से देखें तो इनमें आप आधे मनुष्य और आधे प्राचीन मनुष्य की इमेज के दर्शन पाएंगे।
कारपोरेट मीडिया माओवादी और हिन्दू आतंकी की ऐसी इमेज पेश कर रहा है गोया कोई फोरेंसिक रिपोर्ट पेश कर रहा हो। वे इनके शरीर की ऐसी इमेज पेश कर रहे हैं जिससे ये आधे मनुष्य और आधे शैतान लगें। इससे वे खतरे और भय का विचारधारात्मक प्रभाव पैदा कर रहे हैं।
मनमोहन सिंह मीडिया में उतने नजर नहीं आते जितना इन दिनों डिजिटल दानवों (माओवाद और हिन्दू आतंकी) को पेश किया जा रहा है। हमें इस कोड को खोलना चाहिए। यह तकरीबन वैसे ही है जैसे अमेरिका ने तालिबान और विन लादेन की इमेजों के प्रचार-प्रसार के जरिए सारी दुनिया को तथाकथित आतंकवाद विरोधी मुहिम में झोंक दिया और तबाही पैदा की गयी। सामाजिक अस्थिरता पैदा की गयी। घृणा का वातावरण पैदा किया गया। ठीक यही काम मनमोहन कोड अपने डिजिटल शत्रुओं के प्रचार-प्रसार के नाम पर कर रहा है। हमें जागरूक रहने की जरूरत है।
मनमोहन सिंह ने जब पहलीबार ‘यूपीए -1’ के प्रधानमंत्री का दायित्व संभाला तो उस समय दो महत्वपूर्ण बातें घटित हुईं, पहली, सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इंकार किया और मनमोहन सिंह का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया।
दूसरी बड़ी घटना यह हुई कि मनमोहन सिंह सिख थे, नव्य-उदारतावादी नीतियों के निर्माता थे। इनमें उनका सिख होना बेहद महत्वपूर्ण माना गया। यह भी कहा गया कि कांग्रेस कितनी महान पार्टी है कि उसने एक औरत को पार्टी का अध्यक्ष बनाया और एक सिख को प्रधानमंत्री बनाया। ये दोनों ही बातें तथ्य के रूप में सही हैं लेकिन सिख और औरत के नाते सही नहीं हैं। सोनिया को औरत के नाते अध्यक्ष नहीं बनाया गया। मनमोहन सिंह सिख के नाते प्रधानमंत्री नहीं बने। इन दोनों का औरत और सिख वाला रूप सिर्फ प्रतीकात्मक है। असल तो राजनीति है और राजनीतिक इमेज है जिसने इन्हें अध्यक्ष और प्रधानमंत्री बनाया। राजनीति में एक ही अस्मिता होती है वह है राजनीतिज्ञ की। समस्त अस्मिताएं इसमें समा जाती हैं या फिर अप्रासंगिक हो जाती हैं।
मनमोहन सिंह का व्यक्तित्व अनेक गुणों से परिपूर्ण है। वे बेहद विनम्र हैं, सुसंस्कृत है,शिक्षित हैं। नव्य -उदार नीतियों का उन्हें विश्व में बेहतरीन विशेषज्ञ माना जाता है। उन्होंने अपनी नीतियों के कुफल और सुफल दोनों से प्रभावित किया है। मीडिया में मनमोहन सिंह के बारे में न्यूनतम बातें छपती हैं। संभवतः मीडिया में उन्हें सबसे कम कवरेज वाले प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाएगा।
सवाल यह है कि डिजिटल युग में मनमोहन का कोड क्या है ? मनमोहन कोड को खोले बिना उनकी डिजिटल युग की छायाओं की सही भाषा को समझने में मदद नहीं मिलेगी। पहली समस्या है कि क्या मनमोहन कोड जैसी कोई चीज है ? हमारे देश में विद्वानों की कमी नहीं है जो इस तरह के किसी भी कोड की उपस्थिति को अस्वीकार करें।
भारत में सन् 1980 के दौर में पंजाब में जिस तरह का आतंकी दौर था और ब्लू स्टार ऑपरेशन हुआ,श्रीमती गांधी की एक सिख के हाथों हत्या हुई और बाद में संगठित सिख जनसंहार हुआ, उसे देखते हुए मनमोहन सिंह का क्रमशः सत्ता के शिखर पर पहुँचना निश्चित ही बड़ी बात है। लेकिन इस प्रक्रिया में कहीं से भी उनका सिख होना कारक या समस्या नहीं था।
भारत की बहुलतावादी संरचनाएं इतनी ताकतवर हैं कि उन्होंने जाति और धर्म के आधार को कमजोर कर दिया है। धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक संस्कृति का तानाबाना जिस तरह विकसित हुआ है उसने आधुनिक सोच और आधुनिक व्यवहार की मजबूत नींव रखी है। भारत में धार्मिक और साम्प्रदायिक पहचान का वर्चस्व खत्म हुआ है। अब मनमोहन सिंह के पास सिख के नाम पर दाढ़ी और पगड़ी ही चिह्न के रूप में बची है।
सवाल उठता है क्या मनमोहन सिंह को सिख अस्मिता के रूप में देखें ? या फिर उनकी शिक्षा-दीक्षा, उनके जीवनानुभवों की कहानियों, माइथोलॉजी,इमेज,संवेदना,वैज्ञानिक विमर्श आदि को भी देखें। क्या इतनी चीजों को मिलाकर देखने से मनमोहन सिंह का सिखभाव बचा रहेगा ?
