Sunday 26 June 2016

Cynical Thoughts 1

Today, I am sharing something which may be considered as my own conclusion on the basis of my own experiences. I have to say it and move on. My own experience suggests (to me) that in the academic space in our country a choice you are not supposed to think independently. You should follow the elite academics and provide the support to his/her theory. Basically, the training for high level academic life is given to select few whereby they develop their skills in handling complex ideas in a complex manner. A paragraph written by such trained scholars is enough to identify him or her as "really competent" for high level of academic works. These high level academics, I call AC 1 passengers, are very specialised and they focus on one theme or area beyond which they will not move. Some of them, for a change, keep a side interest in film, theatre or a sport, but basically they are specialist of their own area. They follow the main road, they are always visible and there is a support system available for them, almost everywhere. (More on it later)
On the second level, which I call AC 2 tier, there are people who are hardworking, intelligent and they are not necessarily coming from elite backgrounds. They work in tandem with the AC 1 people, and try to follow them. These people may talk too much, but they never really cross the line, set by the AC1 people. They are amply rewarded and they are also seen as respectable.
Then comes the AC 3 people, who are followers of AC 2 people. Access to this is open to all those hard working, intelligent people who can do good work but never dare to speak up, challenge the dominant paradigms, set by the higher class people.
Then comes Non-Ac class in which there are reserved class and non-reserved class. This is the most creative class, but they are not given opportunity and most of them remain mere good prospects until he is backed by higher class people.
We live in democracy and fortunately the entire space can not be controlled by elites. Some concessions are made to accommodate people due to reservation, political pressure and all. The AC people are intelligent enough not to leave this nonreserved non ac co-travelers. They identify their followers, and try to control the large number of people through these people. As long as you do not assert your independence and disturb the dominant paradigms you may survive. You will be allowed to be seen with the big people, if you are lucky. But, normally you are not allowed to go beyond a point.
On the basis of my own experiences, let me be categorical on this, you will be discouraged at every point if you try to enter in crucial areas. You can be fact finder, supplier of facts, supporter of their theories and live peacefully. Once you start raising your own questions, you will see the change. Your applications would be very politely sidelined and everytime you will be given the signal that you are good but not good enough like them, the high class people. To add insult to injury, the lesser competent people are seen visible as successful people. In a country like ours, few foreign trips are good enough to buy academics.
At one level, you get the signal. Either remain with them or live as ordinary mortals. Most of us realise this by the time we reach 40. What to do ?
All your questions will haunt you, trouble you and you will have no place to move. Some of us go cynical at this stage. Some of them go to some party or group with the hope to find a way out. 45 is crossed, your energy level is down and then you realise even there asking your own questions create problems.
Then, you realise,you should have asked all your questions the way you wanted twenty years ago without bothering about anything. You should realise you can not move to AC class in your own langauge, with your questions and the baggage you carry with you for being born in a underprivileged stock.
Should you revolt at the age when your sympathisers are advising against it ? Rest assured, you will be made fun of, not by the privileged but by people like you, who are smarter than you in reading the signals of the elites.
Was Kunwar Singh right ?
I think, you have no option but to revolt if you want to die with satisfaction of being an honest man.
There is no guide for you. Let your conscience be your guide.
[Cynical Thoughts 1]


