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Friday, 28 August 2009

स्त्री वादी लेखन की हिन्दी में संभावना

हिन्दी में स्त्रीवादी विमर्श संभव नहीं लगता. इसके कारणों को आलोचकों में ढूढने के बजाय समाज में ढूंढने चाहिए. हिन्दी समाज बना ही इस रूप में है कि इसमें स्त्री का पक्ष ठीक से आता ही नहीं. जिस हालत में हिन्दी समाज है और जिस तरह से इसका विकास हो रहा है स्त्री वादी दृष्टि का विकास दो चीजों पर निर्भर करता है. या तो कोई ऐसा स्कूल बने जो इस विषय को हिन्दी समाज के हिसाब से उठाए. यह स्त्रीवादी आतंकवादी नजरिया न हो नहीं तो इसका प्रभाव नहीं पडेगा. लोग उसे स्वीकार नहीं करेंगे. यह काम धीरज से किया जा सकता है. अभी हाल में अनामिका की एक किताब देखी थी. मुझे लगता है अगर इस तरह का लेखन ज्यादा मात्रा में होने लगे तो बात बन सकती है. मर्दवाद का विरोध करने की जल्दबाजी में कुछ लोग एक इस तरह के स्त्रीवाद को पोसने लगते हैं जो इस समाज के क्या किसी भी समाज के अनुकूल नहीं है. मर्दवाद कोई आसमान से टपकी हुई चीज नहीं है और न ही किसी षडयंत्र के तहद इसे प्रतिष्ठित किया गया है. मर्दवाद एक तरह की समस्या है जिससे परेशान पुरुष भी है. अपने समाज में जब से आधुनिक विचारों का आक्रमण /हस्तक्षेप हुआ तब से ही इस बात की ओर कम ध्यान दिया गया है कि भारतीय समाज को कुछ विजातीय से दीखने वाले तत्त्वों के साथ तालमेल बिठाना पडेगा. स्त्री पुरूष सम्बन्ध को लेकर जो एक तरह की बहस उन्नसवीं शताब्दी में चली थी उसका कोई बडा प्रभाव समाज पर, कम से कम हिन्दी समाज पर शायद नहीं पडा. गांधी के विचारों में एक परिपक्व भारतीय नारीवादी दृष्टि का विकास हुआ दीखता है लेकिन समाज ने उसे भी भुला दिया. जैनेन्द्र के साहित्य में एक भारतीय नारीवादी दृष्टि थी लेकिन हिन्दी समाज भी उसके लिए कोई सही कसौटी नहीं बना पाया. प्रेमचन्द से लेकर रेणु तक में स्त्री वादी (भारतीय) दृष्टि के विकास की संभावना थी. लेकिन समस्या यह है कि इसके बाद लेखिकाओं को उस दृष्टि का और विकास करना चाहिए था. महादेवी वर्मा को छोडकर बाकियों में उस गाम्भीर्य का अभाव दीखता है जो भारतीय समाज की गति-प्रकृति को ध्यान में रखते हुए सामाजिक विचार को आगे बढने और बढाने के लिए आवश्यक है. कुल मिलाकर जो स्त्री की विविध छवियों का मिसाइली हमला बाजारवाद के कारण बहुत विकृत रूप में आया है. 1990 के बाद नारी के आक्रामक रूप ने भीतर ही भीतर भारतीय मर्द को दहला दिया है. यह एक ऐसे समय और स्थितियों के लिए भारतीय मर्द को तय्यार रहने के लिए कहता है जहां वह अपने पुराने सभी आदर्शों से अपने को अलग खडा पाएगा. एक भारतीय मर्द अभी भी उसी के साथ प्रेम करना चाहता है जिसके साथ वह बुढापा बिताने की सोचता है. लेकिन इस समय की नारी उसे आक्रांत करती है. विवाह, परिवार, जीवन साथी, मां की ममता, सात जन्म आदि के साथ इस नयी नारी को मिला नहीं पाता. ऐसे समय में वह बह रहा है, एक अनिर्णय की स्थिति को ढोते हुए.


हिन्दी के अधिकतर सिद्ध विचारक इस समय हाथ जलाने के जोखिम से बचते हुए बाकी का समय बिताना चाहते हैं. वे जिस बौद्धिक स्ट्रेटेजी से काम चलाते हैं उसे समझना कठिन नहीं है. वे नारी का आदर्शीकरण करते हुए पुरूषवाद का विरोध इस अमूर्तन के साथ करते हैं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

होना यह चाहिए कि बडी संख्या में लेखिकाओं को बहस के केन्द्र में लाया जाए और उन्हें धैर्य से सुना जाए. ज्यादा से ज्यादा युवा लेखक लेखिकाओं को बहस के केन्द्र में रखा जाए. लेकिन इसमें एक बडी मुश्किल है. जब दलित लेखकों की एक बड़ी संख्या हिन्दी में सक्रिय हुई वे बहुत हडबडी में दिखाई दिए. इस कमजोरी का फायदा उन लोगों को मिला जो समाज की नई चुनौतियों का मुकाबला नये समय के हिसाब से नहीं करना चाहते थे. धीरे धीरे ये नये दलित लेखक गुटबंदी के शिकार हो गये और दिग्भ्रमित हुए. आज दलित लेखन उतना संभावनाशील नहीं दिखलाई पड रहा जितना उसे होना चाहिए था. स्त्री लेखन को इससे बचना चाहिए. एक स्त्री कुछ अच्छा लिखती है तो हिन्दी के बहुत सारे दिग्गज उसे सहारा देने, उसके बारे में अतिश्योक्तिपूर्ण बातें कहने की प्रतियोगिता करने लगते हैं. मैं तो उस दिन दहल सा गया जब इस बीमारी का शिकार होते हुए एक बहुत् ही संभावनाशील युवा दलित आलोचक को देखा. उन्होंने एक लेखिका की पहली पुस्तक की प्रशंसा करते हुए उसे निर्मल वर्मा से भी श्रेष्ठ घोषित कर दिया! साहित्य का क्षेत्र कोई फिल्म जगत नहीं है जहां किसी को रातोंरात स्टार बनाया जा सकता है. इस क्षेत्र में धैर्य और निष्ठा के साथ लेखन का कार्य करने वालों को ही स्थायी मान मिल सकेगा. हम तो उम्मीद लगाए बैठे हैं कि लेखिकाओं की ओर से नई दृष्टि का विकास हो सकेगा.

