Sunday, 21 October 2018

Towards Histories of Our Times: An Invitation


History writing can be be approached at three disciplinary planes –philosophical, literary and of course historical. For a philosopher the main interest area is the ways of knowing and constructing the past and the implications of ideas deployed therein.

 This naturally involves consciousness about the ‘methods of historiography’ viz. how to adjudicate testimony and evidence; in want of which history will become a fiction or a work of literature.

To situate the history of a particular space in a particular time-frame and with a particular purpose may involve a deliberately chosen/created context and a mode of narrative. The final product of such historiographical process is debated not because of the facts presented through it, but because of the selection of the factors like time-frame, subject of narrative, purpose etc. which form (or are according to) the agenda of writing history – quite often there may be a very well conceived and sophisticated agenda (political, communal or whatever) at operation prior to conceiving the history itself. For a good ‘politics of history’ one has to have a good sense of selection of the factors shaping the history. On the same account, for a philosopher, a statesman and for a historiographer all history is contemporary history.

So, for a pertinent historiography, one’s choosing a particular method (eg. empirical method) for history must portray the intended purpose to be served by it. This kind of honesty would give a critique a right space for framing counter-arguments and constructing alternative histories; and also a right platform for appreciating a work of history. The clarity about the intended purpose would also determine the method to be adopted for the purpose.

Howsoever, when we choose empirical method, it should be made clear as in contrast to what or in comparison to what method the chosen method is more compatible or apt, though much care is needed in adopting the empirical method because it may sometime portray the ‘world of history’ to be the ‘world of science’ – the view which has been contested.

By focusing on the structures and strategies of historical accounts, Hayden White came to see historiography and literature as fundamentally the same endeavor. As in similar tone in India, KC Bhattacharya rendered all the evolution theories (in science) as a work of literature. There is no ‘ideal narratio’ for Frank Ankersmit, because ultimately there is no ontological structure onto which the single ‘correct’ narration can be correspondentially grafted. Keith Jenkins exhorts an end to historiography as customarily practiced. Since historians can never be wholly objective, and since historical judgment cannot pretend to a correspondential standard of truth, all that remains of history are the congealed power structures of a privileged class.

With these thoughts, I wish to approach the process of History writings which began in the nineteenth century at least at two levels, identified as popular (in various forms) and academic (official, “scientific” and verifiable) histories. Working on the Hindi intelligentsia of late nineteenth and early twentieth centuries I came across to materials which suggest that the history meant various things to people in a complex way. So far, the writings of the past (including my own) are often mired in discourses of secular and communal, which overlook the many strands of ideas and cultural practices which sought to vindicate that instead of such binaries, there were constant bouts of competition, collaboration and assimilation creating spaces between the communal and the secular.

