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Sunday, 24 January 2010

हिन्दी उपन्यास और स्त्री प्रश्न 2

वेश्याओं के धिक्कार सुहागिनों के महिमामंडन दोनों को एक दूसरे के सामने खड़ा कर पितृसत्तात्मक शोषक विचारधारा ने स्त्री को एक और स्तर पर विभाजित कर दिया। दोनों स्त्रियाँ समाज के वर्चस्ववादी शोषण का शिकार हैं किन्तु अपने वास्तविक शत्रु को भूल एक दूसरे के विरुद्ध खड़ी हैं। इस विचारधारा ने सती बनाम वेश्या का प्रपंच खड़ा किया। सती को वेश्या का ''घृणित'' चेहरा दिखा-दिखाकर बार-बार उसके महात्म्य के प्रति आश्र्वस्त किया - सुमन वेश्या भाली बाई को अपने धर्माचरण से हराना चाहती है, वह उस अभाव से उबर कर सात्विकता के उच्च आसन पर बैठना चाहती है किन्तु भोली को मंदिर में गाते देख उसे आघात लगता है - ''भोली के सामने केवल धन ही सिर नहीं झुकाता, धर्म भी उसका कृपाकांक्षी है। धर्मात्मा लोग भी उसका आदर करते हैं। वही वेश्या जिसे मैं अपने धर्म-पाखण्ड से परास्त करना चाहती हूँ - यहाँ महात्माओं की सभा में
ठाकुर जी के पवित्र निवास स्थान में आदर और सम्मान का पात्र बनी हुई है और मेरे लिये कहीं खड़ने होने की जगह नहीं।''३ सचेतन सुमन घर जाकर धर्म के उपादानों की गठरी बाँधकर रख देती है। सती और वेश्या की इस मुठभेड़ के पश्चात्‌ प्रेमचंद समस्या समाधान की ओर व्यवस्थित उन्मुख होते हैं। इनमें पहला पड़ाव है - उन्हें शहर से बाहर बसाना। इन्हें शहरवासियों से दूर रखने के सम्बन्ध में प्रेमचंद तर्क देते हैं - ''हमने वेश्याओं को शहर से बाहर रखने का प्रस्ताव इसलिये नहीं किया कि हमें उनसे घृणा है। हमें उनसे घृणा करने का कोई अधिकार नहीं है। यह उनके साथ घोर अन्याय होगा। यह हमारी ही कुवासनाएँ, हमारे ही सामाजिक अत्याचार, हमारी ही कुप्रथाएँ हैं जिन्होंने वेश्याओं का रूप धारण किया। यह दालमंडी हमारे ही जीवन का कलुषित प्रतिबिंब, हमारे पैशाचिक अधर्म का साक्षातद्व स्वरुप है। हम किस मुँह से उनसे घृणा करें। उनकी अवस्था बहुत शोचनीय है। हमारा कर्त्तव्य है कि हम उन्हें सुमार्ग पर लायें, उनके जीवन को सुधारें और यह तभी हो सकता है, जब वे शहर से बाहर दुर्व्यसनों से दूर रहें। हमारे सामाजिक दुराचार अग्नि के समान हैं और अभागिन रमणियाँ तृण के समान। अगर अग्नि को शांत करना चाहते हैं तो तृण को उससे दूर कर दीजिये; तब अग्नि आप-ही-आप शांत हो जायेगी।''४ पदमसिंह इसकके साथ म्युनिसिपट बोर्ड में प्रस्ताव भी रखते हैं कि वेश्याओं को मुख्य शहर से बाहर बसाने के साथ, शहर के मुख्य सैर के स्थानों और पार्कों में उनका आना निषिद्ध किया जाये, उनके नृत्य पर भारी टैक्स लगाए जायें आदि आदि।
प्रेमचंद 'वेश्यावृत्ति' को किसी ''विशेष दुर्गुण'' की कोटि में न रख अन्य दुर्वृत्तियों जैसा ही पतित बताते हैं - ''हमें वेश्याओं को पतित समझने का कोई अधिकार नहीं है, यह हमारी परम धृष्टता है। हम रात-दिन जो रिश्र्वतें लेते हैं, सूद खाते हैं, दीनों का रक्त चूसते हैं, असहायों का गला काटते हैं, कदापि इस योग्य नहीं हैं कि समाज के किसी अंग को नीच या तुच्छ समझें। ... जिस समाज में अत्याचारी जमींदार, रिश्र्वती राज्य-कर्मचारी, अन्यायी महाजन, स्वार्थी बंधु आदर और सम्मान के पात्र हों वहाँ दालमंडी क्यों न आबाद हो?''५
इस प्रकार कुँवर अनिरुद्ध सिंह इन मीनाबाजारों को 'हराम के धन का परिणाम' बताते हुए वेश्याओं को शहर के बाहर बसाने का विरोध किया।
प्रेमचंद सेवासदन में कुछ विसंगतियों जैसे, 'तृण को अग्नि से बचाने के लिये शहरबदर कर देना पर अग्नि शहर से बाहर न जाये इसकी कोई पक्की व्यवस्था न होना, वेश्याओं के पुनर्वास और आजीविका का प्रबन्ध न होना को अनुत्तरित छोड़ वेश्याओं की कन्याओं के लिये 'सेवासदन' बनाते हैं। सुमन से सुमनबाई और अब सुधर का इस सेवासदन की संचालिका सुमन इन कन्याओं के भविष्य के बारे में अनिश्चित है - उनके विवाह के प्रश्न पर सुमन कहती है - ''यह तो टेढ़ी खीर है। हमारा कर्त्तव्य यह है कि इन कन्याओं को चतुर गृहिणी बनने के योग्य बना दें। उनका आदर समाज करेगा या नहीं, मैं नहीं कह सकती।''६
स्त्री प्रश्न 'हिन्दू स्त्री' और 'मुस्लिम स्त्री' के प्रश्नों में बँट चुका था। स्त्री उद्धार साथ पुनरुत्थानवादी, राष्ट्रवादी और उदारवादी सभी चेहरे जुड़ रहे थे। राष्ट्रवादियों के सामने राष्ट्र निर्माण का प्रश्न था तो पुनरुत्थानवादी इसे धर्म और जाति से जोड़कर देख रहे थे। वेश्या प्रश्न इससे कैसे अछूता रहता! सेवासदन का विठ्ठलदास, जिसके कान भरने पर सुमन का पति उसे घर से निकाल
देता है, सुमन के पतन को हिन्दू धर्म का पतन मानता है। हिन्दू धर्म में भी यदि ब्राह्मण जाति की स्त्री वेश्या बन जाये तो हिन्दुओं को पतन के गर्त्त से बचाना असंभव है। विठ्ठलदास द्वारा धिक्कारे जाने पर सुमन बा.जार में अनेकों ब्राह्मणियों और मुजरा सुनने वाले हिन्दू सज्जनों का हवाला देती है। प्रत्युत्तर में विठ्ठल दास हिन्दू नारी की महिमा समझाते हुए ब्राह्मणियों को ''नीच जाति'' की कुलटाओं का अंतर समझने के लिये कहता है - ''सुमन तुम सच कहती हो, बेशक हिन्दू जाति अधोगति को पहुँच गयी और अब तक वह कभी की नष्ट हो गई होती, पर हिन्दू स्त्रियों ही ने अभी तक उसकी मर्यादा की रक्षा की है। उन्हीं के सत्य और सुकीर्ति ने उसे बचाया है। केवल हिन्दुओं की लाज रखने के लिये लाखों स्त्रियाँ आग में भस्म हो गई हैं। यही वह विलक्षण भूमि है जहाँ स्त्रियाँ नाना प्रकार के कष्ट भोगकर, अपमान और निरादर सहकर पुरुषों की उनमानुषीय क्रूरताओं को चित्त में न लाकर हिन्दू जाति का मुख उज्ज्वल करती थीं। यह साधारण स्त्रियों का गुण था और ब्राह्मणियों का तो पूछना ही क्या? . . . सोचो तो कितने खेद की बात है कि जिस अवस्था में तुम्हारी लाखों बहनें हँसी-खुशी जीवन व्यतीत कर रही हैं, वही अवस्था तुम्हें इतनी असह्य हुई कि तुमने लोक-लाज, कुल मर्यादा को लात मारकर कुपथ ग्रहण किया। . . . सुमन तुम्हारे इस कर्म ने ब्राह्मण जाति ही का नहीं, समस्त हिन्दू जाति का मस्तक नीचा कर दिया।''७
माथा नीचा किये सजल नेत्रों से लज्जित सुमन सुधरने को तैयार हो जाती है।
अंग्रे.जों ने वेश्यावृतित नियमन क़ानून के विरोध की प्रतिक्रिया में इस देश में होने वाले हर प्रकार के सार्वजनिक नृत्यों पर रोक लगा दी थी। राष्ट्रवादियों ने इसके सुधारात्मक पक्ष को ग्रहण किया। प्रेमचंद के कई उपन्यासों में इस प्रवृत्ति के प्रमाण मिलते हैं।
इसी तरह अंग्रेज सिपाहियों द्वारा हिन्दू स्त्रियों के बलात्कार को स्त्री के विरुद्ध हिंसा के बजाय साम्राज्यवादी पशुता से जोड़ दिया गया। प्रेमचंद के उपन्यास 'कर्मभूमि' का विशद मुन्नी प्रसंग इस तथ्य की पुष्टि करता है।
भारतीय राजनीति में गाँधी जी के आने के बाद राष्ट्रीय आंदोलन में स्त्रियों की सहभागिता बड़ी तेजी से बढ़ी। ये सभी वर्गों की स्त्रियाँ थीं। अपने दक्षिण अफ्रीका के आंदोलन से ही गाँधी जी स्त्रियों की सहन शक्ति से अत्यन्त प्रभावित थे। कस्तूरबा को उन्होंने असहयोग आंदोलन की कला में अपना गुरु माना था। स्त्रियों की प्रशस्ति में गाँधी जी ने कहा - ''मैंने इन कॉलमों में सुझाव दिया है कि स्त्री अहिंसा का अवतार है। अहिंसा का अर्थ है अपरिमित प्यार जिसका दूसरा अर्थ है पीड़ा सहने की असीम क्षमता। स्त्री, पुरुष की माँ के अलावा इतना बड़ा कष्ट सहने की क्षमता भला और किसी में दिखाई पड़ती है।''८
स्त्रियों की प्रशंसा में ऐसे कसीदे पहले भी लोगों ने काढ़े थे, खूब बढ़-चढ़ कर काढ़े थे। गाँधी जी की प्रशंसा भिन्न थी। स्त्री की घर में विशेष भूमिका की बात कहते हुए भी उन्होंने स्त्री
को सार्वजनिक जीवन में उतारा। यद्यपि उन्होंने महिलाओं के कार्य सीमित ही रखे किन्तु सार्वजनिक क्षेत्र में उतरी लज्जावंती, बेगम शाहनवा.ज और सरोजिनी नायडू आदि ने आरक्षण, विनियुक्ति आदि प्रस्तावों को ठुकरा कर भारतीय स्त्रियों को समान राजनैतिक दर्जा देने की माँग की। गाँधी जी को इस बात की खूब समझ थी कि स्त्रियों को खादी पहनाए बिना न स्वदेशी का मंत्र चल सकता है और विदेशी वस्त्रों की होली जल सकती है।
१९१९ के रॉलट एक्ट कानून और जालियाँवाला बाग ने राष्ट्रीय आंदोलन में तेजी ला दी। गाँधी जी के आह्वान पर १९२० के दशक में बड़ी संख्या में महिलाएँ बाहर आईं। उनकी भूमिका विदेशी वस्त्र बहिष्कार, विदेशी दवा और शराब की दुकानों पर धरना और पिकेटिंग आदि तक सीमित थी। १९३० के दशक में गाँधी ने उन्हें नमक आंदोलन से जोड़ा। नागरिक अवज्ञा आंदोलन में उनकी भूमिका की प्रशंसा करते हुए गाँधी जी ने कहा - ''भारतीय स्त्रियों ने पर्दा फाड़कर फेंक दिया और राष्ट्र के काम के लिये बाहर आ गईं। उन्होंने महसूस किया कि देश उनकी घरेलू देखभाल की जिम्मेदारी के अलावा कुछ और अधिक करने की माँग कर रहा था . . .।''९
गाँधी जी की आदर्श कार्यकर्ता 'स्वैच्छिक विधवा' थी और उनके लिये 'सती' वह नारी थी जो अपने त्याग, बलिदान स्नेह से परिवार और देश का भाग्य बदल दे।
सार्वजनिक क्षेत्र में स्त्रियों की सहभागिता बढ़ने पर उनके मातृ रूप के साथ उनके 'पत्नी' रूप की भी चर्चा बढ़ी। प्रेमचंद कालीन पूरा साहित्य पत्नी के संगिनी रूप को रेखांकित करता है। प्रेमचंद का अपना साहित्य पत्नी की सहभागिता का विराट दस्तावे.ज है। धनिया, सुखदा, जालपा और विद्या सभी पत्नियाँ अपने पति के जीवन संग्राम और उत्थान में सहायक हैं, आधुनिक स्त्री माँ से पत्नी बनने की अपनी यात्राओं में (उल्टी यात्रा में) अपने मानवी होने का अर्थ तलाशने लगी। मध्यवर्गीय स्त्री के प्रश्नों की धारा की एक दिशा को जैनेन्द्र गाँधी वादी स्पर्श सहित सम्बोधित कर रहे थे।
सन्‌ १९३० के अंत में भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में साम्यवादियों का पदार्पण हुआ। इस साम्यवादियों और क्रान्तिकारियों के यहाँ भी औरत का प्रवेश निषेध था। उसके निर्णय की स्वतंत्रता व अधिकार कमोवेश यहाँ भी पुरातनपंथियों की ही तर्ज पर थे। स्त्री विवाह कर स्वतंत्र हो सकती थी। तब स्वतंत्र नारी कौन है? बौद्ध भिक्षु व्याख्यायित कर चुके थे - वेश्या! यशपाल ने इस विषय पर अपना प्रसिद्ध उपन्यास दिव्या (१९४५ ई.) लिखा। प्रेमचंद के 'सेवासदन' की सुमन की तरह दिव्या भी द्विजकन्या है। यशपाल ने जाति व्यवस्था और धार्मिक नियमों साथ ही सामन्ती शासन में पिसती स्त्री व्यथा का अत्यन्त सटीक और मार्मिक चित्रण किया। उन्होंने बौद्धों द्वारा वेश्या को स्वतंत्र घोषित करने (इसी आधार पर गौतम बुद्ध ने वेश्या को दीक्षा दी थी।) की विसंगतियों को भी उद्घाटित किया। यशपाल की दिव्या से छूट गए प्रश्नों को अमृतलाल नागर ने 'सुहाग के नूपुर' में सम्बोधित किया।
नारी देह के प्रति पुरुष की तीव्र और उच्छृंखल कामना ने वेश्यावृत्ति जैसी जिस हृदयहीन व्यवस्था को जन्म दिया; जिस नारीत्व के कारण स्त्री वेश्या बनी उस वेश्या के नारीत्व के पददलित और उत्पीड़ित होने की मार्मिक कथा 'सुहाग के नूपुर' का उल्लेख किये बिना अधूरी रह जायेगी।
उपन्यास के दो नारी पात्र - सती कन्नगी और वेश्या माधवी। क्या अंतर है दोनों में! माधवी की दासी प्रश्न करती है, 'छोटी स्वामिनी ने भी एकपुरुषव्रत साधा है। फूल-हाट में कुलवधुओं के समान संस्सकारों वाली अनेक महिलाएँ हैं। भला उनमें और कुलवधुओं में क्या अंतर है?''१० इस प्रश्न में वेश्या नारी के अन्तर्मन की पीड़ा ही नहीं पुरुष द्वारा स्त्री में एकपुरुषगामिनी ही बने रहने की भावना का खूँटा भी गाड़ देना है। स्त्री समाज का विभाजन अपने भोग की सुविधानुसार, उसकी सुविधा को इस विभाजन से और बल वृद्धि मिलती है। नारी समाज आपस में उस ''मर्यादा, सतीत्व
और उच्च पदों के लिये आपसी प्रतिद्वन्द्विता में उलझ पुरुष समाज के षडयंत्र से अनभिज्ञ ईर्ष्या की उस भस्मकारी अग्नि की आहुति बनता है जो भीतर-बाहर दोनों से जलाती है। पुरुष ने ''सती'' को मिथ्या अधिकारों का ऐसा टोकरा पकड़ा दिया है जिसके खालीपन को वेश्या नहीं देख पाती और उसकी मर्यादा से आहत होती है। यद्यपि 'वेश्या' की स्वतंत्रता और उच्छृंखलता 'सती' को आकृष्ट नहीं करती किन्तु वह अपने 'सुहाग' के छिन जाने पर जो पीड़ा भोगता है उसका कारण इस वेश्या को ठहराती है जबकि दोषी पुरुष है। माधवी के प्रति तीव्र मोह और श्र्वसुर कुल की अकूत संपत्ति की लालसा, साथ ही कन्नगी के शीतल रूप के प्रति आकृष्ट कोवलन अपने विवाह की प्रथम रात्रि को अपनी सती पत्नी को वेश्या के द्वार पर ला खड़ा करता है। माधवी के मन में अपने प्रिय कोवलन के विवाहोत्सव में कन्नगी के सामने नाचने की फाँस गड़ी हुई है, ''परसों अपने विवाह के उत्सव में स्वर्णसिंहासन पर मेरे प्राण-पति के साथ बैठकर नई सेठानी ने अपने पिता की कोठी में मेरा नृत्य देखा था। आज मेरे कोठे पर सेठानी नृत्य करेंगी और मैं अपने प्रिय के साथ बैठकर देखूँगी।''११ इस विडम्बना से अनभिज्ञ कि उसके पैरों में घुघरूँ बाँध उसे जिस-तिस के सामने नचाने वाली कन्नगी नहीं है, वह कन्नगी को नचाना चाहती है। कन्नगी के पास भी पुरुष का दिया हुआ वह सम्मान है जिससे वह माधवी को आहत कर सकती है - ''बहन! मेरे देवतुल्य पतिकुल ने सुहाग के नूपुरों से मेरे पैरों को बाँध दिया है। ये घुँघरू तुम्हारे ही पैरों में शोभा पाएँगे।''१२ नूपुर हों या घुँघरू, सती हो वेश्या-बँधे स्त्री के ही पैरों में हैं। नूपुर को चाहे तबले की थाप पर न बजना हो पर उसका गति संचालन है पुरुषों के ही हाथों में। घुँघरू? वे तो स्त्री के लिये सबसे बड़ी गाली हैं। इसलिये सुहागवती कन्नगी का यह पुरुष प्रदत्त ''सौभाग्य'' माधवी के इस सम्मन के लिये लालायित मन पर पत्थर सी चोट करता है - '' 'सुहाग के नूपुर' शब्द मन के अभाव-खड्ड में ऐसे पड़े मानो भारी बोझ की गठरी कुएँ में पानी में छपाका मार स्रोत के तल में जा लगी हो।''१३
दोनों स्त्रियाँ अपने किसी भी अस्तित्व से अपरिचित अपनी अन्य कैसी भी पहचान से अंजान नारी जीवन की एक ही सार्थकता और उपयोगिता से परिचित हैं, पुरुष को रिझाना और उससे इसका प्रमाण पत्र लेना - ''हाँ सुना है कि इन बहुमुल्य नूपुरों के कारण तुम नगर-भर की सुहागिनों के लिये ईर्ष्या की वस्तु बन गई हो। पर इनसे अपने सौभाग्य देवता को न रिझा सकोगी गुइयाँ! वह शक्ति मेरे ही घुँघरुओं में है।''१४
अपने अपने नूपुरों और घुँघरुओं की निरर्थकता का भान नहीं है दो तेजस्वी नारियों को। उनमें आपस में संशय, द्वेष, डाह और जानलेवा घृणा है और पुरुष? इस सर्वविनाशिनी घृणा के घात-प्रतिघात से आनन्दित है - ''मैं आनन्द ले रहा हूँ। मेरे सामने स्त्री के दो रूप आ रहे हैं। सुहागरात में यह अनुभव भला कितने सौभाग्यशालियों को मिलता है।''१५ मदिरा में मस्त हँसता हुआ कोवलन, पुरुष समाज इससे अनभिज्ञ है या बना रहना चाहता है कि इस अग्नि की तपिश उसके कामातुर तन-मन को भी जलायेगी, चाहे कम ही सही।
'सुहाग के नूपुर' उपन्यास अपने दुर्गुणों से प्रेरित पुरुष द्वारा निर्मित समाज की विडम्बनाओं को परत-दर परत खोलता है। स्थानाभाव के कारण इस उपन्यास का यहाँ विशद विवेचन संभव नहीं है। उसकी वर्चस्ववादी व्यवस्था सभी को उनकी नारकीय स्थितियों में कैद रखती है। मुक्ति के मार्गों को उसकी उद्दाम लालसा रोके खड़ी है। इसलिये राज्य व्यवस्था द्वारा अन्त में ''वेश्या'' ही बना दी
जाती है। सती कन्नगी से वेश्या माधवी हार जाती है, हरा दी जाती है। राजपुरुष आदेश देता है - ''कोटपाल! आज से नगर की कोई वेश्या दान, धर्म और वाणिज्य की आड़ लेकर सतियों को त्रस्त न कर सकेगी और यदि कभी एक क्षण के लिये भी ऐसा हुआ तो मैं इस नगर की सर्वश्रेष्ठ वेश्या इस माधवी को भरे चौराहे पर श्र्वपच-चंडालों के मनोरंजनार्थ नचाऊँगा।''१६ हारने के बाद, हरा दिये जाने के बाद भी वेश्याएँ रहेंगी क्योंकि उन्हें पुरुषों का मनोरंजन करना है बल्कि एक और गुरुतर कार्यभार है उन पर - ''कुलवधुओं की प्रतिष्ठा के लिये समाज को नगरवधुओं की आवश्यकता रहेगी, केवल उन्हें उनकी मर्यादा में बाँध दो।''१७ अपनी-अपनी मर्यादाओं में बँधी स्त्रियाँ ही पुरुष समाज के भोग और मोक्ष दोनों कार्यों को सिद्ध कर सकेंगी। इस महत्‌ कार्य को साधने में उसकी अपनी जो चाहे दशा हो।
उपन्यास के अंत में एकपुरुषव्रता उससे प्रेम करने वाली माधवी, अंततः वेश्या बनने पर बाध्य माधवी, अपनी संतान को भद्र वंशावली में स्थान दिलवा पाने में नाकाम माधवी, सुहाग के नूपुर पहन वेश्या से सती पद पाने को प्राणांतक वेदना से व्याकुल माधवी, भयंकर वृष्टि से सब संतान सम्पत्ति सर्वस्व गँवा बैठी पगली माधवी कहती है - ''सारा इतिहास सच-सच ही लिखा है देव! केवल एक बात अपने महाकाव्य में और जोड़ दीजिये - पुरुष जाति के स्वार्थ और दंभ भरी मूर्खता से ही सारे पापों का उदय होता है। उसके स्वार्थ के कारण ही उसका अर्धांग - नारी जाति - पीड़ित है। एकांगी दृष्टिकोण से सोचने के कारण ही पुरुष न तो स्त्री को सती बनाकर सुखी कर सका और न वेश्या बनाकर। इसी कारण वह स्वयं भी झकोले खाता है और खाता रहेगा। नारी के रूप में न्याय रो रहा है महाकवि! उसके आँसुओं में अग्निप्रलय भी समाई है और जलप्रलय भी।''१८ और यह पूछे जाने पर कि क्या वह माधवी है, पगली कहती है, ''मैं नारी हूँ - मनुष्य समाज का व्यथित अर्धांग।''१९
भारतीय संस्कृति ने अपनी आधी आबादी को यौन शुचिता से ऐसा जोड़ा कि बाद की आधुनिकता भी इसी प्रवृत्ति के साथ पनपी। स्त्री की यौन शुचिता और नारी के सतीत्व से पितृसत्तात्मक विचारधारा की सम्बद्धता दो-चार महानगरों में कम हुई हो तो हुई हो अन्यथा यह विषबेल अभी भी फलती-फूलती अवस्था में है। इस सतीत्व निर्वाह और इस पर तनिक भी शंका हो जाने पर इसे सिद्ध करने का पूरा भार सीता ने ही उठा लिया था। मर्यादा पुरुषोत्तम का महात्म्य पत्नी परित्याग में भी है। उनके पुरुषोत्तम होने के कारणों में एक महत्तम कारण धोबी के कहने पर महारानी का त्याग भी है। (शायद बहुतमत सीता के विरुद्ध नहीं था!) पुरुष मानस में पुरुषोत्तम की यह भावना सदैव बनी रही है। विवाहित स्त्री का सतीत्व और अविवाहिता का कौमार्य आधुनिक समाज के पुरुष की संस्कारबद्ध जड़ता की भी माँग कर रहे हैं। अपनी होने वाली पत्नी की अक्षुण्ण योनि की तीव्र आकांक्षा और अक्सर उसके प्रति उसके संदेह के कीड़ ने कितने दाम्पत्य जीवनों को नरक बना दिया होगा, इसका अनुमान ममता कालिया के 'बेघर (१९७१) उपन्यास से लगाया जा सकता है।
परमजीत का संजीवनी से इसलिये विवाह न करना कि वह 'कुँआरी' नहीं, परमजीत उसकी जिंदगी में 'पहला पुरुष नहीं और फिर पारम्परिक विवाह मार्ग से झगड़ालू और फूहड़ पत्नी रमा के साथ जीवन-निर्वाह जितना दर्दनाक है उससे अधिक दर्दनाक है संजीवनी द्वारा स्वयं को भ्रष्ट समझना। संजीवनी स्वयं इस 'अप्रिय व छोटी सी दुर्घटना' के लिये अपराध-बोध से मुक्त नहीं हो पाती। उसकी
अपनी अस्थि मज्जा में यह बात गहरे तक समाई हुई है कि वह अपवित्र है।
इस अपवित्रता के कारण त्याज्य होने के भय ने स्त्री-पुरुष में स्वाभाविक संवाद-सूत्र कायम नहीं होने दिया। परिणामतः स्त्री-पुरुष का यह सहज सम्पर्क बड़े रहस्य के रूप में परिणत होता गया। नारी देह से जुड़े आधारहीन मिथकों का निराकरण संभव न हो सका। स्त्री को देवी पद पर आसीन कर उसे धक्का दे कर गिराने की दुर्घटना से नारी विश्र्व इतना आक्रान्त रहा है कि उसने भेद बनाए रखने में अपनी कुशलता समझी।
इस संदर्भ में १७९२ में मेरी कोल्सनक्राफ्ट का यह कथन कितना सटीक है - ''दरअसल स्त्री उत्कृष्टता की भ्रान्त धारणाएँ स्त्रियों को इतना नीचे गिरा देती हैं कि यह कृत्रिम निर्बलता उनमें शक्ति की स्वाभाविक विरोधी चालाकी को जन्म देती है, जो उन्हें ऐसी घृणित बचकानी अदाएँ दिखाने की ओर ले जाती हैं जो देखने वालों में कामना भले ही जगाती हों, पर स्त्रियों की गरिमा घटाती ही है। ऐसे पूर्वग्रहों को पोषित मत करिये और वे जीवन में अधीनस्थ ही सही, पर सम्मानजनक स्थिति अर्जित कर लेंगी।''२०
इस ''सम्मानजनक'' स्थिति को प्राप्त करने के लिये औरत चाहे कितनी दूर की यात्रा कर लेउसे कमोवेश वही पुरुष मन मिलता है जो औरत को अपने अधीनस्थ देखना चाहता है। वह औरत से अपने मन की करवाना चाहता है। इसलिये मृदुला गर्ग के उपन्यास 'कठगुलाब' की स्मिता का चाहे जीजा हो पति जिम दोनों को कठपुतलियाँ चाहिये। जीजा मुँह नहीं खोलने देता और जिम हर बात पर कहता है ''वी नीड टु टॉक''। दोनों औरत से केवल अपने मन की बात सुनना चाहते हैं। वे आत्मविश्र्वास से इतने भरे हुए हैं कि उन्हें किसी की बात नहीं सुननी। तिस पर औरत की बात!
अमेरिका के प्रगतिशील समानधर्मा लगने वाले क़ानून भी आत्माभिमानी स्त्री की बात नहीं सुनना चाहते। मारियान इस क़ानून पर टिप्पणी करती है - ''यही तो शान है, हमारे समानधर्मा क़ानून की। औरत के हर फरेब में वह मददगार रहता है। हाँ फेमिनिन वाइल्स से मुक्त हो, सिर ऊँचा करके, अपने हाथों अपने जीवन की रूपरेखा तैयार करने की कोशिश कीजिये, फिर देखिये, वही क़ानून कैसे आपको पटखनी देता है।''२१
प्रेम दीवानी मारियान कभी कुछ न लिखने वाले लेखक इर्विंग से विवाह कर लेती है, ''औरत का काम कभी खत्म नहीं होता'' इस मुहावरे को अपनी जीवन में घटित होते हुए, कुछ ज्य़ादा ही घटित होते हुए देखती है, हर औरत की तरह खूब थकी रहती है, इर्विंग के कहने पर अपना गर्भपात करवा लेती है, अपनी माँ बनने की इच्छा .जमीन में गहरे दफ़ना देती है पर उस दिन वह अपने को बेतहाशा छला हुआ अनुभव करती है जिस दिन उसके दस वर्षों की अनथक मेहनत का परिणाम उसका जरनल इर्विंग अपने नाम से छपवा लेता है। इस बेशर्म चोरी पर तड़पती मारियान से इर्विंग कहता है - ''चीखो मत . . . मैंने कोई कपट नहीं किया। तुमने अपनी मर्जी से अपना जरनल मुझे दिया था। और कोई अनोखी बात नहीं की तुमने। डी.एच. लारेंस, स्कॉट फिटजैरल्ड और भी कितने लेखकों ने उपन्यास लिखते हुए अपनी बीवियों के जरनल इस्तेमाल किए थे। जेल्डा फिटजैरल्ड ने तो अपनी मर्जी से दिया भी नहीं था। बिला सोचे-समझे चल दी थी कोर्ट में, एतराज दर्ज करने, आधी पागल जो थी। हुआ क्या? कोर्ट ने कानूनन फिटजैरल्ड को जेल्डा के जरनल का इस्तेमाल करने की इजा.जत दे दी थी। साहित्य का इतिहास जानती भी हो कि खामखां चिल्लाए जा रही
हो।''

