संस्कृति का पहले जो भी अर्थ रहा हो लेकिन अभी यह अँग्रे.जी के कल्चर के अनुवाद रूप में प्रचलित है। रोचक तथ्य यह है कि अँग्रे.जी में कल्चर शब्द जर्मन शब्द कुल्टूर का अनुवाद है। इस कुल्टूर या कल्चर का एक विशेष अर्थ है। कल्चर शब्द का रवीद्रनाथ टैगोर द्वारा 'संस्कृति' के रूप अनुवाद के बाद से अधिकाकाधिक प्रचलित हुआ। रवीन्द्रनाथ के सन्दर्भ में यह बताना मुझे जरूरी लगता है, कि जब उन्हें बंगला में संस्कृति के लिए कोई शब्द नहीं मिल रहा था और जो दूसरा शब्द मिल रहा था वह था संसृति। इसके साथ उन्होंने शब्द लिया संस्कर्तृ - ये तीन शब्द उनको मिल रहे थे। इन तीन शब्दों के भावों को साथ लेकर चलने के बाद वह संस्कृति के उस अर्थ की तरफ जाते हैं, जहाँ से उन्हें कुल्टूर के उस अनुवाद को सामने रखने में मदद मिलेगी।
मेरी पहली बात है कि यह अनुमान करना अनुचित न होगा कि रवीन्द्रनाथ ने कल्चर के लिए संस्कृति का प्रयोग करते समय संस्कृत, संसृति ओर संस्कर्तृ - तीनों शब्दों को आस-पास लाने के लिए इस नये शब्द का उपयोग कर रहे थे। वे एक साथ कृत्रिम, श्रेष्ठ, अनुशीलन द्वारा मांजने, प्रवाह जैसे भावों को एक शब्द में लाने की कोशिश कर रहे थे। निरन्तरता भी आये, परिष्करण भी आये और जो अन्य अर्थ संस्कर्तृ, संसृति और संस्कृत में है वह सब उसमें आ जायें। इसलिए यह बहुत व्यापक शब्द है और उसमें बहस की बहुत गुंजाइश बनती है। उस ओर न जाकर, मैं उसे वर्तमान के सन्दर्भ में लाने की कोशिश कर रहा हूँ।
संस्कृति की गत्यात्मकता ही उसकी शक्ति है। सांस्कृतिक संक्रमण के समाजशास्त्र के सन्दर्भ में, सम्यक् दृष्टि हेतु यह स्मरण रखना आवश्यक है कि नीतियाँ और आदर्श परिवर्तित होते रहते हैं। नीतियाँ और आदर्श दोनों परिवर्तनशील हैं। आज के भारतीय सन्दर्भ में इस प्रश्न पर तीन स्तरों पर विचार करना उचित होगा। समाज में सांस्कृतिक परिवर्तन के दो कारण हैं - आन्तरिक दबाव एवं बाहरी दबाव। आप देख सकते हैं, भारत में एक संस्कृति के नाम पर कितना गैर सांस्कृतिक आचरण महाराष्ट्र में हो रहा है। यह उस दबाव एक बानगी मात्र समझिए। क्षेत्रीयता बहुत हद तक हमारे लिए नये प्रश्न खड़े करने जा रही है - राजनीति के सन्दर्भ में भी, संस्कृति के सन्दर्भ में भी और हमारे साहित्य के सन्दर्भ में भी ये ची.जें बहुत महत्त्वपूर्ण होने वाली है। संस्कृति के नाम पर महाराष्ट्र के इस गैर सांस्कृतिक आचरण को इसकी बानगी ही इसे मानकर चलें।
संस्कृति की आन्तरिक लड़ाइयाँ भी बहुत महत्त्वपूर्ण होती हैं। यहाँ रामचन्द्र शुक्ल की उस बात की ओर लौटने की जरूरत है, जिसे मैं संस्कृति के विचार के सन्दर्भ में दूसरा बिन्दु मान रहा हूँ। शुक्ल जी का कहाना है कि बुद्धि की चाशनी में डुबोये बिना किसी भी भाव का स्वाद नहीं हो सकता। आज लगता है कि बा.जार की चाशनी में डुबोये बिना किसी शब्द की कोई महत्ता नहीं है, किसी बात की कोई गरिमा नहीं है, किसी विचार की कोई महत्ता नहीं है। तो यह एक नया सन्दर्भ है एक नयी बात है, जिस चुनौती के सामने हम लोगों को और तैयार होकर आना पड़ेगा और देखना पड़ेगा कि ये ची.जें इस रूप में क्यों आ रही हैं।
आप निश्चित रूप से यह मानेंगे कि इस समय एक रस्साकशी चल रही है। भारत में पूरी तरह से पूँजीवादी दौर चल रहा है । हमें समझाया जा रहा है कि पूँजीवाद के अलावा कोई विकल्प नहीं है। एक ही साथ इस देश में अट्ठारवीं, उन्नीसवीं, बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दियां चल रही हैं। कुछ लोगों के लिए आधुनिक समय अभी नहीं आया है। कुछ लोग आधुनिक समय में चल रहे हैं और कुछ उत्तर आधुनिक होने की कोशिश कर रहे हैं जो यह समझते हैं कि उत्तर आधुनिक परिदृश्य हमारे सामने आ चुका है।
किसी-किसी माध्यम में समय खुलकर बोलता है। आज तेजी से बदलते भारतीय समाज में, विभाजित संस्कृतियों को स्पष्टतः देखा जा सकता है। पूरा भारतीय समाज मानो दो भाग में बँट गया है। एक ओर वे लोग हैं, जो वैश्र्वायन के तर्कों के साथ हैं, ग्लोबलाइजेशन के तर्कों के साथ हैं और दूसरी ओर वे हैं जो परिस्थितिवश इसके विरूद्ध हैं। भारत कभी भी एक संस्कृति का राष्ट्र नहीं रहा है। यह बात थोड़ी विवादास्पद हो सकती है। किन्तु इतिहाससम्मत यही प्रतीत होता है कि भारत की विराट संस्कृति में बहुत सारी संस्कृतियाँ बहुत संतुलित रूप में उपस्थित रही हैं, और उसी तरह उपस्थित रही हैं, जैसे एक पेड़ में बहुत सारे पत्ते एक दूसरे का स्थान न लेते हुए भी उपस्थित रहते हैं बल्कि कहें कि एक दूसरे को स्थान देते हुए उपस्थित रहते हैं। किसी का किसी से इस बात के लिए झगड़ा नहीं है कि हम हैं तो तुम नहीं हो, तुम हो तो हम नहीं हैं। इस तरह का भाव लेकर हमारी संस्कृति का विकास हुआ है। इस अर्थ में ''भारतीय संस्कृति'' का अर्थ हमारे लिए बहुत स्पष्ट है।
जिन लोगों ने इस देश की संस्कृति की आन्तरिक एकता के सूत्रों को सामने रखकर राष्ट्रीय एकता की संकल्पना तैयार की थी, उनके मूल्यों को समाज धीरे-धीरे भूल रहा है और छोड़ने की ओर बढ़ रहा है। संकट बहुत गहरे हैं। जो काम औपनिवेशिक विचारधारा नहीं कर सकी, वह काम उदारवादी वैश्र्िवक विचारधारा ने कर दिया है। इस देश के बहुसंख्यक लोग इस देश की संस्कृति के मूल्यों को स्थानीय रूपों में जिस तरह ढो रहे हैं, उसके साथ इस देश के सपने का कोई तार्किक जोड़ नहीं बनता। महान् महाराष्ट्र और महान् देश - इसके बीच में बहुत सारे ऐसे बिन्दु हैं, जहाँ हमें लगता है, जैसे हमारे बीच में कुछ टूट सा रहा है। कुछ ऐसा घटित हो रहा है, जिससे हमारी संस्कृति खतरे में है।
आधुनिक विचारधारा चाहे जितनी भी दमनकारी रही हो, भारतीय समाज के सामने उसने एक स्वप्न जरूर रखा था देश के नव निर्माण का, जिसमें हर भारतीय के लिए स्थान था। देश का आखिरी आदमी भी देश की प्रगति का साझेदार था। वह स्वप्न था, सच्चाई यह है कि इस देश के भीतर कई देश हैं या उन्हें बनाये जाने की कोशिश की जा रही है। और बनाए जा रहे इस नए देश की एक संस्कृति नहीं है। बहुलतावादी सांस्कृतिक दृष्टिकोण का विकास करते हुए देश के लोगों को आगे ले जाते हुए, प्रगति का जो स्वप्न स्वतन्त्रता के पूर्व और बाद के दशकों में देश के बुद्धिजीवियों और नेताओं ने देखा था, वह बीत चुका है, फिर कभी न लौटने के लिए। लोगों की इस प्रत्तीति के समाजशास्त्रीय विश्लेषण की जरूरत है कि ऐसा क्यों हुआ और इस देश की संस्कृति या संस्कृतियों का क्या होने वाला है। यही हमारे विचार का मूल बिन्दु होना चाहिए।
किसी ने कहा है कि सामाजिक प्रगति नदी के बहाव के तरह है। वह आगे की ओर ही बढ़ती है। पीछे की तरफ नहीं लौटती। गंगा इलाहाबाद से बहती हुई कलकत्ता जाकर फिर वापस नहीं लौट सकती। प्रगति को होते रहना है, उसकी यात्रा को अनवरत चलते रहना है। इसीलिए लोग कहते हैं कि प्रगति तो होगी, लेकिन प्रगति होते हुए विध्वंस कम हो, इसके लिए ही कोशिश की जा सकती है। मैं समझता हूँ इस पर दुबारा विचार करने की आवश्यकता है कि क्या प्रगति हमारे लिए इतनी ही .जरूरी चीज है कि हम सब कुछ खो दें। विकास, प्रगति इस सब मूल्यों पर फिर से बहुत सोचने की जरूरत है। ये विचार कहाँ से आये हैं, इनके मूल कहाँ से निर्धारित होते रहे हैं और अब इनमें क्या करने की .जरूरत है। जी. एच. वेल्स की बहुत विख्यात पुस्तक है 'टाइम मशीन'। उसमें प्रगति के इस तर्क का एक प्रति तर्क गढ़ा गया है और एक ऐसे सुदूर भविष्य की कल्पना की गयी है जहाँ चन्द्रमा पर निर्माण हो जाने के कारण चन्द्रमा से टूट-टूट कर टुकड़े .जमीन पर गिरते दिखाई देते हैं। यहां के लोग वहाँ और वहाँ के लोग आने लगे हैं यहाँ इस आवागमन से विध्वंस फैलने लगा है। धरती के लोग इन आगुन्तकों के भय से घाटी में लटकते हुए घरों में पक्षियों की भांति भयभीत होकर रहते हैं। वे केवल वर्तमान में रहते हैं, जैसा भी, जो भी उनके साथ हो रहा है, उसे झेलते हैं, जीते हैं और मारे भय के भविष्य के बारे में कुछ नहीं सोच पाते। वे लोग धरती पर भय से उतरते ही नहीं है। एच. जी. वेल्स दिखाते हैं कि मनुष्य भविष्य में धरती पर नहीं उतर पायेगा और घाटियो में लटका रहेगा। घर इस तरह के बनाये गये हैं जिसमें वह लटकता रह सके। और जिस दिन वह अपनी धरती पर उतरेगा, उसी दिन धरती फाड़कर बाहर के जीव-जन्तु, बाहरी ग्रह के लोग आयेंगे और उनका शिकार करके धरती के नीचे, जिसे हम पाताल कह सकते हैं, घुस जायेंगे। ये पाताल निवासी पकड़ कर लाये गए धरतीवासियों को पिंजरें में कैद कर तरह-तरह की यातनाएं देंगे। सौ साल पहले इस तरह की एक कल्पना वेल्स ने की थी। इस कल्पना के पीछे जो असली तर्क है, उसे समझने की जरूरत है कि विकास की कल्पना अन्ततः सुदूर भविष्य में हमें सुकून नहीं दे सकती। वेल्स का कहना है कि विकास के इस मार्ग पर चलकर मनुष्य पुनः उसी चक्र में लौट जायेगा, उसी जगह लौट जायंगा, जहाँ से उसने यात्रा शुरू की थी। भय, अन्धकार, पाताललोक - इस कल्पना में यही सामने आते हैं। मनुष्य पशु नहीं है। इसलिये पशु होना उस रूप में आनन्दित होते रहना ही उसका धर्म नहीं है। मनुष्य के पशु होने से उसके आगे जाने की बात संस्कृति हमें सिखाती है। संस्कृति के समाजशास्त्रीय व्याख्याकारों को इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि समाज के परिवर्तन के तर्कों के साथ मानवता का भविष्य सुरक्षित है या नहीं। पूरब और पश्चिम के द्वन्द्व औचित्य पर जरूरी कारणों से सवाल उठाये गये हैं। एडवर्ड सईद जैसे विद्वानों ने ''ओरियण्टलिज़्म'' लिखकर यह प्रस्तावित किया कि इस तरह के विभाजन के पीछे एक योरोपीय ज्ञानबोध है, जो पूँजी के वैश्र्िवक प्रचार के युग में सारी दुनिया में स्वीकृत करवाया गया है। हम और वे। पश्चिम और पूरब। प्रगति की सारी अवधारणा - एक ऐसे ज्ञान विमर्श - यानी नॉलेज डिसकोर्स से निकलकर आ रही है, जो पूरी तरह से पूँजी के नियन्त्रण में रही है। पूरब एक कल्पना है, जिसे पश्चिम ने अपने विरोध में उपस्थित किया। आज फिर लगता है कि पूरब और पश्चिम की सोच में उपस्थित एक मूलभूत अन्तर को रेखांकित किया जाना चाहिये। हमारे विद्वानों ने पहले ऐसा किया है। यह समझाया है कि कम से कम संस्कृति की समझ के स्तर पर यह अन्तर शायद रहा है। हमें उस तरफ लौटने की जरूरत है।
लगभग सौ बरस पहले श्रीलंका मूल के महान विद्वान केण्टिस कुमारस्वामी ने घोषणा की थी कि पश्चिम कुछ भी नया रचने में असमर्थ है। वह क्यों कह रहे हैं उनको कुछ भी नया सोचने में असमर्थ? - इन कैपबल ऑफ थिंकिंग - ये उन्हीं के शब्द हैं। इस प्रसंग में मैं रवि वर्मा प्रसंग को लाना चाहूँगा। रवि वर्मा की पेंटिंग्स को देखकर विवेकानन्द की पहली प्रतिक्रिया थी कि ये बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। और अब लगता है कि भारतीय कला बहुत आगे जा चुकी है। बाद में जब उनलोगों ने उन्हें बताया, समझाया, तो विवेकानन्द का वक्तव्य आया कि इनका कोई मूल्य नहीं है। राजा रवि वर्मा की पेंटिंग का कोई मूल्य ही नहीं है, क्योंकि यह नकल है। और यहीं पर विवेकानन्द उस भारतीय दृष्टि को पाते हैं, जहाँ उन्हें लगता है कि किसी चीज की अनुकृति मात्र में भारतीयता सुरक्षित नहीं है। वह हमारी अपनी दृष्टि नहीं है। अपनी दृष्टि की रक्षा हमें ही करनी पड़ेगी। और इस रक्षा के लिए जरूरत है हमें विवेकानन्द, अवनीन्द्रनाथ टैगोर, कुमारस्वामी से लेकर मतिराम जैसे विद्वानों की। इन विद्वानों ने पूरब और पश्चिम के इस विभेद को संस्कृति के स्तर पर समझने की कोशिश की है, उसको सामने रखा है।
साहित्य के क्षेत्र में निर्मल वर्मा का स्मरण बहुत जरूरी लगता है और संस्कृति के व्यापक सन्दर्भों को अगर हम ध्यान में रखें, तो जिस आदमी का हमें सबसे अधिक ऋणी होना चाहिए, वह हैं महात्मा गांधी। मेरी दृष्टि में महात्मा गांधी को इस समय संस्कृति पुरुष के रूप में उपस्थित किये जाने की अधिक जरूरत है, राजनीतिक पुरुष की तुलना में। अगर समाज को निर्बन्ध विकास करने दिया जाय, तो समाज जिस ओर बढ़ेगा, वह मनुष्यता का रास्ता नहीं है, वह पशुता का रास्ता है। मैं इस बात पर .जोर देना चाहता हूँ।
