Friday 23 January 2009

Hindi mein itihas

हिन्दी में इतिहास लेखन (1864-1930); कुछ संदर्भ[1]
हितेन्द्र पटेल , इतिहास विभाग, रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय, कोलकाता.

हिंदी के बारे में यह कहा जाता है कि पिछले 125 सालों में इस भाषा नें जितनी प्रगति की है उतनी शायद ही किसी और भाषा ने की होगी. वह भी तब जब इसे किसी क्षेत्र के लोगों ने अपनी क्षेत्रीय पहचान से जोड्कर नहीं देखा. बंगाल के शिक्षित मध्यवर्ग ने बँगला भाषा को बँगला जाति की सांस्कृतिक पहचान का ज़रूरी हिस्सा बना दिया इसलिये बँगला का विकास इस तेजी से हो सका. हिन्दी के मामले में ऐसा नहीं है, इसलिए हिन्दी का विकास क्षेत्रीय से ज़्यादा राष्ट्रीय विकास के साथ जुडा हुआ माना जाना चाहिये. यह एक महत्त्वपूर्ण बात है कि जब आधुनिक हिन्दी का पूरा विकास नहीं हुआ था तब भी क्षेत्रीय की अपेक्षा राष्ट्रीय दृष्टि पर अधिक बल था. यह एक गौर करने वाली बात है कि बंगाल और महाराष्ट्र की स्थानीय भाषाई जातिवादी पहचान पर इसके नवजागरण में अधिक बल दिया गया था और इन इलाकों में राष्ट्रीय दृष्टि का विकास बाद में हुआ. महाराष्ट्र में ‘महाराष्ट्र धर्म’ पहले आया फिर बहुत बाद में भारत की चिंता आयी.[2] तुलना में हिन्दी प्रदेश में राष्ट्रीय दृष्टि पर बल शुरू से ही रहा. इस पर्चे में उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के शुरूआती दशकों में हिन्दी में इतिहास लेखन के कुछ पहलुओं पर विचार करने का प्रयास किया गया है.
भारत में इतिहास लेखन के सन्दर्भ में यह याद रखना जरूरी है कि इसका विकास दो स्तरों पर हुआ. यूरोप में विकसित ऐतिहासिक दृष्टि का उपयोग कर भारतीय समाज के अतीत को समझने की एक कोशिश के अंतर्गत जो इतिहास लिखा गया उसका एक हिस्सा स्कूली पाठ्यक्रम में पढाये जाने के कारण शिक्षितों के बीच मान्य हुआ. दूसरी ओर एक इतिहास ऐसा भी लिखा जाता रहा जो लोक भावनाओं को, समय की मांग को (जैसा इतिहास लेखक समझ पाये) ध्यान में रखकर शिक्षित समुदाय के सामने लाया जाता रहा. आज़ादी के बाद पहली श्रेणी के इतिहास को वैज्ञानिक, अकादमिक इतिहास के रूप में विकसित होने का अवसर मिला क्योंकि यही इतिहास स्कूलों, कालेजों, विश्वविद्यालयों और इतिहास अध्ययन के लिये सरकार पोषित संस्थाओं द्वारा विकसित किया गया. महत्त्वपूर्ण यह है कि सरकारी सहयोग न मिलने पर भी दूसरी धारा का प्रभाव भी कम होता दिखाई नहीं देता. भारत की देशी भाषाओं में इस तरह के लोकप्रिय इतिहास की एक लम्बी परम्परा रही है और यह भी माना जाना चाहिये कि भारत में जिसे वैज्ञानिक इतिहास कहा जाता है उसने लोकप्रिय साहित्य को पूरी तरह से अपदस्थ नहीं किया है. दोनों ही अपनी अपनी जगह पर कायम हैं. [3] इसमें यह कहने का प्रयास किया गया है कि हिन्दी में इतिहास लेखन की लोकप्रिय परम्परा के इतिहास पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है. हिन्दी समाज के इतिहास लेखन का कार्य अभी किया जाना बाकी है. जिस प्रकार हर भाषिक समाज के अपने गवैये, कवि, लेखक इत्यादि होते हैं वैसे ही हर समाज के अपने इतिहासकार भी होते हैं. हिन्दी समाज में जैसे जैसे आधुनिकता आयी यहां अपने समाज को समझने का, उसके इतिहास को लिखने का प्रयत्न भी हुआ, लेकिन इस क्रम में जो समाज शास्त्रीय समझ बनी वह अपने समाज की एक बाहरी समझ बन कर ही रह गयी. इस पर्चे में कुछ बिन्दुओं को उठाया गया है जिसके माध्यम से एक और हिन्दी समाज के इतिहास लेखन की चेष्टाओं का एक परिचय भी प्राप्त होता है और साथ ही उन तथ्यों की ओर संकेत भी होता है जिससे हिन्दी समाज के अपने इतिहास के स्वरूप और संभावना का पता चलता है. पता चलता है कि हिन्दी समाज का निजी इतिहास कैसा हो सकता था, हो सकता है. यह एक गंभीर विषय का एक व्यक्तिगत विश्लेषण है, जिसका उद्देश्य हिन्दी समाज के जातीय इतिहास की जटिलताओं को सामने रखना है.
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सर्वप्रथम यह कहना जरूरी है कि हिन्दी में सामाजिक सरोकारों पर गंभीरता पूर्वक विचार भारतेन्दु युग से ही होता रहा है. लेखकों पत्रकारों को यह चिंता लगातार रही कि समाज के अध्ययन के लिये हिन्दी में सामग्री उपलब्ध हो सके. हिन्दी प्रदेश में हिन्दी माध्यम से पढने वालों के बीच जो समाज विज्ञान की पुस्तकें प्रचलन में रहीं उन्हें ही आधार बनाना गलत होगा. पुस्तकें तो लिखी गयीं, उनका व्यापक प्रसार भी रहा लेकिन हिन्दी शिक्षित लोगों के बीच मान्य इतिहास की परंपरा के विश्लेषण के लिये पत्र पत्रिकाओं और पुस्तकों को भी आधार बनाना उचित होगा. जैसे बांग्ला में अपने इतिहास लेखन के लिये ईश्वरचन्द्र विद्यासागर और फिर बंकिमचन्द्र से लेकर रवीन्द्रनाथ तक सभी बडे लेखकों ने अपनी भाषा को ही माध्यम बनाया वैसा प्रयास हिन्दी में भी था. कलकत्ता के प्रबुद्ध बंगाली अपनी जातीय परम्परा के प्रति गौरव बोध के लिये इतिहास के महत्त्व को शुरू से ही समझते थे. बंकिमचन्द्र ने बांग्ला के लेखकों को इतिहास लिखने की प्रेरणा दी और यह भी बतलाया कि जब तक इस देश के लोग अपना इतिहास खुद नहीं लिखेंगे उनमें हीन भावना बनी रहेगी. खास तौर से उन्होनें शिवनाथ शास्त्री को इस देश का इतिहास लिखने के लिये उपयुक्त माना था. बंकिमचन्द्र ने उस समय उपलब्ध अंग्रेज़ों द्वारा लिखे इतिहासों की तीखी आलोचना इन शब्दों में की है- “ इन ग्रंथों से बंगाल का इतिहास नहीं जाना जा सकता और यदि कोई इस इतिहास को बंगाल का इतिहास कहता है तो वह बंगाली नहीं है.” [4]