Sunday 26 October 2014

कार्पोरेट भारत में भाषा का प्रश्न

 कार्पोरेट भारत में भाषा का प्रश्न

हिन्दी भारत के भास/उहे एक राष्ट्र के आसा हम ओकरो भंडार बडाइब/ओहू में बोलब ओ गाइब तबो न छोडब आपन बोली/चाहे केहु मारे गोली।’ मनोरंजनप्रसाद सिंह की इन पंक्तियों के पीछे की दृष्टि से आज भारत बहुत आगे आ गया लगता है। राष्ट्र निर्माण के जिस स्वप्न के साथ हिन्दी का प्रचार प्रसार हुआ था उसमें हिन्दी को देश की सम्पर्क भाषा के रूप में देखना एक सहज स्वाभाविक राष्ट्रीय संकल्प था। वह सपना क्यों टूटा यह यहाँ विचारणीय नहीं है लेकिन इस बात को याद रखे बिना कि हिन्दी हमारे राष्ट्रीय स्वप्न के साथ जुड़ा हुआ है, भारतीय भाषाओं के स्वतन्त्र भारत में अधिकार पर बात करना सम्भव नहीं है। आखिर क्यों एक कवि जो अपनी बोली के लिए गोली खाने के लिए तैयार है वह नि:संकोच हिन्दी को भारत (देश) की भाषा मानता है? ऐसे सैकड़ों–हजारों विद्वान लोग थे जो अपनी-अपनी भाषा पर पूरा अभिमान रखते हुए हिन्दी को देश की भाषा के रूप में सहज रूप से स्वीकार कर रहे थे। जब से राष्ट्र निर्माण का संकल्प इस देश में आया उसी समय से हिन्दी को ही यह स्थान दिया गया। इसकी शुरूआत बंगाल में हुई बनारस या पटना में नहीं हुई यह ध्यान दिलाना भी अनुचित नहीं होगा। गाँधी युग में अच्छी तरह से स्वीकार कर लिया गया। देश के स्वाधीन होने के बाद जिस तरह अँग्रेजी को हटाकर हिन्दी को प्रतिष्ठित करने के सिद्धान्त को नेहरूवियन आधुनिक उदार सोच ने स्थगित किया उसपर बहुत चर्चा की जा चुकी है। यह गलत था या सही इसपर कोई मन्तव्य दिए बिना यह कहना सही होगा कि इस समय लिये गये निर्णयों से आखिरकार अँग्रेजी इस देश में शक्तिशाली होती गयी और अब यह उस समय से ज्यादा स्वीकृत है जिस समय अँग्रेजों की हुकूमत थी। मीनाक्षी मुखर्जी समेत कई विद्वानों ने इस अँग्रेजी की भारत में बढ़ती शक्ति को लेकर आश्चर्य व्यक्त किया है। इस विषय पर इस छोटे आलेख में पिछले डेढ़ सौ सालों में भाषा के प्रश्न पर हुए परिवर्तनों पर एक टिप्पणी की गयी है और अन्त में वर्तमान समय में उभर रहे विकल्पों पर एक मन्तव्य दिया गया है।
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यह अब एक ‘क्लिशे’ हो गया है कि अगर चीन, जापान, फ्रांस, रूस और जर्मनी जैसे देशों का पूरा काम (तकनीकी जरूरत समेत) अपनी-अपनी भाषाओं में हो जाता है तो आखिरकार भारत का काम क्यों नहीं चल सकता। इस बात के समर्थन और विरोध में दशकों से कहा सुना जाता रहा है लेकिन कोई हल नहीं निकल सका। स्थिति यह हो गयी कि रवीन्द्रनाथ टैगोर की भाषा बंग्ला भी अँग्रेजी दबाव में लगातार आती गयी, हिन्दी की तो बात छोड़ ही दें। ऐसे स्थिति आ गयी कि तकनीकी और समाज विज्ञान के क्षेत्र में ही नहीं साहित्य और धर्म के क्षेत्र में भी अँग्रेजी आने लगी। राजनीति, धर्म और पत्रकारिता सभी क्षेत्रों में अँग्रेजी का वर्चस्व बढ़ने लगा। अब इस स्थिति में कुछ गुणात्मक किस्म के परिवर्तन हुए हैं जिससे समीकरण बदले हैं। इस नयी परिस्थिति में भारतीय भाषाओं के सामने एक नये विकल्प का संसार खुलता दीख रहा है इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए। यह याद रखा जाना चाहिए कि बंकिम–रवीन्द्रनाथ या भारतेन्दु–प्रेमचन्द की औपनिवेशिक ‘राष्ट्रीय दुनिया’ अब नहीं है। उस समय के आदर्श अब जितने भी मोहक लगते हों वे हमारे लिए पर्याप्त नहीं हैं। अँग्रेजी का जो विरोध था वह अँग्रेजी हुकूमत के साथ जुड़ा हुआ था। एक राष्ट्र को कैसा होना चाहिए इसके बारे में सोचते हुए इंटेलिजेंसिया (इसे सुविधा के लिए हिन्दी में स्वीकार कर लिया जा सकता है) ने एक राष्ट्रीय स्वप्न का ताना-बाना बुना जिसमें एक स्वाधीन राष्ट्र के लिए अपनी भाषा का महत्त्व बना। उसकी खोज शुरू हुई और इस दौरान ही अँग्रेजी के स्थान पर एक स्तर पर हिन्दी और अन्य स्तरों पर हिन्दी समेत सभी भारतीय भाषाओं को रखकर सोचने का विकल्प उभरा। हिन्दी को सम्पर्क भाषा के रूप में देखने का जो आधार बना उसमें राष्ट्र के बनने के पूर्व के समय के सामूहिकता के आधारों–धर्म, धार्मिक पुस्तकें, धार्मिक स्थल आदि का महत्त्व है। जो हिन्दू मानस के थे उनके लिए संस्कृत सबसे ऊपर थी, पर विभिन्न कारणों से हिन्दी उनके लिए सबसे मान्य देश की सम्पर्क भाषा बन कर उभरी। हिन्दी के राष्ट्रीय विकल्प बन जाने का कारण हिन्दी के लोग नहीं थे यह याद रखें। हिन्दी किसी भी तरह से कई अन्य भारतीय भाषाओं से बेहतर स्थिति में नहीं थी। हिन्दी को सबसे बड़ी भाषा इसलिए माना गया क्योंकि यह हमारे राष्ट्रीय स्वप्न का हिस्सा थी।
जिसे हम गाँधी युग कहते हैं उसमें इस स्वप्न को जब रूप दिया गया भाषा का प्रश्न उलझने लगा। इस प्रश्न को दो स्तरों पर सुलझाने की कोशिश हुई - जनता के साथ संवाद में यह मान्य हुई। इससे हिन्दी को महत्त्व मिला इसमें सन्देह नहीं। भारत के सभी हिस्सों में हिन्दी ही जनता और उनके राष्ट्रीय नेताओं के बीच की भाषा बनी। लेकिन, नेताओं, बडे लोगों ने अपने घर और आपस के संवाद के लिए, ज्ञानार्जन के लिए अँग्रेजी को ही मान्य बनाया। लगभग सभी बड़े नेता, पूँजीपति और विद्वान आदि अँग्रेजी के साथ ही रहे। इस सन्दर्भ में गाँधी ने कुछ दबाव बनाया और हिन्दी प्रदेश के नेताओं के साथ हिन्दी में संवाद करना शुरू किया। यह दिलचस्प है कि गोविन्द बल्लभ पन्त जैसे हिन्दी प्रदेश के नेता ने गाँधी से अँग्रेजी में पत्राचार करना चाहा और दूसरी ओर से दबाव बनने पर अनिच्छा से हिन्दी में पत्र लिखना शुरू किया। काँग्रेस के बडे़ नेताओं में सिपर्फ राजेन्द्र प्रसाद थे जिन्होंने हिन्दी को सहज रूप से स्वीकार किया। उन्होंने अपनी आत्मकथा हिन्दी में लिखी, अन्य बडे़ नेताओं ने अँग्रेजी में। इस देश में एलिट अपने लिए नेताओं का चुनाव बड़ी सावधानी से करते हैं। उस दौर से लेकर 1990 के दशक तक एलिट किसी देशी नेता को अपना समर्थन देने से येन–केन प्रकारेण बचना चाहता है। गाँधी के मामले में वह मजबूर था इसलिए उसे ‘थोड़ा सनकी’ मानते हुए भी समर्थन देने के लिए तैयार हुआ क्योंकि वह ‘अच्छे आदमी’ थे। (ये इतिहासकार बरूण दे के शब्द हैं) यह खासा दिलचस्प है कि वामपन्थ के लगभग सभी बडे़ नेता, काँग्रेस के अधिकांश बडे़ नेता आदि अँग्रेजी से अपनी भाषाओं की तुलना में अधिक निकट थे। यानी, जनता के लिए भारतीय भाषा और एलिट के लिए अँग्रेजी (अपनी भाषा के साथ) यही आदर्श विकल्प था। बिहार के एक विद्वान हैं – शैबाल मित्र। उन्होंने एक दिलचस्प लेख लिखा है जिसमें उन्होंने कहा है कि बिहार में पारम्परिक इंटेलिजेंसिया के लिए भाषा अँग्रेजी थी। (यहाँ पारम्परिक का उपयोग समाजशास्त्रीय केटेगरी के रूप में है।) जो इस देश की भाषा के साथ थे उसे वे कॉकटेली इंटेलिजेंसिया कहते हैं। इस बात से भड़कने की जरूरत नहीं है। बिहार जैसे राज्य में सभी बडे़ विद्वान हिन्दी जानते हुए अँग्रेजी में ही काम करते रहे यह एक सच है। अब आप राहुल सांकृत्यायन का नाम न लें, वे एक अपवाद हैं। राहुल भाषा के मामले में बहुत ही लोकतान्त्रिक थे। वे 1926 में भी जनता के साथ उसकी अपनी बोली में राजनैतिक संवाद करना चाहते थे। राजेन्द्र प्रसाद आदि हिन्दी में भाषण देते थे। उन्हीं सभाओं में राहुल (तब रामोदर दास) छपरा की बोली में भाषण देते थे और जनता में वही ज्यादा लोकप्रिय होता था। बंगाल में यह प्रवृत्ति थोड़ी कम थी लेकिन वहाँ भी प्राथमिकता अँग्रेजी को ही दी जाती रही। इस देश के इंटेलिजेंसिया का जब कोई सम्यक विश्लेषण होगा यह साफ हो जाएगा कि यह अँग्रेजी की तरफ झुकी हुई रही है। चाहे उर्दू की ‘उँची दुनिया’ हो या पिफर बांग्ला का सांस्कृतिक संसार हो सब तरफ अँग्रेजी को ही बढ़त मिली हुई थी। प्रमाण के लिए समर सेन और तपन रायचैधरी की आत्मकथाएँ पढ लें। लेकिन उस समय राष्ट्रीय दबाव इतना अधिक था कि यह सबकुछ उभर कर नहीं आया। अकादमिक जगत का कोई भी आदमी इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि साहित्य के सीमित संसार ने भाषिक और अकादमिक का एक ‘नीचा नगर’ बनाया जिसके अलावा सब जगह अँग्रेजी को बढ़त मिली हुई थी। पर, सरकारी नीति निर्माण में सिद्धान्तत: अँग्रेजी को धीरे-धीरे हटना था सरकारी नीति के कारण भारतीय भाषाओं को कम से कम अँग्रेजी के समतुल्य स्थान देने की बाध्यता थी। इसी कारण हिन्दी को आगे आने का एक मौका बना। नेहरू के नेतृत्व में एक उदार उत्तर–औपनिवेशिक राष्ट्रीय दौर शुरू हुआ जिसमें अँग्रेजी को बने रहने का मौका मिला। इस देश में अँग्रेजी अगर इस शक्तिशाली रूप में बनी हुई है तो उसके लिए मैकॉले को श्रेय दिया जाता है लेकिन उसके साथ नेहरू का नाम भी लिया जाना चाहिए। हालाँकि यह भी एक सच है कि मैकॉले और नेहरू ने किसी बदनीयती से ऐसा नहीं किया था। वे जिस वैचारिक संसार से आते थे वहाँ से अँग्रेजी को इसी रूप में देखा जा सकता था।
उदार उत्तर–औपनिवेशिक दौर जब तक चला (कह सकते हैं अस्सी के दशक तक यह चला) इस देश के एलिट सुविधाजनक स्थिति में रहे। हर स्तर पर अँग्रेजी के साथ चलने के फायदे बने रहे। एकबारगी तो ऐसा लगा कि पूँजीपति वर्ग पूरी तरह से उदार एलिट के तर्कों से ही चलने के लिए तैयार हो गया है। यही वह दौर था जब सलमान रूश्दी जैसे लेखक ने मैकॉले जैसा भयानक वक्तव्य दिया जिसमें भारतीय साहित्य को लगभग अँग्रेजी साहित्य में घटा देने की भयावह कोशिश की गयी थी। वह उदारवाद का स्वर्णिम काल था जब लगा कि बाजार भी उनके साथ है। जितने नये शिक्षण संस्थान बने सबमें यही पाठ दोहराया गया कि अँग्रेजी के सिवा कोई विकल्प नहीं। ऐसी बातें कॉमन सेंस का हिस्सा बनने लगीं जिसमें यह निहित था कि जाने अंजाने अँग्रेजों ने भारत को अँग्रेजी में काबिलियत देकर भारत को चीन समेत अन्य देशों की तुलना में बढ़त दे दी है। यानी, अँग्रेजी हमारी ताकत है। यही वह दौर था जब हिन्दी के बड़े कवि (जिन्हें साहित्य जगत का सबसे बडा सम्मान मिल चुका है) ने उदारता से कहा कि वे अँग्रेजी को एक भारतीय भाषा मानते हैं।
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बाजार और पूँजीवाद की अनिश्चितता ही उसकी शक्ति है। उदार पूँजीवाद के भीतर से नये तर्क उभरे और एक नये समीकरण ने जन्म ले लिया। उदार उत्तर–औपनिवेशिक दौर के महानायक वे लोग थे जो एक ऐसे एलिट को शक्तिशाली बना रहे थे जिनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने मुनाफे को देश के साथ साझा करने में पीछे नहीं हटेंगे। संजय बारू ने मनमोहन सिंह के सम्बन्ध में जो किताब लिखी है उसमें भी यही तर्क उभरता है। उत्तर–औपनिवेशिक कॉरपोरेट युग, जिसकी शुरूआत इस देश में हो चुकी है, ने एक नया समय शुरू किया है जिसमें देशी भाषाओं को बाजार की ओर से अधिक शक्तिशाली बनाया जाना शुरू हुआ। यह एक पेचीदा बात है जिसको वे नहीं समझ सकते जो अभी भी पिछले दोनों दौर के तर्कों के सहारे ही हल ढूँढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।
यह नया समय शक्तिशाली बनने के नये स्वप्न के साथ लगातार आक्रामक होता जा रहा है। संयोग से यह समय इस देश में राजनैतिक रूप से उस विचारधारा के लोगों के नियन्त्रण में है जिसके स्वप्न की भाषा राष्ट्रीय है और वे शक्ति के देशी भावों के साथ चलना चाहते हैं। इस युग में आर्थिक और सांस्कृतिक जगतों को अलगाया जा रहा है। आर्थिक रूप से उन्नत होना जिनका ध्येय है उनको इस समय के राजनैतिक स्वरों से कम असुविधा हो रही है। उन्हें लग रहा है कि यह वह राजनैतिक नेतृत्व है जो उनके आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनने को काम्य मानता है। वह अगर सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्रों में अनुदार भी रहे तो भी उसे विशेष परेशानी नहीं होती है। चीन के मॉडल की सफलता के बाद इस मॉडल का जोर बढ़ा है। इसमें राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्वतन्त्रता का हनन बहुत चुभने वाला नहीं रह जाता, बशर्ते आर्थिक विकास सुनिश्चित हो। लेकिन इस प्रोजेक्ट को सफल बनाने में लगे राजनैतिक नेतृत्व के लिए यह पूरा मामला ‘राष्ट्रीय’ है, ‘सांस्कृतिक’ है। वह देश को साफ–सुथरा, विकास से युक्त, सुखी और शक्तिशाली बनाना चाहता है।
वर्तमान भारत पर सोचते हुए एक इतिहास के विद्यार्थी को दो प्रसंगों को याद करने की छूट मिलनी चाहिए। प्रथम, फ्रांस की राज्य–क्रान्ति का प्रसंग और द्वितीय, बिस्मार्क का युग। फ्रांस की क्रान्ति इसलिए शुरू हुई क्योंकि राजा के पास आर्थिक विकल्प नहीं बचे थे और वह उस व्यवस्था द्वारा पोषित शक्तिशाली वर्गों से अधिक योगदान की अपेक्षा करता था जिसके लिए शक्तिशाली समूह तैयार नहीं थे। उससे आर्थिक संकट गहराया और क्रान्ति शुरू हुई, कई वर्षों तक चली और अन्तत: विप्लवी समाज फ्रांस ने एक निरंकुश अधिनायक को सत्ता सौंप दी जो मुकुट को अपनी तलवार की नोक से उठाकर अपने सिर पर रखना सही मानता था और जो ‘असम्भव को मूर्खों की डिक्शनरी का शब्द मानता था’। बिस्मार्क ने जर्मनी को आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनाया और कहा जाना चाहिए कि औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप इंग्लैंड ने जो कुछ सौ सालों में हासिल करके अपनी बढ़त बनायी थी उसको खारिज करते हुए बीस तीस सालों में जर्मनी ने इंग्लैंड के बराबर अपनी औद्योगिक क्षमता को बढ़ा दिया। उस बिस्मार्क ने इंजीनियरों को विद्वानों से बड़ा माना और नौजवानों को संदेश दिया – ‘परिश्रम, परिश्रम और परिश्रम!’ उस ‘लौह पुरूष’ ने ही तो महान जर्मनी के ऐतिहासिक संकल्प को पूरा किया।
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इस दौर में कॉरपोरेट को काम करने वाले एक ‘हिन्दू बिस्मार्क’ की जरूरत थी। लोकतन्त्र के रूप में भारत की जो तस्वीर बनती दिखती है उसमें सबकुछ ऐसे ही चला तो सबकुछ बदल जाएगा। देश शक्तिशाली बनेगा, आर्थिक रूप से बनेगा, पूँजी का वर्चस्व बढे़गा, राजनीति में गुणात्मक बदलाव होंगे और देश की जनता के इतिहास और उसकी अपनी बोली–वाणी को महत्त्व मिलेगा। इस दौर में अँग्रेजी का वर्चस्व टूटना चाहिए। अब बाजार यह मान चुका है कि इस देश में विकास के लिए भारतीय भाषाओं का महत्त्व अँग्रेजी से अधिक है। वह इस ‘मास’ (आमलोग) को विकास में शामिल करके अपना विस्तार करना चाहता है। पूँजी के विस्तार के इस दौर में अखबारों में छपे मार्केट ट्रैंड को समझाने वाले कुछ दिनों से बार बार यह कह रहे थे कि इस देश की भाषा का ही भविष्य है। लेकिन इस नये समय में, इस (नये) ‘देश’ में देश की भाषा कैसी होगी इसे कैसे बनाया–बढ़ाया जाएगा यह इस बात पर निर्भर है कि देश की नयी इंटेलिजेंसिया कैसा व्यवहार करती है। आपने देखा होगा कि इन दिनों क्रिकेट की कमेंट्री अब वे लोग कर रहे हैं जिनकी भाषा (अँग्रेजी के अलावा) बांग्ला, तमिल, तेलुगु और मराठी है।
और अन्त में, यूपीएससी की परीक्षा के सम्बन्ध में जो आन्दोलन चल रहा था उसके बारे में दो शब्द। क्या किसी को भी यह लगता था कि यह आन्दोलन ‘सफल’ नहीं होगा? इसका ‘सफल’ होना तय था। ठीक वैसे ही जैसे पड़ोसी देश की एक रैडिकल लेखिका को लम्बे समय का वीसा दिया जाना! लगता है वे तमाम संस्थाएँ और पद–प्रतिष्ठान आदि ही अपनी शक्ति खोते जाएँगे जो पिछले दौर में शक्ति के केन्द्र हुआ करते थे। क्या आपको लगता है कि यूपीएससी, योजना आयोग या यूजीसी उतने शक्तिशाली रह सकेंगे? अगर लगता है तो आप अभी भी उदार औपनिवेशिक राष्ट्रीय युग के साथ चिपके हुए हैं। उदार अँग्रेजीपरस्तों की दीनता अभी नहीं दिख रही है साफ साफ, थोडे़ दिनों बाद दिखने लगेगी। ये बात और है कि ऐसा होना काम्य है या नहीं। 
(यह आलेख 'सबलोग' के सितंबर 2014 अंक में प्रकाशित है।)

