Friday 28 August 2009

भारतीयता के प्रसंग में किशन पटनायक की याद्

भारतीयता के सन्दर्भ के आते ही बातचीत दो दिशाओं की ओर घूम जाती है. एक ओर वे लोग दिखलाई पडने लगते हैं जो भारतीयता के नाम से किसी हिन्दूवादी सोच को देखने लगते हैं और दूसरी ओर ऐसे लोग आ जाते हैं जो लगभग भक्ति भाव से भारतीयता को देखने लगते हैं. इस सन्दर्भ में समाजवादी चिंतक किशन पटनायक के एक लेख का यह हिस्सा पठनीय है. इसे काशी विश्वविद्यालय के ब्लाग पर अफलातून ने रखा है. पूरे लेख के लिए उस ब्लाग पर जाएं.भारतीय समाज में ऐसी कोई बनी – बनाई संस्कृति नहीं है जो इस शून्य को पूरा कर सकेगी । आपका एक सरल विश्वास है कि भारत के ग्रामीण समाज में भारतीय संस्कृति है । भारतीयता के नाम पर जो भी इस वक्त बचा हुआ है , वह एक विकृति है । अगर तपस्या करने का इरादा न हो तो आप जैसे भारतीयतावादी भी बिहार या ओड़िशा के किसी गाँव में एक साल लगातार नहीं रह सकेंगे । आप कहते हैं कि पर्दा – प्रथा भारतीय नहीं है । यह तो आप और हम मानते हैं । पूर्वी उत्तर प्रदेश की किसी ग्रामीण महिला से पूछिए – पर्दा – प्रथा और चूड़ियों को छोड़कर वह भारतीयता की कल्पना नहीं कर सकती है । अगर आप इन चिह्नों को मिटाना चाहेंगे तो वह कहेगी कि आप ईसाई धर्म प्रचारकों द्वारा प्रभावित हैं । पर्दा – प्रथा , चूड़ियाँ , अस्पृश्यता , जाति – प्रथा , सती – प्रथा - यही तो भारतीयता है , भारतीय ग्रामीणों की नजर में । जिस भारतीयता की आप कल्पना करते हैं वह समाज में नहीं है , हमारे खून में या अवचेतन में है , इतिहास में है । हम उसका उद्धार कर सकते हैं बशर्ते कि हम इन विकृतियों से लड़ सकें । विकृतियों से लड़कर ही हम एक नई भारतीयता का सृजन कर सकेंगे । हम अपनी विकृतियों को जानेंगे कैसे ? यहाँ पर हमे यूरोपीय कसौटी पर परीक्षा देनी पड़ेगी । यह इतिहास का नियम है कि एक सभ्यता बनती है , बिगड़ती है और खतम होने के पहले मानव समाज को कुछ मूल्य दे जाती है । संकट के काल में एक सभ्यता के मूल्यों को दूसरी सभ्यता के मूल्यों से परखा जाता है । भारतीय संस्कृति की सारी उपलब्धियों के बावजूद उसमें व्यक्ति की गरिमा या मानव सेवा की परम्परा नहीं है ( न होने के कुछ अच्छे कारण भी रहे होंगे ) । बौद्ध परम्परा को छोड़कर मानव सेवा की वृत्ति भारत में नहीं है । ब्राह्मणवादी हिन्दू परम्परा में यह बिलकुल नहीं है । आपको एक भी पौराणिक नायक , राजा या ऋषि नहीं मिलेगा , जिसने किसी पतित आदमी को , छोटे आदमी को , पापी आदमी को , महामारी से ग्रस्त आदमी को गले लगाकर , गोद में लिटाकर उसकी सेवा की हो । भारतीय संस्कृति की इस मौलिक कमी के परिणामस्वरूप भारतीय समाज में अस्पृश्यता से लेकर सती दाह तक की गलत प्रथायें बनी हुई हैं । इस कमी के विरुद्ध बुद्ध का एक प्रयास था । बुद्ध का प्रभाव मिट गया । विवेकानन्द और गाँधी का प्रभाव भी क्षीण हो चला है । हमारी महान संस्कृति की गहराई में ऐसी एक कमी क्यों रह गयी ? यही तो इतिहास की विचित्रता है ।

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