Friday 21 August 2009

1857 के विद्रोह का इतिहास

1857 के विद्रोह के अध्ययन के सन्दर्भ पर कुछ बेतरतीब नोट्स
हितेन्द्र पटेल


भारत में तीन तरह के इतिहास लेखन होते रहे ह- अकादमिक, प्रेरणादायक आर योगदान को रेखांकित करने वाला इतिहास। इन तीनों प्रकार के इतिहासों की अपनी अलग महत्ता ह आर यह उनके पाठकों पर निर्भर करता ह कि उनके लिये कान सा इतिहास 'सच्चा' ह। तीनों प्रकार के इतिहासों के बीच 1857 के विद्रोह के अध्ययन को लेकर जो विरोध ह उसको ध्यान में रखे बिना इस विषय पर उपलब्ध विपुल सामग्री से मनमाने निष्कर्ष निकालने का सिलसिला चल रहा ह। इस लेख को इसी पीड़ा को महसूसते हुए लिखा गया ह कि इनमें से कोई भी पद्धति इस बात को याद रखने की .जरूरत महसूस नहीं करता कि 1857 का इतिहास लिखते हुए हम प्रायः वर्तमान को ही उसके इतिहास पर प्रक्षेपित कर रहे होते ह। यह कहा जाता रहा ह कि इतिहास किसी भी सूरत में उपलब्ध नहीं होता, वह खो जाता ह, फिर कभी वापस नहीं आने के लिये।
1857 का इतिहास जिस रूप में पेश किया जाता रहा ह आर लगातार यह सिलसिला चल रहा ह उसकी पृष्ठभूमि को समझने के बाद यह स्पष्ट होने लगता ह कि अकादमिक इतिहास भी एक प्रकार की प्रेरणा आर विशेष प्रकार के योगदान को ही रेखांकित करता ह। जसे जसे योगदान आर प्रेरणा के परिदृश्य को सामने रखने वाला इतिहास ज्य़ादा लोगों द्वारा स्वीकृत होता जायेगा वही असली इतिहास बनता जायेगा। हाल फिलहाल तक देश भर में जो राष्ट्रवाद की विचारधारा का वर्चस्व था वह अब एक नयी विचारधारा - दलित विचारधारा से उलझ गया ह। इस विचारधारात्मक वर्चस्व की लड़ाई का जो भी परिणाम निकले, इसने यह तो तय कर ही दिया ह कि राष्ट्रवादी इतिहास में बहुत कुछ जानबूझ कर छुपाया गया ह।
1857 के विद्रोह पर विचार करने की अपनी आर भी दिक्कतें ह। अगर इस दलित आक्रमण की बात को न.जरअंदा.ज भी कर दें तो भी कई मुश्किलें पेश आती ह। एक बड़ी समस्या यह ह कि कोई भी अपने अंचल को दाग़दार नहीं देखना चाहता। 1857 में अगर इस तरह से राष्ट्र अंग्रे.ज विरोधी हो उठा था तो हम हार कसे गये? राजनीति का रोग अब इतिहास में भी पसर गया ह- येन केन प्रकारेण अपने योगदान को ज्य़ादा महत्त्वपूर्ण बनाकर पेश करना। इतिहास में एक पाठ जो सबको सिखाया जाता ह वह ह कि घटना का एक सन्दर्भ होता ह जो विगत समय के साथ घटना के सम्पर्क के अध्ययन से विश्लेषित होता ह।मूल समस्या यहीं से शुरू होती ह। बहुधा 1857 के पूर्व के भारत मे अगरे.जी राज के खिलाफ हुए विद्रोहों आर आर प्रतिवादों को भुला दिया जाता ह। कुछ कम्युनिस्ट समर्थक लेखकों को छोड़कर कोई इस बात की चर्चा नही करना चाहता ह कि 1757 से लेकर 1857 के बीच जो असंख्य किसान विद्रोह हुए थे उसमें किसी प्रकार की राजनतिक चेतना थी कि नहीं ? अगर ये किसान-आदिवासी लोग संगठित होकर विद्रोह कर रहे थे तो उसका बाद के समय से क्या राजनतिक रिश्ता बनता ह?
अकादमिक इतिहास में वही चलता ह, टिका रहता ह, जो बड़े इतिहासकार हमें बतलाते ह। भारत के इतिहास लेखन की सबसे बड़ी विडंबना यही रही ह कि यह समय के शक्तिशाली विचारधारा के प्रभाव में रहकर भारत के इतिहास को पेश करता रहा ह। एक समय यह साम्राज्यवादी, आर फिर राष्ट्रवादी प्रभावों को लेकर चलता रहा ह। दिक्कत यह ह कि इन दोनो दृष्टियों में उद्देश्य अलग होने के बावजूद कुछ एसी समानताएं ह जिससे प्रतिरोध के इतिहास का एक बड़ा इलाका छूट जाता ह। राष्ट्रवाद बनाम आपनिवेशवाद
के समीकरण म ये फिट नहीं होते क्योंकि दोनों ही प्राक्‌-आधुनिक सन्दर्भों के साथ आधुनिक समय को जोड़कर नहीं देखते। प्राक्‌-आधुनिक दोनों के लिए अंधकार का समय ह, पूंजीवादी आधुनिक समय के आने के पहले से चली आ रही ची.जें ज्य़ादा महत्व नहीं पाती। .जमींदार अत्याचारी थे, ब्राह्मण अनाचारी, बनिए क्रूर सूदखोर थे आर यह समाज ( जिसे बाद में भारत बनना था) बहुत ही बंटा हुआ एक पिछड़ा समाज था, जसी तमाम ची.जें हमारे पूरे मानस पर हावी रही ह कि 1857 के सन्दर्भों में आये ब्रिटिश विरोधी प्रतिरोधों के साथ बाद में आये '' राष्ट्रवाद'' को जोड़ना उन्ह परेशान करता ह। एक समाज शास्त्री ने टिप्पणी की ह कि आधुनिक राष्ट्रवाद भारत में एक ''डेरिवेटिव'' ( पराश्रित) विमर्श ह। यानि भारतीय आधुनिक राष्ट्रवाद ने आधुनिक यूरोपीय विमर्श पर निर्भरशील विचारधारा के रूप में अपना विकास किया। आर फिर इस राष्ट्रवाद का स्वरूप 1920 के दशक में जाकर अपना पूर्ण स्वरूप पाता ह। 1870 के दशक से 1920 के दशक के 50-60 वर्षों में यह जो राष्ट्रवाद निर्मित हुआ वह एक एसे बोध से आया था जो तत्त्वतः यूरोपीय आधुनिक विमर्श से गहरे स्तर पर जुड़ा हुआ था।
1857 इस अर्थ में एक 'प्राक आधुनिक' राजनतिक विद्रोह था जिसने एक आधुनिक सत्ता को चुनाती दी थी। यानि 1857 के विद्रोह की जय का एतिहासिक अर्थ होता एक एसी शक्ति की जय जो समाज के विकास के लिये, प्रगति के लिये बाधक होने वाली शक्ति की जीत। विद्रोही एक 'पगली' हवा में 'कुपथ' पर चल पड़े थे। भारत में जो 'इंटेलिजेंसिया' उभर रहा था उसके लिये 1857 के बाद विक्टोरिया की घोषणा ने एक बड़ी आशा को जन्म दिया कि नया समाज बनेगा। एक महत्त्वपूर्ण हिंदी लेखक का एक वक्तव्य जो 1907 में छपे इस लेख से लिया गया ह इस भाव को ही सामने रखता ह- '' सन 1858 ई की राज घोषणा से यहां की प्रजा को यह दृढ विश्र्वास हो गया था कि वास्तव में अंग्रे.जी शासन का अभिप्राय निःस्वार्थ भाव से केवल भारतोन्नति मात्र ह।'' 1870 से 1907 के बीच के हिंदी साहित्य से द.र्जनों उद्द्धरण दिये जा सकते ह जो इसी भाव को प्रगट करते ह