Tuesday 5 August 2014

 26 साल पहले के ‘आरंभ’ की याद ; कुछ पर्सनल नोट्स
‘आरंभ’ हिन्दी भाषी छात्र-छात्राओं की एक जीवंत संस्था थी जो 1988 के मध्य से 1989 के मध्य तक पूरी सक्रियता से हिन्दी भाषी छात्र-छात्राओं को लेकर गोष्ठियाँ, मीटिंग्स, सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि कार्यक्रम करती रही थी. इतने कम समय में इस संस्था से जुडे लोगों ने जो कुछ किया उसके महत्त्व के बारे में जो लोग उससे जुडे रहे थे उनके अलावा किसी के लिए समझ पाना खासा कठिन है. सामान्यत: जब संस्थाएँ बनती हैं और नियमित काम होता है तो इससे जुडे कुछ प्रकाशन आदि होते हैं जिसके आधार पर बाद की पीढी उनके किए कामों से परिचित होते हैं. ‘आरंभ’ के साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. इसकी ओर से कुछ भी प्रकाशित नहीं हुआ और आज अगर कोई कहे कि इस तरह की किसी संस्था ने एक खास अवधि में वैसा काम किया जो आज तक किसी संस्था ने नहीं किया तो शायद लोग मुस्कराने लगें; लेकिन जिनको याद है वे कहेंगे कि हाँ, बिल्कुल सही है यह !
      इस संस्था के निर्माण में जयपुरिया कॉलेज के कुछ उत्साही छात्र छात्राओं की केन्द्रीय भूमिका थी. अशोक सिह, अभिजीत कृष्ण, रूपा गुप्ता, ऋता गुप्ता, प्रदीप जीवराजका आदि  ने इसकी शुरूआत की. अशोक सिंह को छोडकर बाकी सभी पहली बार इस तरह के काम के लिए आगे आए थे और उनमें निर्दोष किस्म का क्रांतिकारी उत्साह था. एक आध मीटिंग के बाद इसको एक सांगठनिक रूप देने की कोशिश हुई. अशोक सिंह ने हितेन्द्र पटेल का नाम अध्यक्ष के रूप में सुझाया. रेखा सिंह और ममता त्रिवेदी आदि लोगों से सम्पर्क साधा गया और इस तरह एक कोर टीम बनी. जब मिलना जुलना शुरू हुआ तो यह स्पष्ट हो गया कि उनके भीतर एक किस्म की सामूहिकता बन चुकी है और वे मिलजुल कर साहित्यिक-सांस्कृतिक काम करने में जुट गए. उस समय जनवादी लेखक संघ बहुत सक्रिय हुआ करता था. विमल वर्मा से अशोक सिंह के सम्बन्ध बहुत अच्छे थे और एक एक कर कई गोष्ठियाँ हुईं जिसमें हिन्दी जगत के प्रतिष्ठित आलोचक-अध्यापक गण इन गोष्ठियों में आए. विमल वर्मा, श्रीहर्ष, कृष्ण चन्द्र पाण्डेय ‘अनय’, मदन सूदन, चन्द्रदेव सिंह, शंभुनाथ, चन्द्रकला पाण्डेय, रामवृक्ष चन्द, सुब्रत लाहिडी समेत बहुत सारे लोगों ने आरंभ की गोष्ठियों में भाग लिया. जो चीज़ सबसे चकित करने वाली थी कि इन गोष्ठियों में छात्र-छात्राओं की उपस्थिति. 50 से 70 की संख्या में बगैर किसी शिक्षक समुदाय के दबाव के श्रोता आते थे और बहुत मनोयोग से सुनते थे. धीरे धीरे आरंभ का विस्तार होने लगा और पूनम मिश्र, उमा झुनझुनवाला, शोभा, रमेश अग्रहरि, तरूण द्विवेदी आदि इस संस्था के साथ जुड गए. आज मुड कर देखने पर लगता है कि इन लोगों के लिए साहित्य संस्कृति से जुडने का इससे अच्छा मंच और कुछ नहीं हो सकता था. इनमें से कई साहित्य, अध्यापन, कानून, राजनीति, नाटक, संगीत आदि के क्षेत्र में बाद में चलकर आगे बढे. आप इनमें से किसी से भी पूछ लीजिए कि आरंभ का उनके जीवन में क्या योगदान था, मेरा दावा है कि सभी कहेंगे कि बहुत ही महत्त्वपूर्ण योगदान था इसका !
      जो सबसे बडा काम इस संस्था ने किया वह था आत्म-विश्वास पैदा करने का. कुछ उदाहरण देना उपयुक्त होगा. ममता त्रिवेदी अच्छा गाती थी. सनातन धर्म विद्यालय के एक कार्यक्रम में उसने एक साहित्यिक गीत प्रस्तुत किया. अध्यक्षीय वक्तव्य में विमल वर्मा ने कहा कि हिन्दी को एक नयी महादेवी मिल गयी ! अब आप इस वक्तव्य को जैसे भी देखें उस समय ममता त्रिवेदी के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं रहा होगा. अशोक सिंह अपने को हिन्दी के प्रमोद दास गुप्ता के रूप में देखने लगा होगा ऐसा मेरा अनुमान है. प्रदीप जीवराजका संस्था के कोषाध्यक्ष हुआ करता था वह चीजों को सँभालने, लोगों को समझाने बुझाने का ऐसा अभ्यस्त हो गया कि बाद में सफल वकील बन गया ! उमा झुनझुनवाला एक सफल नाट्य कर्मी बनी. रेखा सिंह एक प्रखर वक्ता बनकर ऐसे उभरी कि बाद में उसके लिए कलकत्ता विश्वविद्यालय छात्र राजनीति में नेतृत्व में जाने का, और फिर बाद में डी वाई एफ आई और सी पी एम में आगे बढने में कोई दिक्कत नहीं हुई. गुप्ता बहनें- रूपा और ऋता की भाषण-बाजी में ज्यादा रूचि नहीं थी लेकिन जब भी सामूहिक गायन होता उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती. अचला नागर के निर्देशन में साहित्यिक गीतों का कार्यक्रम हुआ था जो हरिवंशराय बच्चन की कविताओं पर केन्द्रित था. अद्भुत कार्यक्रम हुआ था. अंत में चन्द्रदेव सिंह का वक्तव्य भी बहुत सुंदर था. अभिजीत कृष्ण को आरंभ ने बहुत बडा संगठक अपने को मानने का सुयोग बनाया. हितेन्द्र पटेल को वक्ता के रूप में आत्मविश्वास मिला.  उस समय के सभी लोग इसी तरह की बातें कहेंगे.
      दूसरा बडा काम आरंभ ने यह किया कि बौद्धिक जगत का संसार उनके सामने खोल दिया. कई गोष्ठियों में अनय जी विस्तार से प्रेमचंद साहित्य और उनके पात्रों का परिचय कराते रहे, श्री हर्ष ने प्रभावशाली तरीके से कविता और प्रतिबद्धता के अंतर्स्संपर्कों को पेश किया, विमल वर्मा आलोचना के बडे बडे नामों को सबके लिए परिचित बना गए, सुब्रत लाहिडी नाटक, संस्कृति कर्म की जानी अनजानी बातों को बताते रहे. शंभुनाथ भी आरंभ की गोष्ठियों में आए थे. संयोग से उस समय बहुत कम पैसे में महाजाति सदन के एक सेमिनार हॉल में जगह मिल जाती थी जहाँ गोष्ठियाँ हो जाती थी. सनातन धर्म विद्यालय तो आरंभ के लिए हमेशा खुला ही रहता था मानो !
तीसरी सबसे बडी बात थी सबके लिए एक अपने सामाजिक स्पेस का फैलाव. किरण मोरारका नाम की एक लडकी थी. बहुत ही उत्साही. सब जब अपने अपने यहाँ कार्यक्रम करने लगे तो उसने भी अपने घर पर बीस लडके लडकियों को लेकर एक मीटिंग की थी. मारवाडी, यूपियन, बिहारी, गुजराती, स्त्री, जाति और  विषय जैसे तटबंध मानो हिन्दी के सामने उठ ही नहीं सकती थी ! जाति, क्षेत्र और व्यवसाय आदि से बँधे संगठन हुए होंगे लेकिन हिन्दी का ऐसा कोई संगठन आज तक बना है मेरी जानकारी में नहीं है. यह खुलापन उनमें इतना रच बस गया कि कमोबेश सभी इस तरह के बंधनों से जीवन भर के लिए मुक्त हो गए. एक लडकी ने बाद में एक प्रखर मुस्लिम संस्कृतिकर्मी से, एक गुजरातन ने एक प्रखर बिहारी वकील से (जो आरंभ में भी आता जाता था), एक वैश्य ने एक बिहारी छात्र से शादी की, एक बिहारी लडकी ने एक बंगाली से शादी की, एक अन्य वैश्य लडकी ने एक मारवाडी लडके से शादी की, एक लडकी ने गुजराती लडके से शादी की... . यह किसी संस्था के योगदान को रेखांकित नहीं करता ?
उस दौर में लगता था कि अपनी बिरादरी में शादी करना क्या कोई शादी है ! विचारों और विश्वासों को मानो किसी ने जड से पकड कर हिला दिया हो ! आज याद करते हुए रोमांच होता है कि उन दिनों यह निश्चित किया था कि सिर्फ अंतर्जातीय और दहेज रहित विवाह आयोजन में ही जाउँगा. कई वर्षों तक इसका पालन भी किया !यह आरंभ की स्पिरिट ही थी कि एक आर्य समाज मन्दिर में हो रही शादी में उपस्थित लोग संस्था के साथी थे जो चार कचौडी, आलूदम और एक सस्ती सी मिठाई के पैकेट को खाकर भी संतुष्ट थे. कामरेड अशोक सिंह से शादी करने वाले जोडे का सम्बन्ध अच्छा नहीं था लेकिन उसने भी ‘जन संसार’ में इसकी रिपोर्ट लिखी और ‘साहसिक कदम’ पर बधाई दी !
गोष्ठियों में कैसे बोलते हैं, संगठन को कैसे चलाया जाता है, रिपोर्ट कैसे लिखते हैं, कैसे क्या किया जाता है सबकुछ इस संस्था ने सिखाया. पैनल कैसे पास किया जाता है और चुनाव कैसे किया जाता है आदि बहुत कुछ इस संस्था ने सिखाया. (इसके बारे में बाद में विस्तार से लिखा जाएगा) आपस में मतभेद रखकर भी सबको साथ लेकर चलने का मंत्र सबको स्वीकार्य था. (अभिजीत कृष्ण और प्रदीप जीवराजका को इसके लिए कुछ अतिरिक्त अंक दिए जा सकते हैं). आज यह सोचते हुए भी रोमाँच होता है कि राजेश सेठिया (जो अब डॉक्टर है) पैसे इकट्ठा करने के लिए चंदा कैसे वसूल किया जाए इस विषय पर रैडिकल राय दिया करता था !
यह सबकुछ 1989 मध्य तक चला फिर उसके बाद बिखराव आ गया जिसके कारणों पर विस्तार से बातचीत बाद में.   

