Tuesday 27 December 2011

उपन्यास की भूमिका

भूमिका
उन दिनों मैं कोलकाता के एक कॉलेज में अध्यापक था और शहर के बहुत सारे अध्यापक-पत्रकारों की तरह ऐसी जगहों में आता जाता रहता था जहाँ किताबें, संस्कृति-चर्चा, सेमिनार आदि होते हैं और जहाँ बैठने के लिए ज्यादा पैसे खर्च न करने पडते हों. इस हिसाब से मेरे लिए नेशनल लाइब्रेरी एक सुविधाजनक जगह थी जहाँ मैं अपने कॉलेज से निकल कर अक्सर ही पहुंच जाया करता था. मुझे लगता था कि इस लाइब्रेरी की महिमा अपरंपार है. यह एक पूरी दुनिया को अपने में समेटे हुए है. भाँति-भाँति के लोग - विद्वान, पढाकू , छात्र, घुमक्कड , प्रेमी, अड्डेबाज, साहित्यकार, जिज्ञासु, निठल्ले और भी न जाने कितने प्रकार के लोग वहाँ जुटते थे.
एक दिन मैं लाइब्रेरी के मेन हॉल की एक टेबुल पर बैठा कुछ पढ रहा था. पढने में मन नहीं लग रहा था. आसपास की टेबुलों पर नजर डालते हुए मेरा ध्यान एक व्यक्ति पर गया जो बहुत तल्लीन होकर एक किताब को पढ रहा था. उसकी निगाह लगातार पुस्तक पर ही थी. उसको इस तरह मनोयोग से पढते देख मेरा ध्यान उसपर केन्द्रित होना लगा. उत्सुकता हुई कि देखूँ वह आखिरकार ऐसी क्या चीज पढ रहा है. मैं उसकी गोल टेबुल पर ठीक उसके सामने बैठ गया और एक इनसायक्लोपीडिया के पेज पलटने लगा. लगातार ध्यान इसी बात पर लगा रहा कि वह कब उस किताब से अपना ध्यान हटाता है. इस इंतजार का दस मिनट भी नहीं बीता होगा कि मुझसे नहीं रहा गया. मैंने उसे टोका- "यह कौन सी किताब है?" उसने कोई उत्तर नहीं दिया.
मुझे लगा उसने सुना नहीं. थोडा अटपटा भी लगा. मैंने स्वर को तेज करते हुए उससे पूछा- " यह आपकी पुस्तक है?" उसने फिर भी नहीं सुना. अंत में मैंने उसके सामने बंद पडी दो किताबों में से एक को उठा लिया और उसे पलटने लगा. फिर भी वह पूर्ववत अपनी किताब में ही डूबा रहा !
मैंने ऐसा पढने वाला देखा नहीं था. कुछ सूझा नहीं कि क्या किया जाए ताकि उसके साथ बात शुरू हो सके. मैं धीरे धीरे उसकी पुस्तकें पलटने लगा. जिन दोनों पुस्तकों को मैंने उठाया वे दो उपन्यास थे- एक उपेन्द्रनाथ अश्क का और दूसरा राजेन्द्र यादव का. अश्क जी की किताब का शीर्षक मेरे लिए नया था. लेकिन राजेन्द्र यादव का उपन्यास शह और मात मेरा पढा हुआ था.
मैं उस पुस्तक का नाम देखने की कोशिश करने लगा जो वह लगातार पढे जा रहा था. वह एक बहुत मोटी सी कोई किताब थी.
यह एक तकलीफदेह प्रतीक्षा सिद्ध हुई. करीब दो घंटे तक वह यूँ ही पढता रहा ! मैं कुढता रहा, मन ही मन प्रशंसा भी करता रहा और उसके इस तरह पढते रहने पर आश्चर्य भी करता रहा. करीब 5 बजे के करीब उसने पुस्तक को बंद किया. शायद पुस्तक समाप्त हो गयी थी.