Saturday, 23 January 2010

हिन्दी उपन्यास और स्त्री प्रश्न 1

भारतीय परम्परा विचारों के आदर्शीकरण में जितनी सिद्धस्त रही है, उस आदर्श को लागू करने में उतनी ही, बल्कि कहें कि उससे बढ़ कर भेद-भाव ग्रस्त रही है। अपने इतिहास के माध्यकाल में जिन संस्कृतियों से इसकी मुठभेड़ हुई, इस क्षेत्र में वे भी उससे कम न थीं। औरतों और बाद में जिस पश्चिमी एनलाइटेनमेन्ट (कदथ्त्ढ़ण्द्यड्ढदथ््रड्ढदद्य) की दीप्ति से भारतीय देदीप्यमान होना चाहते थे, और हुए भी, उनके आदर्शों की कथनी और क्रियान्वयन की करनी में भी भारी दूरी थी। यह जानना रोचक होगा कि १७८९ ई. की फ्रांसीसी क्रान्ति के बाद १७९१ ई. में स्त्री शिक्षा का क़ानून और १७९२ ई. में स्त्रियों को मिले कुछ नागरिक अधिकार १८०४ ई. के 'नेपोलियानिक कोड' और अन्य यूरोपीय देशों की ऐसी ही बुर्जुआ नागरिक संहिताओं के द्वारा रिस्त्र कर दिये गए। १७९२ ई. में मेरी वोल्सनक्राफ़्ट की यह माँग कि बुर्जुआ क्रान्ति का नारा ''स्वतंत्रता समानता भ्रातृत्व'' स्त्री समुदाय पर भी समान रूप से लागू किया जाये, आज भी एक माँग ही है। सम्पत्ति, शिक्षा और वोट का अधिकार पाते-पाते बीसवीं शताब्दी के दूसरे-तीसरे दशक व्यतीत हो चुके थे। तात्पर्य यह कि स्त्रियों को राजनैतिक अधिकार बहुत बाद में मिले।
भारत में 'घर' से 'बाहर' पैर रखने वाली महिलाओं की पहली पंक्ति में सर्वप्रथम नाम पंडिता रमबाई का है। इन्हीं रमाबाई के प्रयासों से कांग्रेस सत्र में महिलाओं की सहभागिता संभव हो पाई। महिलाओं ने कितने घोर असहिष्णु वातावरण में राष्ट्रवादी आंदोलनों एवं संगठनों में हिस्सेदारी आरंभ की इसका अनुमान इस घटना से लगता है कि महाराष्ट्र में पहली महिला उपन्यासकार काशीबाई कानितकर और पहली महिला डॉक्टर ''आनन्दीबाई जोशी - दोनों सहेलियाँ जब पहली बार जूते पहनकर तथा छाता लेकर बाहर निकलीं तो उन पर यह कहकर गलियों में पत्थर बरसाए गए कि उन्होंने पुरुष अधिकार वाले प्रतीकों को अपनाकर उनका अपमान करने की हिमाकत की है।''१
(बहुत बाद में एक कवयित्री के प्रति ऐसी ही सामाजिक असहिष्णुता दिखाते हुए लोगों ने भद्दी फब्तियाँ कसी थीं जिसके विरोध में महादेवी वर्मा ने मंच से काव्य-पाठ करना बंद कर दिया था।) बहरहाल १८८९ ई. के बम्बई कांग्रेस अधिवेशन में स्त्रियों ने पहले-पहल भागीदारी की। इस अधिवेशन की रिपोर्ट में ''इस बात का उल्लेख तो किया गया कि महिला प्रतिनिधियों को दरी पर बैठने की अनुमति दी गई, परन्तु इस तथ्य को छिपा लिया गया कि उन्हें बोलने या कि प्रस्तावों पर वोट देने की इजा.जत नहीं दी गई।''२
उल्लेखनीय तथ्य यह है कि जब कांग्रेस के मंच से महिलाओं को बोलने का अधिकार मिला तो उन्होंने सबसे पहले वेश्यावृत्ति की समस्या को उठाया। ये महिलाएँ भारत में अंग्रे.जों द्वारा वेश्यावृत्ति के नियमन के क़ानून की समाप्ति चाहती थीं।
स्त्री शिक्षा, बाल विवाह निषेध, बहुत विवाह निषेध, सती प्रथा निषेध, विधवा विवाह प्रचलन आदि पर उन्नीसवीं सदी सक्रिय रही थी किन्तु वेश्या समस्या पर सहानुभूति परक रवैया बीसवीं शती में आ पाया। भारत में ब्रिटिशों के आगमन के बाद अंग्रेज सिपाहियों की संख्या और छावनियों के अनुपात में वेश्यावृत्ति भी बढ़ी। इन वेश्याओं में अधिकांश स्त्रियाँ निर्धन, परित्यक्ता और अपहृता थीं। अंग्रे.जों ने छावनियों के आस-पास 'रेडलाइट एरिया' प्रणाली विकसित की। अंग्रे.जों द्वारा वेश्यावृत्ति को समाप्त करने के स्थान पर उसे क़ानूनी रूप देने का विरोध भारत ही नहीं उनके अपने देश में भी हुआ। वेश्या उत्पीड़न का प्रश्न यहाँ के रईसों-समर्थों-संभ्रान्तों को तब समझ आया जब अंग्रे.जों ने रखैलों और रक्षिताओं आदि को भी वेश्या की कोटि में डाल दिया। अभी तक बहुत से क़ानूनी दबावों और आत्महत्याओं को झेल रहे वेश्या वर्ग की आँच भद्र वर्ग को भी लगी। वह 'मालिक' से 'ग्राहक' बन कर अपमानित हुआ। अब विवाद छिड़ना स्वाभाविक था। साहित्य में उसका प्रतिफलन और भी स्वाभाविक था।

Friday, 28 August 2009

स्त्री वादी लेखन की हिन्दी में संभावना

हिन्दी में स्त्रीवादी विमर्श संभव नहीं लगता. इसके कारणों को आलोचकों में ढूढने के बजाय समाज में ढूंढने चाहिए. हिन्दी समाज बना ही इस रूप में है कि इसमें स्त्री का पक्ष ठीक से आता ही नहीं. जिस हालत में हिन्दी समाज है और जिस तरह से इसका विकास हो रहा है स्त्री वादी दृष्टि का विकास दो चीजों पर निर्भर करता है. या तो कोई ऐसा स्कूल बने जो इस विषय को हिन्दी समाज के हिसाब से उठाए. यह स्त्रीवादी आतंकवादी नजरिया न हो नहीं तो इसका प्रभाव नहीं पडेगा. लोग उसे स्वीकार नहीं करेंगे. यह काम धीरज से किया जा सकता है. अभी हाल में अनामिका की एक किताब देखी थी. मुझे लगता है अगर इस तरह का लेखन ज्यादा मात्रा में होने लगे तो बात बन सकती है. मर्दवाद का विरोध करने की जल्दबाजी में कुछ लोग एक इस तरह के स्त्रीवाद को पोसने लगते हैं जो इस समाज के क्या किसी भी समाज के अनुकूल नहीं है. मर्दवाद कोई आसमान से टपकी हुई चीज नहीं है और न ही किसी षडयंत्र के तहद इसे प्रतिष्ठित किया गया है. मर्दवाद एक तरह की समस्या है जिससे परेशान पुरुष भी है. अपने समाज में जब से आधुनिक विचारों का आक्रमण /हस्तक्षेप हुआ तब से ही इस बात की ओर कम ध्यान दिया गया है कि भारतीय समाज को कुछ विजातीय से दीखने वाले तत्त्वों के साथ तालमेल बिठाना पडेगा. स्त्री पुरूष सम्बन्ध को लेकर जो एक तरह की बहस उन्नसवीं शताब्दी में चली थी उसका कोई बडा प्रभाव समाज पर, कम से कम हिन्दी समाज पर शायद नहीं पडा. गांधी के विचारों में एक परिपक्व भारतीय नारीवादी दृष्टि का विकास हुआ दीखता है लेकिन समाज ने उसे भी भुला दिया. जैनेन्द्र के साहित्य में एक भारतीय नारीवादी दृष्टि थी लेकिन हिन्दी समाज भी उसके लिए कोई सही कसौटी नहीं बना पाया. प्रेमचन्द से लेकर रेणु तक में स्त्री वादी (भारतीय) दृष्टि के विकास की संभावना थी. लेकिन समस्या यह है कि इसके बाद लेखिकाओं को उस दृष्टि का और विकास करना चाहिए था. महादेवी वर्मा को छोडकर बाकियों में उस गाम्भीर्य का अभाव दीखता है जो भारतीय समाज की गति-प्रकृति को ध्यान में रखते हुए सामाजिक विचार को आगे बढने और बढाने के लिए आवश्यक है. कुल मिलाकर जो स्त्री की विविध छवियों का मिसाइली हमला बाजारवाद के कारण बहुत विकृत रूप में आया है. 1990 के बाद नारी के आक्रामक रूप ने भीतर ही भीतर भारतीय मर्द को दहला दिया है. यह एक ऐसे समय और स्थितियों के लिए भारतीय मर्द को तय्यार रहने के लिए कहता है जहां वह अपने पुराने सभी आदर्शों से अपने को अलग खडा पाएगा. एक भारतीय मर्द अभी भी उसी के साथ प्रेम करना चाहता है जिसके साथ वह बुढापा बिताने की सोचता है. लेकिन इस समय की नारी उसे आक्रांत करती है. विवाह, परिवार, जीवन साथी, मां की ममता, सात जन्म आदि के साथ इस नयी नारी को मिला नहीं पाता. ऐसे समय में वह बह रहा है, एक अनिर्णय की स्थिति को ढोते हुए.


हिन्दी के अधिकतर सिद्ध विचारक इस समय हाथ जलाने के जोखिम से बचते हुए बाकी का समय बिताना चाहते हैं. वे जिस बौद्धिक स्ट्रेटेजी से काम चलाते हैं उसे समझना कठिन नहीं है. वे नारी का आदर्शीकरण करते हुए पुरूषवाद का विरोध इस अमूर्तन के साथ करते हैं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

होना यह चाहिए कि बडी संख्या में लेखिकाओं को बहस के केन्द्र में लाया जाए और उन्हें धैर्य से सुना जाए. ज्यादा से ज्यादा युवा लेखक लेखिकाओं को बहस के केन्द्र में रखा जाए. लेकिन इसमें एक बडी मुश्किल है. जब दलित लेखकों की एक बड़ी संख्या हिन्दी में सक्रिय हुई वे बहुत हडबडी में दिखाई दिए. इस कमजोरी का फायदा उन लोगों को मिला जो समाज की नई चुनौतियों का मुकाबला नये समय के हिसाब से नहीं करना चाहते थे. धीरे धीरे ये नये दलित लेखक गुटबंदी के शिकार हो गये और दिग्भ्रमित हुए. आज दलित लेखन उतना संभावनाशील नहीं दिखलाई पड रहा जितना उसे होना चाहिए था. स्त्री लेखन को इससे बचना चाहिए. एक स्त्री कुछ अच्छा लिखती है तो हिन्दी के बहुत सारे दिग्गज उसे सहारा देने, उसके बारे में अतिश्योक्तिपूर्ण बातें कहने की प्रतियोगिता करने लगते हैं. मैं तो उस दिन दहल सा गया जब इस बीमारी का शिकार होते हुए एक बहुत् ही संभावनाशील युवा दलित आलोचक को देखा. उन्होंने एक लेखिका की पहली पुस्तक की प्रशंसा करते हुए उसे निर्मल वर्मा से भी श्रेष्ठ घोषित कर दिया! साहित्य का क्षेत्र कोई फिल्म जगत नहीं है जहां किसी को रातोंरात स्टार बनाया जा सकता है. इस क्षेत्र में धैर्य और निष्ठा के साथ लेखन का कार्य करने वालों को ही स्थायी मान मिल सकेगा. हम तो उम्मीद लगाए बैठे हैं कि लेखिकाओं की ओर से नई दृष्टि का विकास हो सकेगा.

Sunday, 23 August 2009

आलोक धन्वा से एक मुलाकात

यह लिखते हुए कुछ असमंजस की स्थिति में हूं. क्या इस तरह आलोक जी के बारे में दो बातों को सार्वजनिक करना ठीक है. पर सोचता हूं जो लोग इस ब्लाग पर आयेंगे वे समझ सकेंगे कि मैं उनके प्रति प्रेम भाव के कारण ही दो चित्र अपने ब्लाग पर डाल रहा हूं.
आलोक जी पटना में एक कमरे के फ्लैट में रहते हैं. उनको चाहने वाले भी कम नहीं हैं, लेकिन मुझे लगता रहा कि हिन्दी का इतना महान कवि एक दम अकेला छोड दिया गया है. तमाम तरह की दुश्चिंताएं उन्हें घेरे थीं और वे बार बार दुखी हो जाते थे. कुछ व्यक्तिगत प्रसंग भी आये जिसने उन्हें बहुत व्यथित किया है. मैं उनकी बातें सुनता रहा और वे तमाम मेरे सामने घूमते रहे जब कोलकाता में हम उन्हें रोक रहे थे और वे दिल्ली जा रहे थे. कितनी बडी गलती की थी आलोक जी ने!
मुझे उनका स्नेह मिलता रहा है इस बात का मुझे गर्व है. बडे प्रेम से कोलकाता का हाल पूछते रहे. इस बात से बहुत उदास थे कि बंगाल में वामपंथ की शक्ति लगातार कम होती जा रही है. जब मैनें उन्हें कहा कि अब वामपंथ के शासन को टिकाना संभव नहीं वे मेरा चेहरा गौर से देखने लगे. कुछ साल पहले हमलोग जब  उनसे बहस करते थे और कहते थे कि वामपंथ गलत हाथों में चला गया है तो वे विरोध करते थे. इस बार नहीं किया. शायद वे समझ चुके हैं कि हमलोगों की बातें सही थी, शायद. लेस्बियनिज्म के प्रश्न पर वे इसके खिलाफ बोले. कहने लगे कि यह प्रकृति के खिलाफ है, अप्राकृतिक है.
पूरी दुनिया में जिस तरह आदमी अकेला होता जा रहा है जब "आदमी को आदमी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है". वे लगभग विकल भाव से अपने पुराने साथी (एक रिक्सा वाला जो उनके साथ रोज रहता था) को याद करते रहे. खासकर एक बात को जब वह बेनी (रिक्शा वाले का नाम) कहने लगा था- " हे पैसा, हम तोरा पाछू नैं रहब, तोरा आगू रहब, कैहनें कि जे तोरा पाछू रहतै ओकरा नींद नैं आबै छै".
लगभग तीन घंटे की बातचीत के बाद जब मैं बाहर निकला तो अपने समेत सभी हिन्दी समाज के ठेकेदारों को कोस रहा था जो हिन्दी के इस महान कवि को शांति से रहने की सामान्य व्यवस्था भी नहीं करवाता और उम्मीद करता है कि एक ठो और 'कपडे के जूते' क्यों नहीं लिखते आलोक जी.

