Friday, 7 October 2011

स्टीव ज़ॉब्स , एडिसन और कार्ल मार्क्स

स्टीव जॉब्स युवावस्था में भारत आये थे इस उम्मीद में कि यहाँ उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होगी लेकिन वे इस देश की गरीबी को देखकर इतने परेशान हो गए कि उन्हें लगा कि इस देश को आध्यात्मिक गुरूओं या राजनैतिक सिद्धांतकारों से अधिक तकनीकी प्रतिभाओं की जरूरत है जो उनके जीवन को बेहतर बना सके. उनका एक प्रसिद्ध कथन है कि टॉमस एडिसन कार्ल मार्क्स से ज्यादा उपयोगी हैं क्योंकि उनके काम से मानवता का अधिक भला हुआ. जॉब्स ने बडे काम किए हैं लेकिन इस कथन को स्वीकार करना कठिन है. समाज में जितनी भी समृद्धि हो अगर उसके पास नैतिकता न हो तो वह समाज काम्य नहीं हो सकता. रावण की लंका सोने की थी. निश्चित रूप से वहाँ अयोध्या से अधिक समृद्धि थी लेकिन क्या इस कारण से उसे बेहतर माना जा सकता है ? मनुष्य -मनुष्य के बीच कोई भेद न हो और लोग समानता और भातृत्व के साथ समाज में रह सकें इस विचार को आगे लाने के लिए प्रयत्नशील लोग तकनीकी प्रगति के लिए प्रयत्नशील प्रतिभाओं से ज्यादा जरूरी हैं. हाँब्सबाम ने याद दिलाया है कि बीसवीं शताब्दी इतिहास की सबसे हिंसक शताब्दी थी जिसने युद्ध के चरित्र को ही बदल दिया. पहले युद्ध करने वाली सेना, युद्ध के दौरान मारी जाती थी और युद्ध के बाद शांति का दौर शुरू होता था. लेकिन, बीसवीं शताब्दी ने युद्ध नहीं करने वालों को भी मारना शुरू किया और युद्ध के बाद भी युद्ध को बनाए रखने के लिए संसाधन जुटाए रखे. यह सब कुछ तकनीक के सहारे हुआ और तकनीक ने इसे 'लेजिटिमाइज' भी किया. खाडी युद्ध को कैसे भुलाया जा सकता है ? अफगानिस्तान से लेकर इराक तक न जाने कितने उदाहरण दिए जा सकते हैं. जब तक मानवता के पास बेहतर समाज का स्वप्न नहीं होगा सिर्फ तकनीक उसे विनाश के रास्ते पर ही ले जाएगी. एच जी वेल्स के 'टाइम मशीन' का स्मरण हो आता है.

समृद्ध और संस्कृतिहीन हिन्दी समाज के संपन्न वर्ग और बुद्धिजीवियों से अपेक्षाएँ (एक फौरी, आधी अधूरी टिप्पणी)

हिन्दी के बुद्धिजीवी

मराठी या बंगाली बुद्धिजीवियों की तरह अपने समाज से जुडे हुए नहीं हैं. यह निष्कर्ष निकलता है एक सेमिनार का जिसमें हिन्दी समाज के चार बडे विद्वान हिस्सा लेते हैं. गौतम नवलखा का मत है कि "1998 से ही सरकार ने यह मान लिया है कि माओवादी आंदोलन सामाजिक समस्या नहीं बल्कि एक कानून और व्यवस्था की समस्या है! सरकार सुधार और दमन को एक साथ चला रही है. सरकार मानती है कि माओवादी आंदोलन को कमजोर करना दूसरे आन्दोलनों को कमजोर करने की पहली शर्त है. इस लिए सभी वाम ताकतों को सरकार के इस खेल को समझना चाहिए. आज मात्र एक आंदोलन के बल पर क्रांति नहीं हो सकती. जब सभी वाम पार्टियों का ‘विजन’ एक है तो सभी को मिल कर काम करना चाहिए. दूसरे वाम दलों को सोचने की जरूरत है कि यदि माओवादी आंदोलन कमजोर होता है तो देर सबेर उन पर भी संकट आएगा. सभी को अपनी अपनी कमजोरी को बांटना चाहिए. अपने अंतर्विरोधों को विचार विमर्श के जरिये हल करना चाहिए. मार्क्सवाद व्यवहार का सिद्धांत है. और हमें व्यवहार के जरिये काम को आगे ले जाना होगा."

समयांतर के सम्पादक और लेकिन दरवाजा के लेखक पंकज बिष्ट मानते हैं कि हिन्दी में एक भी लेखक नहीं है जो अपने समाज से जुडा है. सब बस सरकारी तंत्र के सामने भीख माँगने वाले याचक हैं. सारे लेखक- पत्रकार सरकार के द्वारा खरीदे जा रहे हैं. हिन्दी समाज में कोई भी तेंदुलकर जैसा जनता का आदमी नहीं है जो कह सके कि अगर उसके पास बंदूक होती तो वह मोदी को गोली मार देते. आनंद स्वरूप वर्मा के हिसाब से देश में 'रीकालॉनाइजेशन' की प्रक्रिया चल रही है. इस क्षेत्र के तमाम देशों में सिर्फ नेपाल है जहाँ औपनिवेशिक दबाव नहीं है. भाषा और संस्कृति का इलाका दक्षिणपंथियों के हवाले छोडकर वामपंथियों ने बडी गलती की है. गाँधीवादी हिमांशु कुमार के अनुसार - "गाँधी ने कहा था कि अंग्रेजियत चली जाये अंग्रेज रह जाये. यह उन्होंने इसलिए कहा था कि वे समझते थे कि अंग्रेजो का विकास का मॉडल गरीब जनता के खिलाफ है. वह मिडिल क्लास पैदा करता है जो श्रमजीवी किसान जनता पर बोझ होती है. अंग्रेजों के आने से पहले भारत में मिडिल क्लास नहीं था. गाँधी ने कहा कि विकास का अंग्रेजी मॉडल दूसरे देश की जनता का क़त्ल करता है. भारत देश किसका क़त्ल करेगा? लेकिन नेहरु ने उसी मॉडल को अपनाया. आज सेना बस्तर पहुँच गई है!"