Review of Daya Krishna's book for Akar 50

दया कृष्ण , सभ्यताएँ और संस्कृतियाँ : भावी इतिहास –लेखन की प्रस्तावना (अनुवादक – नंदकिशोर आचार्य), रज़ा फाउंडेशन, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली , 2018( पृ 224, मूल्य 699 रु)
दया कृष्ण (1924-2007) भारत के प्रमुख दार्शनिकों में से एक थे। पश्चिमी दर्शन शास्त्र के गंभीर अध्येता होने के बाद वे अपनी प्रश्नाकुलता (जिसके कारण उन्हें मित्रगण ‘भारतीय सुकरात’ कहते थे) जिस तरह वे भारतीय दर्शन और बौद्धिक परंपरा की ओर आए उसके लिए उनकी वैचारिक यात्रा का एक विशेष महत्त्व है। जीवन के अंतिम दशक में उनकी एक किताब प्रकाशित हुई प्रोलेगोमेना टू एनी फ्यूचर हिस्टोरीयोग्राफी ऑफ कल्चर्स एंड सिविलाइजेशन (1997) जिसकी बहुत चर्चा हुई। इतिहास, दर्शन और सभ्यता के बारे में सोचते हुए भारत के एक प्रमुख दार्शनिक ने कैसे विचार किया यह बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस पुस्तक का अनुवाद प्रतिष्ठित हिन्दी साहित्यिक नंदकिशोर आचार्य ने किया है और इसका प्रकाशन रज़ा पुस्तक माला  में 2018 में किया गया। यह एक कठिन पुस्तक है लेकिन जिन सवालों पर इसमें एक दार्शनिक ने विचार किया गया है उसके बारे में हिन्दी में बातचीत ज़रूरी है।
    इतिहास का अकादमिक विकास उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में जिस तरह से हुआ उसके बारे में यह कहना गलत नहीं होगा कि यह इतिहास एक सीमित समय और क्षेत्र (स्पेस) में ही इतिहास लिखने को वैज्ञानिक ढंग से अतीत के बारे में लिखने की कोशिश का नाम है। इस सीमित समय और क्षेत्र को अपने स्रोतों के सहारे देखने की ही इतिहासकार ज़िम्मेदारी लेता है। वह एक छोटे से समय, मसलन बीस-तीस साल, और इलाके को लेकर अपना अध्ययन करना ही अब चलन में है। वे दिन गए जब  गिब्बन, मोमसेन, टायनबी जैसे विद्वान सभ्यता के सैकड़ों वर्षों के इतिहास जैसे बड़े विषय को लेकर अध्ययन करते थे। अगर हम मार्क ब्लॉक की पुस्तक – ‘द हिस्टोरियंस क्राफ्ट’ का स्मरण करें तो कह सकते हैं कि एक इतिहासकार एक योजना के अंतर्गत एक निश्चित शोध-प्रणाली का अनुसरण कर एक कारीगर की तरह इतिहास लिखता है।     इतिहासकार, जिसे अब कुछ लोग अब इतिहासज्ञ कहना पसंद करते हैं,  के लिए औज़ार और सामग्री – तथ्य और पद्धति का ज्ञान – वैसे ही महत्त्वपूर्ण हैं जैसे एक बढई के लिए लकड़ी काटने का ज्ञान और जो वह बना रहा है उसका खाका है। इतिहास-लेखन को सीखना होता है। किसी भी ‘क्राफ्ट’ की तरह इसे सीखना होता है। यह कवि कर्म जैसा नहीं है जो मुख्यतः उसकी नैसर्गिक प्रतिभा पर निर्भर होता है।
    दयाकृष्ण इस तरह के इतिहास लेखन से संतुष्ट नहीं हैं और वे चाहते हैं कि जो इतिहास लिख रहे हैं उनके क्षितिज का विस्तार हो। उनके शब्दों में कहें तो अब इतिहासकार को कारीगर की तरह नजर सामने अपने औजारों और इलाकों पर गड़ाए रखने के साथ आकाश की ओर उठाने की भी जरूरत है ताकि जो भविष्य का आकाश है उसके साथ अपने अतीत से जुड़े काम को मिलाकर देख सके। मनुष्य और सभ्यता दोनों एक दूसरे को जुड़े  हुए हैं। साहिर के शब्दों के सहारे कहें तो नीले गगन के तले अगर धरती का प्यार पलता हो तो धरती पर जो चल रहा है उसके साथ आकाश का एक जुड़ाव है। इतिहास का ‘कैमरा’ प्रेमी के साथ ही आकाश, सुबह शाम सबसे जुड़कर ही समय को रच सकते हैं। दूसरे शब्दों में इतिहासकार को उस खेत जोतते किसान की तरह होना चाहिए जो खेत में बुआई के समय इस बात का ध्यान रखे कि बारिश हो सकती है और उसके खेत बोने के ज्ञान को आकाशी शक्तियों के साथ जोड़ कर देखना होता है ताकि उसका उद्देश्य –अच्छी फसल उसे मिल सके।  प्रोफेसर सरन जैसे विद्वानों के हवाले से दयाकृष्ण जैसे दार्शनिक चिंतक प्रचलित इतिहास लेखन को अपर्याप्त मानते हैं और कहते हैं कि जिस सभ्यता के संदर्भ में इतिहास की घटना घटती है उसकी समझ के बिना ऐतिहासिक घटनाओं का सम्यक विवेचन संभव नहीं। वे इस पुस्तक के आरंभ में यह लिखते हैं – ‘किसी भी संस्कृति अथवा सभ्यता का इतिहास स्वयं मनुष्य का ही इतिहास है।”
    इस तरह की सोच का एक इतिहास रहा है। जब वैश्विक ज्ञान और वैज्ञानिक ज्ञान की आधारशिला रखी जा रही थी तब भी सबलोग यह नहीं मान रहे थे कि सिर्फ वैज्ञानिक आधार पर ही हम अतीत (इतिहास) को समझ सकते हैं। देकार्त के तर्क से परे जाकर इटली के दार्शनिक गियाम्वैटिस्टा विको (1668-1744) ने यह कहने का प्रयास किया था कि हर सभ्यता का अपना एक संदर्भ होता है और उसी के संदर्भ में उसके इतिहास को समझा जा सकता है। वहाँ से शुरू कर हाइडेगर होते हुए मिशेल फूको जैसे चिंतकों ने वैज्ञानिक सीमा को प्रश्नांकित किया है। कई लोगों को इस प्रयास में मानव के इतिहास के इलाके में अपनी शक्ति (इतिहास को नियंत्रित करने की) की सीमा को समझाने की कोशिश भी लगती रही है। इतिहास में देवता और दैविक के लिए कोई स्थान नहीं है। वहाँ मनुष्य ही निर्माता है। समाज का अध्ययन इतिहास की चीज़ है जिसे मानव के अपने प्रयासों को केंद्र में रखकर लिखा जाता है। जो हम जान नहीं सकते उसके बारे में इतिहासकार की दिलचस्पी कम है।
    ‘Prolegomena’ का प्रयोग एक प्रकार से भूमिका के रूप में ही किया गया है जो इतिहास के लिखे जाने के पूर्व ध्यान देने के लिए प्रस्तावित की गई हैं। द्याकृष्ण का मत है कि मनुष्य का इतिहास उसकी सभ्यता के इतिहास से सीधे सीधे जुड़ा है। मनुष्य ही अपनी सभ्यता का निर्माण करता है और इसी क्रम में वह खुद भी निर्मित होता है। यह जो बन रहा है और बनाया जा रहा है यह अगर सिर्फ वर्तमान केन्द्रित रहे तो उसे ठीक ठीक नहीं समझा जा सकता है। दया कृष्ण के शब्दों में “अतीत उसी हद तक सार्थक या महत्त्वपूर्ण माना जाता है जिस हद तक वह वर्तमान का कारण होता है।” (पृ 19)
