Monday 31 August 2009

प्रभाष जोशी का बचाव और अभद्रता का प्रदर्शन निन्दनीय

यह बहुत ही दुखद है कि एक बहस को इस तरह व्यक्तिगत बना दिया गया. जगदीश्वर चतुर्वेदी समेत तमाम लोग सती के प्रसंग में प्रभाष जोशी के वक्तव्य के सन्दर्भ में अपना विरोध दर्ज कर रहे थे. ऐसा करना बिल्कुल ठीक है. प्रभाष जोशी गांधी जी हों तो भी इस विचार का विरोध होना चाहिए. आपको याद होगा कि गांधी के एक वक्तव्य – भूकंप हमारे पापों का फल है- के आने के बाद टैगोर ने गांधी का विरोध किया था. तब क्या गांधी के समर्थक – नेहरू-पटेल आदि क्या टैगोर को औकात बताने के लिए कूद पडे थे? और फिर प्रभाष जोशी अगर ब्लाग पर नहीं आते तो इसके क्या? तोमर जी को मैं बहुत अच्छा पत्रकार मानता रहा हूं. अब अचानक वे धमकाने पर उतर आयेंगे इसकी उम्मीद कतई नहीं थी. शायद वे समझते हैं कि ब्लाग पर इस तरह की लठैती वाली भाषा बोलने से उनका कोई नुकसान नहीं होगा. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रभाष जोशी पटना में अपने भाषण का समापन इस बात से करते हैं कि मैं प्रभाष जोशी, सती का समर्थक … यह हिन्दी समाज का दिवालियापन है. हम अंग्रेजों से कुछ सीख सकते हैं. डीन जोंस एक प्रतिष्ठित क्रिकेट खिलाडी और कमेंटेटर थे. एक बार एक एक खिलाडी को टेरोरिस्ट बोल गये. वह दक्षिण अफ्रीकी खिलाडी मुसलमान था और इस कमेंट का विरोध हुआ. उसके बाद डीन जोंस के माफी मांगने के बाद भी उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया, अनुबंध का नवीकरण नहीं हुआ. ये कमेंट मामूली नहीं हैं मान्यवर. आप सती को परंपरा का अंग उन्नसवीं सदी में नहीं कह रहे हैं आज कह रहे हैं जब सारी दुनिया को इस जघन्य प्रथा की असलियत पता चल चुकी है. बचपन में सुना हुआ एक प्रसंग याद आता है. सुनता था कि जब पुल बनता है तो नरबलि न दी जाये तो पुल टूट जाता है. हर पुल बनने के बाद बच्चे की बलि दी ही जाती है. लोग कहते थे कि यह तो हमारी परंपरा है. बाल मन में मेरे स्वप्न में वे बच्चे दिखाई देते थे, उनकी चीख सुनाई देती थी. बस्तर में राजा जब जंगल से गुजरता था तो दस बीस आदिवासियों को मार कर फेंक दिये जाने की प्रथा थी ताकि बाघों से भरे जंगल में बाघ का पेट भरा रहे और राजा पर बाघ आक्रमण न करे. यह भी परंपरा थी. कहिए कि इस तरह का जघन्य अपराध भी परंपरा में है. समरथ को नहीं दोष गुसाईं एक समय लिखा गया है. अब युग बीत गया है. अब ज्यादा धमकाइयेगा और धौंस दिखाईयेगा और कुलीन राजपूती शान बघारियेगा तो हास्यास्पद हो जाइयेगा. गर्व करना है अपने कुलीन राजपूत होने पर तो घर में करिए. हिन्दी के लोकतांत्रिक संसार में इस तरह की अलोकतांत्रिक भाषा का प्रयोग करने के जुर्म में जनता आपको माफ कर देगी इसमें संदेह है.

Friday 28 August 2009

भारतीयता के प्रसंग में किशन पटनायक की याद्

भारतीयता के सन्दर्भ के आते ही बातचीत दो दिशाओं की ओर घूम जाती है. एक ओर वे लोग दिखलाई पडने लगते हैं जो भारतीयता के नाम से किसी हिन्दूवादी सोच को देखने लगते हैं और दूसरी ओर ऐसे लोग आ जाते हैं जो लगभग भक्ति भाव से भारतीयता को देखने लगते हैं. इस सन्दर्भ में समाजवादी चिंतक किशन पटनायक के एक लेख का यह हिस्सा पठनीय है. इसे काशी विश्वविद्यालय के ब्लाग पर अफलातून ने रखा है. पूरे लेख के लिए उस ब्लाग पर जाएं.भारतीय समाज में ऐसी कोई बनी – बनाई संस्कृति नहीं है जो इस शून्य को पूरा कर सकेगी । आपका एक सरल विश्वास है कि भारत के ग्रामीण समाज में भारतीय संस्कृति है । भारतीयता के नाम पर जो भी इस वक्त बचा हुआ है , वह एक विकृति है । अगर तपस्या करने का इरादा न हो तो आप जैसे भारतीयतावादी भी बिहार या ओड़िशा के किसी गाँव में एक साल लगातार नहीं रह सकेंगे । आप कहते हैं कि पर्दा – प्रथा भारतीय नहीं है । यह तो आप और हम मानते हैं । पूर्वी उत्तर प्रदेश की किसी ग्रामीण महिला से पूछिए – पर्दा – प्रथा और चूड़ियों को छोड़कर वह भारतीयता की कल्पना नहीं कर सकती है । अगर आप इन चिह्नों को मिटाना चाहेंगे तो वह कहेगी कि आप ईसाई धर्म प्रचारकों द्वारा प्रभावित हैं । पर्दा – प्रथा , चूड़ियाँ , अस्पृश्यता , जाति – प्रथा , सती – प्रथा - यही तो भारतीयता है , भारतीय ग्रामीणों की नजर में । जिस भारतीयता की आप कल्पना करते हैं वह समाज में नहीं है , हमारे खून में या अवचेतन में है , इतिहास में है । हम उसका उद्धार कर सकते हैं बशर्ते कि हम इन विकृतियों से लड़ सकें । विकृतियों से लड़कर ही हम एक नई भारतीयता का सृजन कर सकेंगे । हम अपनी विकृतियों को जानेंगे कैसे ? यहाँ पर हमे यूरोपीय कसौटी पर परीक्षा देनी पड़ेगी । यह इतिहास का नियम है कि एक सभ्यता बनती है , बिगड़ती है और खतम होने के पहले मानव समाज को कुछ मूल्य दे जाती है । संकट के काल में एक सभ्यता के मूल्यों को दूसरी सभ्यता के मूल्यों से परखा जाता है । भारतीय संस्कृति की सारी उपलब्धियों के बावजूद उसमें व्यक्ति की गरिमा या मानव सेवा की परम्परा नहीं है ( न होने के कुछ अच्छे कारण भी रहे होंगे ) । बौद्ध परम्परा को छोड़कर मानव सेवा की वृत्ति भारत में नहीं है । ब्राह्मणवादी हिन्दू परम्परा में यह बिलकुल नहीं है । आपको एक भी पौराणिक नायक , राजा या ऋषि नहीं मिलेगा , जिसने किसी पतित आदमी को , छोटे आदमी को , पापी आदमी को , महामारी से ग्रस्त आदमी को गले लगाकर , गोद में लिटाकर उसकी सेवा की हो । भारतीय संस्कृति की इस मौलिक कमी के परिणामस्वरूप भारतीय समाज में अस्पृश्यता से लेकर सती दाह तक की गलत प्रथायें बनी हुई हैं । इस कमी के विरुद्ध बुद्ध का एक प्रयास था । बुद्ध का प्रभाव मिट गया । विवेकानन्द और गाँधी का प्रभाव भी क्षीण हो चला है । हमारी महान संस्कृति की गहराई में ऐसी एक कमी क्यों रह गयी ? यही तो इतिहास की विचित्रता है ।

स्त्री वादी लेखन की हिन्दी में संभावना

हिन्दी में स्त्रीवादी विमर्श संभव नहीं लगता. इसके कारणों को आलोचकों में ढूढने के बजाय समाज में ढूंढने चाहिए. हिन्दी समाज बना ही इस रूप में है कि इसमें स्त्री का पक्ष ठीक से आता ही नहीं. जिस हालत में हिन्दी समाज है और जिस तरह से इसका विकास हो रहा है स्त्री वादी दृष्टि का विकास दो चीजों पर निर्भर करता है. या तो कोई ऐसा स्कूल बने जो इस विषय को हिन्दी समाज के हिसाब से उठाए. यह स्त्रीवादी आतंकवादी नजरिया न हो नहीं तो इसका प्रभाव नहीं पडेगा. लोग उसे स्वीकार नहीं करेंगे. यह काम धीरज से किया जा सकता है. अभी हाल में अनामिका की एक किताब देखी थी. मुझे लगता है अगर इस तरह का लेखन ज्यादा मात्रा में होने लगे तो बात बन सकती है. मर्दवाद का विरोध करने की जल्दबाजी में कुछ लोग एक इस तरह के स्त्रीवाद को पोसने लगते हैं जो इस समाज के क्या किसी भी समाज के अनुकूल नहीं है. मर्दवाद कोई आसमान से टपकी हुई चीज नहीं है और न ही किसी षडयंत्र के तहद इसे प्रतिष्ठित किया गया है. मर्दवाद एक तरह की समस्या है जिससे परेशान पुरुष भी है. अपने समाज में जब से आधुनिक विचारों का आक्रमण /हस्तक्षेप हुआ तब से ही इस बात की ओर कम ध्यान दिया गया है कि भारतीय समाज को कुछ विजातीय से दीखने वाले तत्त्वों के साथ तालमेल बिठाना पडेगा. स्त्री पुरूष सम्बन्ध को लेकर जो एक तरह की बहस उन्नसवीं शताब्दी में चली थी उसका कोई बडा प्रभाव समाज पर, कम से कम हिन्दी समाज पर शायद नहीं पडा. गांधी के विचारों में एक परिपक्व भारतीय नारीवादी दृष्टि का विकास हुआ दीखता है लेकिन समाज ने उसे भी भुला दिया. जैनेन्द्र के साहित्य में एक भारतीय नारीवादी दृष्टि थी लेकिन हिन्दी समाज भी उसके लिए कोई सही कसौटी नहीं बना पाया. प्रेमचन्द से लेकर रेणु तक में स्त्री वादी (भारतीय) दृष्टि के विकास की संभावना थी. लेकिन समस्या यह है कि इसके बाद लेखिकाओं को उस दृष्टि का और विकास करना चाहिए था. महादेवी वर्मा को छोडकर बाकियों में उस गाम्भीर्य का अभाव दीखता है जो भारतीय समाज की गति-प्रकृति को ध्यान में रखते हुए सामाजिक विचार को आगे बढने और बढाने के लिए आवश्यक है. कुल मिलाकर जो स्त्री की विविध छवियों का मिसाइली हमला बाजारवाद के कारण बहुत विकृत रूप में आया है. 1990 के बाद नारी के आक्रामक रूप ने भीतर ही भीतर भारतीय मर्द को दहला दिया है. यह एक ऐसे समय और स्थितियों के लिए भारतीय मर्द को तय्यार रहने के लिए कहता है जहां वह अपने पुराने सभी आदर्शों से अपने को अलग खडा पाएगा. एक भारतीय मर्द अभी भी उसी के साथ प्रेम करना चाहता है जिसके साथ वह बुढापा बिताने की सोचता है. लेकिन इस समय की नारी उसे आक्रांत करती है. विवाह, परिवार, जीवन साथी, मां की ममता, सात जन्म आदि के साथ इस नयी नारी को मिला नहीं पाता. ऐसे समय में वह बह रहा है, एक अनिर्णय की स्थिति को ढोते हुए.


हिन्दी के अधिकतर सिद्ध विचारक इस समय हाथ जलाने के जोखिम से बचते हुए बाकी का समय बिताना चाहते हैं. वे जिस बौद्धिक स्ट्रेटेजी से काम चलाते हैं उसे समझना कठिन नहीं है. वे नारी का आदर्शीकरण करते हुए पुरूषवाद का विरोध इस अमूर्तन के साथ करते हैं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

होना यह चाहिए कि बडी संख्या में लेखिकाओं को बहस के केन्द्र में लाया जाए और उन्हें धैर्य से सुना जाए. ज्यादा से ज्यादा युवा लेखक लेखिकाओं को बहस के केन्द्र में रखा जाए. लेकिन इसमें एक बडी मुश्किल है. जब दलित लेखकों की एक बड़ी संख्या हिन्दी में सक्रिय हुई वे बहुत हडबडी में दिखाई दिए. इस कमजोरी का फायदा उन लोगों को मिला जो समाज की नई चुनौतियों का मुकाबला नये समय के हिसाब से नहीं करना चाहते थे. धीरे धीरे ये नये दलित लेखक गुटबंदी के शिकार हो गये और दिग्भ्रमित हुए. आज दलित लेखन उतना संभावनाशील नहीं दिखलाई पड रहा जितना उसे होना चाहिए था. स्त्री लेखन को इससे बचना चाहिए. एक स्त्री कुछ अच्छा लिखती है तो हिन्दी के बहुत सारे दिग्गज उसे सहारा देने, उसके बारे में अतिश्योक्तिपूर्ण बातें कहने की प्रतियोगिता करने लगते हैं. मैं तो उस दिन दहल सा गया जब इस बीमारी का शिकार होते हुए एक बहुत् ही संभावनाशील युवा दलित आलोचक को देखा. उन्होंने एक लेखिका की पहली पुस्तक की प्रशंसा करते हुए उसे निर्मल वर्मा से भी श्रेष्ठ घोषित कर दिया! साहित्य का क्षेत्र कोई फिल्म जगत नहीं है जहां किसी को रातोंरात स्टार बनाया जा सकता है. इस क्षेत्र में धैर्य और निष्ठा के साथ लेखन का कार्य करने वालों को ही स्थायी मान मिल सकेगा. हम तो उम्मीद लगाए बैठे हैं कि लेखिकाओं की ओर से नई दृष्टि का विकास हो सकेगा.

Thursday 27 August 2009

हितेंद्र पटेल का पहला उपन्याकस “हारिल” प्रकाशित







जीवन के बौद्धिक प्रवाह में अपनी धुन और शर्तों पर जीते हुए व्यक्ति को कुछ ऐसे अनुभव होते हैं, जो उसके अब तक जीए जीवन से नितांत भिन्न होते हैं। इससे पहले जीवन ऐसे प्रश्ने लेकर नहीं मिला था। इन अनुभवों से जुड़े प्रश्नोंभ का उत्तर न खोज पाने की व्याकुलता में प्रशांत हिमालय की ओर अपनी औचक यात्रा पर निकल पड़ता है। इस हिमालय प्रवास में उसकी भेंट कुछ ऐसे जीवंत चरित्रों से होती है, जो उसे नयी दृष्टि देती है।

कोलकाता लौटकर प्रशांत ने पाया कि दुनिया अपनी धुरी पर नहीं घूम रही। नयी सृष्टि में कौन-सा मार्ग एक बौद्धिक के जीने के लिए मुफीद है? क्या चुनें हम अपने लिए!… आख‍िर क्या चुना प्रशांत ने अपने लिए?

इस उपन्यास में ऐसे बहुत से सवालों से मुठभेड़ हैं, जो अपनी सरल गति के कारण बेहद रोचक और पठनीय है। उपन्यास की नायिका जामिनी का आख‍िर में किया गया सवाल सिर्फ उपन्यास के भीतर का सवाल नहीं रह जाता – सभी सजग-सचेत व्यक्ति के लिए है कि, “क्या हमलोग ऐसा कुछ नहीं कर सकते, जिससे हम इज़्ज़त के साथ रहें, खुश रहें, स्वाधीन रहें और हमें किसी ऐसे सहारे की ज़रूरत न हो, जो हमारी डिग्निटी को नष्ट करे। पढ़े-लिखे लोगों को तो ऐसी कोई राह निकालनी चाहिए। ऐसा क्या कि हमारी सारी मेधा, सारी तपस्या, सारे आदर्श तभी बचें जब हमें शक्तिशाली लोगों की बैसाखी मिले!”

हारिल लेखक का पहला उपन्यास है, मगर इसके कथा-वस्तु के साथ जैसा प्रौढ़ मगर सहज लेखकीय निर्वाह मिलता है, वह विरल और विचारणीय अनुभव देता है।





Rajeeva said:

Hitendra coming out with a novel is not a surprise. Being not exactly from linguistic background was never his limitation. He is an emotional man and whatever was lacking, JNU filled in. I am sure Haaril would never part with the wooden plank now it has found. Looking forward to some interesting reading. राजीव पाण्डेय

Monday 24 August 2009

खुदीराम बोस






खुदीराम बोस : अमर तरूण विप्लवी

2008 में आज के भारत में वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में देश के युवाओं की ओर देखने पर ऐसा लगता है कि देश के युवाओं के हौंसले टूट रहे हैं और जीवन जीने की एक आदर्श वादी कल्पना की जगह किसी भी तरह बडे बनने की ललक ने ले ली है. आज विकासवादी वे हैं जो अमरीकी पूंजीवादी चक्र के साथ हैं और पिछडे वे हैं जो मातृभूमि और मातृभाषा की बात करते हैं. ऐसे कठिन दौर में सौ साल पहले के एक तरूण –खुदीराम के बारे में सोचने से हमें अहसास होगा कि हम कहां से कहां आ गये. अब भी न चेते तो कहां जायेंगे, यह अनुमान करना भी कठिन नहीं है. सौ साल पहले के बंगाल से आज के बंगाल को हम कैसे मिलायेंगे? अंधेरे समय में आदर्श की रक्षार्थ शायद हमारे नौजवानों को याद दिलाने की ज़रूरत है कि इस देश की खातिर कितनों ने अपना सब कुछ लुटा दिया. खुदीराम और भगत सिंह जैसे नौजवानों के आदर्श को इस देश में फिर से याद करने की ज़रूरत है. कैसे थे वे लोग जो देश के लिये अपनी जान की परवाह नहीं करते थे ! आज 2008 में खुदीराम की फांसी को सौ साल पूरे हो रहे हैं. आइये देखें कि हमारे देश के इतिहास के एक अमर प्रतीक का जीवन कैसे बीता.