क्या मनमोहन के दृश्य और अदृश्य जीवन की इमेजों के आधार पर उनके सिख को परिभाषित कर सकते हैं ?क्या उससे सिख निकलेगा ?मूल समस्या यह है कि क्या मनमोहन सिंह सिख हैं ? इसबार के लोकसभा चुनाव में पंजाब के सिखों ने कांग्रेस को ज्यादा संसदीय सीटें जीताकर दीं। क्या इस तरह की जीत को सिख मनमोहन के व्यक्तित्व से जोड़कर देख सकते हैं ?
कांग्रेस ने अपने प्रचार में सोनिया-मनमोहन और राहुल गांधी के त्रिगुट की इमेज का इस्तेमाल किया था। इस त्रिमूर्ति की विजुअल इमेज किसी भी तरह के नस्ल संबंधी संकेत का प्रचार नहीं करती। लेकिन इस त्रिमूर्ति की इमेज का डिजिटल रूपों में जिस तरह प्रचार किया गया उसमें एक नए किस्म का स्पेस -टाइम संबंध उभकर आया है। नई डिजिटल इमेज एक ही साथ मिथकीय और ऐतिहासिक होती है। अतीतपंथी और भविष्योन्मुखी होती है। तकनीकीपरक और धार्मिक होती है।
मनमोहन सिंह ने अपने प्रचार में बार-बार समृद्ध भारत और समर्थ भारत की बात की है। बार-बार विकासदर को उछाला है। अपने को समृद्धि के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। खासकर पूंजीपति,ह्वाइट कॉलर और मध्यवर्ग के साथ जोड़ा है। इस क्रम में उन्होंने मजदूरों-किसानों की राजनीति को हाशिए पर ड़ालने में सफलता अर्जित की है।
मनमोहन सिंह भारत के अकेले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने कभी मजदूरों-किसानों को सम्बोधित नहीं किया है। मनमोहन की इमेज से मजदूरों-किसानों का दूर रहना जितना दृश्य है उससे भी ज्यादा दृश्यगत है उनका किसानों का ऋण माफ करना। यह ऐसा पैसा था जो डूब गया था,जिसकी वसूली संभव नहीं थी, अतः उसे माफ करके उन्होंने पूंजीवाद के हित में बड़ा कदम उठाया। इस फैसले से किसानों को कम और बैंकों को ज्यादा लाभ पहुँचा है।
मनमोहन कोड की विशेषता है कि उसने गरीबी के यथार्थ विमर्श को वायवीय बना दिया है। गरीबी और अभाव को एकसिरे से अपदस्थ कर दिया है। मनमोहन कोड ने गरीबी और अभाव को अप्रत्यक्ष दानव में रूपान्तरित कर दिया है। जिसके बारे में आप सिर्फ कभी-कभार सुन सकते हैं। मनमोहन कोड के लिए गरीबी और अभाव कभी महान समस्या नहीं रहे। उनके लिए वे ठोस सामाजिक वर्ग भी समस्या नहीं रहे जिनके कारण गरीबी और अभाव कम होने की बजाय बढ़ रहे हैं। मनमोहन कोड ने देश की एकता और अखंडता के लिए सबसे खतरनाक शत्रु के रूप में माओवाद को प्रतिष्ठित किया है। जबकि माओवाद भारत विभाजन या सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा नहीं है।
मनमोहन कोड की काल्पनिक सृष्टि है माओवाद और आतंकी हिन्दू। यह जादुई-मिथकीय शत्रु है। मनमोहन कोड के अनुयायी और प्रचारक माओवाद के बारे में तरह-तरह की दंतकथाएं, किंवदन्तियां आदि प्रचारित कर रहे हैं। मीडिया में माओवाद एक मिथकीय महामानव है। इसी तर्ज पर आरएसएस के नाम पर बहुत सारे आतंकी हिन्दू महामानव पैदा कर दिए गए हैं। ये सारे मनमोहन कोड से सृजित वर्चुअल सामाजिक शत्रु हैं। ये आधे मानव और आधे दानव हैं।
माओवाद और हिन्दू आतंकवाद की रोचक डिजिटल कहानियां आए दिन सम्प्रेषित की जा रही हैं। इन्हें सामाजिक विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। आप जरा गौर से माओवादी नेता किशनजी की कपड़ा मुँह पर ढ़ंके इमेज और हिन्दू आतंकी के रूप में पकड़े गए संतों को ध्यान से देखें तो इनमें आप आधे मनुष्य और आधे प्राचीन मनुष्य की इमेज के दर्शन पाएंगे।
कारपोरेट मीडिया माओवादी और हिन्दू आतंकी की ऐसी इमेज पेश कर रहा है गोया कोई फोरेंसिक रिपोर्ट पेश कर रहा हो। वे इनके शरीर की ऐसी इमेज पेश कर रहे हैं जिससे ये आधे मनुष्य और आधे शैतान लगें। इससे वे खतरे और भय का विचारधारात्मक प्रभाव पैदा कर रहे हैं।
मनमोहन सिंह मीडिया में उतने नजर नहीं आते जितना इन दिनों डिजिटल दानवों (माओवाद और हिन्दू आतंकी) को पेश किया जा रहा है। हमें इस कोड को खोलना चाहिए। यह तकरीबन वैसे ही है जैसे अमेरिका ने तालिबान और विन लादेन की इमेजों के प्रचार-प्रसार के जरिए सारी दुनिया को तथाकथित आतंकवाद विरोधी मुहिम में झोंक दिया और तबाही पैदा की गयी। सामाजिक अस्थिरता पैदा की गयी। घृणा का वातावरण पैदा किया गया। ठीक यही काम मनमोहन कोड अपने डिजिटल शत्रुओं के प्रचार-प्रसार के नाम पर कर रहा है। हमें जागरूक रहने की जरूरत है।
Subscribe to:
Posts (Atom)