कुछ अर्थों में 1857 का विद्रोह हिन्दुस्तान के अंत आर भारत के जन्म को 'सिग्निफ़ाई' करता ह। जो इस विद्रोह के पक्ष में थे आर जो विपक्ष में थे उनकी चेतना में फर्क था। हिन्दुस्तान के अपने पचड़े थे, अपने तरह की विडंबनाएं थीं, लेकिन उस समाज के पास जो सांस्कृतिक स्मृति थी उसमें कोई हिन्दुस्तानी- हिन्दु, मुसलमान, अछूत कोई भी, अपना था, आर अंग्रे.ज विदेशी थे। विदेशी उनके लिए अलग थे। भारत के साथ जो एक बोध आया उसमें ये बातें क्रमशः मिटती रहीं आर इसी के साथ हिन्दुस्तान भी मिटता रहा।
भारत में इंटेलिजेसिया का उद्भव आधुनिकता के दबाव के कारण हुआ। यह वर्ग शुरू से ही विरोधाभासी तत्त्वा को लेकर चलता रहा। परंपरा आर आधुनिकता के बीच झूलते इस ''सुपर क्लास'' ने भी अपने समय की शक्तिशाली विचारधारा को शक्तिशाली बनने में मदद की। इस बात को स्पष्ट करने के लिए एक उदाहरण पर विचार किया जा सकता ह। फकीर आर सन्यासी विद्रोह पर विचार करते हुए ए एन चन्दर ने 1763 से 1800 के बीच सात चरणों का उल्लेख किया ह। पहले चरण में ही इस बात का उल्लेख मिलता ह कि 5,000 सन्यासी सारन जिले में प्रवेश कर गये थे। इसी सन्दर्भ में 1789 से लेकर 1831 के बीच मुंडाओं के अनेक आन्दोलनों का .जिक्र किया जा सकता ह। 1832 से लेकर 1955 तक के आदिवासी विद्रोह की चर्चा तो अब पर्याप्त होने ही लगी ह। इसके अलावा मालाबार के मोपला विद्रोह की चर्चा भी होती रही ह जिसने 80 बरसों तक किसानों का आन्दोलन .जारी रखा। इन आन्दोलनों के बारे में, टीपू सुल्तान के बारे में, मद्रास के सनिक विद्रोह के बारे मे, 1824 के बरकपुर में हुए सनिक विद्रोह के बारे
मे विचार करते हुए क्या इस बात पर संदेह व्यक्त किया जाना उचित नहीं ह कि 1857 की एक उर्दू पत्रिका में अजीमुल्ला खान की यह छपी यह 'आ.जादी का झंडा' कविता उस समय नहीं लिखी गयी। कविता की ये पंक्तियां अगर 1857 की लिखी हों तो निश्चित ही विद्रोही अपने देश के लिये लड़ रहे थे आर वे ब्रिटिश कम्पनी के विरूद्ध हिन्दू -मुसलमान एकता के महत्त्व को भली भांति समझते थेः
''हम ह इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा, पाक वतन ह काम का जन्नत से भी न्यारा।
....
आया फिरंगी दूर से एसा मंतर मारा, लूटा दोनो हाथ से प्यारा वतन हमारा।
आज शहीदों ने तुझको अहले वतन ललकारा, तोड़ो गुलामी की जं.जीरें बरसाओ अंगारा।
हिंदू, मुसलमां, सिख हमारा भाई-भाई प्यारा,
यह ह आ.जादी का झंडा, इसे सलाम हमारा''
यह संभव ह कि इस कविता को बाद में थोड़ा बदला गया हो लेकिन जो भावनाएं इसमें व्यक्त उस समय की हो सकती ह। खुद मंगल पाण्डे का अपना वक्तव्य ही इसी त.र्ज पर ह।
1857 के कुछ वर्ष पूर्व एक अंग्रे.ज ने एक टिप्पणी की थी जिसे ध्यान में रखना उचित होगा। उन्होंने कहा था कि भारत के कुछ लोग इस कम्पनी राज से प्रभावित ह आर मानते ह कि यह शासन अच्छा ह लेकिन एसे लोगों की संख्या कम ह। अधिकतर लोग अंग्रे.जों से घृणा करते ह आर किसी भी तरह से उन्हें यहां से मार भगाना चाहते ह।1880 के दशक में एक समाचार पत्र में छपा था कि भारत में तीन प्रकार के राष्ट्रवाद ह- एक उदारनतिक, दूसरा हिंदू आर तीसरा मुस्लिम। क्या यह प्रस्तावित किया जा सकता ह कि अंग्रे.ज विद्वान के 1857 के पूर्व के वक्तव्य आर 1880 के दशक में कलकत्ता के एक अंग्रे.जी समाचार पत्र में छपे इस लेख के बीच कोई कोई वक्तव्य छुपा हो सकता ह ?
यह बहुसंख्यक भारतीयों का राष्ट्रवाद ही था जो कालांतर में विविध रूपों में- कभी धर्म के नाम पर, कभी गो-रक्षा इत्यादि के नाम से व्यक्त होता रहा। इस बहुसंख्यक अंग्रे.जों से घृणा करने वाले भारतीयों के राष्ट्रीय होने के इतिहास पर गहरे स्तर पर विचार होना चाहिये। दरअसल उन्नीसवीं सदी के इतिहास को लेकर दो बड़ी समस्याएं ह। पहली समस्या ह कि जो राष्ट्रवादी विचारधारा का निर्माण कर रहे थे वे एक साथ अपनी जाति आर अपने धर्म के लिये भी काम कर रहे थे। उनके लिये हिन्दू धर्म, जाति धर्म आर राष्ट्रीय धर्म तीनों एक साथ चलते थे। एसे बहुत सारे लोग थे जिनके लिये हिन्दू जाति के संगठन का दायित्व, हिन्दुओं द्वारा वर्णाश्रम धर्म का पालन दोनों ही राष्ट्र निर्माण के लिये .जरूरी थे। जिसे हिन्दी नवजागरण से जुड़े हिन्दी इंटेलिजेंसिया की विचारधारा को ठीक से समझना हो उन्हें बलिया में भारतेन्दु के भाषण की तुलना में प्रताप नारायण मिश्र के 'हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान' या प्रेमघन के 'हिन्द, हिन्दू आर हिंदी' पर ज्य़ादा ध्यान देना चाहिये। यह सही ह कि हिंदी इंटेलिजेंसिया के लेखन में पूरी तरह आपनिवशिक शासन का स्वीकार नहीं ह आर वे कई मामले में असन्तुष्ट ह आर वे भारतवर्ष की दरिद्रता पर व्यथित भी थे। लेकिन, उनके असंतोष का एक प्रमुख कारण यह भी था कि उनके सनातन धर्म का मान घटता जा रहा था आर परम प्रतापी अंग्रे.ज शासन द्वारा हिंदू हित का ध्यान न रखकर विधर्मी यवन के प्रति सदय बने हुए थे।
दूसरी बड़ी समस्या यह ह कि आपनेवशिक शासन के प्रभाव से भारतीय समाज पर पड़ने वाले दबावों आर उसके परिणामस्वरूप आये वचारिक बदलावों को समझने के लिये नवजागरण से जुड़े लोगों के द्वारा समझने की कोशिश करना। यह प्रस्तावित किया जा सकता ह कि हिंदी नवजागरण हिंदी समाज में हो
