Friday, 10 September, 2010

हिंसा से प्रभावित होने वालों को भी हिंसक होने का अधिकार नहीं

"हिंसा से प्रभावित होने वालों को भी हिंसक होने का अधिकार नहीं."
प्रश्न: हिंसा में जिस वृद्धि की बात की जा रही है, उसे कौन बढा रहा है?
उत्तर : इस प्रश्न का उत्तर देने के पहले मैं कुछ बातों पर पाठकों का ध्यान दिलाना चाहूंगा. हिंसा एक हद तक बुखार की तरह है. जैसे बुखार अपने आप कोई रोग नहीं है बल्कि एक संकेत है किसी बीमारी का. जैसे ही वह बीमारी ठीक होगी बुखार अपने आप उतर जाएगा. हिंसा को समाज में व्याप्त बुराई के संकेत के रूप में भी देखा जा सकता है. समस्या तब अधिक हो जाती है जब इस प्रश्न पर राज्य-सत्ता जैसे संस्थान को जोडकर इस पर विचार किया जाता है. राज्य प्रभुत्त्वशाली वर्ग के हितों के हिसाब से ही काम करता है. इस राज्य को एक विशेषाधिकार प्राप्त है. यही वह चीज है जिसके कारण यह सबसे शक्तिशाली है. वह अधिकार है 'हिंसा का अधिकार'. सभी संस्थाओं में सिर्फ इसे यह अधिकार है कि यह हिंसा कर सकती है. आधुनिक युग में, जिसमें राज्य-सत्ता के अधिकार सबसे व्यापक हैं, किसी को आत्महत्या का भी अधिकार नहीं है. सामान्यत: यह माना जाता है कि राज्य उस देश के समस्त नागरिकों की सामूहिक इच्छा का प्रतिनिधित्त्व करता है. समस्या तब होती है जब राज्यसत्ता अपनी वैधता को खो दे, यानि जब राज्य अपनी शक्ति का दुरूपयोग करके नागरिकों की सामूहिक इच्छा का अनादर करके शासन करने की कोशिश करे. विख्यात वामपंथी चिंतक फ्रांज फेनन मानते थे कि 'उपनिवेशवाद हिंसा है अत: इसके खिलाफ हिंसा का प्रयोग सर्वथा उचित है". दुनिया के तमाम क्रांतिकारी विचारकों का मत भी यही है कि जब राज्य जनता का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहा हो और अपने को बचाने के लिए उसके पास उपलब्ध शक्ति- हिंसा का सहारा लेने लगे तो वह अपने शासन के अधिकार को खो देता है. ऐसे में राज्य सत्ता के खिलाफ हिंसा का प्रयोग वैध है. युद्ध में शत्रु के द्वारा प्रयुक्त अस्त्र के हिसाब से ही युद्ध किया जाता है. अत: अनुचित राज्य सत्ता को अपदस्थ करने के लिए हिंसा का रास्ता ही सही रास्ता है. इसी तर्क के कारण फेनन अल्जीरिया के क्रांतिकारियों द्वारा औपनिवेशिक शासन के खिलाफ हिंसा का प्रयोग बिल्कुल सही मानते हैं.
इस के विपरीत गाँधी जैसे विचारक हैं जो हिंसा को हर रूप में गलत मानते हैं. उनकी दृष्टि में अगर औपनिवेशिक शक्तियाँ हिंसा का प्रयोग करती हैं तो इसका उत्तर प्रति हिंसा से देने का अर्थ है पहली शक्ति द्वारा हिंसा के प्रयोग का औचित्य सिद्ध करना. अगर हम हिंसा का विरोध अहिंसा से करेंगे तो हिंसा करने वाला या तो बदलेगा या उसके बल प्रयोग की नैतिकता खत्म होगी. इस प्रकार का अनैतिक बल प्रयोग चल नहीं सकता.
