Sunday 14 August 2011

Shammi Kapoor a modern Indian rebel star 1


I watched the programmes of tv which naturally centred around Shammi Kapoor with interest. Two things were noticeable- first, the capacity of SK film persona to survive all these years as if not much has changed since good old 60s and the second, the simplicity that comes with SK while he looked back. This can not be part of any big star- be it the greatest Dilip Kumar (most articulate but never simple), most successful hero Amitabh (whose approach is professional), Devanand (the debonair hero but too modern to be simple). He was perhaps the only big superstar who took his going away of stardom with relative empathy.
What is amazing that that man was so full of life and so down to earth at the same time. He has a huge sense of gratitude. The way he remembered his colleagues and contemporaried is noteworthy. In one of the best interviews of SK , Vinod Dua asked some interesting questions and he responded very nicely.Two interesting episodes which Dua made him to narrate were very absorbing. First, how he married Gita Bali. Shammi was so genuine in saying that he was dating with Gita for three months and he was persuading her to marry him. She was not saying yes. (My God ! how could a lady say no to Shammi Kapoor). One day she said- 'Chalo shadi karte hain, abhi' and at 10.30 in the night they went to a temple. The priest said to them that the God was sleeping and they could marry in the morning. They came back , had their dinner and went to the temple at 4.30 in the morning and became husband and wife! Gita Bali told him to put  lipstick in his 'mang' for 'sindoor' (vermillion)! The second episode was equally interesting: Shammi Kapoor was in the second row of a flight and he was singing an old song of 1948. Much to his surprise he found a lady voice was coming from the front row. When he looked at the lady he found it was Lata Mangeshkar ! She said' Do you think others do not k now this song ?"
How people can be so good ! The time may change but these greats would be there with us.
[ I had written a longer piece and suddenly the text turned into garbage. I wish to continue this note] 

Wednesday 10 August 2011

kuchh depressing thoughts

अगर अमूर्त्त सा लगने वाला सच सामने आ जाये तो फिर नामों की क्या जरूरत है ? मैं सुबह से देर रात तक टी वी, अखबार और अब वर्चुअल मीडियम के तमाम हिन्दी के लोगों को देखकर यह कहता हूँ कि ये लोग हिन्दी की आत्मा को नहीं समझते हैं. कल रात जब दीपक चौरसिया को आरक्षण पर एक कार्यक्रम एंकर करते देखा तो इतनी कोफ्त हुई कि बयान नहीं कर सकता. ये जो हमारे प्रतिनिधि बनते हैं वे प्लांटेड लोग हैं ऐसा ही लगता है या फिर ये लोग रूपांतरित हो जाते हैं व्यवस्था का दबाव ऐसा है. प्रकाश झा बिहारी हैं, अमिताभ बच्चन एक हिन्दी कवि का बेटा है, मनोज बाजपेयी बिहारी है और दीपक चौरसिया पिछडे वर्ग से आया हुआ पत्रकार है . ये सब मिलकर जो बातचीत कर् रहे थे उसको सुनना कंटेंट और फॉर्म दोनों के स्तर पर असहनीय था. ये लोग समझाना चाह्ते हैं कि शिक्षा का व्यवसायीकरण आरक्षण के कारण हुआ है ! दूसरी ओर फेसबुक पर दिल्ली में नौकरी करने वाला/ करने की जुगत में भिडा पिछडा/दलित वर्ग जिस तरीके से एकांगी विश्लेषण करके हिन्दी समाज की सोच को कास्ट लाईन पर वर्टिकली बाँटना चाहता है उसे देख कर यह विश्वास डिगने लगा है कि ये नीचे से ऊपर गये लोग नयी सकारात्मक सोच रखकर चलेंगे. पूरा देश ग्लोबलाईजेशन के जहर से आक्रांत होता जा रहा है, किसानों और आदिवासियों के हितों को विकास के नाम पर अनदेखा किया जा रहा है और ये सब लोग इस तरह का समाज फोडू प्रचार चला रहे हैं. क्या ऐसे में हिन्दी या भारतीय विचारों या भाषा- संस्कृति को समझते हुए चला सोचा जा सकता है ? पूरे मामले को फिर से विचारना होगा. ये देश बौद्धिक रूप से और गुलाम होता जा रहा है. हम 'उपकार' फिल्म के मनोज कुमार की जगह प्रेम चोपडा होते जा रहे हैं. ऐसे में आप नाम लेने के लिए कहते हैं ? 