मीडिया विशेषज्ञ दिलीप मंडल को लगता है कि कारपोरेट मीडिया में काम करने वाला बुद्धिजीवी जनता का बुद्धिजीवी नहीं हो सकता है. प्रशांत राही (उत्तराखंड के वामपंथी कार्यकर्त्ता) ने देश में दो विकास के मॉडलों- माओवादी और गाँधीवादी- की चर्चा की और कहा कि बुद्धिजीवी या तो राज्य के साथ रहे या जन-आन्दोलन के साथ.
इन विश्लेषणों में सच का एक हिस्सा तो है लेकिन इसमें पूरा विश्लेषण नहीं है. बुद्धिजीवी अगर विजय तेंदुलकर की तरह यह बोले कि अगर उनके पास बंदूक होती तो वे मोदी को गोली मार देते एक ऐसा वक्तव्य है जिसको एक बैचैन बुद्धिजीवी की एक परेशानी में दी गयी टिप्पणी के अतिरिक्त कुछ मानना युक्तिसंगत न होगा.

बुद्धिजीवी आखिर कौन है ? यह हमारे समाज में किस हैसियत में है? क्या हिन्दी का बुद्धिजीवी समाज में ऐसी हैसियत रखता है कि वह समाज का नेतृत्व कर सके ?
हिन्दी समाज में सबसे अधिक जनता के साथ खडे होने का श्रेय उस समय के बुद्धिजीवियों को है जिन्हें हम भारतेन्दु युग कहते हैं. जिस निष्ठा के साथ कठिन परिस्थितियों में लेखक पत्रकारों ने काम किया वह अतुलनीय है. लेकिन हुआ समाज से उन्हें समर्थन नहीं मिला. आप देख लीजिए किस तरह वे लोग गये. कुछ लोग तो फटेहाली में मरे. गाँधी युग में बुद्धिजीवी राजनीतिज्ञों के पीछे या साथ साथ चलने वाले लोग ही बने रह सके. उनमें से भी जो लोग रैडिकल थे वे पीछे छूट गये. आपने से कईयों ने राधामोहन गोकुल जी का नाम सुना होगा. उनके बारे में पढते हुए इस हिन्दी समाज के संपन्न और संस्कृतिहीन लोगों की कृतघ्नता का पता चलता है. जब तक राजनेताओं ने किसी की सुध न ली कोई लेखक सम्मान का अधिकारी न हुआ. स्वामी सहजानंद का उदाहरण सामने आता है. उनसे बड़ा जनता का आदमी शायद ही कोई हुआ हो. लगभग अप्रासंगिक हो गये. भला हो उनकी जाति के नेताओं का जिन्होंने उन्हें जिलाए रखा.
आज़ादी के बाद हिन्दी का बुद्धिजीवी हाशिए पर ही रहा. समाज का नेतृत्व नेताओं के पास ही रहा. बुद्धिजीवी समाज के द्वारा पोषित हों तब तो वे वैसा कुछ कर सकें जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती है. बंग्ला समाज अपने बुद्धिजीवियों के प्रति संवेदनशील रहा है. शमशेर के स्तर का कोई कवि बंग्ला में इतनी परेशानी में कभी नहीं रहेगा. मुक्तिबोध की बात न ही करें. आज आलोक धंवा घनघोर संकट में हैं. उनको जब लटकने के लिए एक रस्सी मिली तो उन्हें न जाने क्या क्या कहा जाने लगा. पूरे समाज में वही बुद्धिजीवी सामान्य तरीके से रह पाया जिसके पास कोई नौकरी हो या वह किसी बडे परिवार से आता हो. ऐसे में बुद्धिजीवी पर ठीकरा फोडना एक तरह से अनुचित है. समाज के नेतागण, बडे लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं. कैसा समाज है हमारा ? बंगाल के हर घर ने टैगोर, बंकिम और शरत से लेकर जीवनानंद तक को सँजोया. महाश्वेता देवी आसमान से नहीं टपकीं. वे जब नवयुवती थी तब झाँसी जाकर लक्ष्मीबाई पर शोध कर सकती थीं. ऐसा समाज उन्हें मिला. और अपना हिन्दी समाज ? ज्यादा न ही बुलवायें .
बुद्धिजीवी सॉफ्ट टारगेट हैं . इसलिए जिसको जो मन में आता है वह उनपर जो चाहे बोल सकता है.

अब वापस उस जगह लौटा जाए जहाँ से बात शुरू हुई थी. इस देश में एक अतिवाम धारा है जिसके लिए बुद्धिजीवी की भूमिका तय है. वह यह आशा करते हैं कि बुद्धिजीवी सडकों पर उतरें, कंधे पर बंदूकें हों और वे हर उस कृत्य का समर्थन करें जिसे इस धारा की मुक्ति वाहिनी कर रही है. जो भी ऐसा नहीं करें वे बुद्धिजीवी नहीं सत्ता के हाथों बिके हुए हैं. इस धारा की धार को अर्द्ध -शताब्दी तक देखने-झेलने के बाद जनता उनके साथ जाने को तैयार नहीं. इसकी जिम्मेदारी किसकी ? निश्चित रूप से बुद्धिजीवी की ! वे ही नहीं समझते कि दरअसल माओवादी जनता के लिए लड रहे हैं और राज्य के खिलाफ उनका हर खूनी संघर्ष जायज है, जरूरी है. लेखक की किताब नहीं खरीदी जाती तो उसके लिए लेखक दोषी है. ऐसी किताबें क्यों नहीं लिखता जिसे जनता खरीदे ? विकास के मॉडल में माओवादी और गाँधीवादी मॉडल (पता नहीं यह बायनरी कैसे बनती है) के बीच बुद्धिजीवी को सीधे सीधे माओवाद के समर्थन में उतर जाना चाहिए. कार्पोरेट के लोग झूठे हैं (संरचनात्मक कारणों से !) और दक्षिण एशिया के तमाम देशों में एक ही आदर्श देश है जो औपनिवेशिकता के सांस्कृतिक दबावों से मुक्त है और वह है नेपाल !! इस तरह के जन-ज्वार में बहते हुए प्रबुद्धों के साथ हिन्दी के बुद्धिजीवी न बहें तो धिक्कार है उनपर !