Saturday, 22 August 2009

1857 का इतिहास : कुछ प्रसंग

इतिहासो के दौर में 1857; कुछ विचार


हितेन्द्र पटेल



इन दिनो 1857 को लेकर लगातार बहस हो रही ह। कुछ वर्षो पहले यू जी सी ने कालेजो आर विश्र्वविद्यालयो के लिए जब पाठयक्रम तयार किया था तो 1857 के विद्रोह को एक अलग अध्याय के रूप मे भी नही रखा गया था। आज भी बहुत सारे लोगो को लग रहा ह कि 1857 के विद्रोहियो के बारे मे इतनी बहस की क्या .जरूरत ह? पर, 1857 पर बहसो का दार थम ही नही रहा। निश्चित रूप से पिछले कुछ सालो मे एसा कुछ घटित हुआ ह जिससे 1857 के बारे मे लोग इतनी बड़ी सखा मे लेखन कर रहे ह।यह सही ह कि सरकार ने एक करोड़ रूपये एक सन्स्था को देकर इस बहस को बढाने मे मदद की ह लेकिन यह भी सही ह कि इन दिनो 1857 के विद्रोह पर जो बहस हो रही ह वह सब सरकारी मदद के कारण ही हो रही हो। दरअसल, इस बहाने इतिहास की पूरी धारणा, राष्ट्रवाद की धारणा, उन्नसवी सदी के बुद्धिजीवियो की विचारधारा, जातिवादी विमर्श मे एक गुणात्मक अन्तर इत्यादि विषयो को ध्यान मे रखने पर एसा लगता ह कि आधुनिक इतिहास लेखन की दिशा अब बदलने लगी ह। 1857 पर हो रहे विमर्शो ने कुछ एसे ही सन्केत दिये ह।

इतिहास होता भी है और बनाया भी जाता है। जो इतिहास है उसकी पुनर्प्राप्ति की आकांक्षा प्रयोजनीय है लेकिन उसकी उपलब्धि असंभव। कुल मिलाकर ऐतिहासिक विवरण का ध्येय है - ऐसे सवाल पूछना जिसमें ऐतिहासिक 'सच' ज्यादा साफ दिखाई दे, 'सत्य' के इर्द गिर्द की चीजों पर इस तरह से रौशनी पड़े कि जो 'सच' है वह दीखने लगे। इन्हीं मायनों में इतिहास में प्रवेश किसी सत्य का अनुसंधान नहीं है कुछ ऐसे प्रश्न पूछना है जिसमें इतिहास के इलाकों से ज्य़ादा से ज्य़ादा हिस्सा हमें दीखे। यहां यह दुहराने का प्रयोजन शायद अनावश्यक है कि हम चाहें या न चाहें अपने वर्त्तमान को भूतकाल पर प्रक्षेपित करते हैं। इतिहास वर्तमान से ज्य़ादा जुड़ा है भूतकाल से कम। भूतकाल सिर्फ तथ्य देते हैं। उन तथ्यों को किस प्रकार संयोजित करना है, कहां किसे कितनी प्रमुखता देनी है और इसके अन्त में क्या निष्कर्ष निकालने हैं यह सब बातें वर्तमान से ही तय होती हैं। कॉलिंगवुड को याद करें तो यह कि इतिहास मूलतः इतिहासकार के दिमाग़ में होता है। हेडेन व्हाइट ने एक बहुत सरल तरीके से इसकी व्याख्या की है : हम मानें कि तथ्य कुछ इस प्रकार हैं - ठ्ठ, ड, ड़, ड्ड, ड्ढ . . . । इसको इतिहासकर जब पूरी ईमानदारी के साथ भी रखेगा तो वह इस रूप में आयेगा - ठ्ठ ड क् ड्ड क . . . । किसी दूसरे इतिहासकार के लिए वह इस रूप में आ सकता है - ऋ ड ड़ क़् ड्ढ . . . । यानी यह इतिहासकार पर निर्भर है कि वह किस तथ्य को प्रमुखता देगा और किसे नहीं। इस सुविधा के कारण इतिहासकार ईश्र्वर हो जाता है। कहा जाता है कि इतिहासकार वह कर सकता है जो ईश्र्वर भी नहीं कर सकते - वह इतिहास बदल सकता है! पर ईश्र्वर का इतिहास एक कल्पना है जिसे उत्साही 'मुक्तिकामी', आधुनिक ज्ञान बोध ने मनुष्य की चेतना में संयोजित कर पाने की आकांक्षा प्रगट की। हेगेल का इतिहास वही पूरा इतिहास है, शायद ईश्र्वर का इतिहास है जो तीन भागों में विभक्त है - भूत, वर्त्तमान और भविष्य। इन तीनों को एक सूत्र में पिरोकर इतिहास की संकल्पना ने उन्नीसवीं सदी में इतिहास की धारणा को आकार दिया। बीसवीं सदी के अंत तक आते आते वह इतिहास दम तोड़ने लगा।

फूकोयामा को मानें तो यह इतिहास 'मर' गया है। बोद्रीया ने भी कहा कि इतिहास अपनी कक्षा से छिटक कर कहीं और चला गया है। इतिहास समय की पटरी से उतर गया है।फूकोयामा की जिस उक्ति को लगभग फूहड़ 'सिद्ध' किया जाता है उसका मर्म यही था कि इतिहास की हेगेलीय धारणा का अन्त हो गया है।

'इतिहास' के अन्त से ''इतिहासों'' का दौर शुरू हो गया है। दरअसल, गौर से देखा जाय तो इतिहास कभी भी इतिहासों से ज्य़ादा शक्तिशाली नहीं था। यह तो आधुनिक बुर्जुआ वर्ग का हठ था, ज्ञान तंत्र की पूरी संरचना पर उसका एकाधिकार था जो शास्त्रीय ज्ञान चर्चा में यह बात स्वीकार्य हो गयी कि उनका इतिहास 'सच' है और बाकी चीजें कल्पना।

एक विद्वान ने प्रस्तावित किया है कि यह जानना ज्य़ादा जरूरी है कि घटनाओं को लोगों ने किस रूप में अपने इतिहासों में देखा है। भले ही इन इतिहासों में इतिहास की प्रमाणिकता का अभाव हो। यह ज्य़ादा जरूरी है कि लोगों ने भूतकाल की घटनाओं का 'आत्म इतिहास' अपने तरीके से लिखने की कोशिश की। इन चेष्टाओं को इतिहास अगर खारिज कर दे तो इतिहास को इस प्रश्न का

उत्तर देना पड़ेगा कि आखिरकार ये 'आत्म-इतिहास' किन मानकों पर खारिज होंगे और इन मानकों को बनाने वाले कौन हैं?

यह इतना आसान मामला नहीं है। दरअसल, साठ के दशक के बाद से सारी दुनिया में यह बात लगातार कही जा रही है कि जिसे हम पूरे समाज का 'सच' और इतिहास मानकर चल रहे हैं वे विश्र्व साम्राज्यवाद के विस्तार के दौर में आधुनिक मध्यवर्गीय बोध से संचालित हुआ। यानि इतिहासबोध मध्यवर्गीय बोध का ही दूसरा रूप है। हां, यह बात भूलने की नहीं है कि मध्यवर्गीय बोध का एक ही रूप नहीं होता। उसके भीतर भी संघर्ष जारी रहता है।

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1857 का विपुल इतिहास उपलब्ध है। एक अनुमान है कि जितना 1857 को लेकर लिखा गया है उतना किसी भी भारतीय इतिहास के विषय में नहीं लिखा गया। प्रदीप सक्सेना ने दशकों तक 1857 के विद्रोह पर शोध किया है। उनका मानना है कि करीब डेढ़ लाख पृष्ठों की सामग्री उनकी जानकारी में है (सरकारी दस्तावेजों के अतिरिक्त)। निश्चय ही सरकार से करोड़ों की राशि प्राप्त करके इतिहासकारों के दलों ने जो देश के विभिन्न हिस्सें में 1857 से संबंधित तथ्यों पर लगातार बहस किया है उससे हजारों नये पृष्ठों की बढ़ोत्तरी हुई है। इतनी सामग्री जहां हो, इतने सारे इतिहासकार जहां लगे हों, वामपंथ से लेकर दक्षिणपंथ तक सभी धारा के लोग जिसे लेकर बहस करना चाहते हों उस विषय पर तो विषय का कोना-कोना उद्घाटित हो जाना चाहिए। ऐसा हुआ नहीं है। ऐतिहासिक मतभेद बने रहे हैं।

अंग्रेज इतिहासकारों की दृष्टि में यह विद्रोह सिपाही विद्रोह था जिसे आम जनता का समर्थन नहीं था। चूंकि यह सैनिक विद्रोह था जैसे ही सरकार ने बेहतर तकनीक और तैयारी के साथ इसका मुकाबला किया इसका दमन हो गया। लेकिन विद्रोह के दमन के पूर्व सिपाहियों ने नृशंसता और बर्बरता का परिचय दिया और असंख्य निर्दोष अंग्रेजों की हत्याएं की। बर्बर सिपाहियों के बीच आपसी तालमेल नहीं था और कोई योजना भी नहीं थी। कुछ जगहों पर विद्रोह हुए और कुछ बागी नेताओं ने उनका नेतृत्व किया। दो-तीन जगहों पर बागी सैनिकों को सफलता भी मिली। लकिन, बागियों की पराजय असंदिग्ध थी। वे हारी हुई लड़ाई लड़ रहे थे। विद्रोह के चरित्र पर इस ऐतिहासिक दृष्टि का मत रहा है कि ब्रिटिश कम्पनी शासन ने भारत में आधुनिकीकरण की जो प्रक्रिया शुरू की थी उससे पुरातनपंथी, पारम्परिक रूप से शक्तिशाली वर्ग के लोगों में असंतोष था। जो लोग ब्रिटिश हुकूमत के असंतुष्ट थे उन्होंने एकजुट होकर ब्रिटिश शासन के खात्में के लिए इस विद्रोह में भाग लिया। चूंकि उन्हें एक बड़े प्रतीक की जरूरत थी उन्होंने कम.जोर और वृद्ध मुगल बादशाह - बहादुर शाह .जफर को नेतृत्व संभालने के लिए बाध्य किया। एक बार अंग्रेजी कम्पनी के हाथों पराजित होकर विद्रोही शक्तियां मिटती चली गयीं और पुनः आधुनिकपंथी ब्रिटिश हुकूमत कायम हो गया। इस विद्रोह के दौरान के अनुभवों ने ब्रिटिश शासन के चरित्र में कुछ परिवर्त्तन किए। अब तक ब्रिटेन की ओर से भारत को सुधारने के लिए, आगे बढ़ाने के लिए चेष्टाएं चल रही थी। उस सुधारवादी दौर का अन्त हो गया और ब्रिटिश शासन (जो कम्पनी के हाथों से निकलकर अब सीधे 'क्राउन' के हाथों संचालित था) ने यहां के जमींदारों के साथ मिलकर शासन करना शुरू किया। यानि, 1857 की क्रान्ति का नुकसान यह हुआ कि भारत की प्रगति बाधित हुई और प्रगतिशील शक्तियां कम.जोर हुईं।

यह दृष्टि कमोबेश सभी आधुनिक पंथी विचारकों में दिखाई देती है। जो लोग उन्नीसवीं शताब्दी के नव जागरण के इतिहास से परिचित हें वे जानते हैं कि हिन्दी, बंगला, मराठी समेत सभी भारतीय भाषाओं के आधुनिकता के अग्रदूतों ने या तो 1857 के विद्रोह का समर्थन किया या फिर चुप्पी साध ली। यह एक विचारणीय तथ्य है कि हिन्दी साहित्य और और पत्र-पत्रिकाओं में 1857 को लेकर 1920-22 तक जो छपता रहा वह कहीं से भी 1857 के विद्रोह को समर्थन नहीं करता। बंगाल के विद्वानों की अंग्रेज भक्ति के उदाहरण तो हमें लज्जित कर देते हैं। ऐसा नहीं है कि नवजागरण के पुरोधाओं में स्वदेश प्रेम नहीं था या फिर वे अंग्रेजी राज्य से सर्वथा प्रसन्न थे। देश के हर हिस्से के बौद्धिक धीरे-धीरे अंग्रेजी राज्य के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि का विकास कर रहे थे और अपने असंतोष को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूपों में प्रगट कर रहे थे। हिन्दी साहित्य के प्रसंग में रामविलास शर्मा, भगवानदास माहौर, कर्मेन्दु शिशिर, कृष्ण बिहारी मिश्र, अर्जुन तिवारी, शंभुनाथ, रूपा गुप्ता इत्यादि के शोध यह बताने के लिए यथेष्ट हैं कि हिन्दी में नवजागरण के दौर में शुरू से ही अंग्रेजी राज्य के अन्तर्गत भारतीयों की हो रही दुर्दशा के प्रति हिन्दी के लेखक संवेदनशील थे। लेकिन, इस आलोचनात्मक दृष्टि में 1857 के प्रति जो दृष्टिकोण उभरकर आता है वह यही है कि 1857 के विद्रोहियों ने 'कुपथ' पर चलकर 'विनाश' को निमंत्रण दिया। लाखों लोगों की हत्याएं हुई और देश पर बड़ी विपत्ति आ गयी। 1857 एक 'भूल का समय' था। एक लेखक ने तो कहा ही है कि इस समय की हवा 'पगली हवा' थी जिसने लोगों को दीवाना बना दिया था। इस तरह के भाव ने ही कमोवेश 1920-22 तक अपना प्रभाव बनाए रखा। हालांकि यह भी सही है कि इक्का दुक्का ही सही लेखक-कवियों और पत्रकारों ने कभी-कभार एक दो ऐसी बातें कह दीं जिससे लगता है कि विद्रोहियों को वे सहानुभूति पूर्वक देखते हैं। यहां तक कि कलकत्ता के एक पत्रकार ने भी 1857-58 के दौरान एक लेख लिखा जिसमें बलवाइयों के प्रति सहानुभूति थी। इस लेखक को प्रताड़ित किया गया, उसे सरकारी कोपभाजन का शिकार होना पड़ा और 20 हजार रूपये जमानत देकर अपनी रिहाई करवानी पड़ी। 1870 में अमृतबाजार पत्रिका में भी एक पत्र छपा जिसमें 1857 के विद्रोह को स्वाधीनता संग्राम के रूप में देखा गया। बिहार के यशस्वी पत्रकार, केशवराम भट्ट के 1874 में लिखे गये नाटक, - सज्जाद सम्बुल (उर्दू) जिसको 'बिहार बन्धु' (हिन्दी) में छापा गया, में भी 1857 के प्रति अलग नजरिये के दर्शन होते हैं। लेकिन, इन्हें अपवाद ही माना जाता चाहिए। भारतेन्दु युगीन और महावीर प्रसाद द्विवेदी युगीन हिन्दी साहित्य में 1857 के प्रति दृष्टिकोण पर कर्मेन्दु शिशिर के ये विचार सही हैं - ''डा0 रामविलास शर्मा ने भारतेन्दु और उनके सहयोगियों के लेखन पर विचार करते हुए हिन्दी नवजागरण का नाभि नाल रिश्ता 1857 से जोड़ा।... उनके दिए साक्ष्य अपर्याप्त थे, और उसी आधार पर भारतेन्दु योग को 1857 से जोड़ने का निर्णय उचित नहीं माना जा सकता।''

बंगला साहित्य में 1857 का इतिहास लिखा गया, उनके वीरों पर विस्तृत चर्चा की गयी, उपन्यास भी लिखे गये लेकिन कुल मिलाकर 1907-08 तक 1857 को सिपाही विद्रोह ही माना गया, राष्ट्रीय विद्रोह नहीं। यह कहना गलत नहीं होगा कि 'युगान्तर' पत्रिका के दौर में, 1906-08 के बीच बंगाल में 1857 को स्वाधीनता संग्राम के रूप में देखने की शुरूआत हुई।

मराठी साहित्य में 1857 पर जिन दो पुस्तकों का हवाला दिया जाता है वे हैं - गोडसे का 'मांझा प्रवास' (1907) और दत्तात्रेय बलवंत पारसनिस द्वारा लिखित लक्ष्मीबाई की जीवनी। 'मांझा प्रवास' 1880 के आसपास तक लिख ली गयी थी और शायद पारसनिस ने लक्ष्मीबाई पर अपनी किताब लिखने में इससे मदद ली थी। लेकिन, कहीं भी यह पता नहीं चलता कि ये लेखक 1857 को राष्ट्रीय विद्रोह मानते थे या फिर उसे स्वाधीनता संग्राम के रूप में देखकर विद्रोहियों के प्रति आदरभाव रखते थे। पारसनिस की पुस्तक में बंगला जीवनीकारों की तरह लक्ष्मीबाई की वीरता के प्रति आदरभाव है लेकिन उसे गलत माना गया है। राय बहादुर पारसनीस ने लक्ष्मीबाई के अतिरिक्त एक अन्य रानी की जीवनी भी लिखी है - जिसने तमाम कष्टों औन अन्यायों के बावजूद अंग्रेजी शासन का विरोध नहीं किया।

स्पष्टतः लक्ष्मीबाई की वीरता तो प्रशंसनीय है लेकिन जिस उद्देश्य के लिए वह लड़ रही थी वह सही नहीं था! धीरे-धीरे 1857 के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्त्तन हुआ और तिलक की 'केसरी' पत्रिका, 'युगान्तर' (बंगाल), सावरकर की पुस्तक (1907), गदर पार्टी के द्वारा 1857 को लेकर प्रचार आदि के कारण 1920-22 तक 1857 के प्रति भाव में गुणात्मक परिवर्तन हो गया था। 1920 के दशक की हिन्दी पत्रिकाओं-खासकर 'प्रभा' में छपे लेखों को आधार बनाया जाय तो कहना पड़ेगा कि 1857 के प्रति दृष्टिकोण बदल चुका था। हालांकि, यह लक्षणीय है कि हिन्दी में प्रकाशित 1857 के प्रथम इतिहास पुस्तकों का प्रकाशन जब 1922 में हुआ 1857 के विद्रोहियों के प्रति समर्थन नहीं था। ईश्र्वरी प्र0 शर्मा की पुस्तक के कुंवर सिंह वाले प्रसंग को छोड़कर अन्यत्र इतिहासकारों ने 1857 के बागियों के प्रति सहानुभूति का भाव नहीं है। यह कहना गलत नहीं होगा कि पं0 सुदरलाल की पुस्तक के प्रकाशन के बाद और हिन्दूपंच के बलिदान अंक के बाद 1857 के प्रति हिन्दी लेखकों का दृष्टिकोण बदला है। गुणात्मक रूप से 1857 के प्रति हिन्दी साहित्य में सहानुभूति पूर्वक विचार 1920 के दशक के अंत तक ही स्पष्ट रूप से सामने आ सका। इस प्रसंग में हिन्दी साहित्य पर 1857 के प्रभाव का प्रामाणिक दस्तावेज पेश करने वाले भगवानदास माहौर का वक्तव्य उद्धृत करना उचित होगा - ''महात्मा गांधी के अहिंसात्मक सत्याग्रह के पूर्व तक हिन्‌ी के प्रकाशित साहित्य में वह जान नहीं आयी थी कि वह 1857 के अपने स्वाधीनता संग्राम को अभीष्ट रूप में खुलकर प्रस्तुत कर सके।''

शैलेन्द्रधारी सिंह ने 1930 के दशक में हिन्दी रचनात्मक लेखन में 1857 के प्रति आये इस परिवर्त्तन पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि इसी दौर में 1857 संबंधी साम्राज्यवादी कल्पना का राष्ट्रीय जवाब तैयार हुआ। बहुत सारी पुस्तकें लिखी गयी जिसमें 1857 के नायकों को गौरवान्वित किया गया। यह कैसे हुआ और यह कितना निर्णायक सिद्ध हुआ इसे हिन्दी साहित्य के एक उदाहरण से समझा जा सकता है। यह उदाहरण इस आलेख के मुख्य विचार - इतिहास का एक हिस्सा 'होता है' और एक हिस्सा निर्मित होता चलता है, का समर्थन करता है।

यह उदाहरण है - लक्ष्मीबाई के इतिहास का। सुभद्रा कुमारी चौहान ने 22 साल की उम्र में लक्ष्मीबाई पर जो कविता लिखी उसने मानो लक्ष्मीबाई का इतिहास ही बदल दिया। 'खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी' पारसनीस की रानी से भिन्न थी पारसनीस और उनके समकालीनों की यह मान्यता कि रानी लक्ष्मीबाई के साथ जो अन्याय हुआ उससे रानी बाध्य होकर लड़ीं, अब बदल गयी। रानी स्वतंत्रता का संदेश देने वाली एक ऐसी वीरांगना में परिणत हो गयी थी जो देश के लिए लड़ रही थी खुद अपने लिए नहीं। बुंदेले के हरबोलों के मुख सुनी कहानियों के आधार पर यह लक्ष्मीबाई का नया इतिहास था जिसे राष्ट्रवादी साहित्यिक मन नये सिरे से तैयार कर रहा था। इस नयी राष्ट्रीय छवि के उद्देश्य स्पष्ट थे। रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब, तात्या टोपे, कुंवर सिंह, अजीमुल्ला, पीर अली, बहादुरशाह इत्यादि सभी एक दूसरे से राष्ट्रीय सूत्र में बंध गये थे। यह प्रमाणित किया जाने लगा कि 1857 में बैरकपुर से शुरू हुआ विद्रोह दरअसल गलत समय पर शुरू हो गया। इसके बहुत पहले से देशव्यापी राष्ट्रीय विद्रोह की तैयारियां चल रही थी।