  

  

Sunday 12 February 2012






हिन्दी के विशिष्ट लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता प्रो कृष्णचन्द्र (अनय) का देहांत





हिन्दी के एक प्रतिष्ठित व्यंग्य-लेखक, साहित्यकार और पत्रकार प्रो. कृष्ण चन्द्र (जो हिन्दी के पाठकों के बीच अनय नाम से परिचित थे) का गत 9 फरवरी सायंकाल को हृदय-गति रूक जाने से निधन हो गया. वे 73 वर्ष के थे. इस सूचना से बंगाल के हिन्दी के साहित्यिक जगत में शोक छा गया. ‘तीसरा विभाजन’ समेत तीन चर्चित पुस्तकों, असंख्य लेखों और व्यंग्य रचनाओं के लेखक अनय का जीवन बहुत ही प्रेरणास्पद है. उन्नाव जिले के एक ज़मींदार परिवार में जन्मे अनय 1952 में स्कूल की परीक्षा पास करके कलकत्ता आए थे और तब से मृत्यु पर्यंत कलकत्ता में रहे. यहीं से 1961 में विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त करने के बाद वे सेंट पाल कॉलेज में पढाने लगे और 1999 तक यहीं पढाते रहे. एक शिक्षक के रूप में वे असाधारण शिक्षक के रूप में जाने जाते रहे. सेंट पाल के से अवकाश प्राप्त करने के बाद उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज में अध्यापन कार्य किया . उनके बह्त सारे छात्र मानते हैं कि प्रेमचंद, रेणु और परसाई को पढने और समझने की सीख उनसे ही मिली. प्रेमचन्द पर तो उनके बिना कोई साहित्यिक कार्यक्रम अधूरा सा लगता था. हिन्दी भाषी छात्र-छात्राओं की विभिन्न समस्याओं को लेकर वे लगातार बोलते और लिखते रहे. इन विषयों पर जनसत्ता मे लिखे उनके लंबे आलेखों और शब्द-कर्म विमर्श में छपे लेखों का एक दस्तावेज़ी मूल्य है और इसको आज भी याद किया जाता है. अंत समय तक वे बेहद सक्रिय रहे. उनके स्तंभ प्रभात वार्ता में सबसे ज़्यादा पढा जाने वाला स्तंभ था. उनके अचानक चले जाने से उनके चाहने वाले शोकाकुल हैं.
शिक्षण के अतिरिक्त वे सामाजिक कार्यो में सक्रिय रूप से भाग लेते रहे और अपने इलाके- काशीपुर के हिन्दी भाषियों – के बीच लगातार काम किया. एक साधारण से एक रूम के फ्लैट में रहते हुए वे लगातर सी पी आई के कर्मठ कार्यकर्त्ता बने रहे. वे एक संस्था की तरह थे. बेहद मिलनसार, कर्मठ और उदार अनय जी को पसंद करने वाले वाम से लेकर दक्षिणपंथी सभी विचारधाराओं के लोग थे. वे हमेशा अपनी राजनीतिक विचारधारा और अपने प्रति आलोचनात्मक रवैया रखते थे और बिना किसी लाग लपेट की अपनी बातों को विभिन्न मंचों पर रखते थे.
चर्चा में तब वे आये जब उनके शिष्य सुरेन्द्र प्रताप सिंह के संपादकत्व में निकल रही पत्रिका- रविवार में वे नियमित व्यंग्य का कॉलम लिखने लगे. उनकी रचनाएँ बहुत पसंद की गई. बाद में लेखों और कहानियों का यह सिलसिला चलता रहा और उन्हें कलकता शहर के साहित्यकारों में जाना जाने लगा. एक कुशल वक्ता के साथ साथ वे बेहद पढाकू किस्म के नेता-शिक्षक बने . दुर्भाग्य से उनके लेखन को पुस्तकाकार रूप में सामने लाने में प्रकाशक और वे स्वयं इच्छुक देर से हुए और उनकी प्रकाशित पुस्तकें उनके लेखक रूप को सामने नहीं रख पातीं. अब तक उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं- नज़र नज़ारा (व्यंग्य) , समय दर्पण (कहानी संकलन), राहुल विमर्श, महानगर 1977 (सम्पादन), ‘तीसरा विभाजन’ (कथा संग्रह). उनकी दो पुस्तकें प्रेस में हैं. उन्होंने शब्दकर्म विमर्श के संपादक मंडल में रहकर इस पत्रिका का मार्ग दर्शन किया.
अनय जी के व्यंग्य लेखन पर बर्द्धमान विश्वविद्यालय में शोध-कार्य भी हुआ है. कोलकाता की विभिन्न लघु पत्र-पत्रिकाओं, संकलनों में बिखरी हुई उनकी विपुल सामग्री को सामने लाने का काम अभी होना बाकी है.
यह एक महत्त्वपूर्ण बात है कि व्यक्तिगत जीवन में भी उन्होंने अपने प्रिय प्रेमचंद से प्रेरणा ली और जाति बिरादरी की हर सीमा का अतिक्रमण किया. जो उनके करीबी थे वे अधिकतर निचले तबके के लोग थे और अनय जी ने कभी भी अपने और पराये का हल्का सा भी परिचय नहीं दिया. अपनी दोनों अति सुंदर, सुशिक्षित कन्याओं का विवाह उन्होंने अपनी जाति के बाहर किया. यह कोलकाता के सांस्कृतिक इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है कि एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण के सुंदर व्यक्ति ने अपना विवाह खत्री कन्या से किया और अपनी कन्या का विवाह एक मेधावी चौरसिया लडके से किया. इस विवाह में साक्षी के रूप में एक पिछडे वर्ग के उनके एक छात्र का हस्ताक्षर है. उनके लिए रोने वालों में उडिया, मुस्लिम और बंगाली कर्मी ज़्यादा थे. बांग्ला देश से भाग कर कोलकाता की बस्तियों में शरण पाए हुए और हिन्दी प्रदेश से आए गरीब छात्रों के लिए तो वे मसीहा ही थे. वे अक्सर उन लडकों के लिए कॉलेज और उसके बाहर संघर्ष करते हुए देखा जा सकता था जो बिहार यूपी से आकर किसी कॉलेज में किसी तरह भर्ती तो हो जाते थे लेकिन न अंग्रेज़ी और बांग्ला में दिए गए लेक्चर को न समझ पाने के कारण मुसीबत में पडे रहते थे. अनय जी का यह वाक्य बहुत लोकप्रिय हुआ कि “ हिन्दी भाषी छात्र बांग्ला में लेक्चर सुनता है, हिन्दी में उसे समझता है और अंग्रेज़ी में लिखने की कोशिश करता है. इन तीनों में से वह दो ही जानता है.” इस प्रश्न को वे लगातार उठाते रहे और जब हिन्दी माध्यम में प्रश्न पत्र को छापने का सफल आन्दोलन हुआ तो वे सबसे ज़्यादा मुखर वही थे. इन बातों के मामले में वे किसी दल या विचारधारा का ख्याल नहीं रखते थे. वैसे भी वे अक्सर कहते थे कि अपने कार्यक्षेत्र के बाहर गेट पर ही विचारधारा को छोड आना चाहिए और फिर अपना काम करके वापस जाते समय गेट पर उसे वापस पहन लेना चाहिए. काम करना ही चाहिए, सबको. पूरे शहर में वे हर व्यक्त्ति के पास जा सकते थे और उनसे अपने गरीब और बेसहारा छात्रों के लिए कुछ भी कर सकते थे. अपने छात्रों पर वो पूरा भरोसा करते थे. ज़रूरत पडने पर वे हिन्दी भाषी छात्र-छात्राओं के लिए इतिहास, अंग्रेज़ी और पॉलिटिकल साइंस ऑनर्स के लिए तैयारी कराते थे. वे अक्सर कहते थे कि हिन्दी भाषी छात्र जिस परिवेश से उठ कर आते हैं उसके लिए महानगर में आकर किसी बडे कॉलेज में पढना बहुत ही कठिन होता है. उन्हें सहानुभूति और सहयोग की ज़रूरत होती है और ये काम करना उनका दायित्त्व है.
इस विशिष्ट व्यक्तित्व के अचानक चले जाने से हिन्दी संसार में एक अपूरणीय क्षति हुई है. अनय हमारे पाथेय थे अब उनकी स्मृति और उनका लेखन हमारी धरोहर हैं.
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Tuesday 27 December 2011