Monday, 12 September 2011

हिरामन से राजा हिन्दुस्तानी बनता गाँव का आदमी


हिरामन से राजा हिन्दुस्तानी बनता गाँव का आदमी और गाँव का असली हाल

एक बहुप्रचारित कथन है - "ग्लोबल अपने पीछे एक लोकल बना लेता है." इस बात को ध्यान से समझ लेने से यह स्पष्ट हो जाता है कि वैश्वीकरण की आँधी में पुराने भारतीय गाँव का बदल जाना उसकी नियति थी. इन दिनों यह कहना और सोचना आम हो गया है कि हम अपना गाँव खो रहे हैं. जिस तरह की सूचनाएँ उपलब्ध हो रही हैं उससे यह बात स्पष्ट है कि अब हम अपने गाँव को एक ऐसी इकाई में बदलते देख रहे हैं जो शहर बनने की प्रक्रिया में हैं. जितनी जल्दी उनका विकास होगा वे शहर की तरह हो जायेंगे. भारतीय संदर्भ में अब गाँव में रह रहे लोग गाँव के बारे में एक तरह से सोच रहे हैं और गाँव के जीवन की स्मृति के साथ लिखने वाले लोग दूसरी दृष्टि से. कईयों को यह लगता है कि गाँव के प्रति मोहग्रस्त लोगों के पास एक रूमानी दृष्टि है. इस रूमानी दृष्टि में चीजें किसी एक आदर्श की स्मृति के साथ रहती हैं या फिर किसी चरम स्थिति या आदर्श की ओर चीजें बढ रही होती हैं. लेखक और सिरफिरे किस्म के आदर्शवादी या संस्कृतिकर्मी ही गाँव को गाँव के रूप में बचाने की जरूरत पर ध्यान देते हैं.  इस आलेख में गाँव की स्थिति, उसकी स्मृति, उसकी असलियत और संभाव्य स्थिति पर एक संक्षिप्त टिप्पणी की गयी है.
  मूल बात पर आने के पूर्व इन पंक्तियों के लेखक की अपनी दृष्टि को स्पष्ट रूप से व्यक्त कर देना उचित होगा. 1920 से 1960 के बीच पश्चिम में जो एक उपभोक्ता समाज पैदा हुआ उसके लिए किसी चीज का मूल्य उसकी उपयोगिता में निहित न रहकर उसकी 'साईन वेल्यू' पर ज्यादा निर्भर है. यह एक ऐसा समाज था जो प्राक आधुनिक समाजों से गुणात्मक रूप से भिन्न था. प्राक आधुनिक समाजों में चीजों की तुलना में कुछ मूल्य अधिक महत्त्व रखते थे. बोद्रिला के शब्दों में कहें तो समाज 'सिम्बॉलिक एक्सचेंज' पर अधिक आधारित था और उत्पादन पर कम. आधुनिक समाज में उत्पादन ज्यादा महत्त्वपूर्ण बना. अब उत्तर-आधुनिक समाज में पूँजी से भी ज्यादा महत्त्व टेक्नोलॉजी का हुआ और एक तरह से किसी भी चीज की महत्ता को समाज में जिस रूप में रखा जाता है उसी से उसका महत्त्व निर्धारण होता है. ऐसे में गाँव अपने भदेस रूप में किसी भी तरह से काम्य नहीं रह गया है और इस तरह का 'सिमुलेशन' (एक तरह से मूल्य बनाने का तंत्र) गाँव और गाँव से जुडी तमाम चीजों को दोयम दर्जे का प्रचारित करने लगा है. समाज में जब तक राष्ट्रवाद जैसी आधुनिक विचारधारा का प्रभाव रहता है तब तक गाँव की एक सुंदर कल्पना बनी रहती है. जैसे जैसे राष्ट्र और राष्ट्र-राज्य कमजोर होते हैं गाँव बीते जमाने को ढोने वाला स्पेस बन जाता है जिससे जितनी जल्दी मुक्ति मिले उतना ही अच्छा.
पिछले दो दशकों में भारतीय गाँवों के चरित्र में जो बदलाव आये हैं उसके कारणों और परिणामों पर विचार करने के पूर्व दो बातों का उल्लेख ज़रूरी है. प्रथम, क्या भारतीय ग्राम वैसे कभी थे जैसे राष्ट्रीय कल्पना के युग में उसे देखने की कोशिश हुई ? एक विद्वान ने ठीक ही कहा है कि ये सपने के गाँव भारत में सिर्फ सपनों में ही रहे कभी वास्तविक गाँव से इस सपने का कोई जोड नहीं बना. यह नारों में, साहित्य में, सिनेमा में और शहर में रहने वाले शहरी की कल्पना में बसा हुआ गाँव था जिसमें गाँव के किसान धरती का सीना चीरकर अपने खून पसीने से असली सोना- अनाज पैदा करते थे, पूरे समाज की चिंता करते थे, शांति से और संतोष से जीना चाहते थे. उन मेहनती किसानों को भारतीय जीवन, जीवन शैली के केन्द्र में रखकर कुछ इस तरह देखा गया कि गाँव के समाज की तमाम अंदरूनी कमजोरियाँ पार्श्व में चली गयीं. गाँव के प्रति इस रूमानी दृष्टि को हम भारत के बाहर के मुल्कों- विशेषकर रूस में भी पाते हैं जहाँ किसान जीवन को आदर्श और सच्चाई से जोडकर देखा गया. आज इस धारणा पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है.
दूसरी बात जिसपर सोचा जाना चाहिए कि वैश्वीकरण के दौर के तर्कों ने ग्रामीण जीवन को किस तरह प्रभावित किया. यह एक बहुप्रचारित बात है कि वैश्वीकरण ने अंतर्राष्टीय पूँजी के इस विस्तार के युग में गाँवों को बाजार की शक्तियों के हवाले कर दिया और देखते ही देखते गाँव का पूरा चेहरा बदल गया, उसके मूल्य बदल गये और अब स्थिति ऐसी आ गयी है कि गाँव अब शहर जैसे ही हो गये हैं. इस पूरी प्रक्रिया पर आँसू बहाना लगातार जारी है लेकिन इस परिवर्त्तन के कारणों पर विस्तार से बहस कम ही होती है.
सुविधा के लिए हम साहित्य के उदाहरण लें. गाँव और शहर के साभ्यतिक अंतर को रेखांकित करते हुए रवीन्द्रनाथ टैगोर और गाँधी के विचारों से ही बात करना उचित होगा. यह बात सबको पता है कि गाँधी भारत को गाँवों का देश मानते थे और सारे जीवन वह गाँव और उसमें रहने वालों को ही ध्यान के केन्द्र में रखते रहे. टैगोर ने तो गाँव और शहर के बीच के अंतर को एक अनुभव के आधार पर अपने एक प्रसिद्ध निबंध में रखा है. उन्होंने लिखा है कि एक बार वे शांतिनिकेतन से कलकत्ता आ रहे थे. उनकी गाडी बीच बीच में खराब हो जाती थी और उसे फिर से चालू करने के लिए पानी की जरूरत होती थी. रास्ते में कई बार गाडी खराब हुई और हर बार आसपास के गाँवों के गरीबों ने पानी ला लाकर उन्हें मदद की. पानी लाने वाले बहुत गरीब थे और उन्हें पैसों की सख्त जरूरत होगी यह समझकर टैगोर ने उन्हें जब पैसे देने चाहे तो उन्होंने नहीं लिए क्योंकि किसी जरूरतमंद को पानी पिलाना और खाना खिलाना वे अपना धर्म समझते थे जिसके एवज में पैसे लेना उनके लिए पाप था. ऐसा ही अनुभव रास्ते में कई बार हुआ और किसी ने भी पानी देने के लिए पैसे लेना स्वीकार नहीं किया जबकि उन्हें पैसे की सख्त जरूरत थी. जैसे ही रवीन्द्रनाथ की मोटर कलकत्ता पहुँची और पानी की जरूरत पडी इसके लिए पैसे देने के लिए शहरी ने कहा जबकि उनके लिए पानी की व्यवस्था करना गाँव के देहातियों की तुलना में बहुत सहज था. रवीन्द्रनाथ के लिए लोगों के इस अंतर को ही सभ्यता का अंतर था. यानि, शहर का आदमी गाँव के आदमी की इस संस्कृति और धर्म-विवेक के स्थान पर मुद्रा-भित्तिक विनिमय को ज्यादा सही समझने लगा है. यह उसकी बुद्धि से आया है. गाँव और शहर के बीच के अंतर का एक हद तक रूमानी अंतर इस कथा में अंतर्निहित है. इसी तरह के कई उदाहरण साहित्य से निकाले जा सकते हैं जिसमें गाँव और शहर के बीच के इस अंतर को ध्यान में रखा गया है. कल्चरल इथॉस में यह अंतर कुछ इस तरह रच बस गया है कि लोकप्रिय सिनेमा से लेकर नाटकों तक में इस भाव को ही दुहराया गया है.