बांग्ला नवजागरण के पुरोधाओं की तरह हिन्दी नवजागरण के प्रमुख स्वरों- राजा शिवप्रसाद, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, केशवराम भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र इत्यादि भी भारतीयों को अपना इतिहास लिखने के लिये प्रेरित करते हैं. लेकिन जिस तरह बांग्ला में इतिहास की बहुत सारी पुस्तकें लिखी गयीं हिन्दी में वैसा नहीं हो सका. उसके कई कारण थे. एक कारण यह भी था कि कलकत्ता में बांग्ला में इतिहास लिखने की शुरूआत बहुत पहले हो चुकी थी. सबसे पहले 1808 में फोर्ट विलियम कालेज के मृत्युंजय विद्यालंकार ने राजावली लिखी. यह एक पौराणिक इतिहास पुस्तक थी. [5] लगभग आधी शताब्दी बाद दूसरी तरह का इतिहास –युक्ति-सम्मत (रैशनल) लिखा जाने लगा.[6] भारत में विश्वविद्यालयों के आने के बाद नये प्रकार के इतिहास की ज़रूरत हुई. इस दौर में जे. सी. मार्शमैन की पुस्तक –हिस्ट्री आव बेंगाल का अनुवाद ईश्वर चन्द्र विद्यासागर और रामगति न्यायरत्न ने किया. इस बीच जेम्स मिल की हिस्ट्री आव ब्रिटिश इंडिया (1817) और एलफिंस्टन की हिस्ट्री आव इंडिया (1841) अंग्रेज़ी पुस्तकें आयीं. 1857 के बाद अनेक इतिहास पुस्तकें बांग्ला में प्रकाशित हुईं. उनमें प्रमुख हैं- भूदेव मुखोपाध्याय की पाठ्य पुस्तक के रूप में लिखित पुरातत्त्व सार, बांग्लार इतिहास, इंग्लैंडेर इतिहास, रोमेर इतिहास, और स्वप्नालब्ध भारतेर इतिहास , कृष्णचन्द्र राय की भारतवर्षेर इतिहास (इसका नवां संस्करण 1870 में आया), क्षेत्रनाथ बंद्योपाध्याय की शिशु पाठ बांग्लार इतिहास् (1872), क्षिरोद चन्द्र रायचौधरी की समग्र भारतेर संक्षिप्त इतिहास् (1876), भोलानाथ चक्रवर्ती की से एक दिन आर ऐई एक दिन अर्थात बंगेर पूर्ब ओ बर्तमान अबस्था (1876) , जीबन कृष्ण चट्टोपाध्याय की भारतवर्षेर पुराबृत्त् (पांचवां संस्करण, 1875) आदि. स्पष्ट है कि ये पाठ्य पुस्तकें उस समय ही प्रचलित उन इतिहासों से भिन्न थीं जिसे रजनीकांत गुप्त जैसे लोग लिख रहे थे. इस दौर में ऐतिहासिक कहानियों का सिलसिला टाड की पुस्तक के आने के बाद और बंकिमचन्द्र के उपन्यासों के लोकप्रिय होने के साथ शुरू हुआ. इस तरह के इतिहास लेखन में कुछ उल्लेखनीय प्रकाशनों के रूप में आर्य कीर्ति, वीर महिला और सिपाही युद्धेर इतिहास (पाँच भाग), चण्डीचरण सेन की झांसीर रानी, महाराजा नन्द कुमार से लेकर नगेन्द्र नाथ गुप्त की अमर सिंह और सखाराम देउस्कर कीबाजी राव , आदि का उल्लेख उचित होगा जो इतिहास की एक समझ पाठकों को दे रहे थे. बांग्ला के कई बडे लेखकों, जिनमें गिरीश घोष, द्विजेन्द्रलाल मित्र, रवीन्द्रनाथ ठाकुर इत्यादि शामिल थे, ने भी अपने अपने तरीके से का इतिहास को पाठकों के सामने रखा. इस दौर की एक खास बात यह भी है कि आधुनिक भारतीय भाषाओं के बीच काफी लेनदेन था. मराठी, हिन्दी और बांग्ला के लेखकों के बीच इस लेन देन से उन्नीसवीं सदी का भारतीय बौद्धिक समृद्ध हुआ.
हिन्दी में इतिहास लिखने की शुरूआत इतिहासतिमिर नाशक से हुई. इसके कुल तीन खंड आये- पहला 1864 में छपा था और तीसरा 1873 में. यह एक महत्त्वपूर्ण प्रयास था जिससे हिन्दी में एक नये ढंग का इतिहासलेखन शुरू हुआ जो अंग्रेज़ों की इतिहासदृष्टि के अनुरूप था. शिवप्रसाद की दृष्टि हिन्दी में नई थी. इसमें पहली बार इतिहास को पुराण से अलगाया गया और औपनिवेशिक आधुनिक इतिहास लेखन की नींव डाली. यह नयी दृष्टि लिखित साक्ष्यों के आधार को ज़्यादा महत्त्व देती थी और इतिहास की प्रगतिशील व्याख्या करती थी जिसके अनुसार इतिहास तीन कालखंडों- प्राचीन, मध्ययुगीन और आधुनिक, में बँटा हुआ था. इस दृष्टि से मध्ययुग अंधकार युग था और भारत को मुसलमानों के शासन के अँधियारे से उजाले की और लाने का श्रेय अंग्रेज़ों को दिया जाता था. उस समय इसी तरह की इतिहासदृष्टि का प्रचार पाठ्य पुस्तकों के माध्यम से किया जाता था. इतिहासतिमिर नाशक में शिवप्रसाद ने लिखा कि “ हम तो अपने देश का इतिहास लिखते हैं जिसका प्रमाण आज तक मौजूद है.” [7] कुछ विद्वानों के अनुसार इस इतिहास दृष्टि से “ पुनरूत्थानवाद की जमीन खिसकती थी’’ [8], लेकिन कुल मिलाकर शिवप्रसाद वही कह रहे थे जो उस समय के अन्य पाठ्य पुस्तकों के लेखक कह रहे थे. मुसलमानों के शासन के बारे में हिन्दी के प्रथम इतिहास लेखक की राय भी वही थी जो उस समय एशियाटिक सोसाईटी के विद्वानों से लेकर 1857 के बाद के वर्षों के पाठ्य पुस्तक लेखकों की थी. इस पुस्तक में शिवप्रसाद एक जगह लिखते हैं- “ मुसलमानों ने इस देश को उसी हालत में दबा रखा और यूरोप और अमेरिका को वहां के बुद्धिबल ने कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया.... मुसलमान जहाँ गए, यही हाल हुआ. इनकी अमलदारी में कोई देश उन्नति की सीढी पर नहीं चढा.” [9] मुसलमानों के प्रति उनके विचार थे कि “ये हिन्दुओं का नाश करना और उनके मूर्ति मंदिरों को तोडना तो यह बड़ा धर्म समझते हैं.”[10] लेकिन उनके लिखने का तरीका कुछ ऐसा था कि पारंपरिक हिन्दुओं को इस इतिहास पुस्तक का विरोध करना ज़रूरी लगा. शूद्रों पर लगी बंदिशों पर लिखते हुए शिवप्रसाद ने लिखा- “ यह काठ की हाण्डी कब तक गर्म हो सकती थी? शूद्रों में होशियारी आई और थोडे से ब्राह्मणों के सुख चैन और मज़ा उडाने के लिये सारी प्रजा अथवा शूद्रों का गुलामी में पडे रहना असह्य हुआ. दस्तूर है कि जिस नियम की नेंव थोडों के फाइदे के लिये बहुतों के नुकसान पर रहती है, कदापि चिर स्थाई नहीं होती.” [11]
प्रभाव की दृष्टि से इतिहासतिमिरनाशक का महत्त्व बहुत अधिक है. हिन्दी प्रदेश के स्कूलों में इतिहास कई दशकों बाद भी उसी रूप में पढाये जाते रहे जैसे शिवप्रसाद जी ने उसे प्रस्तुत किया. उन्होंने न सिर्फ इतिहास बल्कि अन्य विषयों की पाठ्य पुस्तकों को तैयार करने का काम किया जिसमें से हिन्दी पाठ्य क्रम के लिये तैयार किया गयी पुस्तक वीर सिंह वृत्तांत का महत्त्व इतिहास लेखन के संदर्भ में भी होना चाहिये. साहित्य और इतिहास के बीच आवाजाही का वातावरण तैयार करने में इन शुरूआती पुस्तकों ने बडी भूमिका निभाई.
इसके बाद हिन्दी में लिखे गये इतिहासों में उल्लेखनीय हैं- केशवराम भट्ट की हिन्दोस्तान का इतिहास, शिवनन्दन सहाय का भारतवर्ष का इतिहास, बंगाल का इतिहास, दीनदयाल सिंह का भारतवर्षीय इतिहास (1890), गोकर्ण सिंह का भारत वर्ष का समस्त इतिहास (1899), उमानाथ मिश्र का हिन्दुस्तान का इतिहास प्रथम भाग, सरयूप्रसाद मिश्र का नेपाल का प्राचीन इतिहास ( 1909), इत्यादि. समय समय पर कुछ अन्य प्रकाशन भी हुए जिनसे हिन्दी पढे लिखे लोग इतिहास के बारे में जान सके. उन्नीसवी सदी में भी हिन्दी में कुछ ऐसी पुस्तकों का प्रकाशन हुआ था जिसे देखकर सुखद आश्च्रर्य होता है. ऐसी ही एक पुस्तक है - बादशाह अकबर का संक्षिप्त जीवन चरित्र् जिसे किसी डा. ब्राउअर साहब ने लिखा था. हिन्दी में उपन्यास रूप में प्रकाशित इस पुस्तक की भूमिका से पता चलता है कि इसे सर्वप्रथम 1872 ई. में हालैण्ड के हेग शहर में डच भाषा में प्रकाशित किया गया था. सन 1877 में इसका अनुवाद जर्मन भाषा में किया गया इस पुस्तक के प्रकाशन वर्ष के बारे में निश्चित जानकारी मुझे नहीं मिली है, लेकिन टाइप फान्ट एवं एक जगह पुस्तक में आये संकेत के आधार पर लगता है यह पुस्तक 1892 के आसपास प्रकाशित हुई थी. इस पुस्तक के प्रथम भाग की एक प्रति ही उपलब्ध है. इस पुस्तक में अकबर को एक महान भारतीय शासक के रूप में चित्रित किया गया है.