रहे परिवर्तनों को एक सीमा तक ही समझने में सहायक हो सकता ह। निम्न वर्गीय (या निम्न वर्णीय) इतिहास के प्रसंगों को लाने से स्पष्ट हो जाता ह कि हिंदी समाज कई स्तरों पर आपनिवशिक दबावों से जूझ रहा था।भारतेन्दु के पिता का घर 1857 के दारान विद्रोहियों के खिलाफ लड़ रही सेना के अस्त्रागार का काम करता था। 1857 के एक इतिहासकार ने स्वीकार किया ह कि अवध के सिपाही बनियों से बड़ी नफरत करते थे क्योंकि उन्होंने अंग्रे.जों की बड़ी मदद की थी। भारतीय राष्ट्रवाद के अंदरूनी संघर्षों को, अंतर्विरोधों को ध्यान में न रखकर हम उन्नीसवीं शताब्दी के इतिहास की एकांगी व्याख्या ही कर पाते ह। क्या भारतेन्दु के युग के निम्न जाति के लोग सोचते विचारते थे ? उनके सोच को सामने लाने के जो थोड़े प्रयत्न बद्रीनारायण, साधना इत्यादि जसे लोगों ने किया ह उससे तो साफ लगता ह कि बहुत सारी बातें ह जिसको समझने के लिये लिखित श्रोतों से आगे जाकर देखने की .जरूरत ह। यह देखने की .जरूरत आर भी अधिक इसलिये भी .जरूरी हो गया ह क्योंकि राष्ट्रवाद को चुनाती देने के लिये आज दलितवाद एक शक्तिशाली विचारधारा के रूप में उभर चुकी ह आर उसने राष्ट्रवाद के इतिहास को सवर्ण हिन्दू मानस की निर्मिति के रूप में देखने की शुरूआत कर दी ह।
हिन्दी में 1857 के इतिहास पर असंख्य पुस्तकें हें, पर प्रभाव की दृष्टि से 1907 में सरकार द्वारा सहयाग मिलने के पूर्व तक के समय में जिन पुस्तकों का सबसे व्यापक प्रभाव रहा ह वे हः
रामविलास शर्मा, भगवानदास माहार , वृन्दावनलाल वर्मा, के के दत्त, दुर्गाशंकर सिंह की पुस्तकें। हाल के वर्षों में प्रदीप सक्सेना, कर्मेन्दु शिशिर, रश्मि चाधरी जसे विद्वानों ने भी 1857 पर गंभीर शोध कार्य किये ह। इन सभी पुस्तकों की एक बड़ी सीमा ह कि इसमें दो चेतनाओं - हिन्दुस्तानी आर भारतीय के बीच एक असहज समन्वय दिखलाकर, कई असुविधाजनक सवालों को दबाकर, आधुनिक नवजागरण की अवधारणा के सहारे इतिहास को देखने की कोशिश। नवजागरण के चरित्र पर यहां चर्चा संभव नहीं, लेकिन जिस तरह से इन लोगों ने राममोहन राय, बंकिम, भारतेन्दु की चेतना से मंगल पाण्डे, नाना साहब, बहादुरशाह .जफर, कुंवर सिंह इत्यादि की चेतना को जोड़ने की कोशिश की ह उससे हम मन कितना ही प्रसन्न हो वह एतिहासिक रूप से भ्रामक ह। इस ''राष्ट्रवादी'' मोह ने तत्वतः इंटेलिजेंसिया के उसी प्रोजेक्ट को स्वीकार किया जिसमें भारत के आने के आपनिवेशिक, प्राच्य-वादी को इतिहास की गति के रूप में स्वीकार किया गया था। जिस राष्ट्र के निर्माण में इंटेलिजेंसिया जुटा रहा वह एक एसे राष्ट्र का की कल्पना थी, जो बुनियादी रूप से समाज को एक नये सांस्कृतिक धरातल को तयार कर रहा था जिसमें राज्यसत्ता के हाथ में सामाजिक, राजनतिक आर आर्थिक शक्तियों का जाना देर-सवेर तय था। इसके फलस्वरूप इंटेलिजेंसिया ने जिस राष्ट्रवाद को प्रतिष्ठित किया वह दमनकारी पूंजीवादी आधुनिक व्यवस्था के लिए कटिबद्ध था। देश का जो अर्थ कुंवर सिंह या उनके लिए होता था उसके मायने समझने की समझदारी लोक में धकिया दी गयी आर वहां उनकी उपस्थिति बनी रही। एसे बहुत सारे नायक इस हिन्दुस्तान के कोने कोने में रहे होंगे जिन्हें लोक परंपराओं में तो प्रतिष्ठित पाया जाता ह लेकिन जिसकी स्वीकृति इस नये राष्ट्रीय चेतना में नहीं ह। उन्नीसवीं सदी की इसी दोहरी मानसिकता के दर्शन हमें किसी भारतीय भाषा में 1857 के विद्रोह के पहले इतिहासकार रजनीकांत गुप्त के इस कथन में होती ह जिसमें वे कहते ह कि ''हम कनवर
(कुंवर) सिंह को जसा भी समझें लेकिन बिहारियों के बीच वे बहुत श्रद्धा से याद किए जाते ह।'' यह जानने की इच्छा होती ह कि कुंवर सिंह को ''जसा भी'' क्यों समझा जाता रहा?
इस प्रश्न का उत्तर देने के पहले कुछ बातों का उल्लेख करना उचित होगा। सुधीर चन्द्र ने अपने
हाल के कुछ शोध आलेखों में यह दिखाने का प्रयास किया ह कि 1857 का परवर्ती समय के लेखन पर व्यापक प्रभाव रहा ह। वे 'हिन्दू पेट्रियाट' के उदाहरणों से आर कुछ अन्य श्रोतों से यह दिखलाते ह कि उस समय के लेखकों में 'एम्बिवेंलेंस' ( दुचित्तापन) ह। दोनों तरह की बातें उनके यहां मिलती ह। 1857 का प्रत्यक्ष विरोध भी आर 1857 का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन भी। यह बात एक घालमेल की स्थिति पदा करती ह। यूं तो दुचित्तापन विक्टोरियन मानस का एक सहज स्वभाव ह, लेकिन 1857 को लेकर जो स्थिति ह उसमें दुचित्तापन कम ह। सदानन्द मिश्र, राधाचरण गोस्वामी से लेकर ब्रजरत्न दास तक के लेखकों में जो बात उभर कर आती ह वह कुछ आर ही बयां करता ह। 'सरस्वती' के यशस्वी सम्पादक महावीर प्रसाद द्विवेदी की कलम से निकला था कि झांसी की रानी आर नाना साहब नृशंश हत्यारे थे! एसे असंख्य उदाहरण ह जिसके आधार पर यह कहना ग़लत नहीं होगा कि हिन्दी का इंटेलिजेंसिया दरअसल 1857 की जिस समझ को 1920 के दशक तक ढोता रहा वह आर कुछ हो उन अर्थों में तो राष्ट्रीय नहीं ही था जिन अर्थों में 1857 के बाग़ी राष्ट्रीय थे। इसके बाद 1857 को आधुनिक राष्ट्रीय विमर्श ने अपनी सुविधा से 'अप्रोपियेट' कर लिया। असुविधाजनक सवालों को छोड़ दिया गया आर एक तरह से 1857 की चेतना आर 1920 के राष्ट्रवादियों कि चेतना के गुणात्मक अंतर को भुला दिया गया।
