भूमिका
उन दिनों मैं कोलकाता के एक कॉलेज में अध्यापक था और शहर के बहुत सारे अध्यापक-पत्रकारों की तरह ऐसी जगहों में आता जाता रहता था जहाँ किताबें, संस्कृति-चर्चा, सेमिनार आदि होते हैं और जहाँ बैठने के लिए ज्यादा पैसे खर्च न करने पडते हों. इस हिसाब से मेरे लिए नेशनल लाइब्रेरी एक सुविधाजनक जगह थी जहाँ मैं अपने कॉलेज से निकल कर अक्सर ही पहुंच जाया करता था. मुझे लगता था कि इस लाइब्रेरी की महिमा अपरंपार है. यह एक पूरी दुनिया को अपने में समेटे हुए है. भाँति-भाँति के लोग - विद्वान, पढाकू , छात्र, घुमक्कड , प्रेमी, अड्डेबाज, साहित्यकार, जिज्ञासु, निठल्ले और भी न जाने कितने प्रकार के लोग वहाँ जुटते थे.
एक दिन मैं लाइब्रेरी के मेन हॉल की एक टेबुल पर बैठा कुछ पढ रहा था. पढने में मन नहीं लग रहा था. आसपास की टेबुलों पर नजर डालते हुए मेरा ध्यान एक व्यक्ति पर गया जो बहुत तल्लीन होकर एक किताब को पढ रहा था. उसकी निगाह लगातार पुस्तक पर ही थी. उसको इस तरह मनोयोग से पढते देख मेरा ध्यान उसपर केन्द्रित होना लगा. उत्सुकता हुई कि देखूँ वह आखिरकार ऐसी क्या चीज पढ रहा है. मैं उसकी गोल टेबुल पर ठीक उसके सामने बैठ गया और एक इनसायक्लोपीडिया के पेज पलटने लगा. लगातार ध्यान इसी बात पर लगा रहा कि वह कब उस किताब से अपना ध्यान हटाता है. इस इंतजार का दस मिनट भी नहीं बीता होगा कि मुझसे नहीं रहा गया. मैंने उसे टोका- "यह कौन सी किताब है?" उसने कोई उत्तर नहीं दिया.
मुझे लगा उसने सुना नहीं. थोडा अटपटा भी लगा. मैंने स्वर को तेज करते हुए उससे पूछा- " यह आपकी पुस्तक है?" उसने फिर भी नहीं सुना. अंत में मैंने उसके सामने बंद पडी दो किताबों में से एक को उठा लिया और उसे पलटने लगा. फिर भी वह पूर्ववत अपनी किताब में ही डूबा रहा !
मैंने ऐसा पढने वाला देखा नहीं था. कुछ सूझा नहीं कि क्या किया जाए ताकि उसके साथ बात शुरू हो सके. मैं धीरे धीरे उसकी पुस्तकें पलटने लगा. जिन दोनों पुस्तकों को मैंने उठाया वे दो उपन्यास थे- एक उपेन्द्रनाथ अश्क का और दूसरा राजेन्द्र यादव का. अश्क जी की किताब का शीर्षक मेरे लिए नया था. लेकिन राजेन्द्र यादव का उपन्यास शह और मात मेरा पढा हुआ था.
मैं उस पुस्तक का नाम देखने की कोशिश करने लगा जो वह लगातार पढे जा रहा था. वह एक बहुत मोटी सी कोई किताब थी.
यह एक तकलीफदेह प्रतीक्षा सिद्ध हुई. करीब दो घंटे तक वह यूँ ही पढता रहा ! मैं कुढता रहा, मन ही मन प्रशंसा भी करता रहा और उसके इस तरह पढते रहने पर आश्चर्य भी करता रहा. करीब 5 बजे के करीब उसने पुस्तक को बंद किया. शायद पुस्तक समाप्त हो गयी थी.
उसने पुस्तक बंद करके निर्विकार भाव से आसपास देखा. उसकी निगाह मुझसे मिली. उसने मेरे सामने पडी अपनी किताबों को देखा और फिर एक प्रश्नवाचक दृष्टि मुझपर डाली. मैं मुस्कुरा दी. बदले में वह मुस्कुराया या नहीं समझ में नहीं आया. वह आहिस्ते से उठा, मेरे सामने पडी पुस्तकों को लिया और काउंटर की ओर बढ गया. उसकी अभद्रता पर मुझे क्रोध आ गया. मेरे अध्यापकीय गौरव पर यह एक आघात सा था.
मुझे सँभलने में कुछ सेकेण्ड्स लगे. मैं उठकर तेजी से काउँटर की ओर बढ गया. वह अपनी किताबें जमा कर रहा था. काउँटर पर बैठे व्यक्ति ने जब उससे उसका नाम पूछा तो उसने धीरे से कहा- दिलीप बलराज. इस तरह उसका नाम मुझे पता चला. कार्ड लेकर वह तेजी से गेट की ओर बढ गया. मैं ठगा सा खडा रह गया.
अगले दो दिन मैं लाइब्रेरी नहीं जा पाया, पर मैं उस "पाठक-राज" (मन ही मन मैंने उसे यही नाम दिया था) को भूला नहीं. कई बार उसके बारे में सोचते हुए मैं दोस्तोव्येस्की के पात्रों के पास पहुँच जाता हालाँकि दिलीप देखने में उन पात्रों जैसा नहीं था. वह उतना दुबला-पतला, फटेहाल नहीं था जैसा मुझे लगता था कि दोस्तोव्येस्की का हर प्रमुख पात्र होता है !
तीसरे दिन मैंने दिलीप को लाइब्रेरी में एक नोटबुक में कुछ लिखते देखा. पास में कोई अंग्रेज़ी की किताब थी. इस किताब के लेखक का नाम मैंने कभी नहीं सुना था. मैं उसकी टेबुल के पास की खाली टेबुल पर बैठ गया. वह फिर उसी तल्लीनता से अपने काम में जुटा हुआ था. न तो वह इधर-उधर देखता था और न ही रूकता था. लगभग डेढ घंटे बाद वह रूका . उसके पेन की स्याही खत्म हो गयी थी. उस समय मेरा ध्यान इस बात पर गया कि वह फाउंटेन पेन से लिख रहा था. अब मेरे पास मौका था. मैंने तुरंत अपना 'जेल पेन' निकाला और उसकी ओर बढा दिया. उसकी आँखों में हल्की सी चमक उभरी और फिर बुझ गयी. उसने मेरी ओर देखा. चेहरे पर एक मुस्कान थी, शायद एक कृतज्ञताबोध भी.