संस्कृति के विमर्श की जो भी व्याख्या हो, यह समाज को मनुष्यता की राह पर ले जाता है। विकास और संस्कृति की राह अलग-अलग है। एक बड़ी हद तक अलग-अलग रास्ता है इनका। इसका कार्य मानव-समाज को और कल्याणकारी बनाना है। विकास और कल्याण के बीच के गुणात्मक अन्तर को हमें समझने की जरूरत है। भारत में संस्कृति का अर्थ क्या है और यह पश्चिम की संस्कृति के अर्थ से किस प्रकार भिन्न है। भारतीय और पश्चिमी संस्कृतियों के बीच के गुणात्मक अन्तर को सामने रखते हुए एक विद्वान ने कहा था कि अब समय आ गया है कि हम चेतें और हाथ उठाकर पश्चिमी सभ्यता के ठेकेदारों से कह दें कि अब हमें आपकी सभ्यता और संस्कृति की आवश्यकता नहीं है। टी. एच. इलिएट के खोखलों मानव को उद्धृत करते हुए वह दूर तक जाते हैं और पश्चिमी संस्कृति में प्रभावी व्यक्तिवादी वेदनावाद, जिसे अस्तित्ववाद के रूप में भी हमलोग चिह्नित कर सकते हैं, को भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा के विरोध में बतालते हैं। इस दृष्टि से पश्चिमी संस्कृति के साथ भारतीय संस्कृति का मेल शराब और दूध के मेल जैसा है। वे जानते थे कि भारतीय संस्कृति की समझ पश्चिमी संस्कृति की समझ से अलग है। संस्कृति बहुत व्यापक शब्द है। ऐसा माना जाना चाहिए कि संस्कृति में जितने अर्थ हैं वह कल्चर में शायद नहीं हैं। संस्कृति बहुत ही व्यापक शब्द है। पश्चिम की संस्कृति के विमर्श में जीवन का एक कोलाहल है। जहाँ-जहाँ पश्चिम का विस्तार होगा, जहाँ-जहाँ पश्चिम का प्रभाव ज्य़ादा होगा, वहाँ जीवन में कोलाहल अधिक प्रबल होता जायेगा। यह बात उनके भाषण में आयी है। यह कोलाहल संक्रमण काल की एक महत्त्वपूर्ण चीज है। पुराने सांस्कृतिक मूल्यों का क्षरण होता है और नये मूल्य प्रचारित होते हैं। संस्कृति के समाजशास्त्र के अध्ययन के लिए अब भारत में यह जरूरी है कि संक्रमण के पीछे चल रहे सामाजिक संघर्षों के साथ इन मूल्यों का सम्पर्क स्थापित करें। ऐसा क्यों हो रहा है कि एक देश के भीतर कई संस्कृतियाँ दिखलायी जा रही हैं। आपस में मारकाट बढ़ने लगी है और जिसे हम विध्वंस की राजनीति कहते हैं कि वह अपने साथ विध्वंस की संस्कृति भी लेकर चल रही है। ऐसा क्यों हो रहा है, इस पर सबसे अधिक विचार करना चाहिये।
अब मैं वर्तमान सन्दर्भों की ओर आना चाहूँगा। इस देश की संस्कृति चर्चा का इतिहास हमें यह बतलाता है कि 'हम एक हैं' इस भावना का सुसंगत समाशास्त्रीय पाठ उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में ही तैयार हुआ। देश के माने बदले और नवजागरण के साथ देश के इतिहास, संस्कृति और सभ्यता का एक पाठ तैयार हुआ। इस पाठ की बहुत सारी अच्छी-बरी बातों, - राष्ट्रीय आन्दोलन, नवजागरण, हिन्दू नवजागरण, इस्लामिक नवजागरण इत्यादि के व्याख्याकारो की लोगों ने आलोचना लिखी है। यह सब जानते हैं कि पिछले बीस-पच्चीस सालों में इस राष्ट्रीय पाठ को एक गम्भीर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। वह चुनौती दलित सांस्कृतिक आन्दोलन की ओर आयी है। मैं स्त्री विमर्श को पूरी बातचीत में नहीं रख पाया, क्योंकि समय की भी सीमा है और स्त्री विमर्श लाने से बात को दूसरी तरफ भी ले जाना पड़ेगा, लेकिन मूलरूप से मुझे लगता है कि जो दलित सांस्कृतिक आन्दोलन हुआ है, उसके साथ सांस्कृतिक विमर्श को जोड़ना पड़ेगा। वरना लोग कहने लगेंगे कि हमारी संस्कृति और है और आपकी संस्कृति और। इस तरह से हमारी जो सांस्कृतिक दृष्टि है, उसका विखण्डन शुरू होगा, जो कहीं भी नहीं थमेगा।, किसी मूल्य को तैयार नहीं होने देगा और इतने सारे मूल्य हो जायेंगे कि सांस्कृतिक विमर्श एक अर्थ में कल्पना का व्यायाम बनकर रह जायगा।
पिछले तीस सालों में, राजनीति, सामाजिक संतुलन, आर्थिक संरचना इत्यादि सभी चीजें बदल गयी हैं। हमारे भारत में भी हम देख रहे हैं कि ग्लोबलाइजेशन के इस युग में सारी चीजें टूटने-फूटने लगी हैं। तो, ये तीस साल बहुत महत्त्वपूर्ण हैं जिनमें हमारी दृष्टि बदली है। ऐसे में पुरानी सांस्कृतिक दृष्टि, जिसके पीछे एक राष्ट्रीय दर्शन था, उसकी सीमाएँ भी थोड़ी स्पष्ट होती जा रही हैं। लोग पूछने लगे हैं कि जो चित्र आप दिखा रहे हैं, संस्कृति का यह बहुत सुन्दर चेहरा, बहुत भव्य चेहरा जो दिख रहा है, उसमें हम कहाँ हैं। हम जिस समुदाय से आते हैं, हमलोग जहाँ से हैं, वह चेहरा हमें दिखाई नहीं दे रहा है। यह बात स्त्री के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है और दलित के सन्दर्भ में भी कही जा सकती है। दलित विचारधारा का जब से समाज में प्रभाव बढ़ा है, तब से संस्कृति को पुनर्परिभाषित किये जाने की जरूरत होने लगी है। इस प्रसंग में नये सवालों पर पर्याप्त चर्चा हो चुकी है, लेकिन यहाँ एक प्रसंग जोड़ना मुझे जरूरी लगता है। संस्कृति के संक्रमण काल का समाजशास्त्र इस बात की अनदेखी नहीं कर सकता कि एक गलती के सुधारने के क्रम में एक और बड़ी गलती भी हो सकती है। संस्कृति का जैसा भी पाठ राष्ट्रीय दौर में तैयार हुआ था, उसमें परम्परा के प्रति समग्र दृष्टि भले ही न हो, एक सकारात्मक भाव था। उन्हें एक नया कल्याणकारी समाज बनाना था और इस देश से विदेशियों को हटाना था। हम चाहें तो इस युग में गांधी और नेहरू की चाहे जितनी आलोचना कर लें, लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा कि उनकी दृष्टि सकारात्मक थी। वह चाहते थे कि देश बने, और उस देशवासियों के बीच में एक सुन्दर सम्पर्क बने, उनके बीच में एक रागात्मक-भावात्मक सम्पर्क हो। उनकी सीमाएँ हो सकती हैं किन्तु उनकी मंशा प्रभावशाली है। जैस-जैसे समय बदलता है, वैसे-वैसे किसी भी विचार दर्शन की सीमाएँ भी स्पष्ट होती जाती हैं। पर उस विचार दर्शैन का सकारात्मक भाव हमें मानना ही चाहिए।
लेकिन इन दिनों जो दौर चल रहा है, उसमें एक प्रकार की उग्रता है। परम्परा की बहुत ही फूहड़ समझ है। मैं फूहड़ शब्द का प्रयोग बहुत .जोर देकर करना चाहता हूँ। परम्परा को इस प्रकार मनचाहा आकार देना चाहिए। यह सही है कि बहुत सारी परम्पराएं हो सकती हैं, बहुत सारी दृष्टियाँ भी हो सकती हैं, लेकिन अपनी दृष्टि को सामने लाने के क्रम में हम दूसरी सारी परम्पराओं का निषेध कर दें, यह बात भारतीय सन्दर्भ में मुझे बहुत ही विध्वंसकारी प्रतीत होती है। आज परम्परा की समझ बहुत फूहड़ है और उस पर राजनीति का पूरा जोर है। संस्कृति के लिए यह बहुत खतरनाक है । जहाँ संस्कृति के विमर्श में राजनीति की दखलअन्दाजी बढ़ने लगे, वहाँ समझना चाहिए कि संकट बहुत गहरा हो रहा है और वहाँ से निकलने की गुंजाइश भी कम होती जा रही है। जो लोग संस्कृति के नये मूल्यों को तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं वे राजनीति से प्रेरित दिखते हैं। राजनीति का प्रभाव स्वीकार्य हो सकता है, लेकिन राजनीति से प्रेरित संस्कृति विमर्श की ओर आना, और पूरे अकादमिक क्षेत्र को उसका पिछलग्गू बना देना, यह बात मुझे सही नहीं लगती है।
संस्कृति विमर्शा के लिये यह जरूरी है कि इसे राजनीति के दिशा निर्देश पर न चलाया जाये, बल्कि समाज के कल्याण को ध्यान में रखकर विकसित किया जाये। हमें आशा करनी चाहिए कि इस मन्थन से कुछ जो नये मूल्य निकलेंगे, वे समाज के लिए कल्याणकारी होंगे।
संस्कृति केवल वर्चस्व का साधन ही नहीं बनती, वह मुक्ति का माध्यम भी होती है। फ्रेंकफुर्त स्कूल के एक विद्वान पचास साल से भी ज्यादा पहले से इस बात को दिखला चुके थे कि संस्कृति उद्योग कैसे बन गया है. संस्कृति में पूँजी को, पैसे को हम इतनी छूट दे सकते हैं कि वह संस्कृति के पूरे विमर्श को नियन्त्रित करे ? मैं बा.जार के साथ-साथ राजनीति को भी इसके लिए बहुत बड़ा खतरा मानता हूँ जो विध्वंसकारी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देती है और जो संस्कृति के प्रति समाज में एक सम्यक् दृष्टि का प्रसार जो संस्कृति कर्मियों का उद्देश्य है, साहित्यकारों का उद्देश्य है, उसको बाधित करती है और उसकी जगह पर एक अजीब तरह का कोलाहल पैदा किया जाता है। इस कोलाहल से यह बताया जाता है कि सच कुछ भी नहीं है, सब कुछ कल्पना है। पश्चिम में इस तरह के प्रयोग हो रहे हैं कि इतिहास कुछ है ही नहीं। हेडेन व्हाइट जैसे लोग यह प्रचारित कर रहे हैं कि पूरी चीज ही कल्पना है। एक स्तर पर कल्पना है भी। लेकिन फिर भी हमें अगर मूल्यों की चिंता करनी है, तो इस बारे में दुबारा ठहरकर बहुत सुचिन्तित तरीके से सोचना पड़ेगा कि इसमें सकारात्मक क्या है और इसके विनाशकारी तत्व कौन से हैं। और तभी हम संस्कृति और साहित्य की सही और सच्ची भारतीय सांस्कृतिक समझ को सामने रख पायेंगे।
Sunday, 13 March 2011
Saturday, 5 March 2011
Wednesday, 22 December 2010
अंग्रेजी का बढता दबाव और हिन्दी समाज के बौद्धिकों का दायित्व
बातचीत अंग्रेज़ी में गांधीजी पर हो रही थी. इतिहासकार शाहिद अमीन ने अपना मत रखा कि गांधीगिरी का प्रयोग उचित नहीं है और इस बात के समर्थन में वे एक पुराने गाने से 'दादागिरी नहीं चलने की यहां का उदाहरण दे रहे थे, अचानक गांधी के तुनुकमिज़ाज प्रपौत्र तुषार गांधी भडक गये. तुषार गांधी को शांत करने के लिए अंतत: बरखा दत्त हिन्दी में बोलीं- तुषार, उनको अपनी बात कहने दें. दत्त के हिन्दी में बोलने का सुयोग लेकर शाहिद अमीन हिन्दी में बोलने लगे और माहौल को सामान्य करने के लिए बाबा रामदेव आदि की बातें करने लगे. बातचीत का पूरा माहौल बदल गया. अब तक जो बातचीत एक कॉंवेंटी माहौल में हो रही थी वहां एक पल के लिए सहज वातावरण बन गया. इस तरह के अनुभवों के बाद यह सोचने का मन होता है कि क्या इस देश में यह बातचीत हिन्दी के सहज भाषाई परिवेश में नहीं हो सकती. अगर नहीं तो क्यों? क्यों इस देश के बडे लोग एक दूसरे से अंग्रेजी में इस तरह बातचीत करते हुए दिखाई पडते हैं. टी वी चैनलों पर हम क्यों ऐसा परिवेश तैयार करते हैं कि अधिकतर लोग असहज हो जाएं. देश के बडे लोग भी (राजनेता समेत) जब अंग्रेजी बोलने की कोशिश में असहज होते दिखलाई पडते हैं और धीरे धीरे वे तमाम लोग जो अंग्रेजी में सहज नहीं थे अब अंग्रेजी सीखने के लिए विवश हुए और अब अंग्रेजी में साक्षात्कार देते है तो यह प्रश्न मन में आता ही है कि हम इस देश में ऐसी संस्कृति को क्यों बढावा दे रहे हैं जिसमें इस देश के लोग अपने लोकप्रिय जन-माध्यम में इतना असहज हो जाता हो और इंग्लैण्ड और अमरीका का आदमी पूरी सहजता से भारत के जनमाध्यम में बोलता दिखलाई पडता हो.
हर समय का अपना एक कॉमन सेंस बनता है या बनाया जाता है जिसे उस समय के शक्तिशाली प्रभुवर्ग निर्मित करते हैं. 1990 के बाद से जब से इस देश में वैश्वीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है यह बात मान्य होने लगी है कि अंग्रेजी का ज्ञान हमारे लिए एक वरदान है और जो लोग दुनिया में आगे बढने की कोशिश करना चाहते हैं उनके लिए अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है. यह एक दुष्प्रचार का परिणाम है कि पश्चिम बंगाल की सी पी एम सरकार सहयोगी दलों के विरोध के बावजूद अब सरकारी स्कूलों में अंग्रेज़ी माध्यम से शिक्षा देने की नीति पर अमल कर रही है. अंग्रेजी के बढते वर्चस्व के इस दौर में एक प्रकार की असहजता हर उस नागरिक में लक्षित की जा सकती है जो अंग्रेजी का प्रयोग अपने दैनिक जीवन में करने का अभ्यस्त नहीं है. जिस तरह से अंग्रेजी स्कूलों का जोर बढा है और देश की तमाम नौकरियों के लिए अंग्रेजी को जरूरी सा बनाने की सांस्थानिक कोशिशें तेज हुई हैं उसे देखते हुए इस देश में इस देश में यह एक बहस का मुद्दा बनना चाहिए कि इस युग में शिक्षित भारतीय क्या हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं के बदले अंग्रेजी को इस देश में राजकाज, शिक्षा और दैनिक जीवन में तरजीह देने के लिए तैयार होने की दिशा में बढ रहा है या नहीं.
अंग्रेजी विरोध के आन्दोलन का युग बीत गया लगता है. जिस तरह हमारे सामाजिक जीवन के तीन क्षेत्रों - शिक्षा, मनोरंजन और राजकाज की भाषा के रूप में अंग्रेजी का वर्चस्व बढा है वह एक विचारणीय प्रश्न है. इस बिन्दु पर बहुधा लोग कुछ अतिप्रचलित उदाहरणों, उद्धरणों का प्रयोग करते हैं. जैसे- " कह दो गांधी को वह अंग्रेजी नहीं जानता", " मातृभाषा में ही हमारा स्वस्थ विकास हो सकता है " आदि आदि. इस तरह की बातों को दुहराते हुए, हिन्दी दिवसों का पालन करते हुए इसे अब झुठलाया नहीं जा सकता है कि इस देश में भाषा का मुद्दा एक खतरनाक मोड पर पहुंच गया है.