    दया कृष्ण की मान्यता है कि अतीत की स्मृति और भविष्य के लिए कामना के बीच ही परिवर्तन के सूत्र ढूँढे जा सकते हैं। यह व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों स्तरों पर चलता रहता है। वर्तमान या मनुष्य के अनुभव पर केन्द्रित होने से हम ‘वनडायमेंशनल’ हो जाते हैं। इतिहास यहीं सीमित हो जाता है। वह मनुष्य के अनुभव के आधार पर चीजों को रखकर समझने की कोशिश करता है। जो चीज जैसी दीखती है अनुभव में वैसी ही इतिहास में आती है पर यह एक सीमित दृष्टि ही देती है। सभ्यता और संस्कृति कोई प्राकृतिक चीज नहीं हैं। यह वह है जो हम बचाते हैं, ढोते हैं,  इसे विस्मृत होने से बचाने की कोशिश करते हैं और अगली पीढ़ी को सौंपते की जिम्मेवारी भी लेते हैं । अगर यह सौंपने की प्रक्रिया न चले तो चीजें भुला दी जाती हैं। दया कृष्ण के लिए किसी भी सभ्यता के इतिहास लेखक के लिए सबसे जरूरी है यह देखना कि सहेजने और सौंपने की प्रक्रिया कैसे चलती हैं, यह कैसे होता है? वे इसे भी महत्त्वपूर्ण मानते हैं कि जब कोई सभ्यता फैलती है तो उसका बर्ताव पहले की सभ्यताओं के साथ किस प्रकार का होता है। किसी सभ्यता ने किस प्रकार अपने प्रतीक बनाए, बचाए और उसे बदलने की कोशिश की यह बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है ।
    दया कृष्ण ने यह भी लक्षित किया है कि एक समय में रह रहे इतिहासकार (जो अपने वर्तमान में ही अवस्थित होते हैं) एक ही समय में होकर भी अपनी अपनी जगहों के होने के कारण अलग अलग तरीके से भी सोचते हैं। वे भिन्न समाजों , विभिन्न संस्कृतियों और अलग अलग राजनैतिक परिवेश के होते हैं अतः उनमें अंतर होता है।  वे इतिहास के रैखिक समय (लिनियर ) होने की बात को रखते हुए चक्रीय (साइकालिक) समय की समझ को भी अतीत के संदर्भ में रखते हैं। वे टायनबी के उदाहरण को रखते हैं और उनके ईसाई धर्म में अवस्थित होने की चर्चा करते हैं। इस संदर्भ में वे जीवन चक्र और सांस्कृतिक चक्र के बीच के संबंध की बड़ी बारीक चर्चा करते हुए यह कहते हैं कि जैविक चक्र (जो एक जीवन से जुड़ा है) सांस्कृतिक चक्र (जो सामूहिकता से जुड़ा है) का हिस्सा बनता चलता है और जो जीवन के अनुष्ठान होते हैं वे सांस्कृतिक रूप ले लेती हैं। यहीं रिचुअल का जन्म होता है जो किसी सभ्यता को समझने के लिए जरूरी विषय होते हैं । वे जीवन के तीन पक्ष –जैविक , सामाजिक और सांस्कृतिक  को एक ही समय –विवाह में विश्लेषित करके यह कहते हैं कि जो इतिहास ‘रिचुयल’ के कारण आए परिवर्तनों को न समझे वह इन तीनों प्रकारों के जीवन को समझ नहीं पाएगा।
    दयाकृष्ण एक और प्रश्न रखते हैं – सभ्यता और संस्कृति के विस्तार और संकुचन का।  हर संस्कृति की एक सीमा रेखा होती है जैसे हर देश की एक सीमा होती है। जब कोई उसका अतिक्रमण करके दूसरी सीमा में प्रविष्ट होती है तो दोनों सभ्यताएँ – जो फैल रही है और जो संकुचित हो रही हैं- दोनों बदलते   है। इस प्रसंग में वे एक दिलचस्प टिप्पणी करते हैं कि जब कोई सभ्यता किसी दबाव में (मसलन युद्ध में पराजित होकर ) अपने को किसी और संस्कृति और सभ्यता के दबाव में पाती है तो अपने तरीके से सिकुड़ कर (संकुचित होकर) अपने को बचाने के लिए गैर राजनैतिक क्षेत्र में अपनी अस्तित्व रक्षा के लिए सचेष्ट होती है। अगर कोई इतिहासकर राजनैतिक घटनाक्रमों के आधार पर ही इतिहास को समझने की कोशिश करेगा और पराजित शक्ति के अपने बचाव के सांस्कृतिक प्रयासों को समझने की कोशिश नहीं करेगी तो वह उस समाज को ठीक से नहीं समझ सकेगी। यहाँ स्पष्ट है कि काबराल की सांस्कृतिक संघर्ष और पार्थ चटर्जी की उपनिवेशवादी दौर में सांस्कृतिक क्षेत्र में अपनी सभ्यता और संस्कृति की श्रेष्ठता को बरकारार रखने की बात को भी याद किया जा सकता है।
    भारतीय संदर्भ में दया कृष्ण की एक अन्य बात भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। वे कहते हैं कि पूरा देश अंग्रेजों के अधीन नहीं रहा। एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजों के अधीन राजनैतिक रूप से रहा लेकिन सांस्कृतिक रूप से अपनी स्वायत्ता बनाए रहा। वे राजे रजवाड़ों के अधीन रहे भारत के सांस्कृतिक अनुभवों, आचार व्यवहारों के इतिहास पर ध्यान देने की बात करते हैं।
    दूसरी महत्त्वपूर्ण बात दया कृष्ण क्लिफर्ड गीर्ट्ज के हवाले से कहते हैं। गीर्ट्ज का मत है कि महान एंथ्रोपोलोजिस्ट अपनी तथ्यात्मक विवरणों के कारण महत्त्वपूर्ण नहीं होता बल्कि जिस तरह से उसने लिखा (देखा ) है उसके कारण होता है। भले ही उसके तथ्य सही नहीं हों, अगर उसने सही तरीके से लिखा / देखा है तो उसे अधिक महत्त्व मिलेगा।  कल्चरल एंथ्रोपोलोजिस्ट और इतिहासकार के बीच के अंतर –एक देख कर विवरण तैयार करता है और दूसरा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर- के संदर्भ में वे एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात लिखते हैं कि अभिलेखाकर में उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्य इतिहास नहीं हैं, ये बस इतिहास के कच्चे माल भर हैं, जिसके आधार पर इतिहास को अभी लिखा जाना है। दया कृष्ण के अनुसार महान इतिहासकार अपने लिखने के ढंग और अपने ‘विजन’ के कारण ही महान होते हैं न कि अपने तथ्यों की सटीकता के कारण। वे जो उदाहरण देते हैं वे खासे दिलचस्प हैं। मार्क्स अन्याय के खिलाफ आक्रोश के कारण जिसके साथ एक शोषण-रहित समाज का ‘विजन’ जुड़ा है, हीगेल द्वंदात्मकता के कारण (जिसके आधार पर वे ‘अब्सोलुट स्पिरिट’ को इतिहास में एक आकार (कंक्रीटइजेशन) दे सके), और मैक्स वेबर अपने ‘कॉर्पोरेट रैशनलिटी’, ‘ब्यूरोक्रैट’ के ‘इम्पेर्सोनल रैशनलिटी’, करिश्मा आदि की धारणाओं के  आधार पर पूंजीवाद और धर्म को समझने मे सहायक होने के कारण महत्त्वपूर्ण हैं । इनमें से कोई भी इतिहासकार नहीं हैं लेकिन इतिहास लेखन के लिए ये सभी बहुत महत्त्वपूर्ण हैं ।
    दया कृष्ण ने सभ्यता के विस्तार को सिर्फ युद्ध और राजनैतिक विस्तार में देखने को सही नहीं माना है। विजयी और विजित सभ्यताओं के संपर्कों और प्रभावों को अन्य क्षेत्रों – वाणिज्य, धर्म , कला, आर्किटेक्चर , साहित्य आदि – से जोड़कर देखने पर बल दिया है। वे मानते हैं कि इस्लाम के प्रसार को मॉडेल मानना सही नहीं है। वे ईसाई धर्म के शुरुआती दौर को सभ्यता के प्रसार को समझने में ज़्यादा सहायक मानते हैं। वे सभ्यता के विस्तार के संदर्भ में सबसे बढ़िया उदाहरण बौद्ध धर्म के प्रचार से आए परिवर्तनों   इस संदर्भ में वे यूरोप के विस्तार के साथ ही भारत, दक्षिण भारत, दक्षिण पूर्व एशिया आदि के वैदिकीकरण की चर्चा भी करते हैं। ये सभी चीजें युद्ध विजय से कम महत्त्वपूर्ण नहीं माने जा सकते। इस संदर्भ में बौद्ध धर्म के द्वारा नेपाल, तिब्बत, चीन, भूटान , जापान, श्रीलंका में आए परिवर्तनों के बारे में सोचना भी सहायक हो सकता है।