नाना साहब इस तैयारी के सूत्रधार थे। जब से अजीमुल्ला यूरोप से लौटकर आये थे जहां उन्होंने क्रीमिया का युद्ध देखा, यह समझ लिया कि अंग्रेजों की असली शक्ति है भारत पर अधिकार, तब से इस भारतव्यापी विद्रोह की तैयारियां शुरू हो गयी। गैरीबाल्डी, और रूस के शासकों से भी अजीमुल्ला का सम्पर्क हुआ था। गैरीबाल्डी तो अपनी सेना लेकर भारतीय विद्रोहियों की मदद के लिए चलने ही वाला था कि उसे सूचना मिली कि विद्रोह समाप्त हो गया। इस तरह की तमाम बातों को सुभद्र कुमारी चौहान से लेकर ऋषभ चरण जैन इत्यादि के विवरणों में देखा-महसूस किया जा सकता है। चौहान की ओजस्वी कवित्त शक्ति ने लक्ष्मीबाई का जो इतिहास रूप रचा वही असली लक्ष्मीबाई के रूप में हिन्दी साहित्य में स्वीकृत हो गया। इसी स्वीकृति पर प्रामाणिकता की मुहर तब लगी जब दशकों की शोध-यात्रा के बाद वृन्दावनलाल वर्मा ने लक्ष्मीबाई की जीवनी औपन्यासिक रूप में 1946 में प्रकाशित की।

लगभग इसी तरह की कहानियाँ तात्या टोपे, नाना साहब और कुंवर सिंह की भी है। ये सभी लोग पहले बाध्य होकर लड़ने वालों के रूप में इतिहास में वर्णित थे लेकिन राष्ट्रवादी उभार के दौर में उनकी ऐतिहासिक छवियाँ पुनर्निर्मित हुईं और उनके जीवन के आधार पर साहित्यिक-ऐतिहासिक कृतियां सामने आयीं। कौन भूल सकता है आरसी प्रसाद सिंह की वह ओजस्वी कविता जिसमें वे कहते हैं - ''अस्सी बरस की हड्डी में जागा जोश पुराना था, सब कहते हैं कुंवर सिंह भी बड़ा वीर मर्दाना था।'' कुंवर सिंह का जो उपलब्ध इतिहास हमारे पास है ये कथाएं, कविताएं उनकी छवि को उससे दूर ले जाती हैं, बहुत ज्य़ादा प्रभावी बनाती हैं और शायद इतिहास से निकलकर ये छवियां इतिहासों में तब्दील हो जाती है।

नाना साहब और तात्या टोपे का प्रसंग भी कम दिलचस्प नहीं। ऋषभ चरण जैन का 1932 में छपा उपन्यास 'गदर' स्वाधीनता संग्राम पर प्रकाशित हिन्दी का पहला ग्रन्थ है जिसमें दृढ़ता से 1857 के विद्रोहियों को राष्ट्रीय नायकों का दर्जा दिया गया। उपन्यास का नायक अ.जीमुल्ला एक सुदर्शन व्यक्तित्व का मालिक है जो अपने स्वामी नाना साहब की पुत्री से प्रेम करता है। नाना साहब की पुत्री को चार्ल्स नामक अंग्रेज कलंकित करता है। नाना साहब असली मराठा का कर्त्तव्य पालन करते हुए अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए अंग्रेजों की सेना को चीरते हुए चार्ल्स तक पहुंचते हैं और उसकी हत्या करते हैं और उसका खून पीते हैं! यह वह बिन्दु है जो हमें राष्ट्रीय कल्पना और औपनिवेशिक कल्पनाके बीच एक सूत्र को दर्शाता है। दिल्ली पर आक्रमण के बाद बहादुरशाह .जफ़र हार जाते हैं और पुत्र समेत उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है। उनके पुत्रों की हत्या उनके सामने कर दी जाती है ओर हडसन नामक जनरल मुगल राजकुमारों का रक्त पान करता है। घृणा और विद्वेष की चरम अभिव्यक्ति के रूप में शत्रु को मारकर उसके रक्त को पीना यह एक मध्ययुगीन बर्बरता के उदाहरण-सा लगता है जिसे आधुनिक हडसन अंजाम देता है। ऋषभ चरण जैन के विवरण में यह कृत्य एक वीरोचित कर्म है और, ख्वाजा हसन के वृत्तांत में यह अत्याचार और दमन का प्रतीक है।

'गदर' में जैन ने दिखलाया है कि किस प्रकार कई विदेशी भाषाओं के जानकार, आधुनिक ज्ञान से युक्त अ.जीमुल्ला लंदन जाकर नाना साहब की पेंशन के लिए पैरवी करते हैं। वे असफल होते हैं और यूरोप प्रवास के दौरान अन्य यूरोपीय शक्तियों से ब्रिटेन विरोधी संभावित विद्रोह के लिए समर्थन पाने की चेष्टा करते हैं। तीस के दशक में कई ऐसे उपन्यास लिखे गये जिसमें राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत लेखकों ने 1857 का एक राष्ट्रीय इतिहास लिखा। इस राष्ट्रीय इतिहास में कल्पना का तत्त्व कितना प्रभावी था इसे भी ध्यान में रखना चाहिए। एक उपन्यासकार ने यह दिखलाया कि तात्या टोपे को फांसी देने के क्रम में तात्या की जगह कोई और देशभक्त फांसी पर तात्या बनकर चढ़ गया। तात्या हिमालय चले गये। अंग्रेज चूंकि तात्या को पहचानते नहीं थे इसीलिए वे यही समझते रहे कि उन्होंने तात्या को फांसी दे दी। एक अन्य उपन्यास में लक्ष्मीबाई को भी बाद तक जीवित दिखलाया गया और बताया गया कि जो लक्ष्मीबाई बनकर अंत में शहीद हुई वह कोई और थी। लक्ष्मीबाई हिमालय चली गयी और 80 वर्ष तक जीवित रही।

साहित्य में उपस्थित यह इतिहास 1857 के अध्येताओं के लिए चुनौती है। क्या इसे कपोल-कल्पना मानकर इतिहास के अध्ययन क्षेत्र से बाहर रखा जाय या इसे भी इतिहास का ही एक अंग मानकर चला जाये? हेडेन व्हाइट पर फिर से लौटकर देखना उचित होगा। वे मानते हैं कि इतिहास से प्रश्न किस तरह से पूछा जाये कि इतिहास अधिक प्रामाणिकता के साथ उपस्थित हो समझने के लिए रचनात्मक लेखन से तकनीक सीखना चाहिए। क्या क्या वर्णित होता है और इन वर्णनों में किस तरह की प्रवृत्तियां काम कर रही हैं, किन-किन प्रकार की छवियां काम कर रही हैं यह सब कुछ इतिहास की वृहत्तर सीमा ('मेटा हिस्ट्री') में समाहित हो जाता है। इस दृष्टि से विचार करने पर इतिहास सतत परिवर्त्तनशील आख्यानों में परिवर्त्तित हो जाता है। इन सतत परिवर्त्तनशील आख्यानों को मध्यवर्गीय इतिहासबोध से संचालित इतिहास के बरक्स रखकर देखने से एक दो बातें उभरकर सामने आती है जिसे एक उदाहरण के माध्यम से समझा जा सकता है।

लक्ष्मीबाई के जीवन पर 1890 के दशक में एक अंग्रेज लेखक ने एक नाटक लिखा। इसमें दिखलाया गया था कि कामातुर लक्ष्मीबाई ने एक अंग्रेज अफसर को अपने मोहमाश में बांधना चाहा। कर्त्तव्यपरायण अंग्रेज अफसर ने रक्तपिपासिनी रानी के अधम प्रस्ताव को जान की परवाह न करके ठुकरा दिया। लगभग इसी तरह का एक नाटक 1930 के दशक में एक अंग्रेज द्वारा लिखा गया। 1890 के दशक में नाटक का विरोध न हुआ लेकिन 1930 के दशक में तीव्र राष्ट्रवादी विरोध के फलस्वरूप प्रकाशक को विवादित अंश हटाने पड़े और माफी मांगनी पड़ी। यहां शैलेन्द्रधारी सिंह ने ठीक ही कहा है कि 1857 ने ब्रिटेन के साम्राज्यवादियों को, उसके गर्वीले राष्ट्रवादियों को अपनी जाबांजी और मर्दानगी को प्रदर्शित करने का, अपना गौरव गान करने का मौका प्रदान किया। अंग्रेजों ने बहुत सारे ग्रन्थ लिखे जिसमें 1857 की घटनाओं को पार्श्र्व में रखकर अंग्रेजों के जय की, उनकी

महानता का आख्यान निर्मित किया। डा0 सिंह ने यह ईशारा भी किया है कि यह देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रवादी उभार के दौर में जब इस आख्यान का प्रतिवादी आख्यान निर्मित हुआ किस तरह की कल्पनाओं ने इतिहास से मिलकर ऐतिहासिक आख्यान को तैयार किया।(दुर्भाग्य से डा0 शैलेन्द्रधारी सिंह को यह मौका नहीं मिला। पटना में उनके आवास पर कुछ लोगों ने उनकी हत्या कर दी।) अर्थात्‌, 1930 की राष्ट्रीय ऐतिहासिक कृतियों को अगर राष्ट्रवादियों का आत्म इतिहास मानकर देखा जाये तो?

यह एक प्रसिद्ध उक्ति है कि इतिहास में तथ्यों के आलावा सब झूठ होता है और साहित्य में तथ्यों के अलावा सब कुछ सच होता है। यानि इतिहास से तथ्य लिये जायें और साहित्य से तथ्येतर विवरण। यानि, इतिहास का सच न तो इतिहास के पास है और न ही साहित्य के पास। 'सच' शायद वह मरीचिका है जिसकी ओर जितना बढ़ेंगे वह उतना ही दूर होता जायेगा। हाइडेगर से लेकर मिशेल फूको तक बहुत सारे दार्शनिकों ने इतिहास की पूरी धारणा पर जिस संरचनात्मक दबाब को दिखाया हे उसमें यही बात प्रधान है कि काल विशेष में प्रभावी सोच-पद्धति (ड्ढद्रत्द्मद्यड्ढथ््रठ्ठ) ही वह प्रभावी माध्यम है जो हमें विशेष तरह से सोचने के लिए बाध्य करता है। एक कालखण्ड में उस कालखण्ड में प्रभावी सोच-पद्धति यह निर्धारित करती है कि हम क्या सोच सकते हैं और क्या नहीं। हम क्या सोच सकते हैं और क्या नहीं यह हमारे वर्त्तमान समय द्वारा ही तय होता है। हेडेन व्हाइट ने भी दिखलाया है कि एक लेखक अपने समय के 'ट्रोप' (च््रद्धदृद्रड्ढ) पर ही अवस्थित होता है।

1857 के संदर्भ से निकलकर जो नये-नये आख्यान हाल के वर्षों में उभरकर सामने आ रहे हैं उन्हें ध्यान से देखने पर यह स्पष्ट हो जायेगा कि 1857 का इतिहास हमारे वर्त्तमान से ही नियंत्रित होता है। लक्ष्मीबाई के साथ-साथ झलकारी बाई की कहानी को भी देखा जाने लगा है। झलकारी बाई पर जो एक ऐतिहासिक ग्रन्थ मोहनदास नैमिशराय ने प्रस्तुत किया है वह इतिहास की दृष्टि से 'कमजोर' है। ऐसे तथ्यों को पेश किया गया है जिसे कहने के पहले हमें प्रमाण देने पड़ेंगे। ये प्रमाण सामान्यतः प्रभुत्वशाली वर्ग की मिल्कियत हैं। वे ही लेख लिखवाते हैं, अपनी गाथाओं को सुरक्षित रखवाते हैं और उनकी ही कथाएँ लिखित रूप में हमारी धरोहर बनकर सुरक्षित रहती हैं। लेकिन ऐसे पात्रों का इतिहास लिखना जो प्रभुत्वहीन समुदायों से आते हैं निश्चित ही इतिहास में दूसरे रूप में आता है। स्रोतों के अभाव में इनका इतिहास उल्टी यात्रा करता है। इस प्रसंग में मार्क ब्लॉख, लूसियेन फेब्रे जैसे फ्रांसीसी इतिहासकारों द्वारा प्रयुक्त 'रिग्रेसिव मेथड' का उल्लख उचित होगा। यह सब जानते हैं कि मार्क ब्लॉख विश्र्व के महानतम इतिहासकारों में से हैं। उनकी धारणा थी कि संग्रहालयीय तथ्य निर्भर राजनैतिक इतिहास एक आंशिक इतिहास है। पूर्ण इतिहास (च््रदृद्यठ्ठथ् ण्त्द्मद्यदृद्धन््र) के लिए हर तरह के स्रोतों और पद्धतियों की मदद लेनी चाहिए। वे मानते थे कि फ्रांस में सामाजिक परिवर्त्तन को समझने के लिए कृषक समुदाय के जीवन में हुए परिवर्त्तनों का अध्ययन जरूरी है। पर समस्या यह थी कि किसान का इतिहास कैसे लिखा जाये। इस समस्या के निदान के लिए जिस पद्धति का अनुसरण उन्होंने किया उसे अनजाने भूतकाल से चलकर जाने हुए वर्त्तमान की ऐतिहासिक प्रगतिशील धारणा के विपरीत जाते हुए (वर्त्तमान) से अजाने (भूतकाल) की यात्रा शुरू की। इसी पद्धति से वैकल्पिक इतिहास की वैकल्पिक व्यवस्था संभव हो सकी। भारत में इतिहास की इस उल्टी यात्रा की उपयोगिता का एक बेहतरीन उदाहरण हाल ही प्रकाशित पुस्तक 'वंचितों का

आत्म इतिहास' है जिसमें उत्तर भारत की दलित जातियों के अपने इतिहास लेखन को रखा गया है।

1857 का उल्टा इतिहास उस हद तक प्रयोजनीय शायद न हो। इस आलेख के शुरू में ही यह कहा गया है कि डेढ़ लाख पृष्ठों से भी अधिक ऐतिहासिक सामग्री उपलब्ध है। फिर इतिहास के इन दस्तावेजों के आधार पर ही प्रामाणिक इतिहास क्यों नहीं लिखा जा सकता?

इन पंक्तियों के लेखक के अनुसार 1857 के इतिहास की हर पद्धति आंशिक-इतिहास को ही पेश कर सकती है। हम 1857 के इतिहास के पास कैसे प्रश्न लेकर जाते हैं वही तय करेगा कि 1857 के इतिहासों के पास हमारे लिए क्या उत्तर है। एक प्रश्न, सुविधा के लिए, यह हो सकता है कि 1857 के विद्रोहियों ने विद्रोह का मन कब, क्यों और कैसे बनाया। इस प्रश्न के उत्तर में हमारे इतिहासकारों के उत्तर अलग-अलग हैं। अधिकतर इतिहासकार यही मानते हैं कि सिपाहियों के बीच व्यापक असंतोष था। इस असन्तोष का कारण मुख्यतः यह था कि अंग्रेजी सैनिकों की तुलना में हेय माने जाते थे और उनके प्रति सरकारी रवैया उपेक्षापूर्ण था। इस प्रश्न के उत्तर ढूंढ़ते हुए सिपाही मन का जोड़ उत्तर भारतीय किसान मन से कितना था, यह एक बुनियादी प्रश्न है। अगर ये सिपाही मन से किसान और तन से सिपाही थे (एरिक स्टोक्स) तो 1857 के विद्रोह को राष्ट्रीय न मानने का कोई कारण नहीं। सिर्फ एक ही असुविधा हो सकती है। मार्क्सवादी चिंतन पद्धति के अनुसार 1857 का विद्रोह प्राक्‌ पूंजीवादी युग के दौर की परिघटना है और राष्ट्रवाद पूंजीवादी दौर में ही बुर्जुआ विचारधारा के रूप में उभर सकता है। अतः सिद्धांततः 1857 का विद्रोह राष्ट्रीय विद्रोह नहीं हो सकता। यह अधिक से अधिक 'स्वाधीनता का संग्राम' हो सकता था, मुक्ति संग्राम हो सकता है। पर, यह एक और समस्या को जन्म देता है - स्वाधीनता किससे - अंग्रेजों से या सामंती शक्तियों से? रामविलास शर्मा जैसे राष्ट्रीय मार्क्सवादी चिंतको की समस्या यह है कि वे एक साथ 1857 के नायकों और उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में शक्तिशाली हुए मध्यवर्ग दोनों की चेतना को जोड़कर देखने की कोशिश करते हैं। मंगल पाण्डेय, लक्ष्मीबाई, कुंवर सिंह और अ.जीमुल्ला की चेतना का जोड़ भारतेन्दु और प्रताप नारायण मिश्र से!

यह पहले ही कहा जा चुका है कि भारतीय मध्यवर्ग मूलतः औरपनिवेशिक युगीन आधुनिक बोध का संवाहक था। जिन शब्दों में बंगला में राष्ट्रवादी कविताओं के अग्रदूत ईश्र्वरचन्द्र गुप्त इत्यादि ने 1857 के विद्रोहियों ने लिखा है वह आज भले हमें शर्मिंदा करे पर उस युग में उस श्रेणी के लोगों के लिए यही उत्तम विचार थे। भारतेन्दु के परिवार ने 1857 के दौरान अंग्रेजों की मदद की थी इस बात को छुपाया जाना चाहिए? भारतेन्दु जब सात वर्ष के थे तो उन्होंने अपने परिवार वालों को दंगाइयों के विरोध में अंग्रेजों की मदद करते पया होगा! जो लोग 19 वीं शताब्दी के पूवार्द्ध में सारे देश में अंग्रेज और भारतीय शक्तियों के संघर्ष को ध्यान में रखेंगे वे महसूस करेंगे कि अंग्रेजी राज्य भारत में दो तरह की प्रतिक्रिया पैदा कर रहा था - साधारण लोगों के बीच अत्याचार और दमन के फलस्वरूप वितृष्णा का भाव और नवशिक्षित आधुनिक लोगों के बीच आशा का भाव। 1853 में (उसके पूर्व भी) कई अंग्रेज कम्पनी शासन के प्रति लोगों के आक्रोश से परिचित थे। एक अंग्रेज प्रशासक ने तो साफ तौर पर यह लिखा था कि इस देश के दो देश हैं - बहुसंख्यक लोग ब्रिटिशों के घृणा करते हैं और उसे भगाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं और दूसरा - अल्पसंख्यकों का जो ब्रिटिश कम्पनी शासन को एक सुयोग के रूप में देखता है।

1857 का विद्रोह बहुसंख्यक भारतीयों का विद्रोह था। अल्पसंख्यक आधुनिकों के लिए तो यह एक उपद्रव ही था। कालांतर में अल्पसंख्यक आधुनिकों ने समाज का नेतृत्व हासिल किया और राष्ट्रीयता के आधार के निर्माता बने इसीलिए इस राष्ट्रीयता में 1857 के लिए सकारात्मक भाव प्रायः नहीं था। 1920 के बाद गांधी युग में बड़ी संख्या में 'बहुसंख्यकों' के राष्ट्रीय होने के दौर में जो 'पॅराडाइम शिफ्ट' हुआ उसके फलस्वरूप ही 1857 के नायकों को प्रतिष्ठा मिली। पह यह भाव भी पूर्ण स्वीकार का नहीं था। क़ांग्रेसी नेतृत्व ने 1857 को आदर से स्मरण भले ही किया हो लेकिन उस अंग्रेज विद्वेषी चरमपंथी भाव को कभी भी मान नहीं दिया जिसके प्रतिनिधि 1857 के वीर थे। यही वह केन्द्रीय प्रश्न है जिसकी ओर ध्यान दिए बिना ही 1857 पर लगातार विचार किया जाता रहा है।

एक और प्रश्न 1857 में उठना स्वाभाविक है। 1857 के विद्रोह में धर्म की भूमिका कितनी अधिक थी। या फिर, मुसलमानों ने क्यों 1857 के आन्दोलन को ज्य़ादा जोरदार समर्थन दिया। विलियम डेलरिम्पल के दिल्ली सम्बन्धी अध्ययन को अगर प्रामाणिक माना जाय तो यह कहना गलत नहीं लगता कि 1857 का विद्रोह विद्रोहियों के लिए 'जेहाद' ही था। वे स्वयं को जेहादी कहते भी थे।

1857 को हम एक ऐसे आन्दोलन के रूप में याद करते हैं जिसमें हिन्दू और मूसलमान एक जुट होकर विदेशियों के विरूद्ध लड़े। ऐसे बहुत सारे दस्तावेज हमारे इतिहासकारों ने जुटाये हैं जिसमें हिन्दू और मुसलमान नेताओं ने देश की जनता में सामुदायिक सौहार्द बनाये रखकर अंग्रेजों की खिलाफत करने की बात की थी। मुसलमानों को क़ुरान-ए-पाक की सौगंध और हिन्दुओं को तुलसी-गंगाजल-की कसम जैसे प्रयोगों के आधार पर आम हिन्दु-मुसलमानों को लामबंद करने की चेष्टाएँ की गयी थीं, इसमें संदेह नहीं है। बहादुरशाह .जफ़र और लखनऊ के विद्रोही नेताओं के फरमानों को ध्यान से पढ़ने पर हमें कई नयी बातें समझ में आती हैं।