उन लेखकों को इस बात का श्रेय मिलना चाहिए जिन्होंने इस तरह के एकांगी और आदर्शवादी गाँव के भीतर की जटिलता को समझने की कोशिश की. आज़ादी के बाद के हिन्दी उपन्यासों में गाँव की तस्वीर किस तरह बदली है इसके लिए फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यासों को देखा जा सकता है. गाँव के चित्र को मैला आँचल में कम और परती परिकथा  में अधिक फैलाव देते हुए रेणु ने जो शुरूआत की थी उसे श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी  ने रूप दे दिया. इस समय तक आते आते गाँव और शहर के बीच के अंतर में वह पुराना समीकरण- गाँव का भोला भाला व्यक्ति बनाम शहर का चालू व्यक्ति - बदल चुका था. शुक्ल के इस गाँव में आगे का कोई रास्ता नहीं बनता और जीता जागता आदमी और उसका पूरा संघर्ष का जीवन हास्यास्पद आयाम प्राप्त कर लेता है.
गाँव इस तरह बदले कि अब वहाँ संघर्ष तीव्र होने लगे और बदलाव की छटपटाहट तीखी होने लगी. इस बात पर ध्यान केन्द्रित करते हुए यह साफ दिखलायी देने लगा कि गाँव का सच वह नहीं है जो टैगोर, प्रेमचंद से लेकर सियारामशरण गुप्त तक देखने में आता था. लेकिन फिर भी गाँव के पुराने ढाँचे को पूरी तरह से 1990 के दशक के पहले नहीं तोडा जा सका. ग्लोबलाइजेशन के प्रभाव में ही गाँव का चरित्र बदला. इस प्रसंग में यह चर्चा संभव नहीं कि ऐसा क्यों हुआ लेकिन यह कहना प्रासंगिक होगा कि विकास की धारणा के अंतर्गत यह सामान्य नियम सा है कि गाँव को शहर की ओर जाना है, कृषि को उद्योग की ओर जाना है और धीरे धीरे मशीन केन्द्रित औद्योगिकीकरण द्वारा ही समाज की बढती जरूरतों को पूरा करना संभव है. आधुनिकीकरण मशीनीकरण का ही दूसरा नाम है. सारी दुनिया में यही मॉडल सब जगह माना गया है. इन बातों पर बगैर ज्यादा सोचे समझे ही इस देश की अर्थव्यवस्था को गुणात्मक रूप से बदल डालने वाली एक प्रक्रिया शुरू हो गयी जिसे हमसब नयी अर्थनीति से चालित वैश्वायन की प्रक्रिया कहते हैं. इसके आने के बाद बहुत ही स्वाभाविक तरीके से गाँव अब शहर की ओर तकते हुए जीने लगे. गाँव और शहर के बीच की दूरी मिटी नहीं लेकिन सपनों के बीच की दूरी मिट गयी. अब गाँव का आदमी गँवार नहीं था अब वह एक ऐसा आदमी था जिसके सपने शहरी हो रहे थे. पहले टेलिविजन, फिर केबल और बाद में मोबाईल ने उन्हें दुनिया से इस तरह 'कनैक्ट' कर दिया कि उनके सपनों में वे सपने पलने लगे जो किसी शहर के किसी गंदे कोने में जीते बस्ती में रहने वालों के दिलों में पलते थे. यह ग्रेट कल्चर और लिट्ल कल्चर के बीच के गायब होने का एक ऐसा दौर था जिसमें कोई भी यह सोच सकता था कि वह येन केन प्रकारेण बडा बन सकता है या उसे बनना चाहिए. पूरा हिन्दुस्तान मानों मिलिनियेर डॉग बनने के लिए लालायित सा दीखने लगा. कैसे भी हो गाँव को शहर की ओर जाना ही चाहिए यह मानो मंत्र सा हो गया. इस यात्रा को विकास कहा गया. हर दल इस विकास के लिए कटिबद्ध सी हो गयी.
विकास का यह तूफान अब तक नहीं थमा है. बेशुमार पैसा समाज में आया और इसने गाँव देहात के लोगों को पैसे की शक्ति से परिचित करवा दिया. कल का साधारण सा एक लडका किसी बडी कम्पनी में काम करके लाखों कमाने लगा और उस गाँव का हर बच्चा उस आदर्श जीवन के लिए जी तोड परिश्रम करने के लिए कोटा आदि जगहों में जाकर कोचिंग करने लगा. गाँव गाँव में यह खबर फैल गयी कि किसी तरह अगर 'आई आई टी' को क्रैक कर दिया जाये तो चाँदी ही चाँदी है. इस तरह के कई अन्य प्रलोभन मैनेजमेंट, मीडिया और सॉफ्टवेयर के क्षेत्रों से होता हुआ विज्ञापन की दुनिया तक फैलता गया और इस प्रक्रिया में गाँव के लोग भी जुडते गये. यह कितना दिलचस्प है कि नैनीताल, शिमला आदि स्थानों पर स्कूली शिक्षा के लिए लाखों रूपये खर्च करने वालों में सबसे बडी संख्या बिहार के छोटे शहरों के लोगों की है जो अपने बच्चे को किसी काबिल बनाने के लिए सब कुछ करने को तैयार हैं.
यह बिल्कुल सही है कि नयी अर्थनीति गाँवों पर आक्रमण है. पर, इस आक्रमण के लिए खुद गाँव के लोग प्रतीक्षा में रहते हैं. एक उदाहरण देना उचित होगा. उत्तराखंड में किसी इलाके में वन सम्पदा की रक्षा के लिए सरकार ने कडे नियम बनाए ताकि जंगल बच सके. देखा गया कि वहाँ के लोगों ने ही जंगलों में आग लगाना शुरू कर दिया ताकि विकास की संभावना बन सके !
एक अन्य उदाहरण लें. बहुत सारे लोग जमीन अधिग्रहण के खिलाफ हुए. उन्हें लगा कि किसानों की जमीन पर जबरन पूँजीपति लोग पैसे और शक्ति के बल पर कव्ज़ा जमा रहे हैं. लडभिड कर अंत में हुआ यह कि किसानों ने अपनी ज़मीन को ज्यादा कीमत पर बेच दिया. पता चला कि किसानों को कीमत को लेकर समस्या थी. उन्हें जब अधिक कीमत मिल गयी तो उन्हें ज़मीन बेचने में कोई दिक्कत नहीं हुई. उनकी लडाई लडने वालों में बहुतों को लगा कि उन्होंने आन्दोलन करके, दबाव बनाकर सिर्फ इतना किया कि ज़मीन की कीमत बढवा दी. ज़मीन अधिग्रहण को वे रोक नहीं पाये.
