Tuesday 9 August 2011


कुछ विचार -
1.    आप चाहें तो इसे मेरा पूर्वाग्रह मानें, लेकिन जो हिन्दी के मीडिया के चेहरे हैं उनमें एक किस्म का बेवकूफी भरा आत्म-विश्वास दिखलायी पडता है. (दो तीन अपवादों को छोडकर) अंग्रेजी की मीडिया के जो चेहरे हैं वे ज्यादा सहज होते हैं, बेहतर तैयारी के साथ आते हैं और अपने 'कुछ बन जाने को दिखलाने की चाह' का प्रदर्शन नहीं होता. आप मीडिया में हैं कोई सेलेब्रेटी तो हैं नहीं और कुछ प्रमाणित करके तो वहाँ पहुँचे नहीं हैं. हिन्दी पत्रकारिता से जुडे लोगों का दायित्त्व ज्यादा है उन्हें इससे बचना चाहिए.
2.    दिल्ली में बैठकर साहित्य, पत्रकारिता और राजनीति के अखाडों में आते जाते कुछ लफाडिया किस्म के लोग हिन्दी के चेहरे बनते जा रहे हैं. इससे हिन्दी का जो चेहरा बनता जा रहा है वह उसका असली चेहरा नहीं है. इस देश के दूसरे हिस्सों में इस भाषा में लिखा- पढा जा रहा है इसकी जानकारी के बगैर ही लोग वही घिसे पिटे नामों, बातों के सहारे हिन्दी का चेहरा बने हुए हैं. एक अभियान चलना चाहिए कि इस 'नकली हिन्दी के चेहरों' के बाहर की हिन्दी में क्या कुछ सोचा समझा जा रहा है.
3.    योग्यता, निष्ठा और तैयारी (आपस में जुडे हुए भी) का कोई विकल्प नहीं हो सकता. आप बगैर तैयारी के जायेंगे तो वही हाल होगा जो हाल धोनी की टीम का इंग्लैंड में हो रहा है. एक दोयम दर्जे की टीम है इंग्लैंड की और लग रहा है कि भारत बचे हुए भी टेस्ट हार जायेगा. आपका काम आपको करना पडेगा. करने के लिए जानना पडेगा. जानने के लिए परिश्रम करना पडेगा. अपने को अपडेट करना पडेगा. इस सामान्य बात को समझे बिना कैसे काम हो सकता है ?किसी को भी इस बात से जाँचा जाना चाहिए (प्राथमिक रूप से) कि जो काम उसका है उसे वह ठीक से करता है या नहीं. हर स्तर पर इसकी जाँच होनी चाहिए. खुद अपने को भी देखना चाहिए. यह न करके हम सब किसी काम के लिए भी दूसरे को दोषी बनाने में लगे रहते हैं. हर डिबेट मेरा और तेरा या फिर हम बनाम वे में तब्दील हो जाते हैं.
4.     प्रेमचन्द या रवीन्द्रनाथ बहुत महान थे. माना. लेकिन जिस भाषा में उन्होंने लिखा उसके नये लोग क्या हैं , कितने प्रेमचन्द और रवीन्द्रनाथ हैं यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. आज रवीन्द्रनाथ को लेकर इतना कुछ कहा सुना जा रहा है लेकिन बांग्ला साहित्य के वर्तमान स्वरूप की चिंता पर कितना ध्यान है? हम वर्तमान में जीते हैं हमारा सरोकार वर्तमान से ज्यादा होना चाहिए.
5.    शैबाल मित्र का एक व्यंग्य है- 'रवीन्द्र दौड'. इसका एक सुंदर अनुवाद विजय शर्मा ने किया था. एक बात कही जाती थी कि आपको एक लेख लिखना आना चाहिए- गाय पर. बाकी जो भी लेख दिया जाये आपका काम है किसी तरह से लेख को गाय तक मोड दिया जाये. बाढ पर बात करनी हो तो एक दो वाक्य बाढ पर लिख कर गाय का उल्लेख कर दीजिए और फिर गाय पर तो आप जानते ही हैं... अब आप रवीन्द्र संगीत को हर घर में ऐसे सिखाने लगें जैसे टाइपिंग स्कूल में टाइप सेखाते हैं तो लोग सीखेंगे लेकिन वह क्या संगीत सीखना होगा?

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