उसने पुस्तक बंद करके निर्विकार भाव से आसपास देखा. उसकी निगाह मुझसे मिली. उसने मेरे सामने पडी अपनी किताबों को देखा और फिर एक प्रश्नवाचक दृष्टि मुझपर डाली. मैं मुस्कुरा दी. बदले में वह मुस्कुराया या नहीं समझ में नहीं आया. वह आहिस्ते से उठा, मेरे सामने पडी पुस्तकों को लिया और काउंटर की ओर बढ गया. उसकी अभद्रता पर मुझे क्रोध आ गया. मेरे अध्यापकीय गौरव पर यह एक आघात सा था.
मुझे सँभलने में कुछ सेकेण्ड्स लगे. मैं उठकर तेजी से काउँटर की ओर बढ गया. वह अपनी किताबें जमा कर रहा था. काउँटर पर बैठे व्यक्ति ने जब उससे उसका नाम पूछा तो उसने धीरे से कहा- दिलीप बलराज. इस तरह उसका नाम मुझे पता चला. कार्ड लेकर वह तेजी से गेट की ओर बढ गया. मैं ठगा सा खडा रह गया.
अगले दो दिन मैं लाइब्रेरी नहीं जा पाया, पर मैं उस "पाठक-राज" (मन ही मन मैंने उसे यही नाम दिया था) को भूला नहीं. कई बार उसके बारे में सोचते हुए मैं दोस्तोव्येस्की के पात्रों के पास पहुँच जाता हालाँकि दिलीप देखने में उन पात्रों जैसा नहीं था. वह उतना दुबला-पतला, फटेहाल नहीं था जैसा मुझे लगता था कि दोस्तोव्येस्की का हर प्रमुख पात्र होता है !
तीसरे दिन मैंने दिलीप को लाइब्रेरी में एक नोटबुक में कुछ लिखते देखा. पास में कोई अंग्रेज़ी की किताब थी. इस किताब के लेखक का नाम मैंने कभी नहीं सुना था. मैं उसकी टेबुल के पास की खाली टेबुल पर बैठ गया. वह फिर उसी तल्लीनता से अपने काम में जुटा हुआ था. न तो वह इधर-उधर देखता था और न ही रूकता था. लगभग डेढ घंटे बाद वह रूका . उसके पेन की स्याही खत्म हो गयी थी. उस समय मेरा ध्यान इस बात पर गया कि वह फाउंटेन पेन से लिख रहा था. अब मेरे पास मौका था. मैंने तुरंत अपना 'जेल पेन' निकाला और उसकी ओर बढा दिया. उसकी आँखों में हल्की सी चमक उभरी और फिर बुझ गयी. उसने मेरी ओर देखा. चेहरे पर एक मुस्कान थी, शायद एक कृतज्ञताबोध भी.
वह मेरी कलम लेकर कुछ देर लिखता रहा , लेकिन उसे शायद मेरे पेन से लिखने में वैसा आनंद नहीं आ रहा था. कुछ देर बाद वह उठा. मेरा पेन मेरी ओर बढाया और कहा- " थैंक्स !"
मुझसे उसकी आवाज बहुत अच्छी लगी. मैंने उसे रूकने के लिए कहा. वह खडा रहा.
मैंने अपनी चीजें उठा ली और उसी के साथ लाइब्रेरी के बाहर आ गया.
बाहर आकर मैंने उसे पूछा- " आप दिलीप बलराज हैं? " उसने कहा- " हाँ' लेकिन उसके स्वर में कोई प्रसन्नता या आश्चर्य नहीं था. मैंने बात को आगे बढाने के लिए पूछा- " आप यहाँ रोज आते हैं? " "हाँ, पिछले कुछ महीने से आता हूँ" " किसलिए ? किसी काम के सिलसिले में ?" "नहीं , कुछ खास नहीं . मैं एक कथा लिखना चाहता हूँ . मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि कैसे लिखूँ . प्रॉपर फॉर्म की तलाश में मैं किताबें पढता रहा हूँ. अब भी मुझे ठीक से समझ में नहीं आ रहा है कि मुझे कैसे लिखना चाहिए. " उसने बडी सहजता से कहा.