खुदीराम के समय का बंगाल



उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में अंग्रेज़ विरोधी चेतना का विकास पूरी तरह से हो चुका था. 1857 के महान राष्ट्रीय संग्राम को जिस नृशंशता से दबाया गया था उसकी स्मृति उत्तर भारतीय राज्यों में प्रबल रूप से देखी जा सकती है, लेकिन बंगाल के उन हिस्सों में जहां बंग्ला भाषा बोली जाती थी 1857 के विद्रोह का कोई खास असर नहीं दिखलाई नहीं पडता. इन हिस्सों में राष्ट्र्वादी चेतना का विकास 1860 के दशक में भिन्न रूप में शुरू हुआ. शुरूआती दौर में हिन्दुओं के बीच जो राष्ट्रीय चेतना फैलाने का जो काम हुआ उसमें हिन्दुओं के सामुदायिक संगठन पर अधिक बल था. हिन्दु मेला ने बंगाल के पढे लिखे वर्ग में देश के लिये सोचने, उसके प्रति देशवासियों को तैयार करने की कोशिश की. उसी समय से बंगाल प्रसिडेंसी में कई ऐसे केन्द्र बनने शुरू हो गये जहां अंग्रेज विरोधी पढे लिखे लोग अपने तरीके से क्रांतिकारी विचारों से लैस थे. तबसे लेकर 1890 के दशक तक के दौर में बंगाल के कुछ हिस्सों में नौजवानों के स्वास्थ्य सुधारने के लिये बनाये गये व्यायाम केन्द्रों में जो राष्ट्रीय चेतना का फैलना जारी रहा उसका यथेष्ट ऐतिहासिक मूल्यांकन अभी नहीं हुआ है. लेकिन 1902 के बाद जब क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों की गतिविधियां तेज हुईं और सरकारी तंत्र ने इनके बारे में तहकीकात की तो यह स्पष्ट हो गया कि बंगाल के इन क्रांतिकारियों के लिये ज़मीन तैयार करने का काम राजनारायण बोस ( रिश्ते में अरबिंद घोष के नाना) और नबगोपाल मित्र के हिन्दू मेला आन्दोलन के दौर से ही चल रहा था. राजनारायण बोस एक ऐसी गुप्त संस्था का निर्माण करना चाहते थे जो मौका पाकर अंग्रज़ों पर हमला कर सकें. वे मानते थे कि जब तक कुछ अंग्रेज़ अधिकारियों को बम से उडाया नहीं जायेगा वे लोग यहां से नहीं भागेंगे. क्रांतिकारी आन्दोलन के इस दौर में- जिसे सभा समितियों का दौर कहा जाता है- मिदनापुर एक बड़ा केन्द्र बन कर उभरा. 1900 के बाद क्रांतिकारियों की गतिविधियां बढने लगीं और धीरे धीरे छात्र समुदाय का समर्थन क्रांतिकारी संगठनों को मिलने लगा. प्रमथ मित्र, सरलाबाला, जतीन्द्रनाथ, बारिन्द्र घोष, सतीस बोस इत्यादि नेताओं की मदद से अनुशीलन समिति और जुगांतर समिति जैसे संगठन धीरे धीरे मिदनापुर, कलकत्ता और उन जिलों में प्रभावी होने लगे जो बंग विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल में शामिल किये गये. 1902 में अरबिंद घोष ने क्रांति के संदेश को देशवासियों के बीच पहुंचाने के लिये हेमचन्द्र कानूनगो, सत्येन बोस और मेदिनीपुर के कुछ युवकों को दीक्षा दी. अरबिन्द घोष के छोटे भाई बारीन्द्र घोष इसी समय अनुशीलन समिति के सदस्य बने. 1904 तक आते आते क्रांतिकारी विचारों का प्रभाव इतना बढा हुआ दिखलाई देने लगा कि अरबिंद घोष को ऐसा लगने लगा कि एक राष्ट्रीय क्रांतिकारी आन्दोलन शुरू करने का समय आ गया है. ऐसा कहा जाता है कि बडौदा में, जहां अरबिंद घोष रहते थे, उनका संबंध ऐसे लोगों से था जो 1857 के विद्रोह के दौर से ही अंग्रेजों के विरूद्ध राष्ट्रीय आन्दोलन के लिये प्रयत्नशील थे. यह वह दौर था जब अरबिंद घोष ने भबानी मन्दिर , सिस्टर निवेदिता ने काली: द मदर जैसी पुस्तकें लिखी. सखाराम गणेश देउस्कर ने न सिर्फ देशेर कथा जैसी किताब लिखकर अंग्रेज़ी राज में आर्थिक शोषण का प्रामाणिक दस्तावेज़ प्रस्तुत किया बल्कि घूम घूम कर युवकों को क्र्रांतिकारी विचारों की अर्थवत्ता समझाने का कठिन कार्य किया. तिलक का आन्दोलन इस क्रांतिकारी आन्दोलन के लिये बहुत मददगार सिद्ध हुआ. लेकिन, क्रांतिकारी आन्दोलन तीव्र तब हुआ जब कर्ज़न ने बंगाल को विभाजित करने की योजना को कार्यरूप देने की कोशिश शुरू की. अब कलकत्ता से लेकर पूर्वी बंगाल और मेदिनीपुर तक अंग्रेज़ों के खिलाफ आन्दोलन तेज होने लगे और कांग्रेस के भीतर क्रांतिकारी और उग्रवादी कहे जाने वाले नेताओं का जोर बढने लगा. 1905 से लेकर 1907 के बीच बंगाल में अंग्रेज़ विरोधी जो आन्दोलन हुए उसने भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के चरित्र को बदल दिया. यही वह निर्णायक मोड था जिसके बाद राष्ट्रीय आन्दोलन जन आन्दोलन का रूप लेने लगा, मध्यवर्ग का चरित्र बदलने लगा, भारतीय दृष्टि के विकास पर बुद्धिजीवियों का ध्यान गया और यह स्पष्ट हो गया कि अंग्रेज़ों के प्रति तीव्र जनाक्रोश है. स्वदेशी आन्दोलन ने पूरे बंगाल को झकझोर दिया. लेकिन, 1907 के अंत तक आते आते यह आन्दोलन शिथिल पडने लगा. ऐसे समय में 30 अप्रिल 1908 में बिहार के मुझफ्फरपुर में एक घटना घटी जिसे 1857 के विद्रोह के बाद की सबसे बडी घटना के रूप में देखा गया. पता चला कि पहली बार इस देश में किसी शिक्षित भारतीय ने बम जैसी विध्वंसकारी चीज़ का इस्तेमाल एक अंग्रेज़ के खिलाफ किया था. राष्ट्रवादी पत्रिका केशरी ने अपने 26 मई 1908 के अंक में लिखा कि “ न तो 1897 के जुबिली हत्याकांड और न ही सिख रेजिमेंट के साथ हुए छेडछाड ने इतना बावेला मचाया ( जितना कि इस घटना ने). ब्रितानी अवाम के हिसाब से बम का भारत में आगमन 1857 के बाद की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना है.” बाद में दो तरूण जिन्होंने कलकत्ता से मुझफ्फरपुर में बम फेंका था पकडे गये और उसके बाद उस महान गौरव गाथा का जन्म हुआ जो आज भी करोडों भारतवासियों के हृदय में प्रेरणा का संचार करते हैं. यह कहानी है अग्निपुंज अमर शहीद खुदीराम बोस की.



भारतीय क्रांतिकारियों के बलिदानों को इस देश की जनता हमेशा श्रद्धा से याद करती है. इस देश का इतिहास भले ही नरमपंथी राष्ट्रीय नेताओं के योगदानों को केन्द्र में रखकर विचार करती हो लेकिन लोगों के हृदय में लक्ष्मीबाई से लेकर खुदीराम बोस, बिस्मिल, चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और सुभाषचन्द्र बोस तक ऐसे महापुरूषों के प्रति कम श्रद्धा नहीं रखती. समय समय पर इन नामों और इन प्रतीकों का प्रभावी उपयोग राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान किया जाता रहा लेकिन इन क्रांतिकारियों के वैचारिक संघर्ष पर कम ही ध्यान दिया गया है. खुदीराम को उनकी शहादत के सौ वर्ष पूरे होने के समय अधिकतर लोग इस रूप में ही याद करते हैं कि वह एक भावुक तरूण था जो क्रांतिकारी आवेग के कारण बम फेंकने के लिये मुझफ्फरपुर गया था और बाद में पकडे जाने के बाद वीरता का परिचय देते हुए फांसी के तख्ते पर झूल गया. उसके ऐतिहासिक कृत्य के महत्त्व को तो लोग याद करते हैं, लेकिन उस तरूण क्रांतिकारी के जीवन और उसके दर्शन पर अभी भी कम लोगों का ध्यान जाता है. प्रस्तुत आलेख में यह कहने का प्रयास किया गया है कि यह एक अधूरा सच है.



खुदीराम का आरंभिक जीवन



खुदीराम का जन्म 3 दिसंबर 1889 को मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में हुआ था. उनके पिता त्रैलोक्यनाथ बसु नराजोल इस्टेट के तहसीलदार थे. कहा जाता है कि जब लक्ष्मीप्रिया देवी को कोई पुत्र न हुआ तो उन्होंने अपने घर के सामने की सिद्धेश्वरी काली मन्दिर में तीन दिनों तक लगातार पूजन किया. तीसरी रात को काली माता ने उन्हें दर्शन देकर पुत्ररत्न की प्राप्ति का आशीर्वाद तो दिया लेकिन यह भी कहा कि यह पुत्र बहुत यशस्वी तो होगा लेकिन अधिक दिन जीवित नहीं रहेगा. उन दिनों के रिवाज़ के हिसाब से नवजात शिशु का जन्म होने के बाद उसकी सलामती के लिये कोई उसे खरीद लेता था. लक्ष्मीप्रिया देवी के पुत्र के जन्म के बाद उसे तीन मुट्ठी खुदी ( चावल ) देकर उसकी दीदी ने खरीद लिया जिसके कारण उसका नाम पडा –खुदीराम.



बालक खुदीराम को मां बाप का प्रेम अधिक दिनों तक नहीं मिल सका. मात्र 6 वर्ष की अवस्था में पहले मां और फिर पिता चल बसे. दीदी अपरूपा देवी का विवाह हो चुका था लेकिन उसे ही नन्हें खुदीराम का दायित्व लेना पडा. अब खुदीराम दीदी और उसके परिवार के साथ रहने लगे. दीदी का एक लड़का खुदीराम की ही उम्र का था. दोनों साथ ही तमलुक शहर के हेमिल्टन स्कूल में पढने लगे. तब तक खुदीराम 12 साल के हो चुके थे. स्कूल में खुदीराम का ज़्यादा मन नहीं लगता था. वे कुछ विशेष किस्म के किशोर थे. स्कूल में वे एक ऐसे छात्र के रूप में जाने जाते थे जिसे किसी भी तरह के कष्ट को सहन करने की क्षमता थी और जो किसी से भी नहीं डरता था. उनके स्कूली जीवन के बारे में दो तीन कहानियां बहुत प्रसिद्ध हैं जिसके बारे में उन लेखकों ने लिखा है जो उनके साथ स्कूल में पढते थे. एक बार वे एक ऊंचे पेड़ से ज़मीन पर कूदे और उन्हें बहुत चोट लगी और कपडे भी बुरी तरह से फट गये. लेकिन जब उसी समय उनके शिक्षक आ गये तो अपने दुःख और तकलीफ को भीतर ही भीतर पीते हुए खुदीराम ने ऐसा दिखाया मानो उन्हें कुछ हुआ ही न हो. सभी लडके अवाक ! खुदीराम सांप से बिल्कुल ही नहीं डरते थे और कई बार सांप को पकड कर, थोडी देर खेल करके वे उसे छोड दिया करते थे. ऐसे साहसी लडके को उनके साथ पढने वाले लडके क्यों न सराहते भला ?



दो वर्ष के बाद खुदीराम को कक्षा तीन ( जो आज के हिसाब से कक्षा 8 के समकक्ष) में मिदनापुर कालेजियेट स्कूल में दाखिल कर लिया गया. इस समय तक यह स्पष्ट होने लगा था कि उनका मन स्कूल की शिक्षा में कम ही लगता था. उनका दिमाग तेज़ था लेकिन उनका दिल पढने में नहीं लगता था. वे देश की सेवा करना चाहते थे. जैसे ही उन्हें पता चलता कि किसी को मदद की ज़रूरत है वे दौड कर उसकी मदद करते. वे बचपन से ही बहुत दयालु प्रकृति के थे. एक बार एक भिखारी ठंड में ठिठुरता हुआ उनके दरवाज़े पर भीख मांगने आया. उसकी दशा देखकर बालक खुदीराम इतने द्रवित हो गये कि मृत पिता की कीमती निशानी- एक कश्मीरी शाल अपनी दीदी के मना करने पर भी दे आये ! इस तरह की अनेक कहानियां खुदीराम के बारे में प्रचलित हैं.



खुदीराम के बारे में अब तक यह बात कम ही लोगों को पता है कि वे एक अत्यंत कर्मठ समाजसेवी थे. जब वे स्कूल में पढ़ते थे तो उन्हें पता चला कि तमलुक शहर में हैज़ा फैल गया है. उस समय बहुत सारे लोग हैज़ा के प्रकोप से काल कलवित हुए थे. बालक खुदीराम ने अपनी जान की परवाह न करते हुए रोगियों की सेवा की. उसी कठिन समय में जब बहुत सारे लोग रोज मर रहे थे श्मशान घाट के बारे में बालकों के बीच यह धारणा हो गयी कि आधी रात के बाद घाट के एक पेड़ के पास कोई नहीं जा सकता. साहसी बालक खुदीराम ने आधी रात के बाद वहां जाकर, उस पेड़ से एक टहनी तोड कर लाकर दोस्तों को दिखलाकर अपने साहस का लोहा मनवा लिया. एक बार स्कूल के एक शिक्षक ने अपने छात्रों की सहन शक्ति की परीक्षा ली. उन्होंने एक टेबुल को पूरी ताकत से हाथ से मारने के लिये कहा. कुछ प्रयासों के बाद सभी छात्र बैठ गये लेकिन खुदीराम तीस के बाद भी प्रहार करते रहे. शिक्षक ने अंत में साश्चर्य उसे रोका तो देखा कि उनके हाथ से खून बह रहा है. बहुत तकलीफ होने पर भी खुदीराम ने उफ तक नहीं किया. ऐसी कितनी ही कहानियां हैं जिससे पता चलता है कि यह कोई साधारण बालक नहीं था. लेकिन एक घटना से पता चलता है कि इस बालक में सिर्फ साहस ही नहीं था एक देश प्रेमी हृदय भी था. एक बार एक छात्र कक्षा में स्वदेशी धोती पहन कर आ गया. सभी लडके उसे देखकर हंसने लगे, लेकिन बालक खुदीराम ने आगे बढ कर उस छात्र को गले लगा लिया. इससे बाकी के लडकों को अपनी गलती का अहसास हुआ.



खुदीराम का क्रांतिकारी आन्दोलन से जुडाव खुदीराम ने स्कूली शिक्षा में ज़्यादा दिकचस्पी नहीं दिखाई, लेकिन सामाजिक दायित्व पालन में असाधारण तत्परता दिखलाई. यह कम लोगों को ज्ञात है कि हैजा फैलने के समय से लेकर बाढ आने पर अपने जीवन की तनिक भी परवाह न करके खुदीराम ने विपत्ति में फंसे लोगों की मदद की. ऐसे नौजवान के प्रति क्रांतिकारी संगठनों के लोगों का ध्यान जाना स्वाभाविक था. मिदनापुर शहर में एक बार शहर के शिक्षकों, विद्यार्थियों और कई प्रमुख व्यक्तियों ने यह संकल्प लिया कि जब तक बंग विभाजन का आदेश नहीं लौटा लिया जाता वे विदेशी वस्तुएं- नमक, चीनी और कपडों का उपयोग नहीं करेंगे. इस संकल्प के साथ ही खुदीराम का स्कूल छूट गया. उन दिनों सत्येन बोस, ज्ञानेन्द्र नाथ बसु, हेमचन्द्र बसु आदि क्रांतिकारी आन्दोलन को प्रभावी बनाने के लिये नौजवानों की तलाश में थे. वे नौजवानों को लेकर मीटिंग करते थे और कुछ पुस्तकों की चर्चा करते थे. इन पुस्तकों में प्रमुख थे- ‘भागवत गीता’, स्वामी विवेकानन्द की पुस्तकें, क्रांतिकारी नेताओं की जीवनियां और सखाराम गणेश देउस्कर की पुस्तक- ‘ देशेर कथा’.



जुलाई 1905 में बंग विभाजन की सरकारी घोषणा के बाद जहां इसका सबसे तीव्र विरोध हुआ उनमें मिदनापुर शहर भी शामिल था. अगस्त में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया. यहीं पर खुदीराम ने आजन्म स्वदेश सेवा का व्रत लिया. पिकेटिंग से लेकर जनसभाओं के आयोजन और् स्वयंसेवकों की सेवा और उनकी देखभाल का काम वे नि:स्वार्थ भाव से करते थे. उस दौर के बारे में लोगों ने लिखा है कि वे स्वयं कहीं भाषण नहीं देते थे और न ही कहीं अपने को जनप्रिय बनाने के लिये कुछ करते थे. लेकिन सब लोग जानते थे कि उनका योगदान सबसे बढकर होता था. खासकर विदेशी वस्तुएं बेचने वाले उनके नाम से बहुत घबराते थे. फरवरी 1906 से लेकर दिसंबर 1907 तक स्वदेशी प्रचार मिदनापुर में बहुत सक्रिय रहा. खुदीराम की ऐसी छवि थी कि अगर कहीं विदेशी वस्तुएं बिक रही हों तो वहां वे दियासलाई और माचिस लेकर पहुंच जायेंगे और आग लगा देंगे! भूपेन्द्र नाथ बसु ने उन दिनों के खुदीराम के बारे में लिखा है कि वे हर उस आदमी को देशद्रोही समझते थे जो चेतावनी के बावजूद विदेशी वस्तुएं बेचने की कोशिश करता हो. उन्हीं दिनों जब मिदनापुर से पाँच मील दूर के इलाके में कंसावती नदी में बाढ आयी और हजारों लोगों को जान माल का नुकसान होने लगा खुदीराम अपने दोस्तों के साथ राहत कार्य के लिये दौड पडे. कई दिनों तक वहीं रहकर बाढपीडितों की मदद करने के बाद वे घर लौटे. उनके बहनोई सरकारी कर्मचारी थे और खुदीराम की गतिविधियों से उन्हें दिक्कत हो सकती थी, इस ख्याल से खुदीराम ने उनका घर छोड दिया और एक वकील के घर में जाकर रहने लगे. इस दौर में एक बार वे घर द्वार छोड कर ग्राम सेवा के लिये चल पडे, लेकिन कुछ दिनों बाद वे लौट आये. दीदी को बाद में पता चला कि वे एक गांव में जाकर किसान परिवार के साथ रहते थे और उनकी तरह खेतों में मेहनत करते थे. बेचारे बालक की हथेलियां इस तरह के काम करने के कारण सख्त हो गयी थी. गरीबों के प्रति खुदीराम के मन में कितना दर्द था इसका अंदाजा एक घटना से लगाया जा सकता है. एक बार एक भिखारी ठंड में ठिठुरता हुआ उनके दरवाजे तक आया तो बालक खुदीराम ने अपने ट्रंक से निकालकर अपने मृत पिता की अंतिम निशानी –एक कीमती पश्मीने की शाल उसे दे दी. दीदी ने उन्हें समझाया कि भिखारी उसे बाजार में बेच देगा वे बोले- “ कोई बात नहीं. इससे उसे कुछ पैसे तो मिल जायेंगे जिससे उसकी कुछ मदद तो हो जायेगी!”



1906 में मिदनापुर में क्रांतिकारी युवकों का सबसे बड़ा अड्डा सत्येन्द्र नाथ बसु की एक हैंडलूम फैक्ट्री थी. इसके साथ ही एक छात्र भंडार था जहां नौजवानों के लिये क्रांतिकारी साहित्य और पत्र पत्रिकाएं उपलब्ध कराई जाती थी. यहीं खुदीराम ने फ्रांस की राज्यक्रांति, क्रांतिकारियों की जीवनियां, ‘वर्तमान राजनीति’, ‘मुक्ति किस रास्ते’ आदि पुस्तकें पढी और ‘बन्दे मातरम’, ‘जुगांतर’ , ‘सांध्य’ जैसी क्रांतिकारी पत्रिकाओं में छपने वाली चीजों को पढा. सत्येन्द्र नाथ के घर के पास ही एक काली मन्दिर था जहां जाकर नौजवान रक्त तिलक लगाकर देशव्रती होने की प्रतिज्ञा करते थे. खुदीराम को तो विदेशी वस्त्र जलाने में कुछ ज़्यादा ही आनंद आता था, पुलिस के साथ उनकी एक मुठभेड भी इसी साल हुई जिसके बाद उन्हें जेल भी जाना पडा. फरवरी 1906 की यह घटना यह बतलाती है कि मुजफ्फरपुर बम कांड के बहुत पहले ही खुदीराम ने एक और बड़ा कांड किया था.



मिदनापुर जेल हाउस में एक समारोह हो रहा था जहां जिलाधिकारी को कुछ पुरस्कार देने थे. इस कार्यक्रम के दौरान बालक खुदीराम ने एक पुस्तिका- ‘बन्दे मातरम’ को बांटना शुरू कर दिया. जितनी निर्भीकता और आश्वस्ति से वे इस पुस्तिका को लोगों को दे रहे थे उससे पास में खडे सत्येन्द्र बसु प्रभावित हुए बिना न रह सके. खुदीराम ने एक प्रति एक शिक्षक रामचन्द्र सेन को भी दी. अंग्रेज़ों का इतना आतंक उस समय था कि इस तरह की सामग्री को देखना भी लोगों को भयभीत कर देता था. सेन ने तुरंत एक सिपाही को खुदीराम को पकडने के लिये कहा. सिपाही ने जब खुदीराम को पकडना चाहा तो उसकी नाक पर एक करारा घूंसे का प्रहार करके खुदीराम वहां से निकल गये. उस समय इस प्रकार की धृष्टता अकल्पनीय थी. बाद में उन्हें गिरफ्तार किया गया और एक्ट 121 के अंतर्गत ( साम्राज्य के विरूद्ध युद्ध छेडने के आरोप में) मुकद्दमा चलाया गया. सज़ा बहुत कठोर हो सकती थी, जैसा कि उन दिनों का चलन था, पर खुदीराम की उम्र और वकीलों की होशियारी से उन्हें बरी कर दिया गया. इस घटना को क्रांतिकारियों ने अपनी विजय के रूप में देखा. आखिरकार सरकार विरोधी प्रकाशन का सरकारी कार्यक्रम में वितरण करके, सिपाही की नाक पर घूंसा जडकर भी खुदीराम को रिहा कर दिया गया ! पूरे मिदनापुर शहर में खुशी की लहर दौड गयी. खुदीराम को फूलों से लाद दिया गया, घोडे पर बिठाकर उन्हें एक जुलूस निकालकर शहर में घुमाया गया और आतिशबाज़ी आधी रात तक चली. देश के लिये कुछ करने का जोश इतना अधिक था कि सत्येन बसु की नौकरी चली गयी( क्योंकि उन्होंने खुदीराम को बचाने के लिये झूठी गवाही दी थी) लेकिन वे बहुत खुश थे! जिस रामचन्द्र सेन ने खुदीराम के विरूद्ध गवाही दी थी उसकी सबने इतनी निन्दा की कि वे घर से निकलते न थे. एक दिन कोई आया और धोखे से उसे बाहर बुलाकर उसे पीटकर भाग गया ! सेन ने पुलिस में मामला किया और खुदीराम को अभियुक्त बनाना चाहा पर उसे कोई गवाह नहीं मिला.