    इन सब बातों के आलोक में दया कृष्ण का मत है कि इतिहासकार दरअसल ‘माइक्रो’ इतिहास को लिखता है जिसमें एक खास समय, इलाका और उससे संबन्धित तथ्य उसके पास होते हैं , जबकि जरूरत है कि वह ‘मैक्रो’ इतिहास की ओर ध्यान दे जहां समय और इलाके की कोई सीमा नहीं उसका आकाश उसके सामने खुला है। उसे रचनात्मक होकर कल्पनाशील होने की पूरी सुविधा है। इस अर्थ में ही इतिहास का आकाश खुलता है। दयाकृष्ण के शब्दों में इतिहास मनुष्य के लंबी अवधि में पहिले विविध प्रकार के प्रयत्नों का फल है। वह समायातीत होकर मनुष्य के सामूहिक प्रयासों से जुड़ पाता है।  यह समझ किसी खास समय और खास इलाके से जुड़े तथ्यों की वैज्ञानिक व्याख्या से संभव नहीं है। वे इस सीमा को इतिहास तक सीमित रखकर नहीं देखते बल्कि वे अर्थशास्त्र और राजनीति के साथ भी इसे पाते हैं। इस अन्द्र्भ में दया कृष्ण विट्ट्गेंस्टाइन के वैश्विक पोलिटिकल सिस्टम की चर्चा भी करते हैं जो विभिन्न इलाकों की राजनीति को प्रभावित करती हैं।
    दया कृष्ण सभ्यता के इतिहास , इसके लिखे जाने की प्रक्रिया, इसके घटने के समय के बाद इसके ऐतिहासिक रूप के बनने की जटिल प्रक्रिया आदि पर विषद चर्चा के बाद इस बात तक आते हैं कि किसी सभ्यता का कोई भूगोल होता है या नहीं ? वे इस बात को फिर से दोहराते हैं कि सभ्यता के इतिहास का संबंध अतीत और भविष्य दोनों से है और साथ ही एक सभ्यता दूसरी सभ्यता से पृथक नहीं है, जुड़ी हुई है। वे एक बेहतरीन निष्कर्ष निकालते हैं कि दरअसल सभ्यताएँ मानव समाज की अधूरी परियोजनाएँ है जिसमें अभी भी संभावना बनी हुई है। यह बेहद दिलचस्प निष्कर्ष है।
    दूसरी बात यह कहते हैं कि सभी सभ्यताओं की समस्त उपलब्धियां पूरे मानव समाज की उपलब्धि है और इस प्रकार इसका एक वैश्विक रूप है। मानव समाज का कोई भी हिस्सा इसकी समस्त उपलब्धियों का अधिकारी है। यह सहकारी प्रकल्प है भले ही इसमें प्रतियोगिता भी रही है।  इसपर किसी का भी स्वामित्व या एकाधिकार एक छलावा ही है। द्या कृष्ण ने इस बात पर एक प्रकार से अफसोस ही प्रकट किया है कि अब तक सभ्यता के इतिहास (वे कहानी कहते हैं) को इस प्रकार लिखा गया है मानो वे सब अलग अलग हों। सबको यह ही लगता है कि महत्त्वपूर्ण चीजें भीतर ही घटित हुई और बाहर से कुछ जो लेनदेन हुआ वह कम हुआ और वह आकस्मिक ही था। सुविधा के लिए यह ठीक हो सकता है लेकिन दयाकृष्ण के अनुसार ये सभी सभ्यताएँ एक तरह से जुड़कर एक दूसरे से सीखती हुई आगे बढी हैं। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं की “समकालीन पश्चिमी चिंतन में बुद्धि के उच्छेदन (सबवर्शन  को उस चिंतन की एक अन्य लड़ी द्वारा आगे बढ़ाया गया है जो ज्ञान को एक ऐसे उत्पाद के रूप में देखने का परिणाम है जिसकी जड़ें ‘सत्य’ की तलाश में नहीं बल्कि उन कामनाओं और हितों की पूर्ति में है जिनका पारंपरिक रूप से ‘सत्य’ समझे जाने वाले तत्त्व से कोई संबंध नहीं है।” (पृ 220) इस तरह के प्रयासों के प्रति दया कृष्ण सावधान हैं और वे कहते हैं कि एक सभ्यता को उस प्रलोभन से बचाना होगा जो बुद्धि द्वारा ही प्रस्तुत किए गए हैं। (फूको, देरीदा और रोर्टी समेत कई दार्शनिकों का स्पष्ट उल्लेख इस संदर्भ में किया गया है।) ये प्रलोभन सर्वाधिक सूक्ष्म और खतरनाक होते हैं क्योंकि वे बुद्धि को ही अपने को भिन्न तरह से देखने के लिए राजी करने का प्रयत्न करते हैं। इसके कारण अपने को एक सांस्कृतिक क्रियाशीलता के रूप में देखने और साभ्यतिक भूमिका को भूलने का खतरा बढ़ता है।
    पुस्तक को पढ़ते हुए यह स्पष्ट है कि सभ्यता और शास्त्र के बीच के संबंध की रक्षा का एक उद्देश्य इसके साथ जुड़ा है। जिन लोगों को सभ्यता और संस्कृति के निर्माता के रूप में शास्त्र से लोक की ओर उन्मुख होना जरूरी लगता हो उनके लिए यह पुस्तक एकांगी लगेगी। सभ्यता द्वारा निर्मित शास्त्रीय संरचना की रक्षा को दया कृष्ण बहुत महत्त्व देते हैं। दार्शनिक ने जिस उद्देश्य से यह पुस्तक लिखी है उसके बाहर जाकर लोक और शास्त्र के द्वंद्व की चर्चा यहाँ करना अनावश्यक होगा।
    सभ्यता के संबंध में दया कृष्ण के इस प्रकार के निष्कर्षों से सभ्यता के इतिहास के संबंध में नये ढंग से सोचने की दृष्टि मिलती है। जिस अध्याय में इतिहास , इतिहास-लेखन और मानव समाज के लिए अपनी पहचान (आइडेंटिटी) और सत्य के साथ उनके संबंध की पड़ताल की गई है उसमें दया कृष्ण ने एक तरह से अपने निष्कर्षों को बहुत खोल कर लिख दिया है। इस पुस्तक के शुरू में यह कहा गया है कि यह 1997 में अङ्ग्रेज़ी में प्रकाशित दया कृष्ण की पुस्तक का अनुवाद है। इससे लग सकता है कि यह पूरी किताब का अनुवाद है। पर इस पुस्तक में से छह में से चार अध्यायों का ही अनुवाद संकलित है। छोड़ दिए गए दो अध्यायों में से एक जो सीधे सीधे इतिहासलेखन पर ही है उपयोगी सिद्ध होता। संभव है इन दोनों महत्त्वपूर्ण अध्यायों को अलग से प्रकाशित किया जाए।
    अपनी सोच में दया कृष्ण सभ्यता और संस्कृति के बहुलता वादी दृष्टिकोण के पक्ष में खड़े हैं। जिस तरह से वे सभ्यता के निर्माण के उद्यम पर चिंतन द्वारा मनुष्य द्वारा सभ्यता के निर्माण के अधूरे काम के रूपायण की ओर बढ़े हैं उस प्रयास को हिन्दी बौद्धिक जगत समझने की कोशिश करे तो हो सकता है कि दया कृष्ण जैसे विचारकों के बारे में जो अनभिज्ञता है वह दूर हो और आम हिन्दी का पाठक समृद्ध हो। यह फिर से दोहराया जा सकता है कि यह कठिन है क्योंकि दया कृष्ण ने अपनी बात को अपने विषय की दुरूह अकादमिक भाषा में ही रखा है। अनुवादक ने भी हिन्दी के शब्द भंडार की समृद्धि का प्रमाण देने की चेष्टा एक स्वाभिमानी हिन्दी लेखक की तरह की है। बेचारे हिन्दी के सामान्य पाठक के प्रति विद्वान अनुवादक ने कोई रहम नहीं किया है।  एक एक शब्द मानो अङ्ग्रेज़ी के शब्द का मुक़ाबला करने के लिए लाए गए हैं। यह बहुत ही श्रमसाध्य कार्य रहा होगा यह स्पष्ट है।
    अब इस पुस्तक पर चर्चा करके इसको पाठकों के लिए और अधिक ग्रहण-योग्य बनाने की चुनौती हमारे सामने है। तभी हिन्दी में निरंतर क्षीण हो गयी विचार परंपरा में यह हिन्दी अनुवाद विस्तार करेगी जिसकी आशा अशोक बाजपेयी ने आमुख में व्यक्त की है।    