वह मेरी कलम लेकर कुछ देर लिखता रहा , लेकिन उसे शायद मेरे पेन से लिखने में वैसा आनंद नहीं आ रहा था. कुछ देर बाद वह उठा. मेरा पेन मेरी ओर बढाया और कहा- " थैंक्स !"
मुझसे उसकी आवाज बहुत अच्छी लगी. मैंने उसे रूकने के लिए कहा. वह खडा रहा.
मैंने अपनी चीजें उठा ली और उसी के साथ लाइब्रेरी के बाहर आ गया.
बाहर आकर मैंने उसे पूछा- " आप दिलीप बलराज हैं? " उसने कहा- " हाँ' लेकिन उसके स्वर में कोई प्रसन्नता या आश्चर्य नहीं था. मैंने बात को आगे बढाने के लिए पूछा- " आप यहाँ रोज आते हैं? " "हाँ, पिछले कुछ महीने से आता हूँ" " किसलिए ? किसी काम के सिलसिले में ?" "नहीं , कुछ खास नहीं . मैं एक कथा लिखना चाहता हूँ . मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि कैसे लिखूँ . प्रॉपर फॉर्म की तलाश में मैं किताबें पढता रहा हूँ. अब भी मुझे ठीक से समझ में नहीं आ रहा है कि मुझे कैसे लिखना चाहिए. " उसने बडी सहजता से कहा.
" तो आप राइटर हैं? मैंने प्रसन्नता को अपने स्वर में उडेलते हुए कहा. " नहीं मैं सिर्फ एक कथा लिखना चाहता हूँ. इस शहर को छोडने के पहले मुझे अपनी कथा कहनी चाहिए."
मैंने विस्तार से उसे बतलाया कि इस क्षेत्र में मेरा अनुभव कितना व्यापक है. इतना तक बोल गया कि वह सिर्फ अपना ड्राफ्ट मुझे दे दे बाकी का काम मैं सँभाल लूंगा. उसने मुझे कुछ कहा नहीं. मुझे लगा उसे यह बात अच्छी लगी.
मेरे कई बार अनुरोध करने पर भी वह चाय पीने के लिए राजी नहीं हुआ. उसने बताया कि वह दिन में सिर्फ एक बार भोजन करता है और रात में दूध पीकर सोता है.
मैंने उसके चेहरे को ध्यान से देखा. मुझे लगा कि वह 'सत्यकाम' फिल्म के नायक का सा लगता था. कम से कम उसकी आँखें बिल्कुल वैसी ही थी. उन दिनों ख्यालों में दो भारतीय फिल्म नायकों- देवदास और सत्यकाम के बारे में सोचा करता था. ऐसे में इस साम्य को पाकर मुझे एक आंतरिक खुशी महसूस हुई.
उसके बाद हमलोग करीब दस बारह बार मिले, दो तीन दिनों के अंतराल पर. जिस दिन उससे आखिरी मुलाकात हुई उस दिन वह कुछ उदास सा था. उसने मुझे बताया कि अब उसे बाहर जाना है. मैंने उससे उसकी कहानी, जिसे वह हमेशा कथा ही कहता था, के बारे में पूछा. उसने अपने बडे से झोले में से कागजों का एक मोटा पुलिंदा निकालकर मुझे सौंप दिया. उसने एक बात दृढता से कही कि यह उसकी अपनी कथा है जिसे मैं जैसे चाहे छपवा सकता हूँ. चाहूँ तो मैं कुछ फेरबदल भी कर सकता हूँ.
मैंने उससे यह पूछा कि उसने कोई प्रतिलिपि अपने पास रखी है या नहीं उसने कहा- " उसकी कोई आवश्यकता नहीं है." मुझे आश्चर्य हुआ कि कैसे उसने अपनी इस कथा को एक सामान्य परिचय के बाद मुझे सौंप दिया.
वह अपने बारे में बातें नहीं करता था. उसके ड्राफ्ट में पृष्ठ संख्या दी हुई नहीं थी. कुछ पन्ने स्टेपल किए हुए थे. घर लौटकर बीवी की डॉंट खाकर भी पूरा पढ गया. कहानी मुझे ठीक-ठाक लगी. शिल्प में कोई नयापन नहीं था और कथा को सीधे सीधे कहा गया था. शाय्द उसने अपने जीवन के विविध अनुभवों को एक कथा के रूप में पिरोने की कोशिश की थी. उसकी भाषा सहज थी लेकिन पढने वाले को कुछ हिस्सा अनावश्यक लग सकता था. इसे छपवाने के बारे में कोई राय बनाने के पहले मैंने अपने कुछ साहित्यिक समझ वाले मित्रों से इसे पढाने की बात सोची. इसका पहला अनुभव बहुत खराब हुआ. कई मित्रों से कहा लेकिन किसी की दिलचस्पी नहीं हुई. मुझे थोडी कोफ्त हुई कि कोई भी अपनी लिखी चीज के अलावा किसी चीज को पढने या चर्चा के लिए तैयार नहीं दिखा. आखिरकार मेरे एक अभिन्न मित्र इसे पढने के लिए राजी हुए. वे व्यस्त रहने वाले थे इसलिए उन्होंने कहा कि रविवार को मैं इसे पढकर तुम्हें बताता हूँ. मंगलवार को मैंने उन्हें फोन किया तो उनका उत्तर था कि यह उपन्यास जीवनानुभव पर आधारित सामान्य सा उपन्यास है जिसमें कुछ दम नहीं है. उनका एक वाक्य कुछ अजीब सा लगा- " अब ऐसी कहानी या ऐसे उपन्यासों में गरीब-गुर्बा लोग ही टँगे रहते हैं. अब भी हिंदी में लोग इसी तरह की चीजें कैसे लिखते रह सकते हैं ?अब इस तरह की कहानी लिखने का कोई मतलब नहीं है." इस बात को तो मैं सह गया, लेकिन इसके बाद जो उन्होंने बताया उससे मुझे बहुत क्रोध आया. उन्होंने बताया कि गलती से उनकी आया ने उन कागजों के एक हिस्से को अखबार के साथ रख दिया और वे फिंक गए. कई बार ढूँढा लेकिन वे मिले नहीं. दस बारह पन्ने इस तरह खो गए. उसने यह भी बताया कि वे कहानी के महत्त्वपूर्ण हिस्से नहीं थे . उसमें कॉलेज के कुछ अनुभव थे जिसमें कुछ भी नया नहीं था. "वही किसी शहरी लडकी को मन ही मन चाहने लगना, उसका मुस्कुराकर बातें करने को दिव्य अनुभव समझना और फिर असलियत में लौटकर देवदास बनना..." मैं विद्वान मित्र से तर्क नहीं कर पाया. वे इन दिनों विरचनवादी दृष्टि से साहित्य और तमाम तरह के टेक्स्ट को देखते थे. वे मॉडर्न टेक्स्ट की खूबियों के भी कायल थे. बात- बात में ज्वॉयस, प्रूस्त और क्लॉड सिमान आदि की चर्चा करते थे और हिन्दी में लिखे जा रहे साहित्य को हेय दृष्टि से देखते थे. मुझे लगा कि इतने विद्वान व्यक्ति को यह पढने के लिए देना उचित नहीं था. मेरी ही गलती थी.