1857 की विरासत के संदर्भ में भी एक उल्टी-प्रक्रिया का उपयोग किया जाये। प्रश्न यह उठता है कि अगर क़ुरान और तुलसी एक होकर विदेशी ताकतों का मुकाबला करने के लिए तैयार हो गयीं तो आधुनिक हिन्दू और मुसलमान नेताओं में ऐसी ऐकता क्यों तैयार न हो सकी। सैयद अहमद खान ने 1857 की जो व्याख्या प्रस्तुत की और उसके लिए हिन्दुओं को जिम्मदार ठहराया उसे देखकर तो यही लगता है कि मुसलमानों में भी अंग्रेजों के समर्थकों की कमी न रही होगी। दूसरी ओर, हिन्दुओं के बड़े लोगों में अधिकतर अंग्रेजों के साथ थे, इसके संदेह नहीं। मनेजर पाण्डेय का यह सुझाव बिल्कुल सही ह कि जो लोग 1857 को प्रतिक्रियावादी जमींदारों और राजे-रजवारों के असंतोष को ही सबसे प्रमुख कारण मानते हैं उन्हें एक सूची .जरूर बनानी चाहिए जिसमें एक ओर उनलोगों का नाम दर्ज हो जिन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया और दूसरी ओर उनका नाम हो जिन्होंने अंग्रेजों का विरोध किया। कर्मेन्दु शिशिर ने यह माना है कि अधिकतर बड़े राजा-महाराजा लोग अंग्रेजों के साथ थे। उन्होंने यह बतलाया है कि कुंवर सिंह की जमींदारी डुमरांव राजा के अधीन थी और डुमरांव राजा ने 1857 में अंग्रेजों का साथ दिया। बिहार के ही शक्तिशाली महाराज - दरभंगा महाराज ने अंग्रेजों का साथ दिया। बंगाल के खत्री महाराज बर्दवान ने अंग्रेजों का पूरा साथ दिया। यह तो अवध के सन्दर्भ में रूद्रांशु मुखर्जी ने दिखलाया ही है कि विद्रोहियों में किस प्रकार बनियों के प्रति घृणा थी क्योंकि सेठ-साहूकार लोग अंग्रेजों का साथ दे रहे थे। जिन लोगों ने दिल्ली में हुई लड़ाई और दिल्ली पतन का इतिहास लिखा है वे बतलाते हैं कि खत्रियों और बनियों ने विद्रोहियों का साथ नहीं दिया। एक इतिहासकार ने ऐसी असंख्य अर्जियों का जिक्र किया है जिसमें सिपाहियों के विरुद्ध सरकार ने अपील की गयी थी। उन लोगों की इन अर्जियों पर और रोशनी डालने की जरूरत है। 1857 के इन सन्दर्भों को और अधिक विस्तार से चर्चा के केन्द्र में लाने के बाद ही चीजें और साफ होंगी। जो लोग फ्रांसीसी राज्य क्रान्ति के इतिहास से वाकिफ हैं वे जानते हैं कि जॉर्ज रूद (क्रड्ढदृद्धढ़ड्ढ ङद्वड्डड्ढ) द्वारा विश्लेषित विप्लवी भीड़/समूह (थ््रदृड) की भूमिका क्रांति के दौरान क्या थी। 1857 के सन्दर्भ में अगर सिपाहियों के मार्च पर ध्यान केन्द्रित किया जाये और इसके प्रति लोगों के बीच जो वातावरण पैदा हुआ उस पर ध्यान केन्द्रित किया जाये तो यह संभव है 1857-58 के दौर के इतिहास का एक जीवंत चित्र उभर सके। रामविलास शर्मा से लेकर देवेन्द्र चौबे और रश्मि चौधरी जैसे विद्वानों ने कुंवर सिंह की सेना के जगदीशपुर से शुरू होकर उत्तर भारत की परिक्रमा करते हुए वापस वहीं पहुंचने की यात्रा के प्रभाव पर चर्चा की है। इतिहासकार गौतम भद्र सेना के इस 'मार्च' को बहुत महत्त्वपूर्ण मानते हैं। इस प्रकार के प्रसंगों को कम महत्त्वपूर्ण मानकर विद्रोह के अंतिम परिणाम पर ही ध्यान केन्द्रित करना इतिहास के उन अंशों को छुपाना है जिससे भारतीय इतिहास को देखने-समझने की एक वैकल्पिक दृष्टि का निर्माण संभव है। इतिहास की एकरेखीय व्याख्या से आगे बढ़कर यह देखने की जरूरत है कि जनमानस में 1857 का जो प्रभाव लगातार बना रहा और जिसकी अनुगूंज लोक कथाओं और लोग गीतों में लगातार सुनायी देती है उसका इतिहास किस प्रकार लिखा जा सकता है। खतरा यह है कि भारतीय इतिहास का जो तानाबाना हमारे बौद्धिकों के बीच प्रचारित है वह इस नयी दृष्टि को महत्त्व देने के बाद बिखरने लगेगा। दरअसल, यह प्रस्तावित किया जा सकता है कि राष्ट्रवाद की पूरी धारणा भारतीय सन्दर्भ में मध्यवर्गीय सन्दर्भों में ही निर्मित और प्रचारित होती रही है। 1857 ही क्यों उसके पूर्व से ही हमारे देश में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रतिरोधों का जो इतिहास रहा है उनको ज्य़ादा महत्त्व मिलना चाहिए। एडवर्ड सईद भारतीय इतिहास के बहुत बड़े ज्ञाता भले न हों लेकिन वे एक बात पते की कह गये कि भारतीयों का संघर्ष साम्राज्यवाद के विरूद्ध उसी दिन शुरू हो गया जिस दिन अंग्रेजी शासन यहां शुरू हुआ।

उर्दू के एक पत्रकार ने मुर्शिदाबाद की अपनी यात्रा का उल्लेख किया है। वे जिस गाड़ी से जा रहे थे उसके ड्राइवर ने एक जगह गाड़ी की स्पीड एकदम से ते.ज कर दी। पत्रकार ने पूछा कि ऐसा उसने क्यों किया। ड्राइवर ने बतलाया कि उस जगह हर ड्राइवर ऐसा ही करता है क्योंकि वहां मीरजाफर की कब्र है! 1757 के दो सौ पचास वर्ष बाद भी गद्दार मीरजाफर की जिस देशद्रोही छवि को वह ड्राइवर ढो रहा है उसमें राष्ट्रवाद कहीं है या नहीं? अगर है तो उसका इतिहास कहां है? उत्तर भारत के किसी भी हिस्से में जाइये आपको ऐसे असंख्य लोक गीत मिलेंगे जिनमें 1857 के विद्रोही नेताओं के शौर्य की अशेष गाथाएं होंगी। दिलचस्प बात यह है कि इन विद्रोही नेताओं की सूची लगातार बढ़ती जा रही है ऐसा तब जबकि इतिहासकारों के बीच 1857 के विद्रोही देशभक्त के रूप में नहीं बलवाई के रूप में ज्य़ादा रहे। आज भी समस्त उत्तर भारत में जो कैलेंडर सबसे ज्य़ादा बिकते हैं उनमें क्रान्तिकारी वीरों की तस्वीरें होती हैं। ये छवियों करोड़ों भारतीयों की राष्ट्रीय भावनाओं की अभिव्यक्ति हैं जिसका इतिहास अभी और लिखा जाना है, नये दृष्टिकोण से लिखा जाना है।

[वसुधा, 1857 अंक]

अनय के कथा संसार पर एक नज़र

अनय, तीसरा विभाजन् (कहानी संग्रह), समन्वय प्रकाशन, गाजियाबाद, 2008 (मू.175 रू.).


हाल के वर्षों में सबाअल्टर्न (वंचितों-उपेक्षितों) और हाशिये के समाजों को समझने के लिये उनके दिन-प्रतिदिन के संघर्षों और आकाक्षा-अभिलाषा को प्रतिबिंबित करते साहित्य को बहुत महत्त्व दिया गया है. गायत्री चक्रवर्ती स्पिवैक ने महाश्वेता देवी के साहित्य को आधार बनाकर इतिहासकारों के समक्ष यह प्रश्न रखा है कि “ क्या सबाआल्टर्न अपने लिये खुद बोल सकते है?” इस क्रम में बंगाल में रहने वाले हिन्दी भाषी समाज या हिन्दुस्तानी समाज के सांस्कृतिक अध्ययन के लिये जिस रचनाकार का साहित्य हमारे लिये सबसे ज्यादा उपयोगी हो सकता है उसमें अनय का नाम लिया जा सकता है. उन्होंने कम कहानियां लिखी हैं और उनकी लेखकीय पहचान उनके व्यंग्यकार रूप से ही अधिक है. पहले रविवार और फिर जनसत्ता के लोकप्रिय व्यंग्यकार के रूप में वे अधिक जाने जाते हैं. कम लोगों को यह पता है कि अनय ने वामपंथ की राजनीति पर रविवार के दिनों में खूब लिखा था और उसके बाद भी जब जब उन्होंने लिखा लोगों ने गंभीरता से उसे लिया. जनसत्ता में छपे बंगाल के हिन्दी भाषी समाज पर उनका लम्बा आलेख आज भी याद किया जाता है. उनकी कहानियां पत्र पत्रिकाओं में पिछले चार दशकों से छपती रही हैं लेकिन अब तक उनका कोई कहानी संग्रह नहीं छपा था. यह संग्रह अनय का पहला संग्रह है लेकिन एक कथाकार के रूप में वे कलकत्ते में परिचित हैं. उनकी कहानियों का पाठ विभिन्न संस्थाओं ने कई कई बार किया है और एक कहानी –‘तीसरा विभाजन’ का पाठ और उसपर चर्चा तो बहुत अधिक हो चुकी है. यह सुखद है कि अनय की कहानियों के एक गल्प-गुच्छ से हिन्दी समाज एक साथ इस पुस्तक से परिचित हो सकेगा. एक कहानीकार के रूप में अनय का मूल्यांकन हो सके इसके लिए इस संग्रह की विशेष जरूरत थी.

अनय के कथा संसार में पात्र साठ के दशक से लेकर नब्बे के दशक के हैं. इस अर्थ में वे आदर्शवादी युग, मानस और भाव-बोध के साहित्यकार हैं. वे वैचारिक रूप से वामपंथी हैं और साठ के दशक से अगले तीस पैंतीस सालों के सामाजिक-भावनात्मक परिवर्तनों की एक प्रगतिशील व्याख्या करते हैं. उनके भाव-बोध का निर्माण जिन तत्त्वों से हुआ है उनमें हिन्दी प्रदेश के संस्कार, ग्राम्य जीवन दर्शन के प्रति मोह, सांस्कृतिक मूल्य-बोध के प्रति असाधारण आस्था आदि तत्त्वों का एक अद्भुत समावेश है जो उनकी कहानियों को हिन्दी समाज के बौद्धिक मानस का एक दस्तावेज बनाता है. ये कहानियां अपने पाठकों से एक दृष्टि की मांग करती हैं. अगर पाठक इन कहानियों को सामान्य ढंग से पढेंगे तो ये ‘सरल’ कहानियां लगेंगी, लेकिन ये कहानियां बहुत जटिल भावबोध को अभिव्यक्त करती हैं. उनके पात्र अपने ‘समय’ से कैसे हारते हैं और कैसे ‘समय’ के दबावों से मुक्त करने वाली संभावनाएं हमारे समय के जटिल यथार्थ को व्यक्त करती हैं –पूर्णत: नहीं, अंशत: यह अनय की तीसरा विभाजन की कहानियों से समझा जा सकता है.

इन कहानियों में पहली और शायद सबसे ‘पूरी’ कहानी है ‘समय सूर्य’ जिसमें एक क्रिश्चियन कालेज में एक मैकाले की संतान अंग्रेज़ी पढाने वाले प्रो सेन के भीतर कालेज के चपरासी के कुत्ता पालने से उत्पन्न क्र्रोध को व्यक्त किया गया है. प्रोफेसर साहब बदलते समय को समझ नहीं पाते और अतीत के दौर में रहे अपने ‘स्टेटस’ को खोते देख चपरासी को पीट देते हैं. समय बदल चुका है. कालेज में हडताल हो जाती है. प्रोफेसर लोग सेन से सहानुभूति रखकर भी कुछ नहीं कर पाते और स्वाभिमानी प्रोफेसर को गरीब चपरासी से माफी मांगनी पडती है. इस कहानी के दो वाक्यों को देखें- प्रिंसिपल द्वारा सेन के बारे में यह कहना “ अतीत में जीने में उन्हें मलबा ही मिलेगा”; और कहानी के अंत में मिस्टर सेन को माफी मांगने के बाद “ मिस्टर सेन को बंसी (चपरासी) का आधार बढता नजर” आना. कहानीकार इन दोनों वाक्यों के साथ खड़ा दिखाई देता है. इस कहानी में व्यक्त भावों को ध्यान से देखने से यह साफ लगता है कि कहानीकार सेन महाशय के ‘एलियेनेशन’ से उत्पन्न आवेग को समझ रहे हैं और समय सूर्य के सामने उनके झुकने की आंतरिक पीडा को समझते हैं.

एक अनुमान किया जा सकता है कि यह कहानी सत्तर के आसपास लिखी गयी होगी. इसके तीस साल (अगर यह अनुमान सही है) बाद की कहानी ‘तीसरा विभाजन’ एक दूसरे तरह की पीडा को व्यक्त करने वाली मार्मिक कहानी है. इस कहानी की प्रशंसा आलोचक ज्योतिष जोशी और प्रफुल्ल कोलख्यान ने भी की है. यह निश्चित रूप से अनय की सर्वश्रेष्ठ कहानी है. इस कहानी को एक निहायत सपाट और भावुक कहानी के रूप में पढे जाने का भी भय है. एक गनी पहलवान है जो देश विभाजन के बाद तीन साल तक उन्नाव जिले में रहकर अंतत: पूर्वी पाकिस्तान जाने का निर्णय लेता है. उसके चेले उसे रोकने की कोशिश करते हैं, लेकिन उसका ईमान कहता है कि उसे मुसलमानों के अलग देश पाकिस्तान बन जाने के बाद यहां से चले जाना चाहिये. वह दो बरस के बेटे को लेकर बंगलादेश चला जाता है. समय उसे बांटने की कोशिश करता है उसे अपने ऊपर हुई ज़्यादतियों के बारे में बतलाने के लिये कहता है. बाद में जब उसका बेटा जुम्मन बड़ा होता है और महसूस करता है कि उसे यहां उसकी पहचान नहीं, वह तो बिहारी है और उसका घर तो वहां उस पार –उन्नाव में है वह यहां आता है. वापसी की इस यात्रा में वह सब कुछ मिट गया है जिसके सहारे वह अपने को पा सके. हिन्दू मुसलमान के बीच विभाजन इतना पक्का हो गया है कि अब लोग हिन्दू होकर गर्व करने लगे हैं और सिर्फ बूढों को याद है कि इस इलाके में कभी गनी चालीसा भी होता था. लोग उसे पाकिस्तानी समझ कर पुलिस स्टेशन ले जाते हैं और जुम्मन देखता है कि पुलिस स्टेशन उसके पुरखों के कब्रिस्तान के बिल्कुल पास में है. जुम्मन दु:ख के इन क्षणों में हंसा- “दादा की कब्र पुलिस की हिफाजत में है.”

कहानी इस बिन्दु पर आकर उस ओर बढती है जिससे इस कहानी का एक नया अर्थ उभरता है. एक बुढिया की आवाज आती है- “ दारोगा जी वह गनी पहलवान का लड़का है. मैंने गनी पहलवान को जाते समय वापस आने के लिये कहा था. गनी ने अपने लडके को भेजा है. वह अपने घर आया है.” इस समय कहानीकार ने लिखा है- “ जुम्मन का सारा डर दूर हो गया. न जाने कितने युगों से यह वह आवाज़ सुनने के लिए ज़िंदा था. वह अपने घर आया है.”

यह कहानी विखंडन की तकनीक की मांग करती है. पहचान और जुडाव मनुष्य के लिए कितना ज़रूरी है जिसे धर्म की चौहद्दी में समेटा नहीं जा सकता. यह उन्नाव के उस जिले की बात है जहां एक पंडित चेले को लगता है कि 1950 के बाद, गनी पहलवान के जाने के बाद “ छंगा पंडित के जीवन में कुछ नहीं हुआ”. उस चंदनधारी पंडित ने गनी पहलवान के बाद लंगोट नहीं पहना. उसने अपना लंगोट पेड़ पर टाँग दिया जो बरसों गनी उस्ताद की याद में रोता रहा. वह लंगोट उस सेक्युलर सांस्कृतिक देश का परचम हो सकता है जिसमें हिन्दू पट्ठे मुसलमान उस्ताद के बिना बदनपुर में जाना तक गवारा नहीं करते. बदनपुर के बदन की लंगोट तो गनी पहलवान थे! यह एक क्लैसिक कहानी है. जिसकी प्रत्येक पंक्ति को अलग अलग पढ़ कर भी कहानी के मर्म तक पहुंचा जा सकता है. किसी दार्शनिक ने कहा है कि मनुष्य के भीतर एक हार्ड डिस्क होता है जिसे कभी भी नष्ट नहीं किया जा सकता है. मनुष्य चाहे कितना भी गिर जाये, झेल जाये, बदल जाये यह “ अनकरेप्टेबुल” रहता है. यह हार्ड डिस्क ही है जो देश के साथ जोड नहीं बना पाता, अपनी बेटी को बँगला पढाते देख दुःखी होता है. जुम्मन की स्मृति में ही उसका सांस्कृतिक लोकेशन है. उस स्मृति के भीतर का कोना कोना झंकृत हो उठता है उस आवाज से जो बुढिया की आवाज है. इस आवाज को सुनकर जुम्मन का सारा डर दूर हो जाता है. उस आवाज को शायद थाने के बाहर कब्रों में दबे जुम्मन के पुरखों ने भी सुना होगा तभी तो कहानीकार ने लिखा है- “ न जाने कितने युगों से वह यह आवाज सुनने के लिए जिंदा था.”

ऐसी कहानियां बरसों में कभी लिखी जाती हैं.

इन दोनों कहानियों को एक साथ पढते हुए साफ लगता है कि कहानीकार ने एक लम्बी सांस्कृतिक यात्रा तय की है.

संग्रह की कुछ अन्य कहानियां अलग धरातलों पर हैं. अनय जी ने बहुत नज़दीक से अपने समाज के विस्थापित लोगों की व्यथा को देखा है और उसकी राजनीति की असलियत को समझा है. ‘अनादि दास का क्या हुआ?’ कहानी तो मानो सत्यकथा का बयान हो. पर यह सत्यकथा से भी ज़्यादा है. शिल्प की दृष्टि से यह बहुत कसी हुई कहानी है और भाषा भी बहुत सटीक है. किसी समय का क्रांतिकारी जिन्हें देखकर पुलिसवाले भाग खडे होते थे और धनीमानी लोग मूत देते थे जब पुलिस की मार से नामर्द बनकर और क्रांति प्रयास के विफल होने के बाद विपत्ति में पडकर अपने परिवार के भरण पोषण के लिये कुछ हाथ पैर मारते हैं और अपने साथी से मिलते हैं तो पाते हैं कि वे बदल गये हैं. एक मित्र जो “ बीवी की पहरेदारी में रहने लगा है” के चेहरे पर आंखें गडा कर अनादि ने अनुभव किया- “ यह आदमी जरूर शनिवार को दो-तीन पैग दारू पीता होगा. मंगलवार को किसी धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होता होगा. दस लाख का ऋण लेकर , यह कारबार की दुनिया में पैठ गया है, इसे करोड की चिंता है.” अनादि और काली के रूप में दो क्रांतिकारी इस कथा में उभरते है. एक अनादि है जो वामफ्रंट के युग में जानपहचान का फायदा लेना मुनासिब समझता है लेकिन अनादि इसके लिये तैयार नहीं हो पाता. बंगाल में वामफ्रंट के युग में उन वामपंथियों को तो लाभ लेने का हक है ही जिन्होंने पहले बहुत कष्ट उठाया है यह बात गलत है या सही यह प्रश्न यह कहानी छोड जाती है. कुछ अन्य कहानियां- ‘कालबैसाखी’, ‘ओ बुढिया भाग’ और ‘अंधी सुरंग’ भी अनय के कथा संसार को विस्तृत आयाम देती हैं. ‘अंधी सुरंग’ का एक मुसलमान प्रोफेसर भाडे के मकान के लिए जिस तरह कलकत्ते में भटकता है वह हमारे प्रगतिशील समाज के भीतर पलने वाले दुराग्रहों को बडी बारीकी से पकडता है. यह बहुत प्रसन्नता की बात है कि अनय जी ने हमें आखिरकार एक कथा संग्रह दिया है. जिन बातों को वे हमारे सामने रखते हैं उसेके पूरे परिदृश्य को सामने रखने के लिये एक उपन्यास की अपेक्षा तो कम से कम की ही जा सकती है. वामपंथी ट्रेड यूनियन, बस्ती पालिटिक्स, बंगलादेशी लोगों की कथा व्यथा और असंगठित श्रमिकों की करूण अवस्था आदि विषयों पर लिखते हुए अनय जी जिस गहरी समझदारी और साहित्यिक विवेक का परिचय इन कहानियों में देते हैं उसे देखते हुए एक क्या अनेक उपन्यासों की उम्मीद हिन्दी पाठक समाज कर सकता है.
[वागर्थ, मार्च 2009]