हिन्दी का भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में "राष्ट्रीय" बनना एक विचारधारात्मक संघर्ष का परिणाम था. कम से कम जब से गांधी जी नेतृत्व में आये थे हिन्दी राष्ट्रीय आन्दोलन की भाषा बन गयी थी. एक बार बाल गंगाधर तिलक कलकत्ता के मछुआ बाज़ार में भाषण देने आए. गांधीजी हिन्दी में बोल चुके थे और तिलक को लगा कि अगर वे अंग्रेजी में बोलेंगे तो जनता पर अपेक्षित प्रभाव पैदा नहीं होगा. वे सार्वजनिक जीवन में पहली बार हिन्दी में बोले और इसका बहुत अच्छा प्रभाव पडा. इसके बाद तिलक हिन्दी में ही बोलने लगे. यह गांधी का ही प्रभाव था. कलकत्ता के शिक्षित लोग एक बार गांधीजी के सोदपुर आने पर उनसे आग्रह करने लगे कि वे हिन्दी में न बोलें. गांधीजी ने उनलोगों को फटकार लगाई और हिन्दी में बोले. वह एक बेहद दिलचस्प अध्याय है जिसमें 1927 में गांधी हिन्दी के पक्ष में इस तरह बोले कि आज का हिन्दी वाला भी शर्मा जाए. अपने आचरण से भी गांधी ने हिन्दी को बहुप्रचारित किया. गोविन्द बल्लभ पंत अल्मोडा में अंग्रेजी माध्यम से पढे थे और वे अंग्रेजी में गांधी को पत्र लिखते थे जिसका उत्तर गांधी हिन्दी में देते थे. शर्म आने पर पंत भी उन्हें हिन्दी में पत्र लिखने लगे. इस तरह के ढेरों उदाहरण दिए जा सकते हैं लेकिन गांधी की भाषा पर कम विचार किया जाता है. इसे विडंबना ही कहना चाहिए कि गांधी के भाषणों और पत्रों का जो संकलन गांधी समग्र में आया है उनमें से अधिकतर पहले छपे अंग्रेजी वाड्गमय के हिन्दी अनुवाद है. मूल रूप से ये भाषण हिन्दी में दिए गए थे!
इन बातों को पुराने युग के कॉमन सेंस में इस लिए स्वीकृत माना गया था क्योंकि उस समय राष्ट्रीय स्वप्न और विचारधारा का जोर था जिसमें एक राष्ट्र, एक भाषा की बात को समर्थन था. सुदीप्त कविराज यह स्मरण कराते हैं कि इस देश में राष्ट्रीय स्वप्न ने भारतीय भाषाओं ने अपना स्वरूप तैयार किया था न कि अंग्रेजी में. उत्तर औपनिवेशिक भारत में अंग्रेजी बनी रही और वैश्वीकरण के दौर में तो यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि यह नये 'इंडिया' की भाषा बन जायेगी.
इस ग्लोबल युग में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि इस देश में शासन और शिक्षा की असली भाषा अंग्रेजी ही है. आकडों को दिखला कर यह कहना कि इस देश में शिक्षा की भाषा भारतीय भाषाएं हैं एक छलावा ही है. जिसे हिन्दी माध्यम का स्कूल कॉलेज कहा जाता है वहां हिन्दी के अलावा सबकुछ अंग्रेजी में तैयार पाठ्यक्रमों का अनुवाद ही पढाया जाता है. दो तीन दशक पहले तक शिक्षकों की कोशिशों से कुछ प्रयत्न होते थे कि अन्य विषयों को भी हिन्दी में उचित तरीके से पढाया जाए पर अब सब कुछ मानो अंग्रेजी की नकल पर ही होने लगा है. लगभग हर समाजविज्ञान के क्षेत्र में सभी राष्ट्रीय संस्थाएं अंग्रेजी में काम करती हैं. तकनीकी क्षेत्रों की बात छोड ही दें जहां हिन्दी में काम करने में अपेक्षाकृत रूप में कठिनाई है. इसे क्या कहा जाए कि इतिहास अध्ययन के क्षेत्र में वार्षिक अधिवेशन में कोई भी पर्चा हिन्दी में नहीं छप सकता जबकि विकल्प देने पर कम से कम पचास फीसदी से ज्यादा पर्चे हिन्दी में प्रस्तुत किए जाएंगे. एक बार फ्रांस से पी एच डी किए लाल बहादुर वर्मा हिन्दी में पर्चा पढने लगे तो एक ख्यात हिन्दी भाषी इतिहासकार ने जिस तरह उन्हें घूरा और हतोत्साहित किया उसे वर्मा 'जीवन में न भूलने वाला अनुभव' मानते हैं. दरअसल, हिन्दी पर हमला कई तरह से किया जाता है. इस मुद्दे पर इस देश के एलिट समुदाय में अद्भुत एका है. हिन्दी में लिखे लेखों और पुस्तकों को दर्ज ही नहीं किया जाता. इस बार इंडियन हिस्टॉरिकल इंसटीच्यूट के मुंबई वार्षिक अधिवेशन में अर्चना ढेरे (जो मराठी साहित्य की प्राध्यापिका हैं ) ने एक अविस्मरणीय बीज वक्तव्य हिन्दी में दिया. यह तय मानिए कि इस वक्तव्य को हिन्दी में दिए जाने के कारण कभी भी प्रमुखता से कहीं भी छापा नहीं जाएगा. संभव है इस तरह के वक्तव्य हिन्दी में देने वाले लोग अपवाद के रूप में भी न दिखें. अंग्रेजी एलिट में हिन्दी के विरूद्ध जो एका है उसे समझकर हिन्दी भाषी बौद्धिकों ने तैयारी करने की सख्त जरूरत है. यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस देश में हर भाषा के सम्मान के लिए सबसे ज्यादा तत्पर उस समाज के उदार लोग नहीं हैं. ये उन्नत सोच वाले उदार लोग अंग्रेजी के साथ हैं.
शिक्षा और राजकाज के अतिरिक्त जो इलाका अंग्रेजी की दखल में चला जा रहा है वह इस दौर के सांस्कृतिक संकट को सबसे अच्छी तरह से स्पष्ट करता है. वह क्षेत्र है मनोरंजन का. इस देश में हिन्दी फिल्म और क्रिकेट बहुत लोकप्रिय है. इन दोनों क्षेत्रों में अंग्रेजी ने चोर दरवाजे से अपना वर्चस्व बनाया है. हिन्दी फिल्म का लगभग हर शख्स फिल्म के अलावा बाकी सब जगहों पर अंग्रेजी में बोलता है या बोलना चाहता है. सिर्फ बंगाल में आनंद बाजार ग्रुप की नीतियों के कारण फिल्म जगत के लोग बांग्ला भाषी जनता के लिए हिन्दी में बोलते हैं ! लता मंगेशकर, आशा भौंसले आदि कुछ गायकों को छोडकर कोई छोटी बडी फिल्मी हस्ती हिन्दी में बोलती दिखाई नहीं देती. क्रिकेट की कमेंट्री अब अंग्रेजी में ही होती है. भला हो दूरदर्शन की पुरानी नीतियों का कि एक कोने में एक टी वी दे दिया जाता है जिसे देखकर सुशील दोषी जैसे हिन्दी के यशस्वी कमेंट्रेटर हिन्दी में कमेंट्री करते हैं. यह बात गौर करने की है कि आज भी सुशील दोषी साफ सुथरी हिन्दी में बेहतरीन कमेंट्री करते हैं. हमें उनका कृतज्ञ होना चाहिए. जिन लोगों ने हिन्दी में कमेंट्री की शुरूआत की थी, मसलन अरूण लाल, मोहिन्दर अमरनाथ, मनिंदर सिंह आदि वे सब अब अंग्रेजी में कमेंट्री करने लगे. कपिलदेव जैसे लोग हिंदी कमेंट्री के लिए तैयार नहीं. वे अंग्रेजी कमेंट्री करना चाहते है जिसके लिए चैनल वाले तैयार नही ! हम सब मिलकर अब नहीं चेते और इस तरह के तर्क देते रहे कि बाज़ार तो हिन्दी के साथ है और भले ही अंग्रेजी में बोला जाता हो लेकिन अर्थ ग्रहण हिन्दी में होता है, हम भूल कर रहे हैं. खतरा यहां तक बढ गया है कि हिन्दी के लोग भी अंग्रेजी शैली में सोचने विचारने के अभ्यस्त होने लगे हैं, अपनी हिन्दी छवि को छुपाने लगे हैं. जो लोग हिन्दी के अध्यापक हैं वे जब अंग्रेजी में या अंग्रेजीनुमा हिन्दी में बोलने दिखने की होड में दिखते हैं तो उन तमाम नौजवानों को बेहद निराशा होती है जो इस संकट के दौर में भी अपनी भाषा में काम करना चाहते हैं. हिन्दी समाज के प्रबुद्ध लोगों को इस दिशा में काम करने की संभावनाओं को बढाने की कोशिश करनी चाहिए. तभी वह सहज माहौल हम जन माध्यमों में पाएंगे जो हिन्दी के आते ही सहज ही टी वी के पर्दे पर आ जाता है. पर इस सांस्कृतिक माहौल को हम अपनी भाषा के प्रति दायित्वशील होकर ही हासिल कर सकते हैं.
हर समय का अपना एक कॉमन सेंस बनता है या बनाया जाता है जिसे उस समय के शक्तिशाली प्रभुवर्ग निर्मित करते हैं. 1990 के बाद से जब से इस देश में वैश्वीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है यह बात मान्य होने लगी है कि अंग्रेजी का ज्ञान हमारे लिए एक वरदान है और जो लोग दुनिया में आगे बढने की कोशिश करना चाहते हैं उनके लिए अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है. यह एक दुष्प्रचार का परिणाम है कि पश्चिम बंगाल की सी पी एम सरकार सहयोगी दलों के विरोध के बावजूद अब सरकारी स्कूलों में अंग्रेज़ी माध्यम से शिक्षा देने की नीति पर अमल कर रही है. अंग्रेजी के बढते वर्चस्व के इस दौर में एक प्रकार की असहजता हर उस नागरिक में लक्षित की जा सकती है जो अंग्रेजी का प्रयोग अपने दैनिक जीवन में करने का अभ्यस्त नहीं है. जिस तरह से अंग्रेजी स्कूलों का जोर बढा है और देश की तमाम नौकरियों के लिए अंग्रेजी को जरूरी सा बनाने की सांस्थानिक कोशिशें तेज हुई हैं उसे देखते हुए इस देश में इस देश में यह एक बहस का मुद्दा बनना चाहिए कि इस युग में शिक्षित भारतीय क्या हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं के बदले अंग्रेजी को इस देश में राजकाज, शिक्षा और दैनिक जीवन में तरजीह देने के लिए तैयार होने की दिशा में बढ रहा है या नहीं.
अंग्रेजी विरोध के आन्दोलन का युग बीत गया लगता है. जिस तरह हमारे सामाजिक जीवन के तीन क्षेत्रों - शिक्षा, मनोरंजन और राजकाज की भाषा के रूप में अंग्रेजी का वर्चस्व बढा है वह एक विचारणीय प्रश्न है. इस बिन्दु पर बहुधा लोग कुछ अतिप्रचलित उदाहरणों, उद्धरणों का प्रयोग करते हैं. जैसे- " कह दो गांधी को वह अंग्रेजी नहीं जानता", " मातृभाषा में ही हमारा स्वस्थ विकास हो सकता है " आदि आदि. इस तरह की बातों को दुहराते हुए, हिन्दी दिवसों का पालन करते हुए इसे अब झुठलाया नहीं जा सकता है कि इस देश में भाषा का मुद्दा एक खतरनाक मोड पर पहुंच गया है.
हिन्दी का भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में "राष्ट्रीय" बनना एक विचारधारात्मक संघर्ष का परिणाम था. कम से कम जब से गांधी जी नेतृत्व में आये थे हिन्दी राष्ट्रीय आन्दोलन की भाषा बन गयी थी. एक बार बाल गंगाधर तिलक कलकत्ता के मछुआ बाज़ार में भाषण देने आए. गांधीजी हिन्दी में बोल चुके थे और तिलक को लगा कि अगर वे अंग्रेजी में बोलेंगे तो जनता पर अपेक्षित प्रभाव पैदा नहीं होगा. वे सार्वजनिक जीवन में पहली बार हिन्दी में बोले और इसका बहुत अच्छा प्रभाव पडा. इसके बाद तिलक हिन्दी में ही बोलने लगे. यह गांधी का ही प्रभाव था. कलकत्ता के शिक्षित लोग एक बार गांधीजी के सोदपुर आने पर उनसे आग्रह करने लगे कि वे हिन्दी में न बोलें. गांधीजी ने उनलोगों को फटकार लगाई और हिन्दी में बोले. वह एक बेहद दिलचस्प अध्याय है जिसमें 1927 में गांधी हिन्दी के पक्ष में इस तरह बोले कि आज का हिन्दी वाला भी शर्मा जाए. अपने आचरण से भी गांधी ने हिन्दी को बहुप्रचारित किया. गोविन्द बल्लभ पंत अल्मोडा में अंग्रेजी माध्यम से पढे थे और वे अंग्रेजी में गांधी को पत्र लिखते थे जिसका उत्तर गांधी हिन्दी में देते थे. शर्म आने पर पंत भी उन्हें हिन्दी में पत्र लिखने लगे. इस तरह के ढेरों उदाहरण दिए जा सकते हैं लेकिन गांधी की भाषा पर कम विचार किया जाता है. इसे विडंबना ही कहना चाहिए कि गांधी के भाषणों और पत्रों का जो संकलन गांधी समग्र में आया है उनमें से अधिकतर पहले छपे अंग्रेजी वाड्गमय के हिन्दी अनुवाद है. मूल रूप से ये भाषण हिन्दी में दिए गए थे!
इन बातों को पुराने युग के कॉमन सेंस में इस लिए स्वीकृत माना गया था क्योंकि उस समय राष्ट्रीय स्वप्न और विचारधारा का जोर था जिसमें एक राष्ट्र, एक भाषा की बात को समर्थन था. सुदीप्त कविराज यह स्मरण कराते हैं कि इस देश में राष्ट्रीय स्वप्न ने भारतीय भाषाओं ने अपना स्वरूप तैयार किया था न कि अंग्रेजी में. उत्तर औपनिवेशिक भारत में अंग्रेजी बनी रही और वैश्वीकरण के दौर में तो यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि यह नये 'इंडिया' की भाषा बन जायेगी.
इस ग्लोबल युग में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि इस देश में शासन और शिक्षा की असली भाषा अंग्रेजी ही है. आकडों को दिखला कर यह कहना कि इस देश में शिक्षा की भाषा भारतीय भाषाएं हैं एक छलावा ही है. जिसे हिन्दी माध्यम का स्कूल कॉलेज कहा जाता है वहां हिन्दी के अलावा सबकुछ अंग्रेजी में तैयार पाठ्यक्रमों का अनुवाद ही पढाया जाता है. दो तीन दशक पहले तक शिक्षकों की कोशिशों से कुछ प्रयत्न होते थे कि अन्य विषयों को भी हिन्दी में उचित तरीके से पढाया जाए पर अब सब कुछ मानो अंग्रेजी की नकल पर ही होने लगा है. लगभग हर समाजविज्ञान के क्षेत्र में सभी राष्ट्रीय संस्थाएं अंग्रेजी में काम करती हैं. तकनीकी क्षेत्रों की बात छोड ही दें जहां हिन्दी में काम करने में अपेक्षाकृत रूप में कठिनाई है. इसे क्या कहा जाए कि इतिहास अध्ययन के क्षेत्र में वार्षिक अधिवेशन में कोई भी पर्चा हिन्दी में नहीं छप सकता जबकि विकल्प देने पर कम से कम पचास फीसदी से ज्यादा पर्चे हिन्दी में प्रस्तुत किए जाएंगे. एक बार फ्रांस से पी एच डी किए लाल बहादुर वर्मा हिन्दी में पर्चा पढने लगे तो एक ख्यात हिन्दी भाषी इतिहासकार ने जिस तरह उन्हें घूरा और हतोत्साहित किया उसे वर्मा 'जीवन में न भूलने वाला अनुभव' मानते हैं. दरअसल, हिन्दी पर हमला कई तरह से किया जाता है. इस मुद्दे पर इस देश के एलिट समुदाय में अद्भुत एका है. हिन्दी में लिखे लेखों और पुस्तकों को दर्ज ही नहीं किया जाता. इस बार इंडियन हिस्टॉरिकल इंसटीच्यूट के मुंबई वार्षिक अधिवेशन में अर्चना ढेरे (जो मराठी साहित्य की प्राध्यापिका हैं ) ने एक अविस्मरणीय बीज वक्तव्य हिन्दी में दिया. यह तय मानिए कि इस वक्तव्य को हिन्दी में दिए जाने के कारण कभी भी प्रमुखता से कहीं भी छापा नहीं जाएगा. संभव है इस तरह के वक्तव्य हिन्दी में देने वाले लोग अपवाद के रूप में भी न दिखें. अंग्रेजी एलिट में हिन्दी के विरूद्ध जो एका है उसे समझकर हिन्दी भाषी बौद्धिकों ने तैयारी करने की सख्त जरूरत है. यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस देश में हर भाषा के सम्मान के लिए सबसे ज्यादा तत्पर उस समाज के उदार लोग नहीं हैं. ये उन्नत सोच वाले उदार लोग अंग्रेजी के साथ हैं.