उपन्यास की भूमिका

भूमिका
उन दिनों मैं कोलकाता के एक कॉलेज में अध्यापक था और शहर के बहुत सारे अध्यापक-पत्रकारों की तरह ऐसी जगहों में आता जाता रहता था जहाँ किताबें, संस्कृति-चर्चा, सेमिनार आदि होते हैं और जहाँ बैठने के लिए ज्यादा पैसे खर्च न करने पडते हों. इस हिसाब से मेरे लिए नेशनल लाइब्रेरी एक सुविधाजनक जगह थी जहाँ मैं अपने कॉलेज से निकल कर अक्सर ही पहुंच जाया करता था. मुझे लगता था कि इस लाइब्रेरी की महिमा अपरंपार है. यह एक पूरी दुनिया को अपने में समेटे हुए है. भाँति-भाँति के लोग - विद्वान, पढाकू , छात्र, घुमक्कड , प्रेमी, अड्डेबाज, साहित्यकार, जिज्ञासु, निठल्ले और भी न जाने कितने प्रकार के लोग वहाँ जुटते थे.
एक दिन मैं लाइब्रेरी के मेन हॉल की एक टेबुल पर बैठा कुछ पढ रहा था. पढने में मन नहीं लग रहा था. आसपास की टेबुलों पर नजर डालते हुए मेरा ध्यान एक व्यक्ति पर गया जो बहुत तल्लीन होकर एक किताब को पढ रहा था. उसकी निगाह लगातार पुस्तक पर ही थी. उसको इस तरह मनोयोग से पढते देख मेरा ध्यान उसपर केन्द्रित होना लगा. उत्सुकता हुई कि देखूँ वह आखिरकार ऐसी क्या चीज पढ रहा है. मैं उसकी गोल टेबुल पर ठीक उसके सामने बैठ गया और एक इनसायक्लोपीडिया के पेज पलटने लगा. लगातार ध्यान इसी बात पर लगा रहा कि वह कब उस किताब से अपना ध्यान हटाता है. इस इंतजार का दस मिनट भी नहीं बीता होगा कि मुझसे नहीं रहा गया. मैंने उसे टोका- "यह कौन सी किताब है?" उसने कोई उत्तर नहीं दिया.
मुझे लगा उसने सुना नहीं. थोडा अटपटा भी लगा. मैंने स्वर को तेज करते हुए उससे पूछा- " यह आपकी पुस्तक है?" उसने फिर भी नहीं सुना. अंत में मैंने उसके सामने बंद पडी दो किताबों में से एक को उठा लिया और उसे पलटने लगा. फिर भी वह पूर्ववत अपनी किताब में ही डूबा रहा !
मैंने ऐसा पढने वाला देखा नहीं था. कुछ सूझा नहीं कि क्या किया जाए ताकि उसके साथ बात शुरू हो सके. मैं धीरे धीरे उसकी पुस्तकें पलटने लगा. जिन दोनों पुस्तकों को मैंने उठाया वे दो उपन्यास थे- एक उपेन्द्रनाथ अश्क का और दूसरा राजेन्द्र यादव का. अश्क जी की किताब का शीर्षक मेरे लिए नया था. लेकिन राजेन्द्र यादव का उपन्यास शह और मात मेरा पढा हुआ था.
मैं उस पुस्तक का नाम देखने की कोशिश करने लगा जो वह लगातार पढे जा रहा था. वह एक बहुत मोटी सी कोई किताब थी.
यह एक तकलीफदेह प्रतीक्षा सिद्ध हुई. करीब दो घंटे तक वह यूँ ही पढता रहा ! मैं कुढता रहा, मन ही मन प्रशंसा भी करता रहा और उसके इस तरह पढते रहने पर आश्चर्य भी करता रहा. करीब 5 बजे के करीब उसने पुस्तक को बंद किया. शायद पुस्तक समाप्त हो गयी थी.
उसने पुस्तक बंद करके निर्विकार भाव से आसपास देखा. उसकी निगाह मुझसे मिली. उसने मेरे सामने पडी अपनी किताबों को देखा और फिर एक प्रश्नवाचक दृष्टि मुझपर डाली. मैं मुस्कुरा दी. बदले में वह मुस्कुराया या नहीं समझ में नहीं आया. वह आहिस्ते से उठा, मेरे सामने पडी पुस्तकों को लिया और काउंटर की ओर बढ गया. उसकी अभद्रता पर मुझे क्रोध आ गया. मेरे अध्यापकीय गौरव पर यह एक आघात सा था.
मुझे सँभलने में कुछ सेकेण्ड्स लगे. मैं उठकर तेजी से काउँटर की ओर बढ गया. वह अपनी किताबें जमा कर रहा था. काउँटर पर बैठे व्यक्ति ने जब उससे उसका नाम पूछा तो उसने धीरे से कहा- दिलीप बलराज. इस तरह उसका नाम मुझे पता चला. कार्ड लेकर वह तेजी से गेट की ओर बढ गया. मैं ठगा सा खडा रह गया.
अगले दो दिन मैं लाइब्रेरी नहीं जा पाया, पर मैं उस "पाठक-राज" (मन ही मन मैंने उसे यही नाम दिया था) को भूला नहीं. कई बार उसके बारे में सोचते हुए मैं दोस्तोव्येस्की के पात्रों के पास पहुँच जाता हालाँकि दिलीप देखने में उन पात्रों जैसा नहीं था. वह उतना दुबला-पतला, फटेहाल नहीं था जैसा मुझे लगता था कि दोस्तोव्येस्की का हर प्रमुख पात्र होता है !
तीसरे दिन मैंने दिलीप को लाइब्रेरी में एक नोटबुक में कुछ लिखते देखा. पास में कोई अंग्रेज़ी की किताब थी. इस किताब के लेखक का नाम मैंने कभी नहीं सुना था. मैं उसकी टेबुल के पास की खाली टेबुल पर बैठ गया. वह फिर उसी तल्लीनता से अपने काम में जुटा हुआ था. न तो वह इधर-उधर देखता था और न ही रूकता था. लगभग डेढ घंटे बाद वह रूका . उसके पेन की स्याही खत्म हो गयी थी. उस समय मेरा ध्यान इस बात पर गया कि वह फाउंटेन पेन से लिख रहा था. अब मेरे पास मौका था. मैंने तुरंत अपना 'जेल पेन' निकाला और उसकी ओर बढा दिया. उसकी आँखों में हल्की सी चमक उभरी और फिर बुझ गयी. उसने मेरी ओर देखा. चेहरे पर एक मुस्कान थी, शायद एक कृतज्ञताबोध भी.
वह मेरी कलम लेकर कुछ देर लिखता रहा , लेकिन उसे शायद मेरे पेन से लिखने में वैसा आनंद नहीं आ रहा था. कुछ देर बाद वह उठा. मेरा पेन मेरी ओर बढाया और कहा- " थैंक्स !"
मुझसे उसकी आवाज बहुत अच्छी लगी. मैंने उसे रूकने के लिए कहा. वह खडा रहा.
मैंने अपनी चीजें उठा ली और उसी के साथ लाइब्रेरी के बाहर आ गया.
बाहर आकर मैंने उसे पूछा- " आप दिलीप बलराज हैं? " उसने कहा- " हाँ' लेकिन उसके स्वर में कोई प्रसन्नता या आश्चर्य नहीं था. मैंने बात को आगे बढाने के लिए पूछा- " आप यहाँ रोज आते हैं? " "हाँ, पिछले कुछ महीने से आता हूँ" " किसलिए ? किसी काम के सिलसिले में ?" "नहीं , कुछ खास नहीं . मैं एक कथा लिखना चाहता हूँ . मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि कैसे लिखूँ . प्रॉपर फॉर्म की तलाश में मैं किताबें पढता रहा हूँ. अब भी मुझे ठीक से समझ में नहीं आ रहा है कि मुझे कैसे लिखना चाहिए. " उसने बडी सहजता से कहा.
" तो आप राइटर हैं? मैंने प्रसन्नता को अपने स्वर में उडेलते हुए कहा. " नहीं मैं सिर्फ एक कथा लिखना चाहता हूँ. इस शहर को छोडने के पहले मुझे अपनी कथा कहनी चाहिए."
मैंने विस्तार से उसे बतलाया कि इस क्षेत्र में मेरा अनुभव कितना व्यापक है. इतना तक बोल गया कि वह सिर्फ अपना ड्राफ्ट मुझे दे दे बाकी का काम मैं सँभाल लूंगा. उसने मुझे कुछ कहा नहीं. मुझे लगा उसे यह बात अच्छी लगी.
मेरे कई बार अनुरोध करने पर भी वह चाय पीने के लिए राजी नहीं हुआ. उसने बताया कि वह दिन में सिर्फ एक बार भोजन करता है और रात में दूध पीकर सोता है.
मैंने उसके चेहरे को ध्यान से देखा. मुझे लगा कि वह 'सत्यकाम' फिल्म के नायक का सा लगता था. कम से कम उसकी आँखें बिल्कुल वैसी ही थी. उन दिनों ख्यालों में दो भारतीय फिल्म नायकों- देवदास और सत्यकाम के बारे में सोचा करता था. ऐसे में इस साम्य को पाकर मुझे एक आंतरिक खुशी महसूस हुई.
उसके बाद हमलोग करीब दस बारह बार मिले, दो तीन दिनों के अंतराल पर. जिस दिन उससे आखिरी मुलाकात हुई उस दिन वह कुछ उदास सा था. उसने मुझे बताया कि अब उसे बाहर जाना है. मैंने उससे उसकी कहानी, जिसे वह हमेशा कथा ही कहता था, के बारे में पूछा. उसने अपने बडे से झोले में से कागजों का एक मोटा पुलिंदा निकालकर मुझे सौंप दिया. उसने एक बात दृढता से कही कि यह उसकी अपनी कथा है जिसे मैं जैसे चाहे छपवा सकता हूँ. चाहूँ तो मैं कुछ फेरबदल भी कर सकता हूँ.
मैंने उससे यह पूछा कि उसने कोई प्रतिलिपि अपने पास रखी है या नहीं उसने कहा- " उसकी कोई आवश्यकता नहीं है." मुझे आश्चर्य हुआ कि कैसे उसने अपनी इस कथा को एक सामान्य परिचय के बाद मुझे सौंप दिया.
वह अपने बारे में बातें नहीं करता था. उसके ड्राफ्ट में पृष्ठ संख्या दी हुई नहीं थी. कुछ पन्ने स्टेपल किए हुए थे. घर लौटकर बीवी की डॉंट खाकर भी पूरा पढ गया. कहानी मुझे ठीक-ठाक लगी. शिल्प में कोई नयापन नहीं था और कथा को सीधे सीधे कहा गया था. शाय्द उसने अपने जीवन के विविध अनुभवों को एक कथा के रूप में पिरोने की कोशिश की थी. उसकी भाषा सहज थी लेकिन पढने वाले को कुछ हिस्सा अनावश्यक लग सकता था. इसे छपवाने के बारे में कोई राय बनाने के पहले मैंने अपने कुछ साहित्यिक समझ वाले मित्रों से इसे पढाने की बात सोची. इसका पहला अनुभव बहुत खराब हुआ. कई मित्रों से कहा लेकिन किसी की दिलचस्पी नहीं हुई. मुझे थोडी कोफ्त हुई कि कोई भी अपनी लिखी चीज के अलावा किसी चीज को पढने या चर्चा के लिए तैयार नहीं दिखा. आखिरकार मेरे एक अभिन्न मित्र इसे पढने के लिए राजी हुए. वे व्यस्त रहने वाले थे इसलिए उन्होंने कहा कि रविवार को मैं इसे पढकर तुम्हें बताता हूँ. मंगलवार को मैंने उन्हें फोन किया तो उनका उत्तर था कि यह उपन्यास जीवनानुभव पर आधारित सामान्य सा उपन्यास है जिसमें कुछ दम नहीं है. उनका एक वाक्य कुछ अजीब सा लगा- " अब ऐसी कहानी या ऐसे उपन्यासों में गरीब-गुर्बा लोग ही टँगे रहते हैं. अब भी हिंदी में लोग इसी तरह की चीजें कैसे लिखते रह सकते हैं ?अब इस तरह की कहानी लिखने का कोई मतलब नहीं है." इस बात को तो मैं सह गया, लेकिन इसके बाद जो उन्होंने बताया उससे मुझे बहुत क्रोध आया. उन्होंने बताया कि गलती से उनकी आया ने उन कागजों के एक हिस्से को अखबार के साथ रख दिया और वे फिंक गए. कई बार ढूँढा लेकिन वे मिले नहीं. दस बारह पन्ने इस तरह खो गए. उसने यह भी बताया कि वे कहानी के महत्त्वपूर्ण हिस्से नहीं थे . उसमें कॉलेज के कुछ अनुभव थे जिसमें कुछ भी नया नहीं था. "वही किसी शहरी लडकी को मन ही मन चाहने लगना, उसका मुस्कुराकर बातें करने को दिव्य अनुभव समझना और फिर असलियत में लौटकर देवदास बनना..." मैं विद्वान मित्र से तर्क नहीं कर पाया. वे इन दिनों विरचनवादी दृष्टि से साहित्य और तमाम तरह के टेक्स्ट को देखते थे. वे मॉडर्न टेक्स्ट की खूबियों के भी कायल थे. बात- बात में ज्वॉयस, प्रूस्त और क्लॉड सिमान आदि की चर्चा करते थे और हिन्दी में लिखे जा रहे साहित्य को हेय दृष्टि से देखते थे. मुझे लगा कि इतने विद्वान व्यक्ति को यह पढने के लिए देना उचित नहीं था. मेरी ही गलती थी.
इस दुर्घटना के बाद दो तीन अन्य मित्रों को दबाव देकर कहानी पढवाई. उन जगहों से भी कोई उत्साहवर्द्धक टिप्पणी नहीं मिली. लगभग सबने कहा कि इस तरह के उपन्यास साठ और सत्तर के दशक तक बहुत सारे छप चुके हैं. एक विद्वान मित्र ने टेलीफोन पर टिप्पणी की- " इसमें नागर बोध और ग्राम्य बोध के बीच का गहरा असंतुलन है. जो लोग गाँव को लेकर लिखते हैं उनका शिल्प और गद्य एक तरह का होता है और जो नागर बोध के लेखक हैं उनका दूसरी तरह का. इसमें दोनों का घालमेल है. यह घालमेल भी कुछ कच्चे तरीके का है. इसमें सुधार की जरूरत है."
इस टिप्पणी के बाद मैं बुझ सा गया. मैंने उससे मिलकर इसपर विस्तार से चर्चा की. उन्होंने तर्क किया कि अज्ञेय या निर्मल वर्मा जैसे लेखक गाँव देहात की पृष्टभूमि पर नहीं लिखते या कम लिखते हैं वो इसलिए कि जिस भाव-बोध को लेकर वे चलते हैं उसे गाँव-देहात की पृष्टभूमि में रखने पर रचना का संतुलन बिगड जायेगा. उन्होंने कहा कि अगर इसमें से गाँव वाले प्रसंग को हटा दिया जाए तो यह कामू के आउटसाइडर की तर्ज का मामूली उपन्यास माना जा सकता है. उसने यह भी प्रस्ताव दिया कि गुरूजी वाले प्रसंग को अलग से एक कहानी के रूप में छपवा दिया जा सकता है. उसमें से अचानक आए गुरूजी के मृत्य प्रसंग को हटाकर. एक विदुषी महिला को भी पढवाया. उनकी राय थी कि इसमें राजनीति को लाकर कथा को बोझिल बना दिया गया है. एक आदमी की कहानी और राजनीति को इस तरह मिलाने से पठनीयता प्रभावित होती है. उनका कहना था कि इसमें 'सेक्सुअलिटी' का प्रसंग भी आधे-अधूरे किस्म से आया है. अगर इसपर लिखना था तो और साहस के साथ आना चाहिए था.
मेरी राय इन सबसे अलग इसलिए थी क्योंकि मैंने इसके लेखक को ईमानदारी और निष्ठा के साथ काम करते हुए देखा था. जो व्यक्ति इतनी लगन से अपनी कथा कहने की कोशिश में लगा हो वह ऐसा कैसे लिख सकता है जिसको विद्वान लोग स्वीकार न कर पाते हों यह मुझे समझ में नहीं आता था ? मैंने अंतत: इसे छपवाने का निर्णय लिया. इस पुस्तक को छापने में एक बडी असुविधा यह थी कि इसके कुछ हिस्से "मैं" शैली में थे और कुछ हिस्सों में यह सामान्य कथा शैली में था जिसमें दिलीप की जीवन यात्रा का वृत्तांत था. बहुत सोचने विचारने के बाद मुझे लगा कि "मैं" शैली को हटा दिया जाए. (हालांकि भूमिका लिखते समय यह लग रहा है कि यह शायद युक्तिसंगत नहीं हुआ). एक अन्य तथ्य का उल्लेख इसमें जरूरी है. दिलीप के कॉलेज हॉस्टल जीवन का जो हिस्सा जो किसी कबाडी के यहाँ अखबारों के बीच दबा होगा या अब तक ठोंगा बन गया होगा चूँकि मेरा पढा हुआ था इसलिए उसके बारे में कुछ लिख दूँ. उसमें दिलीप के हायर सेकेंडरी में फेल हो जाने के बाद के कठिन दौर का जिक्र था और कॉलेज जीवने में किसी सहपाठिनी के साथ एकतरफा प्रेम का वर्णन था. पर, कुल मिलाकर वह खंड ऐसा नहीं था कि इसके बिना कथा की अन्विति न बनती हो.
और अंत में, एक अन्य मित्र की बात का उल्लेख करना चाहूँगा जिसे भूलना मेरे लिए बहुत ही मुश्किल है. उन्होंने कहा कि " यह किसी काइयाँ और अतिमहात्त्वाकांक्षी आदमी की पद-प्रतिष्ठा पाने के लोभ में लिखी कहानी है."इस बात को सुनकर मुझे बहुत दु:ख हुआ. जिस आदमी ने इसे लिखा था उसे यह किताब छपी हुई मिलेगी भी नहीं यह भी पता नहीं. पता नहीं किस विश्वास के सहारे वह अपनी कहानी मेरे हवाले कर गया. जाने वाले दिन के दो तीन दिन पहले वह कुछ अजीब अजीब बातें कर रहा था. कुछ बातें मुझे याद हैं, जैसे- " हमारी भाषा खो गयी है... हमारा जीवन बस देह और मन का ही जीवन रह गया है, असली चेतन तो कहीं भीतर रौंदा जा रहा है... जिसे हम भाषा समझते हैं और जिसे हमने ईश्वर का स्थानापन्न बनाने की कोशिश की उसमें चेतना को व्यक्त करना असंभव है... हमें लौटना होगा उस भाषा के पास जहाँ हमारी "जीवात्मा" अभिव्यक्ति पा सके. हम भटक रहे हैं और समझ रहे हैं कि हम कहीं पहुँच चुके हैं या पहुँच रहे हैं... . "
यह बात मुझे उसके व्यक्तित्व से मेल खाती नहीं लगी थी. एक पल को यह लगा कि वह किसी पढी हुई चीज को दुहरा रहा था. पर शायद वह मुझसे कुछ कहना चाह रहा था जिसको व्यक्त करने के लिए उसके पास भाषा नहीं थी. बस उसकी दो आँखें अपलक मेरी ओर देख रही थीं. उन आँखों को मैं अपने इर्द-गिर्द अब भी महसूस कर रहा हूँ जब ये पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं. एक हल्की सी उम्मीद मन में है कि दिलीप की इस कथा को कुछ पाठक मिलेंगे.