मुझे लगता है गाँधी की बात बहुत गहरी है और इसे ठीक से समझने की जरूरत है. देखा जाए तो जब से लोकतंत्रात्मक व्यवस्था दुनिया में आयी है, किसी भी देश की राज सत्ता अपने देश की आम जनता की इच्छा के विरूद्ध नहीं जा सकती. सिर्फ तानाशाही और फासिस्ट राज्य सत्ता ही जनता की इच्छा का अनादर करने का जोखिम उठाती है. अगर इस बात को मान लिया जाए तो गाँधी का कहा हुआ बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है. यह ज्यादा कारगर तरीका है. हालाँकि यह भी कहना पडेगा कि किसी और औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ गाँधी का अहिंसात्मक आन्दोलन इतना प्रभावी नहीं भी हो सकता था. आप बर्मा का उदाहरण भी ले सकते हैं. चाहे तो तिब्बत का भी उदाहरण ले सकते है जिसमें गाँधीवादी प्रकार के राजनैतिक आन्दोलनों को वह सफलता नहीं मिली जो भारत में संभव हो सकी.
अब आपके प्रश्न के उत्तर की ओर जाया जाए. आपने विषय को प्रस्तावित करते हुए बहुत ही सही लक्षित किया है कि "मनोरचना में विवेक और कल्याण का दायरा सिकुडता जा रहा है." यही वह बात है जिससे बात शुरू की जा सकती है. यह क्यों हो रहा है? क्या इससे इतर कुछ और हो सकता था? मुझे लगता है आधुनिक सोच इससे इतर कुछ और कर ही नहीं सकता था. अपने देश में इस संबंध में ज्यादा चर्चा नहीं होती कि आखिरकार आधुनिक यूरोपीय सोच के दायरे में इस देश की सोच को क्यों 'रिड्यूस' किया जाता रहा है. यूरोप में सौ से भी ज्यादा सालों से यह बात समझी जाती रही है कि आधुनिकता के भीतर भयानक विध्वंसकारी तत्त्व हैं जो हमारे मन को 'वेस्टलैंड' में बदल देंगे और विवेकशील मनुष्य एक उपभोक्ता 'बायो मास' में तब्दील हो जाएगा. यूरोप या पश्चिम विश्व नहीं है लेकिन वही मान लिया गया है. आज साहित्य से लेकर आर्थिक,-राजनैतिक, सामाजिक सांस्कृतिक, वैचारिक-भाषिक, धार्मिक-आध्यात्मिक, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, परिवार पडोस, राष्ट्र-राज्य , चेतन-अवचेतन, मीडिया-फिल्म, लोक-विश्व, न्याय-नैतिकता आदि सभी क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा जारी है. यह प्रतिस्पर्द्धा ही तो हमें अपने आंतरिक विवेक से विच्छिन्न करके हमसे वही करवाती है जिसे करते हुए हम अपने लिए ही 'अजनबी' बन जाते हैं. हमारी सारी लडाई हमारे अपने भीतर एक हिंसा का अनंत सिलसिला रचती है जिसमें हम जन्म से लेकर मृत्यु (और उसके बाद भी) टँगे रहते हैं. मार्टिन हाइडेगर की कई स्थापनाओं से असहमत होते हुए भी मुझे लगता है उनके सोच ने आधुनिक मनुष्य की विडंबना को ठीक से पकडा है. जिसे सार्त्र 'नथिंगनेस' कहते हैं वही तो हमारे आधुनिक की नियति है. आप फ्रैंकफुर्त स्कूल के विद्वानों को पढते हुए महसूस करेंगे कि आधुनिक 'मैकेनिकल' मनुष्य के प्रति पश्चिम में भी चिंता रही है. जब मार्कुज 'वन डायमेंशनल मैन' लिखते हैं तो इस बात का पूरा विवरण हमारे पास उपलब्ध हो जाता है कि यही पश्चिमी मनुष्य को होना था. राम मनोहर लोहिया ने इस बात पर बहुत ही सुंदर टिप्पणी की थी. लेकिन, इन सबके बावजूद भारत समेत पूरी दुनिया वही खेल खेल रही है. प्रतिस्पर्द्धा को अवगुण मानने की दृष्टि हमारी भारतीय सोच का प्रधान तत्त्व रहा है इसका स्मरण कराना भी अब इस देश में पिछडेपन का चिह्न माना जाता है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. दुनिया भर में शांति के इस दौर में करोडों लोग हिंसा का शिकार हो रहे हैं और सब कुछ आधुनिक बनने और आगे बढने के लिए अपरिहार्य माना जा रहा है. आधुनिक पश्चिमी सोच का वैश्विक वैचारिक वर्चस्व इस जगत की भयानक हिंसा के मूल में है.
