Monday, 24 August, 2009

प्रभाष जोशी और सती प्रसंग

मुझे खुशी है कि आपने मेरी बातों को सही तरीके से लिया और अच्छा सवाल खडा किया. चार्वाक जी, हम सब ने तुर्गनेव की 'पिता और पुत्र' पढी है. उसका मुख्य पात्र बाजारोव , जो एक निहिलिस्ट था, कहता है कि विध्वंस के बिना सार्थक निर्माण संभव नहीं. एक समय यह बात ठीक लगती थी. लेकिन फिर एक समय आता है जब उसी उपन्यास के एक और पात्र की बात हमारे दिमाग पर हावी होने लगती है- ' यू केन नाट बी द जज आव योर फादर'. हिन्दी की विचित्र स्थिति का अंदाजा मुझसे बहुत ज्यादा आपको होगा. एक समय था जब हमलोग समझते थे कि सुरेन्द्र प्रताप सिंह बहुत पावरफुल आदमी हैं. सच यह नहीं था. प्रभाष जोशी एक समय नौकरी पर रखने की ताकत रखते थे. लेकिन इस तरह की शक्ति के अलावा उनके पास ज्यादा शक्ति नहीं रही होगी. एक व्यक्तिगत किस्सा बताना चाहूंगा. भारत की एक बडी मीडिया संस्था गुजरात समाचार ने तय किया कि वह एक अखबार शुरू करेगी. उस समय जिस आदमी को यह दायित्व दिया गया कि वह जगह जगह से आये आवेदनों पर विचार करके नियुक्तियां करे उसने सबसे पहले मुझे चुना और फिर हम दोनों ने मिलकर बहुत सारी नियुक्तियां की. हमलोग बहुत पावरफुल समझे जाते थे क्योंकि 40 से ज्यादा लोगों को नौकरी दी थी, और भी दे सकते थे. करोडों रूपये का मामला हमलोगों के हाथ में था. मं व्यक्तिगत कारणों से पत्रकारिता छोड कर दूसरे काम में लग गया. बाद में असली पावरफुल व्यक्ति का जो हुआ वह मेरे लिए सबक से कम नहीं था. चार्वाक जी, आप चाहे इसे मेरा सनकीपन समझें लेकिन हो सके तो इस बात को मान लें कि अखबार मालिक हिन्दी के पत्रकार-सम्पादक को चपरासी से ज्यादा नहीं समझते. ऊपर से भले ही आप आप करें भीतर ही भीतर उसे अपना व्यक्तिगत नौकर ही समझते हैं. हिन्दी में वैसे भी दो चार लोग हैं जिसे देखकर हिन्दी वालों को भी थोडा मान मिलता है. रामविलास शर्मा, नामवर सिंह, प्रभाष जोशी, मैनेजर पाण्डेय जैसे लोग कम हैं. आप इन महानुभावों से असहमत हों, उनसे झगडा करे लेकिन उन्हें बचा कर भी रखें. इन सब लोगों में कुछ कुछ ऐसा है जिससे हमें बहुत असुविधा होती है, खीज भी होती है लेकिन क्या किया जाये? हमें हिन्दी के वृहत्तर सरोकारों को ध्यान में रखते हुए इन्हें बचाकर रखना पडेगा. और दो में तीन ब्राह्मण की बात ? हिन्दी का विकास जिस रूप में हुआ है उसको ध्यान में रखने पर यह कुछ स्वाभाविक ही लगेगा. हिन्दी बौद्धिक समाज का चरित्र पिछले 10-15 सालों में तेजी से बदला है. अब यहां अन्य जातियों का दखल बढा है. अब तीन में दो नहीं तीन में एक ब्राहमण ही मिलेगा. समय अब बदला है. उम्मीद है परिदृश्य और भी बदलेगा. कुछ ज़्यादा बोल गया होउं तो क्षमा प्रार्थी हूं.


पर, यह मत समझिएगा कि सती के प्रसंग में जोशी जी की जान हमलोग छोडने वाले हैं.

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