1907 में जब स्वदेशी आन्दोलन शिथिल पडने लगा तब बंगाल में नरम दल और गरम दल का विभाजन और बढ गया. खुदीराम अरबिन्दो घोष के दल के साथ थे जो अपने को नेशनलिस्ट कहते थे. मिदनापुर में खुदीराम ने सुरेन्द्रनाथ बनर्जी आदि नरमपंथी नेताओं के विरूद्ध प्रदर्शन भी किया. उस समय क्रांतिकारियों के लिये पैसों की बडी कमी थी. खुदीराम ने डाक लूटने की योजना बनाई और डाक का थैला छीन कर फरार हो गये. किसी ने उन्हें देख भी लिया, लेकिन कोई उनके खिलाफ शिकायत करने नहीं आया. डाक छीनने के बाद खुदीराम रात के अंधेरे में आठ मील चलकर कोलाघाट होते हुए मिदनापुर पहुंच गये.



क्रांतिकारी दल ने इस समय किसी तरह बम बनाने की तकनीक सीखने का प्रयास किया. हेमचन्द्र दास भी खुदीराम के एक उस्ताद थे. उन्होंने अपनी ज़मींदारी का एक हिस्सा बेच दिया ताकि विदेश जाकर बम बनाना सीख सकें. ऐसे में खुदीराम कलकत्ता आ गये. पुलिस की नज़र में खुदीराम एक खतरनाक क्रांतिकारी थे और उनकी गतिविधि पर नज़र रखी जा रही थी.



उन दिनों क्रांतिकारी लोगों पर सरकार बहुत सख्त थी और मामूली अपराधों के लिये भी कठोर दण्ड दिये जाते थे. एक जज था किंग्सफोर्ड जो क्रांतिकारियों को कठोर दंड देने में आनंद का अनुभव करता था. एक पन्द्रह वर्ष के किशोर सुशील सेन को एक पुलिस कर्मी को धक्का देने के लिये उसने कोडों से पिटवाने का हुक्म दिया था जिसके विरूद्ध क्रांतिकारियों में तीव्र असंतोष था. उसे रास्ते से हटाने के लिये एक पार्सल बम का प्रयोग किया गया लेकिन वह योजना सफल न हो सकी. सरकार सावधान हो गयी और किंग्सफोर्ड को कलकत्ता से हटाकर मुजफ्फरपुर भेज दिया गया. तब क्रांतिकारी दल ने तय किया कि वहां जाकर उसे खत्म किया जाना चाहिये.



खुदीराम और मुजफ्फर पुर बम कांड खुदीराम कैसे किंग्सफोर्ड की हत्या की योजना में शामिल हुए इसके बारे में कई अटकलें लगायी जाती हैं. सरकार का दृढ विश्वास था कि इस योजना का मिदनापुर षडयंत्र के साथ सीधा संपर्क था.कई ऐसे साक्ष्य सरकार ने इकट्ठा किये थे जिससे आभास मिलता है कि खुदीराम समेत कई क्रांतिकारी नौजवान ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या, पुल उडाने, विदेशी वस्त्रों को जलाने इत्यादि जैसे कामों को देश हित के लिये जरूरी मानते थे और संगठित रूप से काम कर रहे थे. जनवरी 1908 में जिस रिवाल्वर को एक पुलिस अधिकारी ने मिदनापुर के क्रांतिकारियों के पास देखा था वह वही पिस्तौल थी जो खुदीराम के पास गिरफ्तार होने के समय मिली थी. खुदीराम का संबंध 6 दिसंबर 1907 के नारायणगढ ट्रेन उडाने की योजना से भी जोडा जाता है.



दूसरी और कुछ लोगों का मानना है कि कलकत्ता आने के बाद खुदीराम का संपर्क अरबिन्दो घोष के दल के साथ और घनिष्ट हो गया जहां से किंग्सफोर्ड हत्या की योजना बनी थी. शुरू में यह काम प्रफुल्ल चाकी को दिया गया था जो खुदीराम की ही तरह क्रांतिकारी इतिहास के एक देदीप्यमान नक्षत्र हैं लेकिन हेमचन्द्र कानूनगो को लगा कि यह अकेले करना ठीक नहीं होगा और किसी अन्य क्रांतिकारी को प्रफुल्ल चाकी के साथ भेज दिया जाये. इस तरह बंगाल में पहले राजनैतिक हत्याकांड का दायित्व दो तरूणों को सौंपा गया. वे एक दूसरे का नाम तक नहीं जानते थे. खुदीराम का नाम दुर्गा दास सेन था और प्रफुल्ल का नाम दिनेश चन्द्र राय था. दोनो एक दूसरे को शायद इसी नाम से जानते थे, ऐसा भी कहा जाता है. उनके जाने के बाद पुलिस को गुप्तचर विभाग ने चेताया था कि किंग्सफोर्ड को मारने का संकल्प लिया गया है.



मुजफ्फरपुर बम कांड और उसके बाद किस तरह दो तरूण- प्रफुल्ल और खुदीराम मुजफ्फरपुर आकर दो सप्ताह रहकर अंतत: 30 अप्रिल 1908 को बम फेंकने में सफल हुए यह कहानी सबको पता है. एक धर्मशाला में दोनों रहे और किसी तरह किंग्सफोर्ड के बारे में पता करके अंतत: बम लेकर छिपे और अंधेरे में बम फेंककर वहां से भागे. दुर्भाग्य से उन्होंने एक गलत गाडी को निशाना बना लिया और दो विदेशी निर्दोष महिलाओं की जानें गयीं. लेकिन यह अपने आप में अनहोनी सी बात थी कि एक हिन्दुस्तानी बम जैसे अत्याधुनिक हथियार का प्रयोग एक गौरांग के ऊपर करे. पहली बार किसी बंग संतान ने एक अंग्रेज़ पर इस तरह आधुनिक अस्त्र का प्रयोग किया था. ऐसा तब भी हो गया जब पुलिस को इसकी सूचना पहले से थी कि किंग्सफोर्ड को मारने के लिये क्रांतिकारी दल सक्रिय है. पुलिस विभाग के लिये यह एक शर्मनाक घटना थी. रात के अंधेरे में खुदीराम और प्रफुल्ल भागे और दोनों ही पकडे गये. प्रफुल्ल को एक बंगाली दारोगा ने धोखे से पकडवाने की कोशिश की. इस कुकृत्य के लिये उसे बाद में क्रांतिकारियों ने मार डाला. प्रफुल्ल ने पुलिस के हाथों पकडे जाने से पहले ही आत्महत्या कर ली. खुदीराम को 1 मई 1908 को मुजफ्फरपुर से 20 मील दूर वैनी स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया. उसके बाद मुकद्दमा चला और अंतत: 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर में फांसी दे दी गयी. खुदीराम ने जिस भाव से मुकद्दमे के दौरान और फांसी के पहले देश के लिये प्राण देने के आदर्श को जीवन से बहुत ऊपर रखकर साहस का उदाहरण पेश किया वह आज भी हर देश प्रेमी के लिये प्रेरणा का स्रोत है. मुकद्दमे के दौरान खुदीराम का वज़न बढ गया था! फांसी के एक दिन पहले इस वीर तरूण ने अपने वकील से कहा था कि “ आपलोग व्यर्थ ही चिंतित होते हैं. पुराने समय में राजपूत रमणियों की तरह मैं भी निर्भय होकर मृत्यु का वरण करूंगा.” इस वीर बालक को देखने और उसकी अविश्वसनीय सी लगने वाली दृढता से जज भी अवाक थे. जब मृत्यु दंड सुनाया गया तो बालक खुदीराम के चेहरे पर मुस्कान थी. जज को लगा कि शायद तरूण ने अर्थ ठीक से समझा नहीं!



वीर तरूण खुदीराम को देखने के लिये मिदनापुर से चलकर एक युवती- सुधांशु बाला सरकार मुजफ्फरपुर चल कर आयी ताकि इस असाधारण तरूण को एक बार देख सके.



खुदीराम की फांसी के दिन बंगाल के कई स्कूलों में बच्चे शोक की पोशाक में, नंगे पाँव स्कूल गये और निरामिष भोजन किया. विप्लवी पत्रों ने खुदीराम की वीरता को सलाम किया. खुद बाल गंगाधर तिलक ने जिन शब्दों में खुदीराम को याद किया वह एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है. तिलक ने खुदीराम और प्रफुल्ल की शहादत को उद्देश्य की दृष्टि से चापेकर बंधुओं की शहादत से भी ज़्यादा महान बताया. बाद में तिलक पर मुकद्दमा चला और उन्हें कारावास का दण्ड भोगना पडा. सबसे अधिक महत्त्व की बात यह थी कि स्वदेशी आन्दोलन के शिथिल पड जाने के बाद एक बार फिर देशप्रेमी लोगों को जगाने का काम खुदीराम की शहादत ने किया. जून 1908 में सावरकर ने भी खुदीराम को महान क्रांतिकारी माना.



खुदीराम के फांसी के दृश्य को केन्द्र में रखकर बाद में बहुत कुछ लिखा गया. यह सिलसिला हिंदी में चाँद के फांसी अंक से 1928 में शुरू हुआ जिसमें इसका वर्णन इन शब्दों में हुआ: “ (खुदीराम की) अस्थि चूर्ण और भस्म के लिये परस्पर छीना झपटी होने लगी. कोई सोने की डिब्बी में , कोई चाँदी के और कोई हाथी दाँत के छोटे छोटे डिब्बों में वह पुनीत भस्म भर ले गये! एक मुट्ठी भस्म के लिये हज़ारों स्त्री पुरूष प्रमत्त हो उठे थे. खुदीराम ने अपनी जान पर खेलकर इस प्रकार भारत जननी पर अपनी भक्ति श्रद्धांजलि अर्पित की.”



बंगाल की धरती पर इस महान संतान के प्रभाव को एक बाऊल गायक के अमर गीत से समझा जा सकता है जिसे मानो खुदीराम ने फांसी पर चढते हुए ही गाया हो- “ एक बार विदाई दे मा, घूरे आसि”. यह गीत 1910 में एक स्वदेशी धोती में छपा हुआ पाया गया था जिसमें खुदीराम अपनी मातृभूमि को अपने विदा गीत में अंत में कहते हैं कि मां फिर मैं आऊंगा और तुम्हारी कोख से जन्म लूंगा. अगर तुम पहचान न पाओ तो उसकी गर्दन को देखना वहां तुम्हें (फांसी की डोरी के) निशान मिलेंगे!



आज भी इस गीत को सुनकर कौन होगा जिसकी आंखें नम न हो जाये ? धन्य है वह धरती जिसने इस कोटि के वीर पुत्र को जन्म दिया.



राहुल सांकृत्यायन में वीर सिंह गढवाली की जीवनी की भूमिका में चेताया था कि खुदीराम और अन्य क्रांतिकारियों के इतिहास को भुलाने की चेष्टा हो रही है. हमें इन क्रांतिकारियों को भुलाना नहीं चाहिये.


[प्रभात खबर, दीपावली विशेषांक, 2008]

media ka khel

मज़े की बात यह है कि यह सबकुछ कोई सोची समझी रणनीति के तहद नहीं होती. मीडिया का काम इस तरह चीजों को फैलाना, बिखराना होता गया है कि अब लगता ही नहीं है कि ऐसा समय भी आयेगा जब सच को कहने और सुनने का दौर आयेगा. हाइपर रियलेतटी अब सचमुच वर्चुअल से ज्यादा पावरफुल होता जा रहा है. लेकिन, अभी भी इतिहास के प्रेत आकर हस्तक्षेप करते हैं और बहस चलने लगती है! यह बात कुछ और विश्लेष्ण की मांग करती है कि इतिहास के आइकन इतिहास से निकल कर किस तरह स्वायत्तता हासिल करते हैं और इतिहास की प्रक्रिया को गौण कर देते हैं. जसवंत सिंह की दिलचस्पी इस बात में क्यों नहीं होती कि इतने सारे लोगों को आखिर क्यों मरना पडा. वह कौन सा दौर था, कैसी ऐतिहासिक प्रक्रिया में इस तरह का नरसंहार चलता रह पाया. वह भी तब जब विभाजन हो चुका था ? जिन्ना के लिए हमदर्दी के कारणों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण होना चाहिए.

प्रभाष जोशी और सती प्रसंग

मुझे खुशी है कि आपने मेरी बातों को सही तरीके से लिया और अच्छा सवाल खडा किया. चार्वाक जी, हम सब ने तुर्गनेव की 'पिता और पुत्र' पढी है. उसका मुख्य पात्र बाजारोव , जो एक निहिलिस्ट था, कहता है कि विध्वंस के बिना सार्थक निर्माण संभव नहीं. एक समय यह बात ठीक लगती थी. लेकिन फिर एक समय आता है जब उसी उपन्यास के एक और पात्र की बात हमारे दिमाग पर हावी होने लगती है- ' यू केन नाट बी द जज आव योर फादर'. हिन्दी की विचित्र स्थिति का अंदाजा मुझसे बहुत ज्यादा आपको होगा. एक समय था जब हमलोग समझते थे कि सुरेन्द्र प्रताप सिंह बहुत पावरफुल आदमी हैं. सच यह नहीं था. प्रभाष जोशी एक समय नौकरी पर रखने की ताकत रखते थे. लेकिन इस तरह की शक्ति के अलावा उनके पास ज्यादा शक्ति नहीं रही होगी. एक व्यक्तिगत किस्सा बताना चाहूंगा. भारत की एक बडी मीडिया संस्था गुजरात समाचार ने तय किया कि वह एक अखबार शुरू करेगी. उस समय जिस आदमी को यह दायित्व दिया गया कि वह जगह जगह से आये आवेदनों पर विचार करके नियुक्तियां करे उसने सबसे पहले मुझे चुना और फिर हम दोनों ने मिलकर बहुत सारी नियुक्तियां की. हमलोग बहुत पावरफुल समझे जाते थे क्योंकि 40 से ज्यादा लोगों को नौकरी दी थी, और भी दे सकते थे. करोडों रूपये का मामला हमलोगों के हाथ में था. मं व्यक्तिगत कारणों से पत्रकारिता छोड कर दूसरे काम में लग गया. बाद में असली पावरफुल व्यक्ति का जो हुआ वह मेरे लिए सबक से कम नहीं था. चार्वाक जी, आप चाहे इसे मेरा सनकीपन समझें लेकिन हो सके तो इस बात को मान लें कि अखबार मालिक हिन्दी के पत्रकार-सम्पादक को चपरासी से ज्यादा नहीं समझते. ऊपर से भले ही आप आप करें भीतर ही भीतर उसे अपना व्यक्तिगत नौकर ही समझते हैं. हिन्दी में वैसे भी दो चार लोग हैं जिसे देखकर हिन्दी वालों को भी थोडा मान मिलता है. रामविलास शर्मा, नामवर सिंह, प्रभाष जोशी, मैनेजर पाण्डेय जैसे लोग कम हैं. आप इन महानुभावों से असहमत हों, उनसे झगडा करे लेकिन उन्हें बचा कर भी रखें. इन सब लोगों में कुछ कुछ ऐसा है जिससे हमें बहुत असुविधा होती है, खीज भी होती है लेकिन क्या किया जाये? हमें हिन्दी के वृहत्तर सरोकारों को ध्यान में रखते हुए इन्हें बचाकर रखना पडेगा. और दो में तीन ब्राह्मण की बात ? हिन्दी का विकास जिस रूप में हुआ है उसको ध्यान में रखने पर यह कुछ स्वाभाविक ही लगेगा. हिन्दी बौद्धिक समाज का चरित्र पिछले 10-15 सालों में तेजी से बदला है. अब यहां अन्य जातियों का दखल बढा है. अब तीन में दो नहीं तीन में एक ब्राहमण ही मिलेगा. समय अब बदला है. उम्मीद है परिदृश्य और भी बदलेगा. कुछ ज़्यादा बोल गया होउं तो क्षमा प्रार्थी हूं.


पर, यह मत समझिएगा कि सती के प्रसंग में जोशी जी की जान हमलोग छोडने वाले हैं.

Sunday 23 August 2009

प्रभाष जोशी की सती प्रथा संबंधी टिप्पणी

प्रमोद मल्लिक की प्रतिक्रिया से थोडा चकित हुआ. क्या यह कोई दोहराने की जरूरत है कि प्रभाष जोशी जी हिन्दी बौद्धिक जगत के एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ हैं ? निश्चित ही उन्होंने जब लोगों का चुनाव किया होगा तो वे ये न देखते होंगे कि यह ब्राह्मण है या नहीं. वे इस स्तर के तो नहीं ही होंगे. मैं उनको व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता, लेकिन इतना तो उनके लेखन से ही लग जाता है कि वे एक उच्च कोटि के व्यक्ति और विद्वान हैं. सवाल इस बात का है ही नहीं. सवाल है परंपरा की उस समझ का है जिसमें सती जैसी प्रथा का समर्थन ध्वनित होता है. इस मसले पर हम उनसे यह उम्मीद कतई नहीं करते कि वे सौ साल पहले के महानों की तरह ही बातें करते रहें. प्रमोद जी, बंकिमचन्द्र ने बहुविवाह का समर्थन किया था. इस बात से बंकिम हमारे लिए बेकार नहीं हो जाते. विद्यासागर और बंकिम का वितर्क देखिए. क्या आपको लगता है कि बंकिम का समर्थन इस विषय पर किया जा सकता है? प्रभाष जी को पूरा अधिकार है कि वे परंपरा की एक हिन्दूवादी समझ रखें. वे फिर भी हमारे लिए आदरणीय रह सकते हैं. आखिर मदन मोहन मालवीय हमारे महान हैं कि नहीं, कुमारस्वामी हैं कि नहीं? लेकिन, परंपरा की इनकी समझ एकांगी ही मानी जायेगी. आखिर एक समय नरबलि भी, शिशुबली भी परंपरा का अंग रही होगी. परंपरा कोई ऐसी चीज नहीं जिसे हम पूरा का पूरा ढोते रहें. हम अपनी सुविधानुसार उसमें काट छांट करते ही हैं. सती प्रथा हमारे समाज के लिए कलंक है. जिस बात से इसका परोक्ष-अपरोक्ष समर्थन होता हो उसका विरोध होना चाहिए.

आलोक धन्वा से एक मुलाकात

यह लिखते हुए कुछ असमंजस की स्थिति में हूं. क्या इस तरह आलोक जी के बारे में दो बातों को सार्वजनिक करना ठीक है. पर सोचता हूं जो लोग इस ब्लाग पर आयेंगे वे समझ सकेंगे कि मैं उनके प्रति प्रेम भाव के कारण ही दो चित्र अपने ब्लाग पर डाल रहा हूं.
आलोक जी पटना में एक कमरे के फ्लैट में रहते हैं. उनको चाहने वाले भी कम नहीं हैं, लेकिन मुझे लगता रहा कि हिन्दी का इतना महान कवि एक दम अकेला छोड दिया गया है. तमाम तरह की दुश्चिंताएं उन्हें घेरे थीं और वे बार बार दुखी हो जाते थे. कुछ व्यक्तिगत प्रसंग भी आये जिसने उन्हें बहुत व्यथित किया है. मैं उनकी बातें सुनता रहा और वे तमाम मेरे सामने घूमते रहे जब कोलकाता में हम उन्हें रोक रहे थे और वे दिल्ली जा रहे थे. कितनी बडी गलती की थी आलोक जी ने!
मुझे उनका स्नेह मिलता रहा है इस बात का मुझे गर्व है. बडे प्रेम से कोलकाता का हाल पूछते रहे. इस बात से बहुत उदास थे कि बंगाल में वामपंथ की शक्ति लगातार कम होती जा रही है. जब मैनें उन्हें कहा कि अब वामपंथ के शासन को टिकाना संभव नहीं वे मेरा चेहरा गौर से देखने लगे. कुछ साल पहले हमलोग जब  उनसे बहस करते थे और कहते थे कि वामपंथ गलत हाथों में चला गया है तो वे विरोध करते थे. इस बार नहीं किया. शायद वे समझ चुके हैं कि हमलोगों की बातें सही थी, शायद. लेस्बियनिज्म के प्रश्न पर वे इसके खिलाफ बोले. कहने लगे कि यह प्रकृति के खिलाफ है, अप्राकृतिक है.
पूरी दुनिया में जिस तरह आदमी अकेला होता जा रहा है जब "आदमी को आदमी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है". वे लगभग विकल भाव से अपने पुराने साथी (एक रिक्सा वाला जो उनके साथ रोज रहता था) को याद करते रहे. खासकर एक बात को जब वह बेनी (रिक्शा वाले का नाम) कहने लगा था- " हे पैसा, हम तोरा पाछू नैं रहब, तोरा आगू रहब, कैहनें कि जे तोरा पाछू रहतै ओकरा नींद नैं आबै छै".
लगभग तीन घंटे की बातचीत के बाद जब मैं बाहर निकला तो अपने समेत सभी हिन्दी समाज के ठेकेदारों को कोस रहा था जो हिन्दी के इस महान कवि को शांति से रहने की सामान्य व्यवस्था भी नहीं करवाता और उम्मीद करता है कि एक ठो और 'कपडे के जूते' क्यों नहीं लिखते आलोक जी.