हिन्दी में कुछ ऐसी इतिहास पुस्तकें प्रकाशित हुईं जो शायद ब्रिटिश शासन को खुश करने के उद्देश्य से लिखी और प्रकाशित की गयी थीं. इस तरह की पुस्तकों में पं. लज्जाराम शर्मा की लिखी विक्टोरिया का चरित्र का उल्लेख किया जा सकता है जिसे 1901 में श्री वैंकटेश्वर प्रेस से प्रकाशित किया गया था. यह हिन्दी का सौभाग्य था कि उसे ऐसे कर्मठ लेखक संपादक मिले हुए थे जिन्होंने बांग्ला, मराठी भाषाओं में छपने वाली इतिहास पुस्तकों को हिन्दी पाठकों तक पहुंचाने का बीडा उठा रखा था. रोमेश चन्द्र दत्त की पुस्तक शिवाजी विजय का अनुवाद बलदेव मिश्र ने किया और उसे वेंकटेश्वर प्रेस ने 1901 में प्रकाशित किया. राजा राममोहन राय की एक जीवनी यदुनन्दन प्रसाद मिश्र ने 1917 में लिखी. साथ ही समय समय पर जीवनी कोषों का प्रकाशन भी होता रहा जिसमें महान लोगों की जीवनियां छपती थी. इन जीवनी कोषों में एक मदन कोष था जिसे इटावा के मदनलाल तिवारी ने 1907 में लिखकर तैयार किया था. उस समय के हिन्दी बौद्धिकों की भारतीय इतिहास के प्रति दृष्टि को समझने के लिये यह एक अमूल्य पुस्तक है जिसमें एक हज़ार इतिहास पुरूषों की जीवनियां तैयार की गयी हैं.
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1919 में वनिता विलास पुस्तक लिखी जिसमें न केवल महान भारतीय स्त्रियों में लक्ष्मी बाई को शामिल किया गया बल्कि लक्ष्मीबाई पर पारसनीस की लिखी पुस्तक को प्रामाणिक इतिहास माना और उनकी वीरता की प्रशंसा की. सामान्यत: लक्ष्मी बाई के प्रसंग में महावीर प्रसाद द्विवेदी सरस्वती में की गयी अवमाननामूलक टिप्पणियों के कारण याद किया जाता है लेकिन यह पुस्तक लक्ष्मीबाई के लिये इन प्रशंसापूर्ण शब्दों का प्रयोग करती है- “ महाशौर्यशाली दिव्य स्त्री रत्न” जिस जैसी " वीर नारी इस देश में तो क्या अन्य देश में भी शायद ही हुई होगी.”[12]
इन पुस्तकों में से अधिकतर इतिहास पुस्तकों में जो इतिहास प्रस्तुत हुआ उसमें आधुनिक इतिहासबोध और हिन्दूवादी सोच का एक घालमेल था. बहुत बडे विद्वानों ने भी जब इतिहास लिखा तो पुरानी सोच को पूरी तरह बदलने की कोशिश नहीं की. हिन्दूवादी संगठनों ने अपनी तरह का इतिहास लिखा जिसके अध्याय कुछ इस तरह के होते थे- भारत और ब्रह्मांड, विश्वगुरू के रूप में भारत, भारतद्वीप का सामाजिक गठन, वेद और शास्त्रों की शाश्वतता, भारतद्वीप का ज्ञान और शौर्य इत्यादि.[13] इस तरह के हिन्दूवादी इतिहास की पुस्तकों का प्रभाव सिर्फ हिन्दूवादी संगठनों तक सीमित नहीं था. 1939 में छपी इतिहास पुस्तक के अध्यायों पर ध्यान दें- त्रेता युग (सूर्य वंश), त्रेता युग (पौर्य , त्रेता युग (चन्द्र वंश की शाखाएं), त्रेता युग (भगवान रामचन्द्र, द्वापर युग (प्रथम भाग), द्वापर युग (महाभारत), कलियुग इत्यादि.[14] इस प्रकार के इतिहास विद्वानों के इतिहास में भी आ जाते थे- “ रामायण के समय में मगध में मारीच, सुबाहु, ताडका आदि राक्षसियों का निवास था.” [15] अपने समय के महान विद्वान भी यह लिखते हैं- “ पृथ्वीराज के मरने पर कैसी करूण दशा भारतवर्ष की हुई उसे लिखने की सामर्थ्य लेखनी में नहीं है.’’ [16] बिहार में 1921 में स्कूलों में पं. रामदहिन मिश्र की इतिहास की जो किताब पढाई जाती थी उसे रामावतार शर्मा ने संशोधित किया था. इस पुस्तक में भी जो अध्याय थे वे हिन्दूवादी दृष्टिकोण के निकट था जिसमें मुसलमान शासकों के अत्याचार पर ध्यान केन्द्रित किया गया था. [17]
स्कूलों में पढाए जाने वाले इतिहास के अलावा जो इतिहास हिन्दी प्रदेश में सामने आया वह जातिवादी (कास्टिस्ट) और सामुदायिक और क्षेत्रीय इतिहास अधिक था आधुनिक इतिहास कम. इन आरंभिक इतिहास पुस्तकों की प्रकृति के बारे में कहा जा सकता है कि एक दो अपवादों को छोडकर इन पुस्तकों ने जातिवादी (कास्टिस्ट) स्मृति, धार्मिक सामूहिक चेतना, पारंपरिक सोच (जैसे ज्योतिष की सत्यता में विश्वास) जैसी चीज़ों का सहारा भी लिया और जगह जगह पर उस समय के अंग्रेज़ी इतिहासकारों की धारणाओं को स्वीकार भी किया. इन इतिहास पुस्तकों के बारे में यह भी कहना चाहिये कि ये उन लोगों द्वारा लिखे गये थे जो स्वय़ं इतिहासकार नहीं थे. वे घटनाओं के वर्णन इस तरह करते थे कि हिन्दू राजाओं की पराजय भी उनके नैतिक विजय के रूप में उभरे( जैसे सिकंदर और पोरस का प्रसंग). इन इतिहासकारों के लिये वर्तमान सदैव उपस्थित रहता था. वे प्राय: इस तरह की चीज़ें लिखते कि अगर ऐसा न होता तो आज हमारी इतनी खराब अवस्था न होती, तब आज की तरह हम बँटे हुए नहीं थे, तब हिन्दुओं में एका था इत्यादि. दरअसल, सुदीप्त कविराज की यह बात सटीक है कि ये इतिहास लेखक इतिहास नहीं लिख रहे थे, बल्कि एक विचारधारा का निर्माण कर रहे थे और इतिहासलेखन इसमें सहायक था.[18] जिस हद तक ये विचारधारा निर्माण में सहायक था उसे स्वीकार किया गया और जहां ज़रूरी लगा एक नयी विधा- ऐतिहासिक कहानियां का सहारा लिया गया. कई बार अपनी बात को इतिहास में लाने के लिये लेखक स्वप्न देखने लगता है जहां कल्पना का सहारा अधिक लिया जा सके. इस तरह के स्वप्नों का सिलसिला बंगाल के भूदेव मुखोपाध्याय के ‘ स्वप्नालब्ध भारतेर इतिहास’ से शुरू होकर राधाचरण गोस्वामी, अंबिकादत्त व्यास इत्यादि लेखकों में अधिक से अधिक कल्पनाशील हुआ. यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि हिन्दी में ऐतिहासिक कहानियों को इतिहास से ज़्यादा पाठक मिले. हिन्दी समाज का एक सच यह है कि इतिहास का पाठ यहां इतिहासकारों से कम साहित्यकारों ने ज़्यादा तैयार किया.