Sunday 13 November 2011

Rajneesh on Bipasana of S N Goenka

Vipassana Meditation Technique

Question: Beloved master, Over the past five years I've spent many weeks in isolation at dharmagiri, practicing vipassana meditation as taught by S.N. Goenka. I’ve never experienced such pain, suffering and doubt ever before. Presently I feel very exhausted, tired, yearning deeply to connect with my heart. My interest in the meditation practice is passing away. Beloved master, is this type of meditation practice necessary? Is it helpful? Can awareness and celebration alone pierce to the depth of the mind and dissolve the darkest nights?

Osho: Sagaresh, the vipassana meditation was invented by Gautam Buddha, and for twenty-five centuries Buddhists have been torturing themselves. Now, who told you to go to Dharmagiri to S.N. Goenka, to learn a meditation for which the whole context is missing? The meditation was perfectly right for a man like Gautam Buddha. Always remember, everything is related, interdependent with a certain context.

A German poet, Heine, was lost in a forest for days. Utterly tired, exhausted, hungry, he could not find the way; neither could he find anyone who could show him the way. In the nights he was resting up on the trees; otherwise wild animals would destroy him. And there came the full-moon night. He had written many poems... the moon had been one of his most loved objects, and he had written beautiful songs about it.

But that night, tired and hungry and afraid, he looked at the full moon and he could not believe it – what he saw in the full moon he had never seen before. And he had been a lifelong moon gazer. That night he saw a loaf of bread! What you see depends on you. People see the faces of their loved ones, people see their dream girls in the moon, but nobody has ever seen a loaf of bread. But his experience was absolutely authentic – but only in his context.

I am reminding you of this because people tend to forget that life is a very interwoven, interdependent, cosmic whole. You cannot take a part out of it and keep it alive, meaningful. I will not tell you to do vipassana unless I can also give you the experience of Gautam Buddha. Poor Goenka cannot understand this. He is just a businessman. What does he understand about the context in which vipassana arose?

Gautam Buddha had lived in tremendous luxury, surrounded by beautiful girls, beautiful palaces. The whole night was a celebration; the day was for rest, the night for dances and drinking. Out of this experience he became tired. He had seen all the beautiful girls; there was nothing more to be seen. He had seen that every man and woman is just a skeleton, covered with a thin skin. Just think for a moment: here all of you are skeletons covered with thin skin! This body and its beauty fades very soon.

He had seen all that was possible in those days for a man of power and riches to see, but he could not find peace, contentment, silence. He could not find himself. Utterly frustrated, he moved out of the palace one night – because this life is going to end in a few days, or in a few years. It is not something to cling to. Each moment death is coming closer; before death grabs you, you have to figure out something which is eternal, which is immortal.

All that you see around you is made of the same stuff as dreams are. Do you think you are for the first time on the earth? On the same earth millions of people have come and simply disappeared into thin air. Scientists have calculated that the place you are occupying has been occupied by at least ten people before you. You are sitting on ten corpses! And don’t think much of yourself, because you cannot get out – you will be the eleventh. And remember, it is not a laughing matter for you.

Those ten corpses will laugh at you: ”Look, the poor fellow was thinking of great things and finally is flat on the pile of corpses.” Gautam Buddha’s search for truth, for himself, for the source of life which is eternal, cannot be the search of a poor man who is hungry, who is searching for a loaf of bread. But people have completely forgotten Gautam Buddha. They have taken his meditation out of context.

He could meditate because there was nothing else in the world to think about, to desire, to be ambitious for. The world was, in a way, finished the day he left his house; he never looked back. I am reminded of a beautiful story.... Buddha was afraid that if he went into the mountains of his own kingdom, his father’s armies would find him; he would not be able to escape. He was the only son of an old king, who was hoping that he would succeed him. And he had made a big kingdom for him.

So he immediately passed beyond the boundaries of his kingdom to the neighboring kingdom. And the king was very furious. He ordered the armies not to leave even a single inch unsearched: ”Look around, all over the country.”

Gautam Buddha was not found, but he was not aware that the kingdom he had entered belonged to a friend of his father. So the father informed this king and other kings surrounding his kingdom, ”You have to find my son. In my old age at least you can do this much for me; we have been friends.”

The neighboring king found Gautam Buddha and he said, ”If you are angry, if you have fought with your father... It happens. It is not something strange or unfamiliar; fathers and sons have always been fighting. Don’t be worried. I have only one daughter and no son – get married to my daughter and you will have two kingdoms together. Your father is old; he cannot live long.

And my kingdom is far bigger than your father’s. He is my friend and I have come with a request. You have everything to gain, nothing to lose. You get a beautiful wife, a great kingdom, and of course your own kingdom is there. You will be a greater king than me or your father because your kingdom will be bigger than the kingdoms we have. You will have two kingdoms together.”

Gautam Buddha said, ”You don’t understand the point. I have not fought with my father, I have not been angry with him, and I have not come here in search of a girl. I am not interested in a kingdom, howsoever big it is. But I would like to ask you a few questions; you are my father’s friend. First tell me, you say your girl is very beautiful – is this beauty going to remain forever? Will she not one day be old?”