Friday, 21 August 2009

1857 के विद्रोह का इतिहास

1857 के विद्रोह के अध्ययन के सन्दर्भ पर कुछ बेतरतीब नोट्स
हितेन्द्र पटेल


भारत में तीन तरह के इतिहास लेखन होते रहे ह- अकादमिक, प्रेरणादायक आर योगदान को रेखांकित करने वाला इतिहास। इन तीनों प्रकार के इतिहासों की अपनी अलग महत्ता ह आर यह उनके पाठकों पर निर्भर करता ह कि उनके लिये कान सा इतिहास 'सच्चा' ह। तीनों प्रकार के इतिहासों के बीच 1857 के विद्रोह के अध्ययन को लेकर जो विरोध ह उसको ध्यान में रखे बिना इस विषय पर उपलब्ध विपुल सामग्री से मनमाने निष्कर्ष निकालने का सिलसिला चल रहा ह। इस लेख को इसी पीड़ा को महसूसते हुए लिखा गया ह कि इनमें से कोई भी पद्धति इस बात को याद रखने की .जरूरत महसूस नहीं करता कि 1857 का इतिहास लिखते हुए हम प्रायः वर्तमान को ही उसके इतिहास पर प्रक्षेपित कर रहे होते ह। यह कहा जाता रहा ह कि इतिहास किसी भी सूरत में उपलब्ध नहीं होता, वह खो जाता ह, फिर कभी वापस नहीं आने के लिये।
1857 का इतिहास जिस रूप में पेश किया जाता रहा ह आर लगातार यह सिलसिला चल रहा ह उसकी पृष्ठभूमि को समझने के बाद यह स्पष्ट होने लगता ह कि अकादमिक इतिहास भी एक प्रकार की प्रेरणा आर विशेष प्रकार के योगदान को ही रेखांकित करता ह। जसे जसे योगदान आर प्रेरणा के परिदृश्य को सामने रखने वाला इतिहास ज्य़ादा लोगों द्वारा स्वीकृत होता जायेगा वही असली इतिहास बनता जायेगा। हाल फिलहाल तक देश भर में जो राष्ट्रवाद की विचारधारा का वर्चस्व था वह अब एक नयी विचारधारा - दलित विचारधारा से उलझ गया ह। इस विचारधारात्मक वर्चस्व की लड़ाई का जो भी परिणाम निकले, इसने यह तो तय कर ही दिया ह कि राष्ट्रवादी इतिहास में बहुत कुछ जानबूझ कर छुपाया गया ह।
1857 के विद्रोह पर विचार करने की अपनी आर भी दिक्कतें ह। अगर इस दलित आक्रमण की बात को न.जरअंदा.ज भी कर दें तो भी कई मुश्किलें पेश आती ह। एक बड़ी समस्या यह ह कि कोई भी अपने अंचल को दाग़दार नहीं देखना चाहता। 1857 में अगर इस तरह से राष्ट्र अंग्रे.ज विरोधी हो उठा था तो हम हार कसे गये? राजनीति का रोग अब इतिहास में भी पसर गया ह- येन केन प्रकारेण अपने योगदान को ज्य़ादा महत्त्वपूर्ण बनाकर पेश करना। इतिहास में एक पाठ जो सबको सिखाया जाता ह वह ह कि घटना का एक सन्दर्भ होता ह जो विगत समय के साथ घटना के सम्पर्क के अध्ययन से विश्लेषित होता ह।मूल समस्या यहीं से शुरू होती ह। बहुधा 1857 के पूर्व के भारत मे अगरे.जी राज के खिलाफ हुए विद्रोहों आर आर प्रतिवादों को भुला दिया जाता ह। कुछ कम्युनिस्ट समर्थक लेखकों को छोड़कर कोई इस बात की चर्चा नही करना चाहता ह कि 1757 से लेकर 1857 के बीच जो असंख्य किसान विद्रोह हुए थे उसमें किसी प्रकार की राजनतिक चेतना थी कि नहीं ? अगर ये किसान-आदिवासी लोग संगठित होकर विद्रोह कर रहे थे तो उसका बाद के समय से क्या राजनतिक रिश्ता बनता ह?
अकादमिक इतिहास में वही चलता ह, टिका रहता ह, जो बड़े इतिहासकार हमें बतलाते ह। भारत के इतिहास लेखन की सबसे बड़ी विडंबना यही रही ह कि यह समय के शक्तिशाली विचारधारा के प्रभाव में रहकर भारत के इतिहास को पेश करता रहा ह। एक समय यह साम्राज्यवादी, आर फिर राष्ट्रवादी प्रभावों को लेकर चलता रहा ह। दिक्कत यह ह कि इन दोनो दृष्टियों में उद्देश्य अलग होने के बावजूद कुछ एसी समानताएं ह जिससे प्रतिरोध के इतिहास का एक बड़ा इलाका छूट जाता ह। राष्ट्रवाद बनाम आपनिवेशवाद
के समीकरण म ये फिट नहीं होते क्योंकि दोनों ही प्राक्‌-आधुनिक सन्दर्भों के साथ आधुनिक समय को जोड़कर नहीं देखते। प्राक्‌-आधुनिक दोनों के लिए अंधकार का समय ह, पूंजीवादी आधुनिक समय के आने के पहले से चली आ रही ची.जें ज्य़ादा महत्व नहीं पाती। .जमींदार अत्याचारी थे, ब्राह्मण अनाचारी, बनिए क्रूर सूदखोर थे आर यह समाज ( जिसे बाद में भारत बनना था) बहुत ही बंटा हुआ एक पिछड़ा समाज था, जसी तमाम ची.जें हमारे पूरे मानस पर हावी रही ह कि 1857 के सन्दर्भों में आये ब्रिटिश विरोधी प्रतिरोधों के साथ बाद में आये '' राष्ट्रवाद'' को जोड़ना उन्ह परेशान करता ह। एक समाज शास्त्री ने टिप्पणी की ह कि आधुनिक राष्ट्रवाद भारत में एक ''डेरिवेटिव'' ( पराश्रित) विमर्श ह। यानि भारतीय आधुनिक राष्ट्रवाद ने आधुनिक यूरोपीय विमर्श पर निर्भरशील विचारधारा के रूप में अपना विकास किया। आर फिर इस राष्ट्रवाद का स्वरूप 1920 के दशक में जाकर अपना पूर्ण स्वरूप पाता ह। 1870 के दशक से 1920 के दशक के 50-60 वर्षों में यह जो राष्ट्रवाद निर्मित हुआ वह एक एसे बोध से आया था जो तत्त्वतः यूरोपीय आधुनिक विमर्श से गहरे स्तर पर जुड़ा हुआ था।
1857 इस अर्थ में एक 'प्राक आधुनिक' राजनतिक विद्रोह था जिसने एक आधुनिक सत्ता को चुनाती दी थी। यानि 1857 के विद्रोह की जय का एतिहासिक अर्थ होता एक एसी शक्ति की जय जो समाज के विकास के लिये, प्रगति के लिये बाधक होने वाली शक्ति की जीत। विद्रोही एक 'पगली' हवा में 'कुपथ' पर चल पड़े थे। भारत में जो 'इंटेलिजेंसिया' उभर रहा था उसके लिये 1857 के बाद विक्टोरिया की घोषणा ने एक बड़ी आशा को जन्म दिया कि नया समाज बनेगा। एक महत्त्वपूर्ण हिंदी लेखक का एक वक्तव्य जो 1907 में छपे इस लेख से लिया गया ह इस भाव को ही सामने रखता ह- '' सन 1858 ई की राज घोषणा से यहां की प्रजा को यह दृढ विश्र्वास हो गया था कि वास्तव में अंग्रे.जी शासन का अभिप्राय निःस्वार्थ भाव से केवल भारतोन्नति मात्र ह।'' 1870 से 1907 के बीच के हिंदी साहित्य से द.र्जनों उद्द्धरण दिये जा सकते ह जो इसी भाव को प्रगट करते ह
कुछ अर्थों में 1857 का विद्रोह हिन्दुस्तान के अंत आर भारत के जन्म को 'सिग्निफ़ाई' करता ह। जो इस विद्रोह के पक्ष में थे आर जो विपक्ष में थे उनकी चेतना में फर्क था। हिन्दुस्तान के अपने पचड़े थे, अपने तरह की विडंबनाएं थीं, लेकिन उस समाज के पास जो सांस्कृतिक स्मृति थी उसमें कोई हिन्दुस्तानी- हिन्दु, मुसलमान, अछूत कोई भी, अपना था, आर अंग्रे.ज विदेशी थे। विदेशी उनके लिए अलग थे। भारत के साथ जो एक बोध आया उसमें ये बातें क्रमशः मिटती रहीं आर इसी के साथ हिन्दुस्तान भी मिटता रहा।
भारत में इंटेलिजेसिया का उद्भव आधुनिकता के दबाव के कारण हुआ। यह वर्ग शुरू से ही विरोधाभासी तत्त्वा को लेकर चलता रहा। परंपरा आर आधुनिकता के बीच झूलते इस ''सुपर क्लास'' ने भी अपने समय की शक्तिशाली विचारधारा को शक्तिशाली बनने में मदद की। इस बात को स्पष्ट करने के लिए एक उदाहरण पर विचार किया जा सकता ह। फकीर आर सन्यासी विद्रोह पर विचार करते हुए ए एन चन्दर ने 1763 से 1800 के बीच सात चरणों का उल्लेख किया ह। पहले चरण में ही इस बात का उल्लेख मिलता ह कि 5,000 सन्यासी सारन जिले में प्रवेश कर गये थे। इसी सन्दर्भ में 1789 से लेकर 1831 के बीच मुंडाओं के अनेक आन्दोलनों का .जिक्र किया जा सकता ह। 1832 से लेकर 1955 तक के आदिवासी विद्रोह की चर्चा तो अब पर्याप्त होने ही लगी ह। इसके अलावा मालाबार के मोपला विद्रोह की चर्चा भी होती रही ह जिसने 80 बरसों तक किसानों का आन्दोलन .जारी रखा। इन आन्दोलनों के बारे में, टीपू सुल्तान के बारे में, मद्रास के सनिक विद्रोह के बारे मे, 1824 के बरकपुर में हुए सनिक विद्रोह के बारे
मे विचार करते हुए क्या इस बात पर संदेह व्यक्त किया जाना उचित नहीं ह कि 1857 की एक उर्दू पत्रिका में अजीमुल्ला खान की यह छपी यह 'आ.जादी का झंडा' कविता उस समय नहीं लिखी गयी। कविता की ये पंक्तियां अगर 1857 की लिखी हों तो निश्चित ही विद्रोही अपने देश के लिये लड़ रहे थे आर वे ब्रिटिश कम्पनी के विरूद्ध हिन्दू -मुसलमान एकता के महत्त्व को भली भांति समझते थेः
''हम ह इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा, पाक वतन ह काम का जन्नत से भी न्यारा।
....
आया फिरंगी दूर से एसा मंतर मारा, लूटा दोनो हाथ से प्यारा वतन हमारा।
आज शहीदों ने तुझको अहले वतन ललकारा, तोड़ो गुलामी की जं.जीरें बरसाओ अंगारा।
हिंदू, मुसलमां, सिख हमारा भाई-भाई प्यारा,
यह ह आ.जादी का झंडा, इसे सलाम हमारा''
यह संभव ह कि इस कविता को बाद में थोड़ा बदला गया हो लेकिन जो भावनाएं इसमें व्यक्त उस समय की हो सकती ह। खुद मंगल पाण्डे का अपना वक्तव्य ही इसी त.र्ज पर ह।
1857 के कुछ वर्ष पूर्व एक अंग्रे.ज ने एक टिप्पणी की थी जिसे ध्यान में रखना उचित होगा। उन्होंने कहा था कि भारत के कुछ लोग इस कम्पनी राज से प्रभावित ह आर मानते ह कि यह शासन अच्छा ह लेकिन एसे लोगों की संख्या कम ह। अधिकतर लोग अंग्रे.जों से घृणा करते ह आर किसी भी तरह से उन्हें यहां से मार भगाना चाहते ह।1880 के दशक में एक समाचार पत्र में छपा था कि भारत में तीन प्रकार के राष्ट्रवाद ह- एक उदारनतिक, दूसरा हिंदू आर तीसरा मुस्लिम। क्या यह प्रस्तावित किया जा सकता ह कि अंग्रे.ज विद्वान के 1857 के पूर्व के वक्तव्य आर 1880 के दशक में कलकत्ता के एक अंग्रे.जी समाचार पत्र में छपे इस लेख के बीच कोई कोई वक्तव्य छुपा हो सकता ह ?
यह बहुसंख्यक भारतीयों का राष्ट्रवाद ही था जो कालांतर में विविध रूपों में- कभी धर्म के नाम पर, कभी गो-रक्षा इत्यादि के नाम से व्यक्त होता रहा। इस बहुसंख्यक अंग्रे.जों से घृणा करने वाले भारतीयों के राष्ट्रीय होने के इतिहास पर गहरे स्तर पर विचार होना चाहिये। दरअसल उन्नीसवीं सदी के इतिहास को लेकर दो बड़ी समस्याएं ह। पहली समस्या ह कि जो राष्ट्रवादी विचारधारा का निर्माण कर रहे थे वे एक साथ अपनी जाति आर अपने धर्म के लिये भी काम कर रहे थे। उनके लिये हिन्दू धर्म, जाति धर्म आर राष्ट्रीय धर्म तीनों एक साथ चलते थे। एसे बहुत सारे लोग थे जिनके लिये हिन्दू जाति के संगठन का दायित्व, हिन्दुओं द्वारा वर्णाश्रम धर्म का पालन दोनों ही राष्ट्र निर्माण के लिये .जरूरी थे। जिसे हिन्दी नवजागरण से जुड़े हिन्दी इंटेलिजेंसिया की विचारधारा को ठीक से समझना हो उन्हें बलिया में भारतेन्दु के भाषण की तुलना में प्रताप नारायण मिश्र के 'हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान' या प्रेमघन के 'हिन्द, हिन्दू आर हिंदी' पर ज्य़ादा ध्यान देना चाहिये। यह सही ह कि हिंदी इंटेलिजेंसिया के लेखन में पूरी तरह आपनिवशिक शासन का स्वीकार नहीं ह आर वे कई मामले में असन्तुष्ट ह आर वे भारतवर्ष की दरिद्रता पर व्यथित भी थे। लेकिन, उनके असंतोष का एक प्रमुख कारण यह भी था कि उनके सनातन धर्म का मान घटता जा रहा था आर परम प्रतापी अंग्रे.ज शासन द्वारा हिंदू हित का ध्यान न रखकर विधर्मी यवन के प्रति सदय बने हुए थे।
दूसरी बड़ी समस्या यह ह कि आपनेवशिक शासन के प्रभाव से भारतीय समाज पर पड़ने वाले दबावों आर उसके परिणामस्वरूप आये वचारिक बदलावों को समझने के लिये नवजागरण से जुड़े लोगों के द्वारा समझने की कोशिश करना। यह प्रस्तावित किया जा सकता ह कि हिंदी नवजागरण हिंदी समाज में हो
रहे परिवर्तनों को एक सीमा तक ही समझने में सहायक हो सकता ह। निम्न वर्गीय (या निम्न वर्णीय) इतिहास के प्रसंगों को लाने से स्पष्ट हो जाता ह कि हिंदी समाज कई स्तरों पर आपनिवशिक दबावों से जूझ रहा था।भारतेन्दु के पिता का घर 1857 के दारान विद्रोहियों के खिलाफ लड़ रही सेना के अस्त्रागार का काम करता था। 1857 के एक इतिहासकार ने स्वीकार किया ह कि अवध के सिपाही बनियों से बड़ी नफरत करते थे क्योंकि उन्होंने अंग्रे.जों की बड़ी मदद की थी। भारतीय राष्ट्रवाद के अंदरूनी संघर्षों को, अंतर्विरोधों को ध्यान में न रखकर हम उन्नीसवीं शताब्दी के इतिहास की एकांगी व्याख्या ही कर पाते ह। क्या भारतेन्दु के युग के निम्न जाति के लोग सोचते विचारते थे ? उनके सोच को सामने लाने के जो थोड़े प्रयत्न बद्रीनारायण, साधना इत्यादि जसे लोगों ने किया ह उससे तो साफ लगता ह कि बहुत सारी बातें ह जिसको समझने के लिये लिखित श्रोतों से आगे जाकर देखने की .जरूरत ह। यह देखने की .जरूरत आर भी अधिक इसलिये भी .जरूरी हो गया ह क्योंकि राष्ट्रवाद को चुनाती देने के लिये आज दलितवाद एक शक्तिशाली विचारधारा के रूप में उभर चुकी ह आर उसने राष्ट्रवाद के इतिहास को सवर्ण हिन्दू मानस की निर्मिति के रूप में देखने की शुरूआत कर दी ह।
हिन्दी में 1857 के इतिहास पर असंख्य पुस्तकें हें, पर प्रभाव की दृष्टि से 1907 में सरकार द्वारा सहयाग मिलने के पूर्व तक के समय में जिन पुस्तकों का सबसे व्यापक प्रभाव रहा ह वे हः
रामविलास शर्मा, भगवानदास माहार , वृन्दावनलाल वर्मा, के के दत्त, दुर्गाशंकर सिंह की पुस्तकें। हाल के वर्षों में प्रदीप सक्सेना, कर्मेन्दु शिशिर, रश्मि चाधरी जसे विद्वानों ने भी 1857 पर गंभीर शोध कार्य किये ह। इन सभी पुस्तकों की एक बड़ी सीमा ह कि इसमें दो चेतनाओं - हिन्दुस्तानी आर भारतीय के बीच एक असहज समन्वय दिखलाकर, कई असुविधाजनक सवालों को दबाकर, आधुनिक नवजागरण की अवधारणा के सहारे इतिहास को देखने की कोशिश। नवजागरण के चरित्र पर यहां चर्चा संभव नहीं, लेकिन जिस तरह से इन लोगों ने राममोहन राय, बंकिम, भारतेन्दु की चेतना से मंगल पाण्डे, नाना साहब, बहादुरशाह .जफर, कुंवर सिंह इत्यादि की चेतना को जोड़ने की कोशिश की ह उससे हम मन कितना ही प्रसन्न हो वह एतिहासिक रूप से भ्रामक ह। इस ''राष्ट्रवादी'' मोह ने तत्वतः इंटेलिजेंसिया के उसी प्रोजेक्ट को स्वीकार किया जिसमें भारत के आने के आपनिवेशिक, प्राच्य-वादी को इतिहास की गति के रूप में स्वीकार किया गया था। जिस राष्ट्र के निर्माण में इंटेलिजेंसिया जुटा रहा वह एक एसे राष्ट्र का की कल्पना थी, जो बुनियादी रूप से समाज को एक नये सांस्कृतिक धरातल को तयार कर रहा था जिसमें राज्यसत्ता के हाथ में सामाजिक, राजनतिक आर आर्थिक शक्तियों का जाना देर-सवेर तय था। इसके फलस्वरूप इंटेलिजेंसिया ने जिस राष्ट्रवाद को प्रतिष्ठित किया वह दमनकारी पूंजीवादी आधुनिक व्यवस्था के लिए कटिबद्ध था। देश का जो अर्थ कुंवर सिंह या उनके लिए होता था उसके मायने समझने की समझदारी लोक में धकिया दी गयी आर वहां उनकी उपस्थिति बनी रही। एसे बहुत सारे नायक इस हिन्दुस्तान के कोने कोने में रहे होंगे जिन्हें लोक परंपराओं में तो प्रतिष्ठित पाया जाता ह लेकिन जिसकी स्वीकृति इस नये राष्ट्रीय चेतना में नहीं ह। उन्नीसवीं सदी की इसी दोहरी मानसिकता के दर्शन हमें किसी भारतीय भाषा में 1857 के विद्रोह के पहले इतिहासकार रजनीकांत गुप्त के इस कथन में होती ह जिसमें वे कहते ह कि ''हम कनवर
(कुंवर) सिंह को जसा भी समझें लेकिन बिहारियों के बीच वे बहुत श्रद्धा से याद किए जाते ह।'' यह जानने की इच्छा होती ह कि कुंवर सिंह को ''जसा भी'' क्यों समझा जाता रहा?
इस प्रश्न का उत्तर देने के पहले कुछ बातों का उल्लेख करना उचित होगा। सुधीर चन्द्र ने अपने
हाल के कुछ शोध आलेखों में यह दिखाने का प्रयास किया ह कि 1857 का परवर्ती समय के लेखन पर व्यापक प्रभाव रहा ह। वे 'हिन्दू पेट्रियाट' के उदाहरणों से आर कुछ अन्य श्रोतों से यह दिखलाते ह कि उस समय के लेखकों में 'एम्बिवेंलेंस' ( दुचित्तापन) ह। दोनों तरह की बातें उनके यहां मिलती ह। 1857 का प्रत्यक्ष विरोध भी आर 1857 का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन भी। यह बात एक घालमेल की स्थिति पदा करती ह। यूं तो दुचित्तापन विक्टोरियन मानस का एक सहज स्वभाव ह, लेकिन 1857 को लेकर जो स्थिति ह उसमें दुचित्तापन कम ह। सदानन्द मिश्र, राधाचरण गोस्वामी से लेकर ब्रजरत्न दास तक के लेखकों में जो बात उभर कर आती ह वह कुछ आर ही बयां करता ह। 'सरस्वती' के यशस्वी सम्पादक महावीर प्रसाद द्विवेदी की कलम से निकला था कि झांसी की रानी आर नाना साहब नृशंश हत्यारे थे! एसे असंख्य उदाहरण ह जिसके आधार पर यह कहना ग़लत नहीं होगा कि हिन्दी का इंटेलिजेंसिया दरअसल 1857 की जिस समझ को 1920 के दशक तक ढोता रहा वह आर कुछ हो उन अर्थों में तो राष्ट्रीय नहीं ही था जिन अर्थों में 1857 के बाग़ी राष्ट्रीय थे। इसके बाद 1857 को आधुनिक राष्ट्रीय विमर्श ने अपनी सुविधा से 'अप्रोपियेट' कर लिया। असुविधाजनक सवालों को छोड़ दिया गया आर एक तरह से 1857 की चेतना आर 1920 के राष्ट्रवादियों कि चेतना के गुणात्मक अंतर को भुला दिया गया।
एक बार फिर उन्नीसवीं शताब्दी के दोहरे राष्ट्रवादी चेतना पर लाटना .जरूरी ह। अगर 'पयामे आ.जादी' जसी उर्दू में छपी कविताओं को अगर छोड़ भी दें तो एसे उदाहरणों की कमी नहीं जिसमें 1857 के विद्रोह को सही तरीके से देखने की कोशिश की गयी ह। केशवराम भट्ट की पुस्तक 'सज्जाद सुम्बुल' (1874) का .जिक्र किया जा सकता ह। यह किताब उर्दू में भी छपी आर 1870 के दशक में 'बिहार बन्धु' ( हिन्दी समाचार पत्र) में धारावाहिक रूप में हिंदी मे छपी थी। लेकिन बाद के वर्षों में जसे जसे नवजागरण कालीन साहित्य में सामाजिक आर जातीय सरोकार बढने लगे 1857 के प्रति पुराने पिछड़े मुसलमानी शासन के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण हावी होने लगा आर वर्णाश्रमी हिन्दूपन हावी होने लगा। अधिकांश हिन्दी के लेखक- पत्रकार गांवों से आये थे इसलिए लोक के साथ उनका सम्पर्क तो बना रहा लेकिन इन मसीजीवियों की विचारधारा उन्हें धीरे धीरे एक एसी ओर ले गयी जहां राष्ट्रीय होना धार्मिक होने जसा हो गया। यहां आकर वे राष्ट्रीय कांग्रेस की विचारधारा में अपनी सामाजिक आर राष्ट्रीय मुक्ति का स्वप्न देखने लगे। इस तरह से राष्ट्रीय होने के अपने फायदे आर अपने नुकसान ह।
जब यह सब कुछ हो रहा था चुनातियां आपनिवेशिक शासन आर साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद दोनों ओर से उपस्थित थे। 1923 से 1928 के बीच के इतिहास को ठीक से पढने से पता चलता ह कि कांग्रेस की दिक्कतें कितनी अधिक थी। उसे हिन्दू, मुसलमानों के प्रति सहिष्णु, राष्ट्रीय, आधुनिक, लोकप्रिय, अहिसक सबकुछ होना आर दिखना था। यही वह भावभूमि ह जिसमें पहली बार 1857 के प्रति भारतीय राष्ट्रवादी न.जरिये ने सहानुभूतिपूर्वक विचार करना शुरू किया। अब 1857 के वीर नायक आर नायिकाएं नये तरीके से प्रस्तुत होने लगे आर उनके संग्राम को राष्ट्रीय मुक्ति का संग्राम माना गया आर उनका यशोगान किया गया। 1885 के बाद 1928-29 तक के समय में कुंवर सिंह जसे लोगों का स्मरण राष्ट्रवादी नेताओं ने किया? 1909 में छपकर 1916-22 के बीच क्रान्तिकारियों के बीच 1857 पर लिखी सावरकर की पुस्तक का प्रचार हो चुका था फिर भी ! हिन्दी के यशस्वी लेखक आर 'मनोरंजन' आर 'हिंदू' पंच के प्रतिष्ठित संपादक ईश्र्वरीप्रसाद शर्मा ने भी जब 1922 में 1857 का इतिहास लिखा तो कुंवर सिंह की उदारता का, उनकी लोकप्रियता को जिन शब्दों में याद किया ह उसे देखना चाहिये। वे लिखते ह कि कुंवर सिंह ने ब्राह्मणों
को उदारतापूर्वक .जमीन दी थी। उसी .जमीन पर शर्मा का परिवार बसा था इसलिये लेखक ने उन्ह कुछ उदारता से याद किया था।