हिन्दी प्रदेश में इतिहासलेखन को सामने रखने के लिये कुछ प्रसंगों को सामने रखना युक्तिसंगत होगा. उर्दू में इतिहास की तीन पुस्तकें उन्नीसवीं सदी के अंत में लिखी गयी- शाद अज़ीमाबादी की तवारीख- ए- सूबा बिहार (1870), बिहारीलाल फितरत की आईना-ए- तिरहुत (1883) और मुंशी बिनायक प्रसाद की तवारीख-ए- उज्जैनिया (जिसे 1883से लिखना शुरू किया गया). इन पुस्तकों के लिखने की प्रक्रिया हमें इस बात का संकेत देती हैं कि इतिहास लिखने की प्रक्रिया सरकारी और अन्य स्तरों पर किस प्रकार भिन्न थी. डुमरांव के राजा राधाप्रसाद सिंह ने अपने समुदाय के इतिहास लिखने के लिये मुंशी बिनायक प्रसाद को दायित्व सौंपा. वे कैसा इतिहास लिखें इसपर सुझाव लेने के लिये बाहर के प्रसिद्ध विद्वानों को डुमरांव बुलाया गया. इन आमंत्रित लोगों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र भी थे. मुंशी बिनायक प्रसाद ने लिखा है कि भारतेन्दु ने लोक- इतिहास(ओरल) पर बल देने का सुझाव दिया और अठारह सुझाव दिये. इनमें कहा गया कि विभिन्न इलाकों का इतिहास लिखना चाहिये, गांव गांव जाकर तथ्य इकट्ठे करने चाहिये, विभिन्न मन्दिरों, भवनों में जाकर शिलालेखों का अध्ययन , तालाबों, उद्यानों आदि के निर्माण संबंधी जानकारियों के उपयोग का सुझाव दिया गया था. भारतेन्दु ने जो कुछ कहा वह कई दशकों बाद राहुल सांकृत्यायन की बातों का पूर्वानुमान करती हैं. वे सुझाव देते हैं कि हर गांव के संस्थापक के बारे में जानकारी हासिल करना चाहिये, स्थानीय अर्थव्यवस्था, कृषि उत्पादन, शिल्प-वाणिज्य की बातों पर ध्यान देना चाहिये और इतिहासकार का ध्यान उज्जैनियां वंश की शौर्यगाथा, जय-पराजय के बजाय लोक जीवन के इतिहास पर होना चाहिये. वे कहते हैं कि इतिहास के लिये सरकारी दस्तावेजों के अलावा बहुत सारे लिखित स्रोत इतिहासकारों को गावों में मिलेंगे जिनके आधार पर स्थानीय इतिहास लिखना सहज और प्रामाणिक होगा. बिनायक प्रसाद ने भारतेन्दु के सुझावों पर ध्यान दिया.[19]
यहां रूककर इस बात पर ध्यान दिलाना उचित होगा कि उन्नसवीं सदी के हिन्दी भाषी इलाकों के वैचारिक इतिहास पर कम ध्यान दिया गया है. सामान्यत: हिन्दी की बात चलने पर जो उदाहरण दिये जाते हैं वे उत्तर प्रदेश से संबंधित होते हैं. जानबूझ कर इस पर्चे में अधिकतर उदाहरण बिहार से दिये गये हैं ताकि हिन्दी क्षेत्र की समझ को थोडा बढाया जाये. उदाहरण के तौर पर इसे देखें. भारतेन्दु के बलिया भाषण से सबलोग परिचित हैं. उसके पहले के एक सज्जन की कुछ बातों पर गौर किया जाये. ये सज्जन -शहामत अली खां जिला सारन के मांझी गांव के रहने वाले थे. उनके भाषण का एक हवाला उनके बारे में लिखते हुए 1882 में इस रूप में आया है- “सुनो भाई तुम लोगों का हाल देखकर मुझे बहुत खेदित होना पडता है कि उस दुष्ट शत्रु की जिसने हमारे अधिकार छिनवाये , हमको दीन दशा में पहुंचा दिया. हमारे लाखों करोडों बान्धव के सिर सेंत मेंत कटवाये हमारे गांव गांव भिक्षाटन करवाया, और अनेक भांति से हमको नष्ट करवाया और अनेक भांति से हमको नष्ट कर डाला, और कर रहा है, और करता ही जायेगा उसे निकाल डालने के बदले सब लोग अंत: करण में स्थान दिये हुए हैं . आश्च्रर्य है कि उसके फल को छोटे छोटे लडके , और स्त्रियां तक भली भांति जानते हैं , पर उसने कोई ऐसा मंत्र सीख लिया है कि उसे सब अपना परम मित्र और नित का साथी समझते हैं.” [20]
संभव है कि जब यह लिखा गया है, यानि 1882 में, उस समय की बातों को लेखक ने शहामत अली खां के हवाले से कहने का प्रयास किया हो. वैसी स्थिति में भी इस बात को ध्यान से देखना चाहिये कि हिन्दी का एक लेखक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के बलिया भाषण के पहले समाज के कुछ मुद्दों को कैसे अपनी भाषा में व्यक्त कर रहा है- “ इस दिनों संस्कृत और फारसी पर जहां तहां छेड छाड हो रही है, और हिन्दू और मुसलमान अपने अपने पक्ष पर जी खोल खोल कर लड रहे हैं, पर हमको अब तक इसका कुछ लाभ नहीं देख पडता . न फारसी के होने से मुसलमानों की वह दशा जो सिकन्दर लौदी और औरंगजेब आदि बादशाहों के अधिकार में थी हो जायेगी, और न संस्कृत होने से हिन्दुओं का परलोक सुधरेगा वा राम, कृष्ण और विक्रमादित्य , भोज आदि का सा स्वाधीन राज पलट आवेगा... हा ! देश हितैषी ( हिन्दु और मुसलमान) जनों का न्याय भी इस विषय में पक्ष रहित नहीं जान पडता दूसरे को कौन कहे? हम सब हिन्दू और मुसलमान न्यायाधीश और विद्वानों और धनाढ्य महाशयों से यह पूछते हैं कि क्या यह समय ऐसा है कि आप लोग देशपरोपकारादि और आपस में मेलजोल बढाने के विरूद्ध जो हजारों वर्ष से परस्पर चला आता है और जिससे असंख्य लाभ हो सकते हैं ऐसी झूठी लड़ाई में काल व्यतीत करें ? क्या आपके वे दिन वर्तमान हैं कि जैसे चाहिये पक्ष को निबाह दीजियेगा ? कभी नहीं फिर क्यों अपने ही हाथों से अपने पाँव में कुल्हाडी मारते हैं ? ... इसमें कुछ सन्देह नहीं कि मुसलमानों ने अपने अधिकार में अत्याचार कर हिन्दुओं को बहुत सताया है . पर क्या हो ? वह समय ही वैसा था ? ... यह भी ठीक है कि अब तक ये लोग कोई प्रत्यक्ष गोबध आदि कर हिन्दुओं को कुढाना ही अच्छा समझते हैं . पर इसका फल क्या होता है . लड़ाई झगडा करके दो चार वा दश पाँच को मारें वा मारे जायें , जुर्माना दें , कैद हों , और फांसी पडें, देशांतर में भेजे जायें... फिर उत्तम उपाय क्या है? यह उपाय है कि जब हम और वे दोनों भली भांति जानते हैं कि अब दोनों में कोई स्वाधीन नहीं रह गया , जो वज्र हृदय एक को हानि पहुंचाकर आप बडे बनने के अभिलाषी थे , मिट्टी में गल पच गये वह समय ‘गया वक्त फिर हाथ आता नहीं ‘ कोसों पीछे छूट गया और हजारों वर्ष ये दोनों का इकट्ठे रहकर परस्पर घी और दूध की भांति मिलजुल कर सहोदर भाईयों से अधिक हो गये, तो एक वर्ग की हानि को अपनी हानि और लाभ को अपना लाभ समझ कर आपुस में ऐसा कायम कर लें कि कोई किसी को बुरा न समझे यदि अपनी क्रूर प्रकृति से ऐसा न करने दे , और हठधर्मी और अनैक्य का छोडना ही मत के विरूद्ध समझा जाए तो दोनो को समझाने , और सीधे ढर्रे पर पहुंचाने वाली गवर्नमेंट तो है ही.” [21]
हिन्दी के उन्नीसवीं शताब्दी के समाजशास्त्रीय लेखन की जो एक अकादमिक समझ हमारे पास उपलब्ध है वह एक सीमित समझ है. वह बीसवीं शताब्दी के आधुनिक बोध के स्वीकार किए जाने के पूर्व के समय की विशिष्टता को अब तक ठीक से विश्लेषित करने में समर्थ नहीं हुई है. धर्म, जाति, स्त्री पुरूष सम्बन्ध, समाज, देश-विदेश सब चीजों को उस तरह से नहीं समझती थी जिस तरह से 1920 के बाद समझे जाने का रिवाज हुआ. हालांकि हिन्दी में भी ऐसे लेखन हुए हैं जिन्हें आज की भाषा में ‘समय से आगे की सोच’ के रूप में चिह्नित किया जा सकता है. 1889 में हिन्दी प्रदीप के एक लेख पर ध्यान दें- “ जैसा बेहूदा तरीका बिरादरी का इस समय प्रचलित है उस्से कभी आशा नहीं की जा सक्ती कि जाति पांति के सत्यानाश बिना हुए उन्नति की हजार हजार चेष्टा करने पर भी हमारी या हमारे देश की कभी तरक्की होगी. स्वाधीनता की नाक काटने वाली इस जाति पांति की कुरीति देख यही मन में आता है कि हे परमेश्वर हमने कौन सा पाप किया था जिसका फल भोगने को ऐसी कुलच्छनी समाज में तूने हमें पैदा कर दिया.” ऐसा लिखकर लेखक ने ईश्वर से प्रार्थना की कि “ अब दूसरा जन्म कुदेश में या सहारा के रेगिस्तान में हो . पर इस भारत सरीखी पाप भूमि में हम कभी न जन्में.” [22]