2. हिंसा किसके हित में है?
उत्तर: हिंसा करने वाला समझता है कि वह अपने हित में हिंसा कर रहा है लेकिन यह भ्रामक है. एक स्थूल उदाहरण लें. स्टालिन ने, हिटलर ने, सद्दाम हुसैन ने, बुश ने जो हिंसा की वह अपने लोगों के हित में की है. उनका हाल क्या हुआ. जिसके लिए किया उनका क्या हुआ? इतिहासकार एरिक हॉब्सबाम पूरी दुनिया के बीसवीं सदी के इतिहास का एक यथासंभव सटीक विश्लेषण करके इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि दुनिया में निकट भविष्य में शांति की कोई संभावना नहीं है. वे जो आंकडे देते हैं वे चौंकाने वाले हैं. वे कहते हैं कि आधुनिक "बीसवीं शताब्दी आज तक की सबसे हिंसक शताब्दी रही है. युद्ध से संबंधित हिंसा में कुल 18 करोड 70 लाख लोग मारे गये हैं... इस शताब्दी में युद्ध अनवरत चलता रहा है. ... द्वितीय विश्वयुद्द का कोई समापन नहीं हुआ (जैसा कि अमूमन युद्ध के बाद होता है). जाहिर है, युद्ध द्वारा किसी भी स्थाई समाधान नहीं हुआ है. किसी अफगानिस्तान या इराक तक को युद्ध की हिंसा के द्वारा सबक नहीं सिखाया जा सका. किसी का हित सधा हो, लगता नहीं है. जिन संगठनों ने हिंसा के द्वारा अपनी जनता के लिए अपनी सरकारों से हिंसा के द्वारा मुकाबला किया है उनसे भी कुछ नहीं बन पडा. नेपाल से लेकर श्री लंका तक के नजदीकी उदाहरण यही संदेश देते हैं कि इस तरह के हिंसक राजनैतिक प्रयास फौरी सफलताएं भले ही पा लें, इसके दूरगामी परिणाम शुभ नहीं होते. अफ्रीका में विभिन्न देशों में हिंसात्मक गतिविधियों से जुडे संगठनों का हाल तो और भी भयानक है. वहाँ लाखों लोग मर रहे हैं और किसी का कोई भला नहीं हो रहा है. क्या इस बात की चर्चा की ज़रूरत है कि लश्करे तोईबा और अन्य इस्लामिक हिंसा में विश्वास करने वाले संगठनों से सबका (विशेषकर मुसलमानों का) कितना अहित किया है? वामपंथी हिंसा में विश्वास करने वालों से भी किसी का हित नहीं हुआ है.
3. हर क्षेत्र में केंन्द्रीयकरण की प्रवृत्ति ने हिंसा को नहीं बढाया है?
उत्तर: इसमें कोई संदेह नहीं है. इसको समझने के लिए दो उदाहरणों को पास पास रखकर समझा जा सकता है. कश्मीर में जिस तरह से केन्द्र ने शांति बहाल करने की कोशिश की और आतंकवादी गतिविधियों को समाप्त करने की कोशिश की उसमें सफलता तभी मिलनी शुरू हुई (जितनी भी मिली है) जब स्थानीय राजनैतिक प्रक्रिया शुरू की गई. केन्द्र अपने बूते यह नहीं कर पाया. सख्ती करके भी नहीं. पंजाब में भी यही हुआ. आज खालिस्तान आन्दोलन जैसा खतरनाक आन्दोलन खत्म हुआ जब स्थानीय लोगों ने इसमें पहल की. असम में भी यही हुआ. केन्द्र के बल से किसी भी आन्दोलन को दबाना बहुत मुश्किल है. बाहरी ताकत लगाकर दबाव तो बनाया जा सकता है लेकिन स्थायी रूप से प्रभावी समाधान नहीं दिया जा सकता. अमरीका ने अफगानिस्तान और इराक के उदाहरण से यह पाठ सीखा है.
4. हिंसा की कितनी जरूरत राष्ट्र-राज्य को है?