एक बार फिर उन्नीसवीं शताब्दी के दोहरे राष्ट्रवादी चेतना पर लाटना .जरूरी ह। अगर 'पयामे आ.जादी' जसी उर्दू में छपी कविताओं को अगर छोड़ भी दें तो एसे उदाहरणों की कमी नहीं जिसमें 1857 के विद्रोह को सही तरीके से देखने की कोशिश की गयी ह। केशवराम भट्ट की पुस्तक 'सज्जाद सुम्बुल' (1874) का .जिक्र किया जा सकता ह। यह किताब उर्दू में भी छपी आर 1870 के दशक में 'बिहार बन्धु' ( हिन्दी समाचार पत्र) में धारावाहिक रूप में हिंदी मे छपी थी। लेकिन बाद के वर्षों में जसे जसे नवजागरण कालीन साहित्य में सामाजिक आर जातीय सरोकार बढने लगे 1857 के प्रति पुराने पिछड़े मुसलमानी शासन के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण हावी होने लगा आर वर्णाश्रमी हिन्दूपन हावी होने लगा। अधिकांश हिन्दी के लेखक- पत्रकार गांवों से आये थे इसलिए लोक के साथ उनका सम्पर्क तो बना रहा लेकिन इन मसीजीवियों की विचारधारा उन्हें धीरे धीरे एक एसी ओर ले गयी जहां राष्ट्रीय होना धार्मिक होने जसा हो गया। यहां आकर वे राष्ट्रीय कांग्रेस की विचारधारा में अपनी सामाजिक आर राष्ट्रीय मुक्ति का स्वप्न देखने लगे। इस तरह से राष्ट्रीय होने के अपने फायदे आर अपने नुकसान ह।
जब यह सब कुछ हो रहा था चुनातियां आपनिवेशिक शासन आर साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद दोनों ओर से उपस्थित थे। 1923 से 1928 के बीच के इतिहास को ठीक से पढने से पता चलता ह कि कांग्रेस की दिक्कतें कितनी अधिक थी। उसे हिन्दू, मुसलमानों के प्रति सहिष्णु, राष्ट्रीय, आधुनिक, लोकप्रिय, अहिसक सबकुछ होना आर दिखना था। यही वह भावभूमि ह जिसमें पहली बार 1857 के प्रति भारतीय राष्ट्रवादी न.जरिये ने सहानुभूतिपूर्वक विचार करना शुरू किया। अब 1857 के वीर नायक आर नायिकाएं नये तरीके से प्रस्तुत होने लगे आर उनके संग्राम को राष्ट्रीय मुक्ति का संग्राम माना गया आर उनका यशोगान किया गया। 1885 के बाद 1928-29 तक के समय में कुंवर सिंह जसे लोगों का स्मरण राष्ट्रवादी नेताओं ने किया? 1909 में छपकर 1916-22 के बीच क्रान्तिकारियों के बीच 1857 पर लिखी सावरकर की पुस्तक का प्रचार हो चुका था फिर भी ! हिन्दी के यशस्वी लेखक आर 'मनोरंजन' आर 'हिंदू' पंच के प्रतिष्ठित संपादक ईश्र्वरीप्रसाद शर्मा ने भी जब 1922 में 1857 का इतिहास लिखा तो कुंवर सिंह की उदारता का, उनकी लोकप्रियता को जिन शब्दों में याद किया ह उसे देखना चाहिये। वे लिखते ह कि कुंवर सिंह ने ब्राह्मणों
को उदारतापूर्वक .जमीन दी थी। उसी .जमीन पर शर्मा का परिवार बसा था इसलिये लेखक ने उन्ह कुछ उदारता से याद किया था।

लक्ष्मीबाई आर उनका इतिहासः कुछ सन्दर्भ

प्रभा पत्रिका ने 1924 में एक लेख प्रकाशित किया जिसमें लक्ष्मीबाई को स्वतंत्रता की देवी के रूप में देखा गया था। इसमें ये पंक्तियां ध्यान देने योग्य ह : '' भारतीय नवयुवकों की जागृत हृदयों में खून डालने वालों में प्रात; स्मरणीया महारानी लक्ष्मीबाई ह। अंग्रे.ज लेखकों ने उनकी कीर्ति-ज्योति को व्यक्त नहीं किया क्योंकि स्वदेश आर स्वधर्मार्थ चंडी-रूपा धारण करके अपनी भयंकर तलवार की धार से अनेक युद्ध-प्रवीण अंग्र.जी सेना को कई बार गाजर मूली की तरह काट डाला। समय नहीं बीता, संभव ह अभी भी दो चार पार्थिव शरीरधारी विद्यमन हों जिन्होंने महारानी के दिव्यदर्शन किये हों। महारानी ने सिपाही विद्रोह में अंग्रे.जों के विरूद्ध अपनी कटकरी तलवार खींची थी, वह अपने लिए नहीं, वरन भारत माता के करूण क्रंदन से विह्वल होकर, उसको दासता के पाश से मुक्त करने के लिए। यह भारत वासियों का दुर्भाग्य ह कि वे महारानी के जीवन से अनभिग्य ह। प्रभा के पाठकों आर विशेष कर नवयुवकों के लिए वीर रस की मूर्ति शत्रु-संहारिणी देवी चंडी स्वरूपा लक्ष्मीबाई की निष्पक्ष जीवनी दी जाती ह।''
एसा नहीं था कि लक्ष्मीबाई के जीवन को लेकर इसके पहले लिखा नहीं गया था। हिन्दी में तो कम लेकिन मराठी आर बंगला भाषा में उन्नीसवीं सदी में बहुत सारे उल्लेख मिलते ह आर प्रायः एक प्रशंसा का भाव रहा ह। कम से कम 1890 के दशक से तो लक्ष्मीबाई पर कई पुस्तकें लिखी गयीं। मराठी में दत्तात्रेय बलवंत पारसनीस का 'लक्ष्मीबाई का चरित्र' (1894), शंकरराव सप्तर्षि आणि कम्पनी द्वारा प्रकाशित 'झांसी संस्थानची राणी लक्ष्मीबाई इचे चरित्र' (1895), बंगला में रजनीकांत गुप्त की 'सिपाही युद्धेर इतिहास' (1876 में प्रथम खंड) तथा 'वीर महिमा' (1885), चंडीचरण सेन की 'झांसीर रानी' (1888) वे पुस्तकें ह जिसका व्यापक प्रचार हुआ था। इसके अलावा 1870 के दशक से ही लक्ष्मीबाई की वीरता के प्रति प्रशंसा होती रही थी। इस तरह की पुस्तकों में लक्ष्मीबाई के प्रति प्रशंसा भाव को समझने के लिये चंडीचरण सेन की पुस्तक के इस अंश को देखा जा सकता ह- ' रानी लक्ष्मीबाई जसी वीरांगना ने यदि इंग्लण्ड अथवा अमेरिका में जन्म ग्रहण किया होता तो लोग अपने घरों में उसकी प्रतिमा रखते। किन्तु भारतवर्ष के लोग अभी तक लक्ष्मीबाई के गुणों के गुणों को ग्रहण करने में समर्थ नहीं हुए ह। ' 'मांझा प्रवास' मराठी पुस्तक का प्रकाशन भी हो चुका था जो 1880 के आसपास तक लिख ली गयी थी । लेकिन, इक्का दुक्का अपवादों को छोड़कर कहीं भी यह पता नहीं चलता कि ये लेखक 1857 को राष्ट्रीय विद्रोह मानते थे या फिर उसे स्वाधीनता संग्राम के रूप में देखकर विद्रोहियों के उद्देश्य के प्रति आदरभाव रखते थे। पारसनिस की पुस्तक में बंगला जीवनीकारों की तरह लक्ष्मीबाई की वीरता के प्रति आदरभाव है लेकिन उसे गलत माना गया है। राय बहादुर पारसनीस ने लक्ष्मीबाई के अतिरिक्त एक अन्य रानी की जीवनी भी लिखी है - जिसने तमाम कष्टों औन अन्यायों के बावजूद अंग्रेजी शासन का विरोध नहीं किया।
इन लेखकों के लिए लक्ष्मीबाई की वीरता तो प्रशंसनीय थी, लेकिन जिस उद्देश्य के लिए वह लड़ रही थी वह सही नहीं था!