Tuesday 9 August 2011


कुछ विचार -
1.    आप चाहें तो इसे मेरा पूर्वाग्रह मानें, लेकिन जो हिन्दी के मीडिया के चेहरे हैं उनमें एक किस्म का बेवकूफी भरा आत्म-विश्वास दिखलायी पडता है. (दो तीन अपवादों को छोडकर) अंग्रेजी की मीडिया के जो चेहरे हैं वे ज्यादा सहज होते हैं, बेहतर तैयारी के साथ आते हैं और अपने 'कुछ बन जाने को दिखलाने की चाह' का प्रदर्शन नहीं होता. आप मीडिया में हैं कोई सेलेब्रेटी तो हैं नहीं और कुछ प्रमाणित करके तो वहाँ पहुँचे नहीं हैं. हिन्दी पत्रकारिता से जुडे लोगों का दायित्त्व ज्यादा है उन्हें इससे बचना चाहिए.
2.    दिल्ली में बैठकर साहित्य, पत्रकारिता और राजनीति के अखाडों में आते जाते कुछ लफाडिया किस्म के लोग हिन्दी के चेहरे बनते जा रहे हैं. इससे हिन्दी का जो चेहरा बनता जा रहा है वह उसका असली चेहरा नहीं है. इस देश के दूसरे हिस्सों में इस भाषा में लिखा- पढा जा रहा है इसकी जानकारी के बगैर ही लोग वही घिसे पिटे नामों, बातों के सहारे हिन्दी का चेहरा बने हुए हैं. एक अभियान चलना चाहिए कि इस 'नकली हिन्दी के चेहरों' के बाहर की हिन्दी में क्या कुछ सोचा समझा जा रहा है.
3.    योग्यता, निष्ठा और तैयारी (आपस में जुडे हुए भी) का कोई विकल्प नहीं हो सकता. आप बगैर तैयारी के जायेंगे तो वही हाल होगा जो हाल धोनी की टीम का इंग्लैंड में हो रहा है. एक दोयम दर्जे की टीम है इंग्लैंड की और लग रहा है कि भारत बचे हुए भी टेस्ट हार जायेगा. आपका काम आपको करना पडेगा. करने के लिए जानना पडेगा. जानने के लिए परिश्रम करना पडेगा. अपने को अपडेट करना पडेगा. इस सामान्य बात को समझे बिना कैसे काम हो सकता है ?किसी को भी इस बात से जाँचा जाना चाहिए (प्राथमिक रूप से) कि जो काम उसका है उसे वह ठीक से करता है या नहीं. हर स्तर पर इसकी जाँच होनी चाहिए. खुद अपने को भी देखना चाहिए. यह न करके हम सब किसी काम के लिए भी दूसरे को दोषी बनाने में लगे रहते हैं. हर डिबेट मेरा और तेरा या फिर हम बनाम वे में तब्दील हो जाते हैं.
4.     प्रेमचन्द या रवीन्द्रनाथ बहुत महान थे. माना. लेकिन जिस भाषा में उन्होंने लिखा उसके नये लोग क्या हैं , कितने प्रेमचन्द और रवीन्द्रनाथ हैं यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. आज रवीन्द्रनाथ को लेकर इतना कुछ कहा सुना जा रहा है लेकिन बांग्ला साहित्य के वर्तमान स्वरूप की चिंता पर कितना ध्यान है? हम वर्तमान में जीते हैं हमारा सरोकार वर्तमान से ज्यादा होना चाहिए.
5.    शैबाल मित्र का एक व्यंग्य है- 'रवीन्द्र दौड'. इसका एक सुंदर अनुवाद विजय शर्मा ने किया था. एक बात कही जाती थी कि आपको एक लेख लिखना आना चाहिए- गाय पर. बाकी जो भी लेख दिया जाये आपका काम है किसी तरह से लेख को गाय तक मोड दिया जाये. बाढ पर बात करनी हो तो एक दो वाक्य बाढ पर लिख कर गाय का उल्लेख कर दीजिए और फिर गाय पर तो आप जानते ही हैं... अब आप रवीन्द्र संगीत को हर घर में ऐसे सिखाने लगें जैसे टाइपिंग स्कूल में टाइप सेखाते हैं तो लोग सीखेंगे लेकिन वह क्या संगीत सीखना होगा?