शिक्षा और राजकाज के अतिरिक्त जो इलाका अंग्रेजी की दखल में चला जा रहा है वह इस दौर के सांस्कृतिक संकट को सबसे अच्छी तरह से स्पष्ट करता है. वह क्षेत्र है मनोरंजन का. इस देश में हिन्दी फिल्म और क्रिकेट बहुत लोकप्रिय है. इन दोनों क्षेत्रों में अंग्रेजी ने चोर दरवाजे से अपना वर्चस्व बनाया है. हिन्दी फिल्म का लगभग हर शख्स फिल्म के अलावा बाकी सब जगहों पर अंग्रेजी में बोलता है या बोलना चाहता है. सिर्फ बंगाल में आनंद बाजार ग्रुप की नीतियों के कारण फिल्म जगत के लोग बांग्ला भाषी जनता के लिए हिन्दी में बोलते हैं ! लता मंगेशकर, आशा भौंसले आदि कुछ गायकों को छोडकर कोई छोटी बडी फिल्मी हस्ती हिन्दी में बोलती दिखाई नहीं देती. क्रिकेट की कमेंट्री अब अंग्रेजी में ही होती है. भला हो दूरदर्शन की पुरानी नीतियों का कि एक कोने में एक टी वी दे दिया जाता है जिसे देखकर सुशील दोषी जैसे हिन्दी के यशस्वी कमेंट्रेटर हिन्दी में कमेंट्री करते हैं. यह बात गौर करने की है कि आज भी सुशील दोषी साफ सुथरी हिन्दी में बेहतरीन कमेंट्री करते हैं. हमें उनका कृतज्ञ होना चाहिए. जिन लोगों ने हिन्दी में कमेंट्री की शुरूआत की थी, मसलन अरूण लाल, मोहिन्दर अमरनाथ, मनिंदर सिंह आदि वे सब अब अंग्रेजी में कमेंट्री करने लगे. कपिलदेव जैसे लोग हिंदी कमेंट्री के लिए तैयार नहीं. वे अंग्रेजी कमेंट्री करना चाहते है जिसके लिए चैनल वाले तैयार नही ! हम सब मिलकर अब नहीं चेते और इस तरह के तर्क देते रहे कि बाज़ार तो हिन्दी के साथ है और भले ही अंग्रेजी में बोला जाता हो लेकिन अर्थ ग्रहण हिन्दी में होता है, हम भूल कर रहे हैं. खतरा यहां तक बढ गया है कि हिन्दी के लोग भी अंग्रेजी शैली में सोचने विचारने के अभ्यस्त होने लगे हैं, अपनी हिन्दी छवि को छुपाने लगे हैं. जो लोग हिन्दी के अध्यापक हैं वे जब अंग्रेजी में या अंग्रेजीनुमा हिन्दी में बोलने दिखने की होड में दिखते हैं तो उन तमाम नौजवानों को बेहद निराशा होती है जो इस संकट के दौर में भी अपनी भाषा में काम करना चाहते हैं. हिन्दी समाज के प्रबुद्ध लोगों को इस दिशा में काम करने की संभावनाओं को बढाने की कोशिश करनी चाहिए. तभी वह सहज माहौल हम जन माध्यमों में पाएंगे जो हिन्दी के आते ही सहज ही टी वी के पर्दे पर आ जाता है. पर इस सांस्कृतिक माहौल को हम अपनी भाषा के प्रति दायित्वशील होकर ही हासिल कर सकते हैं.
Saturday, 18 December 2010
मुस्लिम लीग और साम्प्रदायिक राजनीति पर डॉ गिरीश पाण्डेय की पुस्तक का लोकार्पण
मुस्लिम लीग और साम्प्रदायिक राजनीति पर डॉ गिरीश पाण्डेय की इतिहास पुस्तक का लोकार्पण भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ के एन दुबे ने भागलपुर के सुंदरवती महिला कॉलेज में किया. इस अवसर पर बडी संख्या में स्थानीय विद्वान एवं आमंत्रित वक्ता उपस्थित थे. यह एक अत्यंत जरूरी किताब है जिसमें साम्प्रदायिक राजनीति के उन पक्षों पर प्रामाणिक दस्तावेजों की मदद से गंभीरतापूर्वक विचार किया गया है. डॉ दीपक मलिक ने इसकी भूमिका में इस पुस्तक की गुणवत्ता पर विचार किया है.वे लिखते हैं- " इस पुस्तक में उपनिवेशिक दौर में राष्ट्रवाद, उपनिवेशी राज्य और साम्प्रदायिकता के जटिल अंतर्संपर्कों की गहन पडताल की है."
मित्र गण इस पुस्तक को पढकर हिंदी में ऐसी पुस्तक के प्रकाशन के लिए प्रसन्न होंगे.
मित्र गण इस पुस्तक को पढकर हिंदी में ऐसी पुस्तक के प्रकाशन के लिए प्रसन्न होंगे.
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Sunday, 3 October 2010
Bihar ke yashashvi patrakar
बिहार की पत्रकारिता के गौरव क्रूपाकरण
बिहार से एक हजार किलोमीटर से ज्यादा दूर पांडिचेरी में जन्मे पी॰के॰ क्रूपाकरण (पांडिचेरी कनक सभापति क्रूपाकरण) ने बिहार और बिहार की पत्रकारिता को अपनी जिंदगी क्यों दे दी? एक तमिल भाषी, अंग्रेजी पत्रकार ने क्यों बिहार की धरती, बिहार की भाषा, बिहार की संस्कृति को इतनी तरजीह दी? बिहार के बौद्धिक परिवेश में उनके जाने के बाद उनके व्यक्तित्व पर बहस-विमर्श का एक दौर शुरू हो गया है। पिछले दिनों, बिहार के सबसे ज्यादा जाग्रत विचार केन्द्र गाँधी संग्रहालय में बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन और गाँधी संग्रहालय के संयुक्त तत्वाधान में क्रूपाकरण स्मृति गोष्ठी का आयोजन किया गया।
गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए बी॰बी॰सी॰ लंदन के बिहार प्रमुख पत्रकार मणिकांत ठाकुर ने बताया कि उन्होंने किस तरह ठोक-ठोक कर मुझे प्रोपीपुल रिर्पोटिंग की शिक्षा दी। वे कहते थे-प्रोपीपुल रिपोर्टिंग से रिपोर्ट में जान आ जाती है। मैं प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से सवाल करने की हिम्मत नहीं जुटा रहा था। क्रूपाकरण जी ने रास्ते में इस तरह मुझे उत्साहित कर दिया कि जब मैंने इंदिरा जी से एक कड़ा सवाल पूछा तो इंदिरा जी ने उस सवाल का सही जवाब तो नहीं दिया पर सवालकर्ता को चुप करने के लिए मेरे बारे में ऐसी टिप्पणी कर दी कि सबको हँसने के लिए मजबूर कर दिया। आज मैं क्रूपाकरण जी को अपने जीवन का संबल और बिहार की पत्रकारिता का एक शिखर पत्रकार मानता हूँ।
अर्थशास्त्री प्रोफेसर नवल किशोर चैधरी ने कहा कि जे॰पी॰ आंदोलन में इंडियन एक्सप्रेस की बड़ी भूमिका थी। उस समय बहस के केन्द्र में अखबार की खबरें रहती थीं। जिस आंदोलन के लैंडमार्क जे॰पी॰ थे, उस आंदोलन को ताकतवर बनाने में क्रूपाकरण जी जैसे पत्रकार की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण थी। क्रूपाकरण जी के बारे में विश्वविद्यालयों और पत्रकारिता संस्थानों में अध्ययनरत युवा पत्रकारों को जानने की जरूरत है।
दो दशक तक विधान पार्षद रहे समाजवादी नेता और क्रूपाकरण जी के घनिष्ठ मित्र इंद्र कुमार ने कहा कि जे॰पी॰ आंदोलन की गर्भ से निकले नेता लोग टिकट बांटने-मांगने में इतने व्यस्त हैं कि क्रूपाकरण जी को भूल गये, ऐसे नेताओं का पत्रकार बिरादरी बहिष्कार करे। इंद्रकुमार ने क्रूपाकरण जी की याद में डाक बंगला चैराहा के पास विद्यालय उपनिरीक्षिका परिसर के पुराने परिसर में सरकारी सौजन्य से काफी हाउस शुरू करने की माँग की। वरिष्ठ अंगे्रजी पत्रकार और ‘द मेसेनिक टाइम’ के लेखक अभय सिंह ने क्रूपाकरण जी को अपनी पत्रकारिता का एक आइकान बताया।
गाँधीवादी डा॰ रजी अहमद ने कहा कि इंडियन एक्सप्रेस, इमरजेंसी, जे॰पी॰ और क्रूपाकरण एक दूसरे के पूरक हो गये हैं। जिस टेलीप्रिंटर से क्रूपाकरण जी समाचार भेजते थे, वही टेलीप्रिंटर आंदोलन के बारे में देश भर से सूचना प्राप्त करने का माध्यम था। क्रूपाकरण जी सर्चलाईट के पत्रकार मास्टर साहब की बराबर चर्चा किया करते थे कि किस तरह मास्टर साहब बांस घाट पर अपनी पत्नी की जलती हुई चिता छोड़कर साईकिल से खबर भेजने दफ्तर आ गये थे। उस समय मंटू घोष, आजाद साहब, मास्टर साहब, क्रूपाकरण जैसे पत्रकारों की एक पीढ़ी थी, जिनके बारे में जानना नई पीढ़ी के लिए जरूरी है।
जे॰पी॰ आंदोलन के नेता अख्तर हुसैन ने कहा- समाचारों से संघर्ष की जो धारा बनती है, क्रूपाकरण जी उस धारा के नायक थे। उन्होंने राजनीति और नैतिकता से जुड़े कुछ ऐसे सवाल मुझसे पूछ लिये थे, जो जीवन में किसी दूसरे ने कभी नहीं पूछे। ऐसा कहते हुए हुसैन रो पड़े।
युवा पत्रकार इमरान ने सिर्फ एक बार की मुलाकात का जिक्र करते हुये बताया कि उन्होंने कहा था- पत्रकारिता फार या एगेंस्ट नहीं होती है। पत्रकारिता अंततः सत्य ही होती है। नयी पीढ़ी को उत्साहित करने के लिए क्रूपाकरण स्मृति पत्रकारिता आवार्ड की शुरुआत होनी चाहिए।
नन्दीग्राम डायरी के लेखक पुष्पराज ने कहा कि तमिल, तेलुगू, मलयालम, बांग्ला, उर्दू, संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी सहित आठ भाषाओं के ज्ञाता क्रूपाकरण को बिहार की पत्रकारिता के पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के महासचिव अरुण कुमार ने कहा कि यूनियनों के अवसान का यह काल बुरे दौर से गुजर रहा है। ऐसे में यूनियन को नया जीवन दिलाने के लिए हम क्रूपाकरण जी को याद कर रहे हैं। गोष्ठी में एस॰यू॰सी॰आई॰ केन्द्रीय कमिटि सदस्य अरूण सिंह, पत्रकार अमित कुमार, रंगकर्मी अनीश अंकुर सहित शहर के कई गणमान्य बुद्धिजीवी शरीक थे।
(Mediamorcha se sabhar)
बिहार से एक हजार किलोमीटर से ज्यादा दूर पांडिचेरी में जन्मे पी॰के॰ क्रूपाकरण (पांडिचेरी कनक सभापति क्रूपाकरण) ने बिहार और बिहार की पत्रकारिता को अपनी जिंदगी क्यों दे दी? एक तमिल भाषी, अंग्रेजी पत्रकार ने क्यों बिहार की धरती, बिहार की भाषा, बिहार की संस्कृति को इतनी तरजीह दी? बिहार के बौद्धिक परिवेश में उनके जाने के बाद उनके व्यक्तित्व पर बहस-विमर्श का एक दौर शुरू हो गया है। पिछले दिनों, बिहार के सबसे ज्यादा जाग्रत विचार केन्द्र गाँधी संग्रहालय में बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन और गाँधी संग्रहालय के संयुक्त तत्वाधान में क्रूपाकरण स्मृति गोष्ठी का आयोजन किया गया।
गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए बी॰बी॰सी॰ लंदन के बिहार प्रमुख पत्रकार मणिकांत ठाकुर ने बताया कि उन्होंने किस तरह ठोक-ठोक कर मुझे प्रोपीपुल रिर्पोटिंग की शिक्षा दी। वे कहते थे-प्रोपीपुल रिपोर्टिंग से रिपोर्ट में जान आ जाती है। मैं प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से सवाल करने की हिम्मत नहीं जुटा रहा था। क्रूपाकरण जी ने रास्ते में इस तरह मुझे उत्साहित कर दिया कि जब मैंने इंदिरा जी से एक कड़ा सवाल पूछा तो इंदिरा जी ने उस सवाल का सही जवाब तो नहीं दिया पर सवालकर्ता को चुप करने के लिए मेरे बारे में ऐसी टिप्पणी कर दी कि सबको हँसने के लिए मजबूर कर दिया। आज मैं क्रूपाकरण जी को अपने जीवन का संबल और बिहार की पत्रकारिता का एक शिखर पत्रकार मानता हूँ।
अर्थशास्त्री प्रोफेसर नवल किशोर चैधरी ने कहा कि जे॰पी॰ आंदोलन में इंडियन एक्सप्रेस की बड़ी भूमिका थी। उस समय बहस के केन्द्र में अखबार की खबरें रहती थीं। जिस आंदोलन के लैंडमार्क जे॰पी॰ थे, उस आंदोलन को ताकतवर बनाने में क्रूपाकरण जी जैसे पत्रकार की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण थी। क्रूपाकरण जी के बारे में विश्वविद्यालयों और पत्रकारिता संस्थानों में अध्ययनरत युवा पत्रकारों को जानने की जरूरत है।
दो दशक तक विधान पार्षद रहे समाजवादी नेता और क्रूपाकरण जी के घनिष्ठ मित्र इंद्र कुमार ने कहा कि जे॰पी॰ आंदोलन की गर्भ से निकले नेता लोग टिकट बांटने-मांगने में इतने व्यस्त हैं कि क्रूपाकरण जी को भूल गये, ऐसे नेताओं का पत्रकार बिरादरी बहिष्कार करे। इंद्रकुमार ने क्रूपाकरण जी की याद में डाक बंगला चैराहा के पास विद्यालय उपनिरीक्षिका परिसर के पुराने परिसर में सरकारी सौजन्य से काफी हाउस शुरू करने की माँग की। वरिष्ठ अंगे्रजी पत्रकार और ‘द मेसेनिक टाइम’ के लेखक अभय सिंह ने क्रूपाकरण जी को अपनी पत्रकारिता का एक आइकान बताया।
गाँधीवादी डा॰ रजी अहमद ने कहा कि इंडियन एक्सप्रेस, इमरजेंसी, जे॰पी॰ और क्रूपाकरण एक दूसरे के पूरक हो गये हैं। जिस टेलीप्रिंटर से क्रूपाकरण जी समाचार भेजते थे, वही टेलीप्रिंटर आंदोलन के बारे में देश भर से सूचना प्राप्त करने का माध्यम था। क्रूपाकरण जी सर्चलाईट के पत्रकार मास्टर साहब की बराबर चर्चा किया करते थे कि किस तरह मास्टर साहब बांस घाट पर अपनी पत्नी की जलती हुई चिता छोड़कर साईकिल से खबर भेजने दफ्तर आ गये थे। उस समय मंटू घोष, आजाद साहब, मास्टर साहब, क्रूपाकरण जैसे पत्रकारों की एक पीढ़ी थी, जिनके बारे में जानना नई पीढ़ी के लिए जरूरी है।
जे॰पी॰ आंदोलन के नेता अख्तर हुसैन ने कहा- समाचारों से संघर्ष की जो धारा बनती है, क्रूपाकरण जी उस धारा के नायक थे। उन्होंने राजनीति और नैतिकता से जुड़े कुछ ऐसे सवाल मुझसे पूछ लिये थे, जो जीवन में किसी दूसरे ने कभी नहीं पूछे। ऐसा कहते हुए हुसैन रो पड़े।
युवा पत्रकार इमरान ने सिर्फ एक बार की मुलाकात का जिक्र करते हुये बताया कि उन्होंने कहा था- पत्रकारिता फार या एगेंस्ट नहीं होती है। पत्रकारिता अंततः सत्य ही होती है। नयी पीढ़ी को उत्साहित करने के लिए क्रूपाकरण स्मृति पत्रकारिता आवार्ड की शुरुआत होनी चाहिए।
नन्दीग्राम डायरी के लेखक पुष्पराज ने कहा कि तमिल, तेलुगू, मलयालम, बांग्ला, उर्दू, संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी सहित आठ भाषाओं के ज्ञाता क्रूपाकरण को बिहार की पत्रकारिता के पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के महासचिव अरुण कुमार ने कहा कि यूनियनों के अवसान का यह काल बुरे दौर से गुजर रहा है। ऐसे में यूनियन को नया जीवन दिलाने के लिए हम क्रूपाकरण जी को याद कर रहे हैं। गोष्ठी में एस॰यू॰सी॰आई॰ केन्द्रीय कमिटि सदस्य अरूण सिंह, पत्रकार अमित कुमार, रंगकर्मी अनीश अंकुर सहित शहर के कई गणमान्य बुद्धिजीवी शरीक थे।
(Mediamorcha se sabhar)
Friday, 17 September 2010
रवींद्रनाथ की देश-चिंता
रवींद्रनाथ की देश-चिंता ; कुछ प्रसंग
हितेन्द्र पटेल एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास विभाग, रवींद्र भारती
विश्वविद्यालय, कोलकाता.