'प्रभा' में छपे लेख ने जिस तरह से लक्ष्मीबाई को देखा था वह लक्ष्मीबाई के जीवन चरित को एक
नयी तरह से देखने की हिंदी में शुरूआत थी। हालांकि सावरकर की पुस्तक पहले आ चुकी थी आर गदर पत्रिका भी किसी न किसी रूप में एक प्रभाव के रूप में हिंदी भाषी पढे लिखे लोगों में जानी जा चुकी थी लेकिन 1857 के वीरों आर वीरांगनाओं को राष्ट्रीय आन्दोलनकारियों के रूप में देखने की शुरूआत के रूप में यह एक बड़े परिवर्तन का सूचक था। पारसनीस की थीसिस को बदलने आर लक्ष्मीबाई की देवी छवि की निर्मात्री हिन्दी की एक ओजस्वी कवियित्री सुभद्रा कुमारी चौहान थी जिसने 22 साल की उम्र में लक्ष्मीबाई पर जो कविता लिखी उसने मानो लक्ष्मीबाई का इतिहास ही बदल दिया। 'खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी' पारसनीस की रानी से भिन्न थी। पारसनीस और उनके समकालीनों की यह मान्यता कि रानी लक्ष्मीबाई के साथ जो अन्याय हुआ उससे रानी बाध्य होकर लड़ीं, अब बदल गयी। रानी स्वतंत्रता का संदेश देने वाली एक ऐसी वीरांगना में परिणत हो गयी थी जो देश के लिए लड़ रही थी खुद अपने लिए नहीं। बुंदेले के हरबोलों के मुख सुनी कहानियों के आधार पर यह लक्ष्मीबाई का नया इतिहास था जिसे राष्ट्रवादी साहित्यिक मन नये सिरे से तैयार कर रहा था। इस नयी राष्ट्रीय छवि के उद्देश्य स्पष्ट थे। रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब, तात्या टोपे, कुंवर सिंह, अजीमुल्ला, पीर अली, बहादुरशाह इत्यादि सभी एक दूसरे से राष्ट्रीय सूत्र में बंध गये थे। यह प्रमाणित किया जाने लगा कि 1857 में बैरकपुर से शुरू हुआ विद्रोह दरअसल गलत समय पर शुरू हो गया। इसके बहुत पहले से देशव्यापी राष्ट्रीय विद्रोह की तैयारियां चल रही थी। अभी हाल में कर्मेन्दु शिशिर ने इस थीसिस को फिर से आगे बढाने की कोशिश की ह। उन्होंने 18 अक्टूबर 1855 को हरिद्वार में स्वामी पूर्णानंद द्वारा आयोजित सभा में स्वामी विरजानंद के व्याख्यान,स्वामी दयानंद, अजीमुल्ला-नाना साहब इत्यादि लोगों द्वारा देश-व्यापी विद्रोह की तयारी को एतिहासिक तथ्य के रूप में स्वीकार किया ह। नाना साहब इस तैयारी के सूत्रधार थे। जब से अजीमुल्ला यूरोप से लौटकर आये थे जहां उन्होंने क्रीमिया का युद्ध देखा, यह समझ लिया कि अंग्रेजों की असली शक्ति है भारत पर अधिकार, तब से इस भारतव्यापी विद्रोह की तैयारियां शुरू हो गयी। गैरीबाल्डी, और रूस के शासकों से भी अजीमुल्ला का सम्पर्क हुआ था। गैरीबाल्डी तो अपनी सेना लेकर भारतीय विद्रोहियों की मदद के लिए चलने ही वाला था कि उसे सूचना मिली कि विद्रोह समाप्त हो गया। इस तरह की तमाम बातों को सुभद्र कुमारी चौहान से लेकर ऋषभ चरण जैन इत्यादि के विवरणों में देखा-महसूस किया जा सकता है। चौहान की ओजस्वी कवित्त शक्ति ने लक्ष्मीबाई का जो इतिहास रूप रचा वही असली लक्ष्मीबाई के रूप में हिन्दी साहित्य में स्वीकृत हो गया। इसी स्वीकृति पर प्रामाणिकता की मुहर तब लगी जब दशकों की शोध-यात्रा के बाद वृन्दावनलाल वर्मा ने लक्ष्मीबाई की जीवनी औपन्यासिक रूप में 1946 में प्रकाशित की। लगभग इसी तरह की कहानियाँ तात्या टोपे, नाना साहब और कुंवर सिंह की भी है। ये सभी लोग पहले बाध्य होकर लड़ने वालों के रूप में इतिहास में वर्णित थे लेकिन राष्ट्रवादी उभार के दौर में उनकी ऐतिहासिक छवियाँ पुनर्निर्मित हुईं और उनके जीवन के आधार पर साहित्यिक-ऐतिहासिक कृतियां सामने आयीं। कौन भूल सकता है आरसी प्रसाद सिंह की वह ओजस्वी कविता जिसमें वे कहते हैं - ''अस्सी बरस की हड्डी में जागा जोश पुराना था, सब कहते हैं कुंवर सिंह भी बड़ा वीर मर्दाना था।'' कुंवर सिंह का जो उपलब्ध इतिहास हमारे पास है ये कथाएं, कविताएं उनकी छवि को उससे दूर ले जाती हैं, बहुत ज्य़ादा प्रभावी बनाती हैं और शायद इतिहास से निकलकर ये छवियां इतिहासों में तब्दील हो जाती है।
नाना साहब और तात्या टोपे का प्रसंग भी कम दिलचस्प नहीं। ऋषभ चरण जैन का 1932 में छपा उपन्यास 'गदर' स्वाधीनता संग्राम पर प्रकाशित हिन्दी का पहला ग्रन्थ है जिसमें दृढ़ता से 1857 के विद्रोहियों
को राष्ट्रीय नायकों का दर्जा दिया गया। उपन्यास का नायक अ.जीमुल्ला एक सुदर्शन व्यक्तित्व का मालिक है जो अपने स्वामी नाना साहब की पुत्री से प्रेम करता है। नाना साहब की पुत्री को चार्ल्स नामक अंग्रेज कलंकित करता है। नाना साहब असली मराठा का कर्त्तव्य पालन करते हुए अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए अंग्रेजों की सेना को चीरते हुए चार्ल्स तक पहुंचते हैं और उसकी हत्या करते हैं और उसका खून पीते हैं! यह वह बिन्दु है जो हमें राष्ट्रीय कल्पना और औपनिवेशिक कल्पनाके बीच एक सूत्र को दर्शाता है। दिल्ली पर आक्रमण के बाद बहादुरशाह .जफ़र हार जाते हैं और पुत्र समेत उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है। उनके पुत्रों की हत्या उनके सामने कर दी जाती है ओर हडसन नामक जनरल मुगल राजकुमारों का रक्त पान करता है। घृणा और विद्वेष की चरम अभिव्यक्ति के रूप में शत्रु को मारकर उसके रक्त को पीना यह एक मध्ययुगीन बर्बरता के उदाहरण-सा लगता है जिसे आधुनिक हडसन अंजाम देता है। ऋषभ चरण जैन के विवरण में यह कृत्य एक वीरोचित कर्म है और, ख्वाजा हसन के वृत्तांत में यह अत्याचार और दमन का प्रतीक है।