Monday, 24 August 2009

प्रभाष जोशी और सती प्रसंग

मुझे खुशी है कि आपने मेरी बातों को सही तरीके से लिया और अच्छा सवाल खडा किया. चार्वाक जी, हम सब ने तुर्गनेव की 'पिता और पुत्र' पढी है. उसका मुख्य पात्र बाजारोव , जो एक निहिलिस्ट था, कहता है कि विध्वंस के बिना सार्थक निर्माण संभव नहीं. एक समय यह बात ठीक लगती थी. लेकिन फिर एक समय आता है जब उसी उपन्यास के एक और पात्र की बात हमारे दिमाग पर हावी होने लगती है- ' यू केन नाट बी द जज आव योर फादर'. हिन्दी की विचित्र स्थिति का अंदाजा मुझसे बहुत ज्यादा आपको होगा. एक समय था जब हमलोग समझते थे कि सुरेन्द्र प्रताप सिंह बहुत पावरफुल आदमी हैं. सच यह नहीं था. प्रभाष जोशी एक समय नौकरी पर रखने की ताकत रखते थे. लेकिन इस तरह की शक्ति के अलावा उनके पास ज्यादा शक्ति नहीं रही होगी. एक व्यक्तिगत किस्सा बताना चाहूंगा. भारत की एक बडी मीडिया संस्था गुजरात समाचार ने तय किया कि वह एक अखबार शुरू करेगी. उस समय जिस आदमी को यह दायित्व दिया गया कि वह जगह जगह से आये आवेदनों पर विचार करके नियुक्तियां करे उसने सबसे पहले मुझे चुना और फिर हम दोनों ने मिलकर बहुत सारी नियुक्तियां की. हमलोग बहुत पावरफुल समझे जाते थे क्योंकि 40 से ज्यादा लोगों को नौकरी दी थी, और भी दे सकते थे. करोडों रूपये का मामला हमलोगों के हाथ में था. मं व्यक्तिगत कारणों से पत्रकारिता छोड कर दूसरे काम में लग गया. बाद में असली पावरफुल व्यक्ति का जो हुआ वह मेरे लिए सबक से कम नहीं था. चार्वाक जी, आप चाहे इसे मेरा सनकीपन समझें लेकिन हो सके तो इस बात को मान लें कि अखबार मालिक हिन्दी के पत्रकार-सम्पादक को चपरासी से ज्यादा नहीं समझते. ऊपर से भले ही आप आप करें भीतर ही भीतर उसे अपना व्यक्तिगत नौकर ही समझते हैं. हिन्दी में वैसे भी दो चार लोग हैं जिसे देखकर हिन्दी वालों को भी थोडा मान मिलता है. रामविलास शर्मा, नामवर सिंह, प्रभाष जोशी, मैनेजर पाण्डेय जैसे लोग कम हैं. आप इन महानुभावों से असहमत हों, उनसे झगडा करे लेकिन उन्हें बचा कर भी रखें. इन सब लोगों में कुछ कुछ ऐसा है जिससे हमें बहुत असुविधा होती है, खीज भी होती है लेकिन क्या किया जाये? हमें हिन्दी के वृहत्तर सरोकारों को ध्यान में रखते हुए इन्हें बचाकर रखना पडेगा. और दो में तीन ब्राह्मण की बात ? हिन्दी का विकास जिस रूप में हुआ है उसको ध्यान में रखने पर यह कुछ स्वाभाविक ही लगेगा. हिन्दी बौद्धिक समाज का चरित्र पिछले 10-15 सालों में तेजी से बदला है. अब यहां अन्य जातियों का दखल बढा है. अब तीन में दो नहीं तीन में एक ब्राहमण ही मिलेगा. समय अब बदला है. उम्मीद है परिदृश्य और भी बदलेगा. कुछ ज़्यादा बोल गया होउं तो क्षमा प्रार्थी हूं.


पर, यह मत समझिएगा कि सती के प्रसंग में जोशी जी की जान हमलोग छोडने वाले हैं.

Saturday, 22 August 2009

नन्दीग्राम के बाद कोलकाता में बौद्धिक आक्रोश


यह एक मानी हुई बात है कि नन्दीग्राम के भीषण हत्याकाण्ड के बाद कोलकाता के बौद्धिक परिवेश में हलचल शुरू हुई और यहां का हिन्दी जगत भी इससे अछूता नहीं रहा. कुछ तस्वीरें यहां रखी जा रही हैं जो यह बतलाने के लिए हैं कि हम चुप नहीं थे, हमारी आवाज वहां थी.