इस दुर्घटना के बाद दो तीन अन्य मित्रों को दबाव देकर कहानी पढवाई. उन जगहों से भी कोई उत्साहवर्द्धक टिप्पणी नहीं मिली. लगभग सबने कहा कि इस तरह के उपन्यास साठ और सत्तर के दशक तक बहुत सारे छप चुके हैं. एक विद्वान मित्र ने टेलीफोन पर टिप्पणी की- " इसमें नागर बोध और ग्राम्य बोध के बीच का गहरा असंतुलन है. जो लोग गाँव को लेकर लिखते हैं उनका शिल्प और गद्य एक तरह का होता है और जो नागर बोध के लेखक हैं उनका दूसरी तरह का. इसमें दोनों का घालमेल है. यह घालमेल भी कुछ कच्चे तरीके का है. इसमें सुधार की जरूरत है."
इस टिप्पणी के बाद मैं बुझ सा गया. मैंने उससे मिलकर इसपर विस्तार से चर्चा की. उन्होंने तर्क किया कि अज्ञेय या निर्मल वर्मा जैसे लेखक गाँव देहात की पृष्टभूमि पर नहीं लिखते या कम लिखते हैं वो इसलिए कि जिस भाव-बोध को लेकर वे चलते हैं उसे गाँव-देहात की पृष्टभूमि में रखने पर रचना का संतुलन बिगड जायेगा. उन्होंने कहा कि अगर इसमें से गाँव वाले प्रसंग को हटा दिया जाए तो यह कामू के आउटसाइडर की तर्ज का मामूली उपन्यास माना जा सकता है. उसने यह भी प्रस्ताव दिया कि गुरूजी वाले प्रसंग को अलग से एक कहानी के रूप में छपवा दिया जा सकता है. उसमें से अचानक आए गुरूजी के मृत्य प्रसंग को हटाकर. एक विदुषी महिला को भी पढवाया. उनकी राय थी कि इसमें राजनीति को लाकर कथा को बोझिल बना दिया गया है. एक आदमी की कहानी और राजनीति को इस तरह मिलाने से पठनीयता प्रभावित होती है. उनका कहना था कि इसमें 'सेक्सुअलिटी' का प्रसंग भी आधे-अधूरे किस्म से आया है. अगर इसपर लिखना था तो और साहस के साथ आना चाहिए था.
मेरी राय इन सबसे अलग इसलिए थी क्योंकि मैंने इसके लेखक को ईमानदारी और निष्ठा के साथ काम करते हुए देखा था. जो व्यक्ति इतनी लगन से अपनी कथा कहने की कोशिश में लगा हो वह ऐसा कैसे लिख सकता है जिसको विद्वान लोग स्वीकार न कर पाते हों यह मुझे समझ में नहीं आता था ? मैंने अंतत: इसे छपवाने का निर्णय लिया. इस पुस्तक को छापने में एक बडी असुविधा यह थी कि इसके कुछ हिस्से "मैं" शैली में थे और कुछ हिस्सों में यह सामान्य कथा शैली में था जिसमें दिलीप की जीवन यात्रा का वृत्तांत था. बहुत सोचने विचारने के बाद मुझे लगा कि "मैं" शैली को हटा दिया जाए. (हालांकि भूमिका लिखते समय यह लग रहा है कि यह शायद युक्तिसंगत नहीं हुआ). एक अन्य तथ्य का उल्लेख इसमें जरूरी है. दिलीप के कॉलेज हॉस्टल जीवन का जो हिस्सा जो किसी कबाडी के यहाँ अखबारों के बीच दबा होगा या अब तक ठोंगा बन गया होगा चूँकि मेरा पढा हुआ था इसलिए उसके बारे में कुछ लिख दूँ. उसमें दिलीप के हायर सेकेंडरी में फेल हो जाने के बाद के कठिन दौर का जिक्र था और कॉलेज जीवने में किसी सहपाठिनी के साथ एकतरफा प्रेम का वर्णन था. पर, कुल मिलाकर वह खंड ऐसा नहीं था कि इसके बिना कथा की अन्विति न बनती हो.
