Sunday, 20 September, 2009

Haaril released by Alka Saraogi

In a well attended book release function organised by Bharatiya Bhasha Parishad, Kolkata, noted Hindi novelist Alka Saraogi released the novel Haaril penned by Hitendra Patel. This was followed by a lively discussion on the novel in which Anay, Rishikesh Ray, Itu Singh, Shyamal Bhattacharya, Seraj Khan Batish, Geeta Dubey, Amal Karan Seth, Jitendra Jitanshu, Vijay Sharma and others participated. Hitendra Patel and Vijay Bahadur Singh, the editor of Vaagarth,Hindi magazine, also spoke. In this three hour long discussion almost all speakers praised the work and expressed the wish that this kind of work would be welcomed by enlightened Hindi readership. More than 60 scholars graced the occasion.

Saturday, 5 September, 2009

हिन्दी से मांग करने से पहले अंग्रेजीदां इतिहासकारों को चाहिए

प्रो. गिरीश मिश्र ने इस बहस में एक जरूरी मोड दिया है. यह बात कई जगहों से आने लगी है कि हिन्दी में विमर्श का स्तर ठीक नहीं है और साहित्यकार अपने समय के सवालों से टकराने का जोखिम नहीं उठाते, घिसी पिटी लीक पर चलते रहते हैं. यह एक तरह से सही प्रतीत होता है. लेकिन, इसका दूसरा पक्ष यह है कि हिन्दी समाज के समाज शास्त्री जोला के समाज के समाज शास्त्रियों की तरह का आचरण नहीं करते. हिन्दी समाज के समाज शास्त्री एक ग्रंथि पाले हुए हैं. वे समाज के विमर्श को विदेशी विमर्शों के आधार पर फिट करते रहते हैं और उम्मीद करते हैं कि हिन्दी के विद्वान उनका अनुसरण करते रहें. नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव जैसे लोगों ने इस सन्दर्भ में भी एक ख्याति अर्जित कर ली है यह बात समाज शास्त्री ठीक से हजम नहीं कर पाते. क्या यह प्रश्न पूछ्ना गिरीश मिश्र को बिपन चन्द्र से जरूरी नहीं लगता कि स्वातंत्रोत्तर भारत का इतिहास इतना सतही क्यों लिखा जाता है? चौधरी चरण सिंह के सुधार के बाद के समाज के परिवर्तनों पर उपन्यास की मांग वाजिब है लेकिन क्या इतिहास है इस दौर का? कृपया दीपंकर गुप्ता आदि के एक दो लेखों का और कुछ इ पी डब्ल्यू में छपे लेखों का हवाला देकर इतिहासकार अपने दायित्वों से मुक्ति न पा ले. जो उदाहरण गिरीश मिश्र ने गिनाये हैं वे उन देशों से आये हैं जहां के समाज शास्त्री अपने देश का 'टोटल' इतिहास भी लिखना चाह रहे थे. कहा भी जाता है कि शीशे के घरों में रहने वाले दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते. पहले एक लेख इरफान हबीब, बिपन चन्द्र आदि के बारे में लिखें और बताएं कि मार्क ब्लाक, फेब्रे, ब्रादेल, डूबी और लादुरी आदि के देश में ही इस तरह की अपेक्षा साहित्यकारों से की जा सकती है कि वे तत्कालीन समाज के बारे में पेरेक जैसे साहित्यकार पैदा कर सकें जो तत्कालीन समाज की तस्वीर खींच सकें.


दरअसल, हिन्दी में लिखे हर काम को छोटा बनाकर उसकी सीमा को रेखांकित करके कुछ भी नहीं होगा. अभी अभी अरूंधती राय ने यह कहकर सबकी वाहवाही लूटी है कि आदिवासी पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों में कोई भी उनकी भाषा नहीं जानता. क्या बडे लोग, जो बडे मंचों पर काबिज हैं उस आदमी के लिखे को देखने की जहमत उठाते हैं जो हिन्दी में, क्षेत्रीय स्तर पर उन आवाजों को पेश करने की कोशिशें करते हैं? जिस देश में समाजशास्त्र की भाषा अंग्रेजी हो उस देश के साहित्य से अगर मांग हो तो उसे अंग्रेजी साहित्य से मांग रखनी चाहिए. मिश्र जी जांच करें कि अंग्रेजी के लोग कैसा नावेल लिख रहे हैं और फिर इस तरह की टिप्पणियां करे. इस तरह की टिप्पणी का हमें इंतजार रहेगा.

Friday, 4 September, 2009

राजेन्द्र यादव -जगदीश्वर विवाद

जगदीश्वर चतुर्वेदी का अपराध यह है कि वे हिन्दी जगत में कुछ ऐसे प्रश्न उठाने की कोशिश कर रहे हैं जिसके लिए हिन्दी जगत तैयार नहीं दिखलाई पडता. हर मामला अगर व्यक्तिगत बनाकर छोड दिया जायेगा तो बहस का जो स्वरूप होगा वही हो जाता है. जगदीश्वर इस चिट्ठे में जो बुनियादी सवाल उठा रहे हैं वह है पाठ और उसके अर्थ का. यहां किस प्रोफेसर ने किसका शोषण किया इस बात को लाने का प्रयोजन ?