उत्तर: मैं पहले भी कह चुका हूँ कि राज्य का अस्तित्व हिंसा के बल पर ही है. यह अकारण नहीं है कि तोलस्तोय और गाँधी समेत बहुत सारे शांतिप्रिय नेताओं और चिंतकों ने राष्ट्र-राज्य को जरूरी नहीं समझा. वे अगर इसके नाश के लिए तैयार न भी हुए हों तो भी यह तो चाहते ही थे कि इसका दखल लोगों के जीवन में कम से कम हो.
वैसे देखा जाए तो राष्ट्र राज्य जानबूझ कर नहीं मजबूरी में हिंसा करता है. पर यह मजबूरी ऐसी है कि इसके बिना उसका कोई औचित्य रहेगा ही नहीं. आम वामपंथी दृष्टि के अनुसार राज्य का प्रधान दायित्व है 'हैव्स" को " हैव नाट्स" से बचाना और यथास्थिति को बनाए रखना. उदारनैतिक दृष्टि के अनुसार राज्य का दायित्व है नागरिकों की स्वतंत्रता की, उसकी संपत्ति की रक्षा करना और जहाँ तक संभव हो कम से कम हस्तक्षेप करना. सीमा पर रक्षा, पुलिस और डाक व्यवस्था के अलावा किसी भी मामले में राज्य की उपस्थिति को उदारवादी नापसंद करते हैं. कुल मिलाकर फासिस्ट और अन्य प्रकार के तानाशाहों ने ही राज्य की जरूरत को जरूरी समझा है.
राज्य है तो हिंसा है और एक हद तक राज्य की हिंसा को तब तक सही माना जाता है जब तक राज्य को आम जनता की ओर से वैधता प्राप्त है. अगर राज्य कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए या देश की सीमा की सुरक्षा के लिए या फिर किसी गंभीर आंतरिक खतरे का मुकाबला करने के लिए हिंसा का सहारा लेती है तो जनता उस हिंसा को उचित मान लेती है. श्री लंका की वर्तमान सरकार द्वारा जिस हिंसक तरीके से एल टी टी का जाफना से सफाया किया गया उसका श्री लंका की जनता ने समर्थन किया.
5. संगठित हिंसा की समाप्ति किस संगठित विचार या प्रयास से संभव है?
उत्तर: कुछ वर्ष पूर्व विख्यात दो दार्शनिकों -देरिदा और हैबरमास ने इस पर विचार किया था. उसके आधार पर एक विद्वान ने यह सुझाव दिया कि जो शोषित हैं उन्हें भी हिंसा का अधिकार नहीं है. हैबरमास कहते हैं कि इस बात को समझने की जरूरत है कि " बीइंग द सब्जेक्ट ऑव वायलेंस गिव्स अस नो राइट टू बी वायलेंट इन रिटर्न'. यह एक उपयोगी टिप्पणी है. स्पष्ट है कि यह मत गाँधी के विचारों के बहुत निकट है. कई लोगों को यह बात कुछ अटपटी लग सकती है. हम अपने सहज बोध से जानते हैं कि हिंसा आत्म-रक्षार्थ भी किया जाता है और अपने अधिकार के लिए भी कभी कभी हिंसा होती है. भारतीय संदर्भ में हाल ही में अरूंधती राय ने जन-जातियों के साथ राज्य द्वारा किए जा रहे अन्यायों के सन्दर्भ में जन-जातियों द्वारा किए गये हिंसा को उचित ठहराया है. देश के विभिन्न हिस्सों में माओवादियों द्वारा किए जा रहे हिंसक आन्दोलनों के समर्थन में भी कुछ लोगों ने लिखा है. इस बात को केन्द्र में रखकर विचार करना उचित होगा. हैबरमास एक अन्य बात को भी इस सन्दर्भ में जोडते हैं जो उनके पूरे वक्तव्य को स्पष्ट करता है. वे कहते हैं- "हिंसा के परित्याग के लिए यह जरूरी है कि लोग यह समझें कि कहीं भी किसी के ऊपर हो रही हिंसा को वे अपने ऊपर हो रहे आघात के लिए लें". [इस संबंध में और विस्तार के लिए देखें- एल. जी. बोरादरी (Borradori), फिलासफी इन ए टाइम ऑव टेरर :डायलॉग विद जुर्गेन