इस दौर में आयी नयी परिस्थिति में यह सोचना कि यह ट्रैंड बदलने वाला है एक खुशफहमी होगी. पैसे के लालच ने गाँव के लोगों को भी बदल दिया है. अब वे लोग स्मृति में ही रह गये हैं जो पानी को बेचना धर्म के विरूद्ध समझते हों. शहर और गाँव के बीच का साभ्यतिक अंतर जिसे रवीन्द्रनाथ ने बीसवी शताब्दी के पूर्वार्द्ध में लक्षित किया था वह अब मिट सा गया है. इसे समझने के लिए गाँव देहात के लडके-लडकियों के मोबाईल पर हो रही बातचीत, उस मोबाईल में लोड की गयी सामग्री आदि को देखना भी पर्याप्त होगा. करोडों मोबाईल सेट आज जिस गति से गाँव देहातों में व्यवहृत हैं उसे अगर संकेतक माना जाये तो गाँव का आदमी शहर से पीछे रहने के लिए अब किसी भी रूप में तैयार नहीं दीखता. संख्या की दृष्टि से भले ही साडियाँ अब भी बहुत बिकती हैं और अभी भी पुराने गाने सुने जाते हैं, विवाह आदि में पुराने रीति रिवाज़ आज भी कायम हैं आदि आदि कहकर तसल्ली देना संभव हो लेकिन धीरे धीरे चीजें जिस ओर जा रही हैं उससे लगता नहीं कि पुराने गाँव की वापसी की कोई संभावना अब बची है.
गाँव गाँव बनता था उनमें रहने वालों के कारण. ये लोग अलग थे- अपनी सीमित आय और अपनी सीमित आकांक्षाओं के साथ ये गाँव वाले एक 'कम्यूनिटी' बनाते थे और इस कम्युनिटी की छत्रछाया में कम खा कर और ग़म खाकर रहते आये थे. अब वह कम्युनिटी धीरे धीरे खत्म होती जा रही है. आधुनिकता और अब विकास की दोहरी मार से पुराने लोग और पुराने विचार पीछे हटने लगे. यह इस रूप में काम्य था या नहीं इसपर विवेचना हो सकती है लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि अब जात-पात, गाँव जवार आदि के बंधन फिर से उतने शक्तिशाली नहीं हो सकते. वे किसी किसी समय किसी विकास की चाह में लामबंद तो हो सकते हैं लेकिन इस आधारों पर सहज रूप से संघबद्ध नहीं हो सकते.
पिछले सालों में गाँव के भीतर एक दो ऐसे आन्दोलन ने उत्तर भारत में जोर पकडा था जिसने गाँव के लोगों को अपनी सभ्यता और संस्कृति के प्रति सजग और कट्टर समर्थन में खडा किया. इनमें खाप पंचायत के मामले ने कुछ दिलचस्प सवाल खडे किए. अपनी जाति/ गोत्र/ शादी के मामले में अपनी मर्जी बनाम परिवार की मर्जी आदि कई ऐसे मुद्दे बने जिसके बारे में एक भयानक सच सामने आया कि गाँव के कानून शहर के कानून से अलग है. एक साभ्यतिक अंतर भी उभरा. देश भर में इस विषय पर जो चर्चाएँ हुई उसने यह स्पष्ट कर दिया कि गाँव की ये बातें 'फंडामेंटलिज्म' को बढावा देती हैं और गाँव के लोग अपनी बहू बेटियों के साथ बर्बर व्यवहार करते हैं. एक झूठे मान की रक्षा के लिए अपनी बेटी का गला रेतने वाले ये ग्रामीण किसी भी तरह से उस आदर्श ग्राम के निवासी रूप में देखे जा सकते है? ये लोग जो स्त्री और दलितों के प्रति इतनी हेय दृष्टि रखते हैं उनके विचार क्या समाज को स्वीकार हो सकते हैं ? क्या इन दकियानूसी परम्परा को ढोते हुए आज भारतीय समाज दुनिया की तरक्की कर रही जातियों का मुकाबला कर सकती है ? इस तरह के सवाल मीडिया में बार बार उछलते रहे और यह उत्तर आता रहा कि हमारा ग्रामीण समाज सड गया है. सरकार ने जिस तरह विकास को घर घर पहुँचाने का जिम्मा लिया उसकी परिणति यह है कि आज दस- बीस गुणा अधिक पैसा खर्च करके भी गाँव को इस योग्य नहीं बनाया जा सका है कि इसमें रहने वाला यह न सोचे कि वह शहर आखिर क्यों जाये. इन पंक्तियों के लेखक को अपने जीवन में एक भी आदमी ऐसा नहीं मिला जो अपने गाँव से संतुष्ट हो और शहर में (जिसे कई इलाकों में रोड साइड कहा जाता है) न बसना चाहता हो.
श्री लाल शुक्ल के उपन्यास राग दरबारी  पर दुबारा लौटते हुए एक पात्र के मुँह से कहलायी गयी बात बहुत सही है कि शहर में आगे का रास्ता दिखलायी पडता है जो कि गाँव् में नहीं दिखता. रोड, बिजली, अस्पताल, शिक्षा और ज्ञान विज्ञान के सारे अवसर शहरों में केन्द्रित हैं और गाँव में रहकर ठीक से खेती करना भी अब संभव नहीं रह गया है. और शहर में आने, इससे जुडने का मतलब अब वह नहीं रह गया है कि हीरामन गाँव से शहर मेले ठेले में आयेगा, बैलगाडी से धीरे धीरे चलते हुए मंदिर के पास डरते डरते गुजरेगा, भूत-प्रेत को सच मानते हुए मनौतियाँ मानेगा और किसी कुँवारी औरत को महुआ घटवारिन की कथा सुनाते हुए ले जायेगा. अब तो वह सब कुछ समझने लगा है और आकांक्षी हो गया है कि उसे वह सब कुछ क्यों नहीं मिल सकता जो किसी बडे आदमी को मिल सकता है. हीरामन अब राजा हिन्दुस्तानी का दिल रखता है. किसी भारतीय गाँव में सूरदास और होरी अब मिलें यह कठिन है और अगर मिले भी तो वे उस निर्णायक स्थिति में अब नहीं मिलेंगे जिसका उस समाज पर कोई व्यापक प्रभाव हो.
आधुनिकता की आधी अधूरी यात्रा के बीच में उत्तर आधुनिक हस्तक्षेप आने के बाद इस देश में चित्त विजय कर पूरी तरह से काबिज हो गये ग्लोबल मन के कई रजिस्टर हैं. एक में वह गाँव में रहता है, पूजा पाठ करता है तो दूसरे में काइयां बनकर हर तरह के तोल-भाव के लिए तैयार रहता है जिससे वह भी शहर के आदमी की तरह जिंदगी का मज़ा ले सके. इस देश के विभिन्न क्षेत्रों के अखबारों को उलटने से पता चल जाता है कि गाँव देहात अब कितने शहर नुमा गंदगियों से कितना भर गये हैं . विडंबना यह है कि आगे बढने का हर रास्ता इन्हीं गंदगियों से होकर गुजरता है.
विज्ञान, तकनीकी, आधुनिक शिक्षा, मीडिया, औद्योगीकरण और विस्थापन के इस दौर में सारी दुनिया में शहर तेजी से बढे हैं. इतिहासकार हॉब्सबॉम ने बीसवी शताब्दी पर एक विहंगम दृष्टि डालते हुए लिखा है कि इस शताब्दी के अंतिम चरण में ज्यादा लोग शहर में रहने लगे. गाँव से शहर आने के इस 'शिफ्ट' को इतिहासकार ने इस संकेतक के माध्यम से व्यक्त किया है कि एक समय किसी भी नागरिक के पहचान पत्र के रूप में राशन कार्ड को आधार बनाया जाता था लेकिन राशन कार्ड की जगह पासपोर्ट ने ले ली है.