" तो आप राइटर हैं? मैंने प्रसन्नता को अपने स्वर में उडेलते हुए कहा. " नहीं मैं सिर्फ एक कथा लिखना चाहता हूँ. इस शहर को छोडने के पहले मुझे अपनी कथा कहनी चाहिए."
मैंने विस्तार से उसे बतलाया कि इस क्षेत्र में मेरा अनुभव कितना व्यापक है. इतना तक बोल गया कि वह सिर्फ अपना ड्राफ्ट मुझे दे दे बाकी का काम मैं सँभाल लूंगा. उसने मुझे कुछ कहा नहीं. मुझे लगा उसे यह बात अच्छी लगी.
मेरे कई बार अनुरोध करने पर भी वह चाय पीने के लिए राजी नहीं हुआ. उसने बताया कि वह दिन में सिर्फ एक बार भोजन करता है और रात में दूध पीकर सोता है.
मैंने उसके चेहरे को ध्यान से देखा. मुझे लगा कि वह 'सत्यकाम' फिल्म के नायक का सा लगता था. कम से कम उसकी आँखें बिल्कुल वैसी ही थी. उन दिनों ख्यालों में दो भारतीय फिल्म नायकों- देवदास और सत्यकाम के बारे में सोचा करता था. ऐसे में इस साम्य को पाकर मुझे एक आंतरिक खुशी महसूस हुई.
उसके बाद हमलोग करीब दस बारह बार मिले, दो तीन दिनों के अंतराल पर. जिस दिन उससे आखिरी मुलाकात हुई उस दिन वह कुछ उदास सा था. उसने मुझे बताया कि अब उसे बाहर जाना है. मैंने उससे उसकी कहानी, जिसे वह हमेशा कथा ही कहता था, के बारे में पूछा. उसने अपने बडे से झोले में से कागजों का एक मोटा पुलिंदा निकालकर मुझे सौंप दिया. उसने एक बात दृढता से कही कि यह उसकी अपनी कथा है जिसे मैं जैसे चाहे छपवा सकता हूँ. चाहूँ तो मैं कुछ फेरबदल भी कर सकता हूँ.
मैंने उससे यह पूछा कि उसने कोई प्रतिलिपि अपने पास रखी है या नहीं उसने कहा- " उसकी कोई आवश्यकता नहीं है." मुझे आश्चर्य हुआ कि कैसे उसने अपनी इस कथा को एक सामान्य परिचय के बाद मुझे सौंप दिया.
वह अपने बारे में बातें नहीं करता था. उसके ड्राफ्ट में पृष्ठ संख्या दी हुई नहीं थी. कुछ पन्ने स्टेपल किए हुए थे. घर लौटकर बीवी की डॉंट खाकर भी पूरा पढ गया. कहानी मुझे ठीक-ठाक लगी. शिल्प में कोई नयापन नहीं था और कथा को सीधे सीधे कहा गया था. शाय्द उसने अपने जीवन के विविध अनुभवों को एक कथा के रूप में पिरोने की कोशिश की थी. उसकी भाषा सहज थी लेकिन पढने वाले को कुछ हिस्सा अनावश्यक लग सकता था. इसे छपवाने के बारे में कोई राय बनाने के पहले मैंने अपने कुछ साहित्यिक समझ वाले मित्रों से इसे पढाने की बात सोची. इसका पहला अनुभव बहुत खराब हुआ. कई मित्रों से कहा लेकिन किसी की दिलचस्पी नहीं हुई. मुझे थोडी कोफ्त हुई कि कोई भी अपनी लिखी चीज के अलावा किसी चीज को पढने या चर्चा के लिए तैयार नहीं दिखा. आखिरकार मेरे एक अभिन्न मित्र इसे पढने के लिए राजी हुए. वे व्यस्त रहने वाले थे इसलिए उन्होंने कहा कि रविवार को मैं इसे पढकर तुम्हें बताता हूँ. मंगलवार को मैंने उन्हें फोन किया तो उनका उत्तर था कि यह उपन्यास जीवनानुभव पर आधारित सामान्य सा उपन्यास है जिसमें कुछ दम नहीं है. उनका एक वाक्य कुछ अजीब सा लगा- " अब ऐसी कहानी या ऐसे उपन्यासों में गरीब-गुर्बा लोग ही टँगे रहते हैं. अब भी हिंदी में लोग इसी तरह की चीजें कैसे लिखते रह सकते हैं ?