लक्ष्मीबाई आर उनका इतिहासः कुछ सन्दर्भ

प्रभा पत्रिका ने 1924 में एक लेख प्रकाशित किया जिसमें लक्ष्मीबाई को स्वतंत्रता की देवी के रूप में देखा गया था। इसमें ये पंक्तियां ध्यान देने योग्य ह : '' भारतीय नवयुवकों की जागृत हृदयों में खून डालने वालों में प्रात; स्मरणीया महारानी लक्ष्मीबाई ह। अंग्रे.ज लेखकों ने उनकी कीर्ति-ज्योति को व्यक्त नहीं किया क्योंकि स्वदेश आर स्वधर्मार्थ चंडी-रूपा धारण करके अपनी भयंकर तलवार की धार से अनेक युद्ध-प्रवीण अंग्र.जी सेना को कई बार गाजर मूली की तरह काट डाला। समय नहीं बीता, संभव ह अभी भी दो चार पार्थिव शरीरधारी विद्यमन हों जिन्होंने महारानी के दिव्यदर्शन किये हों। महारानी ने सिपाही विद्रोह में अंग्रे.जों के विरूद्ध अपनी कटकरी तलवार खींची थी, वह अपने लिए नहीं, वरन भारत माता के करूण क्रंदन से विह्वल होकर, उसको दासता के पाश से मुक्त करने के लिए। यह भारत वासियों का दुर्भाग्य ह कि वे महारानी के जीवन से अनभिग्य ह। प्रभा के पाठकों आर विशेष कर नवयुवकों के लिए वीर रस की मूर्ति शत्रु-संहारिणी देवी चंडी स्वरूपा लक्ष्मीबाई की निष्पक्ष जीवनी दी जाती ह।''
एसा नहीं था कि लक्ष्मीबाई के जीवन को लेकर इसके पहले लिखा नहीं गया था। हिन्दी में तो कम लेकिन मराठी आर बंगला भाषा में उन्नीसवीं सदी में बहुत सारे उल्लेख मिलते ह आर प्रायः एक प्रशंसा का भाव रहा ह। कम से कम 1890 के दशक से तो लक्ष्मीबाई पर कई पुस्तकें लिखी गयीं। मराठी में दत्तात्रेय बलवंत पारसनीस का 'लक्ष्मीबाई का चरित्र' (1894), शंकरराव सप्तर्षि आणि कम्पनी द्वारा प्रकाशित 'झांसी संस्थानची राणी लक्ष्मीबाई इचे चरित्र' (1895), बंगला में रजनीकांत गुप्त की 'सिपाही युद्धेर इतिहास' (1876 में प्रथम खंड) तथा 'वीर महिमा' (1885), चंडीचरण सेन की 'झांसीर रानी' (1888) वे पुस्तकें ह जिसका व्यापक प्रचार हुआ था। इसके अलावा 1870 के दशक से ही लक्ष्मीबाई की वीरता के प्रति प्रशंसा होती रही थी। इस तरह की पुस्तकों में लक्ष्मीबाई के प्रति प्रशंसा भाव को समझने के लिये चंडीचरण सेन की पुस्तक के इस अंश को देखा जा सकता ह- ' रानी लक्ष्मीबाई जसी वीरांगना ने यदि इंग्लण्ड अथवा अमेरिका में जन्म ग्रहण किया होता तो लोग अपने घरों में उसकी प्रतिमा रखते। किन्तु भारतवर्ष के लोग अभी तक लक्ष्मीबाई के गुणों के गुणों को ग्रहण करने में समर्थ नहीं हुए ह। ' 'मांझा प्रवास' मराठी पुस्तक का प्रकाशन भी हो चुका था जो 1880 के आसपास तक लिख ली गयी थी । लेकिन, इक्का दुक्का अपवादों को छोड़कर कहीं भी यह पता नहीं चलता कि ये लेखक 1857 को राष्ट्रीय विद्रोह मानते थे या फिर उसे स्वाधीनता संग्राम के रूप में देखकर विद्रोहियों के उद्देश्य के प्रति आदरभाव रखते थे। पारसनिस की पुस्तक में बंगला जीवनीकारों की तरह लक्ष्मीबाई की वीरता के प्रति आदरभाव है लेकिन उसे गलत माना गया है। राय बहादुर पारसनीस ने लक्ष्मीबाई के अतिरिक्त एक अन्य रानी की जीवनी भी लिखी है - जिसने तमाम कष्टों औन अन्यायों के बावजूद अंग्रेजी शासन का विरोध नहीं किया।
इन लेखकों के लिए लक्ष्मीबाई की वीरता तो प्रशंसनीय थी, लेकिन जिस उद्देश्य के लिए वह लड़ रही थी वह सही नहीं था!
'प्रभा' में छपे लेख ने जिस तरह से लक्ष्मीबाई को देखा था वह लक्ष्मीबाई के जीवन चरित को एक
नयी तरह से देखने की हिंदी में शुरूआत थी। हालांकि सावरकर की पुस्तक पहले आ चुकी थी आर गदर पत्रिका भी किसी न किसी रूप में एक प्रभाव के रूप में हिंदी भाषी पढे लिखे लोगों में जानी जा चुकी थी लेकिन 1857 के वीरों आर वीरांगनाओं को राष्ट्रीय आन्दोलनकारियों के रूप में देखने की शुरूआत के रूप में यह एक बड़े परिवर्तन का सूचक था। पारसनीस की थीसिस को बदलने आर लक्ष्मीबाई की देवी छवि की निर्मात्री हिन्दी की एक ओजस्वी कवियित्री सुभद्रा कुमारी चौहान थी जिसने 22 साल की उम्र में लक्ष्मीबाई पर जो कविता लिखी उसने मानो लक्ष्मीबाई का इतिहास ही बदल दिया। 'खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी' पारसनीस की रानी से भिन्न थी। पारसनीस और उनके समकालीनों की यह मान्यता कि रानी लक्ष्मीबाई के साथ जो अन्याय हुआ उससे रानी बाध्य होकर लड़ीं, अब बदल गयी। रानी स्वतंत्रता का संदेश देने वाली एक ऐसी वीरांगना में परिणत हो गयी थी जो देश के लिए लड़ रही थी खुद अपने लिए नहीं। बुंदेले के हरबोलों के मुख सुनी कहानियों के आधार पर यह लक्ष्मीबाई का नया इतिहास था जिसे राष्ट्रवादी साहित्यिक मन नये सिरे से तैयार कर रहा था। इस नयी राष्ट्रीय छवि के उद्देश्य स्पष्ट थे। रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब, तात्या टोपे, कुंवर सिंह, अजीमुल्ला, पीर अली, बहादुरशाह इत्यादि सभी एक दूसरे से राष्ट्रीय सूत्र में बंध गये थे। यह प्रमाणित किया जाने लगा कि 1857 में बैरकपुर से शुरू हुआ विद्रोह दरअसल गलत समय पर शुरू हो गया। इसके बहुत पहले से देशव्यापी राष्ट्रीय विद्रोह की तैयारियां चल रही थी। अभी हाल में कर्मेन्दु शिशिर ने इस थीसिस को फिर से आगे बढाने की कोशिश की ह। उन्होंने 18 अक्टूबर 1855 को हरिद्वार में स्वामी पूर्णानंद द्वारा आयोजित सभा में स्वामी विरजानंद के व्याख्यान,स्वामी दयानंद, अजीमुल्ला-नाना साहब इत्यादि लोगों द्वारा देश-व्यापी विद्रोह की तयारी को एतिहासिक तथ्य के रूप में स्वीकार किया ह। नाना साहब इस तैयारी के सूत्रधार थे। जब से अजीमुल्ला यूरोप से लौटकर आये थे जहां उन्होंने क्रीमिया का युद्ध देखा, यह समझ लिया कि अंग्रेजों की असली शक्ति है भारत पर अधिकार, तब से इस भारतव्यापी विद्रोह की तैयारियां शुरू हो गयी। गैरीबाल्डी, और रूस के शासकों से भी अजीमुल्ला का सम्पर्क हुआ था। गैरीबाल्डी तो अपनी सेना लेकर भारतीय विद्रोहियों की मदद के लिए चलने ही वाला था कि उसे सूचना मिली कि विद्रोह समाप्त हो गया। इस तरह की तमाम बातों को सुभद्र कुमारी चौहान से लेकर ऋषभ चरण जैन इत्यादि के विवरणों में देखा-महसूस किया जा सकता है। चौहान की ओजस्वी कवित्त शक्ति ने लक्ष्मीबाई का जो इतिहास रूप रचा वही असली लक्ष्मीबाई के रूप में हिन्दी साहित्य में स्वीकृत हो गया। इसी स्वीकृति पर प्रामाणिकता की मुहर तब लगी जब दशकों की शोध-यात्रा के बाद वृन्दावनलाल वर्मा ने लक्ष्मीबाई की जीवनी औपन्यासिक रूप में 1946 में प्रकाशित की। लगभग इसी तरह की कहानियाँ तात्या टोपे, नाना साहब और कुंवर सिंह की भी है। ये सभी लोग पहले बाध्य होकर लड़ने वालों के रूप में इतिहास में वर्णित थे लेकिन राष्ट्रवादी उभार के दौर में उनकी ऐतिहासिक छवियाँ पुनर्निर्मित हुईं और उनके जीवन के आधार पर साहित्यिक-ऐतिहासिक कृतियां सामने आयीं। कौन भूल सकता है आरसी प्रसाद सिंह की वह ओजस्वी कविता जिसमें वे कहते हैं - ''अस्सी बरस की हड्डी में जागा जोश पुराना था, सब कहते हैं कुंवर सिंह भी बड़ा वीर मर्दाना था।'' कुंवर सिंह का जो उपलब्ध इतिहास हमारे पास है ये कथाएं, कविताएं उनकी छवि को उससे दूर ले जाती हैं, बहुत ज्य़ादा प्रभावी बनाती हैं और शायद इतिहास से निकलकर ये छवियां इतिहासों में तब्दील हो जाती है।
नाना साहब और तात्या टोपे का प्रसंग भी कम दिलचस्प नहीं। ऋषभ चरण जैन का 1932 में छपा उपन्यास 'गदर' स्वाधीनता संग्राम पर प्रकाशित हिन्दी का पहला ग्रन्थ है जिसमें दृढ़ता से 1857 के विद्रोहियों
को राष्ट्रीय नायकों का दर्जा दिया गया। उपन्यास का नायक अ.जीमुल्ला एक सुदर्शन व्यक्तित्व का मालिक है जो अपने स्वामी नाना साहब की पुत्री से प्रेम करता है। नाना साहब की पुत्री को चार्ल्स नामक अंग्रेज कलंकित करता है। नाना साहब असली मराठा का कर्त्तव्य पालन करते हुए अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए अंग्रेजों की सेना को चीरते हुए चार्ल्स तक पहुंचते हैं और उसकी हत्या करते हैं और उसका खून पीते हैं! यह वह बिन्दु है जो हमें राष्ट्रीय कल्पना और औपनिवेशिक कल्पनाके बीच एक सूत्र को दर्शाता है। दिल्ली पर आक्रमण के बाद बहादुरशाह .जफ़र हार जाते हैं और पुत्र समेत उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है। उनके पुत्रों की हत्या उनके सामने कर दी जाती है ओर हडसन नामक जनरल मुगल राजकुमारों का रक्त पान करता है। घृणा और विद्वेष की चरम अभिव्यक्ति के रूप में शत्रु को मारकर उसके रक्त को पीना यह एक मध्ययुगीन बर्बरता के उदाहरण-सा लगता है जिसे आधुनिक हडसन अंजाम देता है। ऋषभ चरण जैन के विवरण में यह कृत्य एक वीरोचित कर्म है और, ख्वाजा हसन के वृत्तांत में यह अत्याचार और दमन का प्रतीक है।
गदर में जैन ने दिखलाया है कि किस प्रकार कई विदेशी भाषाओं के जानकार, आधुनिक ज्ञान से युक्त अ.जीमुल्ला लंदन जाकर नाना साहब की पेंशन के लिए पैरवी करते हैं। वे असफल होते हैं और यूरोप प्रवास के दौरान अन्य यूरोपीय शक्तियों से ब्रिटेन विरोधी संभावित विद्रोह के लिए समर्थन पाने की चेष्टा करते हैं। तीस के दशक में कई ऐसे उपन्यास लिखे गये जिसमें राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत लेखकों ने 1857 का एक राष्ट्रीय इतिहास लिखा। इस राष्ट्रीय इतिहास में कल्पना का तत्त्व कितना प्रभावी था इसे भी ध्यान में रखना चाहिए। एक उपन्यासकार ने यह दिखलाया कि तात्या टोपे को फांसी देने के क्रम में तात्या की जगह कोई और देशभक्त फांसी पर तात्या बनकर चढ़ गया। तात्या हिमालय चले गये। अंग्रेज चूंकि तात्या को पहचानते नहीं थे इसीलिए वे यही समझते रहे कि उन्होंने तात्या को फांसी दे दी। एक अन्य उपन्यास में लक्ष्मीबाई को भी बाद तक जीवित दिखलाया गया और बताया गया कि जो लक्ष्मीबाई बनकर अंत में शहीद हुई वह कोई और थी। लक्ष्मीबाई हिमालय चली गयी और 80 वर्ष तक जीवित रही।
लक्ष्मीबाई की छवि में आये गुणात्मक अन्तर को दो स्तरों पर समझा जा सकता ह। प्रथम- एक नये शक्तिशाली विचारधारा के जनप्रिय होने में सहायक एक 'सिम्बल' के रूप में आर दूसरे लोक छवि के राष्ट्रीय विचारधारा में आत्मसात होने के चिन्ह के रूप में।
लक्ष्मीबाई के जीवन पर 1890 के दशक में एक अंग्रेज लेखक ने एक नाटक लिखा। इसमें दिखलाया गया था कि कामातुर लक्ष्मीबाई ने एक अंग्रेज अफसर को अपने मोहमाश में बांधना चाहा। कर्त्तव्यपरायण अंग्रेज अफसर ने रक्तपिपासिनी रानी के अधम प्रस्ताव को जान की परवाह न करके ठुकरा दिया। लगभग इसी तरह का एक नाटक 1930 के दशक में एक अंग्रेज द्वारा लिखा गया। 1890 के दशक में नाटक का विरोध न हुआ लेकिन 1930 के दशक में तीव्र राष्ट्रवादी विरोध के फलस्वरूप प्रकाशक को विवादित अंश हटाने पड़े और माफी मांगनी पड़ी। यहां शैलेन्द्रधारी सिंह ने ठीक ही कहा है कि 1857 ने ब्रिटेन के साम्राज्यवादियों को, उसके गर्वीले राष्ट्रवादियों को अपनी जाबांजी और मर्दानगी को प्रदर्शित करने का, अपना गौरव गान करने का मौका प्रदान किया। अंग्रेजों ने बहुत सारे ग्रन्थ लिखे जिसमें 1857 की घटनाओं को पार्श्र्व में रखकर अंग्रेजों के जय की, उनकी महानता का आख्यान निर्मित किया। डा0 सिंह ने यह ईशारा भी किया है कि यह देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रवादी उभार के दौर में जब इस आख्यान का प्रतिवादी आख्यान निर्मित हुआ किस तरह की कल्पनाओं ने इतिहास से मिलकर ऐतिहासिक आख्यान को
तैयार किया।(दुर्भाग्य से डा0 शैलेन्द्रधारी सिंह को यह मौका नहीं मिला। पटना में उनके आवास पर कुछ लोगों ने उनकी हत्या कर दी।)
दूसरी ओर लक्ष्मीबाई की जो छवि 1920 के दशक में प्रचारित होने लगी वह उनकी धर्मपरायण हिन्दू छवि थी जो उनके ब्राह्मण होने आर सनातनी रूप को ज्य़ादा उजागर करती थी। एसे तमाम अंश छोड़ दिये गये जिससे हिन्दू राष्ट्रवादी छवि धूमिल होती थी। लक्ष्मीबाई की जो तस्वीर जनमानस में ज्य़ादा प्रचारित ह वह हिन्दू देवी जसी ह जो एतिहासिक रूप से भ्रामक ह। जिन लोगों ने लक्ष्मीबाई को देखा था वे बताते थे कि वह देखने में लड़कानुमा थी, पुरूषों की पोशाक ( जो मुसलमानी पोशाक थी) में लोगों के बीच आती थी। लेकिन धीरे धीरे इस असली छवि को धूमिल कर दिया गया। लक्ष्मीबाई का एक प्रामाणिक चित्र ह जिसमें वह हुक्का पी रही ह। हुक्का गुड़गुड़ाती लक्ष्मीबाई 1920 के प्रशंशकों को स्वीकार्य न थी। वे तो उस देवी की पूजा करते थे जो हिन्दू आदर्शों के लिए लड़ रही थी, जिसके मार्ग दर्शक ब्राह्मण गुरू थे जिनकी प्रेरणा से वह हिन्दू भारत के लिये धर्म-युद्ध कर रही थी।
बाद के वर्षों में हिंदी में अनेक उपन्यास आर कहानियां लिखी गयीं जिसमें उन्हें अनेक रूपों में देखने की कोशिश की गयी। इन सबका एक सुन्दर विवरण भगवानदास माहार की 1857 का हिंदी साहित्य पर प्रभाव पुस्तक में उपलब्ध ह। एक एसी पुस्तक भी आई जिसमें दिखलाया गया ह कि तात्या टोपे की जगह कोई आर तात्या टोपे बनकर फांसी पर चढ गया आर असली तात्या कभी पकड़ में नहीं आया !