राजेन्द्र यादव समेत बहुत सारे बुजुर्ग लेखक नामवर सिंह की लोकप्रियता और उनके विवादों के केन्द्र में रखने की क्षमता के सामने अक्षम हो जाते हैं. ऐसे में वे जाति के नाम पर बहुत ही शानदार हथियार लेकर सूरमा बन बैठे हैं. वे इतिहास मूर्ख हैं यह कहना ठीक नहीं लेकिन जिस आधार पर वे ब्राह्मणों के विशेष गुण – अमूर्त को व्यक्त /साधने की क्षमता आदि- के कायल हो जाते हैं. इस बहाने वे तमाम गैर ब्राह्मण कवियों को हथियार दे देते हैं. अब कोई बडा कवि नहीं बनता है तो सीधा सा कारण है कि वह ब्राह्मण नहीं है और बैठे बैठे निठल्ला चिंतन करने वाली श्रेणी से नहीं आता.

महाराज, कम से कम यह तो सोचा होता कि दूसरे देशों के जो कवि हैं उनपर यह लाजिक क्यों नहीं लगता? क्या भारत की मिट्टी में ऐसा कुछ है कि यह लाजिक सिर्फ यहीं चलता है?

सोशियालाजी में एक फंक्शनलिस्ट स्कूल हुआ करता है जो यह मानता है कि कोई चीज अगर किसी समाज में है तो उसके कारण हैं (वाजिब कारण ). इस दृष्टि के प्रभाव को समझने के लिए यह देखिए कि खुद जगदीश्वर ने यह लिख दिया है कि वेद ब्राह्मणों ने लिखा है! जब वेद लिखे गये थे ब्राहमण कहां थे? वेद व्यास, आदि क्या दुबे चौबे के पूर्वज थे? क्या ऋग वेद कालीन समाज में ब्राहमण जन्म के आधार पर होते थे? कम से कम हमलोग यह नहीं मान सकते कि भारत के समस्त प्राचीन ग्रंथों के रचयिता ब्राहमण लोग थे. कृपया उन्नसवीं सदी में प्राचीन भारत की खोज पर फिर से विचार करिए. (बर्नार्‍ड कोन से लेकर उपिंदर सिंह की पुस्तकें इस मामले में सहायक हो सकती हैं). ब्राहमण जाति के भीतर जो समय के हिसाब से परिवर्तन हुए हैं दुर्भाग्य से इस पर बहुत सोचा नहीं जाता. बिहार के सबसे बडे जमींदार ब्राहमण थे इस बात को भी याद रखिए और बी पी मण्डल (यादव) बहुत बडे जमींदार परिवार के थे. हजारों ऐसे उदाहरण दिए जा सकते हैं जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि जाति परिवर्तन शील है. जाति का क्रिस्टिलाइजेशन औपनिवेशिक कालीन परिघटना है. पर इस ओर जाने से बहुत पढना लिखना पडेगा. कौन जाये. क्यों न सीधे सीधे पहचान को जाति से जोडो और लाठी लेकर कूद पडो. डेमोक्रेसी है, संख्या बल हमारे साथ है जीत हमारी होगी. एडवर्ड सईद का हवाला कई बार दिया जाता है लेकिन आपको याद हो कि खुद सईद ने भारत आने पर अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि ‘आइडेंटिटी बोर्स मी’. इतना तंग आ गये थे उनकी बात को पक़ड कर पहचान के प्रश्न के स्थूलीकरण से !

निवेदन है कि इस बात को देखें कि मूल प्रश्न यह है कि रचना का अर्थ रचना में है या पाठेतर संदर्भों में?

मैं जगदीश्वर चतुर्वेदी से इस बात में सहमत नहीं हूं कि पाठ का अर्थ प्राप्त करने के लिए पाठ से बाहर जाना अनिवार्य है. पाठ के अध्ययन की कई प्रविधियां हैं और आप पाठ को खोलकर उसके अर्थों की एक श्रृंखला पा सकते हैं. मुझे इस सन्दर्भ में एक निवेदन अन्य विद्वान मित्रों से करना है कि सवालों को देखें सवाल करने वाले कभी कभी सही सवाल को थोडे अटपटे ढंग से भी रखें तो भी सवाल को ही महत्त्वपूर्ण मानें, सवाल करने वाले को नहीं. जगदीश्वर एक साथ उन महानों की महानता के सामने प्रश्न खडे कर रहे हैं जो सामने मंच पर भिडते दिखाई पडते हैं लेकिन आपस में उनके बीच एक गहरा रिश्ता है. क्या कारण है कि हिन्दी में अभी भी ये सत्तर अस्सी पार के लोग एजेंडा सेट कर रहे हैं और वो भी बगैर ज्यादा मशक्कत के?