ऐसे में कोई राह नज़र नहीं आती जिससे यह लगे कि गाँव को एक अलग तरह की जैविक इकाई मानते हुए उसके शहर में बदलते जाने की सांस्कृतिक जरूरत को लोग समझने की कोशिश करेंगे. जिस प्रकार चीन में गाँव के शहर नुमा बन जाने की प्रक्रिया में सारी दुनिया में वाहवाही हुई है उसे देखते हुए कम से कम 2011 में तो यही लगता है. अगर विश्वायन की प्रक्रिया रूकती है तब शायद लोगों को लगे कि हमारे गाँव शहर बनकर विकास नहीं करते एक सहज सामान्य जीवन शैली से उपभोक्ता समाज के अनुकूल जीवन शैली को अपनाते हैं. भारत आज भी गाँवों में अधिक बसता हो लेकिन जो रास्ता सामने दीख रहा है उससे तो यह साफ लगता है कि धीरे धीरे गाँव शहर नुमा होंगे या होने के लिए बाध्य होंगे. हाँ यह बात अलग है कि समाज में विषमता जिस तरह बढती जा रही है आपसी संघर्ष तीव्र होंगे. गाँव में हिंसा को , विषमता को समंजित करने का एक ढांचा था जिसमें गाली देने वाला तकलीफ बाँटने के लिए भी आ जाता था और सुरक्षा देने के लिए भी.  लेकिन,  ये सब चीजें खत्म होता जा रही  हैं और अब बस आदमी अकेला है- परिवार और समाज दोनों में. और असुरक्षित भी !