अब इस तरह की कहानी लिखने का कोई मतलब नहीं है." इस बात को तो मैं सह गया, लेकिन इसके बाद जो उन्होंने बताया उससे मुझे बहुत क्रोध आया. उन्होंने बताया कि गलती से उनकी आया ने उन कागजों के एक हिस्से को अखबार के साथ रख दिया और वे फिंक गए. कई बार ढूँढा लेकिन वे मिले नहीं. दस बारह पन्ने इस तरह खो गए. उसने यह भी बताया कि वे कहानी के महत्त्वपूर्ण हिस्से नहीं थे . उसमें कॉलेज के कुछ अनुभव थे जिसमें कुछ भी नया नहीं था. "वही किसी शहरी लडकी को मन ही मन चाहने लगना, उसका मुस्कुराकर बातें करने को दिव्य अनुभव समझना और फिर असलियत में लौटकर देवदास बनना..." मैं विद्वान मित्र से तर्क नहीं कर पाया. वे इन दिनों विरचनवादी दृष्टि से साहित्य और तमाम तरह के टेक्स्ट को देखते थे. वे मॉडर्न टेक्स्ट की खूबियों के भी कायल थे. बात- बात में ज्वॉयस, प्रूस्त और क्लॉड सिमान आदि की चर्चा करते थे और हिन्दी में लिखे जा रहे साहित्य को हेय दृष्टि से देखते थे. मुझे लगा कि इतने विद्वान व्यक्ति को यह पढने के लिए देना उचित नहीं था. मेरी ही गलती थी.
इस दुर्घटना के बाद दो तीन अन्य मित्रों को दबाव देकर कहानी पढवाई. उन जगहों से भी कोई उत्साहवर्द्धक टिप्पणी नहीं मिली. लगभग सबने कहा कि इस तरह के उपन्यास साठ और सत्तर के दशक तक बहुत सारे छप चुके हैं. एक विद्वान मित्र ने टेलीफोन पर टिप्पणी की- " इसमें नागर बोध और ग्राम्य बोध के बीच का गहरा असंतुलन है. जो लोग गाँव को लेकर लिखते हैं उनका शिल्प और गद्य एक तरह का होता है और जो नागर बोध के लेखक हैं उनका दूसरी तरह का. इसमें दोनों का घालमेल है. यह घालमेल भी कुछ कच्चे तरीके का है. इसमें सुधार की जरूरत है."
इस टिप्पणी के बाद मैं बुझ सा गया. मैंने उससे मिलकर इसपर विस्तार से चर्चा की. उन्होंने तर्क किया कि अज्ञेय या निर्मल वर्मा जैसे लेखक गाँव देहात की पृष्टभूमि पर नहीं लिखते या कम लिखते हैं वो इसलिए कि जिस भाव-बोध को लेकर वे चलते हैं उसे गाँव-देहात की पृष्टभूमि में रखने पर रचना का संतुलन बिगड जायेगा. उन्होंने कहा कि अगर इसमें से गाँव वाले प्रसंग को हटा दिया जाए तो यह कामू के आउटसाइडर की तर्ज का मामूली उपन्यास माना जा सकता है. उसने यह भी प्रस्ताव दिया कि गुरूजी वाले प्रसंग को अलग से एक कहानी के रूप में छपवा दिया जा सकता है. उसमें से अचानक आए गुरूजी के मृत्य प्रसंग को हटाकर. एक विदुषी महिला को भी पढवाया. उनकी राय थी कि इसमें राजनीति को लाकर कथा को बोझिल बना दिया गया है. एक आदमी की कहानी और राजनीति को इस तरह मिलाने से पठनीयता प्रभावित होती है. उनका कहना था कि इसमें 'सेक्सुअलिटी' का प्रसंग भी आधे-अधूरे किस्म से आया है. अगर इसपर लिखना था तो और साहस के साथ आना चाहिए था.