गदर में जैन ने दिखलाया है कि किस प्रकार कई विदेशी भाषाओं के जानकार, आधुनिक ज्ञान से युक्त अ.जीमुल्ला लंदन जाकर नाना साहब की पेंशन के लिए पैरवी करते हैं। वे असफल होते हैं और यूरोप प्रवास के दौरान अन्य यूरोपीय शक्तियों से ब्रिटेन विरोधी संभावित विद्रोह के लिए समर्थन पाने की चेष्टा करते हैं। तीस के दशक में कई ऐसे उपन्यास लिखे गये जिसमें राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत लेखकों ने 1857 का एक राष्ट्रीय इतिहास लिखा। इस राष्ट्रीय इतिहास में कल्पना का तत्त्व कितना प्रभावी था इसे भी ध्यान में रखना चाहिए। एक उपन्यासकार ने यह दिखलाया कि तात्या टोपे को फांसी देने के क्रम में तात्या की जगह कोई और देशभक्त फांसी पर तात्या बनकर चढ़ गया। तात्या हिमालय चले गये। अंग्रेज चूंकि तात्या को पहचानते नहीं थे इसीलिए वे यही समझते रहे कि उन्होंने तात्या को फांसी दे दी। एक अन्य उपन्यास में लक्ष्मीबाई को भी बाद तक जीवित दिखलाया गया और बताया गया कि जो लक्ष्मीबाई बनकर अंत में शहीद हुई वह कोई और थी। लक्ष्मीबाई हिमालय चली गयी और 80 वर्ष तक जीवित रही।
लक्ष्मीबाई की छवि में आये गुणात्मक अन्तर को दो स्तरों पर समझा जा सकता ह। प्रथम- एक नये शक्तिशाली विचारधारा के जनप्रिय होने में सहायक एक 'सिम्बल' के रूप में आर दूसरे लोक छवि के राष्ट्रीय विचारधारा में आत्मसात होने के चिन्ह के रूप में।
लक्ष्मीबाई के जीवन पर 1890 के दशक में एक अंग्रेज लेखक ने एक नाटक लिखा। इसमें दिखलाया गया था कि कामातुर लक्ष्मीबाई ने एक अंग्रेज अफसर को अपने मोहमाश में बांधना चाहा। कर्त्तव्यपरायण अंग्रेज अफसर ने रक्तपिपासिनी रानी के अधम प्रस्ताव को जान की परवाह न करके ठुकरा दिया। लगभग इसी तरह का एक नाटक 1930 के दशक में एक अंग्रेज द्वारा लिखा गया। 1890 के दशक में नाटक का विरोध न हुआ लेकिन 1930 के दशक में तीव्र राष्ट्रवादी विरोध के फलस्वरूप प्रकाशक को विवादित अंश हटाने पड़े और माफी मांगनी पड़ी। यहां शैलेन्द्रधारी सिंह ने ठीक ही कहा है कि 1857 ने ब्रिटेन के साम्राज्यवादियों को, उसके गर्वीले राष्ट्रवादियों को अपनी जाबांजी और मर्दानगी को प्रदर्शित करने का, अपना गौरव गान करने का मौका प्रदान किया। अंग्रेजों ने बहुत सारे ग्रन्थ लिखे जिसमें 1857 की घटनाओं को पार्श्र्व में रखकर अंग्रेजों के जय की, उनकी महानता का आख्यान निर्मित किया। डा0 सिंह ने यह ईशारा भी किया है कि यह देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रवादी उभार के दौर में जब इस आख्यान का प्रतिवादी आख्यान निर्मित हुआ किस तरह की कल्पनाओं ने इतिहास से मिलकर ऐतिहासिक आख्यान को
तैयार किया।(दुर्भाग्य से डा0 शैलेन्द्रधारी सिंह को यह मौका नहीं मिला। पटना में उनके आवास पर कुछ लोगों ने उनकी हत्या कर दी।)
दूसरी ओर लक्ष्मीबाई की जो छवि 1920 के दशक में प्रचारित होने लगी वह उनकी धर्मपरायण हिन्दू छवि थी जो उनके ब्राह्मण होने आर सनातनी रूप को ज्य़ादा उजागर करती थी। एसे तमाम अंश छोड़ दिये गये जिससे हिन्दू राष्ट्रवादी छवि धूमिल होती थी। लक्ष्मीबाई की जो तस्वीर जनमानस में ज्य़ादा प्रचारित ह वह हिन्दू देवी जसी ह जो एतिहासिक रूप से भ्रामक ह। जिन लोगों ने लक्ष्मीबाई को देखा था वे बताते थे कि वह देखने में लड़कानुमा थी, पुरूषों की पोशाक ( जो मुसलमानी पोशाक थी) में लोगों के बीच आती थी। लेकिन धीरे धीरे इस असली छवि को धूमिल कर दिया गया। लक्ष्मीबाई का एक प्रामाणिक चित्र ह जिसमें वह हुक्का पी रही ह। हुक्का गुड़गुड़ाती लक्ष्मीबाई 1920 के प्रशंशकों को स्वीकार्य न थी। वे तो उस देवी की पूजा करते थे जो हिन्दू आदर्शों के लिए लड़ रही थी, जिसके मार्ग दर्शक ब्राह्मण गुरू थे जिनकी प्रेरणा से वह हिन्दू भारत के लिये धर्म-युद्ध कर रही थी।
बाद के वर्षों में हिंदी में अनेक उपन्यास आर कहानियां लिखी गयीं जिसमें उन्हें अनेक रूपों में देखने की कोशिश की गयी। इन सबका एक सुन्दर विवरण भगवानदास माहार की 1857 का हिंदी साहित्य पर प्रभाव पुस्तक में उपलब्ध ह। एक एसी पुस्तक भी आई जिसमें दिखलाया गया ह कि तात्या टोपे की जगह कोई आर तात्या टोपे बनकर फांसी पर चढ गया आर असली तात्या कभी पकड़ में नहीं आया !

कुंवर सिंह का प्रसंग

लक्ष्मीबाई की तरह कुंवर सिंह की छवि भी 1920 के दशक में बदली। वे भी एक लोक नायक से एक राष्ट्रीय नायक के रूप में इसी दार में प्रतिष्ठित हुए। हर इलाके के जो अपने अपने नायक थे उनके लिये लोकगीतों में जिस तरह का आदर आर सम्मान था वह उन्नीस सा बीस के सन्दर्भ में धीरे धीरे राष्ट्रीय गाथा के रूप में स्वीकृत होने लगा। जहां लक्ष्मीबाई के नाम की जरूरत थी वहां वह आर जहां कुंवर सिंह की बात कहने से बात बनती थी वहां कुंवर सिंह ही सही। मनोरंजन प्रसाद सिंह की जिस कविता का उल्लेख बार बार किया जाता ह वह 1929 मे पहली बार छपी। जिस पत्रिका में वह कविता छपी थी उसे प्रतिबंधित कर दिया गया। आ.जादी के बाद यह कविता जनता के सामने आई। इस कविता पर सुभद्राकुमारी चाहान की लक्ष्मीबाई कविता का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखलाई पड़ता ह। कुंवर सिंह की कहानी कहने वालों को क्या इस बात का उल्लेख नहीं करना चाहिये कि इस कविता के प्रकाशन का क्या सन्दर्भ ह? इस बात का उल्लेख किया जाना चाहिए कि कुंवर सिंह की प्रशंसा में लिखा गयी यह कविता के संदर्भ का उनकी दो सबसे महत्त्वपूर्ण जीवनिया में स्थान नहीं दिया गया ह। कुंवर सिंह की जीवनी मथुराप्रसाद दीक्षित ने 1930 के दशक में लिखी। 1947 के बाद सरकारी पहल पर उनके प्रामाणिक जीवनी लिखने का कार्यभार प्रसिद्ध इतिहासकार डा कालिकिंकर दत्त को सापा गया। यह पुस्तक 1957 में अंग्रे.जी में आर 1959 में हिन्दी में छपी। इसमें इस कविता का उल्लेख नहीं ह। इस बीच महाराजकुमार दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह की पुस्तक 1955 में छपी। इसमें प्रमुखता से इस कविता को स्थान दिया गया ह। इसमें लिखा गया ह कि '' 1921 ई के आन्दोलन के बाद कुंवर सिंह कलाकरों तथा नेताओं द्वारा खूब याद किये गये। डुमरांव के श्री मनोरंजन प्रसाद, एम ए जो छपरा के राजेन्द्र कालेज के प्रिंसिपल थे, लिखा था-'' था बूढा पर वीर बांकुरा कुंवर सिंह