Sunday, 14 August 2011

Shammi Kapoor a modern Indian rebel star 1


I watched the programmes of tv which naturally centred around Shammi Kapoor with interest. Two things were noticeable- first, the capacity of SK film persona to survive all these years as if not much has changed since good old 60s and the second, the simplicity that comes with SK while he looked back. This can not be part of any big star- be it the greatest Dilip Kumar (most articulate but never simple), most successful hero Amitabh (whose approach is professional), Devanand (the debonair hero but too modern to be simple). He was perhaps the only big superstar who took his going away of stardom with relative empathy.
What is amazing that that man was so full of life and so down to earth at the same time. He has a huge sense of gratitude. The way he remembered his colleagues and contemporaried is noteworthy. In one of the best interviews of SK , Vinod Dua asked some interesting questions and he responded very nicely.Two interesting episodes which Dua made him to narrate were very absorbing. First, how he married Gita Bali. Shammi was so genuine in saying that he was dating with Gita for three months and he was persuading her to marry him. She was not saying yes. (My God ! how could a lady say no to Shammi Kapoor). One day she said- 'Chalo shadi karte hain, abhi' and at 10.30 in the night they went to a temple. The priest said to them that the God was sleeping and they could marry in the morning. They came back , had their dinner and went to the temple at 4.30 in the morning and became husband and wife! Gita Bali told him to put  lipstick in his 'mang' for 'sindoor' (vermillion)! The second episode was equally interesting: Shammi Kapoor was in the second row of a flight and he was singing an old song of 1948. Much to his surprise he found a lady voice was coming from the front row. When he looked at the lady he found it was Lata Mangeshkar ! She said' Do you think others do not k now this song ?"
How people can be so good ! The time may change but these greats would be there with us.
[ I had written a longer piece and suddenly the text turned into garbage. I wish to continue this note] 

Wednesday, 10 August 2011

kuchh depressing thoughts

अगर अमूर्त्त सा लगने वाला सच सामने आ जाये तो फिर नामों की क्या जरूरत है ? मैं सुबह से देर रात तक टी वी, अखबार और अब वर्चुअल मीडियम के तमाम हिन्दी के लोगों को देखकर यह कहता हूँ कि ये लोग हिन्दी की आत्मा को नहीं समझते हैं. कल रात जब दीपक चौरसिया को आरक्षण पर एक कार्यक्रम एंकर करते देखा तो इतनी कोफ्त हुई कि बयान नहीं कर सकता. ये जो हमारे प्रतिनिधि बनते हैं वे प्लांटेड लोग हैं ऐसा ही लगता है या फिर ये लोग रूपांतरित हो जाते हैं व्यवस्था का दबाव ऐसा है. प्रकाश झा बिहारी हैं, अमिताभ बच्चन एक हिन्दी कवि का बेटा है, मनोज बाजपेयी बिहारी है और दीपक चौरसिया पिछडे वर्ग से आया हुआ पत्रकार है . ये सब मिलकर जो बातचीत कर् रहे थे उसको सुनना कंटेंट और फॉर्म दोनों के स्तर पर असहनीय था. ये लोग समझाना चाह्ते हैं कि शिक्षा का व्यवसायीकरण आरक्षण के कारण हुआ है ! दूसरी ओर फेसबुक पर दिल्ली में नौकरी करने वाला/ करने की जुगत में भिडा पिछडा/दलित वर्ग जिस तरीके से एकांगी विश्लेषण करके हिन्दी समाज की सोच को कास्ट लाईन पर वर्टिकली बाँटना चाहता है उसे देख कर यह विश्वास डिगने लगा है कि ये नीचे से ऊपर गये लोग नयी सकारात्मक सोच रखकर चलेंगे. पूरा देश ग्लोबलाईजेशन के जहर से आक्रांत होता जा रहा है, किसानों और आदिवासियों के हितों को विकास के नाम पर अनदेखा किया जा रहा है और ये सब लोग इस तरह का समाज फोडू प्रचार चला रहे हैं. क्या ऐसे में हिन्दी या भारतीय विचारों या भाषा- संस्कृति को समझते हुए चला सोचा जा सकता है ? पूरे मामले को फिर से विचारना होगा. ये देश बौद्धिक रूप से और गुलाम होता जा रहा है. हम 'उपकार' फिल्म के मनोज कुमार की जगह प्रेम चोपडा होते जा रहे हैं. ऐसे में आप नाम लेने के लिए कहते हैं ? 