Saturday 22 August 2009

नन्दीग्राम के बाद कोलकाता में बौद्धिक आक्रोश


यह एक मानी हुई बात है कि नन्दीग्राम के भीषण हत्याकाण्ड के बाद कोलकाता के बौद्धिक परिवेश में हलचल शुरू हुई और यहां का हिन्दी जगत भी इससे अछूता नहीं रहा. कुछ तस्वीरें यहां रखी जा रही हैं जो यह बतलाने के लिए हैं कि हम चुप नहीं थे, हमारी आवाज वहां थी.

प्रभाष जोशी-जगदीश्वर चतुर्वेदी विवाद

यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात है कि भाषा को आलोचना के दायरे में लाया जाए. जगदीश्वर चतुर्वेदी ने हिन्दी में एक नये प्रकार की बह्स को बढाया है. जब से हेडेन व्हाइट जैसे विद्वानों का जोर बढा है और भाषा के भीतर छिपे (स्तरीय रूप में) विचारधारात्मक दबावों को समझने का प्रयत्न बढा है. यह बात बहुत सही है कि हमारे भीतर एक श्रद्धाशील पाठक पहले से मौजूद रहता है जिसके लिए श्रद्धेय लोग खास किस्म का प्रसाद बांटते चलते हैं और हम तृप्त होकर सर झुकाए चलते रहते हैं. यह भेडचाल हिन्दी में इतनी ज्यादा है कि एक बौद्धिक समुदाय के रूप में हिन्दी के बौद्धिकों की कोई हैसियत बन ही नहीं पाई. आज के इंडियन एक्सप्रेस में शेखर गुप्ता (संपादक) ने भारत में जिस किस्म की बौद्धिक क्षय का चित्र खींचा है वह कम से कम हिन्दी के मामले में तो सही ही लगता है. गुप्ता ने कहा है कि भारत मे समाज विज्ञान के क्षेत्र में कोई नया काम नहीं होता क्योंकि यहां राजनैतिक दबाव बहुत अधिक है. वे बतलाते हैं कि इतिहास में लगभग हर नया और उत्कृष्ट काम भारत के बाहर ही होता है. यह बात साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी है. मीडियाक्रिटी का ऐसा वर्चस्व है कि कोई भी नये विमर्श में शामिल होना नहीं चाहता. सांस्थानिक दबाव भी कम नहीं है. अब गौर करिए. जसवंत सिंह की किताब को रिलीज करने वाले प्रोग्राम में नामवर सिंह उपस्थित थे. नामवर सिंह पिछले तीस-चालीस सालों से हिन्दी बौद्धिक समुदाय में जिस तरह के विचारों को लेकर सबसे महान और बडे (प्रभाष जोशी के शब्द) बने हुए हैं उसकी भी किसी ने पडताल की हो (ठीक से) याद नहीं पडता. हिन्दी में नये लोगों को खुल कर बोलना पडेगा और चीजों को उघाड उघाड कर देखना पडेगा. गादामार (या गादामेर) की एक उक्ति का स्मरण होता है जिसमें वे कहते हैं कि हम भाषा में ही होते हैं. अगर भाषा के भीतर जाया जाए और उसे डीकंसट्रक्ट किया जाए तो कुछ नयी बातें आयेंगी. हम अपने प्रति भी क्रिटिकल सम्पर्क रखें तब जाकर वैसी दृष्टि हमें मिल सकेगी जिससे हम लगातार नये समय के साथ तादात्म बिठा सकेंगे. प्रभाष जोशी की भाषा का समाजशास्त्रीय विवेचन तो हो ही विचारधारात्मक विश्लेषण भी हो यह अभीष्ट है. आखिर क्या कारण है कि उन जैसा विद्वान ब्राह्मणों की संस्थाओं में जाकर सम्मानित होता है और इस बात के पीछे के सच को देखना नहीं चाहता. सचमुच हम भाषा के तिलिस्म में ही न अटक जाएं उसके पीछे के विचारों को भी खोलने का अभ्यास करे.

1857 का इतिहास : कुछ प्रसंग

इतिहासो के दौर में 1857; कुछ विचार


हितेन्द्र पटेल



इन दिनो 1857 को लेकर लगातार बहस हो रही ह। कुछ वर्षो पहले यू जी सी ने कालेजो आर विश्र्वविद्यालयो के लिए जब पाठयक्रम तयार किया था तो 1857 के विद्रोह को एक अलग अध्याय के रूप मे भी नही रखा गया था। आज भी बहुत सारे लोगो को लग रहा ह कि 1857 के विद्रोहियो के बारे मे इतनी बहस की क्या .जरूरत ह? पर, 1857 पर बहसो का दार थम ही नही रहा। निश्चित रूप से पिछले कुछ सालो मे एसा कुछ घटित हुआ ह जिससे 1857 के बारे मे लोग इतनी बड़ी सखा मे लेखन कर रहे ह।यह सही ह कि सरकार ने एक करोड़ रूपये एक सन्स्था को देकर इस बहस को बढाने मे मदद की ह लेकिन यह भी सही ह कि इन दिनो 1857 के विद्रोह पर जो बहस हो रही ह वह सब सरकारी मदद के कारण ही हो रही हो। दरअसल, इस बहाने इतिहास की पूरी धारणा, राष्ट्रवाद की धारणा, उन्नसवी सदी के बुद्धिजीवियो की विचारधारा, जातिवादी विमर्श मे एक गुणात्मक अन्तर इत्यादि विषयो को ध्यान मे रखने पर एसा लगता ह कि आधुनिक इतिहास लेखन की दिशा अब बदलने लगी ह। 1857 पर हो रहे विमर्शो ने कुछ एसे ही सन्केत दिये ह।

इतिहास होता भी है और बनाया भी जाता है। जो इतिहास है उसकी पुनर्प्राप्ति की आकांक्षा प्रयोजनीय है लेकिन उसकी उपलब्धि असंभव। कुल मिलाकर ऐतिहासिक विवरण का ध्येय है - ऐसे सवाल पूछना जिसमें ऐतिहासिक 'सच' ज्यादा साफ दिखाई दे, 'सत्य' के इर्द गिर्द की चीजों पर इस तरह से रौशनी पड़े कि जो 'सच' है वह दीखने लगे। इन्हीं मायनों में इतिहास में प्रवेश किसी सत्य का अनुसंधान नहीं है कुछ ऐसे प्रश्न पूछना है जिसमें इतिहास के इलाकों से ज्य़ादा से ज्य़ादा हिस्सा हमें दीखे। यहां यह दुहराने का प्रयोजन शायद अनावश्यक है कि हम चाहें या न चाहें अपने वर्त्तमान को भूतकाल पर प्रक्षेपित करते हैं। इतिहास वर्तमान से ज्य़ादा जुड़ा है भूतकाल से कम। भूतकाल सिर्फ तथ्य देते हैं। उन तथ्यों को किस प्रकार संयोजित करना है, कहां किसे कितनी प्रमुखता देनी है और इसके अन्त में क्या निष्कर्ष निकालने हैं यह सब बातें वर्तमान से ही तय होती हैं। कॉलिंगवुड को याद करें तो यह कि इतिहास मूलतः इतिहासकार के दिमाग़ में होता है। हेडेन व्हाइट ने एक बहुत सरल तरीके से इसकी व्याख्या की है : हम मानें कि तथ्य कुछ इस प्रकार हैं - ठ्ठ, ड, ड़, ड्ड, ड्ढ . . . । इसको इतिहासकर जब पूरी ईमानदारी के साथ भी रखेगा तो वह इस रूप में आयेगा - ठ्ठ ड क् ड्ड क . . . । किसी दूसरे इतिहासकार के लिए वह इस रूप में आ सकता है - ऋ ड ड़ क़् ड्ढ . . . । यानी यह इतिहासकार पर निर्भर है कि वह किस तथ्य को प्रमुखता देगा और किसे नहीं। इस सुविधा के कारण इतिहासकार ईश्र्वर हो जाता है। कहा जाता है कि इतिहासकार वह कर सकता है जो ईश्र्वर भी नहीं कर सकते - वह इतिहास बदल सकता है! पर ईश्र्वर का इतिहास एक कल्पना है जिसे उत्साही 'मुक्तिकामी', आधुनिक ज्ञान बोध ने मनुष्य की चेतना में संयोजित कर पाने की आकांक्षा प्रगट की। हेगेल का इतिहास वही पूरा इतिहास है, शायद ईश्र्वर का इतिहास है जो तीन भागों में विभक्त है - भूत, वर्त्तमान और भविष्य। इन तीनों को एक सूत्र में पिरोकर इतिहास की संकल्पना ने उन्नीसवीं सदी में इतिहास की धारणा को आकार दिया। बीसवीं सदी के अंत तक आते आते वह इतिहास दम तोड़ने लगा।

फूकोयामा को मानें तो यह इतिहास 'मर' गया है। बोद्रीया ने भी कहा कि इतिहास अपनी कक्षा से छिटक कर कहीं और चला गया है। इतिहास समय की पटरी से उतर गया है।फूकोयामा की जिस उक्ति को लगभग फूहड़ 'सिद्ध' किया जाता है उसका मर्म यही था कि इतिहास की हेगेलीय धारणा का अन्त हो गया है।

'इतिहास' के अन्त से ''इतिहासों'' का दौर शुरू हो गया है। दरअसल, गौर से देखा जाय तो इतिहास कभी भी इतिहासों से ज्य़ादा शक्तिशाली नहीं था। यह तो आधुनिक बुर्जुआ वर्ग का हठ था, ज्ञान तंत्र की पूरी संरचना पर उसका एकाधिकार था जो शास्त्रीय ज्ञान चर्चा में यह बात स्वीकार्य हो गयी कि उनका इतिहास 'सच' है और बाकी चीजें कल्पना।

एक विद्वान ने प्रस्तावित किया है कि यह जानना ज्य़ादा जरूरी है कि घटनाओं को लोगों ने किस रूप में अपने इतिहासों में देखा है। भले ही इन इतिहासों में इतिहास की प्रमाणिकता का अभाव हो। यह ज्य़ादा जरूरी है कि लोगों ने भूतकाल की घटनाओं का 'आत्म इतिहास' अपने तरीके से लिखने की कोशिश की। इन चेष्टाओं को इतिहास अगर खारिज कर दे तो इतिहास को इस प्रश्न का

उत्तर देना पड़ेगा कि आखिरकार ये 'आत्म-इतिहास' किन मानकों पर खारिज होंगे और इन मानकों को बनाने वाले कौन हैं?

यह इतना आसान मामला नहीं है। दरअसल, साठ के दशक के बाद से सारी दुनिया में यह बात लगातार कही जा रही है कि जिसे हम पूरे समाज का 'सच' और इतिहास मानकर चल रहे हैं वे विश्र्व साम्राज्यवाद के विस्तार के दौर में आधुनिक मध्यवर्गीय बोध से संचालित हुआ। यानि इतिहासबोध मध्यवर्गीय बोध का ही दूसरा रूप है। हां, यह बात भूलने की नहीं है कि मध्यवर्गीय बोध का एक ही रूप नहीं होता। उसके भीतर भी संघर्ष जारी रहता है।

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1857 का विपुल इतिहास उपलब्ध है। एक अनुमान है कि जितना 1857 को लेकर लिखा गया है उतना किसी भी भारतीय इतिहास के विषय में नहीं लिखा गया। प्रदीप सक्सेना ने दशकों तक 1857 के विद्रोह पर शोध किया है। उनका मानना है कि करीब डेढ़ लाख पृष्ठों की सामग्री उनकी जानकारी में है (सरकारी दस्तावेजों के अतिरिक्त)। निश्चय ही सरकार से करोड़ों की राशि प्राप्त करके इतिहासकारों के दलों ने जो देश के विभिन्न हिस्सें में 1857 से संबंधित तथ्यों पर लगातार बहस किया है उससे हजारों नये पृष्ठों की बढ़ोत्तरी हुई है। इतनी सामग्री जहां हो, इतने सारे इतिहासकार जहां लगे हों, वामपंथ से लेकर दक्षिणपंथ तक सभी धारा के लोग जिसे लेकर बहस करना चाहते हों उस विषय पर तो विषय का कोना-कोना उद्घाटित हो जाना चाहिए। ऐसा हुआ नहीं है। ऐतिहासिक मतभेद बने रहे हैं।

अंग्रेज इतिहासकारों की दृष्टि में यह विद्रोह सिपाही विद्रोह था जिसे आम जनता का समर्थन नहीं था। चूंकि यह सैनिक विद्रोह था जैसे ही सरकार ने बेहतर तकनीक और तैयारी के साथ इसका मुकाबला किया इसका दमन हो गया। लेकिन विद्रोह के दमन के पूर्व सिपाहियों ने नृशंसता और बर्बरता का परिचय दिया और असंख्य निर्दोष अंग्रेजों की हत्याएं की। बर्बर सिपाहियों के बीच आपसी तालमेल नहीं था और कोई योजना भी नहीं थी। कुछ जगहों पर विद्रोह हुए और कुछ बागी नेताओं ने उनका नेतृत्व किया। दो-तीन जगहों पर बागी सैनिकों को सफलता भी मिली। लकिन, बागियों की पराजय असंदिग्ध थी। वे हारी हुई लड़ाई लड़ रहे थे। विद्रोह के चरित्र पर इस ऐतिहासिक दृष्टि का मत रहा है कि ब्रिटिश कम्पनी शासन ने भारत में आधुनिकीकरण की जो प्रक्रिया शुरू की थी उससे पुरातनपंथी, पारम्परिक रूप से शक्तिशाली वर्ग के लोगों में असंतोष था। जो लोग ब्रिटिश हुकूमत के असंतुष्ट थे उन्होंने एकजुट होकर ब्रिटिश शासन के खात्में के लिए इस विद्रोह में भाग लिया। चूंकि उन्हें एक बड़े प्रतीक की जरूरत थी उन्होंने कम.जोर और वृद्ध मुगल बादशाह - बहादुर शाह .जफर को नेतृत्व संभालने के लिए बाध्य किया। एक बार अंग्रेजी कम्पनी के हाथों पराजित होकर विद्रोही शक्तियां मिटती चली गयीं और पुनः आधुनिकपंथी ब्रिटिश हुकूमत कायम हो गया। इस विद्रोह के दौरान के अनुभवों ने ब्रिटिश शासन के चरित्र में कुछ परिवर्त्तन किए। अब तक ब्रिटेन की ओर से भारत को सुधारने के लिए, आगे बढ़ाने के लिए चेष्टाएं चल रही थी। उस सुधारवादी दौर का अन्त हो गया और ब्रिटिश शासन (जो कम्पनी के हाथों से निकलकर अब सीधे 'क्राउन' के हाथों संचालित था) ने यहां के जमींदारों के साथ मिलकर शासन करना शुरू किया। यानि, 1857 की क्रान्ति का नुकसान यह हुआ कि भारत की प्रगति बाधित हुई और प्रगतिशील शक्तियां कम.जोर हुईं।

यह दृष्टि कमोबेश सभी आधुनिक पंथी विचारकों में दिखाई देती है। जो लोग उन्नीसवीं शताब्दी के नव जागरण के इतिहास से परिचित हें वे जानते हैं कि हिन्दी, बंगला, मराठी समेत सभी भारतीय भाषाओं के आधुनिकता के अग्रदूतों ने या तो 1857 के विद्रोह का समर्थन किया या फिर चुप्पी साध ली। यह एक विचारणीय तथ्य है कि हिन्दी साहित्य और और पत्र-पत्रिकाओं में 1857 को लेकर 1920-22 तक जो छपता रहा वह कहीं से भी 1857 के विद्रोह को समर्थन नहीं करता। बंगाल के विद्वानों की अंग्रेज भक्ति के उदाहरण तो हमें लज्जित कर देते हैं। ऐसा नहीं है कि नवजागरण के पुरोधाओं में स्वदेश प्रेम नहीं था या फिर वे अंग्रेजी राज्य से सर्वथा प्रसन्न थे। देश के हर हिस्से के बौद्धिक धीरे-धीरे अंग्रेजी राज्य के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि का विकास कर रहे थे और अपने असंतोष को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूपों में प्रगट कर रहे थे। हिन्दी साहित्य के प्रसंग में रामविलास शर्मा, भगवानदास माहौर, कर्मेन्दु शिशिर, कृष्ण बिहारी मिश्र, अर्जुन तिवारी, शंभुनाथ, रूपा गुप्ता इत्यादि के शोध यह बताने के लिए यथेष्ट हैं कि हिन्दी में नवजागरण के दौर में शुरू से ही अंग्रेजी राज्य के अन्तर्गत भारतीयों की हो रही दुर्दशा के प्रति हिन्दी के लेखक संवेदनशील थे। लेकिन, इस आलोचनात्मक दृष्टि में 1857 के प्रति जो दृष्टिकोण उभरकर आता है वह यही है कि 1857 के विद्रोहियों ने 'कुपथ' पर चलकर 'विनाश' को निमंत्रण दिया। लाखों लोगों की हत्याएं हुई और देश पर बड़ी विपत्ति आ गयी। 1857 एक 'भूल का समय' था। एक लेखक ने तो कहा ही है कि इस समय की हवा 'पगली हवा' थी जिसने लोगों को दीवाना बना दिया था। इस तरह के भाव ने ही कमोवेश 1920-22 तक अपना प्रभाव बनाए रखा। हालांकि यह भी सही है कि इक्का दुक्का ही सही लेखक-कवियों और पत्रकारों ने कभी-कभार एक दो ऐसी बातें कह दीं जिससे लगता है कि विद्रोहियों को वे सहानुभूति पूर्वक देखते हैं। यहां तक कि कलकत्ता के एक पत्रकार ने भी 1857-58 के दौरान एक लेख लिखा जिसमें बलवाइयों के प्रति सहानुभूति थी। इस लेखक को प्रताड़ित किया गया, उसे सरकारी कोपभाजन का शिकार होना पड़ा और 20 हजार रूपये जमानत देकर अपनी रिहाई करवानी पड़ी। 1870 में अमृतबाजार पत्रिका में भी एक पत्र छपा जिसमें 1857 के विद्रोह को स्वाधीनता संग्राम के रूप में देखा गया। बिहार के यशस्वी पत्रकार, केशवराम भट्ट के 1874 में लिखे गये नाटक, - सज्जाद सम्बुल (उर्दू) जिसको 'बिहार बन्धु' (हिन्दी) में छापा गया, में भी 1857 के प्रति अलग नजरिये के दर्शन होते हैं। लेकिन, इन्हें अपवाद ही माना जाता चाहिए। भारतेन्दु युगीन और महावीर प्रसाद द्विवेदी युगीन हिन्दी साहित्य में 1857 के प्रति दृष्टिकोण पर कर्मेन्दु शिशिर के ये विचार सही हैं - ''डा0 रामविलास शर्मा ने भारतेन्दु और उनके सहयोगियों के लेखन पर विचार करते हुए हिन्दी नवजागरण का नाभि नाल रिश्ता 1857 से जोड़ा।... उनके दिए साक्ष्य अपर्याप्त थे, और उसी आधार पर भारतेन्दु योग को 1857 से जोड़ने का निर्णय उचित नहीं माना जा सकता।''

बंगला साहित्य में 1857 का इतिहास लिखा गया, उनके वीरों पर विस्तृत चर्चा की गयी, उपन्यास भी लिखे गये लेकिन कुल मिलाकर 1907-08 तक 1857 को सिपाही विद्रोह ही माना गया, राष्ट्रीय विद्रोह नहीं। यह कहना गलत नहीं होगा कि 'युगान्तर' पत्रिका के दौर में, 1906-08 के बीच बंगाल में 1857 को स्वाधीनता संग्राम के रूप में देखने की शुरूआत हुई।

मराठी साहित्य में 1857 पर जिन दो पुस्तकों का हवाला दिया जाता है वे हैं - गोडसे का 'मांझा प्रवास' (1907) और दत्तात्रेय बलवंत पारसनिस द्वारा लिखित लक्ष्मीबाई की जीवनी। 'मांझा प्रवास' 1880 के आसपास तक लिख ली गयी थी और शायद पारसनिस ने लक्ष्मीबाई पर अपनी किताब लिखने में इससे मदद ली थी। लेकिन, कहीं भी यह पता नहीं चलता कि ये लेखक 1857 को राष्ट्रीय विद्रोह मानते थे या फिर उसे स्वाधीनता संग्राम के रूप में देखकर विद्रोहियों के प्रति आदरभाव रखते थे। पारसनिस की पुस्तक में बंगला जीवनीकारों की तरह लक्ष्मीबाई की वीरता के प्रति आदरभाव है लेकिन उसे गलत माना गया है। राय बहादुर पारसनीस ने लक्ष्मीबाई के अतिरिक्त एक अन्य रानी की जीवनी भी लिखी है - जिसने तमाम कष्टों औन अन्यायों के बावजूद अंग्रेजी शासन का विरोध नहीं किया।