मेरी राय इन सबसे अलग इसलिए थी क्योंकि मैंने इसके लेखक को ईमानदारी और निष्ठा के साथ काम करते हुए देखा था. जो व्यक्ति इतनी लगन से अपनी कथा कहने की कोशिश में लगा हो वह ऐसा कैसे लिख सकता है जिसको विद्वान लोग स्वीकार न कर पाते हों यह मुझे समझ में नहीं आता था ? मैंने अंतत: इसे छपवाने का निर्णय लिया. इस पुस्तक को छापने में एक बडी असुविधा यह थी कि इसके कुछ हिस्से "मैं" शैली में थे और कुछ हिस्सों में यह सामान्य कथा शैली में था जिसमें दिलीप की जीवन यात्रा का वृत्तांत था. बहुत सोचने विचारने के बाद मुझे लगा कि "मैं" शैली को हटा दिया जाए. (हालांकि भूमिका लिखते समय यह लग रहा है कि यह शायद युक्तिसंगत नहीं हुआ). एक अन्य तथ्य का उल्लेख इसमें जरूरी है. दिलीप के कॉलेज हॉस्टल जीवन का जो हिस्सा जो किसी कबाडी के यहाँ अखबारों के बीच दबा होगा या अब तक ठोंगा बन गया होगा चूँकि मेरा पढा हुआ था इसलिए उसके बारे में कुछ लिख दूँ. उसमें दिलीप के हायर सेकेंडरी में फेल हो जाने के बाद के कठिन दौर का जिक्र था और कॉलेज जीवने में किसी सहपाठिनी के साथ एकतरफा प्रेम का वर्णन था. पर, कुल मिलाकर वह खंड ऐसा नहीं था कि इसके बिना कथा की अन्विति न बनती हो.
और अंत में, एक अन्य मित्र की बात का उल्लेख करना चाहूँगा जिसे भूलना मेरे लिए बहुत ही मुश्किल है. उन्होंने कहा कि " यह किसी काइयाँ और अतिमहात्त्वाकांक्षी आदमी की पद-प्रतिष्ठा पाने के लोभ में लिखी कहानी है."इस बात को सुनकर मुझे बहुत दु:ख हुआ. जिस आदमी ने इसे लिखा था उसे यह किताब छपी हुई मिलेगी भी नहीं यह भी पता नहीं. पता नहीं किस विश्वास के सहारे वह अपनी कहानी मेरे हवाले कर गया. जाने वाले दिन के दो तीन दिन पहले वह कुछ अजीब अजीब बातें कर रहा था. कुछ बातें मुझे याद हैं, जैसे- " हमारी भाषा खो गयी है... हमारा जीवन बस देह और मन का ही जीवन रह गया है, असली चेतन तो कहीं भीतर रौंदा जा रहा है... जिसे हम भाषा समझते हैं और जिसे हमने ईश्वर का स्थानापन्न बनाने की कोशिश की उसमें चेतना को व्यक्त करना असंभव है... हमें लौटना होगा उस भाषा के पास जहाँ हमारी "जीवात्मा" अभिव्यक्ति पा सके. हम भटक रहे हैं और समझ रहे हैं कि हम कहीं पहुँच चुके हैं या पहुँच रहे हैं... . "
यह बात मुझे उसके व्यक्तित्व से मेल खाती नहीं लगी थी. एक पल को यह लगा कि वह किसी पढी हुई चीज को दुहरा रहा था. पर शायद वह मुझसे कुछ कहना चाह रहा था जिसको व्यक्त करने के लिए उसके पास भाषा नहीं थी. बस उसकी दो आँखें अपलक मेरी ओर देख रही थीं. उन आँखों को मैं अपने इर्द-गिर्द अब भी महसूस कर रहा हूँ जब ये पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं. एक हल्की सी उम्मीद मन में है कि दिलीप की इस कथा को कुछ पाठक मिलेंगे.