Tuesday, 9 August 2011


कुछ विचार -
1.    आप चाहें तो इसे मेरा पूर्वाग्रह मानें, लेकिन जो हिन्दी के मीडिया के चेहरे हैं उनमें एक किस्म का बेवकूफी भरा आत्म-विश्वास दिखलायी पडता है. (दो तीन अपवादों को छोडकर) अंग्रेजी की मीडिया के जो चेहरे हैं वे ज्यादा सहज होते हैं, बेहतर तैयारी के साथ आते हैं और अपने 'कुछ बन जाने को दिखलाने की चाह' का प्रदर्शन नहीं होता. आप मीडिया में हैं कोई सेलेब्रेटी तो हैं नहीं और कुछ प्रमाणित करके तो वहाँ पहुँचे नहीं हैं. हिन्दी पत्रकारिता से जुडे लोगों का दायित्त्व ज्यादा है उन्हें इससे बचना चाहिए.
2.    दिल्ली में बैठकर साहित्य, पत्रकारिता और राजनीति के अखाडों में आते जाते कुछ लफाडिया किस्म के लोग हिन्दी के चेहरे बनते जा रहे हैं. इससे हिन्दी का जो चेहरा बनता जा रहा है वह उसका असली चेहरा नहीं है. इस देश के दूसरे हिस्सों में इस भाषा में लिखा- पढा जा रहा है इसकी जानकारी के बगैर ही लोग वही घिसे पिटे नामों, बातों के सहारे हिन्दी का चेहरा बने हुए हैं. एक अभियान चलना चाहिए कि इस 'नकली हिन्दी के चेहरों' के बाहर की हिन्दी में क्या कुछ सोचा समझा जा रहा है.
3.    योग्यता, निष्ठा और तैयारी (आपस में जुडे हुए भी) का कोई विकल्प नहीं हो सकता. आप बगैर तैयारी के जायेंगे तो वही हाल होगा जो हाल धोनी की टीम का इंग्लैंड में हो रहा है. एक दोयम दर्जे की टीम है इंग्लैंड की और लग रहा है कि भारत बचे हुए भी टेस्ट हार जायेगा. आपका काम आपको करना पडेगा. करने के लिए जानना पडेगा. जानने के लिए परिश्रम करना पडेगा. अपने को अपडेट करना पडेगा. इस सामान्य बात को समझे बिना कैसे काम हो सकता है ?किसी को भी इस बात से जाँचा जाना चाहिए (प्राथमिक रूप से) कि जो काम उसका है उसे वह ठीक से करता है या नहीं. हर स्तर पर इसकी जाँच होनी चाहिए. खुद अपने को भी देखना चाहिए. यह न करके हम सब किसी काम के लिए भी दूसरे को दोषी बनाने में लगे रहते हैं. हर डिबेट मेरा और तेरा या फिर हम बनाम वे में तब्दील हो जाते हैं.
4.     प्रेमचन्द या रवीन्द्रनाथ बहुत महान थे. माना. लेकिन जिस भाषा में उन्होंने लिखा उसके नये लोग क्या हैं , कितने प्रेमचन्द और रवीन्द्रनाथ हैं यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. आज रवीन्द्रनाथ को लेकर इतना कुछ कहा सुना जा रहा है लेकिन बांग्ला साहित्य के वर्तमान स्वरूप की चिंता पर कितना ध्यान है? हम वर्तमान में जीते हैं हमारा सरोकार वर्तमान से ज्यादा होना चाहिए.
5.    शैबाल मित्र का एक व्यंग्य है- 'रवीन्द्र दौड'. इसका एक सुंदर अनुवाद विजय शर्मा ने किया था. एक बात कही जाती थी कि आपको एक लेख लिखना आना चाहिए- गाय पर. बाकी जो भी लेख दिया जाये आपका काम है किसी तरह से लेख को गाय तक मोड दिया जाये. बाढ पर बात करनी हो तो एक दो वाक्य बाढ पर लिख कर गाय का उल्लेख कर दीजिए और फिर गाय पर तो आप जानते ही हैं... अब आप रवीन्द्र संगीत को हर घर में ऐसे सिखाने लगें जैसे टाइपिंग स्कूल में टाइप सेखाते हैं तो लोग सीखेंगे लेकिन वह क्या संगीत सीखना होगा?

Friday, 10 June 2011

Random thoughts on Indian Intelligentsia 1

Something is terribly wrong in the Indian intelligentsia; the way it reacts to issues which, by all means, constitute and define Indianness. Forget about the knowledge of traditions of the land now known as India the average modern educated Indian does not even care to know how the role of caste, community and language have shaped the course of Indian history in recent centuries. Even the much celebrated Indian Nationalism is not adequately discussed. When Sudipto Kaviraj wrote in one of his articles that Indians became nationalists not in English but in Indian languages such as Bengali, Tamil, Marathi ,Hindi and other Indian languages he was hitting the deck, to use the term of modern cricket. What it means actually ? It leads to the making of Indian Nationalism in the nineteenth and early twentieth centuries. The likes of Bankimchandra, Bharatendu Harischandra, Rabindra Nath Tagore, Sarat , to name only a few,  had been creating and articulating a notion of Indian Nation which was a modern notion but they grounded on Indian traditions. It is only natural that they talked of Hinduness, own culture, own history and so on the  a way an Indian intellectual is expected to do. With the coming of Britain returned liberals most of whom were lawyers by training the emphasis changed. Now,  a new discourse developed which was more suitable for the westernised intelligentsia. The presence of Gandhi was a big problem for the liberals as he was essentially grounded on Indian values and had a great following. The 1920s was the turning point when a new discourse of Indianness emerged which sought to redefine Indian Nationalism. This new modern construction was later blossomed into what is generally known as 'Nehruvian discovery of India'.
It is commonly said that Gandhi was the central figure of India in the first half of twentieth century. This may be true for the whole of India but for elites the real man who mattered most was Nehru. He was the real face of Indian Nationalism for the elites.
Nehru was a well intentioned and remarkable man. By any standard he was a great man but, he was the face of liberal India only to promote a vision of India which was suitable for western educated intelligentsia of India. He was a prisoner of his own vision; a man who was a nationalist, a westernised man and man whose ideology was close to socialist ideology. He was mistrusted by traditionalists and the socialists throughout his life but he successfully flirted with both these ideologies.
The only time Nehru had faced a serious challenge when Lohia mounted attack on him and his policies. But, as Lohia was seen as a threat by liberals Nehru survived and Lohia had to be contended with disgruntled groups and backward caste support base.