स्पष्टतः लक्ष्मीबाई की वीरता तो प्रशंसनीय है लेकिन जिस उद्देश्य के लिए वह लड़ रही थी वह सही नहीं था! धीरे-धीरे 1857 के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्त्तन हुआ और तिलक की 'केसरी' पत्रिका, 'युगान्तर' (बंगाल), सावरकर की पुस्तक (1907), गदर पार्टी के द्वारा 1857 को लेकर प्रचार आदि के कारण 1920-22 तक 1857 के प्रति भाव में गुणात्मक परिवर्तन हो गया था। 1920 के दशक की हिन्दी पत्रिकाओं-खासकर 'प्रभा' में छपे लेखों को आधार बनाया जाय तो कहना पड़ेगा कि 1857 के प्रति दृष्टिकोण बदल चुका था। हालांकि, यह लक्षणीय है कि हिन्दी में प्रकाशित 1857 के प्रथम इतिहास पुस्तकों का प्रकाशन जब 1922 में हुआ 1857 के विद्रोहियों के प्रति समर्थन नहीं था। ईश्र्वरी प्र0 शर्मा की पुस्तक के कुंवर सिंह वाले प्रसंग को छोड़कर अन्यत्र इतिहासकारों ने 1857 के बागियों के प्रति सहानुभूति का भाव नहीं है। यह कहना गलत नहीं होगा कि पं0 सुदरलाल की पुस्तक के प्रकाशन के बाद और हिन्दूपंच के बलिदान अंक के बाद 1857 के प्रति हिन्दी लेखकों का दृष्टिकोण बदला है। गुणात्मक रूप से 1857 के प्रति हिन्दी साहित्य में सहानुभूति पूर्वक विचार 1920 के दशक के अंत तक ही स्पष्ट रूप से सामने आ सका। इस प्रसंग में हिन्दी साहित्य पर 1857 के प्रभाव का प्रामाणिक दस्तावेज पेश करने वाले भगवानदास माहौर का वक्तव्य उद्धृत करना उचित होगा - ''महात्मा गांधी के अहिंसात्मक सत्याग्रह के पूर्व तक हिन्‌ी के प्रकाशित साहित्य में वह जान नहीं आयी थी कि वह 1857 के अपने स्वाधीनता संग्राम को अभीष्ट रूप में खुलकर प्रस्तुत कर सके।''

शैलेन्द्रधारी सिंह ने 1930 के दशक में हिन्दी रचनात्मक लेखन में 1857 के प्रति आये इस परिवर्त्तन पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि इसी दौर में 1857 संबंधी साम्राज्यवादी कल्पना का राष्ट्रीय जवाब तैयार हुआ। बहुत सारी पुस्तकें लिखी गयी जिसमें 1857 के नायकों को गौरवान्वित किया गया। यह कैसे हुआ और यह कितना निर्णायक सिद्ध हुआ इसे हिन्दी साहित्य के एक उदाहरण से समझा जा सकता है। यह उदाहरण इस आलेख के मुख्य विचार - इतिहास का एक हिस्सा 'होता है' और एक हिस्सा निर्मित होता चलता है, का समर्थन करता है।

यह उदाहरण है - लक्ष्मीबाई के इतिहास का। सुभद्रा कुमारी चौहान ने 22 साल की उम्र में लक्ष्मीबाई पर जो कविता लिखी उसने मानो लक्ष्मीबाई का इतिहास ही बदल दिया। 'खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी' पारसनीस की रानी से भिन्न थी पारसनीस और उनके समकालीनों की यह मान्यता कि रानी लक्ष्मीबाई के साथ जो अन्याय हुआ उससे रानी बाध्य होकर लड़ीं, अब बदल गयी। रानी स्वतंत्रता का संदेश देने वाली एक ऐसी वीरांगना में परिणत हो गयी थी जो देश के लिए लड़ रही थी खुद अपने लिए नहीं। बुंदेले के हरबोलों के मुख सुनी कहानियों के आधार पर यह लक्ष्मीबाई का नया इतिहास था जिसे राष्ट्रवादी साहित्यिक मन नये सिरे से तैयार कर रहा था। इस नयी राष्ट्रीय छवि के उद्देश्य स्पष्ट थे। रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब, तात्या टोपे, कुंवर सिंह, अजीमुल्ला, पीर अली, बहादुरशाह इत्यादि सभी एक दूसरे से राष्ट्रीय सूत्र में बंध गये थे। यह प्रमाणित किया जाने लगा कि 1857 में बैरकपुर से शुरू हुआ विद्रोह दरअसल गलत समय पर शुरू हो गया। इसके बहुत पहले से देशव्यापी राष्ट्रीय विद्रोह की तैयारियां चल रही थी।

नाना साहब इस तैयारी के सूत्रधार थे। जब से अजीमुल्ला यूरोप से लौटकर आये थे जहां उन्होंने क्रीमिया का युद्ध देखा, यह समझ लिया कि अंग्रेजों की असली शक्ति है भारत पर अधिकार, तब से इस भारतव्यापी विद्रोह की तैयारियां शुरू हो गयी। गैरीबाल्डी, और रूस के शासकों से भी अजीमुल्ला का सम्पर्क हुआ था। गैरीबाल्डी तो अपनी सेना लेकर भारतीय विद्रोहियों की मदद के लिए चलने ही वाला था कि उसे सूचना मिली कि विद्रोह समाप्त हो गया। इस तरह की तमाम बातों को सुभद्र कुमारी चौहान से लेकर ऋषभ चरण जैन इत्यादि के विवरणों में देखा-महसूस किया जा सकता है। चौहान की ओजस्वी कवित्त शक्ति ने लक्ष्मीबाई का जो इतिहास रूप रचा वही असली लक्ष्मीबाई के रूप में हिन्दी साहित्य में स्वीकृत हो गया। इसी स्वीकृति पर प्रामाणिकता की मुहर तब लगी जब दशकों की शोध-यात्रा के बाद वृन्दावनलाल वर्मा ने लक्ष्मीबाई की जीवनी औपन्यासिक रूप में 1946 में प्रकाशित की।

लगभग इसी तरह की कहानियाँ तात्या टोपे, नाना साहब और कुंवर सिंह की भी है। ये सभी लोग पहले बाध्य होकर लड़ने वालों के रूप में इतिहास में वर्णित थे लेकिन राष्ट्रवादी उभार के दौर में उनकी ऐतिहासिक छवियाँ पुनर्निर्मित हुईं और उनके जीवन के आधार पर साहित्यिक-ऐतिहासिक कृतियां सामने आयीं। कौन भूल सकता है आरसी प्रसाद सिंह की वह ओजस्वी कविता जिसमें वे कहते हैं - ''अस्सी बरस की हड्डी में जागा जोश पुराना था, सब कहते हैं कुंवर सिंह भी बड़ा वीर मर्दाना था।'' कुंवर सिंह का जो उपलब्ध इतिहास हमारे पास है ये कथाएं, कविताएं उनकी छवि को उससे दूर ले जाती हैं, बहुत ज्य़ादा प्रभावी बनाती हैं और शायद इतिहास से निकलकर ये छवियां इतिहासों में तब्दील हो जाती है।

नाना साहब और तात्या टोपे का प्रसंग भी कम दिलचस्प नहीं। ऋषभ चरण जैन का 1932 में छपा उपन्यास 'गदर' स्वाधीनता संग्राम पर प्रकाशित हिन्दी का पहला ग्रन्थ है जिसमें दृढ़ता से 1857 के विद्रोहियों को राष्ट्रीय नायकों का दर्जा दिया गया। उपन्यास का नायक अ.जीमुल्ला एक सुदर्शन व्यक्तित्व का मालिक है जो अपने स्वामी नाना साहब की पुत्री से प्रेम करता है। नाना साहब की पुत्री को चार्ल्स नामक अंग्रेज कलंकित करता है। नाना साहब असली मराठा का कर्त्तव्य पालन करते हुए अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए अंग्रेजों की सेना को चीरते हुए चार्ल्स तक पहुंचते हैं और उसकी हत्या करते हैं और उसका खून पीते हैं! यह वह बिन्दु है जो हमें राष्ट्रीय कल्पना और औपनिवेशिक कल्पनाके बीच एक सूत्र को दर्शाता है। दिल्ली पर आक्रमण के बाद बहादुरशाह .जफ़र हार जाते हैं और पुत्र समेत उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है। उनके पुत्रों की हत्या उनके सामने कर दी जाती है ओर हडसन नामक जनरल मुगल राजकुमारों का रक्त पान करता है। घृणा और विद्वेष की चरम अभिव्यक्ति के रूप में शत्रु को मारकर उसके रक्त को पीना यह एक मध्ययुगीन बर्बरता के उदाहरण-सा लगता है जिसे आधुनिक हडसन अंजाम देता है। ऋषभ चरण जैन के विवरण में यह कृत्य एक वीरोचित कर्म है और, ख्वाजा हसन के वृत्तांत में यह अत्याचार और दमन का प्रतीक है।

'गदर' में जैन ने दिखलाया है कि किस प्रकार कई विदेशी भाषाओं के जानकार, आधुनिक ज्ञान से युक्त अ.जीमुल्ला लंदन जाकर नाना साहब की पेंशन के लिए पैरवी करते हैं। वे असफल होते हैं और यूरोप प्रवास के दौरान अन्य यूरोपीय शक्तियों से ब्रिटेन विरोधी संभावित विद्रोह के लिए समर्थन पाने की चेष्टा करते हैं। तीस के दशक में कई ऐसे उपन्यास लिखे गये जिसमें राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत लेखकों ने 1857 का एक राष्ट्रीय इतिहास लिखा। इस राष्ट्रीय इतिहास में कल्पना का तत्त्व कितना प्रभावी था इसे भी ध्यान में रखना चाहिए। एक उपन्यासकार ने यह दिखलाया कि तात्या टोपे को फांसी देने के क्रम में तात्या की जगह कोई और देशभक्त फांसी पर तात्या बनकर चढ़ गया। तात्या हिमालय चले गये। अंग्रेज चूंकि तात्या को पहचानते नहीं थे इसीलिए वे यही समझते रहे कि उन्होंने तात्या को फांसी दे दी। एक अन्य उपन्यास में लक्ष्मीबाई को भी बाद तक जीवित दिखलाया गया और बताया गया कि जो लक्ष्मीबाई बनकर अंत में शहीद हुई वह कोई और थी। लक्ष्मीबाई हिमालय चली गयी और 80 वर्ष तक जीवित रही।

साहित्य में उपस्थित यह इतिहास 1857 के अध्येताओं के लिए चुनौती है। क्या इसे कपोल-कल्पना मानकर इतिहास के अध्ययन क्षेत्र से बाहर रखा जाय या इसे भी इतिहास का ही एक अंग मानकर चला जाये? हेडेन व्हाइट पर फिर से लौटकर देखना उचित होगा। वे मानते हैं कि इतिहास से प्रश्न किस तरह से पूछा जाये कि इतिहास अधिक प्रामाणिकता के साथ उपस्थित हो समझने के लिए रचनात्मक लेखन से तकनीक सीखना चाहिए। क्या क्या वर्णित होता है और इन वर्णनों में किस तरह की प्रवृत्तियां काम कर रही हैं, किन-किन प्रकार की छवियां काम कर रही हैं यह सब कुछ इतिहास की वृहत्तर सीमा ('मेटा हिस्ट्री') में समाहित हो जाता है। इस दृष्टि से विचार करने पर इतिहास सतत परिवर्त्तनशील आख्यानों में परिवर्त्तित हो जाता है। इन सतत परिवर्त्तनशील आख्यानों को मध्यवर्गीय इतिहासबोध से संचालित इतिहास के बरक्स रखकर देखने से एक दो बातें उभरकर सामने आती है जिसे एक उदाहरण के माध्यम से समझा जा सकता है।

लक्ष्मीबाई के जीवन पर 1890 के दशक में एक अंग्रेज लेखक ने एक नाटक लिखा। इसमें दिखलाया गया था कि कामातुर लक्ष्मीबाई ने एक अंग्रेज अफसर को अपने मोहमाश में बांधना चाहा। कर्त्तव्यपरायण अंग्रेज अफसर ने रक्तपिपासिनी रानी के अधम प्रस्ताव को जान की परवाह न करके ठुकरा दिया। लगभग इसी तरह का एक नाटक 1930 के दशक में एक अंग्रेज द्वारा लिखा गया। 1890 के दशक में नाटक का विरोध न हुआ लेकिन 1930 के दशक में तीव्र राष्ट्रवादी विरोध के फलस्वरूप प्रकाशक को विवादित अंश हटाने पड़े और माफी मांगनी पड़ी। यहां शैलेन्द्रधारी सिंह ने ठीक ही कहा है कि 1857 ने ब्रिटेन के साम्राज्यवादियों को, उसके गर्वीले राष्ट्रवादियों को अपनी जाबांजी और मर्दानगी को प्रदर्शित करने का, अपना गौरव गान करने का मौका प्रदान किया। अंग्रेजों ने बहुत सारे ग्रन्थ लिखे जिसमें 1857 की घटनाओं को पार्श्र्व में रखकर अंग्रेजों के जय की, उनकी

महानता का आख्यान निर्मित किया। डा0 सिंह ने यह ईशारा भी किया है कि यह देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रवादी उभार के दौर में जब इस आख्यान का प्रतिवादी आख्यान निर्मित हुआ किस तरह की कल्पनाओं ने इतिहास से मिलकर ऐतिहासिक आख्यान को तैयार किया।(दुर्भाग्य से डा0 शैलेन्द्रधारी सिंह को यह मौका नहीं मिला। पटना में उनके आवास पर कुछ लोगों ने उनकी हत्या कर दी।) अर्थात्‌, 1930 की राष्ट्रीय ऐतिहासिक कृतियों को अगर राष्ट्रवादियों का आत्म इतिहास मानकर देखा जाये तो?

यह एक प्रसिद्ध उक्ति है कि इतिहास में तथ्यों के आलावा सब झूठ होता है और साहित्य में तथ्यों के अलावा सब कुछ सच होता है। यानि इतिहास से तथ्य लिये जायें और साहित्य से तथ्येतर विवरण। यानि, इतिहास का सच न तो इतिहास के पास है और न ही साहित्य के पास। 'सच' शायद वह मरीचिका है जिसकी ओर जितना बढ़ेंगे वह उतना ही दूर होता जायेगा। हाइडेगर से लेकर मिशेल फूको तक बहुत सारे दार्शनिकों ने इतिहास की पूरी धारणा पर जिस संरचनात्मक दबाब को दिखाया हे उसमें यही बात प्रधान है कि काल विशेष में प्रभावी सोच-पद्धति (ड्ढद्रत्द्मद्यड्ढथ््रठ्ठ) ही वह प्रभावी माध्यम है जो हमें विशेष तरह से सोचने के लिए बाध्य करता है। एक कालखण्ड में उस कालखण्ड में प्रभावी सोच-पद्धति यह निर्धारित करती है कि हम क्या सोच सकते हैं और क्या नहीं। हम क्या सोच सकते हैं और क्या नहीं यह हमारे वर्त्तमान समय द्वारा ही तय होता है। हेडेन व्हाइट ने भी दिखलाया है कि एक लेखक अपने समय के 'ट्रोप' (च््रद्धदृद्रड्ढ) पर ही अवस्थित होता है।

1857 के संदर्भ से निकलकर जो नये-नये आख्यान हाल के वर्षों में उभरकर सामने आ रहे हैं उन्हें ध्यान से देखने पर यह स्पष्ट हो जायेगा कि 1857 का इतिहास हमारे वर्त्तमान से ही नियंत्रित होता है। लक्ष्मीबाई के साथ-साथ झलकारी बाई की कहानी को भी देखा जाने लगा है। झलकारी बाई पर जो एक ऐतिहासिक ग्रन्थ मोहनदास नैमिशराय ने प्रस्तुत किया है वह इतिहास की दृष्टि से 'कमजोर' है। ऐसे तथ्यों को पेश किया गया है जिसे कहने के पहले हमें प्रमाण देने पड़ेंगे। ये प्रमाण सामान्यतः प्रभुत्वशाली वर्ग की मिल्कियत हैं। वे ही लेख लिखवाते हैं, अपनी गाथाओं को सुरक्षित रखवाते हैं और उनकी ही कथाएँ लिखित रूप में हमारी धरोहर बनकर सुरक्षित रहती हैं। लेकिन ऐसे पात्रों का इतिहास लिखना जो प्रभुत्वहीन समुदायों से आते हैं निश्चित ही इतिहास में दूसरे रूप में आता है। स्रोतों के अभाव में इनका इतिहास उल्टी यात्रा करता है। इस प्रसंग में मार्क ब्लॉख, लूसियेन फेब्रे जैसे फ्रांसीसी इतिहासकारों द्वारा प्रयुक्त 'रिग्रेसिव मेथड' का उल्लख उचित होगा। यह सब जानते हैं कि मार्क ब्लॉख विश्र्व के महानतम इतिहासकारों में से हैं। उनकी धारणा थी कि संग्रहालयीय तथ्य निर्भर राजनैतिक इतिहास एक आंशिक इतिहास है। पूर्ण इतिहास (च््रदृद्यठ्ठथ् ण्त्द्मद्यदृद्धन््र) के लिए हर तरह के स्रोतों और पद्धतियों की मदद लेनी चाहिए। वे मानते थे कि फ्रांस में सामाजिक परिवर्त्तन को समझने के लिए कृषक समुदाय के जीवन में हुए परिवर्त्तनों का अध्ययन जरूरी है। पर समस्या यह थी कि किसान का इतिहास कैसे लिखा जाये। इस समस्या के निदान के लिए जिस पद्धति का अनुसरण उन्होंने किया उसे अनजाने भूतकाल से चलकर जाने हुए वर्त्तमान की ऐतिहासिक प्रगतिशील धारणा के विपरीत जाते हुए (वर्त्तमान) से अजाने (भूतकाल) की यात्रा शुरू की। इसी पद्धति से वैकल्पिक इतिहास की वैकल्पिक व्यवस्था संभव हो सकी। भारत में इतिहास की इस उल्टी यात्रा की उपयोगिता का एक बेहतरीन उदाहरण हाल ही प्रकाशित पुस्तक 'वंचितों का

आत्म इतिहास' है जिसमें उत्तर भारत की दलित जातियों के अपने इतिहास लेखन को रखा गया है।

1857 का उल्टा इतिहास उस हद तक प्रयोजनीय शायद न हो। इस आलेख के शुरू में ही यह कहा गया है कि डेढ़ लाख पृष्ठों से भी अधिक ऐतिहासिक सामग्री उपलब्ध है। फिर इतिहास के इन दस्तावेजों के आधार पर ही प्रामाणिक इतिहास क्यों नहीं लिखा जा सकता?

इन पंक्तियों के लेखक के अनुसार 1857 के इतिहास की हर पद्धति आंशिक-इतिहास को ही पेश कर सकती है। हम 1857 के इतिहास के पास कैसे प्रश्न लेकर जाते हैं वही तय करेगा कि 1857 के इतिहासों के पास हमारे लिए क्या उत्तर है। एक प्रश्न, सुविधा के लिए, यह हो सकता है कि 1857 के विद्रोहियों ने विद्रोह का मन कब, क्यों और कैसे बनाया। इस प्रश्न के उत्तर में हमारे इतिहासकारों के उत्तर अलग-अलग हैं। अधिकतर इतिहासकार यही मानते हैं कि सिपाहियों के बीच व्यापक असंतोष था। इस असन्तोष का कारण मुख्यतः यह था कि अंग्रेजी सैनिकों की तुलना में हेय माने जाते थे और उनके प्रति सरकारी रवैया उपेक्षापूर्ण था। इस प्रश्न के उत्तर ढूंढ़ते हुए सिपाही मन का जोड़ उत्तर भारतीय किसान मन से कितना था, यह एक बुनियादी प्रश्न है। अगर ये सिपाही मन से किसान और तन से सिपाही थे (एरिक स्टोक्स) तो 1857 के विद्रोह को राष्ट्रीय न मानने का कोई कारण नहीं। सिर्फ एक ही असुविधा हो सकती है। मार्क्सवादी चिंतन पद्धति के अनुसार 1857 का विद्रोह प्राक्‌ पूंजीवादी युग के दौर की परिघटना है और राष्ट्रवाद पूंजीवादी दौर में ही बुर्जुआ विचारधारा के रूप में उभर सकता है। अतः सिद्धांततः 1857 का विद्रोह राष्ट्रीय विद्रोह नहीं हो सकता। यह अधिक से अधिक 'स्वाधीनता का संग्राम' हो सकता था, मुक्ति संग्राम हो सकता है। पर, यह एक और समस्या को जन्म देता है - स्वाधीनता किससे - अंग्रेजों से या सामंती शक्तियों से? रामविलास शर्मा जैसे राष्ट्रीय मार्क्सवादी चिंतको की समस्या यह है कि वे एक साथ 1857 के नायकों और उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में शक्तिशाली हुए मध्यवर्ग दोनों की चेतना को जोड़कर देखने की कोशिश करते हैं। मंगल पाण्डेय, लक्ष्मीबाई, कुंवर सिंह और अ.जीमुल्ला की चेतना का जोड़ भारतेन्दु और प्रताप नारायण मिश्र से!