कुंवर सिंह का प्रसंग

लक्ष्मीबाई की तरह कुंवर सिंह की छवि भी 1920 के दशक में बदली। वे भी एक लोक नायक से एक राष्ट्रीय नायक के रूप में इसी दार में प्रतिष्ठित हुए। हर इलाके के जो अपने अपने नायक थे उनके लिये लोकगीतों में जिस तरह का आदर आर सम्मान था वह उन्नीस सा बीस के सन्दर्भ में धीरे धीरे राष्ट्रीय गाथा के रूप में स्वीकृत होने लगा। जहां लक्ष्मीबाई के नाम की जरूरत थी वहां वह आर जहां कुंवर सिंह की बात कहने से बात बनती थी वहां कुंवर सिंह ही सही। मनोरंजन प्रसाद सिंह की जिस कविता का उल्लेख बार बार किया जाता ह वह 1929 मे पहली बार छपी। जिस पत्रिका में वह कविता छपी थी उसे प्रतिबंधित कर दिया गया। आ.जादी के बाद यह कविता जनता के सामने आई। इस कविता पर सुभद्राकुमारी चाहान की लक्ष्मीबाई कविता का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखलाई पड़ता ह। कुंवर सिंह की कहानी कहने वालों को क्या इस बात का उल्लेख नहीं करना चाहिये कि इस कविता के प्रकाशन का क्या सन्दर्भ ह? इस बात का उल्लेख किया जाना चाहिए कि कुंवर सिंह की प्रशंसा में लिखा गयी यह कविता के संदर्भ का उनकी दो सबसे महत्त्वपूर्ण जीवनिया में स्थान नहीं दिया गया ह। कुंवर सिंह की जीवनी मथुराप्रसाद दीक्षित ने 1930 के दशक में लिखी। 1947 के बाद सरकारी पहल पर उनके प्रामाणिक जीवनी लिखने का कार्यभार प्रसिद्ध इतिहासकार डा कालिकिंकर दत्त को सापा गया। यह पुस्तक 1957 में अंग्रे.जी में आर 1959 में हिन्दी में छपी। इसमें इस कविता का उल्लेख नहीं ह। इस बीच महाराजकुमार दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह की पुस्तक 1955 में छपी। इसमें प्रमुखता से इस कविता को स्थान दिया गया ह। इसमें लिखा गया ह कि '' 1921 ई के आन्दोलन के बाद कुंवर सिंह कलाकरों तथा नेताओं द्वारा खूब याद किये गये। डुमरांव के श्री मनोरंजन प्रसाद, एम ए जो छपरा के राजेन्द्र कालेज के प्रिंसिपल थे, लिखा था-'' था बूढा पर वीर बांकुरा कुंवर सिंह
मरदाना था...'' यह भ्रामक ह। एसा प्रतीत होता ह कि यह कविता 1921 के आसपास लिखी गयी कविता ह। यह बहुत बाद में छपी ह। बाद की बहुत सारी पुस्तकों में यह बात दुहरायी जाती रही ह।
कुंवर सिंह की कहानी की एसी कई बातें ह जिस ओर कम ध्यान दिया जाता ह। उनके इतिहास का आधा अधूरा सन्दर्भ इसलिए भी रखा जाता ह ताकि बाकी बातों से उठने वाले सवालों से बचा जा सके। इस निबन्ध में उनके इतिहास के बारे में कुछ प्रसंगों की चर्चा की गई ह जिससे यह स्पष्ट हो सके कि कुंवर सिंह के विद्रोह को सिर्फ किसी 80 साल के पराक्रमी राजपूती शार्य की कथा बना कर न देखा जाय।

कुंवर सिंह के इतिहास को कई तरीके से देखा जा सकता ह। उनके जीवन से लेकर 1957-58 में उनके अंग्रे.ज विरोधी अभियानों को लेकर तो लिखा जाना ही चाहिये यह भी देखा जाना चाहिये कि उन्हें लोगों ने कसे याद रखा। इस ओर भी ध्यान देना चाहिये कि लेखकों ने उनके इतिहास को पेश करते हुए जो जोड़ घटाव किया उसके कारण क्या थे। मोटे तार पर यह कहना ठीक होगा कि कुंवर सिंह का इतिहास आर उनके इर्द गिर्द उठ खड़ा हुआ मिथक जो उनके इतिहास से ज्य़ादा शक्तिशाली हो गया ह अध्ययन की दो अलग अलग दिशाएं हो सकती ह। कुंवर सिंह को केन्द्र में रखकर असंख्य लोक-कथाएं, लोक-गीत, लोक-इतिहास रचा गया ह जिसने आरा के भोजपुरी भाषी समाज में उनकी एक लोकनायक की छवि निर्मित की ह। इस दिशा में पहले दुर्गाशंकर सिंह आर हाल में रश्मि चाधरी, ने बहुत सारे साक्ष्य दिये ह। इन साक्ष्यों के आधार पर यह तो प्रमाणित होता ही ह कि बिहार वासियों ने कुंवर सिंह को हमेशा याद रखा। लेकिन इतिहास की कसाटी पर इस प्रकार के साक्ष्यों की एक सीमित भूमिका ह। न तो इससे 1957 के विद्रोह का इतिहास लिखा जा सकता ह आर न ही 1857 के विद्रोहियों की ''राष्ट्रीय भावना'' आर उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में उभरे आधुनिक राष्ट्रवाद के जटिल संबंधो के इतिहास लेखन में मदद मिलती ह। कुल मिलाकर अभी भी कुंवर सिंह के इतिहास पर गंभीर एतिहासिक शोध की .जरूरत बनी हुई ह। एसा होने के कई कारण ह जिसमें सबसे महत्त्वपूर्ण ह इतिहासकार का आधुनिक आग्रह। 1957 में कुंवर सिंह पर जो प्राथमिक श्रोत उपलब्ध थे उसका सबसे अधिक प्रभावी प्रयोग किया ह- रि.जवि सम्पादित पुस्तक में आर ///कालिकिंकर दत्त ने श्रोतों का उपयोग तो बहुत किया ह लेकिन उन्होंने 1857 की चेतना को अपने विवरण की सपाटबयानी से अपने इतिहास में प्रविष्ट नहीं होने दिया। उस समय के इतिहासकार की यह एक बड़ी सीमा थी कि वह 1857 की ''राष्ट्रीय चेतना'' को ठीक से नहीं समझ पाता था। दूसरी ओर दुर्गाशंकर सिंह की पुस्तक में 1857 की चेतना की एक विशिष्ट प्रकार की राजपूती समझ काम कर रही ह। कुंवर सिंह राजपूत थे आर उनके समर्थन में राजपूतों की संख्या अधिक थी लेकिन एक नायक के रूप में कुंवर सिंह को गर राजपूतों का समर्थन न होता तो कुंवर सिंह 1857 के विद्रोह में पूर्वी भारत के सबसे बड़े नेता न होते। जिस प्रकार के पारिवारिक श्रोतों का उपयोग दुर्गाशंकर सिंह ने किय ह आर जितने तरह के सरकारी दस्तावे.ज कालिकिंकर दत्त को उपलब्ध थे दोनों के सम्यक सामंजस्य से कुंवर सिंह का एक प्रभावी इतिहास लिखा जा सकता था, लेकिन दुर्भाग्य से एसा न हो सका। 2007 में जिस तरह की 1857 संबंधी सामग्री अभिलेखागार में अभी भी उपलब्ध ह उसे देखकर बासुदेव चट्टोपाध्याय ने ठीक ही कहा ह कि उन्हें इतिहासकारों की प्रतीक्षा ह।
इस आलेख में कुछ एसे तथ्यों का उल्लेख किया जा रहा ह जिससे इस बात को बल मिलता ह कि कुंवर सिंह का इतिहास लिखने की, उनको याद करने के इतिहास की कितनी .जरूरत ह। यहां कुंवर सिंह के
इतिहास को पेश करने की कोशिश नहीं की गयी ह बल्कि यह तलाशने की कोशिश की गई ह कि इस इतिहास के कितने फलक हो सकते ह।
कुंवर सिंह देखने में कसे लगते थे इसके बारे में सही सही कुछ भी कहना प्रामाणिक नहीं, क्योंकि उनकी कोई स्पष्ट तस्वीर हमारे पास उपलब्ध नहीं। उनकी चार जीवनियां चर्चित ह। उनमें से दो 1957 के आसपास की ह- दुर्गाशंकर सिंह आर कालीकिंकर दत्त की आर दो 2007 की ह- रश्मि चाधरी आर ॥॥॥ दुर्गाशंकर सिंह की पुस्तक में कुंवर सिंह की तस्वीर को लेकर कहा गया ह कि कुंवर सिंह की असली तस्वीर वह नहीं ह जो सुंदरलाल की पुस्तक' भारत में अंग्रे.जी राज' आर सावरकर की पुस्तक में छपी ह। इस प्रकरण में जो तथ्य दुर्गाशंकर सिंह ने दिए ह वे प्रामाणिक प्रतीत होते ह। यानि कुंवर सिंह की बहुप्रचारित छवि जिसमें उन्हें लंबा, शक्तिशाली क्षत्रिय वीर सा दिखाया गया था ( जिसे आई सी एच आर आर रश्मि चाधरी ने सही मान लिया ह) दरअसल लंदन के एक अंग्रेज चित्रकार की कल्पना का चित्र ह!
इतिहासकारों ने कुंवर सिंह की जितनी उपेक्षा की ह वह चकित कर देने वाला ह। आज भी अधिकतर लोगों को यह पता नहीं ह कि उनकी असली हसियत क्या थी। इस सन्दर्भ को कर्मेन्दु शिशिर ने इस प्रकार रखा हः '' वे किसी बड़ी रियासत के राजा नहीं थे, न ही उनका कोई राज्य था। उनकी एक जागीर .जरूर थी जिससे सटे डुमरांव में एक बड़े राजा थे। दरभंगा आर रामगढ - इन क्षेत्रों के तीनों बड़े राजा अंग्रे.ज समर्थक थे। लेकिन कुंवर सिंह की तहसील जगदीशपुर की प्रतिष्ठा बहुत थी। इसका सबसे बड़ा कारण तो यह था कि मुगल बादशाह शाहजहां ने इनको 'राजा' की उपाधि दी थी। दूसरी बात यह कि कुंवर सिंह के रिश्ते महाराष्ट्र के राजाओं से लेकर नाना साहब की अंतरंगता तक थे। यह बात भी सही ह कि वे भारी क.र्ज में डूबे हुए थे आर उनकी अपील रिवेन्यू बोर्ड में लंबित थी। पटना कमिश्नर टेलर चाहते थे कि फसला जल्दी हो आर कुंवर सिंह के पक्ष में हो।'' ( प- 128)
कुंवर सिंह के जीवन के बारे में जो तथ्य ध्यान में रखने की .जरूरत ह वह यह कि 1857 के पहले वह लगभग पूरी आयु जी चुके थे। अंतिम डेढ वर्ष के संघर्ष के एतिहासिक महत्त्व को रेखांकित किया जाना चाहिये लेकिन पिछले तथ्यों की अनदेखी करके नहीं। कुंवर सिंह बचपन में पढ-लिख नहीं सके। तवारीख़-ए-उज्जेनिया के तीसरे खंड में उनके प्रारंभिक जीवन का जो विवरण ह उसके आधार पर कहा जा सकता ह कि शाहबजादे सिंह के बेटे कुंवर सिंह बचपन से ही दुस्साहसी आर अपनी तरह से जीने के अभ्यस्त थे। पढाने आये मालवी को बालक कुंवर सिंह तलवार लेकर काटने दाड़े क्योंकि उन्होंने बालक के पाठ याद न करने पर कान उमेठने की ग़लती की थी! बड़े होकर कुंवर सिंह प्रायःजगदीशपुर के बाहर ही रहे। वे जितारा के जंगल में फूस का बंगला बनाकर रहते थे आर आमोद प्रमोद मेम अपना समय बिताया करते थे। वे बहुधा 100 सवारोम को लेकर जगदीशपुर के आसपास के जंगलों में चक्कर काटा करते थे। उनका विवाह गया के फतेहनारायण सिंह की पुत्री से हुआ किसी हद तक आर्थिक कठिनाई के समाधान हेतु किया गया। मुकदमे के भारी खर्च को उनके ससुर ने देना स्वीकार कर लिया था। कुंवर सिंह की अनेक उपपत्नियां थी जिनमें से एक धरमन बीबी थी जिसके लिये उन्होने आरा आर जगदीशपुर में दो मस्.जिदें बनवाईं। कुंवर सिंह के पुत्र दलभंजन सिंह ने नन्हेंबाई नाम की आरत को अपनी उपपत्नी बना लिया था जिसके कारण पिता कुंवर सिंह से संबंध कभी अच्छा नहीं रहा। बाद में दलभंजन सिंह के बेटे की शादी के समय दादा कुंवर सिंह ने बड़े ठाठ-बाट आर शान शाकत से किया। बारात का कारवां कितना भव्य रहा होगा इसका अंदा.जा इस बात से लगाया जा सकता ह कि इसके साथ दस हकीम आर पच्चीस वद्य चल रहे थे
ताकि रास्ते में कोई बीमार पड़ जाये तो उसका दवा-दारू किया जा सके! जिस समय कुंवर सिंह गद्दी पर बठे .जमीदारी की कुल आय पांच से छह लाख रूपये सालाना के करीब थी जिसमे से डेढ लाख के करीब रुपया सरकारी मालगुजारी के रूप में दिया जाता था।( एक अनुमान से यह 1लाख 66 ह.जार था आर दूसरे अनुमान से यह 1 लाख 36 ह.जार था।) अपने तीनो भाईयों से कुंवर सिंह का सम्पर्क अच्छा नहीं था। कुंवर सिंह चाहते थे कि छोटे भाइयों को जितनी मालगुजारी सरकारी ख.जाने में देनी पड़ती ह वह उनके मार्फत जमा हो। इसका तीनों भाईयों ने विरोध किया। कलक्टर के फसला तीनों भाईयों के पक्ष में जाने पर इसे नहीं
माना आर अपने वंश की पुरानी रीति का हवाला दिया कि ज्येष्ठ पुत्र ही सम्पत्ति का एकमात्र उत्तराधिकारी हो। इस मुकदमे में कुंवर सिंह को आठ लाख खर्च करना पड़ा। क.र्ज में पहले से ही डूबी .जमीदारी के लिये यह खर्च आगे चलकर कुंवर सिंह को आर्थिक उलझन में डालने का कारण हुआ। ( दत्त, प 39) तत्कालीन कुछ सरकारी रिपोर्टों में भी कुंवर सिंह के बारे में जो मत मिलते ह उसमें इस बात का उल्लेख मिलता ह कि वे लोकप्रिय तो थे लेकिन आमदनी आर खर्च के हिसाब का ध्यान वे नहीं रखते थे। 19 दिसम्बर, 1856 की एक रिपोर्ट में पटना कमिश्नर टेलर ने कुंवर सिंह की लोकप्रियता का .जिक्र किया ह लेकिन साथ में लिखा ह- '' अधिकांश राजपूत सरदारों की तरह वे एकदम अपढ रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि वे सहज में षडयंत्रों का शिकार होते रहे ह आर स्वार्थी दलालों के हाथ कठपुतली रह ह।इसके साथ अपनी वृत्ति आर फजूलखर्ची की वंशपरम्परागत प्रकृति के कारण वे बेहिसाब खर्च करते रहे ह। इन खर्चों की पूर्ति वे सदा कर्ज लेकर करते रहे ह । ज्यों ज्यों समय बीतता गया, बाबू कुंवर सिंह की आर्थिक दशा दिनों दिन खराब होती गयी।'' इस बात का अनुमोदन कालिकिंकर दत्त ने भी किया ह-'' यह बात निःसंदेह सच ह कि अपने साधन के बाहर बाबू कुंवर सिंह ने अतिशय उदारता, अनेक सामाजिक रीतियों का पालन करने के लिए फजूलखर्ची, शिकार, मनोरंजन आर कतिपय स्वार्थी दरबारियों...तथा मित्रों की चालों से अपनी जमींदारी को भयंकर कर्ज में डाल दिया।'' ( प 44) इस प्रकार के कई दस्तावे.ज ह जो प्रमाणित करते ह कि लोभी आर विवेकहीन महाजनों ने कुंवर सिंह के साथ बेईमानी आर धोखेबाजी का व्यवहार किया था। ( दत्त ने एसे कई दस्तावे.जों का हवाला दिया ह। देखें दत्त, प 48-66)।
एक एसे .जमीदार की लोकप्रियता के कारण क्या हो सकते हम जो खुद क.र्ज में डूबा हो? कुंवर सिंह का कोई भी इतिहास इस प्रश्न की अनदेखी नहीं कर सकता। तत्कालीन कोई भी दस्तावे.ज यह नहीं बतलाता कि कुंवर सिंह अपनी प्रजा में अलोकप्रिय थे। शायद उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथमार्द्ध में एक राजपूत .जमीदार से जो अपेक्षाएं जनता की हो सकती थी उसे वह पूरा करते होंगे। साथ ही उस दार में बिहार की एक .जमींदारी के भीतर की लड़ाईयों को समझने की भी एक आंतरिक दृष्टि हो सकती ह जिसके कारण यह देखा जा सकता ह कि तमाम मुकद्दमेबाजी के बाव.जूद भाईयों का सम्पर्क बना रहा। कालांतर में अमर सिंह ने जिस तरह कुंवर सिह के देहांत के बाद विद्रोही सेना की कमान संभाली उससे तो यही पता चलता ह कि दोनों भाईयों में गहरे स्तर पर .जुड़ाव था। विद्रोह के दारान के कुछ तथ्य एसे ह जो बतलाते ह कि कुंवर सिंह के विद्रोह ने लोक युद्ध का रूप कितने गहरे स्तर पर ले लिया था। ग्वाला जाति के रंजीत राम सिपाही, जो पहले 40 वीं देशी पदल पलटन का हवलदार था आर बाद में बागी सिपाहियों का सेनानायक बनाया गया, का बयान था कि जिस समय कुंवर सिंह अयोध्या की ओर रवाना हुए उस समय उनके पास 2000 से 2500 तक आदमी थे। आजमगढ में ब्रिगेड मेजर देवकी दूबे के सेनापतित्व में 2000 से 2500 तक आर भी आदमी इनके साथ हो गये। एक इतिहासकार पार्लियामेंट पेपर्स के हवाले से बताते ह कि कुंवर सिंह
द्वारा निर्मित मन्दिर को इस कारण से नष्ट करवा दिया गया था क्योंकि यहां के ब्राह्मणों ने अंग्रे.जों के विरूद्ध कुंवर सिंह का साथ दिया था। निश्चित ही कुंवर सिंह का आंदोलन महज राजपूती मामला नहीं था।

एक अन्य हवलदार अचरज सिंह सिपाही का बयान भी इसी प्रकार के संकेत देता ह। उसने शिवसहाय, गोला, मथुरा चाबे आर रामशरण चाबे के साथ पलटन छोड़ा था। उसने बताया था कि देवकी दूबे विद्रोही फाज के नेता थे। अन्य सिपाहियों के नामों का जो उल्लेख उसने किया ह उसमें सूबेदार अन्तू मिसर ( मिश्र), रामदीन तिवारी, छतरधारी ओझा, रामसरन चाबे, हरकिशुन ग्वार, रामखेलावन पाण्डे, बुलीराम जसे नाम ह।
यह एक तरह से साफ ह कि 1857 के विद्रोह के बिहार अध्याय में एसी तमाम तरह की बातें ह
जिससे प्रतीत होता ह कि कुंवर सिंहआर अमर सिंह के साथ साथ कई एसे महत्त्वपूर्ण लोग ह जिसकी ओर ध्यान दिया जाना चाहिये। उदाहरणस्वरूप अली करीम, बंसुरिया बाबा, धर्मन बीबी इत्यादि का उल्लेख किया जा सकता ह। इन लोगों के बारे में जानने के बाद पता चलता ह कि किस प्रकार उस समय लोग अग्रे.जी राज के खिलाफ लड़ने के लिए आतुर थे। जो लोग इस लोक युद्ध को एक सामंती विद्रोह कहते ह उन्हें ये तथ्य सोचने के लिये बाध्य करेंगे। सच तो यह ह कि 1857 के विद्रोह के पहले से ही बिहार में अंग्रे.जों के खिलाफ आन्दोलन होने लगे थे। 1855-57 से लेकर 1857 का पटना षडयंत्र जसे उदाहरणों ने राजनतिक वातावरण को प्रभावित किया था। कालिकिंकर दत्त ने ठीक ही कहा ह कि इसका असर कुंवर सिंह पर भी पड़ा होगा। 1857 की जुलाई में जब पटना में विद्रोह शुरू हुआ उसके पहले बरकपुर में आर उससे भी पहले बंगाल में दूसरी जगहों पर जो विद्रोह शुरू हुए थे वे एक श्रृखला की कड़ियां ह। यह बात बिल्कुल सही ह कि अंग्र.जों के विरूद्ध संग्राम तो उसी दिन शुरू हो गया था जिस दिन उनका शासन शुरू हुआ था। पर यह संग्राम बहुसंख्यक भारतीयों ने किया था। कुछ समझदार लोग तो शुरू से अंत तक उनके साथ रहे।

2007 में 1857
2007 में 1857 जसे विद्रोह को याद करते हुए वर्तमान समय की अनदेखी उचित नहीं। आज के भारत में 1857 के विद्रोहियों को याद करने करने की राजनीति को भी ध्यान में रखने की .जरूरत ह। मनेजर पाण्डेय ने एक बहुत सटीक सुझाव दिया ह कि एक सूची 1857 के गद्दारों की भी तयार की जानी चाहिये ताकि पता चल सके कि कान किस ओर था। कोई भी इस तरह की सूची भारत के राष्ट्रवाद की पोल खोल सकती ह। लगभग सभी लोग जो आधुनिक राष्ट्रवाद के दार में राष्ट्रवाद को म.जबूती प्रदान करने वाले माने जाते ह उन परिवारों से आये थे जो इस लिस्ट में 'गद्दार' कालम के अंतर्गत सूचीबद्ध होंगे! यह दिलचस्प शोध का विषय हो सकता ह- कांग्रेस आर 1857। इस शोध विषय को शोधार्थी की प्रतीक्षा ह। भारत का कोई भी उदार इतिहासकार 1857 की चेतना को सहानुभूति से समझने के लिये तयार नहीं।
यह समय भारत के आपनिवेशिक शासकों के प्रति कृतज्ञ होने का समय ह। भारत में इस समय विश्र्वायन का आक्रमण हो गया ह आर लोग या तो इसके साथ चलने के लिये बाध्य हो रहे ह या फिर पिछड़ने के लिये अभिशप्त हो रहे ह। यह आक्रमण उन्नीसवीं सदी के भारतीय परम्परागत समाज पर आधुनिकता का आक्रमण जसा ही ह जिसने एसी परिस्थिति पदा कर दी थी जो या तो आधुनिक सोच, बोध को स्वीकार करके नये तरीके से सोचने आर रहने के लिये बाध्य करती थी या फिर पिछड़ने के लिये छोड़ देती थी। इस सांस्कृतिक आक्रमण के फलस्वरूप समाज एक तरह से पुनर्गठित हुआ था सोच विचार के
दृष्टिकोण में गुणात्मक परिवर्तन हुआ था आर एक नयी दुनिया बनी थी। यह नयी दुनिया बु.र्जुआ नियंत्रित दुनिया थी। आज फिर से एक आर नयी दुनिया को तयार करने की कोशिश हो रही ह। उस समय एक ''राष्ट्रीय'' स्वप्न जन्म ले सका आज एक ''वश्र्िवक'' स्वप्न हमारे सामने लाया जा रहा ह। इसे मानिये या पिछड़िये। लड़ने की कोशिश करेंगे तो मिटा दिये जायेंगे। आज जो लोग वश्र्वीकरण के हमले को आगे ले जाने वाली लहर के रूप में देखने के अभ्यस्त हो गये ह उन्हें यह बेमानी लगेगा कि कुंवर सिंह की जंगल में भटकती सेना लड़ते लड़ते प्राण देना चाहती थी, दिल्ली में सनिक यह जानते हुए भी कि उनका हारना तय ह लड़े जा रहे थे, लक्ष्मीबाई की सेना भी लड़ते हुए मरना पसन्द करती थी। उन लोगों के भीतर जो आग थी, अंग्रे.जों को इस माटी से उखाड़ फेंकने का जो स्वप्न था वह किस तरह उन्हें यह शक्ति दे रहा था। आधुनिक भारत की उस समझ का प्रतिनिधित्व करने वाले जो लोग आज वश्र्िवक जगत के महास्वप्न को लेकर चल रहे ह वे उस धारा के प्रतिनिधि ह जिनसे जुड़ा वर्ग उदार रहा ह, अच्छे बुरे की तमी.ज करना जानता ह, हिंसा पसन्द नहीं करता ह, आर उसके लिये अंग्रे.ज घृणा के योग्य नहीं अनुकरणीय रहे ह। व्ही शांताराम की एक पुरानी फिल्म में एक बूढा सड़क पर गाते हुए कहता ह - 'वह गदर नहीं था हम लोगों का स्वाधीनता संग्राम था' तो वह एक बात जोड़े जा रहा था- 'ये माटी सभी की कहानी कहेगा'। माटी की कहानी कहने वाले लोगों के लिए 1857 के संग्राम की कहानी का महत्त्व कभी कम नहीं होगा। देखने की बात तो यह ह कि उदारवादी वश्र्िवक आसमानी स्वप्न का क्या होता ह।