रवींद्रनाथ ठाकुर को इस देश में आधुनिक समय के सबसे विख्यात संस्कृति
पुरूष के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है. लगभग सभी भारतीय भाषाओं के
लेखकों- पाठकों ने उन्हें सम्मान दिया है. गाँधी के बाद सबसे अधिक उन्हीं
के नाम से विभिन्न सरकारी और सार्वजनिक स्थलों के नाम भी रखे गये हैं.
ऐसी अनेक कविताएं और लेख भारत की विभिन्न भाषाओं में मिल जाते हैं जिसके
आधार पर यह कहना अनुचित न होगा कि पूरे भारत के साहित्यकारों ने पाठकों
को अपना कवि माना है. वे बंग्ला के कवि भले ही हों वे सही अर्थों में
पूरे आधुनिक भारतीय साहित्य के सबसे महान प्रतिनिधि माने गये हैं. नेहरू
का यह कथन कि उनके दो गुरू हैं- गांधी और रवींद्रनाथ इस बात के प्रमाण
हैं कि उन्हें सिर्फ साहित्यिक नहीं एक सांस्कृतिक पुरूष के रूप में
सम्मान दिया गया है.
इन सब बातों के आधार पर यह मान लिया जाना युक्ति-संगत नहीं होगा कि उनकी
सच्ची विरासत को लोगों के सामने उचित ढंग से रखा गया है. अधिकतर जगहों पर
उनके नाम का प्रयोग तो बहुत मिलता है लेकिन उनके विचारों के प्रति गहरा
सरोकार नहीं दिखता. आज वैश्वीकरण के युग में उन्हें ठीक से कितना पढते
हैं इसके बारे में बहुत उत्साह वर्द्धक टिप्पणी करना मुश्किल ही होगा. यह
कहना शायद ठीक होगा कि गाँधी की तरह उनके नाम का प्रयोग तो बहुत अधिक हुआ
है लेकिन उनके सरोकारों और उनके संघर्षों को भुला दिया गया. इस आलेख में
कुछ ऐसी बातों का उल्लेख किया गया है जिससे रवीन्द्रनाथ की सच्ची विरासत
को समझने में मदद मिल सके.
यह भ्रामक है कि रवीन्द्रनाथ अपने देश में अपने जीवन काल में सर्वप्रिय
थे. खुद उन्हीं के शब्दों में देखें. अपने एक लेख में वह कहते हैं -"
मेरे साहित्य के प्रति बहुत दिनों तक एक विरोध बना रहा. कुछ लोगों को
लगता था कि मेरी कविताएँ राष्ट्रीय हृदय से नहीं निकली हैं; कुछ लोगों ने
इसे समझ में नहीं आने वाली बतलाया और कइयों ने इन्हें अ-पूर्ण माना.
वास्तव में, मुझे अपने लोगों ने कभी भी पूरी तरह से स्वीकार नहीं
किया...". एक विद्वान ने एक दिलचस्प टिप्पणी की है जिसे ध्यान में रखा जा
सकता है. उनका एक सीधा सा प्रश्न था - रवीन्द्रनाथ अपनी उम्र के ही
विवेकानंद के साथ ही बडे हुए थे. दोनों के बीच के संबंध ऐसे थे कि लडकपन
में जब रवीन्द्रनाथ गाते थे तो विवेकानंद पखावज बजाते थे. दोनों के घर के
बीच आधा किलोमीटर से अधिक की भी दूरी नहीं थी. फिर उन दोनों महानों ने एक
दूसरे के बारे में इतना कम क्यों कहा. रवीन्द्रनाथ के एक-आध लेखों के
अलावा ज्यादा कुछ हमें नहीं मिलता. ऐसा क्यों था? इसके उत्तर में एक
सामान्य उत्तर होगा कि रवीन्द्रनाथ का परिवार ब्राह्म समाज का प्रचारक था
और विवेकानंद सनातनी वेदांती धारा के लोगों के साथ थे. पर यह व्याख्या
यथेष्ट नहीं. बंकिमचन्द्र भी हिंदूवादी मतादर्श के ही थे लेकिन उनके
प्रति रवीन्द्रनाथ ने बहुत ही आदर से लिखा. एक बार बंकिम की युवा
रवीन्द्रनाथ को फटकार ने भी रवीन्द्रनाथ के मन में बंकिम के प्रति आदर को
कम नहीं किया.
अपने एक प्रसिद्ध लेख 'कलाकार का धर्म' में रवीन्द्रनाथ ने उन्नीसवीं
शताब्दी के तीन आन्दोलनों को केन्द्रीय माना है. उनके अनुसार इन तीन
आंदोलनों ने बंगाल और पूरे देश को प्रभावित किया. ये आंदोलन थे- राजा
राममोहन राय द्वारा शुरू किया गया धार्मिक आन्दोलन, बंकिमचन्द्र
चट्टोपाध्याय द्वारा शुरू किया गया साहित्यिक आन्दोलन (जिसने अपने जादुई
छडी से सदियों से सोई हुई बंग्ला भाषा को जगा दिया) और राष्ट्रीय आंदोलन.
आमतौर पर रवींद्रनाथ को राष्ट्रवाद का विरोधी समझा जाता है लेकिन यह सही
नहीं है. यह सही है कि स्वदेशी आंदोलन के बाद उन्होंने उग्र राष्ट्रवाद
का विरोध किया था और अपने को स्वदेशी आंदोलन से एक तरह से अलग किया था.
अपने उपन्यासों में- खासकर घरे बाइरे में वे इसी रूझान को स्पष्ट करते
भी है. लेकिन वे राष्ट्रवादी आंदोलन को प्रतिक्रियावादी न मानकर
क्रांतिकारी मानते हैं जिसने अपने देश के इतिहास में देश के लोगों का
विश्वास पैदा किया और इस भ्रम को तोडा कि यूरोप की नकल में कोई मान है.
यह सब उसी लेख में स्पष्टत: लिखा है जिसकी चर्चा ऊपर की गयी है.
रवीन्द्रनाथ के साहित्य के अध्ययन की एक समस्या यह रही है कि वे गाँधी की
तर्ह भाषा के भीतर गहरे अर्थों को लेकर चलते थे जिसके आधार पर उनकी बातों
के निहितार्थ को समझने के लिए उनके साहित्य में गहरे उतरना पडता है. थोडी
सी असावधानी से उनके साहित्य के भीतर से उल्टा अर्थ भी निकाला जा सकता
है. 'नेशनलिज्म' पर 1917 में लिखी उनकी पुस्तक के आधार पर बहुत सारे
विद्वान उन्हें राष्ट्रवादी न मानकर अंतर्राष्ट्रीय मनोभाव का कवि-विचारक
मानते हैं, लेकिन यह उनके विचारों का एक अधूरा पाठ है. रवींद्रनाथ हमेशा
अपने देश की संस्कृति, इतिहास और परंपरा को एक भारतीय दृष्टि से देखते
थे. इस भारतीय दृष्टि का एक नमूना वह लेख है जिसमें वे सभ्यता पर विचार
करते हैं. अपने एक लेख में कहा है कि उनके लिए यूरोप से आयातित
'सिविलाइजेशन' शब्द के लिए भारत में जो सबसे उपयुक्त शब्द है वह है धर्म.
यह धर्म उनके लिए कोई संगठित धर्म नहीं बल्कि वे मूल्य हैं जिसे व्यक्ति
अपने जीवन में लेकर चलता है. इस बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने एक
सुंदर उदाहरण दिया है. अपने एक अनुभव का उल्लेख करते हुए वे बताते हैं कि
एक बार कलकत्ता आते हुए रास्ते में उनकी मोटर में खराबी आ गयी और उसे फिर
से चलाने के लिए बार बार पानी की जरूरत थी. कुल सौ किलोमीटर की यात्रा
में कई बार गरीब लोगों ने उन्हें बहुत परिश्रम से पानी लाकर पानी दिया.
उसके बदले में किसी भी गरीब ने पैसे लेने से इंकार कर दिया. हालाँकि उन
गरीबों को पैसे की बहुत जरूरत थी. इस यात्रा में जब गाडी कोलकाता के
नज़दीक पहुंची जहाँ पानी देना सुलभ था वहाँ इसके बदले में आदमी ने पैसे
माँगे. रवींद्रनाथ ने लिखा है कि अगर गरीब लोग पानी का व्यवसाय करते तो
उनको बहुत फायदा होता लेकिन किसी प्यासे को पानी पिलाना या जरूरत-मंद को
पानी देकर या खाना खिलाकर उसके बदले पैसे लेना ये गरीब धर्म के विरूद्ध
समझते हैं. इन लोगों की दुनियावी जरूरत और उनके धर्म के बीच के इस संबंध
को रखते हुए रवींद्रनाथ कुछ टिप्पणियाँ करते है. वे कहते हैं कि जीवन के
सहज रूप में जो मूल्य लोग अपने भीतर लिए हुए चलते है (इसके लिए 'सस्टेन'
शब्द का प्रयोग किया गया है) उसकी प्राप्ति बहुत कठिन है. इस धर्म के बोध
को ही रवींद्रनाथ सभ्यता कहते हैं. (देखें- उनका प्रसिद्ध लेख-
'सिविलाइजेशन एंड प्रोग्रेस', बाउंडलेस स्काई, कोलकाता, 1964,
पुनर्मुद्रित 2006).
आशिस नंदी ने अपनी पुस्तक राष्ट्रवाद बनाम देशभक्ति में लिखा है कि
रवींद्रनाथ को डर था कि भारतीय राष्ट्र का विचार कहीं भारतीय सभ्यता पर
प्राथमिकता न प्राप्त कर ले. वे नहीं चाहते थे कि भारतवासियों की जीवन
शैलियों का आकलन केवल भारत नामक राष्ट्र-राज्य की कसौटियों पर हो. नंदी
दिखलाते हैं कि कैसे रवींद्रनाथ राष्ट्रवादी विचारधारा से असहमत होते चले
गये. उनके अनुसार रवींद्रनाथ राष्ट्रभक्ति नहीं देशभक्ति को आधार बना कर
चले थे. उनके जीवन में नंदी अलग अलग समय पर तीन तरह की प्रवृत्तियों की
चर्चा करते हैं. उनके अनुसार रवींद्रनाथ युवावस्था में हिंदू राष्ट्रवाद
से प्रभावित थे, वयस्क होने पर वे ब्राह्मणवादी-उदार-मानवतावाद से
प्रभावित हुए और जीवन के अंतिम वर्षों में राज्य-विरोधी होने तक पहुंच
गये. यह स्थापना रवींद्रनाथ को एक ऐसे विचारक के रूप में प्रस्तुत करती
है जो निरंतर अपने विचारों को अपने जीवनानुभवों और सभ्यता-विवेक से
परिष्कृत करने वाले विचारक के रूप में प्रस्तुत करता है. एक दार्शनिक ने
गाँधी के सन्दर्भ में उनके युग-धर्म के पालन को केन्द्रीय महत्त्व दिया
है. अगर रवींद्रनाथ के संदर्भ में किसी चीज को केन्द्र में रखकर देखने के
लिए उनके सभ्यता विवेक को प्रस्तावित किया जाये तो शायद गलत नहीं होगा.
यह उनका सभ्यता-विवेक ही था जो उन्हें राष्ट्रवाद के खिलाफ खडे होने की
शक्ति प्रदान करता था. यह सर्वविदित है कि जब बंगाल का विभाजन हुआ और
बंगाल के बुद्धिजीवी कर्जन की बंगाल को बाँटकर राष्ट्रवादी शक्तियों को
कमजोर करने के इस प्रयास का विरोध शुरू हुआ रवींद्रनाथ ने इस आंदोलन की
अगुवाई की थी. उनका गीत 'आमार सोनार बांग्ला' उस समय आंदोलन का गीत बन
गया था. लेकिन, रवींद्रनाथ ने स्वदेशी आंदोलन के दौरान के अपने अनुभवों
और भारतीय सभ्यता के प्रति अपनी दृष्टि के कारण यह देख लिया कि इस
विचारधारा में क्या दोष है. वे पश्चिमी इतिहास पर आधारित राष्ट्रवाद की
अवधारणा को भारतीय संदर्भ में दोषयुक्त मानते थे. इसी कारण से वे
गरमपंथियों के आदर्शों से सहमत नहीं थे. उनके इस कथन पर ध्यान दिया जाना
चाहिए- " जिन लोगों को उनकी राजनीतिक आजादी मिल गयी है, वे जरूरी नहीं कि
आजाद ही हों. वे तो केवल ताकतवर भर हैं. उनका बेलगाम आवेश स्वाधीनता के
धोखे में गुलामी को बढावा दे रहा है." (नेशनलिज्म , 1917, पुनर्मुद्रण,
मद्रास: मैकमिलन, 1985, पृ. 68. यह अनुवाद अभय कुमार दुबे का है) यह
रवींद्रनाथ के विचार का वह महत्त्वपूर्ण बिन्दु है जहाँ वह भारतीय
राष्ट्रवाद की उस निर्मिति के विरूद्ध खडे होने का जोखिम उठाते है जिसे
आकार देने में दयानंद, विवेकानंद, अरविंद घोष और तिलक जैसे लोगों का
योगदान था. इस निर्मिति को रवींद्रनाथ अस्वीकार करते हैं. उन्हें लगता है
कि भारत के शिक्षित लोग " अपने पूर्वजों द्वारा दी गयी नसीहतों के विपरीत
इतिहास से कुछ सबक लेने की कोशिश कर रहे हैं."(नेशनलिज्म, पृ. 64)
समकालीन इतिहास के इस दबाव के सामने खडे होने के रवींद्रनाथ के इस साहस
की प्रशंसा करनी पडती है. जब राष्ट्रवाद का जोर बढ रहा हो उनमें यह विवेक
था कि वे पूछ सकें- " क्या वह (भारत) अपनी विरासत बेच कर की गई कमाई के
बदले समकालीन इतिहास की चमक-दमक भरी क्षणभंगुर निर्मितियों को खरीदेगा?"
रवींद्रनाथ के लिए भारत की असली समस्या सामाजिक है, राजनैतिक नहीं. वे
मानते थे कि भारत में राष्ट्रवाद वास्तविक अर्थ में कभी था ही नहीं. वे
30 दिसंबर 1916 को कहते हैं कि " आज हमारे देश के लोग पुरखों की दी हुई
शिक्षा के विपरीत जा रहे हैं. पूरब आज इतिहास का वह पाठ पढ रहा है" जो
उसके अपने सांस्कृतिक अनुभवों से नहीं "जन्मा है". वे जापान की तरक्की को
भी नकली मानते हैं और कहते हैं कि उसने अपने को "भीतर से विकसित नहीं
किया है." (इस महत्त्वपूर्ण वक्तव्य के लिए देखें 'नेशनलिज्म इन इंडिया'
(संक्षिप्त), 30 दिसंबर , 1916, प्रमोद शाह संकलित एवं संपादित थॉट्स ऑन
रिलिजियस पॉलिटिक्स इन इंडिया वॉल्यूम 1, कोलकाता, 2009, पृ. 283-88).