यह पहले ही कहा जा चुका है कि भारतीय मध्यवर्ग मूलतः औरपनिवेशिक युगीन आधुनिक बोध का संवाहक था। जिन शब्दों में बंगला में राष्ट्रवादी कविताओं के अग्रदूत ईश्र्वरचन्द्र गुप्त इत्यादि ने 1857 के विद्रोहियों ने लिखा है वह आज भले हमें शर्मिंदा करे पर उस युग में उस श्रेणी के लोगों के लिए यही उत्तम विचार थे। भारतेन्दु के परिवार ने 1857 के दौरान अंग्रेजों की मदद की थी इस बात को छुपाया जाना चाहिए? भारतेन्दु जब सात वर्ष के थे तो उन्होंने अपने परिवार वालों को दंगाइयों के विरोध में अंग्रेजों की मदद करते पया होगा! जो लोग 19 वीं शताब्दी के पूवार्द्ध में सारे देश में अंग्रेज और भारतीय शक्तियों के संघर्ष को ध्यान में रखेंगे वे महसूस करेंगे कि अंग्रेजी राज्य भारत में दो तरह की प्रतिक्रिया पैदा कर रहा था - साधारण लोगों के बीच अत्याचार और दमन के फलस्वरूप वितृष्णा का भाव और नवशिक्षित आधुनिक लोगों के बीच आशा का भाव। 1853 में (उसके पूर्व भी) कई अंग्रेज कम्पनी शासन के प्रति लोगों के आक्रोश से परिचित थे। एक अंग्रेज प्रशासक ने तो साफ तौर पर यह लिखा था कि इस देश के दो देश हैं - बहुसंख्यक लोग ब्रिटिशों के घृणा करते हैं और उसे भगाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं और दूसरा - अल्पसंख्यकों का जो ब्रिटिश कम्पनी शासन को एक सुयोग के रूप में देखता है।

1857 का विद्रोह बहुसंख्यक भारतीयों का विद्रोह था। अल्पसंख्यक आधुनिकों के लिए तो यह एक उपद्रव ही था। कालांतर में अल्पसंख्यक आधुनिकों ने समाज का नेतृत्व हासिल किया और राष्ट्रीयता के आधार के निर्माता बने इसीलिए इस राष्ट्रीयता में 1857 के लिए सकारात्मक भाव प्रायः नहीं था। 1920 के बाद गांधी युग में बड़ी संख्या में 'बहुसंख्यकों' के राष्ट्रीय होने के दौर में जो 'पॅराडाइम शिफ्ट' हुआ उसके फलस्वरूप ही 1857 के नायकों को प्रतिष्ठा मिली। पह यह भाव भी पूर्ण स्वीकार का नहीं था। क़ांग्रेसी नेतृत्व ने 1857 को आदर से स्मरण भले ही किया हो लेकिन उस अंग्रेज विद्वेषी चरमपंथी भाव को कभी भी मान नहीं दिया जिसके प्रतिनिधि 1857 के वीर थे। यही वह केन्द्रीय प्रश्न है जिसकी ओर ध्यान दिए बिना ही 1857 पर लगातार विचार किया जाता रहा है।

एक और प्रश्न 1857 में उठना स्वाभाविक है। 1857 के विद्रोह में धर्म की भूमिका कितनी अधिक थी। या फिर, मुसलमानों ने क्यों 1857 के आन्दोलन को ज्य़ादा जोरदार समर्थन दिया। विलियम डेलरिम्पल के दिल्ली सम्बन्धी अध्ययन को अगर प्रामाणिक माना जाय तो यह कहना गलत नहीं लगता कि 1857 का विद्रोह विद्रोहियों के लिए 'जेहाद' ही था। वे स्वयं को जेहादी कहते भी थे।

1857 को हम एक ऐसे आन्दोलन के रूप में याद करते हैं जिसमें हिन्दू और मूसलमान एक जुट होकर विदेशियों के विरूद्ध लड़े। ऐसे बहुत सारे दस्तावेज हमारे इतिहासकारों ने जुटाये हैं जिसमें हिन्दू और मुसलमान नेताओं ने देश की जनता में सामुदायिक सौहार्द बनाये रखकर अंग्रेजों की खिलाफत करने की बात की थी। मुसलमानों को क़ुरान-ए-पाक की सौगंध और हिन्दुओं को तुलसी-गंगाजल-की कसम जैसे प्रयोगों के आधार पर आम हिन्दु-मुसलमानों को लामबंद करने की चेष्टाएँ की गयी थीं, इसमें संदेह नहीं है। बहादुरशाह .जफ़र और लखनऊ के विद्रोही नेताओं के फरमानों को ध्यान से पढ़ने पर हमें कई नयी बातें समझ में आती हैं।

1857 की विरासत के संदर्भ में भी एक उल्टी-प्रक्रिया का उपयोग किया जाये। प्रश्न यह उठता है कि अगर क़ुरान और तुलसी एक होकर विदेशी ताकतों का मुकाबला करने के लिए तैयार हो गयीं तो आधुनिक हिन्दू और मुसलमान नेताओं में ऐसी ऐकता क्यों तैयार न हो सकी। सैयद अहमद खान ने 1857 की जो व्याख्या प्रस्तुत की और उसके लिए हिन्दुओं को जिम्मदार ठहराया उसे देखकर तो यही लगता है कि मुसलमानों में भी अंग्रेजों के समर्थकों की कमी न रही होगी। दूसरी ओर, हिन्दुओं के बड़े लोगों में अधिकतर अंग्रेजों के साथ थे, इसके संदेह नहीं। मनेजर पाण्डेय का यह सुझाव बिल्कुल सही ह कि जो लोग 1857 को प्रतिक्रियावादी जमींदारों और राजे-रजवारों के असंतोष को ही सबसे प्रमुख कारण मानते हैं उन्हें एक सूची .जरूर बनानी चाहिए जिसमें एक ओर उनलोगों का नाम दर्ज हो जिन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया और दूसरी ओर उनका नाम हो जिन्होंने अंग्रेजों का विरोध किया। कर्मेन्दु शिशिर ने यह माना है कि अधिकतर बड़े राजा-महाराजा लोग अंग्रेजों के साथ थे। उन्होंने यह बतलाया है कि कुंवर सिंह की जमींदारी डुमरांव राजा के अधीन थी और डुमरांव राजा ने 1857 में अंग्रेजों का साथ दिया। बिहार के ही शक्तिशाली महाराज - दरभंगा महाराज ने अंग्रेजों का साथ दिया। बंगाल के खत्री महाराज बर्दवान ने अंग्रेजों का पूरा साथ दिया। यह तो अवध के सन्दर्भ में रूद्रांशु मुखर्जी ने दिखलाया ही है कि विद्रोहियों में किस प्रकार बनियों के प्रति घृणा थी क्योंकि सेठ-साहूकार लोग अंग्रेजों का साथ दे रहे थे। जिन लोगों ने दिल्ली में हुई लड़ाई और दिल्ली पतन का इतिहास लिखा है वे बतलाते हैं कि खत्रियों और बनियों ने विद्रोहियों का साथ नहीं दिया। एक इतिहासकार ने ऐसी असंख्य अर्जियों का जिक्र किया है जिसमें सिपाहियों के विरुद्ध सरकार ने अपील की गयी थी। उन लोगों की इन अर्जियों पर और रोशनी डालने की जरूरत है। 1857 के इन सन्दर्भों को और अधिक विस्तार से चर्चा के केन्द्र में लाने के बाद ही चीजें और साफ होंगी। जो लोग फ्रांसीसी राज्य क्रान्ति के इतिहास से वाकिफ हैं वे जानते हैं कि जॉर्ज रूद (क्रड्ढदृद्धढ़ड्ढ ङद्वड्डड्ढ) द्वारा विश्लेषित विप्लवी भीड़/समूह (थ््रदृड) की भूमिका क्रांति के दौरान क्या थी। 1857 के सन्दर्भ में अगर सिपाहियों के मार्च पर ध्यान केन्द्रित किया जाये और इसके प्रति लोगों के बीच जो वातावरण पैदा हुआ उस पर ध्यान केन्द्रित किया जाये तो यह संभव है 1857-58 के दौर के इतिहास का एक जीवंत चित्र उभर सके। रामविलास शर्मा से लेकर देवेन्द्र चौबे और रश्मि चौधरी जैसे विद्वानों ने कुंवर सिंह की सेना के जगदीशपुर से शुरू होकर उत्तर भारत की परिक्रमा करते हुए वापस वहीं पहुंचने की यात्रा के प्रभाव पर चर्चा की है। इतिहासकार गौतम भद्र सेना के इस 'मार्च' को बहुत महत्त्वपूर्ण मानते हैं। इस प्रकार के प्रसंगों को कम महत्त्वपूर्ण मानकर विद्रोह के अंतिम परिणाम पर ही ध्यान केन्द्रित करना इतिहास के उन अंशों को छुपाना है जिससे भारतीय इतिहास को देखने-समझने की एक वैकल्पिक दृष्टि का निर्माण संभव है। इतिहास की एकरेखीय व्याख्या से आगे बढ़कर यह देखने की जरूरत है कि जनमानस में 1857 का जो प्रभाव लगातार बना रहा और जिसकी अनुगूंज लोक कथाओं और लोग गीतों में लगातार सुनायी देती है उसका इतिहास किस प्रकार लिखा जा सकता है। खतरा यह है कि भारतीय इतिहास का जो तानाबाना हमारे बौद्धिकों के बीच प्रचारित है वह इस नयी दृष्टि को महत्त्व देने के बाद बिखरने लगेगा। दरअसल, यह प्रस्तावित किया जा सकता है कि राष्ट्रवाद की पूरी धारणा भारतीय सन्दर्भ में मध्यवर्गीय सन्दर्भों में ही निर्मित और प्रचारित होती रही है। 1857 ही क्यों उसके पूर्व से ही हमारे देश में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रतिरोधों का जो इतिहास रहा है उनको ज्य़ादा महत्त्व मिलना चाहिए। एडवर्ड सईद भारतीय इतिहास के बहुत बड़े ज्ञाता भले न हों लेकिन वे एक बात पते की कह गये कि भारतीयों का संघर्ष साम्राज्यवाद के विरूद्ध उसी दिन शुरू हो गया जिस दिन अंग्रेजी शासन यहां शुरू हुआ।

उर्दू के एक पत्रकार ने मुर्शिदाबाद की अपनी यात्रा का उल्लेख किया है। वे जिस गाड़ी से जा रहे थे उसके ड्राइवर ने एक जगह गाड़ी की स्पीड एकदम से ते.ज कर दी। पत्रकार ने पूछा कि ऐसा उसने क्यों किया। ड्राइवर ने बतलाया कि उस जगह हर ड्राइवर ऐसा ही करता है क्योंकि वहां मीरजाफर की कब्र है! 1757 के दो सौ पचास वर्ष बाद भी गद्दार मीरजाफर की जिस देशद्रोही छवि को वह ड्राइवर ढो रहा है उसमें राष्ट्रवाद कहीं है या नहीं? अगर है तो उसका इतिहास कहां है? उत्तर भारत के किसी भी हिस्से में जाइये आपको ऐसे असंख्य लोक गीत मिलेंगे जिनमें 1857 के विद्रोही नेताओं के शौर्य की अशेष गाथाएं होंगी। दिलचस्प बात यह है कि इन विद्रोही नेताओं की सूची लगातार बढ़ती जा रही है ऐसा तब जबकि इतिहासकारों के बीच 1857 के विद्रोही देशभक्त के रूप में नहीं बलवाई के रूप में ज्य़ादा रहे। आज भी समस्त उत्तर भारत में जो कैलेंडर सबसे ज्य़ादा बिकते हैं उनमें क्रान्तिकारी वीरों की तस्वीरें होती हैं। ये छवियों करोड़ों भारतीयों की राष्ट्रीय भावनाओं की अभिव्यक्ति हैं जिसका इतिहास अभी और लिखा जाना है, नये दृष्टिकोण से लिखा जाना है।

[वसुधा, 1857 अंक]

मेरे गुरू - एडवर्ड सईद

मेरे गुरू


- एडवर्ड सईद



[एडवर्ड सईद की मृत्यु के कुछ दिनों पूर्व ही इब्राहिम अबू लोग़द (Lughod) की मृत्यु हुई। एडवर्ड सईद जैसी ख्याति उन्हें नहीं मिली लेकिन अमरीकी विश्र्वविद्यालयों में फिलीस्तीनी मुद्दे पर संघर्षशील वैचारिक आन्दोलन के असली उद्योक्ता वही थे। यहां एडवर्ड सईद का लिखा लेख प्रस्तुत है जहां न सिर्फ उन्होंने इब्राहिम लोग़द को अपना गुरु कहा है बल्कि उन दिनों का विवरण दिया है जिसके कारण खुद एडवर्ड सईद 'ओरियन्टलिज्म' के लेखन की ओर बढ़ पाये। अल-अहरम पत्रिका में छपे इस लेख का अनुवाद रूपा गुप्ता ने किया है।]



एक लंबी बीमारी के बाद बहत्तर वर्ष की आयु में 23 मई को इब्राहिम अबू लोग़द अपने रामल्लाह स्थित घर में चल बसे। वे नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक रहे और बाद में बीर .जेट यूनिवर्सिटी, वेस्ट बैंक के उपाध्यक्ष बने। तेल अवीव एयरपोर्ट पर उनसे मिलने के लिए जाते समय मुझे उनकी मृत्यु का समाचार मिला। वे मेरे सबसे पुराने और सबसे प्रिय मित्र थे। वे एक ऐसे आत्मविश्लेषक चिन्तक, करिश्माई राजनैतिक गुरू एवं नेता थे जिनकी अन्तर्दृष्टि के कारण हमारी पचास वर्षों की मित्रता निभ

सकी। जाफा में हुए उनके अंतिम संस्कार 'आजा-जागरण' - रामल्लाह के कतन केन्द्र उनके घर पर कई सौ शोक संतप्त लोग एकत्रित हुए। उनके दफनाये जाने के अगले दिन उनकी स्मृति में रामल्लाह के थियेटर में हुई स्मृति सभा में उनके कई मित्रों ने अपनी भावनाएं प्रकट कीं। इब्राहिम को पहाड़ के समीप उस कब्रिस्तान में उनके पिता के बगल में दफ़नाया गया जिसकी गोद में बसी जलराशि में इब्राहिम अपने अतिथियों को तैरने के लिए ले जाते थे और हमेशा पास के उस इ.जरायली बीच कैफे में जाने से इंकार कर देते थे जो अत्यन्त आकर्षक था और निमन्त्रण देता प्रतीत होता था। जाफा में हुई उनकी शोकसभा के एक वक्ता फ़ैसल हुसैनी भी थे जो लोग़द की मृत्यु के ठीक एक सप्ताह बाद कुवैत के अपने होटल के कमरे में गु.जर गये।

फिलिस्तिनी अनुभवों के केन्द्र में जो उथल-पुथल और वेदना रही है वह इब्राहिम के सार्थक जीवन और उनकी मृत्यु में भी आद्योपान्त विद्यमान रही है, इसलिये उनके जीवन



की पड़ताल जरूरी हो जाती है। यह इसलिये भी जरूरी हो जाती है क्योंकि यह फिलिस्तिनी स्थिति की सारी अनिश्चततताओं का वहन करती है। उनकी मृत्यु के समय सभी ने यह स्पष्ट अनुभव किया कि अबू लोग़द का जाफ़ा लौटने का निर्णय नितान्त व्यक्तिगत था, उनके जैसी अद्भुत इच्छा शक्ति रखने वाला ही कोई व्यक्ति ऐसा कर सकता था। उनके 1992 में फिलिस्तीन लौटने पर सभी ने टिप्पणी की जहां वे चवालीस (44) वर्षो की अनुपस्थिति के बाद लौटे थे। फिलिस्तीन में एक शिक्षक, जन बुद्धिजीवी और बहुत सी संस्थाओं के संस्थापक के रूप में बिताये उनके जीवन का एक दशक भी सभी की दृष्टि का केन्द्र रहा।

उनके जीवन के सारे नाटकीय निष्कर्षों के उपरान्त भी एक विराट अस्थिरता बनी रही। वे अभी भी निश्चिन्त नहीं थे। यद्यपि उनकी वापसी ने उन्हें बदला नहीं फिर भी घर लौट कर वे निर्वासन से अधिक संतुष्ट थे। फिलिस्तीन एक सवाल था जिसका पूरा उत्तर कभी नहीं दिया गया यहां तक कि पर्याप्त रूप से इसकी प्रस्तुति भी नहीं की गई। उनके व्यक्तित्व की हर बात इस अस्थिरता की पुष्टि करती थी, उनकी मिलनसारिता से लेकर उनकी मूडी आत्मालोचना तक, उनके आशावाद और ऊर्जा से लेकर उनके उस जड़ताबोध तक जो पूरी तरह निष्क्रिय कर देती है और जिसकी जकड़ में हम में से बहुत लोग हैं। उनका जीवन एक साथ पराजय और जय, दीनता और उपलब्धि, हताशा और दृढ़ निश्चय को अभिव्यक्त करता है। संक्षेप में हमारे समय के सबसे अच्छे फिलिस्तिनियों में से एक इब्राहिम का जीवन फिलिस्तीनी जटिलताओं की ही छवि था।

इब्राहिम जो निष्ठुरता की सीमा तक कुशल वक्ता थे, अपने लेखन के लिए कम याद किये जायेंगे। उनका लेखन उनकी सांगठनिक योग्यता की तुलना में कम सघन है। अमेरिका में वे एएयूजी (द एसोसियेशन ऑव अरब-अमेरिका यूनिवर्सिटी ग्रेजुएट्स), द यूनाइटेड होली लैंड फंड, द इंस्टयीटयूट ऑव अरब स्ट्डीज क्वार्टरली और मदीनी प्रेस की स्थापना के माध्यम बने। वे फिलिस्तीनी मुक्त विश्र्वविद्यालय की स्थापना के मुख्य प्रेरक थे। जिसका मुख्यालय 1982 के लेबनान युद्ध तक बेरुत में रहा। वेस्ट बैंक पर उन्होंने एक पाठयक्रम सुधार केन्द्र की परियोजना तैयार की और उसके बाद शोध और शिक्षा के लिए कतन केन्द्र की परिकल्पना की। इसके बाद भी वे इस तथ्य से भली-भांति परिचित थे कि फिलिस्तीन के लिए किए जा रहे संघर्ष को इस तरह के संस्थानों द्वारा नहीं जीता जा सकता। लोगों के अपने देश लौटने या जबरन कहीं भेजे जाने पर भी। ये अन्ततः स्वतः स्फूर्त स्वयं संदर्भित ही होंगे एवं किसी प्रकार का अत्याचार, संघर्ष और अंतहीन नुकसान इन्हें नष्ट या बर्बाद कर देगा। कॉनराड के नायक की तरह इब्राहिम सदैव अपने आस-पास होते नाटकीय घटनाक्रम से यहां तक कि अपनी खुद की कमजोरियों से एक सार्थकता और गर्वबोध ग्रहण करने का प्रयास करते रहे।

उनके जीवन को घेरे रखने वाली नाटकीय घटनाओं पर विचार करें। उनकी मृत्यु के समय उनके घर के बाहर अत्यन्त शक्तिशाली पर दिशाहीन झंझावात चल रहा था। 1982

में बेरूत पर अधिकार और परिणामस्वरूप साबरा और शातिला का हत्याकाण्ड और लेबनान से निर्वासन (उनके साथ ही पी एल ओ के सदस्यों का भी) 1948 में जाफ़ा का पतन उनके परिवार का बिखरना, अमेरिका में उनके लंबे निर्वासित जीवन का और फिलिस्तीन के पक्ष में उनकी मुखरता का आरंभ साथ ही 1992 में उनका अचानक वेस्ट बैंक लौटना। हर वह अरब नागरिक जो नस्लवादी बद्धमूढ़ता और विचारधारा, इस्लाम के प्रति पुराने बैर भाव से लड़ रहा था इब्राहिम का भारी क.र्जदार है। उन्होंने ही यह संघर्ष आरंभ किया और उसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी। अमेरिका के अपने चालीस वर्षों के संघर्ष के बाद भी उनके लिए लौटने की गुंजाइश बची थी पर यह लौटना विपत्ति भरी स्थितियों की ओर लौटना था। यह लौटना मुक्त फिलिस्तीन में नहीं बल्कि ओस्लो के क्षेत्रक में अमेरिकी पासपोर्ट के साथ लौटना था, यह उस जाफा में लौटना था जो इ.जरायली अधिकार क्षेत्र में था। फिलीस्तीन लौटना इजरायली P(A) अधिकार क्षेत्र में लौटना है - यह समझने वाले वे पहले व्यक्ति थे। [उनके अंतिम संस्कार को रोक देने की धमकी तक दी गयी।]

फिलीस्तीन नेशनल काउन्सिल और पी.एल.ओ. के चरित्रगत परिवर्तन को 1988 में ही लक्षित करने वाले वे पहले व्यक्ति थे। वे यह समझ गये थे कि अपने मुक्ति संग्राम का लक्ष्य छोड़ कर पी.एल.ओ ने राष्ट्रीय स्वाधीनता-संग्राम की राह पकड़ ली है जो हर हाल में उसके पहले उद्देश्य से कमतर था। जैसा कि बाद में ओस्लो अनुबंध से भी प्रमाणित हुआ।