The king said, ”You ask strange questions. Everybody becomes old.”

”And do you think,” Gautam Buddha asked, ”she will never die?” The king laughed. He said, ”You are hilarious. Everybody dies.”

Gautam Buddha said, ”I don’t want to get married with someone who is going to die.”

The king said, ”She is not going to die tomorrow.”

Gautam Buddha said, ”You cannot give any guarantee. Are you sure you will be alive tomorrow?”

The king said, ”I have never thought about it. I hope that I will be alive, but I cannot be certain.

But you are creating anxieties in my mind. I had come to take you to the palace and it seems you are trying to convince me to follow you to the mountains.”

Gautam Buddha said, ”It is better – there is still time, it is still light; maybe you have a few days more to live. Devote these few days to a search for something which cannot be taken away from you. Your youth will disappear, your beauty will disappear, your kingdom will one day belong to somebody else. And what does it matter, when you are dead, to whom your kingdom belongs, whether he is your son or somebody else’s son?”

The king said, ”You are a dangerous fellow. I don’t want to talk to you.”

He informed Gautam Buddha’s father, ”I have met your son; he is in the mountains in my kingdom. I tried hard, but he is very convincing. And he has created such anxiety in me that I have not slept since. I am continuously thinking of death – what is going to happen after death? What have I gained by having this big kingdom? I am a poor man inside. I have never looked into my own being; I am not even acquainted with myself. I request to you: don’t try to prevent him, let him go and let him search. What we have missed, perhaps we can hope he will find it.”

Gautam Buddha could sit silently, desireless, thoughtless, moving inwards, because the outside had lost all interest. He had seen it – that it is just a phenomenon, the way you see a film. But there are idiots who even seeing a film will cry, will weep, will laugh, because they will become identified and they will forget that there is nothing on the screen, it is just a projected film.

Our whole life is not much more than that, but to know it you have to go through it. Gautam Buddha had a great chance to experience life and see its futility. This gave him the opportunity to sit in deep silence, undisturbed. Vipassana was discovered in these moments. My own effort here is not to give you, Sagaresh, any meditation like vipassana directly.

This place is not a place of ascetics – people are enjoying everything. I want you to enjoy and to see the futility of it. I want to see how many times you become enlightened and how many times you become unenlightened. I know one day you will simply get tired and you will say, ”Finished!” Not finished like Nandan – she has started again. But she is going to be finished one day. When she says goodbye to her last boyfriend it will be possible for her to meditate; particularly a meditation like vipassana.

Otherwise you can sit with closed eyes and beautiful girls will harass you. That has been the experience, down the ages, of thousands of meditators: it is strange, the moment you sit to meditate, suddenly, from nowhere, such beautiful girls start coming. And you open your
eyes and there is nobody.

And not only girls. If you have not known money, thoughts of money; if you have not known power, thoughts of power; if you have not known what it means to be a celebrity, then a deep desire to become famous... And the mind will go on weaving a thousand and one thoughts and desires.

And so-called teachers like Goenka will go on teaching you, ”Don’t allow these thoughts in your mind.” And the more you push them away, the more they will come close to you. You will throw away one girl and you will find there is a queue of girls, and at the end of the queue is standing Sophia Loren. Now, naturally you think, ”Vipassana can be done later on.”

A man said to his friend, ”Last night was just the greatest experience of my life.”

The other asked, ”What happened?”

He said, ”I went fishing and I caught such big fish that I could not believe it. Even to carry one fish to the shore was difficult. And the whole night I was fishing.”

The other said, ”This is nothing. You are saying you had the greatest experience – the greatest experience happened to me. Last night when I dreamt, what I saw I could not believe. On one side was Marilyn Monroe, utterly nude; on the other side was Sophia Loren, utterly nude.” The other man could not contain himself. He said, ”Stop. Why did you not call me?

At such a moment! And what were you going to do with two such women? One is enough for you; one you should think of for your friend. You call me your best friend? – this is great friendship.” The man said, ”You haven’t heard the whole thing. I had gone to your home to find you, but your wife said you had gone fishing!”

If life has not been a rich experience – if it has been a repressive, religion-dominated, conditioned phenomenon – you cannot do vipassana. In twenty-five centuries, millions of people have been doing vipassana. How many have become Gautam Buddhas? My own analysis is very simple, but very significant: you should not repress anything in your life. Live a non-repressive, joyous life. Soon you will find all those joys and all those pleasures are empty.

Unless you have found through your own experience that pleasures are not pleasures, but simply toys to keep you ignorant, to keep you engaged... Once you have found that through your own experience – remember that is most fundamental; it has to be your own experience – then vipassana is the simplest meditation. You don’t have to go to any businessman to learn it.

Buddha had never gone to S.N. Goenka. These kind of people existed at that time too –
businessmen who were ready to teach you at a certain price. I have never met or seen Goenka, but I saw one of his interviews. He says that he met me in Madras. In my whole life I have been only once in Madras, and I remember perfectly, I have not met any Goenka.

He is simply lying. And his Dharmagiri is not very far away from here. If he wants to meet me he can come any day – perhaps a five-hour drive. But he does not have the guts, because I am very merciless. When I see a fox pretending to be a lion, then I do what needs to be done: expose the fox, take away the hypocrisy. He has not lived a life of love, he has not lived a life of pleasures; he has not lived at all that which can create the context in which vipassana is possible.

He is simply a refugee from Burma. And because Burma is a Buddhist country, everybody knows what vipassana is; just as every Christian knows the Christian prayer, every Buddhist knows vipassana. Coming from Burma he knew the structure, intellectually, of what vipassana is. And here he found many people searching for meditation.

And he does not create a situation in which to be associated with him becomes dangerous for you. He is a non-controversial businessman. You will not offend anybody if you go to Dharmagiri. But if you come here, you don’t see many Indians here. The reason is clear: to be associated with me in any way is to be condemned by the outside society. People start saying that you have also been hypnotized, you have also become corrupt.

Dharmagiri is safe, because he does not say to you, ”You have to drop tradition, you have to drop your conditioning, you have to get out of all the knowledge that has been forced upon you. Unless you are so clean, unconditioned, unorthodox – neither Hindu nor Mohammedan nor Christian – you will not be able to enter the world of meditation.” He does not say anything like that. You just enter vipassana as you are.

Nothing is demanded from you, that you are first to go through a fire to be purified, that you have to get rid of the society which is utterly polluted. I was surprised when I was in America: almost every week somebody would phone from San Francisco, somebody from New York, saying, ”We are coming from Bombay,” or, ”We are coming from Poona and we want to meet Shree Rajneesh.”

I told my secretary to tell those people, ”Shree Rajneesh has been there in Poona for seven years – couldn’t you manage to see him? He will come back again to Poona, you can see him then.” Strangely enough, not a single one has turned up. I have been here for two years. Those people who phoned – from Bombay, from Poona – they have not dared to enter the door. In America they were happy that nobody would know that they had been to see a dangerous man. Here the wife will start crying, the children will say, ”Papa, where are you going?” The neighbors will crowd around saying, ”Don’t do this. Just look at your old parents.” It will become a scene.

And you yourself deep down are such a coward that you believe in all the lies that have been spread. You never come here to check – who is being hypnotized? But the trouble is, people say, ”Once you are there you will become hypnotized, you will start saying the same things.” It is a very strange world.

One German sannyasin is here. He is an old, experienced journalist. He had come from STERN magazine to write of what was happening here. But he was a man of integrity; he reported exactly what was happening. They refused his report. They said, ”You have been hypnotized.” If you lie you are not hypnotized, if you say the truth you are hypnotized. They did not publish his article.

He insisted and finally they published it, but he had to change much in it. But he became so disgusted that he resigned and came back. And since then he has been here, he has been in America; he is again here. There are many writers who have had a strange experience: if they write just a positive account, factual, neither for nor against, nobody is ready to publish their books.

They say, ”These books won’t sell because they don’t have any sensation. Make them sensational.” But how to make them sensational? Lie, create fictions which do not exist, and publishers are ready and magazines are ready to publish them. And these books and these publishers and these magazines spread unfounded things all around the world. So people are so much afraid. But even to mention my name is dangerous.





One of my sannyasins who is a Nobel Prize winner asked the president of the Nobel Prize committee, the King of Norway, ”A man has written five hundred books and you have not taken any note of it.”

The King suggested to him, ”Remember never to mention his name. This time you did because you were not aware, but next time it will be dangerous for your job” – he has a big post – ”it will be dangerous for your reputation. You simply forget about this man.”

And he told me, ”I could not believe that he was not even ready to listen about you. He did not even enquire, just for manners’ sake.” On the contrary, from that day the King kept a certain distance from him. Whenever there was a meeting of the Nobel Prize committee he did not allow him to come close to him; he showed absolutely that a certain China wall had arisen between himself and the poor Nobel Prize winner.

And the only crime he had committed was that he had mentioned my name. Indira Gandhi, who was a very powerful woman, had at least six times made appointments to come here to see me, and every time, just one day before, a phone call would come, ”An emergency has arisen and the meeting has to be postponed.”

In fact, now the meeting is postponed forever! My secretary asked Indira Gandhi, ”Why do you do this? If you don’t want to come, we are not asking you to come. You ask us, that you want to come.”

She met me once in Delhi and she said, ”Since then that man’s eyes have been haunting me and I want to see him again. And whatever he has said has changed the whole of history. I want his advice on other problems.”

My secretary said, ”Then why do you go on canceling? – because this is absolute nonsense, that every time on the very day some emergency arises.”

She said, ”To be honest to you, there has been no emergency, just my colleagues, my cabinet stands in the way. Everybody says, ‘Don’t go there, you can even lose your prime ministership. There will be so much turmoil – just avoid.’”

... Just by going for a meeting with a man who has no power, who is not interested in politics! But I can understand, those politicians were right. If she had come here Mohammedans would have said, ”We are not going to vote for you”; Hindus would have said, ”That man has spoken against our VEDAS, we are not going to vote for you. That man has spoken against our shankaracharya.”

A powerful woman like Indira Gandhi is so cowardly that she cannot come when she wants to come, because of the fear that the voters may start objecting, ”You have been to a man for some advice. And any advice that man gives is going to be dangerous. In the first place you will be hypnotized.”

And she asked my secretary, an intelligent woman, well educated, ”Is it true that whoever goes to meet Shree Rajneesh becomes hypnotized?”

People like Goenka are non-controversial, kindergarten school teachers. They don’t understand the complexity of meditation. Vipassana comes in the end; you cannot begin with vipassana. To begin with vipassana you will have to go through what you are saying – the dark night of the soul. And you will not find the dawn anywhere.

The dark night will go on becoming longer and darker. It is a simple psychology: you are not prepared, you have not done your homework, and you have started a work which needs a tremendous background of experience. They are all against me because I want you to live first as hotly as possible.

I used to go to Allahabad. One of my sannyasins, Jayantibhai, would take me from the airport or from the railway station, and suddenly on a bridge he would accelerate the speed of the car. And I would say, ”What is the matter?”

He said, ”The matter is that board.”

Because I had been telling him again and again, ”That board is very religious. You should once in a while go near the board and look at it.” It was an advertisement, but very beautiful. It said, ”Live a little hot. Sip a Gold Spot.”