            

Monday, 14 August 2017

Random notes 15 August 17

On 71st Independence Day, while passing through Lucknow station, picked three Hindi magazines- India Today, Outlook, Aha! Zindgi. Read two newspapers- Dainik Jagaran and Hindustan. Hindi society and Hindi print world has changed dramatically, indeed. The liberal mindset is no longer dominant. All kind of community ties -religious, social- are obvious in newspapers. Ramnagar area of Uttarakhand gave me the impression that the community links are most important in marketing space. The overwhelming impression one gets while roaming on roads is that the people are living and thinking very differently from the way we tend to believe they are. Survival is the key issue for most of the people. But even the people who are bit secured the life is all about living with comforts. Interestingly, the entertainment of 'low levels' and religious festivities have not lost any appeal. All seemed dying to live with comforts and power. The issues which dominated the contributions of our writers -Ashis Nandy, Irfan Habib, Khilnani, Sashi Tharoor and many more -have talked in terms of values, ideals of the liberal world... India Today seemed to focus on the corporate world view with which people's dream world has a connection. Somehow, a conversation between two youths- one from Ramgarh area and the other from Bihar -which I over heard last night, while taking dinner seemed missing in our print, is not getting out of mind. The two youths, struggling for getting a sustainable salary, were eating and sharing things which gave me the impression that we are still living in the dark world about which Dostovyesky and others have written -a world where there is no real hope. It was so depressing that I could not eat properly. The conversation ended with a coaxing by UP lad. He was telling his friend that he is still not learning properly. The other lad was visibly shaken. He was not saying anything...
With the realities of our country the ideals (Aadarsh) do not seem to survive unless we make necessary adjustments. Thinking of Premchand's 'Aadarshounmukh Yatharthavad' ( ideal driven realism)...

Wednesday, 2 August 2017

इन दिनों फेसबुक पर कुछ नहीं लिख पा रहा।   कोशिश कर रहा हूँ कि  अब कुछ लेख वेख लिखूं.  यह कोई  आसान काम नहीं है. एक बार फेसबुक पर चटपट लिखकर, लोगों  के लाइक्स और कमेंट्स बटोर लेने की आदत पड़ जाने  के बाद उसे छोड़कर लिखने की ओर  जाना कठिन  है.   कोशिश  कर रहा हूँ.
हो सकता है ब्लॉग   पर फिर से लिखना शुरु  करना एक नए समय की शुरुआत हो !  

Sunday, 4 September 2016

E P W at 50 -the 'Small Voice'

Bernard D' Mello has written an appreciation for the magazine which has completed fifty years of existence with its reputation intact. One or two points I find very useful.  (August 20, 2016)

"1968"

A decade of rebellion in various parts of the world directed against capitalism and the "old left".
Various movements: 
1. Naxalbari, Srikakulam , 
2. Chipko movement (beginning in April, 1973)
3. Dalit Panthers
4. Women's movement: when in 1978 the Supreme Court acquitted two policemen who had committed custodial rape. This is considered "a defining moment that gave birth to the women's movement.
5. Second phase of India's civil liberties and democratic rights (CLDR) movement in the early 1970s
6. 20-day strike in the Indian Railways in May 1974
7. Popular upheavels in Gujarat and Bihar preceding the Emergency
8. The Dalli-Rajhara Spring of the contract workers led by Shankar Guha Niyogi.

"1989"

The period of capitalist triumphalism... rise of Hindutva and neo-liberalism. With this, De Mello writes began "guild" began to give way for NGOs. With this came "metamorphosis" of India into a grab-what-you-can-for-yourself capitalist system.
De Mello says that, "In neo-liberal capitalism, all personal relations become reified as relations between things.
He concludes his two page write up by saying - "you need to be able to distinguish between authentic and spurious, ethical and unscrupulous, aesthetic and ugly, civilized and barbaric...the capacity  ... to say "no" remains the basis of our hope and faith... 

Sunday, 26 June 2016

Cynical Thoughts 1

Today, I am sharing something which may be considered as my own conclusion on the basis of my own experiences. I have to say it and move on. My own experience suggests (to me) that in the academic space in our country a choice you are not supposed to think independently. You should follow the elite academics and provide the support to his/her theory. Basically, the training for high level academic life is given to select few whereby they develop their skills in handling complex ideas in a complex manner. A paragraph written by such trained scholars is enough to identify him or her as "really competent" for high level of academic works. These high level academics, I call AC 1 passengers, are very specialised and they focus on one theme or area beyond which they will not move. Some of them, for a change, keep a side interest in film, theatre or a sport, but basically they are specialist of their own area. They follow the main road, they are always visible and there is a support system available for them, almost everywhere. (More on it later)
On the second level, which I call AC 2 tier, there are people who are hardworking, intelligent and they are not necessarily coming from elite backgrounds. They work in tandem with the AC 1 people, and try to follow them. These people may talk too much, but they never really cross the line, set by the AC1 people. They are amply rewarded and they are also seen as respectable.
Then comes the AC 3 people, who are followers of AC 2 people. Access to this is open to all those hard working, intelligent people who can do good work but never dare to speak up, challenge the dominant paradigms, set by the higher class people.
Then comes Non-Ac class in which there are reserved class and non-reserved class. This is the most creative class, but they are not given opportunity and most of them remain mere good prospects until he is backed by higher class people.
We live in democracy and fortunately the entire space can not be controlled by elites. Some concessions are made to accommodate people due to reservation, political pressure and all. The AC people are intelligent enough not to leave this nonreserved non ac co-travelers. They identify their followers, and try to control the large number of people through these people. As long as you do not assert your independence and disturb the dominant paradigms you may survive. You will be allowed to be seen with the big people, if you are lucky. But, normally you are not allowed to go beyond a point.
On the basis of my own experiences, let me be categorical on this, you will be discouraged at every point if you try to enter in crucial areas. You can be fact finder, supplier of facts, supporter of their theories and live peacefully. Once you start raising your own questions, you will see the change. Your applications would be very politely sidelined and everytime you will be given the signal that you are good but not good enough like them, the high class people. To add insult to injury, the lesser competent people are seen visible as successful people. In a country like ours, few foreign trips are good enough to buy academics.
At one level, you get the signal. Either remain with them or live as ordinary mortals. Most of us realise this by the time we reach 40. What to do ?
All your questions will haunt you, trouble you and you will have no place to move. Some of us go cynical at this stage. Some of them go to some party or group with the hope to find a way out. 45 is crossed, your energy level is down and then you realise even there asking your own questions create problems.
Then, you realise,you should have asked all your questions the way you wanted twenty years ago without bothering about anything. You should realise you can not move to AC class in your own langauge, with your questions and the baggage you carry with you for being born in a underprivileged stock.
Should you revolt at the age when your sympathisers are advising against it ? Rest assured, you will be made fun of, not by the privileged but by people like you, who are smarter than you in reading the signals of the elites.
Was Kunwar Singh right ?
I think, you have no option but to revolt if you want to die with satisfaction of being an honest man.
There is no guide for you. Let your conscience be your guide.
[Cynical Thoughts 1]