पराजय की गहन हताशा को भी किस प्रकार छोटी ही सही - उपलब्धि में बदला जाता है यह इब्राहिम से बेहतर कोई नहीं जानता पर वे केवल नैतिक विजयों से संतुष्ट नहीं थे। फौजी शक्ति के यथार्थ से वे भलीभांति परिचित थे। उदाहरण के लिए 1982 में बेरुत की प्रलयंकारी घटना से अराफ़ात के बचने पर उन्होंने कहा - ''हमारे पास टैंक नहीं है मतलब हमारे पास वास्तविक शक्ति नहीं

है। इसीलिए इ.जराइलियों के लिए हमारे संस्थानों को नष्ट करना एवं हमारे लोगों को मार डालना संभव हुआ।''

मैं इब्राहिम से सन 1954 में प्रिन्सटन में मिला था। उन दिनों विश्र्वविद्यालय में विदेशी स्नातक नहीं हुआ करते थे - न कोई अफ्रीकी अमेरिकन, न औरतें। वहां थे केवल वे उच्च वर्गीय श्र्वेत-वर्णी युवक जिन्हें सबसे अच्छी शैक्षणिक सुविधा मिली थी जिन्हें सदा यह महसूस करवाया जाता था कि वे दुनिया पर शासन करने के लिए जन्मे हैं। बाद में उनमें से बहुतों ने शासन किया भी। उन्हीं दिनों शहर के एक धनिक ने संगीत विभाग को एक राशि दी ताकि प्रिन्सटन के अत्यन्त सम्मानजनक संगीत समारोह में विद्यार्थियों को टिकटें मुहैया करवाई जा सकें। मुझे टिकटों को बांटने का काम सौंपा गया। सितम्बर की एक खासी गर्म शाम को एक चपल नीली हरी तीव्र आंखों और उच्चारण के विशेष लहजे वाले एक युवक ने आकर मुझसे टिकट मांगा। उसने मुझे जल्दी से अपना परिचय पत्र दिखाया। (मैं उसका नाम नहीं देख पाया मैंने उसे केवल स्नातक विद्यार्थी में रूप में दर्ज किया।) जाते जाते हठात्‌

मुड़कर उसने मेरा नाम दोबारा पूछा मेरे फिर से बताने पर वह लौट कर आया और पूछा कि मैं कहां का हूं। अभी इजिप्ट का हूं पर पहले मैं फिलीस्तीन का था'' ऐसा ही कुछ मैंने कहा। उसका चेहरा चमक उठा - मैं भी फिलीस्तीन का हूं'' उसने कहा - ''जाफा से''। यह युवक जो थे इब्राहिम फिलिप हित्ती (Hitti) के साथ अध्ययन कर रहे थे जो लेबनान के मूल निवासी थे और उन्होंने 'ओरियन्टल स्टडीज' (प्राच्य अध्ययन) विभाग की स्थापना की थी। यह विभाग मुख्यतः अरब के इतिहास एवं संस्कृति से सम्बद्ध था। इब्राहिम ने मुझे दूसरे अरब स्नातकों से मिलाया और पलक झपकते ही वे मेरे पुराने मित्र बन गये जिनके साथ मैं अरबी भाषा बोल सकता था। प्रिन्सटन में जियोनिस्ट उपस्थिति पर शोक कर सकता था जो स्वे.ज (Suez) संकट के समय सबसे अधिक प्रत्यक्ष थी।

हम दोनों ने 1957 में प्रिन्सटन शहर छोड़ा। वे तब तक पीएच. डी कर चुके थे और मैं बी.ए.। मैं एक वर्ष में लिए इजिप्ट लौट गया। मैं इब्राहिम और उनकी पत्नी जैनेट से काइरो में नियमित रूप से मिलता रहा। इब्राहिम वहां यूनेस्को के लिए काम कर रहे थे। फिलवक्त हम दोनों के अंदर संचित राजनैतिक ऊर्जा का अल्पांश ही दिखाई पड़ा था। मैं बहता बहता हार्वर्ड के स्नातक स्कूल से जा लगा। अबू लोग़द से मेरी मुलाकातें कम हो गयी। हांलाकि मैं जानता था कि वे शिक्षक के रूप में अमेरिका लौट चुके थे। तभी अचानक से 1967 के झंझावात ने हम सबको हिला कर रख दिया। इब्राहिम ने मुझे एक पत्र लिख कर पूछा कि क्या मैं न्यूयॉर्क से प्रकाशित होने वाली अरब लीग मासिक ''अरब वर्ल्ड'' के विशेष अंक के लिए कुछ लिख सकता था, जिसके वे अतिथि संपादक थे और युद्ध पर अरब दृष्टिकोण से प्रकाश डालना चाहते थे। मैंने इस अवसर का उपयोग किया। मैंने मीडिया और लोकप्रिय साहित्य में अरब की छवि पर प्रकाश डालते हुए मध्य युग तक इसके सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व को सामने रखा। यही मेरी पुस्तक ओरियन्टलिज्म का उत्स था जिसे मैंने जैनेट और इब्राहिम को समर्पित किया।

बाद के वर्षों में यद्यपि लोग़द दम्पति शिकागो में रहते थे और मैं न्यूयॉर्क में फिर भी हम राजनीति के कारण एक दूसरे के न.जदीक आते गये। हम एक साथ कांग्रेस के साक्षी रहे, 1988 में जॉर्ज शुल्त्ज से मिले, बॉस्टन में हमने 'अरब स्टडीज' संस्थान बनाया, ''अरब स्टडी.ज क्वार्टरली की स्थापना की और काइरो, अम्मान एवं अलजीयर्स में फिलिस्तीन नेशनल काउन्सिल के अधिवेशनों में भाग लिया। महत्वपूर्ण गतिविधियों क उन वर्षों में अमेरिका और अरब की प्रतिभाओं को पहचानने में इब्राहिम ने अद्भुत बुद्धिमानी का परिचय दिया। उन्होने इन प्रतिभाशाली लोगों का आपस में परिचय करवा कर उनके मिल-जुल कर कार्य करने का मार्ग प्रशस्त किया। पेरिस में एक वर्ष रहने के पश्चात्‌ 1982 के जून में वे मुक्त विश्र्वविद्यालय की स्थापना के लिए बेरूत चले आये। यह कार्य उन्होंने यूनेस्को और पीएलओ के साथ मिल कर किया। उनके बेरूत आगमन के दो दिनों के बाद आइ डी एफ (IDF) ने लेबनान पर आक्रमण कर दिया और उसके तुरन्त बाद ही उनक नया घर एक इ.जरायली रॉकेट द्वारा ध्वंस हो गया। अगले दो महीने वो बेरूत में फंसे रहें। यह समय उन्होंने अपने घनिष्ठ मित्र सोहेल मियारी के साथ मेरी मां के घर में गुजारा। उन कठिन दिनों में हम निरन्तर एक दूसरे के सम्पर्क में थे। इसमें अराफात ने हमारी सहायता की। अराफात में अमेरिकी प्रशासन से मध्यस्थत्ता में बहुत से लोगों की सहायता ली जिनमें एक मैं भी था।

बेरूत संभवतः इब्राहिम के जीवन के अब तक और बाद के अनुभवों में सबसे महत्वपूर्ण रहा। इस अनुभव ने सबसे पहले उन्हें यह सिखाया कि मध्य पूर्व में किस प्रकार श्रेष्ठ संगठनों को औसत बुद्धि के लोगों और राजनैतिक तथा सामाजिक क्रूर अस्थिरता ने नष्ट कर दिया। दूसरी सीख उन्होंने यह ली कि सत्ता की शक्ति का वास्तविक समीकरण किस प्रकार सत्तानशीनों को प्रभावित करता है और उन्हें भी जो सत्ताविहीन हैं। तीसरी और शायद सबसे महत्वपूर्ण बात उन्होंने यह जानी कि जीवन में प्रयास करते रहना चाहिये भले ही असफलता कितने ही डरावने रूप में मंडरा रही हो। इब्राहिम का यही रूप सबसे वास्तविक था - एक ऐसा आदमी जो लगातार प्रयत्नशील रहने के महत्त्व को समझता है, अपने साथियों के प्रति सदैव निष्ठा रखता है, जो सर्वदा आशावादी बना रहता है (और मृत्युदंश जैसी परिस्थितियों में भी अपना हास्य बोध बनाये रखता है)।

वे मुझसे अक्सर कहा करते थे - हमलोग बहुत सामान्य लोग हैं एडवर्ड, बहुत सामान्य पर अंत में देखना इजरालियलों की सारी प्रतिभा को यही सामान्यता पराजित करेगी किन्तु साथ ही यह अवश्य कहते - हम अच्छे इंसान हैं और .जिद्दी भी, हांलाकि हम हमेशा चतुर नहीं हैं। उन्हें ओस्लो अनुबंध की सबसे अधिक परेशान करने वाली बात फिलिस्तियों की अवमानना लगती थी। अराफ़ात की दीनता और विदूषक जैसी भावभंगिमा ने हम दोनों को बहुत उद्वेलित किया था और हम इस बात पर बहुत शर्मिन्दा थे कि ओस्लो अनुबंध के पहले हम उसके साथ थे। मुझसे विपरीत इब्राहिम फिलिस्तीन के उस भाग में रहना चाहते थे जो ओस्लो अनुबंध द्वारा तैयार हुआ था और आंशिक रूप से .जबरन इ.जरायली 'एरिया ए' से दूर था और यही वह स्थान था जहां इब्राहिम ने स्वयं को, अपने साथियों को और अपने विद्यार्थियों का कर्म-स्थल बनाया।

इब्राहिम विद्वानों और बुद्धिजीवियों में आस्था रखते थे - वे चाहें अरब के हों या पश्चिम के। किसी में प्रतिभा देखकर वे उत्साहित हो जाते थे क्योंकि इससे उन्हें उस छिपी हुई प्रतिभा को सामने लाने का अवसर मिलता था। उनके द्वारा प्रशंसित एवं श्रेणीबद्ध लोगों को हमेशा लगा कि दुनिया में लोग तो बहुत से हैं पर मैं विशिष्ट हूं। उनके जैसा उत्साहबर्द्धक संरक्षक और प्रायोजक कोई नहीं था। उनके मुंह से 'तुम अद्भुत तो' सुनने जैसा और कोई अनुभव नहीं था पर साथ ही जब वे किसी के लिए यह कहते थे कि वह मूर्ख (Jerk) है तो प्रथम ध्वनि को अपनी भारी जाफा उच्चारण के साथ और भारी कर देते थे। शिक्षक के रूप में वे दो मनःस्थितियों के मध्य झूलते रहे। विद्यार्थियों को प्रभावित एवं शासित करने की इच्छा और उनके साथ समान होने की कामना। तीन प्रतिभाशाली पुत्रियों के पिता और बेहद प्रतिभा सम्पन्न नारी के पति होने के कारण वे अन्य अरब अथा पश्चिमी पुरूषों की तुलना में स्त्रियों के प्रति अधिक सहिष्णु थे। यहां तक कि पितृव्य व्यवहार करते समय भी वे भ्रातृ वत समानता बनाये रखते थे किसी ने शायद ही कभी उनके तानाशाह रूप को देखा हो हांलाकि किसी महत्वपूर्ण लक्ष्य के लिए वे तानाशाही बहुत प्रभावशाली ढंग से उपयोग कर सकते थे। उनके व्यक्तित्व की दहाड़ती सतह के नीचे एक बेहद दयालु हृदय घड़कता था।

हममें से बहुतों की तरह इब्राहिम भी कभी फिलिस्तीन के अभाव को भूल नहीं सके, उनके आरम्भिक जीवन के शरणार्थी दिनों की स्मृति उन्हें कभी नहीं भूली। हांलाकि उन दिनों की स्मृतियों को उन्होंने कभी अभिव्यक्त नहीं किया पर इ.जरायल के प्रति उनके क्रोध का वे सदैव एक अंश बनी रहीं और इसी कारण वे जानते समझते थे कि यह संघर्ष जटिल है और लंबा चलने वाला है, हमारे जीवन में हमें आत्म निर्धारण का अधिकार मिलने वाला नहीं है। ''फिलीस्तीन के रूप परिवर्तन'' (उनके सुप्रसिद्ध निबन्ध संग्रह का शीर्षक भी है जिसमें उन्होंने .जियोनिज़्म द्वारा देश की लूट को कठोर शब्दों के स्थान पर तनिक कोमलता से व्यक्त किया है) ने उनके जीवन के कार्यों को किसी न किसी रूप में प्रभावित किया, किन्तु वे विचारहीन उग्रपंथी नहीं थे बल्कि भयजनक सीमा तक स्वतंत्र चिन्तक थे। वे अक्सर धीमी गति से प्रहार करने वाले आलोचना मूलक बुद्धिजीवी थे। इस तथ्य के उपरान्त भी कि वे आजीवन व्यक्तिगत एवं पेशागत रूप में किसी विशेष उद्देश्य के लिए कार्य करते रहे उन्हें किसी की प्रकार पेशेवर नहीं कहा जा सकता बल्कि वे सदा एक ऐसे अनाड़ी की तरह कार्य करते रहे जो प्यार और प्रतिबद्धता से चालित था।

इब्राहिम ने मुझे फिलिस्तीन के वास्तविक विषयों और अनुभवों से परिचित करवाया था। वे मुझसे सात वर्ष बड़े थे और फिलिस्तीन की अवश्यम्भाविता से ज्यादा गहरे गुंथे हुए थे। उन्होंने मुझमें और मेरे जैसे बहुतों में अपनी दफनायी हुई आरम्भिक स्मृतियों को फिर से पाने की इच्छा जगायी, इसके पहले कि नक्ब सब कुछ समाप्त कर दे। उन्हें हमारे इतिहास की विस्तृत और सूक्ष्म जानकारी थी, वे इतिहास बहुत अच्छा समझते थे साथ ही उनहें अद्भुत रूप से यह स्मरण था कि कौन सी वस्तु और व्यक्ति कहां से आये, कहां गये, वे अब कहां हैं अथवा वे कब लुप्त हो गये।

सन्‌ 1940 के दशक में जाफ़ा का उल्लेखनीय महत्व है। इब्राहिम के स्कूल 'अमरिये' से चकित कर देने वाले प्रतिभाशाली किशोरों - युवकों का दल निकला। इनलोगों ने शरणार्थी के रूप में, कार्यकर्त्ता, विद्वान और व्यवसायी बन कर जीवन आरम्भ किया। इब्राहिम ने इनलोगों से मेरा परिचय करवाया और वे मेरे घनिष्ठ मित्र बने। उन्हीं में इब्राहिम के भव्य, पी.एल.ओ. महारथी एवं कुशल वक्ता मित्र शफ़ीक-अलहुत भी थे जिन्होंने बेरूत कभी नहीं छोड़ा, 1982 की शरत्‌ ऋतु में शहर के इ.जरायइलियों द्वारा हस्तगत कर लेने पर भी नहीं। हां ओस्लो अनुबंध में अराफ़ात से तीव्र असहमति के कारण उन्होंने कार्यकारी समिति से त्यागपत्र अवश्य दे दिया था। और थे अब्दुल मोहसिन-अल-क़तन - एक सफल व्यवसायी जिन्होंने फिलिस्तिनियों की संस्थाओं की स्थापना के लिए अपनी अधिकांश सम्पत्ति दी और शफ़ीक तथा इब्राहिम की तरह वे भी ओस्लो अनुबंध के मुखर आलोचक थे।

इब्राहिम इन सबों को अपने मध्यकालीन तिथिविज्ञान और अद्भुत उत्साह से दीप्त रखते थे। नेशनल काउन्सिल वेलफेयर ऐसोसियेशन की सभाओं में उन्होंने संख्या में सदैव विस्तारित होते फिलिस्तिनियों को एक दूसरे से मिलवाया। इन संकोची और शर्मीले लोगों से वे आश्चर्यजनक सूचनाएं एकत्रित कर लेते थे जिनका वे बड़ा समुचित उपयोग करते थे। फिलिस्तीन की कहानी के सबसे ठोस पक्ष के रूप में वे शिक्षकों, वकीलों, विद्वानों, बैंक कर्मचारियों और इंजीनियरों को विशेष महत्व देते थे। जैसे-जैसे वे कहानी कहते जाते थे सुनने वाले को लगता था कि वे कुछ भी भूलते नहीं हैं। उनकी कॉनरेडी (Conradian) विशिष्टता उनकी कही हुई हर बात को गहराई प्रदान करती थी। अरब और उस के राष्ट्रीय मुक्ति संग्रामों और उत्तर औपनिवेशिक राजनीति का अमेरिका से परिचय हो जाता है। इब्राहिम में क्षेत्रीयतावाद नहीं था वे केवल फिलिस्तीनी राष्ट्रवाद के समर्थक नहीं थे। उनका व्यापक दृष्टिकोण एवं पूरी दुनिया घूमने की उनकी आकांक्षा ईर्ष्या योग्य थी। वे उन स्थानों के बारे में अत्यन्त अधिकार पूर्वक बात करते थे जहां जाने के बारे में मैं सोच भी नहीं सकता था। ऐसे स्थानों की सूची में पेरू, चीन और रूस भी थे। वे बड़े शहरों में रहना पसंद करते थे और अक्सर अपना समय पेरिस, काइरो और शिकागो में व्यतीत करते थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फिलिस्तीनी मुद्दे पर लोगों की सहायता करने की शक्ति और सीमा से वे भली-भांति परिचित थे। जैसे मुझसे एक दशक पहले ही वे इस बात को समझ गये थे कि सी.एल.आर. जेम्स अपने को पश्चिम के व्यक्ति के रूप में देखता है अरबों के साथ अपने को जोड़ा जाना वह सहज ही स्वीकार नहीं करेगा। इसी के साथ वे अफ्रीकी अध्ययन के नार्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटीज प्रोग्राम के निदेशक होने के नाते अफ्रीका के मुक्ति संग्राम से बहुत अच्छी तरह परिचित थे। इसके कुछ महत्वपूर्ण नेताओं को उन्होंने नॉर्थवेस्टर्न निमंत्रित भी किया था। अमिलकर काबराल और ऑलिवर टैम्बो जैसे व्यक्तित्वों की सराहना वे बहुत पहले ही कर चुके थे। न केवल उन्होंने इन व्यक्तित्वों की विशिष्टता पहचानी थी बल्कि वे उन कारणों के महत्व को भी रेखांकित कर सके थे जिनके लिए ये महान शख्सियतें संघर्ष कर रही थी। उन्होंने इन सभी संघर्षों एवं समस्याओं से फिलिस्तीन को जोड़ कर देखा। उन्हीं के माध्यम से अरब राष्ट्रवादी विमर्श के महान व्यक्तित्वों से परिचय संभव हो जाता है जैसे मुहम्मद हसनैन हकाल और मुनीफ़ अल र.जाज से परिचय संभव हो पाता है।

अपने दूसरे साथी इकबाल अहमद से 1970 में पहली बार मैं इब्राहिम के सौजन्य से ही मिला। इकबाल अहमद की असमय मृत्यु ने मुझे बहुत खालीपन से भर दिया। इब्राहिम की तरह इकबाल भी (अगर इब्राहिम द्वारा किसी की प्रशंसा में कहे गये सर्वोच्च शब्द का व्यवहार करूं तो) 'असल' इंसान थे - 'सच्चे', 'खरे'। इब्राहिम की ही तरह वे भी अत्यन्त उर्वरक प्रतिभा के धनी थे, किसी बात को समझाने में वे अपनी सानी नहीं रखते थे। इन दोनों के साथ देर रात तक बैठकर उनकी सम्मोहक, विस्तीर्ण और ज्ञानप्रद बातें कभी कभी रहस्यमयी भी सुनते हुए खामोशी के गहन आगोश में डूबते जाना एक अद्भुत अनुभव था। बातचीत की शैली चाहे जैसी भी रही हो पर वार्ता अपने लक्ष्य से कभी नहीं भटकी। मेरे दोनों गुरूओं में से कोई भी वक्त के प्रति कभी कंजूस नहीं रहा शायद इसी वजह से वे प्रिंट मीडिया की सापेक्षिक कंजूसी के प्रति लापरवाह रहे। मेरी बीमारी के दिनों में उन लोगों ने अपनी भाषा शैली, कई भाषाओं के ज्ञान और किस्से कहानियों और अपने विचारों की उदारता से मुझे जिस प्रकार उपकृत किया उसका स्वकरण कर मैं आज भी संकोच में पड़ जाता हूं। यह संकोच मुझे उन बातों को यहां उल्लेख करने सो रोक रहा है। मुझे सबसे अधिक सदमा उस बात से लगा है कि वे मुझसे पहले चले गये, वह भी आज के इन हालातों में जब मानवता के हक में उनकी आवा.जों की सबसे अधिक .जरूरत थी।