रवींद्रनाथ जिस ओर 1916 के बाद लगातार बढ रहे थे वह था मानवतावाद की एक
वैश्विक समझ. अपने उसी वक्तव्य में वे कहते हैं कि दुनिया में सिर्फ मानव
का इतिहास है और सभी देशों का इतिहास उस इतिहास के छोटे-छोटे अध्याय भर
हैं. हीरेन मुखर्जी ने 'रवींद्रनाथ और उनकी मानवतावाद की धारणा' नामक
आलेख में महान कवि के भीतर के मानवतावाद की व्याख्या सरल शब्दों में की
है जिसमें मनुष्य के भीतर प्रेरणा के उत्स को समझने के कवि प्रयास की
अभिव्यक्ति हुई है. मुखर्जी के अनुसार रवींद्रनाथ मानते थे कि हर मनुष्य
के भीतर मानव और महामानव दोनों का वास होता है. व्यक्ति मानव की
अभिव्यक्ति है और जाति उसी व्यक्ति के भीतर के महामानवोचित अंश की
अभिव्यक्ति है. व्यक्ति नश्वर है और जाति अमर. जाति व्यक्तियों का कुल
योग नहीं है. अकस्मात व्यक्ति अपने भीतर इस महामानव के सत्य का दर्शन
करता है और उस सत्य के लिए अपने प्राणों तक की परवाह नहीं करता.
रवींद्रनाथ के शब्दों में - " एक व्यापक चित्त है जो व्यक्तिगत नहीं,
विश्वगत है, जिसका परिचय अकस्मात होता है. एक दिन आह्वान आता है, अकस्मात
मानुष-सत्य के लिए प्राण देने के लिए उत्सुक होता हूँ" व्यक्ति जब इस
आह्वान को सुन पाता है तभी वह लोगों को ईश्वर समझ कर उसकी सेवा के लिए
तत्पर हो उठता है. इसी भाव का विस्तार उनके विश्वविद्यालय की परिकल्पना
में है जो विश्व के छंद पर नृत्य करना सिखलाने के लिये वे बनाना चाहते
थे. (देखें- हीरेन मुखर्जी, 'रवींद्रनाथस कॉस्पेशन ऑन
ह्यूमेनिज्म'रवींद्र भारती पत्रिका वॉल्यूम 11, 2008)
सभ्यता और प्रगति के संबंध में रवींद्रनाथ की दृष्टि बहुत ही सूक्ष्म
विश्लेषण की मांग करती हैं. वे पश्चिम की वैज्ञानिक प्रगति और उसकी
समृद्धि के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण नहीं रखते. अपने एक लेख 'द
चैलैंजिंग एज' में वे पश्चिम के उस शक्तिशाली बौद्धिक प्रकाश के महत्त्व
को समझाते हैं जिसने दुनिया को जीत लिया. इस आलोक के 'बिजली के झटके' से
कैसे भारत ने समझा कि नैतिकता और न्याय का एक मानवोचित आधार होना चाहिए
जिसमें मानव मानव के भेद को मिटा दिया. कम से कम नैतिक धरातल पर इस देश
ने पहली बार जाना कि जाति चाहे जो हो न्याय और नैतिकता के नियम सबके लिए
एक ही होंगे. इस पश्चिम के आने से ही इस देश में एक आदर्श नैतिक मानदंड
तैयार हो सका. इसके लिए वे पश्चिम की प्रशंसा करते हैं. साथ ही वे लिखते
हैं कि पश्चिमी साहित्य, खासकर अंग्रेज़ी साहित्य के सम्पर्क में आकर
हमलोगों ने न सिर्फ भावना के गहरे संसार को जानना-समझना सीखा बल्कि
मनुष्य को मनुष्य के शोषण से मुक्त करने की भावना का भी विकास किया. अपने
सत्तरवे वर्ष में लिखे इस आलेख में (यानि 1931 ई. में) वे स्पष्ट रूप से
कहते हैं कि यह युग "यूरोप के साथ आंतरिक (इनवार्ड) सहयोग का युग है".
इतना कहने के बाद रवींद्रनाथ उस ओर जाते हैं जहाँ से वे इस पश्चिम के
शक्ति-जनित सभ्यता का दूसरा चेहरा भी दिखलाते है. वे इस पश्चिम के नैतिक
धरातल से गिरने को विश्वयुद्ध से जोडते हैं. वे कहते हैं कि विश्वयुद्ध
के बाद ऐसा लगता है कि यूरोप ने अपनी शुद्धता और सभ्यता का विवेक
('सैनिटी) को खो दिया है. वे एक सूत्र देते हैं जो मानो रवींद्रनाथ का
संदेश हो उन सबके लिए जो समाज में परिवर्त्तन के पक्षधर हैं. वे कहते हैं
कि हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि जो सबसे शक्तिशाली हैं उनका
दायित्त्व भी सबसे ज्यादा है. उनका अपराध ही सबसे घृणित है. वे यूरोप की
इस शक्तिशाली सभ्यता के पतन को अपरिहार्य मानते हुए भारतवासियों को
प्रगति के यूरोपीय मॉडल को न मानने की सलाह देते हैं. वे कहते हैं कि
उनका हृदय दु:ख से भर उठता है जब वे देखते हैं कि इस देश के पढे-लिखे लोग
बडे, शक्तिशाली, और तेजी वाली चीजों के प्रति आकर्षण देखते हैं. प्रगति
का जो आदर्श आंतरिक आदर्श से नहीं जुडता और हमें अपने दायित्व के प्रति
सचेत नहीं करता. यह हमें अधर्म की ओर ले जाता है. यह अधर्म हमें तेजी से
शक्तिशाली तो बना सकता है जिससे हम शत्रु को परास्त भी कर सकते हैं.
लेकिन, यह हमें भीतर से नष्ट कर देता है. वे कहते हैं - " इस धन और शक्ति
में विनाश के बीज हैं. पश्चिम में इस सम्पत्ति को मानव-रक्त से सींचा गया
है जिसकी फसल अभी लहलहा रही है." वे इस खुशहाल, शक्तिशाली पश्चिम की नकल
को भारत जैसी सभ्यता में जन्मे-पले लोगों द्वारा ललचाई निगाह से देखने को
दुर्भाग्यपूर्ण मानते थे. ईश्वर ने जिसे आंतरिक शक्ति से लबालब, आनंद से
भरपूर, फूल और सितारों के संगीत से भर रखा हो उसे क्या लालच से भरकर उस
रास्ते पर चलना चाहिए जिसमें वस्तु से शून्य (थिंग टू नथिंग) की यात्रा
होती हो?
रवींद्रनाथ का स्मरण उनकी पूजा करते हुए, विनाशकारी पश्चिम की अनैतिकता
फैलाती प्रगति की ओर दौड लगाते हुए करना उस महान सभ्यता विवेक और देशज
नैतिकता-बोध से भरे संस्कृति पुरूष का उपहास करना ही है. आज जरूरत इस बात
की है कि गांधी के साथ हम रवींद्रनाथ की दृष्टि के साथ अपने भीतर के
व्यक्ति और महामानव के बीच से महामानवोचित आदर्श का वरण करें. यही
रवींद्रनाथ को उनके 150वें वर्ष में हमारा संकल्प होना चाहिए. किसी खंडित
दृष्टि को रखकर, जैसा कि कई सम्प्रदायवादी और क्षेत्रवादी विचार सरणियों
से जुडे लोग करते हैं, या सर्वग्रासी प्रगति की ओर अंधाधुंध दौड लगाने
वाले लोग रवींद्रनाथ का नाम तो बहुत लेंगे लेकिन उनके विचारों से उनका
दूर दूर का रिश्ता नहीं होगा. रवींद्रनाथ की दृष्टि की व्यापकता का एक
उदाहरण देकर इस संक्षिप्त आलेख का समापन ठीक होगा.
आज रवींद्रनाथ को बंगाली जातीयता के महानायक बनाकर देखने का चलन है.
अन्नदाशंकर राय ने अपने संस्मरण में रवींद्रनाथ से जुडी एक बात का उल्लेख
किया है. प्रशासनिक परीक्षा में उत्तीर्ण होकर अन्नदाशंकर रवींद्रनाथ से
मिलने गए और यह बतलाया कि वे चाहते तो भारत के किसी भी भाग में जाकर
नौकरी कर सकते थे लेकिन, अपने बंग-माटी के प्रेम के कारण, उसे और समझने
के लिए उन्होंने इसी राज्य में सेवा करने का निश्चय किया. उन्हें लगा कि
इस बात से प्रसन्न होकर रवींद्रनाथ उनके बंगाल प्रेम को सराहेंगे लेकिन,
हुआ ठीक उल्टा. रवींद्रनाथ ने कहा कि यह ठीक नहीं हुआ. उन्होंने कहा कि
बंगाल तो उसका घर है इसलिए इसको तो वे कभी भी, देर-सवेर जान ही लेते
लेकिन देश के अन्य भाग को जानने समझने का, अपने देश के दूसरे हिस्से की
सेवा करने का, उससे जुडने का ऐसा मौका उन्हें नहीं चूकना चाहिए था !
हितेन्द्र पटेल एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास विभाग, रवींद्र भारती
विश्वविद्यालय, कोलकाता.
रवींद्रनाथ ठाकुर को इस देश में आधुनिक समय के सबसे विख्यात संस्कृति
पुरूष के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है. लगभग सभी भारतीय भाषाओं के
लेखकों- पाठकों ने उन्हें सम्मान दिया है. गाँधी के बाद सबसे अधिक उन्हीं
के नाम से विभिन्न सरकारी और सार्वजनिक स्थलों के नाम भी रखे गये हैं.
ऐसी अनेक कविताएं और लेख भारत की विभिन्न भाषाओं में मिल जाते हैं जिसके
आधार पर यह कहना अनुचित न होगा कि पूरे भारत के साहित्यकारों ने पाठकों
को अपना कवि माना है. वे बंग्ला के कवि भले ही हों वे सही अर्थों में
पूरे आधुनिक भारतीय साहित्य के सबसे महान प्रतिनिधि माने गये हैं. नेहरू
का यह कथन कि उनके दो गुरू हैं- गांधी और रवींद्रनाथ इस बात के प्रमाण
हैं कि उन्हें सिर्फ साहित्यिक नहीं एक सांस्कृतिक पुरूष के रूप में
सम्मान दिया गया है.
इन सब बातों के आधार पर यह मान लिया जाना युक्ति-संगत नहीं होगा कि उनकी
सच्ची विरासत को लोगों के सामने उचित ढंग से रखा गया है. अधिकतर जगहों पर
उनके नाम का प्रयोग तो बहुत मिलता है लेकिन उनके विचारों के प्रति गहरा
सरोकार नहीं दिखता. आज वैश्वीकरण के युग में उन्हें ठीक से कितना पढते
हैं इसके बारे में बहुत उत्साह वर्द्धक टिप्पणी करना मुश्किल ही होगा. यह
कहना शायद ठीक होगा कि गाँधी की तरह उनके नाम का प्रयोग तो बहुत अधिक हुआ
है लेकिन उनके सरोकारों और उनके संघर्षों को भुला दिया गया. इस आलेख में
कुछ ऐसी बातों का उल्लेख किया गया है जिससे रवीन्द्रनाथ की सच्ची विरासत
को समझने में मदद मिल सके.
यह भ्रामक है कि रवीन्द्रनाथ अपने देश में अपने जीवन काल में सर्वप्रिय
थे. खुद उन्हीं के शब्दों में देखें. अपने एक लेख में वह कहते हैं -"
मेरे साहित्य के प्रति बहुत दिनों तक एक विरोध बना रहा. कुछ लोगों को
लगता था कि मेरी कविताएँ राष्ट्रीय हृदय से नहीं निकली हैं; कुछ लोगों ने
इसे समझ में नहीं आने वाली बतलाया और कइयों ने इन्हें अ-पूर्ण माना.
वास्तव में, मुझे अपने लोगों ने कभी भी पूरी तरह से स्वीकार नहीं
किया...". एक विद्वान ने एक दिलचस्प टिप्पणी की है जिसे ध्यान में रखा जा
सकता है. उनका एक सीधा सा प्रश्न था - रवीन्द्रनाथ अपनी उम्र के ही
विवेकानंद के साथ ही बडे हुए थे. दोनों के बीच के संबंध ऐसे थे कि लडकपन
में जब रवीन्द्रनाथ गाते थे तो विवेकानंद पखावज बजाते थे. दोनों के घर के
बीच आधा किलोमीटर से अधिक की भी दूरी नहीं थी. फिर उन दोनों महानों ने एक
दूसरे के बारे में इतना कम क्यों कहा. रवीन्द्रनाथ के एक-आध लेखों के
अलावा ज्यादा कुछ हमें नहीं मिलता. ऐसा क्यों था? इसके उत्तर में एक
सामान्य उत्तर होगा कि रवीन्द्रनाथ का परिवार ब्राह्म समाज का प्रचारक था
और विवेकानंद सनातनी वेदांती धारा के लोगों के साथ थे. पर यह व्याख्या
यथेष्ट नहीं. बंकिमचन्द्र भी हिंदूवादी मतादर्श के ही थे लेकिन उनके
प्रति रवीन्द्रनाथ ने बहुत ही आदर से लिखा. एक बार बंकिम की युवा
रवीन्द्रनाथ को फटकार ने भी रवीन्द्रनाथ के मन में बंकिम के प्रति आदर को
कम नहीं किया.
अपने एक प्रसिद्ध लेख 'कलाकार का धर्म' में रवीन्द्रनाथ ने उन्नीसवीं
शताब्दी के तीन आन्दोलनों को केन्द्रीय माना है. उनके अनुसार इन तीन
आंदोलनों ने बंगाल और पूरे देश को प्रभावित किया. ये आंदोलन थे- राजा
राममोहन राय द्वारा शुरू किया गया धार्मिक आन्दोलन, बंकिमचन्द्र
चट्टोपाध्याय द्वारा शुरू किया गया साहित्यिक आन्दोलन (जिसने अपने जादुई
छडी से सदियों से सोई हुई बंग्ला भाषा को जगा दिया) और राष्ट्रीय आंदोलन.
आमतौर पर रवींद्रनाथ को राष्ट्रवाद का विरोधी समझा जाता है लेकिन यह सही
नहीं है. यह सही है कि स्वदेशी आंदोलन के बाद उन्होंने उग्र राष्ट्रवाद
का विरोध किया था और अपने को स्वदेशी आंदोलन से एक तरह से अलग किया था.
अपने उपन्यासों में- खासकर घरे बाइरे में वे इसी रूझान को स्पष्ट करते
भी है. लेकिन वे राष्ट्रवादी आंदोलन को प्रतिक्रियावादी न मानकर
क्रांतिकारी मानते हैं जिसने अपने देश के इतिहास में देश के लोगों का
विश्वास पैदा किया और इस भ्रम को तोडा कि यूरोप की नकल में कोई मान है.
यह सब उसी लेख में स्पष्टत: लिखा है जिसकी चर्चा ऊपर की गयी है.
रवीन्द्रनाथ के साहित्य के अध्ययन की एक समस्या यह रही है कि वे गाँधी की
तर्ह भाषा के भीतर गहरे अर्थों को लेकर चलते थे जिसके आधार पर उनकी बातों
के निहितार्थ को समझने के लिए उनके साहित्य में गहरे उतरना पडता है. थोडी
सी असावधानी से उनके साहित्य के भीतर से उल्टा अर्थ भी निकाला जा सकता
है. 'नेशनलिज्म' पर 1917 में लिखी उनकी पुस्तक के आधार पर बहुत सारे
विद्वान उन्हें राष्ट्रवादी न मानकर अंतर्राष्ट्रीय मनोभाव का कवि-विचारक
मानते हैं, लेकिन यह उनके विचारों का एक अधूरा पाठ है. रवींद्रनाथ हमेशा
अपने देश की संस्कृति, इतिहास और परंपरा को एक भारतीय दृष्टि से देखते
थे. इस भारतीय दृष्टि का एक नमूना वह लेख है जिसमें वे सभ्यता पर विचार
करते हैं. अपने एक लेख में कहा है कि उनके लिए यूरोप से आयातित
'सिविलाइजेशन' शब्द के लिए भारत में जो सबसे उपयुक्त शब्द है वह है धर्म.