हिन्दी के शुरूआती दौर के सामाजिक लेखन में, इतिहास लेखन में आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि और परम्परा की सामाजिक स्मृति का एक मिश्रण देखा जा सकता है. स्मृतिमूलक आधार स्रोतों और इतिहास लेखन के बीच एक खींचतान जारी थी.[23] लिखित इतिहास की सत्ता का वर्चस्व नहीं था और जो लोग इतिहास लिखते थे उनके लिये वर्तमान समाज की बेहतरी के लिये सोचना ही महत्त्वपूर्ण था. इस पर भी थोडी गम्भीरता से विचार करना होगा. ऐसा नहीं है कि हिन्दी के लेखक समाज में हो रही प्रगति के चरित्र के प्रति सचेत नहीं हैं. अक्तूबर 1893 में हिन्दी के एक प्रतिष्ठत पत्र में एक लेख छपा- ‘यह उन्नति है या अवनति’ जिसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं- “ आज घर में हाहाकर मच रहा है, प्रजा अन्न के कष्ट से भूखों मर रही है , जिसे देखो विषाद बदन ही पाओगे. किसी के मुख पर हंसी नहीं है तब क्या इसी का नाम उन्नति है? बाहर जैसा दिखाई पडता था अब भी ज्यों का त्यों दिखाई पडता है, परंतु जिस भाव के विकास में भारत वासियों का गौरव था उस पर आज भावान्तर हो गया है. जिस शक्ति की वृद्धि से मनुष्य का मनुषत्व बढता है आज समग्र भारत संतान उस शक्ति से विहीन है! केवल स्वार्थ ही की ओर सब की दृष्टि है केवल स्वार्थ के लिये सबों ने जातीय स्नेह और ममता को छोड दिया है. भारत संतान आज मरकत की त्याग करके काच संग्रह करने की अनुरागी हो रही है. भले बुरे का विचार न करके जिधर मन में आता है उसी मार्ग का अनुसरण करती जाती है पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव प्रति दिवस बढता जाता है माता पिता के साथ अब भारत वासियों का वह सद्भाव नहीं रहा आहार व्यवहार की सब रीतें बदलकर कुछ से कुछ हो गयी हैं, जिस देशवासियों का परिवार पालन मुख्य धर्म था , जो अतिथि विमुख जाने पर अनिष्ट की आशंका करते थे आज उसी देश के वासी आत्माभिमानी होटल जाते हैं क्या यह उन्नति है?
यद्यपि पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव से हमलोग ... और ज्ञानोन्नति करते जाते हैं पर जिस प्रकार से हमारे पूर्व पुरूष काल व्यतीत करके समाज में गण्य मान्य समझे गये थे, और विज्ञान में उन्होंने उन्नति लाभ की थी उसका अणु मात्र भी भाव दिखाई नहीं पडता. वर्तमान में बहुतेरे भारत कुलांगार ऎसे भी हैं जो अपनी जन्मदायिनी गर्भधारिणी माता को पिता की स्त्री कह कर पुकारते हैं और उस हेतु उपेक्षा भी करते जाते हैं. दरिद्र होकर भी प्रतिदिन विलास के दास होटल जाते हैं , हमलोग जितना आधुनिक उन्नति सोपान पर चढते जाते हैं उतनी ही ऎहिक भोग विलासों की दुर्भावना बढती जाती है. हमारे पूर्वज एक सामान्य उपाय के सहारे दश मनुष्यों का भरण पोषण करने में समर्थ थे किंतु हम शिक्षाभिमानी उनकी उपेक्षा प्रचुर धनउपार्जन करके भी दश जनों का पालन करना तो दूर रहा किंतु अपना भी पेट सुखपूर्वक नहीं भर सकते और न अपनी प्रतिदिन उपयोगी की और आवश्यकताओं को दूर कर सकते हैं. तो भी हमारी वेशभूषा और भोग विलासपयोगी पदार्थों की आवश्यकता अभी तक चरम सीमा को नहीं पहुंची.” [24]
यहां तक जो कुछ कहा गया है उसे परम्परावादी लोगों के उद्गार के रूप में देखने वालों के लिये आगे के वक्तव्य चौंकाने वाले हैं- “ अंगरेज सौदागर विलायत से अप्रयोजनीय और सुखकर सी दीखने वाली नई नई चीजें हमलोगों के विलास के लिये लाये जाते हैं और हमारा क्लेश संचित द्र्व्य इंग्लैंड को ले जा रहे हैं जिन सब वस्तुओं की कोई आवश्यकता नहीं है और न उनका ग्रासाच्छादन से कोई सम्बन्ध है तो भी न मालूम कि किस मोहिनी शक्ति के प्रभाव से हम अपना असंख्य धन व्यय करके भी खरीदते जाते हैं, परंतु यह अनुमान कर सकते हैं कि यह रूचि भेद ही हमारे अनिष्ट का मूल है जो हो यह संसार की बातें थी इन्हें जाने दीजिये किंतु आजकल हमलोगों की एक इच्छा और भी बलवती होती जाती है वह यही है कि चाहे जितना ही रूपया क्यों न फूंक दिया जाये किंतु समाज में मानरक्षा अवश्य करनी चाहिये. परंतु सच पूछिये तो हमें इस बात से कुछ भी अभिज्ञता प्राप्त नहीं हुई , कि मान किस में रहता है बस इसीलिये हम अपना सर्वस्व स्वाहा कर रहे हैं और अनेक बार अविमृष्यता के कारण हमें पछताना भी पडता है ...’’ [25]
इस लेख के अंत में कहा गया है- “ हमारा समाज इन दिनों जिस अवनति के स्रोत में बह रहा है जिस पाश्चात्य सभ्यता के वशीभूत होकर समस्त भारत संतान जर्जरित हो गई है...हमारा समाजबंधन शिथिल हो गया है, दूसरे जातीय प्रेम में हमारी अरूचि हो गई तीसरे शिक्षाभिमानी अंगरेजों का दौर्दड प्रताप हमें उठने ही नहीं देता ... अंगरेजी राज की शिक्षा के कारण बिलायत जात द्र्ब्यों में स्परहा ही नहीं बढती जाती है किंतु उनके भरोसे हम अपना सर्वस्व छोड बैठे हैं. यदि बिलायत से दियासलाई की आमदनी न हो तो दीपक जलाना कठिन पड जाता है, गर्मी और जाडों के कपडे यदि विदेश से न आवें तो नंगा रहना पडे. पिल्स और मिक्सचर यदि अमेरिका और इंग्लैण्ड के डाक्टरों के बनाये न हों तो बीमारी को आराम न पहुंचे... अपने देशजात द्र्ब्यों को हम घृणा कर छोड ही बैठे...हममें अब स्वजाति प्रेम नहीं रहा, इसी से इतना शोचनीय दशा हो रही है, नहीं तो देशीय कारीगर उत्साहहीन होकर अपना व्यापार छोडकर क्यों दूसरी दूसरी वृत्तियों का अवलम्बन करते विदेशी पदार्थों में जितनी हमारी अभिलाषा बढेगी , उतना ही समझना चाहिये कि हमलोग उन्नति के मूल में कुठाराघात करते चले जावेंगे!” [26]
1880 से लेकर 1920 के दशक तक के हिन्दी साहित्य और पत्र पत्रिकाओं में छपी सामग्री के आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि हिन्दी के लेखकों में एक वर्णाश्रमी रूझान था, लेकिन समाज चिंता की एक जो समझ वे बना रहे थे उसपर भी अवश्य ध्यान देना चाहिये. जिस भाषा में वे लिख रहे थे वह जनोन्मुखी थी, और वे चाह रहे थे कि लोगों में जागृति आये. जितनी बडी संख्या में लोगों ने इस समय हिन्दी में लिखा उससे हिन्दी बहुत समृद्ध हुई इसमें सन्देह नहीं. हिन्दी लोकप्रिय साहित्य की भाषा तो बनी ही ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में भी उसका विकास हुआ. बडी संख्या में अनुवाद हुए और लेखकों ने बगैर किसी सांस्थानिक सहयोग के देशी विदेशी साहित्य का अनुवाद किया, अन्य भारतीय भाषाओं- बांग्ला और मराठी के लेखन से हिन्दी पाठकों को जोडे रखा. यह विपुल साहित्य आज भी समीक्षकों को प्रेरित करता है. इस दौरान बहुत सारी ऐसी पुस्तकें छपी जो हिन्दी में समाज चिंता को प्रगट करती ही है, इस भाषा की अपनी चारित्रिक विशिष्टताओं को भी ध्यान में रखती है. लेखक के लिये पाठक की चिंता, उसका ज्ञान वर्द्धन, उसकी उन्नति, उसका मार्ग दर्शन बहुत महत्त्वमें किसी भी तरह के ज्ञान को रखने में उन्हें कोई असुविधा होती हो. वो बहुत सीधे तरीके से अपने पाठकों को संबोधित कर सकते थे. खड्गविलास प्रेस से लेकर वेंकटेश्वर प्रेस तक के असंख्य प्रकाशनों में यह देखा जा सकता है. उस समय के हिन्दी लेखकों की उदारता चकित करती है. जिस सहजता से वे अंग्रेज़ी, बांग्ला या मराठी साहित्य से चीज़ों को हिन्दी में ला रहे थे वह उनकी निष्ठा के साथ ही उनकी सांस्कृतिक उदात्तता का भी परिचायक है. 1854 के बाद से ही राजा शिवप्रसाद के प्रयास से हिन्दी में भूगोल, इतिहास, पदार्थ विज्ञान जैसे विषय़ों पर हिन्दी में पाठ्य पुस्तकें तैयार होने लगी थी. इन पुस्तकों और खासतौर से इतिहासतिमिरनाशक के कारण शिवप्रसाद का महत्त्व है. इस पुस्तक में हिन्दी और उर्दू को निकट लाने का प्रयास किया गया है. हर जगह एक सी भाषा नहीं है पर ज्यादातर जगहों पर बोलचाल की भाषा का प्रयोग है. “ हैदरअली से अंग्रेज़ो का जो सुलहनामा हुआ था, उसमें शर्त थी कि बचाव के लिये दोनो एक दूसरे की मदद करेंगे. लेकिन जब मरहठों ने हैदरअली पर चढाव किया तो अंगरेजों ने उसे कुछ भी मदद न दी. इस बात की उसके जी में बडी लाग थी. वह सन 1780 में एक लाख फौज लेकर चढ आया और अंग्रेज अमलदारी में हर तरफ लूट मचा दी.[27]