और अंत में, एक अन्य मित्र की बात का उल्लेख करना चाहूँगा जिसे भूलना मेरे लिए बहुत ही मुश्किल है. उन्होंने कहा कि " यह किसी काइयाँ और अतिमहात्त्वाकांक्षी आदमी की पद-प्रतिष्ठा पाने के लोभ में लिखी कहानी है."इस बात को सुनकर मुझे बहुत दु:ख हुआ. जिस आदमी ने इसे लिखा था उसे यह किताब छपी हुई मिलेगी भी नहीं यह भी पता नहीं. पता नहीं किस विश्वास के सहारे वह अपनी कहानी मेरे हवाले कर गया. जाने वाले दिन के दो तीन दिन पहले वह कुछ अजीब अजीब बातें कर रहा था. कुछ बातें मुझे याद हैं, जैसे- " हमारी भाषा खो गयी है... हमारा जीवन बस देह और मन का ही जीवन रह गया है, असली चेतन तो कहीं भीतर रौंदा जा रहा है... जिसे हम भाषा समझते हैं और जिसे हमने ईश्वर का स्थानापन्न बनाने की कोशिश की उसमें चेतना को व्यक्त करना असंभव है... हमें लौटना होगा उस भाषा के पास जहाँ हमारी "जीवात्मा" अभिव्यक्ति पा सके. हम भटक रहे हैं और समझ रहे हैं कि हम कहीं पहुँच चुके हैं या पहुँच रहे हैं... . "
यह बात मुझे उसके व्यक्तित्व से मेल खाती नहीं लगी थी. एक पल को यह लगा कि वह किसी पढी हुई चीज को दुहरा रहा था. पर शायद वह मुझसे कुछ कहना चाह रहा था जिसको व्यक्त करने के लिए उसके पास भाषा नहीं थी. बस उसकी दो आँखें अपलक मेरी ओर देख रही थीं. उन आँखों को मैं अपने इर्द-गिर्द अब भी महसूस कर रहा हूँ जब ये पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं. एक हल्की सी उम्मीद मन में है कि दिलीप की इस कथा को कुछ पाठक मिलेंगे.
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Tuesday, 27 December 2011
Saturday, 22 August 2009
नन्दीग्राम के बाद कोलकाता में बौद्धिक आक्रोश
यह एक मानी हुई बात है कि नन्दीग्राम के भीषण हत्याकाण्ड के बाद कोलकाता के बौद्धिक परिवेश में हलचल शुरू हुई और यहां का हिन्दी जगत भी इससे अछूता नहीं रहा. कुछ तस्वीरें यहां रखी जा रही हैं जो यह बतलाने के लिए हैं कि हम चुप नहीं थे, हमारी आवाज वहां थी.
अनय के कथा संसार पर एक नज़र
अनय, तीसरा विभाजन् (कहानी संग्रह), समन्वय प्रकाशन, गाजियाबाद, 2008 (मू.175 रू.).
हाल के वर्षों में सबाअल्टर्न (वंचितों-उपेक्षितों) और हाशिये के समाजों को समझने के लिये उनके दिन-प्रतिदिन के संघर्षों और आकाक्षा-अभिलाषा को प्रतिबिंबित करते साहित्य को बहुत महत्त्व दिया गया है. गायत्री चक्रवर्ती स्पिवैक ने महाश्वेता देवी के साहित्य को आधार बनाकर इतिहासकारों के समक्ष यह प्रश्न रखा है कि “ क्या सबाआल्टर्न अपने लिये खुद बोल सकते है?” इस क्रम में बंगाल में रहने वाले हिन्दी भाषी समाज या हिन्दुस्तानी समाज के सांस्कृतिक अध्ययन के लिये जिस रचनाकार का साहित्य हमारे लिये सबसे ज्यादा उपयोगी हो सकता है उसमें अनय का नाम लिया जा सकता है. उन्होंने कम कहानियां लिखी हैं और उनकी लेखकीय पहचान उनके व्यंग्यकार रूप से ही अधिक है. पहले रविवार और फिर जनसत्ता के लोकप्रिय व्यंग्यकार के रूप में वे अधिक जाने जाते हैं. कम लोगों को यह पता है कि अनय ने वामपंथ की राजनीति पर रविवार के दिनों में खूब लिखा था और उसके बाद भी जब जब उन्होंने लिखा लोगों ने गंभीरता से उसे लिया. जनसत्ता में छपे बंगाल के हिन्दी भाषी समाज पर उनका लम्बा आलेख आज भी याद किया जाता है. उनकी कहानियां पत्र पत्रिकाओं में पिछले चार दशकों से छपती रही हैं लेकिन अब तक उनका कोई कहानी संग्रह नहीं छपा था. यह संग्रह अनय का पहला संग्रह है लेकिन एक कथाकार के रूप में वे कलकत्ते में परिचित हैं. उनकी कहानियों का पाठ विभिन्न संस्थाओं ने कई कई बार किया है और एक कहानी –‘तीसरा विभाजन’ का पाठ और उसपर चर्चा तो बहुत अधिक हो चुकी है. यह सुखद है कि अनय की कहानियों के एक गल्प-गुच्छ से हिन्दी समाज एक साथ इस पुस्तक से परिचित हो सकेगा. एक कहानीकार के रूप में अनय का मूल्यांकन हो सके इसके लिए इस संग्रह की विशेष जरूरत थी.
अनय के कथा संसार में पात्र साठ के दशक से लेकर नब्बे के दशक के हैं. इस अर्थ में वे आदर्शवादी युग, मानस और भाव-बोध के साहित्यकार हैं. वे वैचारिक रूप से वामपंथी हैं और साठ के दशक से अगले तीस पैंतीस सालों के सामाजिक-भावनात्मक परिवर्तनों की एक प्रगतिशील व्याख्या करते हैं. उनके भाव-बोध का निर्माण जिन तत्त्वों से हुआ है उनमें हिन्दी प्रदेश के संस्कार, ग्राम्य जीवन दर्शन के प्रति मोह, सांस्कृतिक मूल्य-बोध के प्रति असाधारण आस्था आदि तत्त्वों का एक अद्भुत समावेश है जो उनकी कहानियों को हिन्दी समाज के बौद्धिक मानस का एक दस्तावेज बनाता है. ये कहानियां अपने पाठकों से एक दृष्टि की मांग करती हैं. अगर पाठक इन कहानियों को सामान्य ढंग से पढेंगे तो ये ‘सरल’ कहानियां लगेंगी, लेकिन ये कहानियां बहुत जटिल भावबोध को अभिव्यक्त करती हैं. उनके पात्र अपने ‘समय’ से कैसे हारते हैं और कैसे ‘समय’ के दबावों से मुक्त करने वाली संभावनाएं हमारे समय के जटिल यथार्थ को व्यक्त करती हैं –पूर्णत: नहीं, अंशत: यह अनय की तीसरा विभाजन की कहानियों से समझा जा सकता है.