मरदाना था...'' यह भ्रामक ह। एसा प्रतीत होता ह कि यह कविता 1921 के आसपास लिखी गयी कविता ह। यह बहुत बाद में छपी ह। बाद की बहुत सारी पुस्तकों में यह बात दुहरायी जाती रही ह।
कुंवर सिंह की कहानी की एसी कई बातें ह जिस ओर कम ध्यान दिया जाता ह। उनके इतिहास का आधा अधूरा सन्दर्भ इसलिए भी रखा जाता ह ताकि बाकी बातों से उठने वाले सवालों से बचा जा सके। इस निबन्ध में उनके इतिहास के बारे में कुछ प्रसंगों की चर्चा की गई ह जिससे यह स्पष्ट हो सके कि कुंवर सिंह के विद्रोह को सिर्फ किसी 80 साल के पराक्रमी राजपूती शार्य की कथा बना कर न देखा जाय।

कुंवर सिंह के इतिहास को कई तरीके से देखा जा सकता ह। उनके जीवन से लेकर 1957-58 में उनके अंग्रे.ज विरोधी अभियानों को लेकर तो लिखा जाना ही चाहिये यह भी देखा जाना चाहिये कि उन्हें लोगों ने कसे याद रखा। इस ओर भी ध्यान देना चाहिये कि लेखकों ने उनके इतिहास को पेश करते हुए जो जोड़ घटाव किया उसके कारण क्या थे। मोटे तार पर यह कहना ठीक होगा कि कुंवर सिंह का इतिहास आर उनके इर्द गिर्द उठ खड़ा हुआ मिथक जो उनके इतिहास से ज्य़ादा शक्तिशाली हो गया ह अध्ययन की दो अलग अलग दिशाएं हो सकती ह। कुंवर सिंह को केन्द्र में रखकर असंख्य लोक-कथाएं, लोक-गीत, लोक-इतिहास रचा गया ह जिसने आरा के भोजपुरी भाषी समाज में उनकी एक लोकनायक की छवि निर्मित की ह। इस दिशा में पहले दुर्गाशंकर सिंह आर हाल में रश्मि चाधरी, ने बहुत सारे साक्ष्य दिये ह। इन साक्ष्यों के आधार पर यह तो प्रमाणित होता ही ह कि बिहार वासियों ने कुंवर सिंह को हमेशा याद रखा। लेकिन इतिहास की कसाटी पर इस प्रकार के साक्ष्यों की एक सीमित भूमिका ह। न तो इससे 1957 के विद्रोह का इतिहास लिखा जा सकता ह आर न ही 1857 के विद्रोहियों की ''राष्ट्रीय भावना'' आर उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में उभरे आधुनिक राष्ट्रवाद के जटिल संबंधो के इतिहास लेखन में मदद मिलती ह। कुल मिलाकर अभी भी कुंवर सिंह के इतिहास पर गंभीर एतिहासिक शोध की .जरूरत बनी हुई ह। एसा होने के कई कारण ह जिसमें सबसे महत्त्वपूर्ण ह इतिहासकार का आधुनिक आग्रह। 1957 में कुंवर सिंह पर जो प्राथमिक श्रोत उपलब्ध थे उसका सबसे अधिक प्रभावी प्रयोग किया ह- रि.जवि सम्पादित पुस्तक में आर ///कालिकिंकर दत्त ने श्रोतों का उपयोग तो बहुत किया ह लेकिन उन्होंने 1857 की चेतना को अपने विवरण की सपाटबयानी से अपने इतिहास में प्रविष्ट नहीं होने दिया। उस समय के इतिहासकार की यह एक बड़ी सीमा थी कि वह 1857 की ''राष्ट्रीय चेतना'' को ठीक से नहीं समझ पाता था। दूसरी ओर दुर्गाशंकर सिंह की पुस्तक में 1857 की चेतना की एक विशिष्ट प्रकार की राजपूती समझ काम कर रही ह। कुंवर सिंह राजपूत थे आर उनके समर्थन में राजपूतों की संख्या अधिक थी लेकिन एक नायक के रूप में कुंवर सिंह को गर राजपूतों का समर्थन न होता तो कुंवर सिंह 1857 के विद्रोह में पूर्वी भारत के सबसे बड़े नेता न होते। जिस प्रकार के पारिवारिक श्रोतों का उपयोग दुर्गाशंकर सिंह ने किय ह आर जितने तरह के सरकारी दस्तावे.ज कालिकिंकर दत्त को उपलब्ध थे दोनों के सम्यक सामंजस्य से कुंवर सिंह का एक प्रभावी इतिहास लिखा जा सकता था, लेकिन दुर्भाग्य से एसा न हो सका। 2007 में जिस तरह की 1857 संबंधी सामग्री अभिलेखागार में अभी भी उपलब्ध ह उसे देखकर बासुदेव चट्टोपाध्याय ने ठीक ही कहा ह कि उन्हें इतिहासकारों की प्रतीक्षा ह।
इस आलेख में कुछ एसे तथ्यों का उल्लेख किया जा रहा ह जिससे इस बात को बल मिलता ह कि कुंवर सिंह का इतिहास लिखने की, उनको याद करने के इतिहास की कितनी .जरूरत ह। यहां कुंवर सिंह के
इतिहास को पेश करने की कोशिश नहीं की गयी ह बल्कि यह तलाशने की कोशिश की गई ह कि इस इतिहास के कितने फलक हो सकते ह।
कुंवर सिंह देखने में कसे लगते थे इसके बारे में सही सही कुछ भी कहना प्रामाणिक नहीं, क्योंकि उनकी कोई स्पष्ट तस्वीर हमारे पास उपलब्ध नहीं। उनकी चार जीवनियां चर्चित ह। उनमें से दो 1957 के आसपास की ह- दुर्गाशंकर सिंह आर कालीकिंकर दत्त की आर दो 2007 की ह- रश्मि चाधरी आर ॥॥॥ दुर्गाशंकर सिंह की पुस्तक में कुंवर सिंह की तस्वीर को लेकर कहा गया ह कि कुंवर सिंह की असली तस्वीर वह नहीं ह जो सुंदरलाल की पुस्तक' भारत में अंग्रे.जी राज' आर सावरकर की पुस्तक में छपी ह। इस प्रकरण में जो तथ्य दुर्गाशंकर सिंह ने दिए ह वे प्रामाणिक प्रतीत होते ह। यानि कुंवर सिंह की बहुप्रचारित छवि जिसमें उन्हें लंबा, शक्तिशाली क्षत्रिय वीर सा दिखाया गया था ( जिसे आई सी एच आर आर रश्मि चाधरी ने सही मान लिया ह) दरअसल लंदन के एक अंग्रेज चित्रकार की कल्पना का चित्र ह!