Sunday, 26 October 2014

कार्पोरेट भारत में भाषा का प्रश्न

 कार्पोरेट भारत में भाषा का प्रश्न

हिन्दी भारत के भास/उहे एक राष्ट्र के आसा हम ओकरो भंडार बडाइब/ओहू में बोलब ओ गाइब तबो न छोडब आपन बोली/चाहे केहु मारे गोली।’ मनोरंजनप्रसाद सिंह की इन पंक्तियों के पीछे की दृष्टि से आज भारत बहुत आगे आ गया लगता है। राष्ट्र निर्माण के जिस स्वप्न के साथ हिन्दी का प्रचार प्रसार हुआ था उसमें हिन्दी को देश की सम्पर्क भाषा के रूप में देखना एक सहज स्वाभाविक राष्ट्रीय संकल्प था। वह सपना क्यों टूटा यह यहाँ विचारणीय नहीं है लेकिन इस बात को याद रखे बिना कि हिन्दी हमारे राष्ट्रीय स्वप्न के साथ जुड़ा हुआ है, भारतीय भाषाओं के स्वतन्त्र भारत में अधिकार पर बात करना सम्भव नहीं है। आखिर क्यों एक कवि जो अपनी बोली के लिए गोली खाने के लिए तैयार है वह नि:संकोच हिन्दी को भारत (देश) की भाषा मानता है? ऐसे सैकड़ों–हजारों विद्वान लोग थे जो अपनी-अपनी भाषा पर पूरा अभिमान रखते हुए हिन्दी को देश की भाषा के रूप में सहज रूप से स्वीकार कर रहे थे। जब से राष्ट्र निर्माण का संकल्प इस देश में आया उसी समय से हिन्दी को ही यह स्थान दिया गया। इसकी शुरूआत बंगाल में हुई बनारस या पटना में नहीं हुई यह ध्यान दिलाना भी अनुचित नहीं होगा। गाँधी युग में अच्छी तरह से स्वीकार कर लिया गया। देश के स्वाधीन होने के बाद जिस तरह अँग्रेजी को हटाकर हिन्दी को प्रतिष्ठित करने के सिद्धान्त को नेहरूवियन आधुनिक उदार सोच ने स्थगित किया उसपर बहुत चर्चा की जा चुकी है। यह गलत था या सही इसपर कोई मन्तव्य दिए बिना यह कहना सही होगा कि इस समय लिये गये निर्णयों से आखिरकार अँग्रेजी इस देश में शक्तिशाली होती गयी और अब यह उस समय से ज्यादा स्वीकृत है जिस समय अँग्रेजों की हुकूमत थी। मीनाक्षी मुखर्जी समेत कई विद्वानों ने इस अँग्रेजी की भारत में बढ़ती शक्ति को लेकर आश्चर्य व्यक्त किया है। इस विषय पर इस छोटे आलेख में पिछले डेढ़ सौ सालों में भाषा के प्रश्न पर हुए परिवर्तनों पर एक टिप्पणी की गयी है और अन्त में वर्तमान समय में उभर रहे विकल्पों पर एक मन्तव्य दिया गया है।
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यह अब एक ‘क्लिशे’ हो गया है कि अगर चीन, जापान, फ्रांस, रूस और जर्मनी जैसे देशों का पूरा काम (तकनीकी जरूरत समेत) अपनी-अपनी भाषाओं में हो जाता है तो आखिरकार भारत का काम क्यों नहीं चल सकता। इस बात के समर्थन और विरोध में दशकों से कहा सुना जाता रहा है लेकिन कोई हल नहीं निकल सका। स्थिति यह हो गयी कि रवीन्द्रनाथ टैगोर की भाषा बंग्ला भी अँग्रेजी दबाव में लगातार आती गयी, हिन्दी की तो बात छोड़ ही दें। ऐसे स्थिति आ गयी कि तकनीकी और समाज विज्ञान के क्षेत्र में ही नहीं साहित्य और धर्म के क्षेत्र में भी अँग्रेजी आने लगी। राजनीति, धर्म और पत्रकारिता सभी क्षेत्रों में अँग्रेजी का वर्चस्व बढ़ने लगा। अब इस स्थिति में कुछ गुणात्मक किस्म के परिवर्तन हुए हैं जिससे समीकरण बदले हैं। इस नयी परिस्थिति में भारतीय भाषाओं के सामने एक नये विकल्प का संसार खुलता दीख रहा है इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए। यह याद रखा जाना चाहिए कि बंकिम–रवीन्द्रनाथ या भारतेन्दु–प्रेमचन्द की औपनिवेशिक ‘राष्ट्रीय दुनिया’ अब नहीं है। उस समय के आदर्श अब जितने भी मोहक लगते हों वे हमारे लिए पर्याप्त नहीं हैं। अँग्रेजी का जो विरोध था वह अँग्रेजी हुकूमत के साथ जुड़ा हुआ था। एक राष्ट्र को कैसा होना चाहिए इसके बारे में सोचते हुए इंटेलिजेंसिया (इसे सुविधा के लिए हिन्दी में स्वीकार कर लिया जा सकता है) ने एक राष्ट्रीय स्वप्न का ताना-बाना बुना जिसमें एक स्वाधीन राष्ट्र के लिए अपनी भाषा का महत्त्व बना। उसकी खोज शुरू हुई और इस दौरान ही अँग्रेजी के स्थान पर एक स्तर पर हिन्दी और अन्य स्तरों पर हिन्दी समेत सभी भारतीय भाषाओं को रखकर सोचने का विकल्प उभरा। हिन्दी को सम्पर्क भाषा के रूप में देखने का जो आधार बना उसमें राष्ट्र के बनने के पूर्व के समय के सामूहिकता के आधारों–धर्म, धार्मिक पुस्तकें, धार्मिक स्थल आदि का महत्त्व है। जो हिन्दू मानस के थे उनके लिए संस्कृत सबसे ऊपर थी, पर विभिन्न कारणों से हिन्दी उनके लिए सबसे मान्य देश की सम्पर्क भाषा बन कर उभरी। हिन्दी के राष्ट्रीय विकल्प बन जाने का कारण हिन्दी के लोग नहीं थे यह याद रखें। हिन्दी किसी भी तरह से कई अन्य भारतीय भाषाओं से बेहतर स्थिति में नहीं थी। हिन्दी को सबसे बड़ी भाषा इसलिए माना गया क्योंकि यह हमारे राष्ट्रीय स्वप्न का हिस्सा थी।