दो वर्ष पहले इक़बाल की मृत्यु के समय उन पर लिखते हुए और आज इब्राहिम पर लिखते हुए उकनी उपलब्धियां गिनवाना मेरे लिए एक कठिन कार्य है। ये दोनों जिससे भी मिले उस पर उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी। इनकी उपलब्धियां किसी एक संस्था में सीमाबद्ध नहीं थी वे तो विभिन्न सभाओं, संस्थाओं, दलों, संगठनों और परिवारों के बीच बिखरी हुई है। उन्होंने अपने सम्पर्क में आने वाले हर व्यक्ति को प्रभावित किया प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में।

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में दोनों अपनी जड़ों की और लौट गये; इकबाल, बिहार के मूल निवासी, इस्लामाबाद और इब्राहिम, जाफा के मूल निवासी, रामल्लाह लौट गये। पर असल में घर नहीं लौटे। अपनी स्मृतियों को पुनः पाने की प्रक्रिया में हम उसे अधिक जड़ बनाते चलते हैं, उन्हें कैद करने के इस प्रयास में हम उन स्मृतियों से धोखा करते हैं - उन स्मृतियों से जिनके पक्ष में ये लोग खड़े थे - ऊर्जा, प्रवाह, खोज और खतरे उठाने की क्षमता। फिलिस्तीन के लंबे इतिहास की स्मृति में इब्राहिम सदा अनुकरण योग्य व्यक्तित्व बने रहेंगे। किसी लक्ष्य के प्रति समर्पित होना किसे कहते हैं इब्राहिम को देख कर समझा जा सकेगा। वे केवल श्रद्धानत नहीं करते बल्कि उसी प्रकार जीने और जीवन के निरन्तर पुनर्परीक्षण के लिए प्रेरित करते हैं। उन्हें पूरी तरह समझने के लिए उन संघर्षों और सिद्धांतों को अच्छी तरह समझना होगा जिनसे उनका जीवन एक क्षण भी विलग नहीं हुआ, उनकी सार्थकता उनके अनुकरण में नहीं उनके जिये सिद्धांतों को फिर से जीने में है इस गुंजाइश के साथ कि भविष्य में इनके प्रति आलोचनात्मक दृष्टि रख इन्हें सुधारा जा सके।

एडवर्ड सईद

सईद का जाना




प्रख्यात विद्वान एडवर्ड सईद (1935-2003) अब नहीं रहे। इनकी मृत्यु के बाद सारी दुनिया के बौद्धिक जगत में एक खालीपन का अहसास बहुतों को हुआ होगा। आज के उत्तर-आधुनिक दौर में जहां विचारों और विचारकों के हस्तक्षेप की महत्ता कम होती दीखती है एडवर्ड सईद की उपस्थिति और हस्तक्षेप का महत्त्व वे तमाम लोग समझते हैं जो अमरीकी साम्राज्यवाद का विरोध करते रहे हैं। सईद की अमरीका में उपस्थिति इस बात के लिए आश्र्वस्त करती थी कि इजराइली समर्थक अमरीकी मीडिया के चौंधिया देने वाली ताकत के मुकाबले खड़ी रहने वाली यह आवाज दब नहीं सकती। अमरीकी ताकत का असली अंदाजा उन लोगों को होता है जो फिलीस्तीन जैसी 'आशा' और प्रेरणा के साथ अमरीकी 'प्रोपेगेण्डा' के सामने खड़े रहे हैं। निश्चय ही सईद इस 'आशा' की सबसे प्रतिनिधि आवाज थे।

जिन लोगों से एडवर्ड सईद का परिचय थोड़ा कम है उनकी सुविधा के लिए उनके बारे में कुछ तथ्य इस प्रकार हैं। अब्राहिम वडी (Wadie) एक फिलीस्तीनी प्रोटेस्टैंट ईसाई थे। उनका जन्म 1895 में हुआ था। 16 वर्ष की आयु में उन्हें ऑटोमन साम्राज्य की सेना में भर्त्ती कर लिये जाने के भय से बाहर भेज दिया गया। लिवरपूल होते हुए अब्राहिम अमरीका पहुंचे जहां वे विलियम सईद बन गये। प्रथम विश्र्व युद्ध के दौरान फ्रांस में रहकर अमरीका की ओर से सैनिक सेवा में योगदान किया। उन्हें अमरीकी नागरिकता मिल गयी लेकिन 1919 में वे वापस अपने वतन फिलीस्तीन लौट गये। वहां अपने चचेरे भाई की कम्पनी - फिलीस्तीन ऐडुकेशन कंपनी में बराबर के पार्टनर बन गये। 1929 में वे मिस्र गये। वहीं उन्होंने अपनी एक कंपनी बनायी - स्टैंडर्ड स्टेशनरी कंपनी। विलियम वडी (Wadie) ने व्यापार में बहुत सफलता पायी और उनकी कम्पनी की शाखाएं काहिरा, एलेक्जेन्ड्रिया और कई अन्य जगहों पर खोली गयीं।

विलियम और उनकी पत्नी ने काहिरा में होते हुए भी जेरूसेलम से लगातार सम्पर्क बनाये रखा। वहां वे जाते रहते थे और उनकी इच्छानुसार उनकी संतान का जन्म जेरूसलम में ही हुआ। 1 नवम्बर 1935 को जेरूसलम में पुत्र के उत्पन्न होने पर विलियम की पत्नी ने उसका नाम रखा - एडवर्ड। वे प्रिंस ऑव वेल्स को बहुत पसंद करती थीं और उन्हीं के नाम पर उन्होंने अपने पुत्र का नामकरण किया था।

एडवर्ड का बचपन और प्राथमिक शिक्षा-दीक्षा काहिरा में ही हुई हांलाकि विलियम परिवार जेरूसलम से अपना सम्पर्क बनाये हुए था। एडवर्ड की शिक्षा-दीक्षा एकदम अंगरेजी साहबों के बच्चों की तरह हुई। काहिरा में वे जिस अमरीकी स्कूल में पढ़ते थे उस स्कूल में हैंडबुक के प्रथम पृष्ठ पर लिखा होता था - ''अंग्रे.जी इस स्कूल की भाषा है। जो विद्यार्थी अंग्रे.जी के अलावा किसी अन्य भाषा में बातें करते पकड़े जायेंगे उन्हें दंड दिया जायेगा।''





इस स्कूल के सभी शिक्षक अंग्रे.ज थे। एडवर्ड सईद लिखते हैं कि उस स्कूल में किसी भी छात्र की भाषा अंग्रे.जी नहीं थी। उन सभी विद्यार्थियों (जो अर्मेनियन, ग्रीक, इटालियन, यहूदी और तुर्क थे) की अपनी-अपनी भाषाएं थीं पर उनका प्रयोग विद्यालय में निषिद्ध था। हांलाकि हमलोग आपस में हमेशा अरबिक या फ्रैंच में बातें करते थे।'' सईद ने लिखा है कि भाषा, संस्कृति, नस्ल और जाति ('एथनिक') के आधार पर हमें ब्रिटिश लोगों से कमतर समझा जाता था। इस कमतरी के एहसास और अपनी संस्कृति के प्रति दमनकारी पश्चिमी सांस्थानिक दबावों से सईद इस स्कूल के माध्यम से परिचित हुए। बाद में मशहूर विक्टोरिया कॉलेज में दाखिल हुए जहां उनके सहपाठियों में थे - जार्डन किंग हुसैन और माइकेल शैलहॉब (Shalhoub)। माइकेल शैलहॉब बाद में ओमर शरीफ के नाम से विख्यात अभिनेता हुए।

अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़े रहने की प्रवणता पिता विलियम की तरह एडवर्ड में भी थी। एडवर्ड सईद ने चालीस वर्षों तक अमेरिका में अंग्रेजी साहित्य पढ़ाने के बाद भी कहा था कि उन्हें मालूम नहीं कि उनकी पहली भाषा कौन सी है - अंग्रे.जी या अरबी। वे लिखते हैं ''जब भी मैं अंग्रेजी का कोई वाक्य बोलता हूं इसकी अरबी मेरे दिमाग में ध्वनित (echo) होती है।''

1951 में उन्हें विक्टोरिया कॉलेज से निकाल दिया गया। कारण था अंग्रेज शिक्षकों और छात्रों के साथ दुर्व्यवहार। उस समय तक मिश्र की राजनैतिक परिस्थितियां बदल रही थी। (1952 में मिश्र स्वाधीन हुआ और नासिर सत्ता में आये।) 1951 की सितंबर में

विलियम ने एडवर्ड को मैसैसचर्स (अमरीका) के एक स्कूल में दाखिला करा दिया। एडवर्ड सईद ने लिखा है - ''जिस दिन मेरे माता पिता स्कूल के गेट पर मुझे छोड़कर अपने देश चले गये वह दिन मेरे जीवन का सबसे दुःखद दिन था।''

अमरीका में आने के बाद एडवर्ड के लिए एक नया माहौल सामने था। उसका नाम था - एडवर्ड, जातीयता थी - फिलीस्तीनी और वह अरबी बोलता था। एडवर्ड ने उन दिनों को याद करते हुए लिखा है कि उनकी समझ में नहीं आता था कि वे क्या करें। किसी ने उन्हें बताया कि एक शिक्षक है जो मिस्र से आया है। संयोग से उस शिक्षक से एडवर्ड के परिवार का सम्पर्क रहा था। एडवर्ड उनके पास गया और अपना परिचय देने के बाद उनके अरबिक बोलने लगा शिक्षक ने उसे तुरन्त टोका और कहा - ''यहां अरबी में बात मत करो। वहां की चीज मैं वहीं छोड़ कर आया हूं।''

एडवर्ड पढ़ाई में अच्छे थे इसीलिए धीरे-धीरे आगे बढ़ते गये। बाद में वे यूनिवर्सिटी में अंग्रे.जी साहित्य पढ़ाने लगे। 1963 में उनका परिवार मिस्र से लेबनान चला गया। इस बीच सईद का अध्ययन चलता रहा। इस प्रक्रिया में वे एक 'पश्चिमी' व्यक्ति बन गये जिसने साहित्य, संगीत और दर्शन का व्यापक अध्ययन किया था। पर उन्होंने लिखा है - ''इन



सबके साथ मेरी परम्परा (Tradition) का कोई सम्बंध नहीं था।'' अपनी परम्परा के सन्दर्भ में अपने ज्ञान को रखने का कार्य उन्होंने कुछ दिनों बाद किया।

1967 में सईद समेत बहुत सारे लोगों को झटका लगा। अरब-इजरायल युद्ध में इजराइल की विजय के बाद फिलीस्तीनी राष्ट्रवाद ने जोर पकड़ा जिसका मुख्य केन्द्र बना - जॉर्डन । उस दौरान सईद के अनुभवों ने उसे बहुत कुछ सिखाया। अमरीका में सभी लोग इजरायल की विजय का जश्न मना रहे थे। गोल्डा मेयर (Meir) ने 1969 में कहा था - ''कोई भी फिलीस्तीनी नहीं है।'' सईद के अनुसार इतिहास को दबाने की कोशिश की जा रही थी। सईद और उनके 'गुरू और साथियों' के लिए कुछ कर गुजरने का समय आ गया था।

एडवर्ड सईद ने फिलीस्तीन के प्रश्न पर लिखना शुरू किया। उन्हें लगने लगा कि पश्चिमी ज्ञान की पूरब संबंधी अज्ञानताओं के खिलाफ लिखना चाहिए। अपनी संस्कृति और इसके इतिहास का अध्ययन करना उन्हें जरूरी लगा। 1972 में एक वर्ष की छुट्टी लेकर उन्होंने अरब के दर्शन और साहित्य का अध्ययन किया। इसने उन्हें 'ओरियन्टलिज्म' की प्रेरणा दी। 1978 में 'ओरियन्टलिज्म' के छपने के बाद तो उन्हें विश्र्वव्यापी ख्याति मिल गयी। तब से लेकर मृत्यु पर्यन्त वे लाखों लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बने रहे। कई पुस्तकें लिखीं और फिलीस्तीन की संघर्षशील जनता की आवा.ज से शुरू करके तृतीय विश्र्व की प्रमुख आवा.ज के रूप में भी चिन्हित हुए।

बेहद मिलनसार, भावुक, परिश्रमी सईद ने संगीत पर भी पुस्तकें लिखी हैं और वे खुद एक कुशल संगीतज्ञ भी थे।

1993 में उन्हें डाक्टरों ने बताया कि उन्हें ल्यूकेमिया है और वे अब अधिक दिनों तक नहीं जी पायेंगे। तब जीवट वाले सईद ने कहा था कि मुझे 10 साल और मिल जाये तो मैं अपने बारे में खास तौर पर अपने शुरुआती दिनों के बारे में कुछ लिखूंगा। खुशकिस्मती से उन्हें ठीक दस साल मिले। इस दौरान वे लगातार लिखते रहे। पूरी जीवटता और निर्भीकता के साथ। इस बीच वे अपने देश भी जाते रहे, इजराइल के विरूद्ध सभाओं में भी शामिल होते रहे, अमरीका की साम्राज्यवादी नीतियों की तीखी आलोचना भी करते रहे और डाक्टरों की हिदायतों के बावजूद लगातार सक्रिय रहे।

एडवर्ड सईद अमरीका में सक्रिय एक षडयंत्र को साफ-साफ देख समझ रहे थे जहां अमरीकी प्रभुत्व की लालसा में पूरे इस्लामी जगत को एक दुश्मन के रूप में देखा जा रहा था। एडवर्ड सईद ने 9/11 सितंबर 2001 की घटना के बाद अमरीकी रवैये पर दुःख प्रगट करते हुए कहा था कि इस्लाम एक नहीं है जैसे कि अमरीका एक नहीं है। इस्लाम के भी कई रूप हैं। जैसे कि अमरीका के भी कई रूप हैं। सईद ने लिखा है कि अमरीका कैप्टन वहाब की तरह का आचरण कर रहा है जो मॉबी डिक को मारने की .जिद के कारण खुद अपने को भी नष्ट करने की ओर बढ़ रहा है।



सईद का भारत के साथ लगाव था। जब वे कुछ साल पहले भारत आये थे तो जहां जहां वे गये उन्हें, अमरीकी साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ लोकतांत्रिक तरीके से लड़ने की प्रेरणा देते रहे। भारत के मामले में एक ट्रेजेडी यह है कि जब भी ई.पी. टॉम्सन, चॉम्स्की, एडवर्ड सईद जैसे विद्वान भारत आते हैं उन्हें असली भारत से रूबरू होने नहीं दिया जाता। दिल्ली, कलकत्ता और मद्रास के अंग्रे.जी (जिसमें वामपंथी कहे जाने वालों की संख्या भी कम नहीं है) ऐसे घेर लेते हैं कि उन्हें जरूर लगता होगा कि वे दिल्ली, कलकत्ता में नहीं किसी अमेरिका या यूरोप की यूनिवर्सिटी में उत्साही लोगों से बातें कर रही है। देशी भाषाओं के मीडिया, संस्थानों और बुद्धिजीवियों को इस ओर ध्यान देना चाहिए। इन सबके बावजूद टाम्सन, चॉम्स्की और सईद की आंखों ने बहुत कुछ देख-सुन लिया। सईद ने कलकत्ता में एक भाषण देते हुए कहा कि भारत का स्वतंत्रता संग्राम उसी समय शुरु हो गया जिस समय अंग्रे.जी ताकत ने यहां पांव धरे। यह बात गौरतलब है कि सईद की पुस्तक 'ओरियन्टलिज्म' (1978) की प्रेरणा ने भारत के इतिहासकारों के एक बड़े मंडल - 'सब-आल्टर्न' को वैचारिक आधार और दृढ़ता दी। 'ओरियन्टलिज्म' के बगैर 'सबआल्टर्न स्टडीज' की कल्पना कठिन है।

सईद ने कई पुस्तकें लिखीं, सैकड़ों लेख लिखे, असंख्य जगहों पर निर्भीक होकर बोलते रहे लेकिन उन्हें इतिहास 'ओरियन्टलिज्म' के लेखक के रूप में ही याद करेगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाना चाहिए कि इस पुस्तक का लगभग 'ग़लत पाठ' ही

सईद की व्यापक प्रसिद्धि का कारण बना। सईद को विख्यात और 'कुख्यात' इसी पुस्तक ने बनाया। इस पुस्तक के बारे में पर्याप्त चर्चा हुई है लेकिन इसको ठीक तरह से नहीं पढ़ा जाता है। युवा सईद इस बात से परेशान थे कि अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दियों ने 'पूरब' को 'पूरब' बनाया। ये चूंकि 'पश्चिम' की सदियां थी इस पूरी प्रक्रिया को 'पश्चिम' ने नियंत्रित किया। कुल मिलाकर 'पूरब' का एक पाठ बना जिसे 'पूरब' के आधुनिक लोगों ने भी मान लिया। यह दमनकारी पाठ साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा नियंत्रित था। यानि हमारा 'आधुनिक ज्ञान' भी साम्राज्यवादी निर्मिति का ही एक अंग है।

'ओरियंटलिज्म' ने अधिकतर उन बातों को ही अकादमिक तरीके से पेश किया है जिसे अरब और भारत जैसे देशों के कई विद्वान कहते रहे थे। इस पुस्तक में कई त्रुटियां भी रही हैं। ऐजा.ज अहमद ने 'इन थ्योरी' में इस पर विस्तार से लिखा भी है। दो 'त्रुटियों' की ओर इशारा जरूरी है। प्रथम - इस पुस्तक ने पश्चिम को कर्त्ता (subject) के रूप में देखा। मानो पूरब और उसके सारे संस्थानों में कोई ताकत ही नहीं थी। पश्चिम आया और हमें बदल गया। और हम ताकते रहे। यह दृष्टि ग़लत है। पूरब के संघर्ष को इतिहास ने दर्ज नहीं किया इसीलिए शायद आज हम उससे परिचित नहीं हैं। द्वितीय - अंजाने ही 'ओरियंटलिज्म' ने अरब-जगत में चल रहे इस्लामी जेहादियों को मजबूती दे दी। पश्चिम ओरियंटलिज्म में 'विलेन' और नायक दोनों बन कर उभरा। सईद ने बाद में 'कल्चर एंड इम्पीरियलिज्म'

लिखकर और अपने साक्षात्कारों में लगातार इस बात को दोहराया कि वे युवा थे, कुछ उद्देश्यों को ध्यान में रखकर लिख रहे थे और उनके 'गलत पाठ' को ज्य़ादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। भारत में उनके दिए गये एक लम्बे इन्टरव्यू में उन्होंने इस पर खुल कर चर्चा की। यह इन्टरव्यू 'बुक रिव्यू' में छपा भी था।

इन सबके बावजूद सईद और 'ओरियन्टलिज्म' एक दूसरे के पर्याय ही बने रहे। यह विडंबना पूर्ण है लेकिन इसके पीछे भी कई कारण रहे हैं जिसकी चर्चा यहां अप्रासंगिक होगी।

सईद की विद्वता और निर्भीकता के सीधे दर्शन उनके 'एक्टिविज़्म' में होते हैं। फिलीस्तीन के लिए संघर्ष में योगदान करने वाले सईद ने भले ही इस संघर्ष को वाणी दी लेकिन इस संघर्ष को शुरू करने वाले विद्वान इब्राहिम अबू लोग़द की मृत्यु भी हाल ही में हुई है। सईद ने लोग़द को अपना गुरू कहा है। अपने गुरू (अंग्रे.जी में लिखे लेख में सईद ने उन्हें 'माई गुरू' कहा है) की मृत्यु के बाद सईद ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है और उनके साथ ही हाल ही में विदा हुए इकबाल अहमद को भी याद किया है। इन दोनों के साथ सईद का सबसे गहरा रिश्ता रहा था। इकबाल अहमद बिहारी थे। इस लेख में सईद के उस दौर से हमारा परिचय होता है जिसके बीच से 'ओरियन्टलिज़्म' का जन्म हुआ।

सईद मार्क्सवादी थे या नहीं यह खुद उनके लिए भी कहना कठिन था। कुछ दिन पहले एक इन्टव्यू में उन्होंने कहा था कि मेरे लिए मार्क्सवादी होना और न होना महत्त्वपूर्ण नहीं है। मैं हमेशा स्वतंत्र बुद्धिजीवी के रूप में रहना चाहता हूं। राजनीति से प्रेरित बुद्धिजीवियों (जिन्हें वह 'politically invested' बुद्धिजीवी कहते हैं) ने अपनी स्वतंत्रता खोकर नुकसान किया है। हैबरमास की तरह सईद भी विद्वानों के विमर्श और राजनैतिक विमर्श को मिला देने के पक्ष में नहीं थे। वे फूको के 'पावर डिस्कोर्स' (शक्ति विमर्श) से भी प्रभावित थे और अडोर्नो और ग्राम्शी से भी। आज के इस दौर में स्वतंत्र और निर्भीक बौद्धिक कर्म के समर्थक सईद ने सारी दुनिया की संघर्षशील मानवतावादी ताकतों को म.जबूत करने में जिस जीवट का परिचय दिया उसने उन्हें दुनिया की सबसे ताकतवर आवा.ज बनाया। वे अपने समय के एक नायक थे।

[शब्द कर्म विमर्श, जनवरी 2004]