इन कहानियों में पहली और शायद सबसे ‘पूरी’ कहानी है ‘समय सूर्य’ जिसमें एक क्रिश्चियन कालेज में एक मैकाले की संतान अंग्रेज़ी पढाने वाले प्रो सेन के भीतर कालेज के चपरासी के कुत्ता पालने से उत्पन्न क्र्रोध को व्यक्त किया गया है. प्रोफेसर साहब बदलते समय को समझ नहीं पाते और अतीत के दौर में रहे अपने ‘स्टेटस’ को खोते देख चपरासी को पीट देते हैं. समय बदल चुका है. कालेज में हडताल हो जाती है. प्रोफेसर लोग सेन से सहानुभूति रखकर भी कुछ नहीं कर पाते और स्वाभिमानी प्रोफेसर को गरीब चपरासी से माफी मांगनी पडती है. इस कहानी के दो वाक्यों को देखें- प्रिंसिपल द्वारा सेन के बारे में यह कहना “ अतीत में जीने में उन्हें मलबा ही मिलेगा”; और कहानी के अंत में मिस्टर सेन को माफी मांगने के बाद “ मिस्टर सेन को बंसी (चपरासी) का आधार बढता नजर” आना. कहानीकार इन दोनों वाक्यों के साथ खड़ा दिखाई देता है. इस कहानी में व्यक्त भावों को ध्यान से देखने से यह साफ लगता है कि कहानीकार सेन महाशय के ‘एलियेनेशन’ से उत्पन्न आवेग को समझ रहे हैं और समय सूर्य के सामने उनके झुकने की आंतरिक पीडा को समझते हैं.
एक अनुमान किया जा सकता है कि यह कहानी सत्तर के आसपास लिखी गयी होगी. इसके तीस साल (अगर यह अनुमान सही है) बाद की कहानी ‘तीसरा विभाजन’ एक दूसरे तरह की पीडा को व्यक्त करने वाली मार्मिक कहानी है. इस कहानी की प्रशंसा आलोचक ज्योतिष जोशी और प्रफुल्ल कोलख्यान ने भी की है. यह निश्चित रूप से अनय की सर्वश्रेष्ठ कहानी है. इस कहानी को एक निहायत सपाट और भावुक कहानी के रूप में पढे जाने का भी भय है. एक गनी पहलवान है जो देश विभाजन के बाद तीन साल तक उन्नाव जिले में रहकर अंतत: पूर्वी पाकिस्तान जाने का निर्णय लेता है. उसके चेले उसे रोकने की कोशिश करते हैं, लेकिन उसका ईमान कहता है कि उसे मुसलमानों के अलग देश पाकिस्तान बन जाने के बाद यहां से चले जाना चाहिये. वह दो बरस के बेटे को लेकर बंगलादेश चला जाता है. समय उसे बांटने की कोशिश करता है उसे अपने ऊपर हुई ज़्यादतियों के बारे में बतलाने के लिये कहता है. बाद में जब उसका बेटा जुम्मन बड़ा होता है और महसूस करता है कि उसे यहां उसकी पहचान नहीं, वह तो बिहारी है और उसका घर तो वहां उस पार –उन्नाव में है वह यहां आता है. वापसी की इस यात्रा में वह सब कुछ मिट गया है जिसके सहारे वह अपने को पा सके. हिन्दू मुसलमान के बीच विभाजन इतना पक्का हो गया है कि अब लोग हिन्दू होकर गर्व करने लगे हैं और सिर्फ बूढों को याद है कि इस इलाके में कभी गनी चालीसा भी होता था. लोग उसे पाकिस्तानी समझ कर पुलिस स्टेशन ले जाते हैं और जुम्मन देखता है कि पुलिस स्टेशन उसके पुरखों के कब्रिस्तान के बिल्कुल पास में है. जुम्मन दु:ख के इन क्षणों में हंसा- “दादा की कब्र पुलिस की हिफाजत में है.”
कहानी इस बिन्दु पर आकर उस ओर बढती है जिससे इस कहानी का एक नया अर्थ उभरता है. एक बुढिया की आवाज आती है- “ दारोगा जी वह गनी पहलवान का लड़का है. मैंने गनी पहलवान को जाते समय वापस आने के लिये कहा था. गनी ने अपने लडके को भेजा है. वह अपने घर आया है.” इस समय कहानीकार ने लिखा है- “ जुम्मन का सारा डर दूर हो गया. न जाने कितने युगों से यह वह आवाज़ सुनने के लिए ज़िंदा था. वह अपने घर आया है.”
यह कहानी विखंडन की तकनीक की मांग करती है. पहचान और जुडाव मनुष्य के लिए कितना ज़रूरी है जिसे धर्म की चौहद्दी में समेटा नहीं जा सकता. यह उन्नाव के उस जिले की बात है जहां एक पंडित चेले को लगता है कि 1950 के बाद, गनी पहलवान के जाने के बाद “ छंगा पंडित के जीवन में कुछ नहीं हुआ”. उस चंदनधारी पंडित ने गनी पहलवान के बाद लंगोट नहीं पहना. उसने अपना लंगोट पेड़ पर टाँग दिया जो बरसों गनी उस्ताद की याद में रोता रहा. वह लंगोट उस सेक्युलर सांस्कृतिक देश का परचम हो सकता है जिसमें हिन्दू पट्ठे मुसलमान उस्ताद के बिना बदनपुर में जाना तक गवारा नहीं करते. बदनपुर के बदन की लंगोट तो गनी पहलवान थे! यह एक क्लैसिक कहानी है. जिसकी प्रत्येक पंक्ति को अलग अलग पढ़ कर भी कहानी के मर्म तक पहुंचा जा सकता है. किसी दार्शनिक ने कहा है कि मनुष्य के भीतर एक हार्ड डिस्क होता है जिसे कभी भी नष्ट नहीं किया जा सकता है. मनुष्य चाहे कितना भी गिर जाये, झेल जाये, बदल जाये यह “ अनकरेप्टेबुल” रहता है. यह हार्ड डिस्क ही है जो देश के साथ जोड नहीं बना पाता, अपनी बेटी को बँगला पढाते देख दुःखी होता है. जुम्मन की स्मृति में ही उसका सांस्कृतिक लोकेशन है. उस स्मृति के भीतर का कोना कोना झंकृत हो उठता है उस आवाज से जो बुढिया की आवाज है. इस आवाज को सुनकर जुम्मन का सारा डर दूर हो जाता है. उस आवाज को शायद थाने के बाहर कब्रों में दबे जुम्मन के पुरखों ने भी सुना होगा तभी तो कहानीकार ने लिखा है- “ न जाने कितने युगों से वह यह आवाज सुनने के लिए जिंदा था.”