हैबरमास एंड जॉक देरिदा (2003)] हैबरमास इस सन्दर्भ में दो बातों का उल्लेख करना नहीं भूलते; उनके अनुसार आधुनिक समाज ने पारंपरिक समाज को ध्वस्त तो कर दिया लेकिन उसका विकल्प तैयार नहीं किया. आतंकवाद आधुनिकता का निगेटिव पक्ष है जिसका उदय इस कारण से हुआ है क्योंकि आधुनिकता ने जो दर्द पैदा किया उसकी दवा का इंतजाम नहीं किया. आतंकवाद एक आधुनिक युग की समस्या है. यह प्राक आधुनिक युगों की हिंसा से भिन्न है. पहले हिंसा का खत्म होना तय था चाहे वह जितना भी भयावह हिंसा क्यों न हो. आज आतंकवाद की हिंसा से भी ज्यादा समस्या पैदा करने वाली बात यह है किसी भी समय फिर से हो सकने वाली हिंसा की आशंका है. 9/11 के बाद अमरीका जितनी भी व्यवस्था कर ले वह इस भय से मुक्त नहीं हो सकता कि ऐसी घटना कभी भी कहीं भी घट सकती है. यह बात और भी भुलाना कठिन है कि अमरीका ने ही ओसामा बिन लादेन को शीत युद्ध के दौरान ट्रेनिंग दी थी और 9/11 के आतंकियों ने पश्चिमी देशों में ही जहाज उडाने की ट्रेनिंग ली थी.
मुझे लगता है हैबरमास की इन बातों से संगठित हिंसा की समाप्ति की ओर एक जरूरी पहल संभव है.
इसमें संदेह नहीं कि जन-जातियों के साथ अन्याय लगातार हुए हैं और इस अन्याय में राज्य की भी भूमिका रही है. जिस प्रकार अमानवीय तरीकों से जन-जातियों को उनके वास-स्थानों से विस्थापित किया जाता रहा है और जिस प्रकार उनकी गरीबी बढी है उसे देखते हुए कई लोगों को लगता है कि उनका प्रतिवाद- चाहे हिंसक हो तो भी समर्थन योग्य है. दूसरी ओर एक अन्य प्रकार की परिस्थिति में बंगाल के कुछ इलाकों में राज्य समर्थित शासक दल द्वारा चलाए जा रही संगठित हिंसा का जिस तरह प्रतिवाद हुआ है उसके संदर्भ में भी यह कहा जा सकता है कि एकमात्र हिंसक तरीके से ही शासक दल के अत्याचार और वैज्ञानिक तरीके से चलाए जा रहे दलीय आतंकवाद का डटकर मुकाबला किया जा सकता था. इस प्रसंग में दो तीन बातों का उल्लेख जरूरी है. बंगाल के जंगल महल इलाके में आज से 30 बरस पहले सभी दलों के समर्थक थे. कुछ कांग्रेसी थे कुछ समाजवादी थे और कुछ कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थक थे. पिछले दिनों यह पता चला कि अब इस इलाके में एक ही दल है -सी पी एम बाकी सबको खत्म कर दिया गया है. पता चला है कि येन केन प्रकारेण- छल-बल-कौशल से लेकर क्रूर हिंसा तक के प्रयोग द्वारा यहाँ सी पी एम के विरोधियों का सफाया कर दिया गया. सी पी एम का दबदबा इतना बढ गया था कि कुछ लोकप्रिय विरोधी दल के नेताओं का खून कराने के बाद भी पार्टी के नेताओं का कुछ नहीं हुआ. लोगों में पार्टी का भय इतना अधिक हो गया था कि लोग डर के मारे मुंह नहीं खोलते थे. ऐसे में धीरे धीरे एक विरोध जन जातियों में पैदा हुआ और जब मौका मिला सी पी एम के नेताओं और समर्थकों का सफाया शुरू हुआ. अब बदले हुए माहौल में सी पी एम के समर्थकों ने पहली बार जाना कि जान का भय क्या होता है. इस भय ने धीरे धीरे सी पी एम विरोधियों में साहस पैदा किया और विभिन्न इलाकों में सी पी एम के आतंक पैदा करने वाले दलीय आतंकवाद को हिंसक तरीके से चुनौती दी. अब इस प्रकार की हिंसा को कैसे देखा जाए?
इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि इस व्याख्या में दम है. आज सी पी एम बंगाल में रक्षात्मक मुद्रा में दिखलाई पड रही है तो इसका बडा कारण सी पी एम की न दिखलाई पडने वाली हिंसा (जिसने विरोधियों को आतंकित कर रखा था) का वैसा ही जवाब दिया जाना है. इन जन जातियों के नेताओं के प्रति सहानुभूति रखते हुए भी यह कहना पडेगा कि इस रास्ते से न कोई समाधान होगा और न ही जन जातियों को कोई राहत ही मिलेगी. होना यह चाहिए कि किसी मजबूरी में हिंसात्मक आन्दोलनों में आए लोगों को जैसे ही सुयोग मिले लोकतांत्रिक पद्धति की प्रक्रियाओं से जोड लिया जाना चाहिए. ऐसे उदाहरण दुनिया में बहुत हैं जिसमें हिंसा का रास्ता छोडकर लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुडे हैं. मिश्र से लेकर फिलिस्तीन तक ऐसे उदाहरण देखे जा सकते हैं. इस देश में पिछले वर्षों में नक्सलवादी आंदोलन का बहुत विस्तार हुआ है. आज सरकार इस तरह के आंदोलनों को देश की सुरक्षा के लिए बडा खतरा मान रही है और युद्ध स्तर पर इसका मुकाबला करने के लिए अपनी फौज को इस काम में लगाए हुए है. आए दिन नक्सली और सेना के बीच की मुठभेडों में दोनों ओर से मारे गये लोगों की तस्वीरें अखबारों में दिखलाई पडती हैं. ऐसे में कभी कभी लगता है कि अब इस देश के एक बडे हिस्से में राज्य और नक्सली अपने अपने अधिकार के लिए खूनी लडाईयाँ चलती रहेंगी. यह हो भी सकता है. लेकिन, यह अंतत: राज्य के द्वारा नक्सलियों के दमन में ही समाप्त होगा. इस बात को अगर ठीक से समझ लिया जाए तो संभव है देश के शांति प्रिय नेताओं की पहल का लाभ लेकर नक्सली लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल हों और अपना राजनैतिक आंदोलन चलाते रहें. अगर ऐसा नहीं हुआ तो सैकडों- हजारों पुलिसकर्मी और नक्सली इस हिंसा की भेंट चढ जायेंगे.
निश्चित ही राज्य को भी इसमें पहल करनी पडेगी. इतिहासकार हॉब्सबाम बताते हैं कि दुनिया के बहुत सारे देशों में राज्य सत्ता के समानांतर कई सत्ताएं उभर गयी हैं जो राज्य की सामरिक शक्ति से होड लेती हैं. उनका दमन राज्य कर ही ले यह जरूरी नहीं, जब तक ऐसा नहीं होता शांति बहाल नहीं हो सकती. राज्य अगर सिर्फ दमन करने के इरादे से काम करेगा तो संभव है यह कठिन प्रमाणित हो. ऐसे में दोनों ओर से पहल होनी चाहिए. मीडिया और संस्कृतिकर्मियों का भी यह दायित्व है कि वह हिंसा के मार्ग को एक विकल्प के रूप में देखने प्रवृत्ति का विरोध करे और लोगों में यह जागरूकता पैदा करे कि हिंसा से स्थायी राजनैतिक समाधान संभव नहीं. साथ ही राज्य पर भी दबाव बनाए कि हर तरह की हिंसा को आपराधिक हिंसा न माने और ऐसा सामाजिक माहौल बनाए जिसमें भय और अविश्वास कम हो. एक आधुनिक दृष्टि रखने वाली सरकार और आधुनिक बनने की होड में पिली जनता में यह विवेक तभी आ सकता है जब इस समाज और संस्कृति के उदात्त तत्त्वों के प्रति लोगों की जागरूकता बढे. चाहे जितना भी कठिन हो यह याद रखा जाना चाहिए कि इसी देश में सौ साल पहले एक अहिंसक राजनैतिक आंदोलन हुआ था जो विश्व का सबसे बड स्वाधीनता संग्राम था

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