I said, ”I am not concerned about Gold Spot, but live a little hot!” People live lukewarm. They live just at the minimum, because from that minimum they are protected from many dangers. If you don’t want to fall, crawl – you are safe! And that’s what you are doing in your life. I say live hotly while the season lasts. And this season will not last forever.

Don’t hesitate, because in that hesitation you are losing time. A roseflower does not hesitate to open in the early morning sun, knowing perfectly well that by the evening the petals will fall and not even a mark will remain behind. Whether that roseflower ever existed or not, it will be the same. But while the sun is rising and the morning breeze is welcoming to dance, the rose dances.

All the religions have destroyed your dance. They have made you crippled, they have destroyed your sensitivities. They have dulled your intelligence and then they say, ”Do vipassana.” A man who has lived hotly is bound to do vipassana – but in the evening. He has seen the day. It was beautiful, but it was ephemeral; it is gone. Now begins the search for that which comes and never goes.

One of the great Hindu scriptures is Badarayana’s sutras. The first sutra is: Athato brahma jigyasa – now the enquiry into the ultimate. That ”now” has been for almost two thousand years or more a problem – how to interpret it? Because this is the beginning. Books don’t begin from now. It seems as if something has preceded it.

And now there are many commentaries on Badarayana’s athato, but no one has got the point. The man was saying, ”You have lived hotly, you have loved deeply. You have done everything that you wanted to do, unrepressed, uninhibited. Now it is time for the enquiry into the ultimate. But only now. If you have not lived at the maximum, that which has been left unlived will go on lingering in your mind.

That which has been repressed will go on asking for your attention. Your heart and your mind will be pulled by the unlived, the repressed, the denied, the condemned, and you cannot sit silently.” Otherwise vipassana is not an effort, it is a very simple experience. After the whole hot day of life, when you see the futility of it all... you have to see. You cannot see from other people’s eyes; you have to see the futility with your own eyes. Then what is the problem? You sit silently, you settle silently within yourself, into your very interiority.

The word ‘vipassana’ simply means perceptivity, clarity, seeing directly into truth. But if something you always wanted – it may be a small thing – is there in your unconscious, it won’t allow your perception to be pure. It will try again and again, ”I am still unfulfilled.” First have the experience that you have denied yourself.

And all these religions have been teaching you to deny this, to deny that. They have driven the whole of humanity bananas; otherwise human beings are beautiful as they are. If they live naturally, one day they are going to ripen, one day they are going to mature. One day they are going to graduate from this so-called world of desires, ambitions, jealousies.

After that graduation, vipassana is not a doing. It is a non-doing. You simply sit silently and it starts showering over you as if the whole sky is rejoicing in your silence. One of the stories about Manjushri, a disciple of Gautam Buddha who became enlightened, depicts it correctly. He is sitting under his tree, silently, and flowers start showering on him. Those flowers are not visible, but they are fragrant, and they have tremendous power to transform your whole being.

Sagaresh, it was in a way good that you went into isolation at Dharmagiri practicing vipassana meditation as taught by S.N. Goenka. It has been a good experience. You say, ”I have never experienced such pain.” You deserved it. Why did you go there?

You say, ”I have never experienced such suffering and doubt ever before. Presently I feel exhausted, tired.” Very good. At least you are alive! Just a few days rest, a few days nourishment in my commune and all pain, all suffering, all doubt and all tiredness will disappear. If you have understood me correctly it has already disappeared. You will be dancing and singing and rejoicing.

We have so many meditations here, but I have put vipassana at the very end. First go through all other kinds of experiences, purifying, so that you can become capable of entering vipassana. People want to jump into paradise directly, and they don’t see the place where they are standing, that if they jump from there they will have multiple fractures. One has to reach to the steps and one has to move step by step, consciously, cautiously. It is a pilgrimage.

But this experience has been really good. You needed it. It will be easier now for you to see my arrangement of meditations. You are saying, ”My interest in the meditation practice is passing away.” Your interest in Dharmagiri should pass away, not in meditations. Just it is too fresh... the wound is open. Just wait, and in a few days you will be doing vipassana here. But here vipassana is a juicy experience; it is not dry.

I have a few criticisms against the vipassana that is being practiced in Buddhist lands. They have all made it very dry, desert-like; nothing blossoms, no greenery; everything is simply businesslike. I want you to learn meditation as a play, as playfulness. Your meditation and your love should be synonymous. And that’s what you are asking. You are asking, ”I am yearning deeply to connect with my heart.”

That guy, S.N. Goenka, has disconnected you from your heart, because in the Buddhist tradition there is no place for the heart. It is a very dry approach to reality. Buddha never even mentions the word ‘love’. He was so afraid that for twenty years continuously he did not allow women to be initiated into his commune – because women are impossible. They will bring some juice, whatever you do; something will start growing in the desert, some flowers.

It is impossible for a woman not to be the heart. It is very easy for the man not to be the heart. The woman is the heart and the man is the head. And once you deny women, then there are only dry heads – coconuts! My approach is, I never make any distinction, whether somebody is woman or man. Anybody who is a seeker of the path is welcome. Hence this is a totally different commune; such a commune has never existed before. Here you can sing and dance, here you can fall in love and fall out of love, there is no harm.

Life is accepted in its totality. And in this total acceptance arises the awareness that will enable you to meditate. And this meditation will be far richer than any vipassana of Gautam Buddha. This meditation may create songs in you, may create dances in you, may give a new impetus to creativity in all dimensions of life.

Your silence should not be the silence of a graveyard, your silence should be the silence of a garden. Once in a while a bird starts singing, but it does not disturb the silence, it deepens it. Once in a while the breeze comes with its song, passes through the pine trees, but it does not disturb the silence, it deepens it.

I do not teach you the desert. I teach you the garden, the garden of the heart. That is where, with great respect, I differ from Gautam Buddha. I love the man, but that does not mean I have to agree with everything done by the man. His meditation is heartless, and a meditation that is heartless is not of any worth. I want a meditation that can laugh, that can dance.

Sagaresh, you suffered well. This is what in the East people call the law of karma. You must have committed some grave sin in your past life; otherwise, why should you go to Dharmagiri? –Dharmagiri of all places! But in a way it is good. That evil act and its punishment is finished. Now you can start afresh.

I teach you a meditation which is totally different from anything that has ever been taught in the name of meditation. Now a few things just to relieve your pain and your suffering and your tiredness, and to help you to forget that you have been to Dharmagiri – you simply dreamt about it, there is no such place as Dharmagiri. This guy S.N. Goenka does not exist; it was just a nightmare.

A man parked his car on a street in New York. But when he returned he found that someone had smashed into the rear end of his car. On the windshield he found a note that read:

Dear Sir, I just smashed into your car. The people who saw the accident are watching me. They think I am writing down my name and address, so you can contact me regarding the damage. They are a bunch of idiots!

Hymie Goldberg is stopped in the street by a neatly dressed salesman who says, ”Sir, would you like to buy a toothbrush for ten dollars?”

”Ten dollars?” cries Hymie. ”That’s robbery!”

The salesman seems hurt. ”Well then,” he says, ”how about a nice piece of homemade chocolate cake for ten cents?” This seems fair, so Hymie hands ten cents to the man and unwrapping the cake takes a bite.

Suddenly he screams and spits out the mouthful. ”My God!” he shouts. ”This cake tastes like
shit.”

”It is,” replies the salesman. ”Wanna buy a toothbrush?”

Tired of being a Yuppie, Bogart decides to leave the city life and buy a small farm. He goes to a sale of farm animals and asks to buy a rooster.

”Out here,” says the salesman, ”we call them cocks.”

”Okay,” says Bogart, ”give me a cock. And can you sell me a hen?” he asks.

”Out here,” says the salesman, ”we call them pullets.”

”Okay, give me a pullet,” says Bogart. ”And what else do you have for sale?”

The salesman explains that he has a jackass for sale, so Bogart buys that too. As he is leaving, the salesman warns Bogart that sometimes the jackass stands still and won’t move until he is scratched between the ears. Sure enough, on his way home the jackass stops and does not move, and Bogart has forgotten what the salesman had said.

Grandma Faginbaum happens to be walking nearby and stops to ask if she can help. Just then
Bogart remembers about scratching the jackass between the ears. ”Ah, yes, you can help me,” says Bogart. ”Would you hold my cock and pullet while I scratch my ass?”

Source: " Hari Om Tat Sat Osho " - Osho [ For more see http://www.messagefrommasters.com/Meditation/Awareness/vipassana_comes_in_end.htm ]

Wednesday 9 November 2011

An Unfortunate Case of Ragging in a Girls’ Hostel of Burdwan University

An Unfortunate Case of Ragging in a Girls’ Hostel of Burdwan University

Yesterday, I was communicated about a very unfortunate case of ragging of some girls of the University of Burdwan, West Bengal. It was reported that four students of of M A first year (First Semester) had been living in a Girls’ Hostel where they were constantly harassed by their seniors. Coming from poor background and unexposed to urabn life-styles and etiquettes, these poor girls were taunted and ridiculed since they had come to the Hostel. The girls suffered but they tolerated this with the expectation that soon all this would end. But, this continued and this became more nasty and unbearable. They were physically harassed, constantly abused, called ‘Biharis, Hindibhashis’ who come to Bengal to cheat and capture the assets of the Bengalis, having no manners befitting a civilized human being and so on. It started with the coming of these girls in the Hostel in middle of October. After two weeks of constant harassment, two of these left the hostel and returned to their home, which is near Asansol. (Their friends say they have left their studies.)The other two remained in the Hostel and they faced the worst treatment. Finally, when all this became absolutely unbearable (the horrifying details of which can not be written here), these students dared to report to their Department teachers. Shocked, the teachers verified the report and found these newcomers’ report dependable. They, however, were reluctant to make it a big issue as this might take a Hindustani-Bengali overtones as the students who were being ragged were all Hindi speaking girls (called Hindusthanis in Bengal ) and the group which did it was all Bengali. But, as the application was so genuine, the teachers approached to the University authorities which took this case sympathetically and appropriately. It is said that an enquiry committee would be constituted and the guilty would be punished. While this was going on, one of these two unfortunate girls, unable to bear the pressure, broke down and so vulnerable she became physically that she was rushed to Burdwan Medical College where she is under treatment.
Meanwhile, the offenders, had decided to dilute the case by bringing charges of theft on these girls on 5th November when they came to know that these girls have reported this to their department teachers. Suddenly, this issue became the issue of stealing and the offenders – these two girls- must be punished ! It is interesting that the mobile and the keys of these girls have been snatched from them and they had been physically assaulted by a group of senior students. The charge is that these girls had stolen a half pant of a senior student!
In the late evening, when the incident became known to media people they flashed this news to all channels and this whole issue had been known to the public.
My worry is that what will happen to these two (and other two who had left the Hostel anticipating that worse is coming) girls. Will they be able to convince their poor family members that they should continue their studies living in the Hostel? I am worried.
This whole issue is very sensitive. The politicization of Bengal public space is so acute that every issue is an issue of politics and it may be the case where two political groups would take sides and the whole issue will become a matter of politics where the powerful group’s view would prevail.
Third worry is that the whole episode would leave a lasting impression in the minds of young girls of the Hostel and the University. One of the key issues of the complain of the girl was that only we four- Hindi speaking girls were targeted and no other fresher was subject of this ragging. Why? The four girls have been born and brought up in Bengal.

We sincerely wish the University authorities would take appropriate step so that incidents like these do not occur in future.