जिसे हम गाँधी युग कहते हैं उसमें इस स्वप्न को जब रूप दिया गया भाषा का प्रश्न उलझने लगा। इस प्रश्न को दो स्तरों पर सुलझाने की कोशिश हुई - जनता के साथ संवाद में यह मान्य हुई। इससे हिन्दी को महत्त्व मिला इसमें सन्देह नहीं। भारत के सभी हिस्सों में हिन्दी ही जनता और उनके राष्ट्रीय नेताओं के बीच की भाषा बनी। लेकिन, नेताओं, बडे लोगों ने अपने घर और आपस के संवाद के लिए, ज्ञानार्जन के लिए अँग्रेजी को ही मान्य बनाया। लगभग सभी बड़े नेता, पूँजीपति और विद्वान आदि अँग्रेजी के साथ ही रहे। इस सन्दर्भ में गाँधी ने कुछ दबाव बनाया और हिन्दी प्रदेश के नेताओं के साथ हिन्दी में संवाद करना शुरू किया। यह दिलचस्प है कि गोविन्द बल्लभ पन्त जैसे हिन्दी प्रदेश के नेता ने गाँधी से अँग्रेजी में पत्राचार करना चाहा और दूसरी ओर से दबाव बनने पर अनिच्छा से हिन्दी में पत्र लिखना शुरू किया। काँग्रेस के बडे़ नेताओं में सिपर्फ राजेन्द्र प्रसाद थे जिन्होंने हिन्दी को सहज रूप से स्वीकार किया। उन्होंने अपनी आत्मकथा हिन्दी में लिखी, अन्य बडे़ नेताओं ने अँग्रेजी में। इस देश में एलिट अपने लिए नेताओं का चुनाव बड़ी सावधानी से करते हैं। उस दौर से लेकर 1990 के दशक तक एलिट किसी देशी नेता को अपना समर्थन देने से येन–केन प्रकारेण बचना चाहता है। गाँधी के मामले में वह मजबूर था इसलिए उसे ‘थोड़ा सनकी’ मानते हुए भी समर्थन देने के लिए तैयार हुआ क्योंकि वह ‘अच्छे आदमी’ थे। (ये इतिहासकार बरूण दे के शब्द हैं) यह खासा दिलचस्प है कि वामपन्थ के लगभग सभी बडे़ नेता, काँग्रेस के अधिकांश बडे़ नेता आदि अँग्रेजी से अपनी भाषाओं की तुलना में अधिक निकट थे। यानी, जनता के लिए भारतीय भाषा और एलिट के लिए अँग्रेजी (अपनी भाषा के साथ) यही आदर्श विकल्प था। बिहार के एक विद्वान हैं – शैबाल मित्र। उन्होंने एक दिलचस्प लेख लिखा है जिसमें उन्होंने कहा है कि बिहार में पारम्परिक इंटेलिजेंसिया के लिए भाषा अँग्रेजी थी। (यहाँ पारम्परिक का उपयोग समाजशास्त्रीय केटेगरी के रूप में है।) जो इस देश की भाषा के साथ थे उसे वे कॉकटेली इंटेलिजेंसिया कहते हैं। इस बात से भड़कने की जरूरत नहीं है। बिहार जैसे राज्य में सभी बडे़ विद्वान हिन्दी जानते हुए अँग्रेजी में ही काम करते रहे यह एक सच है। अब आप राहुल सांकृत्यायन का नाम न लें, वे एक अपवाद हैं। राहुल भाषा के मामले में बहुत ही लोकतान्त्रिक थे। वे 1926 में भी जनता के साथ उसकी अपनी बोली में राजनैतिक संवाद करना चाहते थे। राजेन्द्र प्रसाद आदि हिन्दी में भाषण देते थे। उन्हीं सभाओं में राहुल (तब रामोदर दास) छपरा की बोली में भाषण देते थे और जनता में वही ज्यादा लोकप्रिय होता था। बंगाल में यह प्रवृत्ति थोड़ी कम थी लेकिन वहाँ भी प्राथमिकता अँग्रेजी को ही दी जाती रही। इस देश के इंटेलिजेंसिया का जब कोई सम्यक विश्लेषण होगा यह साफ हो जाएगा कि यह अँग्रेजी की तरफ झुकी हुई रही है। चाहे उर्दू की ‘उँची दुनिया’ हो या पिफर बांग्ला का सांस्कृतिक संसार हो सब तरफ अँग्रेजी को ही बढ़त मिली हुई थी। प्रमाण के लिए समर सेन और तपन रायचैधरी की आत्मकथाएँ पढ लें। लेकिन उस समय राष्ट्रीय दबाव इतना अधिक था कि यह सबकुछ उभर कर नहीं आया। अकादमिक जगत का कोई भी आदमी इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि साहित्य के सीमित संसार ने भाषिक और अकादमिक का एक ‘नीचा नगर’ बनाया जिसके अलावा सब जगह अँग्रेजी को बढ़त मिली हुई थी। पर, सरकारी नीति निर्माण में सिद्धान्तत: अँग्रेजी को धीरे-धीरे हटना था सरकारी नीति के कारण भारतीय भाषाओं को कम से कम अँग्रेजी के समतुल्य स्थान देने की बाध्यता थी। इसी कारण हिन्दी को आगे आने का एक मौका बना। नेहरू के नेतृत्व में एक उदार उत्तर–औपनिवेशिक राष्ट्रीय दौर शुरू हुआ जिसमें अँग्रेजी को बने रहने का मौका मिला। इस देश में अँग्रेजी अगर इस शक्तिशाली रूप में बनी हुई है तो उसके लिए मैकॉले को श्रेय दिया जाता है लेकिन उसके साथ नेहरू का नाम भी लिया जाना चाहिए। हालाँकि यह भी एक सच है कि मैकॉले और नेहरू ने किसी बदनीयती से ऐसा नहीं किया था। वे जिस वैचारिक संसार से आते थे वहाँ से अँग्रेजी को इसी रूप में देखा जा सकता था।
उदार उत्तर–औपनिवेशिक दौर जब तक चला (कह सकते हैं अस्सी के दशक तक यह चला) इस देश के एलिट सुविधाजनक स्थिति में रहे। हर स्तर पर अँग्रेजी के साथ चलने के फायदे बने रहे। एकबारगी तो ऐसा लगा कि पूँजीपति वर्ग पूरी तरह से उदार एलिट के तर्कों से ही चलने के लिए तैयार हो गया है। यही वह दौर था जब सलमान रूश्दी जैसे लेखक ने मैकॉले जैसा भयानक वक्तव्य दिया जिसमें भारतीय साहित्य को लगभग अँग्रेजी साहित्य में घटा देने की भयावह कोशिश की गयी थी। वह उदारवाद का स्वर्णिम काल था जब लगा कि बाजार भी उनके साथ है। जितने नये शिक्षण संस्थान बने सबमें यही पाठ दोहराया गया कि अँग्रेजी के सिवा कोई विकल्प नहीं। ऐसी बातें कॉमन सेंस का हिस्सा बनने लगीं जिसमें यह निहित था कि जाने अंजाने अँग्रेजों ने भारत को अँग्रेजी में काबिलियत देकर भारत को चीन समेत अन्य देशों की तुलना में बढ़त दे दी है। यानी, अँग्रेजी हमारी ताकत है। यही वह दौर था जब हिन्दी के बड़े कवि (जिन्हें साहित्य जगत का सबसे बडा सम्मान मिल चुका है) ने उदारता से कहा कि वे अँग्रेजी को एक भारतीय भाषा मानते हैं।
