Saturday, 30 April, 2011

भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता के बढते अंग्रेजीकरण का विरोध क्यों ?
भारतीय भाषा परिषद में होने वाले आयोजनों और कार्यक्रमों के संदर्भ में एक बहुत अखरने वाली बात यह होती जा रही है कि इसमें भारतीय भाषाओं की जगह अंग्रेज़ी को प्राथमिकता दी जा रही है. अभी तक यह खुल कर नहीं हुआ है लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. आज दैनिक जागरण में जो कुछ परिषद की अध्यक्षा ने कहा है उसे देखें- " आज की तारीख में अंग्रेज़ी से बचकर कहाँ तक रहा जा सकता है? ... जो लोग (अशोक सेकसरिया जैसे लोग) हिन्दी का सवाल उठा रहे हैं, उन्हें यह बताना चाहिए कि उनके घर के बच्चे अँग्रेजी में पढाई नहीं कर रहे? " वे अंग्रेजी में कार्यक्रम आयोजित करने को प्रगतिशील विचारधारा के अंतर्गत पाती हैं और अंग्रेजी में आमंत्रण-पत्र छपाने और कार्यक्रम करने के परिषद के निर्णय का विरोध करने को "कूपमंडूकता"!
मित्रों को यह बताना जरूरी है कि परिषद द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में प्रसिद्ध इतिहासकार रामचन्द्र गुहा को आमंत्रित किया गया है. हम सभी उनको सुनना चाहते हैं, लेकिन इस कार्यक्रम का जो आमंत्रण पत्र छपा वह अंग्रेजी में है और उसे जिस तरह से तैयार किया गया है उसको देखने से पता चलता है कि आयोजन के पीछे एक नकारात्मक दृष्टि काम कर रही है. गुहा का जो संक्षिप्त परिचय दिया गया है उसमें कहा गया है कि उन्होंने नर्मदा परियोजना के विरोध के विरोध में लिखा है. यह बतलाना सौद्येश्य है. यह प्रश्न जरूर पूछा जाना चाहिए कि क्या रामचन्द्र गुहा ऐसा मानते हैं? अगर मानते हैं तो उनके तर्क क्या है?
बहुत संभव है कि अशोक सेकसरिया जैसे लोगों के परिषद के अंग्रेज़ीकरण के विरोध को अंग्रेजी विरोध जैसी किसी चीज से जोड दिया जाए. ऐसा प्रयास शुरू भी हो गया है. परिषद अध्यक्षा डॉ प्रतिभा अग्रवाल के वक्तव्य से यही ध्वनित होता है. खुद गुहा मानते हैं कि इस कार्यक्रम के आमंत्रण पत्र को हिन्दी में भी होना चाहिए था.
साथियो, क्या यह सब हम चुपचाप हो जाने दें ?
हम किसी ऐसे विद्वान के अंग्रेजी में भाषण देने का विरोध नहीं कर सकते जिसे हिन्दी नहीं आती. हम अपने रबीन्द्र भारती विश्वविद्यालय में ऐसे विद्वानों के भाषण का कार्यक्रम बांग्ला में करते हैं और सुविधा के लिए अंग्रेज़ी में दिए गए व्याख्यान का बांग्ला में अनुवाद कर देते हैं. प्रश्नोत्तर में पूछे जाने वाले प्रश्न का अंग्रेज़ी अनुवाद संचालक कर देते हैं. इस तरह से अपने बरसों के अनुभव में कभी किसी को कोई दिक्कत हुई है ऐसा नहीं लगा. भारतीय भाषा परिषद में अगर कार्यक्रम हिन्दी में होता और रामचन्द्र गुहा अंग्रेज़ी में अपनी सुविधा से बोलते तो भी बात समझ में आती. वैसे गुहा बहुत अच्छी हिंदी जानते हैं और वे निश्चित रूप से हिंदी विरोधी नहीं हैं.
अगर आप सोचते हैं कि भारतीय भाषा परिषद के इस अंग्रेज़ीकरण का प्रतिवाद ज़रूरी है तो आप शांतिपूर्वक इसका विरोध करें. हम इस कार्यक्रम का बहिष्कार नहीं करना चाहते. हम अपना प्रतिवाद सुधीजनों के समक्ष रखना चाह्ते हैं ताकि भारतीय भाषाओं के सांस्थानिक स्थानों के संकुचन के इस घोर रचनाविरोधी समय में हमारी भाषाओं के लिए जगह बची रहे.
हितेन्द्र पटेल
1 मई, 2011.

1 comment:

  1. गांधीविद बनने वाले रामचन्द्र गुहा अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं के विषय में गांधी के विचारों के प्रति आंखें मूंद लेते हैं तथा इस विषय पर लोहिया का भी मजाक उड़ाते हैं । बेशर्म हैं ।

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