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हिन्दी में इतिहास लेखन में आये परिवर्तन –खासकर भाषा के स्तर पर- को भी देखना चाहिये. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 1874 में जिस तरह की हिन्दी का प्रयोग किया है उसमें बांग्ला का प्रभाव था: “ जिस प्रकार अमेरिका उपनिवेशित होकर स्वाधीन हुआ वैसे ही भारतवर्ष भी स्वाधीनता लाभ कर सकता है.” साथ ही वे भाषा में ऐसे कई प्रयोग कर रहे थे जिससे हिन्दी की भाषा थोडी कठिन होती थी. वीर भारत तलवार ने एक उदाहरण का उल्लेख किया है जिसके आधार पर वे कहते हैं कि अगर यह हिंदी है तो लोग इतिहास पढ़ना छोड देंगे.[28] हिन्दी समाज के बौद्धिक विकास की आंतरिक समझ न रखने वाला इस तरह के उदाहरण देकर सहज ही कह सकता है कि हिन्दी में इतिहास लेखन के अभाव का एक बड़ा कारण संस्कृतनिष्ठ भाषा के प्रति आग्रह रहा होगा पर यह सही नहीं है. पर, यह भारतेन्दु के लेख की भाषा का गलत पाठ है. न सिर्फ यह गलत रूप में उद्धृत है जहां “ वसय’’ को “वसथ’’ लिख दिया गया है बल्कि मूल लेख को पढने से कहीं नहीं लगता कि इसे कोई सामान्य हिन्दी जानने वाला समझ् न सकेगा. उसी लेख की सहज भाषा का एक नमूना देखिये: “ वापा भांडीर दुर्ग में भीलों के हाथ से पले थे. जिस भील ने वापा को पाला वह यदुवंशी थी. उस प्रदेश में भीलों की दो जाति हैं. एक उजले अर्थात शुद्ध भील वंश के दूसरे संकर भील. यह संकर भील से मिलकर उत्पन्न हुए हैं और पँवार, चौहान, रघुवंशी, जदुवंशी इत्यादि राजपूतों की जाति के नाम उन की जाति के भी होते हैं.” कुल मिलाकर लेख पूरी तरह से समझ में आनेवाला है.
उस दौर में इतिहास की जो पुस्तकें छपीं उसपर ध्यान दिया जाना चाहिये. इन पुस्तकों में जातिवादी, क्षेत्रीय इतिहास की झलक होती थी और आम पाठकों की जानकारी बढाने की कोशिश होती थी. हरिश्चन्द्र लिखित पुस्तकों को देखना भी यथेष्ट होगा. हरिश्चन्द्र ने अगरवालों की उत्पत्ति (1871), चरितावली ( 1871-80), पुरावृत्त-संग्रह् (1872-74), महाराष्ट्र देश का इतिहास ( 1875), उदय पुरोदय (1877), बूंदी का राजवंश, (1880 में लिखी गयी, 1882 में बांकीपुर से छपी), खत्रियों की उत्पत्ति (1873-78 में लिखित, 1883 में प्रकाशित), बादशाह दर्पण ( 1884), चित्तौरगढ ( 1890) इत्यादि इसी कोटि के हैं.
इन पुस्तकों के आने के बावजूद हिन्दी के बडे इतिहाश्रित उपन्यासों के लेखक क्षोभ प्रगट करते हैं कि “ हिन्दी में इतिहास का बिल्कुल अभाव है.” [29]किशोरी लाल गोस्वामी हिन्दी में “वैसा ही कुछ करना चाहते हैं जैसा अंग्रेज़ी में वाल्टर स्काट ...या फिर भारतीय भाषाओं में बंकिमचन्द्र और हरिनारायण आप्टे कर चुके थे. [30]हिन्दी में जब ये इतिहास आने लगे थे हिन्दी लेखकों ने बांग्ला में लोकप्रिय ऐतिहासिक उपन्यासों को हिन्दी में लोकप्रिय बना दिया. उन्नसवीं सदी के अंत से हिन्दी में ऐसे उपन्यासों की बाढ आ गयी . ये कहने को तो काल्पनिक उपन्यास हैं लेकिन इनके पाठक इन पुस्तकों को इतिहास की तरह पढते थे. बांग्ला के लेखकों की तरह हिन्दी के लेखक भी पाठकों में खासे लोकप्रिय थे. लेकिन इन पुस्तकों की आत्मा में हिन्दी समाज के अनुरूप नहीं थी. काशी प्रसाद जायसवाल ने 1899 में एक लेख लिखकर ठीक ही लक्षित किया था कि “ सम्प्रति हिन्दी में उपन्यासों की बडी भरती दीख पडती है. इनमें से अधिकांश बंग भाषा के अनुवाद हैं.... केवल नागरी अक्षरों से कोई उपन्यास ( या कोई पुस्तक) लिखे जाने से वह ‘हिन्दी उपन्यास’ या ‘हिन्दी पुस्तक’ नहीं कहा जा सकता.’’[31] ये बातें इस बात को स्पष्ट करती हैं कि हिन्दी लेखकों, इतिहास लेखकों के बीच एक अंतर उभरने लगा था. जायसवाल 1899 में नौजवान थे और बाद में एक प्रतिष्ठित इतिहासकार बने. वे इतिहास की विवेकसम्मत व्याख्या के हिमायती थे शुरू से वे इस बात से चिंतित थे कि हिन्दी ऐतिहासिक उपन्यासों में बांग्ला उपन्यासों का एक दोष कायम रहा- मुसलमान पात्रों को दुष्ट, अत्याचारी शोषक के रूप में चित्रित करना.[32] इसके बावजूद 1900 के बाद इस तरह के उपन्यासों की धूम मची रही. साथ ही बांग्ला के ऐतिहासिक उपन्यासों का बडी संख्या में अनुवाद किया गया और उन्हें चाव से पढा जाता रहा. शुरूआत बांग्ला उपन्यासों के अनुवाद से हुई लेकिन बाद में बांग्ला की इतिहासिश्रित पुस्तकें हिन्दी में बडी संख्या में छपने लगे. रजनीकांत की पुस्तक आर्य कीर्ति का हिन्दी अनुवाद भारतीय वीरता के रूप में वैद्यनाथ सहाय ने किया जिसमें कुंवर सिंह, लक्ष्मीबाई इत्यादि ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का गुणगान किया गया था. इस पुस्तक को 1923 में छापा गया जिसे हिन्दी समाज ने चाव से पढा. इस पुस्तक में प्रकाशक की ओर से आया वक्तव्य हिन्दी में आये राष्ट्रीय रुझान को रेखांकित करता है. गदर पार्टी के प्रकाशनों के बाद और खास तौर से असहयोग आन्दोलन के बाद से हिन्दी में जो इतिहास की पुस्तकें छपीं और जिस तरह के लेख प्रभा और अन्यान्य पत्र –पत्रिकाओं में छपने लगे उसमें 1857 समेत भारतीय इतिहास का एक राष्ट्रीय पाठ तैयार होने लगा था.[33]पहले के दौर की तुलना में अब शिक्षित हिन्दी जगत 1857 को लेकर अलग तरीके से सोचने लगा था इसका अन्दाज़ा आसानी से लग जाता है जब रजनीकांत गुप्त के दशकों पहले लिखे लेखों को प्रकाशक के वक्तव्य से मिलाते हैं. इस समय से ही हिन्दी में जो इतिहास आने लगे वे आगे के समय से भिन्न थे. 1857 के सन्दर्भ में 1922 में ही तीन पुस्तकें छप कर आयीं जिनमें सबसे उल्लेखनीय पुस्तक ईश्वरी प्रसाद शर्मा की पुस्तक सिपाही विद्रोह या सन सत्तावन का गदर थी. हिन्दी में इस पुस्तक के आने से इतिहास लेखन के एक नये युग का सूत्रपात हुआ. परोक्षत: यह रजनीकांत गुप्त की 1857 पर लिखी पुस्तक पर आधारित है लेकिन नये तरह के इतिहास लेखन की हिन्दी में शुरूआत के संकेत इसमें दिखाई देते हैं. वे लिखते हैं- “ हम विद्रोह को स्वाधीनताभिलाषी भारत का स्वातंत्र्य युद्ध कहने को विवश हैं और कदाचित् वह सफल हो जाता तो संसार का इतिहास भी इसी नाम से अभिहित करता.” [34] उनकी धारणा थी कि “ इसमें संदेह नहीं कि भारत की स्वाधीन प्रवृत्ति की ये अंतिम लौ थी, जिसके बुझते ही स्वाधीनता का टिमटिमाता हुआ चिराग बहुत दिनों के लिये बुझ गया.” [35] बाद में सुंदर लाल की पुस्तक के आने के बाद से सही अर्थों में हिन्दी में इतिहास की पुस्तकों में राष्ट्रीय स्वर पूरी तरह से आने लगा. इस पुस्तक के प्रकाशन और इसके प्रभाव के विश्लेषण से पता चलता है कि हिन्दी में इतिहास पुस्तक के आने का क्या महत्त्व होने लगा.