यह धर्म उनके लिए कोई संगठित धर्म नहीं बल्कि वे मूल्य हैं जिसे व्यक्ति
अपने जीवन में लेकर चलता है. इस बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने एक
सुंदर उदाहरण दिया है. अपने एक अनुभव का उल्लेख करते हुए वे बताते हैं कि
एक बार कलकत्ता आते हुए रास्ते में उनकी मोटर में खराबी आ गयी और उसे फिर
से चलाने के लिए बार बार पानी की जरूरत थी. कुल सौ किलोमीटर की यात्रा
में कई बार गरीब लोगों ने उन्हें बहुत परिश्रम से पानी लाकर पानी दिया.
उसके बदले में किसी भी गरीब ने पैसे लेने से इंकार कर दिया. हालाँकि उन
गरीबों को पैसे की बहुत जरूरत थी. इस यात्रा में जब गाडी कोलकाता के
नज़दीक पहुंची जहाँ पानी देना सुलभ था वहाँ इसके बदले में आदमी ने पैसे
माँगे. रवींद्रनाथ ने लिखा है कि अगर गरीब लोग पानी का व्यवसाय करते तो
उनको बहुत फायदा होता लेकिन किसी प्यासे को पानी पिलाना या जरूरत-मंद को
पानी देकर या खाना खिलाकर उसके बदले पैसे लेना ये गरीब धर्म के विरूद्ध
समझते हैं. इन लोगों की दुनियावी जरूरत और उनके धर्म के बीच के इस संबंध
को रखते हुए रवींद्रनाथ कुछ टिप्पणियाँ करते है. वे कहते हैं कि जीवन के
सहज रूप में जो मूल्य लोग अपने भीतर लिए हुए चलते है (इसके लिए 'सस्टेन'
शब्द का प्रयोग किया गया है) उसकी प्राप्ति बहुत कठिन है. इस धर्म के बोध
को ही रवींद्रनाथ सभ्यता कहते हैं. (देखें- उनका प्रसिद्ध लेख-
'सिविलाइजेशन एंड प्रोग्रेस', बाउंडलेस स्काई, कोलकाता, 1964,
पुनर्मुद्रित 2006).
आशिस नंदी ने अपनी पुस्तक राष्ट्रवाद बनाम देशभक्ति में लिखा है कि
रवींद्रनाथ को डर था कि भारतीय राष्ट्र का विचार कहीं भारतीय सभ्यता पर
प्राथमिकता न प्राप्त कर ले. वे नहीं चाहते थे कि भारतवासियों की जीवन
शैलियों का आकलन केवल भारत नामक राष्ट्र-राज्य की कसौटियों पर हो. नंदी
दिखलाते हैं कि कैसे रवींद्रनाथ राष्ट्रवादी विचारधारा से असहमत होते चले
गये. उनके अनुसार रवींद्रनाथ राष्ट्रभक्ति नहीं देशभक्ति को आधार बना कर
चले थे. उनके जीवन में नंदी अलग अलग समय पर तीन तरह की प्रवृत्तियों की
चर्चा करते हैं. उनके अनुसार रवींद्रनाथ युवावस्था में हिंदू राष्ट्रवाद
से प्रभावित थे, वयस्क होने पर वे ब्राह्मणवादी-उदार-मानवतावाद से
प्रभावित हुए और जीवन के अंतिम वर्षों में राज्य-विरोधी होने तक पहुंच
गये. यह स्थापना रवींद्रनाथ को एक ऐसे विचारक के रूप में प्रस्तुत करती
है जो निरंतर अपने विचारों को अपने जीवनानुभवों और सभ्यता-विवेक से
परिष्कृत करने वाले विचारक के रूप में प्रस्तुत करता है. एक दार्शनिक ने
गाँधी के सन्दर्भ में उनके युग-धर्म के पालन को केन्द्रीय महत्त्व दिया
है. अगर रवींद्रनाथ के संदर्भ में किसी चीज को केन्द्र में रखकर देखने के
लिए उनके सभ्यता विवेक को प्रस्तावित किया जाये तो शायद गलत नहीं होगा.
यह उनका सभ्यता-विवेक ही था जो उन्हें राष्ट्रवाद के खिलाफ खडे होने की
शक्ति प्रदान करता था. यह सर्वविदित है कि जब बंगाल का विभाजन हुआ और
बंगाल के बुद्धिजीवी कर्जन की बंगाल को बाँटकर राष्ट्रवादी शक्तियों को
कमजोर करने के इस प्रयास का विरोध शुरू हुआ रवींद्रनाथ ने इस आंदोलन की
अगुवाई की थी. उनका गीत 'आमार सोनार बांग्ला' उस समय आंदोलन का गीत बन
गया था. लेकिन, रवींद्रनाथ ने स्वदेशी आंदोलन के दौरान के अपने अनुभवों
और भारतीय सभ्यता के प्रति अपनी दृष्टि के कारण यह देख लिया कि इस
विचारधारा में क्या दोष है. वे पश्चिमी इतिहास पर आधारित राष्ट्रवाद की
अवधारणा को भारतीय संदर्भ में दोषयुक्त मानते थे. इसी कारण से वे
गरमपंथियों के आदर्शों से सहमत नहीं थे. उनके इस कथन पर ध्यान दिया जाना
चाहिए- " जिन लोगों को उनकी राजनीतिक आजादी मिल गयी है, वे जरूरी नहीं कि
आजाद ही हों. वे तो केवल ताकतवर भर हैं. उनका बेलगाम आवेश स्वाधीनता के
धोखे में गुलामी को बढावा दे रहा है." (नेशनलिज्म , 1917, पुनर्मुद्रण,
मद्रास: मैकमिलन, 1985, पृ. 68. यह अनुवाद अभय कुमार दुबे का है) यह
रवींद्रनाथ के विचार का वह महत्त्वपूर्ण बिन्दु है जहाँ वह भारतीय
राष्ट्रवाद की उस निर्मिति के विरूद्ध खडे होने का जोखिम उठाते है जिसे
आकार देने में दयानंद, विवेकानंद, अरविंद घोष और तिलक जैसे लोगों का
योगदान था. इस निर्मिति को रवींद्रनाथ अस्वीकार करते हैं. उन्हें लगता है
कि भारत के शिक्षित लोग " अपने पूर्वजों द्वारा दी गयी नसीहतों के विपरीत
इतिहास से कुछ सबक लेने की कोशिश कर रहे हैं."(नेशनलिज्म, पृ. 64)
समकालीन इतिहास के इस दबाव के सामने खडे होने के रवींद्रनाथ के इस साहस
की प्रशंसा करनी पडती है. जब राष्ट्रवाद का जोर बढ रहा हो उनमें यह विवेक
था कि वे पूछ सकें- " क्या वह (भारत) अपनी विरासत बेच कर की गई कमाई के
बदले समकालीन इतिहास की चमक-दमक भरी क्षणभंगुर निर्मितियों को खरीदेगा?"
रवींद्रनाथ के लिए भारत की असली समस्या सामाजिक है, राजनैतिक नहीं. वे
मानते थे कि भारत में राष्ट्रवाद वास्तविक अर्थ में कभी था ही नहीं. वे
30 दिसंबर 1916 को कहते हैं कि " आज हमारे देश के लोग पुरखों की दी हुई
शिक्षा के विपरीत जा रहे हैं. पूरब आज इतिहास का वह पाठ पढ रहा है" जो
उसके अपने सांस्कृतिक अनुभवों से नहीं "जन्मा है". वे जापान की तरक्की को
भी नकली मानते हैं और कहते हैं कि उसने अपने को "भीतर से विकसित नहीं
किया है." (इस महत्त्वपूर्ण वक्तव्य के लिए देखें 'नेशनलिज्म इन इंडिया'
(संक्षिप्त), 30 दिसंबर , 1916, प्रमोद शाह संकलित एवं संपादित थॉट्स ऑन
रिलिजियस पॉलिटिक्स इन इंडिया वॉल्यूम 1, कोलकाता, 2009, पृ. 283-88).
रवींद्रनाथ जिस ओर 1916 के बाद लगातार बढ रहे थे वह था मानवतावाद की एक
वैश्विक समझ. अपने उसी वक्तव्य में वे कहते हैं कि दुनिया में सिर्फ मानव
का इतिहास है और सभी देशों का इतिहास उस इतिहास के छोटे-छोटे अध्याय भर
हैं. हीरेन मुखर्जी ने 'रवींद्रनाथ और उनकी मानवतावाद की धारणा' नामक
आलेख में महान कवि के भीतर के मानवतावाद की व्याख्या सरल शब्दों में की
है जिसमें मनुष्य के भीतर प्रेरणा के उत्स को समझने के कवि प्रयास की
अभिव्यक्ति हुई है. मुखर्जी के अनुसार रवींद्रनाथ मानते थे कि हर मनुष्य
के भीतर मानव और महामानव दोनों का वास होता है. व्यक्ति मानव की
अभिव्यक्ति है और जाति उसी व्यक्ति के भीतर के महामानवोचित अंश की
अभिव्यक्ति है. व्यक्ति नश्वर है और जाति अमर. जाति व्यक्तियों का कुल
योग नहीं है. अकस्मात व्यक्ति अपने भीतर इस महामानव के सत्य का दर्शन
करता है और उस सत्य के लिए अपने प्राणों तक की परवाह नहीं करता.
रवींद्रनाथ के शब्दों में - " एक व्यापक चित्त है जो व्यक्तिगत नहीं,
विश्वगत है, जिसका परिचय अकस्मात होता है. एक दिन आह्वान आता है, अकस्मात
मानुष-सत्य के लिए प्राण देने के लिए उत्सुक होता हूँ" व्यक्ति जब इस
आह्वान को सुन पाता है तभी वह लोगों को ईश्वर समझ कर उसकी सेवा के लिए
तत्पर हो उठता है. इसी भाव का विस्तार उनके विश्वविद्यालय की परिकल्पना
में है जो विश्व के छंद पर नृत्य करना सिखलाने के लिये वे बनाना चाहते
थे. (देखें- हीरेन मुखर्जी, 'रवींद्रनाथस कॉस्पेशन ऑन
ह्यूमेनिज्म'रवींद्र भारती पत्रिका वॉल्यूम 11, 2008)
सभ्यता और प्रगति के संबंध में रवींद्रनाथ की दृष्टि बहुत ही सूक्ष्म
विश्लेषण की मांग करती हैं. वे पश्चिम की वैज्ञानिक प्रगति और उसकी
समृद्धि के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण नहीं रखते. अपने एक लेख 'द
चैलैंजिंग एज' में वे पश्चिम के उस शक्तिशाली बौद्धिक प्रकाश के महत्त्व
को समझाते हैं जिसने दुनिया को जीत लिया. इस आलोक के 'बिजली के झटके' से
कैसे भारत ने समझा कि नैतिकता और न्याय का एक मानवोचित आधार होना चाहिए
जिसमें मानव मानव के भेद को मिटा दिया. कम से कम नैतिक धरातल पर इस देश
ने पहली बार जाना कि जाति चाहे जो हो न्याय और नैतिकता के नियम सबके लिए
एक ही होंगे. इस पश्चिम के आने से ही इस देश में एक आदर्श नैतिक मानदंड
तैयार हो सका. इसके लिए वे पश्चिम की प्रशंसा करते हैं. साथ ही वे लिखते
हैं कि पश्चिमी साहित्य, खासकर अंग्रेज़ी साहित्य के सम्पर्क में आकर
हमलोगों ने न सिर्फ भावना के गहरे संसार को जानना-समझना सीखा बल्कि
मनुष्य को मनुष्य के शोषण से मुक्त करने की भावना का भी विकास किया. अपने
सत्तरवे वर्ष में लिखे इस आलेख में (यानि 1931 ई. में) वे स्पष्ट रूप से
कहते हैं कि यह युग "यूरोप के साथ आंतरिक (इनवार्ड) सहयोग का युग है".
इतना कहने के बाद रवींद्रनाथ उस ओर जाते हैं जहाँ से वे इस पश्चिम के
शक्ति-जनित सभ्यता का दूसरा चेहरा भी दिखलाते है. वे इस पश्चिम के नैतिक
धरातल से गिरने को विश्वयुद्ध से जोडते हैं. वे कहते हैं कि विश्वयुद्ध
के बाद ऐसा लगता है कि यूरोप ने अपनी शुद्धता और सभ्यता का विवेक
('सैनिटी) को खो दिया है. वे एक सूत्र देते हैं जो मानो रवींद्रनाथ का
संदेश हो उन सबके लिए जो समाज में परिवर्त्तन के पक्षधर हैं. वे कहते हैं
कि हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि जो सबसे शक्तिशाली हैं उनका
दायित्त्व भी सबसे ज्यादा है. उनका अपराध ही सबसे घृणित है. वे यूरोप की
इस शक्तिशाली सभ्यता के पतन को अपरिहार्य मानते हुए भारतवासियों को
प्रगति के यूरोपीय मॉडल को न मानने की सलाह देते हैं. वे कहते हैं कि
उनका हृदय दु:ख से भर उठता है जब वे देखते हैं कि इस देश के पढे-लिखे लोग
बडे, शक्तिशाली, और तेजी वाली चीजों के प्रति आकर्षण देखते हैं. प्रगति
का जो आदर्श आंतरिक आदर्श से नहीं जुडता और हमें अपने दायित्व के प्रति
सचेत नहीं करता. यह हमें अधर्म की ओर ले जाता है. यह अधर्म हमें तेजी से
शक्तिशाली तो बना सकता है जिससे हम शत्रु को परास्त भी कर सकते हैं.
लेकिन, यह हमें भीतर से नष्ट कर देता है. वे कहते हैं - " इस धन और शक्ति
में विनाश के बीज हैं. पश्चिम में इस सम्पत्ति को मानव-रक्त से सींचा गया
है जिसकी फसल अभी लहलहा रही है." वे इस खुशहाल, शक्तिशाली पश्चिम की नकल
को भारत जैसी सभ्यता में जन्मे-पले लोगों द्वारा ललचाई निगाह से देखने को
दुर्भाग्यपूर्ण मानते थे. ईश्वर ने जिसे आंतरिक शक्ति से लबालब, आनंद से
भरपूर, फूल और सितारों के संगीत से भर रखा हो उसे क्या लालच से भरकर उस
रास्ते पर चलना चाहिए जिसमें वस्तु से शून्य (थिंग टू नथिंग) की यात्रा
होती हो?
रवींद्रनाथ का स्मरण उनकी पूजा करते हुए, विनाशकारी पश्चिम की अनैतिकता
फैलाती प्रगति की ओर दौड लगाते हुए करना उस महान सभ्यता विवेक और देशज
नैतिकता-बोध से भरे संस्कृति पुरूष का उपहास करना ही है. आज जरूरत इस बात
की है कि गांधी के साथ हम रवींद्रनाथ की दृष्टि के साथ अपने भीतर के
व्यक्ति और महामानव के बीच से महामानवोचित आदर्श का वरण करें. यही
रवींद्रनाथ को उनके 150वें वर्ष में हमारा संकल्प होना चाहिए. किसी खंडित
दृष्टि को रखकर, जैसा कि कई सम्प्रदायवादी और क्षेत्रवादी विचार सरणियों
से जुडे लोग करते हैं, या सर्वग्रासी प्रगति की ओर अंधाधुंध दौड लगाने
वाले लोग रवींद्रनाथ का नाम तो बहुत लेंगे लेकिन उनके विचारों से उनका
दूर दूर का रिश्ता नहीं होगा. रवींद्रनाथ की दृष्टि की व्यापकता का एक
उदाहरण देकर इस संक्षिप्त आलेख का समापन ठीक होगा.
आज रवींद्रनाथ को बंगाली जातीयता के महानायक बनाकर देखने का चलन है.
अन्नदाशंकर राय ने अपने संस्मरण में रवींद्रनाथ से जुडी एक बात का उल्लेख
किया है. प्रशासनिक परीक्षा में उत्तीर्ण होकर अन्नदाशंकर रवींद्रनाथ से
मिलने गए और यह बतलाया कि वे चाहते तो भारत के किसी भी भाग में जाकर
नौकरी कर सकते थे लेकिन, अपने बंग-माटी के प्रेम के कारण, उसे और समझने
के लिए उन्होंने इसी राज्य में सेवा करने का निश्चय किया. उन्हें लगा कि
इस बात से प्रसन्न होकर रवींद्रनाथ उनके बंगाल प्रेम को सराहेंगे लेकिन,
हुआ ठीक उल्टा. रवींद्रनाथ ने कहा कि यह ठीक नहीं हुआ. उन्होंने कहा कि
बंगाल तो उसका घर है इसलिए इसको तो वे कभी भी, देर-सवेर जान ही लेते
लेकिन देश के अन्य भाग को जानने समझने का, अपने देश के दूसरे हिस्से की
सेवा करने का, उससे जुडने का ऐसा मौका उन्हें नहीं चूकना चाहिए था !