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बाजार और पूँजीवाद की अनिश्चितता ही उसकी शक्ति है। उदार पूँजीवाद के भीतर से नये तर्क उभरे और एक नये समीकरण ने जन्म ले लिया। उदार उत्तर–औपनिवेशिक दौर के महानायक वे लोग थे जो एक ऐसे एलिट को शक्तिशाली बना रहे थे जिनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने मुनाफे को देश के साथ साझा करने में पीछे नहीं हटेंगे। संजय बारू ने मनमोहन सिंह के सम्बन्ध में जो किताब लिखी है उसमें भी यही तर्क उभरता है। उत्तर–औपनिवेशिक कॉरपोरेट युग, जिसकी शुरूआत इस देश में हो चुकी है, ने एक नया समय शुरू किया है जिसमें देशी भाषाओं को बाजार की ओर से अधिक शक्तिशाली बनाया जाना शुरू हुआ। यह एक पेचीदा बात है जिसको वे नहीं समझ सकते जो अभी भी पिछले दोनों दौर के तर्कों के सहारे ही हल ढूँढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।
यह नया समय शक्तिशाली बनने के नये स्वप्न के साथ लगातार आक्रामक होता जा रहा है। संयोग से यह समय इस देश में राजनैतिक रूप से उस विचारधारा के लोगों के नियन्त्रण में है जिसके स्वप्न की भाषा राष्ट्रीय है और वे शक्ति के देशी भावों के साथ चलना चाहते हैं। इस युग में आर्थिक और सांस्कृतिक जगतों को अलगाया जा रहा है। आर्थिक रूप से उन्नत होना जिनका ध्येय है उनको इस समय के राजनैतिक स्वरों से कम असुविधा हो रही है। उन्हें लग रहा है कि यह वह राजनैतिक नेतृत्व है जो उनके आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनने को काम्य मानता है। वह अगर सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्रों में अनुदार भी रहे तो भी उसे विशेष परेशानी नहीं होती है। चीन के मॉडल की सफलता के बाद इस मॉडल का जोर बढ़ा है। इसमें राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्वतन्त्रता का हनन बहुत चुभने वाला नहीं रह जाता, बशर्ते आर्थिक विकास सुनिश्चित हो। लेकिन इस प्रोजेक्ट को सफल बनाने में लगे राजनैतिक नेतृत्व के लिए यह पूरा मामला ‘राष्ट्रीय’ है, ‘सांस्कृतिक’ है। वह देश को साफ–सुथरा, विकास से युक्त, सुखी और शक्तिशाली बनाना चाहता है।
वर्तमान भारत पर सोचते हुए एक इतिहास के विद्यार्थी को दो प्रसंगों को याद करने की छूट मिलनी चाहिए। प्रथम, फ्रांस की राज्य–क्रान्ति का प्रसंग और द्वितीय, बिस्मार्क का युग। फ्रांस की क्रान्ति इसलिए शुरू हुई क्योंकि राजा के पास आर्थिक विकल्प नहीं बचे थे और वह उस व्यवस्था द्वारा पोषित शक्तिशाली वर्गों से अधिक योगदान की अपेक्षा करता था जिसके लिए शक्तिशाली समूह तैयार नहीं थे। उससे आर्थिक संकट गहराया और क्रान्ति शुरू हुई, कई वर्षों तक चली और अन्तत: विप्लवी समाज फ्रांस ने एक निरंकुश अधिनायक को सत्ता सौंप दी जो मुकुट को अपनी तलवार की नोक से उठाकर अपने सिर पर रखना सही मानता था और जो ‘असम्भव को मूर्खों की डिक्शनरी का शब्द मानता था’। बिस्मार्क ने जर्मनी को आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनाया और कहा जाना चाहिए कि औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप इंग्लैंड ने जो कुछ सौ सालों में हासिल करके अपनी बढ़त बनायी थी उसको खारिज करते हुए बीस तीस सालों में जर्मनी ने इंग्लैंड के बराबर अपनी औद्योगिक क्षमता को बढ़ा दिया। उस बिस्मार्क ने इंजीनियरों को विद्वानों से बड़ा माना और नौजवानों को संदेश दिया – ‘परिश्रम, परिश्रम और परिश्रम!’ उस ‘लौह पुरूष’ ने ही तो महान जर्मनी के ऐतिहासिक संकल्प को पूरा किया।
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इस दौर में कॉरपोरेट को काम करने वाले एक ‘हिन्दू बिस्मार्क’ की जरूरत थी। लोकतन्त्र के रूप में भारत की जो तस्वीर बनती दिखती है उसमें सबकुछ ऐसे ही चला तो सबकुछ बदल जाएगा। देश शक्तिशाली बनेगा, आर्थिक रूप से बनेगा, पूँजी का वर्चस्व बढे़गा, राजनीति में गुणात्मक बदलाव होंगे और देश की जनता के इतिहास और उसकी अपनी बोली–वाणी को महत्त्व मिलेगा। इस दौर में अँग्रेजी का वर्चस्व टूटना चाहिए। अब बाजार यह मान चुका है कि इस देश में विकास के लिए भारतीय भाषाओं का महत्त्व अँग्रेजी से अधिक है। वह इस ‘मास’ (आमलोग) को विकास में शामिल करके अपना विस्तार करना चाहता है। पूँजी के विस्तार के इस दौर में अखबारों में छपे मार्केट ट्रैंड को समझाने वाले कुछ दिनों से बार बार यह कह रहे थे कि इस देश की भाषा का ही भविष्य है। लेकिन इस नये समय में, इस (नये) ‘देश’ में देश की भाषा कैसी होगी इसे कैसे बनाया–बढ़ाया जाएगा यह इस बात पर निर्भर है कि देश की नयी इंटेलिजेंसिया कैसा व्यवहार करती है। आपने देखा होगा कि इन दिनों क्रिकेट की कमेंट्री अब वे लोग कर रहे हैं जिनकी भाषा (अँग्रेजी के अलावा) बांग्ला, तमिल, तेलुगु और मराठी है।
और अन्त में, यूपीएससी की परीक्षा के सम्बन्ध में जो आन्दोलन चल रहा था उसके बारे में दो शब्द। क्या किसी को भी यह लगता था कि यह आन्दोलन ‘सफल’ नहीं होगा? इसका ‘सफल’ होना तय था। ठीक वैसे ही जैसे पड़ोसी देश की एक रैडिकल लेखिका को लम्बे समय का वीसा दिया जाना! लगता है वे तमाम संस्थाएँ और पद–प्रतिष्ठान आदि ही अपनी शक्ति खोते जाएँगे जो पिछले दौर में शक्ति के केन्द्र हुआ करते थे। क्या आपको लगता है कि यूपीएससी, योजना आयोग या यूजीसी उतने शक्तिशाली रह सकेंगे? अगर लगता है तो आप अभी भी उदार औपनिवेशिक राष्ट्रीय युग के साथ चिपके हुए हैं। उदार अँग्रेजीपरस्तों की दीनता अभी नहीं दिख रही है साफ साफ, थोडे़ दिनों बाद दिखने लगेगी। ये बात और है कि ऐसा होना काम्य है या नहीं। 
(यह आलेख 'सबलोग' के सितंबर 2014 अंक में प्रकाशित है।)