जो लोग प्रतिबंधित साहित्य के इतिहास से परिचित हैं उन्हें सखाराम गणेश देउस्कर की पुस्तक देशेर कथा का स्मरण होगा जिसे स्वदेशी आन्दोलन के दौरान असाधारण लोकप्रियता मिली थी. यह बांग्ला पुस्तक प्रतिबंधित हुई, लेकिन इसका हिन्दी अनुवाद प्रतिबंधित नहीं हुआ. लगभग दो दशक बाद मेजर बी. डी. बासु की अंग्रेज़ी पुस्तक के आधार पर सुंदर लाल ने एक इतिहास पुस्तक लिखी जिसे वे मेजर बासु की अनुमति से, उन्हें दिखाकर, छपने भेजा. बासु की पुस्तक को प्रतिबंध का सामना नहीं करना पडा और सुंदर लाल की पुस्तक हिन्दी में होने के कारण प्रतिबंधित कर दी गयी. पिछले दो दशकों में हिन्दी की ताकत इतनी बढ गयी थी!
चाँद के फाँसी अंक और हिन्दू पंच के बलिदान अंक के आने के बाद तो मानो राष्ट्रीय इतिहास लेखन को पूरी छूट मिल गयी हो. इसके बाद जो इतिहास ज्यादा लोकप्रिय हुआ वह पाठ्यक्रम के बाहर का लोकप्रिय इतिहास था जो शिक्षितों को इतिहास को अपनी तरह से जुडने की छूट देता था. यह कहना गलत नहीं होगा कि असहयोग आन्दोलन के बाद बहुत बाद तक, 1920 के दशक में भी, इस तरह के इतिहाश्रित उपन्यास खूब लिखे जाते रहे जिनमें जो इतिहास व्यक्त हुआ है वह किसी भी तरह से पाठ्य पुस्तकों में पढाये जाने वाले इतिहास से कम प्रभावी नहीं था. ऐसा कहा जाना युक्तिसंगत होगा कि हिन्दी में इतिहास दो रूपों में लिखा जाता रहा- प्रथम कोटि का इतिहास औपनिवेशिक युगीन आधुनिक चेतना का संवाहक था और दूसरी कोटि का इतिहास लेखन कई मामलों में औपनिवेशिक दृष्टि से प्रभावित होने के बावज़ूद एक हिन्दू राष्ट्र्वादी सोच को सामने रखकर सोचता था. इस दूसरी दृष्टि का प्रभाव अकादमिक जगत में कम रहा लेकिन हिन्दी पाठकों के ऊपर इसी तरह के लेखकों का प्रभाव अधिक रहा. ऐसा नहीं है कि पहली धारा पर हिन्दू राष्ट्रवादी रुझान एकदम नहीं थे पर इतिहास की विवेकवादी व्याख्या के यह नज़दीक थी इसमें संदेह नहीं. दूसरी धारा अपेक्षाकृत रूप से आस्थावादी धारा थी जिसमें जातिवादी, पारम्परिक, पौराणिक तत्त्वों का इतिहास में समावेश होता था. इन दोनों धाराओं के बीच कुछ आदान-प्रदान भी चलता रहा लेकिन कुल मिलाकर इन दोनों की इतिहास दृष्टि को अलग मानना ही उचित होगा.
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हिन्दी में किस धारा को प्रधान माना जाये इसका उत्तर इस बात पर निर्भर है कि इतिहास लेखन से हम किस प्रकार की अपेक्षा रखते हैं. अगर इतिहास को तथ्य-परक तथा साक्ष्य निर्भर मानें तो निश्चित ही दूसरी धारा को इतिहास मानने में कठिनाई होगी. लेकिन अगर मानने और प्रभाव की दृष्टि से देखा जाये तो दूसरी धारा को ही हिन्दी समाज का अधिक प्रभावी इतिहास मानना उचित होगा.
हिन्दी में इस दूसरी धारा को प्रभावी मानने पर हमारा ध्यान उन रचनाओं की और जाता है जो प्रामाणिक अर्थ में इतिहास न होकर भी लोगों के बीच इतिहास रूप में स्वीकृत है. हिन्दी में ऐसे उपन्यासों की कमी 1890 के दशक से ही नहीं है जिन्हें ‘इतिहासाश्रित’ कहा जाता है. कुछ उदाहरण देना उचित होगा- किशोरीलाल गोस्वामी की पुस्तकें- हृदयहारिणी, लवंगलता, गुलबहार, तारा, कनक कुसुम (जो दरअसल सखाराम देउस्कर के लेख पर आधारित है), हीराबाई, सुलताना रज़िया, मल्लिका देवी, लखनऊ की कब्र, पन्नाबाई, नूरजहां, गंगा प्रसाद गुप्त की नूरजहां, कुंवर सिंह सेनापति, जयराम दास गुप्त की वाजिदअली शाह, वीर वारांगना, रानी पन्ना, कार्तिक प्रसाद की महाराज छत्रपति शिवाजी का जीवन चरित्र, बलदेव प्रसाद मिश्र की अनारकली, पानीपत, पृथ्वीराज चौहान, मथुरा प्रसाद की नूरजहां से लेकर हरिदास मणिक की राणा सांगा, ब्रजनंदन सहाय की रज़िया बेगम समेत सौ से अधिक पुस्तकों का ज़िक्र किया जा सकता है. जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है इनपर बांग्ला के ऐतिहासिक उपन्यासों का प्रभाव है लेकिन जितनी बडी संख्या में ये छपती रहीं और जिस प्रकार गांधी युग के स्वतंत्रता आन्दोलन के दौर में इस प्रकार के इतिहासों का प्रभावी राष्ट्रीय उपयोग हुआ उससे इन पुस्तकों के महत्त्व को समझा जा सकता है.