ऐसी कहानियां बरसों में कभी लिखी जाती हैं.
इन दोनों कहानियों को एक साथ पढते हुए साफ लगता है कि कहानीकार ने एक लम्बी सांस्कृतिक यात्रा तय की है.
संग्रह की कुछ अन्य कहानियां अलग धरातलों पर हैं. अनय जी ने बहुत नज़दीक से अपने समाज के विस्थापित लोगों की व्यथा को देखा है और उसकी राजनीति की असलियत को समझा है. ‘अनादि दास का क्या हुआ?’ कहानी तो मानो सत्यकथा का बयान हो. पर यह सत्यकथा से भी ज़्यादा है. शिल्प की दृष्टि से यह बहुत कसी हुई कहानी है और भाषा भी बहुत सटीक है. किसी समय का क्रांतिकारी जिन्हें देखकर पुलिसवाले भाग खडे होते थे और धनीमानी लोग मूत देते थे जब पुलिस की मार से नामर्द बनकर और क्रांति प्रयास के विफल होने के बाद विपत्ति में पडकर अपने परिवार के भरण पोषण के लिये कुछ हाथ पैर मारते हैं और अपने साथी से मिलते हैं तो पाते हैं कि वे बदल गये हैं. एक मित्र जो “ बीवी की पहरेदारी में रहने लगा है” के चेहरे पर आंखें गडा कर अनादि ने अनुभव किया- “ यह आदमी जरूर शनिवार को दो-तीन पैग दारू पीता होगा. मंगलवार को किसी धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होता होगा. दस लाख का ऋण लेकर , यह कारबार की दुनिया में पैठ गया है, इसे करोड की चिंता है.” अनादि और काली के रूप में दो क्रांतिकारी इस कथा में उभरते है. एक अनादि है जो वामफ्रंट के युग में जानपहचान का फायदा लेना मुनासिब समझता है लेकिन अनादि इसके लिये तैयार नहीं हो पाता. बंगाल में वामफ्रंट के युग में उन वामपंथियों को तो लाभ लेने का हक है ही जिन्होंने पहले बहुत कष्ट उठाया है यह बात गलत है या सही यह प्रश्न यह कहानी छोड जाती है. कुछ अन्य कहानियां- ‘कालबैसाखी’, ‘ओ बुढिया भाग’ और ‘अंधी सुरंग’ भी अनय के कथा संसार को विस्तृत आयाम देती हैं. ‘अंधी सुरंग’ का एक मुसलमान प्रोफेसर भाडे के मकान के लिए जिस तरह कलकत्ते में भटकता है वह हमारे प्रगतिशील समाज के भीतर पलने वाले दुराग्रहों को बडी बारीकी से पकडता है. यह बहुत प्रसन्नता की बात है कि अनय जी ने हमें आखिरकार एक कथा संग्रह दिया है. जिन बातों को वे हमारे सामने रखते हैं उसेके पूरे परिदृश्य को सामने रखने के लिये एक उपन्यास की अपेक्षा तो कम से कम की ही जा सकती है. वामपंथी ट्रेड यूनियन, बस्ती पालिटिक्स, बंगलादेशी लोगों की कथा व्यथा और असंगठित श्रमिकों की करूण अवस्था आदि विषयों पर लिखते हुए अनय जी जिस गहरी समझदारी और साहित्यिक विवेक का परिचय इन कहानियों में देते हैं उसे देखते हुए एक क्या अनेक उपन्यासों की उम्मीद हिन्दी पाठक समाज कर सकता है.
[वागर्थ, मार्च 2009]
हाल के वर्षों में सबाअल्टर्न (वंचितों-उपेक्षितों) और हाशिये के समाजों को समझने के लिये उनके दिन-प्रतिदिन के संघर्षों और आकाक्षा-अभिलाषा को प्रतिबिंबित करते साहित्य को बहुत महत्त्व दिया गया है. गायत्री चक्रवर्ती स्पिवैक ने महाश्वेता देवी के साहित्य को आधार बनाकर इतिहासकारों के समक्ष यह प्रश्न रखा है कि “ क्या सबाआल्टर्न अपने लिये खुद बोल सकते है?” इस क्रम में बंगाल में रहने वाले हिन्दी भाषी समाज या हिन्दुस्तानी समाज के सांस्कृतिक अध्ययन के लिये जिस रचनाकार का साहित्य हमारे लिये सबसे ज्यादा उपयोगी हो सकता है उसमें अनय का नाम लिया जा सकता है. उन्होंने कम कहानियां लिखी हैं और उनकी लेखकीय पहचान उनके व्यंग्यकार रूप से ही अधिक है. पहले रविवार और फिर जनसत्ता के लोकप्रिय व्यंग्यकार के रूप में वे अधिक जाने जाते हैं. कम लोगों को यह पता है कि अनय ने वामपंथ की राजनीति पर रविवार के दिनों में खूब लिखा था और उसके बाद भी जब जब उन्होंने लिखा लोगों ने गंभीरता से उसे लिया. जनसत्ता में छपे बंगाल के हिन्दी भाषी समाज पर उनका लम्बा आलेख आज भी याद किया जाता है. उनकी कहानियां पत्र पत्रिकाओं में पिछले चार दशकों से छपती रही हैं लेकिन अब तक उनका कोई कहानी संग्रह नहीं छपा था. यह संग्रह अनय का पहला संग्रह है लेकिन एक कथाकार के रूप में वे कलकत्ते में परिचित हैं. उनकी कहानियों का पाठ विभिन्न संस्थाओं ने कई कई बार किया है और एक कहानी –‘तीसरा विभाजन’ का पाठ और उसपर चर्चा तो बहुत अधिक हो चुकी है. यह सुखद है कि अनय की कहानियों के एक गल्प-गुच्छ से हिन्दी समाज एक साथ इस पुस्तक से परिचित हो सकेगा. एक कहानीकार के रूप में अनय का मूल्यांकन हो सके इसके लिए इस संग्रह की विशेष जरूरत थी.