Friday, 10 September 2010
आभासी हिंसा, आरोपित कामन सेंस, सामाजिक की प्लास्टिक सर्जरी और मीडिया (सन्दर्भ ज्याँ बोद्रोया)
आभासी हिंसा, आरोपित कॉमन सेंस और सामाजिक की प्लास्टिक सर्जरी
मीडिया के इमेज जिसमें सबकुछ दिखता है हिंसा के उन इलाकों को लेकर हमारे सामने खडा होता है जिसको देखते हुए हम हिंसा को तैयार करने के विरूद्ध सक्रिय जो मन की कोशिकाएं होती हैं वे स्ववमेय आरपार दिखती है. और दिखता है दिमाग के भीतर का वह केन्द्र जहाँ से हिंसा शुरू होती है. पर्दे की हिंसा हमारे ऊपर कोई आघात नहीं लाती, हम खून करते हुए, तडपते हुए आदमी को देखते हुए आराम से कोल्ड ड्रिंक्स पीते रह सकते हैं. यह हिंसा के आघात से हमारे मन को मुक्त रखते हुए हमें हिंसा को देखते झेलते रहने की उदासीनता प्रदान करता है. मैकलुहान ने लक्षित किया था कि माध्यम ही संदेश हो जाता है. मीडिया ने धीरे धीरे संदेश को गैर-जरूरी और कम महत्त्वपूर्ण बना दिया. इस अर्थ में पर्दे की हिंसा ही संदेश बन जाती है. हिंसा की सूचना से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाता है यह कि इसे कैसे पेश किया जा रहा है. जैसे संगीत की गुणवत्ता से ज्यादा जरूरी पर्दे पर यह हो गया है कि किस भव्यता से उस संगीत को पेश किया जा रहा है. बॉद्रिया ने संदेश और माध्यम के इस टकराहट से उत्पन्न कटुता या विषाक्तता (वरुलेंस) को हिंसा से भी अधिक खतरनाक मानते हैं. एक सीधी हिंसा में एक निदान होता है: एक ने दूसरे को किसी दुश्मनी के कारण मार डाला और मामला एक निर्णय पर पहुंच गया. लेकिन, अब इस तरह नहीं होता. अब निदान नहीं है. कोई किसी को दिन-दहाडे मारकर भी फाँसी पर नहीं लटक रहा. अगर वह फाँसी पर लटक जाए तो बात एक किनारे लग गई- हिंसा हुई और हिंसा करने वाले को दण्ड मिल गया. अब महीनों तक लोगों को बताया जाता रहेगा कि उसका वजन बढ रहा है, वह झूठ बोल रहा है, पाकिस्तानी वकील और सरकार क्या क्या कर रही है, वह अमिताभ बच्चन की फिल्में रोज देखता है, ज्यादा टेंशन में आने पर गाना गाने लगता है आदि आदि. इस तरह एक हिंसक घटना को लेकर सीधी और सच्ची रिपोर्टिंग के भीतर से ही वह वातावरण बनता है जहाँ करोडों भारतीय सप्रमाण इस तरह की बातों पर सोचते और बहसें करते हैं कि मुसलमान कितने देशद्रोही हैं, पाकिस्तान कैसे सिर्फ आतंकवादियों का देश है, भारतीय सरकार मुसलमानों के प्रति कितनी नरम है या दरअसल अमरीका की अनुमति के बिना भारत की कानून व्यवस्था कसब को फाँसी नहीं सुना सकती. और फिर लोग अनुमान करते रहते हैं कि कसब कब फाँसी पर चढाया जाएगा. आप यकीन कीजिए जब तक कसब को फाँसी होगी तब तक उसको फाँसी देने की बात का कोई मतलब रह ही नहीं जाएगा. रश्मी तौर पर मीडिया में यह खबर होगी कि आखिरकार दरिंदे को उसकी दरिंदगी की सजा मिल गई. फिर एक सवाल छोडा जाएगा- क्या आपको लगता है कि भारत की कानून व्यवस्था में कुछ परिवर्तन किए जाएं ताकि इस तरह के केसेज को उसकी परिणति तक पहुंचाने में इतना विलंब न हो!
इस संदर्भ में बोद्रिया का कथन है कि इस मीडिया की सीधी और सच्ची रिपोर्टिंग के बीच "यथार्थ का खून" हो जाता है. छवियों के असीमित जगत में सत्य के इस सतत प्रवाह का, सत्य के, निष्कर्ष के सतत फिसलते जाने के इस खेल में कितना आनंद और कैसा रहस्य है! कैनेडी को किसने मारा? क्यों मारा? इस रहस्य के इर्द गिर्द जो मीडिया जगत में सूचनाओं का अंबार लगा है और यह अभी भी चल रहा है उसकी तुलना में इंदिरा गांधी हत्याकांड के बारे में बहुत कम लिखा पढा गया . बोद्रिया यह भी बतलाते हैं कि इस प्रक्रिया में जो यथार्थ की दुनिया है वह नीरस, बेरंग और बेढब हो जाती हैं और लोग बाजार द्वारा चालित छवियों की दुनिया में चमत्कारिक, जादुई और तिलिस्मी छवियाँ ज्यादा प्रभावशाली होती जा रही है.
जो कुछ टी वी पर दिखलाया जाता है उसकी सामाजिकता के रूप को उद्घाटित करते हुए बोद्रिया का मानना है कि यह आभासी सामाजिकता का पर्दे पर निर्माण जिन छवियों को रचता है उसमें सबकुछ रच कर इस तरह परोस दिया जाता है कि सब कुछ सामने दिखला दिया जाए. किस तरह हवाई जहाज आया, किस तरफ से टक्कर लगी, कैसे लोग चीखे, कैसे भागे... . इन अनंत छवियों के सच के बीच दो सच को रखा जाए. प्रथम, कितने लोग मरे थे 9/11 के इस भयानक आक्रमण में? दूसरा प्रश्न , उस जहाज का सच क्या था जिसे व्हाइट हाउस के आदेश पर उडा दिया गया जिसमें 259 लोग सवार थे? यह जहाज व्हाइट हाउस की ओर बढ रहा था और स्पष्टत: यह व्हाइट हाउस को भी उडाने के लिए टकराने वाला था. पहले प्रश्न का उत्तर हर कोई देगा- बहुत सारे लोग . पर कितने? किसी को ठीक से पता नहीं. एक व्यक्ति ने बी बी सी पर अपने इंटरव्यू में बताया था कि कुल मृतकों की संख्या हजार से कम थी और उसके पास एक लिस्ट थी. उसने चुनौती दी कि कोई नया नाम नहीं जोड सकता. किसी के पास उस चुनौती का कोई उत्तर नहीं था. यानि कुल मृतकों की संख्या हजार से कम थी. दूसरे प्रश्न का उत्तर इस बात में निहित है कि किसी ने भी इसपर कभी भी कोई रिपोर्ट शायद ही पढी देखी हो (भारत में) जिसमें उस जहाज के लोगों के परिवार वालों के दर्द को दिखलाया गया हो.
मीडिया का एक और काम है जिसे बोद्रिया 'सिंथिटिक इमेज ऑव द बनालिटी' कहते हैं. आप सारे दिन करवा चौथ, पूजा पाठ, प्रलय की खबरें, श्री लंका में रावण की गुफा से सीधा प्रसारण, मौसम की पहली बारिश में भीगते झूमते दिल्ली वासी को देखते हुए बरसों बिता देते हैं. बोद्रिया इस सन्दर्भ को एक रोचक ट्विस्ट देते हुए सवाल करते है- क्या कोई सिक्सुअल व्यॉरिज्म भी है क्या? इसका उत्तर देते है कि कोई सेक्सुअल सीनरी है ही नही! वे सेक्स के खुले और सीधे दिखाए जाने में सेक्स के अंत की भी बात करते है. वे अंत में इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि रोज की बेहूदा घिसी पिटी जिंदगी को देखने और दिखलाने के इस मीडियाई खेल में अंतत: दर्शक अपने को सबकुछ देख चुकने के बाद कुछ नहीं कह पाने की सी मन:स्थिति में पाता है. इसे वे "ज़ीरो डिग्री" जीना कहते हैं, रोलाँ बार्थ के "ज़ीरो डिग्री लेखन" की तर्ज पर!
भारतीय मीडिया पर यह कितनी दिलचस्प टिप्पणी है कि 'इंडिया टीवी' की दर्शक संख्या इस समय सबसे ज़्यादा है.
मीडिया के इमेज जिसमें सबकुछ दिखता है हिंसा के उन इलाकों को लेकर हमारे सामने खडा होता है जिसको देखते हुए हम हिंसा को तैयार करने के विरूद्ध सक्रिय जो मन की कोशिकाएं होती हैं वे स्ववमेय आरपार दिखती है. और दिखता है दिमाग के भीतर का वह केन्द्र जहाँ से हिंसा शुरू होती है. पर्दे की हिंसा हमारे ऊपर कोई आघात नहीं लाती, हम खून करते हुए, तडपते हुए आदमी को देखते हुए आराम से कोल्ड ड्रिंक्स पीते रह सकते हैं. यह हिंसा के आघात से हमारे मन को मुक्त रखते हुए हमें हिंसा को देखते झेलते रहने की उदासीनता प्रदान करता है. मैकलुहान ने लक्षित किया था कि माध्यम ही संदेश हो जाता है. मीडिया ने धीरे धीरे संदेश को गैर-जरूरी और कम महत्त्वपूर्ण बना दिया. इस अर्थ में पर्दे की हिंसा ही संदेश बन जाती है. हिंसा की सूचना से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाता है यह कि इसे कैसे पेश किया जा रहा है. जैसे संगीत की गुणवत्ता से ज्यादा जरूरी पर्दे पर यह हो गया है कि किस भव्यता से उस संगीत को पेश किया जा रहा है. बॉद्रिया ने संदेश और माध्यम के इस टकराहट से उत्पन्न कटुता या विषाक्तता (वरुलेंस) को हिंसा से भी अधिक खतरनाक मानते हैं. एक सीधी हिंसा में एक निदान होता है: एक ने दूसरे को किसी दुश्मनी के कारण मार डाला और मामला एक निर्णय पर पहुंच गया. लेकिन, अब इस तरह नहीं होता. अब निदान नहीं है. कोई किसी को दिन-दहाडे मारकर भी फाँसी पर नहीं लटक रहा. अगर वह फाँसी पर लटक जाए तो बात एक किनारे लग गई- हिंसा हुई और हिंसा करने वाले को दण्ड मिल गया. अब महीनों तक लोगों को बताया जाता रहेगा कि उसका वजन बढ रहा है, वह झूठ बोल रहा है, पाकिस्तानी वकील और सरकार क्या क्या कर रही है, वह अमिताभ बच्चन की फिल्में रोज देखता है, ज्यादा टेंशन में आने पर गाना गाने लगता है आदि आदि. इस तरह एक हिंसक घटना को लेकर सीधी और सच्ची रिपोर्टिंग के भीतर से ही वह वातावरण बनता है जहाँ करोडों भारतीय सप्रमाण इस तरह की बातों पर सोचते और बहसें करते हैं कि मुसलमान कितने देशद्रोही हैं, पाकिस्तान कैसे सिर्फ आतंकवादियों का देश है, भारतीय सरकार मुसलमानों के प्रति कितनी नरम है या दरअसल अमरीका की अनुमति के बिना भारत की कानून व्यवस्था कसब को फाँसी नहीं सुना सकती. और फिर लोग अनुमान करते रहते हैं कि कसब कब फाँसी पर चढाया जाएगा. आप यकीन कीजिए जब तक कसब को फाँसी होगी तब तक उसको फाँसी देने की बात का कोई मतलब रह ही नहीं जाएगा. रश्मी तौर पर मीडिया में यह खबर होगी कि आखिरकार दरिंदे को उसकी दरिंदगी की सजा मिल गई. फिर एक सवाल छोडा जाएगा- क्या आपको लगता है कि भारत की कानून व्यवस्था में कुछ परिवर्तन किए जाएं ताकि इस तरह के केसेज को उसकी परिणति तक पहुंचाने में इतना विलंब न हो!
इस संदर्भ में बोद्रिया का कथन है कि इस मीडिया की सीधी और सच्ची रिपोर्टिंग के बीच "यथार्थ का खून" हो जाता है. छवियों के असीमित जगत में सत्य के इस सतत प्रवाह का, सत्य के, निष्कर्ष के सतत फिसलते जाने के इस खेल में कितना आनंद और कैसा रहस्य है! कैनेडी को किसने मारा? क्यों मारा? इस रहस्य के इर्द गिर्द जो मीडिया जगत में सूचनाओं का अंबार लगा है और यह अभी भी चल रहा है उसकी तुलना में इंदिरा गांधी हत्याकांड के बारे में बहुत कम लिखा पढा गया . बोद्रिया यह भी बतलाते हैं कि इस प्रक्रिया में जो यथार्थ की दुनिया है वह नीरस, बेरंग और बेढब हो जाती हैं और लोग बाजार द्वारा चालित छवियों की दुनिया में चमत्कारिक, जादुई और तिलिस्मी छवियाँ ज्यादा प्रभावशाली होती जा रही है.
जो कुछ टी वी पर दिखलाया जाता है उसकी सामाजिकता के रूप को उद्घाटित करते हुए बोद्रिया का मानना है कि यह आभासी सामाजिकता का पर्दे पर निर्माण जिन छवियों को रचता है उसमें सबकुछ रच कर इस तरह परोस दिया जाता है कि सब कुछ सामने दिखला दिया जाए. किस तरह हवाई जहाज आया, किस तरफ से टक्कर लगी, कैसे लोग चीखे, कैसे भागे... . इन अनंत छवियों के सच के बीच दो सच को रखा जाए. प्रथम, कितने लोग मरे थे 9/11 के इस भयानक आक्रमण में? दूसरा प्रश्न , उस जहाज का सच क्या था जिसे व्हाइट हाउस के आदेश पर उडा दिया गया जिसमें 259 लोग सवार थे? यह जहाज व्हाइट हाउस की ओर बढ रहा था और स्पष्टत: यह व्हाइट हाउस को भी उडाने के लिए टकराने वाला था. पहले प्रश्न का उत्तर हर कोई देगा- बहुत सारे लोग . पर कितने? किसी को ठीक से पता नहीं. एक व्यक्ति ने बी बी सी पर अपने इंटरव्यू में बताया था कि कुल मृतकों की संख्या हजार से कम थी और उसके पास एक लिस्ट थी. उसने चुनौती दी कि कोई नया नाम नहीं जोड सकता. किसी के पास उस चुनौती का कोई उत्तर नहीं था. यानि कुल मृतकों की संख्या हजार से कम थी. दूसरे प्रश्न का उत्तर इस बात में निहित है कि किसी ने भी इसपर कभी भी कोई रिपोर्ट शायद ही पढी देखी हो (भारत में) जिसमें उस जहाज के लोगों के परिवार वालों के दर्द को दिखलाया गया हो.
मीडिया का एक और काम है जिसे बोद्रिया 'सिंथिटिक इमेज ऑव द बनालिटी' कहते हैं. आप सारे दिन करवा चौथ, पूजा पाठ, प्रलय की खबरें, श्री लंका में रावण की गुफा से सीधा प्रसारण, मौसम की पहली बारिश में भीगते झूमते दिल्ली वासी को देखते हुए बरसों बिता देते हैं. बोद्रिया इस सन्दर्भ को एक रोचक ट्विस्ट देते हुए सवाल करते है- क्या कोई सिक्सुअल व्यॉरिज्म भी है क्या? इसका उत्तर देते है कि कोई सेक्सुअल सीनरी है ही नही! वे सेक्स के खुले और सीधे दिखाए जाने में सेक्स के अंत की भी बात करते है. वे अंत में इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि रोज की बेहूदा घिसी पिटी जिंदगी को देखने और दिखलाने के इस मीडियाई खेल में अंतत: दर्शक अपने को सबकुछ देख चुकने के बाद कुछ नहीं कह पाने की सी मन:स्थिति में पाता है. इसे वे "ज़ीरो डिग्री" जीना कहते हैं, रोलाँ बार्थ के "ज़ीरो डिग्री लेखन" की तर्ज पर!
भारतीय मीडिया पर यह कितनी दिलचस्प टिप्पणी है कि 'इंडिया टीवी' की दर्शक संख्या इस समय सबसे ज़्यादा है.
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