भगवानदास माहौर ने अनेक हिन्दी पुस्तकों का विस्तार से उल्लेख किया है जिसमें 1857 का इतिहास विविध रूपों में आया था. वे दिखलाते हैं कि ऋषभ चरण जैन के उपन्यास गदर के बाद किस तरह से हिन्दी में ऐसे अनेक पुस्तकें लिखी गयीं जिसमें 1857 का इतिहास बदला हुआ आया. अन्य प्रयासों से भी अनेक ऐसे प्रकाशनों का पता चला है जिनमें 1857 के नायक –नायिकाओं की विविध छवियां आयी हैं. किसी में रानी लक्ष्मीबाई मरती नहीं और वे असहयोग आन्दोलन के समय सत्याग्रहियों को प्रेरित करती हैं ( बीच के वर्षों में वे नेपाल में थीं), तो किसी पुस्तक में तात्या टोपे दरअसल जीवित बच निकलते हैं और उनकी जगह तात्या बनकर कोई और ही फांसी पर चढ जाता है.[36]
हिन्दी में इतिहास लेखन की सीमा और इतिहास से प्रबुद्ध वर्ग की अपेक्षा एक दिलचस्प उदाहरण तब उपस्थित होता है जब दस वर्षों से अधिक समय तक शोध करने के बाद लक्ष्मीबाई का इतिहास लिखने के बजाय वृन्दावनलाल वर्मा तय करते हैं कि वह जो चाहते हैं वह इतिहास पुस्तक लिखकर संभव नहीं है. काफी सोचविचार के बाद उन्होंने लक्ष्मीबाई के जीवन पर उपन्यास लिखना तय किया. यह बात अलग है कि इतिहास की कोई भी पुस्तक, ताप्ती राय की लक्ष्मीबाई की जीवनी समेत, उतनी ऐतिहासिक सामग्री का उपयोग नहीं करती जितनी वृन्दावनलाल वर्मा करते हैं. ऐसा क्या है जिसके कारण वृन्दावनलाल वर्मा इतिहास न लिखकर उपन्यास लिखते हैं जो इतिहास से भी ज्यादा प्रामाणिक है, इस विषय पर हिन्दी में विचार करने की खास तौर से ज़रूरत है.
डॉ. मैनेजर पाण्डेय ने इतिहास पर विचार करते हुए यह कहा है कि इतिहास का संबंध विवेक से है, आस्था से नहीं. जो लोग इतिहास को वैज्ञानिक बनाना चाहते हैं और यह मानते हैं उन्हें हिन्दी में 1947 तक की इतिहास पुस्तकों को देखकर निराशा होती है. लेकिन, ऐसा प्रस्तावित किया जा सकता है कि हिन्दी समाज का विकास जिस रूप में हुआ है इसे ध्यान में रखने पर इस भाषा में इतिहास की उपस्थिति साहित्य में ज़्यादा ढूढने की ज़रूरत है. इस विषय में चलते चलते यह कहा जा सकता है कि जो इतिहास अंग्रेज़ी में लिखा गया वह राष्ट्रवादी अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रहा था जबकि लोकप्रिय इतिहास इस काम को बखूबी कर रहे थे. यह पहले ही कहा जा चुका है कि लोकप्रिय इतिहास ने वैज्ञानिक इतिहास को पूरी तरह विस्थापित नहीं किया है. दोनों तरह के इतिहासों की उपस्थिति बनी हुई है. अब अगर लोकप्रिय इतिहास की ऐतिहासिक भूमिका पर विचार किया जाये तो लगता है कि इस रूप में इतिहास लेखन ने ज़्यादा निर्णायक भूमिका का पालन किया है. अंग्रेज़ी में लिखे जाने वाले ‘विवेक’ युक्त इतिहास की विचारधारात्मक पडताल ज़्यादा गंभीरता की ज़रूरत है. क्या कारण है कि विवेकपूर्ण दृष्टि में 1857 एक सिपाही विद्रोह था और लोकप्रिय साहित्य और स्मृति में यह एक राष्ट्रीय संग्राम ? यहां मुझे यह कहना जरूरी लगता है कि हालांकि हिन्दी में 1857 के सम्बंध में सकारात्मक टिप्पणियां 1920 के दशक के पूर्व देखने में नहीं आती लेकिन लोक स्मृति में 1857 के नायकों के प्रति श्रद्धा और आदर का भाव लगातार बना रहा. यह उसी का दबाव था कि 1920 के दशक में ज्यों ही हिन्दी के लेखक राष्ट्रीय स्वर को अपेक्षाकृत रूप से निडर होकर लाने लगे हिन्दी साहित्य में ये इतिहास प्रसंग बहुत ही लोकप्रिय होने लगे. हिन्दी के लेखकों में 1857 के सन्दर्भ में दृष्टि का सही मूल्यांकन अभी भी नहीं हो पाया है और मुझे लगता है विधागत सीमाबद्धता के कारण यह शायद ही इतिहासकार कर सके. यह काम इतिहास और साहित्य के बीच सकारात्मक आदान प्रदान से ही संभव हो सकेगा. हो सकता है कि हिन्दी साहित्यकारों की टिप्पणियों में अंतर्निहित भाव के सही निहितार्थ को समझने की कोशिश के बाद यह पाया जाये कि हिन्दी लेखकों में भी 1857 के विद्रोहियों की वीरता के प्रति बहुत आदर का भाव रहा हो. [37] भारतीय संदर्भ में क्या ऐसा प्रस्तावित किया जा सकता है कि इतिहास लेखन के क्षेत्र में भाषा का चुनाव एक विचारधारात्मक चुनाव भी है? क्या भाषा के बदल जाने के बाद कथ्य पर कोई असर पडता है? हिन्दी में इन सवालों से जूझना बहुत ज़रूरी है. माधव प्रसाद मिश्र ने अयोध्या के इतिहास पर एक लेख लिखा था जिसकी चर्चा नहीं होती. आज हम अगर उस लेख को निकालकर दुबारा पढें तो लगेगा कि वे विवेकपूर्ण दृष्टि से नहीं लिख रहे थे. अमृतलाल नागर ने भी अयोध्या के प्रसंग में कुछ ऐसी बातें कही थी जो हमें असहज कर देती हैं. आखिर जो लेखक करवट जैसा उपन्यास लिखता हो, जो ग़दर के फूल लिख चुका हो वह अगर लोक स्मृति को इतिहास में सम्मिलित करके हमारे यहां ‘हिस्ट्री’ और ‘ साहित्य’ के बीच कुछ कहता हो तो उसे सुनना चाहिये या नहीं? हिन्दी में जो इतिहास लिखा गया है वह अंग्रेज़ी में लिखे गये इतिहास से कई मायनों में शुरू से ही अलग रहा है. अब समय आ गया है कि हिन्दी में लिखे गये इतिहास की भाषा, उसमें अंतर्निहित भावों की बारीकी से जांच की जाये. ऐसा इसलिये भी जरूरी है क्योंकि बहुधा इन इतिहासों में जो परोक्षत: कहा जा रहा है वह लेखक का पूरा कथन नहीं है. जो लोग इतिहास की पाठ्य पुस्तकें लिख रहे थे वे भी देश में राष्ट्रीय भाव के फैलने देना चाहते थे और इसलिये इस तरह से लिखते थे ताकि पाठक समझ भी ले और ब्रिटिश सरकार की ओर से लेखकों को परेशानी भी न हो. इन इतिहास पुस्तकों में कुछ ऐसे भाव भी उभरते हैं जिससे इतिहास लेखकों की हिन्दू-सवर्णवादी और मर्द वादी विचारधारा का भी स्पष्ट संकेत मिलता है. जो बात आज के इतिहास लेखन के लिये इन सामग्रियों को महत्त्वपूर्ण बनाती है वह यह है कि ये ऐसे लोगों द्वारा लिखे गये थे जो समय के बडे सरोकारों से जूझते हुए मानस की अभिव्यक्तियां हैं. ये हिन्दी के ये लेखक जनता का मार्ग दर्शन करने की कोशिश कर रहे थे. इस कारण से वे बहुधा इतिहास की वैज्ञानिक सीमाओं का अतिक्रमण करते थे और इतिहास को साहित्य के साथ जोडकर अपने लेखन को ज़्यादा प्रभावी बनाते थे. इतिहास शायद एक तरह का साहित्य ही होता है इस बात को हिन्दी के साहित्यकार-इतिहासकार जाने अनजाने बहुत अच्छी तरह समझते थे. आज के दौर में यह मानने की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा है कि इतिहास लेखन के लिये ऐतिहासिक गल्प इतिहास से कुछ कम मह्त्त्वपूर्ण नहीं है. साहित्य इतिहासलेखन का एक अनन्य श्रोत है. अगर इस दृष्टि का विस्तार हो तो भारत में इतिहास लेखन का भला होगा.

2 comments:

  1. इतिहास पर एक अलग दृष्टि मेरे लिये बिलकुल नयी थी। बहुत अच्छी लगी। एक नयी दुनिया में विचरण का आभास हुआ। हिन्दी में इतनी सशक्त प्रस्तुति के लिये साधुवाद।

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  2. i loved it ,, very nice . thanks for this information...

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