अनय के कथा संसार में पात्र साठ के दशक से लेकर नब्बे के दशक के हैं. इस अर्थ में वे आदर्शवादी युग, मानस और भाव-बोध के साहित्यकार हैं. वे वैचारिक रूप से वामपंथी हैं और साठ के दशक से अगले तीस पैंतीस सालों के सामाजिक-भावनात्मक परिवर्तनों की एक प्रगतिशील व्याख्या करते हैं. उनके भाव-बोध का निर्माण जिन तत्त्वों से हुआ है उनमें हिन्दी प्रदेश के संस्कार, ग्राम्य जीवन दर्शन के प्रति मोह, सांस्कृतिक मूल्य-बोध के प्रति असाधारण आस्था आदि तत्त्वों का एक अद्भुत समावेश है जो उनकी कहानियों को हिन्दी समाज के बौद्धिक मानस का एक दस्तावेज बनाता है. ये कहानियां अपने पाठकों से एक दृष्टि की मांग करती हैं. अगर पाठक इन कहानियों को सामान्य ढंग से पढेंगे तो ये ‘सरल’ कहानियां लगेंगी, लेकिन ये कहानियां बहुत जटिल भावबोध को अभिव्यक्त करती हैं. उनके पात्र अपने ‘समय’ से कैसे हारते हैं और कैसे ‘समय’ के दबावों से मुक्त करने वाली संभावनाएं हमारे समय के जटिल यथार्थ को व्यक्त करती हैं –पूर्णत: नहीं, अंशत: यह अनय की तीसरा विभाजन की कहानियों से समझा जा सकता है.
इन कहानियों में पहली और शायद सबसे ‘पूरी’ कहानी है ‘समय सूर्य’ जिसमें एक क्रिश्चियन कालेज में एक मैकाले की संतान अंग्रेज़ी पढाने वाले प्रो सेन के भीतर कालेज के चपरासी के कुत्ता पालने से उत्पन्न क्र्रोध को व्यक्त किया गया है. प्रोफेसर साहब बदलते समय को समझ नहीं पाते और अतीत के दौर में रहे अपने ‘स्टेटस’ को खोते देख चपरासी को पीट देते हैं. समय बदल चुका है. कालेज में हडताल हो जाती है. प्रोफेसर लोग सेन से सहानुभूति रखकर भी कुछ नहीं कर पाते और स्वाभिमानी प्रोफेसर को गरीब चपरासी से माफी मांगनी पडती है. इस कहानी के दो वाक्यों को देखें- प्रिंसिपल द्वारा सेन के बारे में यह कहना “ अतीत में जीने में उन्हें मलबा ही मिलेगा”; और कहानी के अंत में मिस्टर सेन को माफी मांगने के बाद “ मिस्टर सेन को बंसी (चपरासी) का आधार बढता नजर” आना. कहानीकार इन दोनों वाक्यों के साथ खड़ा दिखाई देता है. इस कहानी में व्यक्त भावों को ध्यान से देखने से यह साफ लगता है कि कहानीकार सेन महाशय के ‘एलियेनेशन’ से उत्पन्न आवेग को समझ रहे हैं और समय सूर्य के सामने उनके झुकने की आंतरिक पीडा को समझते हैं.
एक अनुमान किया जा सकता है कि यह कहानी सत्तर के आसपास लिखी गयी होगी. इसके तीस साल (अगर यह अनुमान सही है) बाद की कहानी ‘तीसरा विभाजन’ एक दूसरे तरह की पीडा को व्यक्त करने वाली मार्मिक कहानी है. इस कहानी की प्रशंसा आलोचक ज्योतिष जोशी और प्रफुल्ल कोलख्यान ने भी की है. यह निश्चित रूप से अनय की सर्वश्रेष्ठ कहानी है. इस कहानी को एक निहायत सपाट और भावुक कहानी के रूप में पढे जाने का भी भय है. एक गनी पहलवान है जो देश विभाजन के बाद तीन साल तक उन्नाव जिले में रहकर अंतत: पूर्वी पाकिस्तान जाने का निर्णय लेता है. उसके चेले उसे रोकने की कोशिश करते हैं, लेकिन उसका ईमान कहता है कि उसे मुसलमानों के अलग देश पाकिस्तान बन जाने के बाद यहां से चले जाना चाहिये. वह दो बरस के बेटे को लेकर बंगलादेश चला जाता है. समय उसे बांटने की कोशिश करता है उसे अपने ऊपर हुई ज़्यादतियों के बारे में बतलाने के लिये कहता है. बाद में जब उसका बेटा जुम्मन बड़ा होता है और महसूस करता है कि उसे यहां उसकी पहचान नहीं, वह तो बिहारी है और उसका घर तो वहां उस पार –उन्नाव में है वह यहां आता है. वापसी की इस यात्रा में वह सब कुछ मिट गया है जिसके सहारे वह अपने को पा सके. हिन्दू मुसलमान के बीच विभाजन इतना पक्का हो गया है कि अब लोग हिन्दू होकर गर्व करने लगे हैं और सिर्फ बूढों को याद है कि इस इलाके में कभी गनी चालीसा भी होता था. लोग उसे पाकिस्तानी समझ कर पुलिस स्टेशन ले जाते हैं और जुम्मन देखता है कि पुलिस स्टेशन उसके पुरखों के कब्रिस्तान के बिल्कुल पास में है. जुम्मन दु:ख के इन क्षणों में हंसा- “दादा की कब्र पुलिस की हिफाजत में है.”
कहानी इस बिन्दु पर आकर उस ओर बढती है जिससे इस कहानी का एक नया अर्थ उभरता है. एक बुढिया की आवाज आती है- “ दारोगा जी वह गनी पहलवान का लड़का है. मैंने गनी पहलवान को जाते समय वापस आने के लिये कहा था. गनी ने अपने लडके को भेजा है. वह अपने घर आया है.” इस समय कहानीकार ने लिखा है- “ जुम्मन का सारा डर दूर हो गया. न जाने कितने युगों से यह वह आवाज़ सुनने के लिए ज़िंदा था. वह अपने घर आया है.”
यह कहानी विखंडन की तकनीक की मांग करती है. पहचान और जुडाव मनुष्य के लिए कितना ज़रूरी है जिसे धर्म की चौहद्दी में समेटा नहीं जा सकता. यह उन्नाव के उस जिले की बात है जहां एक पंडित चेले को लगता है कि 1950 के बाद, गनी पहलवान के जाने के बाद “ छंगा पंडित के जीवन में कुछ नहीं हुआ”. उस चंदनधारी पंडित ने गनी पहलवान के बाद लंगोट नहीं पहना. उसने अपना लंगोट पेड़ पर टाँग दिया जो बरसों गनी उस्ताद की याद में रोता रहा. वह लंगोट उस सेक्युलर सांस्कृतिक देश का परचम हो सकता है जिसमें हिन्दू पट्ठे मुसलमान उस्ताद के बिना बदनपुर में जाना तक गवारा नहीं करते. बदनपुर के बदन की लंगोट तो गनी पहलवान थे! यह एक क्लैसिक कहानी है. जिसकी प्रत्येक पंक्ति को अलग अलग पढ़ कर भी कहानी के मर्म तक पहुंचा जा सकता है. किसी दार्शनिक ने कहा है कि मनुष्य के भीतर एक हार्ड डिस्क होता है जिसे कभी भी नष्ट नहीं किया जा सकता है. मनुष्य चाहे कितना भी गिर जाये, झेल जाये, बदल जाये यह “ अनकरेप्टेबुल” रहता है. यह हार्ड डिस्क ही है जो देश के साथ जोड नहीं बना पाता, अपनी बेटी को बँगला पढाते देख दुःखी होता है. जुम्मन की स्मृति में ही उसका सांस्कृतिक लोकेशन है. उस स्मृति के भीतर का कोना कोना झंकृत हो उठता है उस आवाज से जो बुढिया की आवाज है. इस आवाज को सुनकर जुम्मन का सारा डर दूर हो जाता है. उस आवाज को शायद थाने के बाहर कब्रों में दबे जुम्मन के पुरखों ने भी सुना होगा तभी तो कहानीकार ने लिखा है- “ न जाने कितने युगों से वह यह आवाज सुनने के लिए जिंदा था.”
ऐसी कहानियां बरसों में कभी लिखी जाती हैं.
इन दोनों कहानियों को एक साथ पढते हुए साफ लगता है कि कहानीकार ने एक लम्बी सांस्कृतिक यात्रा तय की है.
संग्रह की कुछ अन्य कहानियां अलग धरातलों पर हैं. अनय जी ने बहुत नज़दीक से अपने समाज के विस्थापित लोगों की व्यथा को देखा है और उसकी राजनीति की असलियत को समझा है. ‘अनादि दास का क्या हुआ?’ कहानी तो मानो सत्यकथा का बयान हो. पर यह सत्यकथा से भी ज़्यादा है. शिल्प की दृष्टि से यह बहुत कसी हुई कहानी है और भाषा भी बहुत सटीक है. किसी समय का क्रांतिकारी जिन्हें देखकर पुलिसवाले भाग खडे होते थे और धनीमानी लोग मूत देते थे जब पुलिस की मार से नामर्द बनकर और क्रांति प्रयास के विफल होने के बाद विपत्ति में पडकर अपने परिवार के भरण पोषण के लिये कुछ हाथ पैर मारते हैं और अपने साथी से मिलते हैं तो पाते हैं कि वे बदल गये हैं. एक मित्र जो “ बीवी की पहरेदारी में रहने लगा है” के चेहरे पर आंखें गडा कर अनादि ने अनुभव किया- “ यह आदमी जरूर शनिवार को दो-तीन पैग दारू पीता होगा. मंगलवार को किसी धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होता होगा. दस लाख का ऋण लेकर , यह कारबार की दुनिया में पैठ गया है, इसे करोड की चिंता है.” अनादि और काली के रूप में दो क्रांतिकारी इस कथा में उभरते है. एक अनादि है जो वामफ्रंट के युग में जानपहचान का फायदा लेना मुनासिब समझता है लेकिन अनादि इसके लिये तैयार नहीं हो पाता. बंगाल में वामफ्रंट के युग में उन वामपंथियों को तो लाभ लेने का हक है ही जिन्होंने पहले बहुत कष्ट उठाया है यह बात गलत है या सही यह प्रश्न यह कहानी छोड जाती है. कुछ अन्य कहानियां- ‘कालबैसाखी’, ‘ओ बुढिया भाग’ और ‘अंधी सुरंग’ भी अनय के कथा संसार को विस्तृत आयाम देती हैं. ‘अंधी सुरंग’ का एक मुसलमान प्रोफेसर भाडे के मकान के लिए जिस तरह कलकत्ते में भटकता है वह हमारे प्रगतिशील समाज के भीतर पलने वाले दुराग्रहों को बडी बारीकी से पकडता है. यह बहुत प्रसन्नता की बात है कि अनय जी ने हमें आखिरकार एक कथा संग्रह दिया है. जिन बातों को वे हमारे सामने रखते हैं उसेके पूरे परिदृश्य को सामने रखने के लिये एक उपन्यास की अपेक्षा तो कम से कम की ही जा सकती है. वामपंथी ट्रेड यूनियन, बस्ती पालिटिक्स, बंगलादेशी लोगों की कथा व्यथा और असंगठित श्रमिकों की करूण अवस्था आदि विषयों पर लिखते हुए अनय जी जिस गहरी समझदारी और साहित्यिक विवेक का परिचय इन कहानियों में देते हैं उसे देखते हुए एक क्या अनेक उपन्यासों की उम्मीद हिन्दी पाठक समाज कर सकता है.
[वागर्थ, मार्च 2009]
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