इतिहासकारों ने कुंवर सिंह की जितनी उपेक्षा की ह वह चकित कर देने वाला ह। आज भी अधिकतर लोगों को यह पता नहीं ह कि उनकी असली हसियत क्या थी। इस सन्दर्भ को कर्मेन्दु शिशिर ने इस प्रकार रखा हः '' वे किसी बड़ी रियासत के राजा नहीं थे, न ही उनका कोई राज्य था। उनकी एक जागीर .जरूर थी जिससे सटे डुमरांव में एक बड़े राजा थे। दरभंगा आर रामगढ - इन क्षेत्रों के तीनों बड़े राजा अंग्रे.ज समर्थक थे। लेकिन कुंवर सिंह की तहसील जगदीशपुर की प्रतिष्ठा बहुत थी। इसका सबसे बड़ा कारण तो यह था कि मुगल बादशाह शाहजहां ने इनको 'राजा' की उपाधि दी थी। दूसरी बात यह कि कुंवर सिंह के रिश्ते महाराष्ट्र के राजाओं से लेकर नाना साहब की अंतरंगता तक थे। यह बात भी सही ह कि वे भारी क.र्ज में डूबे हुए थे आर उनकी अपील रिवेन्यू बोर्ड में लंबित थी। पटना कमिश्नर टेलर चाहते थे कि फसला जल्दी हो आर कुंवर सिंह के पक्ष में हो।'' ( प- 128)
कुंवर सिंह के जीवन के बारे में जो तथ्य ध्यान में रखने की .जरूरत ह वह यह कि 1857 के पहले वह लगभग पूरी आयु जी चुके थे। अंतिम डेढ वर्ष के संघर्ष के एतिहासिक महत्त्व को रेखांकित किया जाना चाहिये लेकिन पिछले तथ्यों की अनदेखी करके नहीं। कुंवर सिंह बचपन में पढ-लिख नहीं सके। तवारीख़-ए-उज्जेनिया के तीसरे खंड में उनके प्रारंभिक जीवन का जो विवरण ह उसके आधार पर कहा जा सकता ह कि शाहबजादे सिंह के बेटे कुंवर सिंह बचपन से ही दुस्साहसी आर अपनी तरह से जीने के अभ्यस्त थे। पढाने आये मालवी को बालक कुंवर सिंह तलवार लेकर काटने दाड़े क्योंकि उन्होंने बालक के पाठ याद न करने पर कान उमेठने की ग़लती की थी! बड़े होकर कुंवर सिंह प्रायःजगदीशपुर के बाहर ही रहे। वे जितारा के जंगल में फूस का बंगला बनाकर रहते थे आर आमोद प्रमोद मेम अपना समय बिताया करते थे। वे बहुधा 100 सवारोम को लेकर जगदीशपुर के आसपास के जंगलों में चक्कर काटा करते थे। उनका विवाह गया के फतेहनारायण सिंह की पुत्री से हुआ किसी हद तक आर्थिक कठिनाई के समाधान हेतु किया गया। मुकदमे के भारी खर्च को उनके ससुर ने देना स्वीकार कर लिया था। कुंवर सिंह की अनेक उपपत्नियां थी जिनमें से एक धरमन बीबी थी जिसके लिये उन्होने आरा आर जगदीशपुर में दो मस्.जिदें बनवाईं। कुंवर सिंह के पुत्र दलभंजन सिंह ने नन्हेंबाई नाम की आरत को अपनी उपपत्नी बना लिया था जिसके कारण पिता कुंवर सिंह से संबंध कभी अच्छा नहीं रहा। बाद में दलभंजन सिंह के बेटे की शादी के समय दादा कुंवर सिंह ने बड़े ठाठ-बाट आर शान शाकत से किया। बारात का कारवां कितना भव्य रहा होगा इसका अंदा.जा इस बात से लगाया जा सकता ह कि इसके साथ दस हकीम आर पच्चीस वद्य चल रहे थे
ताकि रास्ते में कोई बीमार पड़ जाये तो उसका दवा-दारू किया जा सके! जिस समय कुंवर सिंह गद्दी पर बठे .जमीदारी की कुल आय पांच से छह लाख रूपये सालाना के करीब थी जिसमे से डेढ लाख के करीब रुपया सरकारी मालगुजारी के रूप में दिया जाता था।( एक अनुमान से यह 1लाख 66 ह.जार था आर दूसरे अनुमान से यह 1 लाख 36 ह.जार था।) अपने तीनो भाईयों से कुंवर सिंह का सम्पर्क अच्छा नहीं था। कुंवर सिंह चाहते थे कि छोटे भाइयों को जितनी मालगुजारी सरकारी ख.जाने में देनी पड़ती ह वह उनके मार्फत जमा हो। इसका तीनों भाईयों ने विरोध किया। कलक्टर के फसला तीनों भाईयों के पक्ष में जाने पर इसे नहीं
माना आर अपने वंश की पुरानी रीति का हवाला दिया कि ज्येष्ठ पुत्र ही सम्पत्ति का एकमात्र उत्तराधिकारी हो। इस मुकदमे में कुंवर सिंह को आठ लाख खर्च करना पड़ा। क.र्ज में पहले से ही डूबी .जमीदारी के लिये यह खर्च आगे चलकर कुंवर सिंह को आर्थिक उलझन में डालने का कारण हुआ। ( दत्त, प 39) तत्कालीन कुछ सरकारी रिपोर्टों में भी कुंवर सिंह के बारे में जो मत मिलते ह उसमें इस बात का उल्लेख मिलता ह कि वे लोकप्रिय तो थे लेकिन आमदनी आर खर्च के हिसाब का ध्यान वे नहीं रखते थे। 19 दिसम्बर, 1856 की एक रिपोर्ट में पटना कमिश्नर टेलर ने कुंवर सिंह की लोकप्रियता का .जिक्र किया ह लेकिन साथ में लिखा ह- '' अधिकांश राजपूत सरदारों की तरह वे एकदम अपढ रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि वे सहज में षडयंत्रों का शिकार होते रहे ह आर स्वार्थी दलालों के हाथ कठपुतली रह ह।इसके साथ अपनी वृत्ति आर फजूलखर्ची की वंशपरम्परागत प्रकृति के कारण वे बेहिसाब खर्च करते रहे ह। इन खर्चों की पूर्ति वे सदा कर्ज लेकर करते रहे ह । ज्यों ज्यों समय बीतता गया, बाबू कुंवर सिंह की आर्थिक दशा दिनों दिन खराब होती गयी।'' इस बात का अनुमोदन कालिकिंकर दत्त ने भी किया ह-'' यह बात निःसंदेह सच ह कि अपने साधन के बाहर बाबू कुंवर सिंह ने अतिशय उदारता, अनेक सामाजिक रीतियों का पालन करने के लिए फजूलखर्ची, शिकार, मनोरंजन आर कतिपय स्वार्थी दरबारियों...तथा मित्रों की चालों से अपनी जमींदारी को भयंकर कर्ज में डाल दिया।'' ( प 44) इस प्रकार के कई दस्तावे.ज ह जो प्रमाणित करते ह कि लोभी आर विवेकहीन महाजनों ने कुंवर सिंह के साथ बेईमानी आर धोखेबाजी का व्यवहार किया था। ( दत्त ने एसे कई दस्तावे.जों का हवाला दिया ह। देखें दत्त, प 48-66)।
एक एसे .जमीदार की लोकप्रियता के कारण क्या हो सकते हम जो खुद क.र्ज में डूबा हो? कुंवर सिंह का कोई भी इतिहास इस प्रश्न की अनदेखी नहीं कर सकता। तत्कालीन कोई भी दस्तावे.ज यह नहीं बतलाता कि कुंवर सिंह अपनी प्रजा में अलोकप्रिय थे। शायद उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथमार्द्ध में एक राजपूत .जमीदार से जो अपेक्षाएं जनता की हो सकती थी उसे वह पूरा करते होंगे। साथ ही उस दार में बिहार की एक .जमींदारी के भीतर की लड़ाईयों को समझने की भी एक आंतरिक दृष्टि हो सकती ह जिसके कारण यह देखा जा सकता ह कि तमाम मुकद्दमेबाजी के बाव.जूद भाईयों का सम्पर्क बना रहा। कालांतर में अमर सिंह ने जिस तरह कुंवर सिह के देहांत के बाद विद्रोही सेना की कमान संभाली उससे तो यही पता चलता ह कि दोनों भाईयों में गहरे स्तर पर .जुड़ाव था। विद्रोह के दारान के कुछ तथ्य एसे ह जो बतलाते ह कि कुंवर सिंह के विद्रोह ने लोक युद्ध का रूप कितने गहरे स्तर पर ले लिया था। ग्वाला जाति के रंजीत राम सिपाही, जो पहले 40 वीं देशी पदल पलटन का हवलदार था आर बाद में बागी सिपाहियों का सेनानायक बनाया गया, का बयान था कि जिस समय कुंवर सिंह अयोध्या की ओर रवाना हुए उस समय उनके पास 2000 से 2500 तक आदमी थे। आजमगढ में ब्रिगेड मेजर देवकी दूबे के सेनापतित्व में 2000 से 2500 तक आर भी आदमी इनके साथ हो गये। एक इतिहासकार पार्लियामेंट पेपर्स के हवाले से बताते ह कि कुंवर सिंह
द्वारा निर्मित मन्दिर को इस कारण से नष्ट करवा दिया गया था क्योंकि यहां के ब्राह्मणों ने अंग्रे.जों के विरूद्ध कुंवर सिंह का साथ दिया था। निश्चित ही कुंवर सिंह का आंदोलन महज राजपूती मामला नहीं था।

एक अन्य हवलदार अचरज सिंह सिपाही का बयान भी इसी प्रकार के संकेत देता ह। उसने शिवसहाय, गोला, मथुरा चाबे आर रामशरण चाबे के साथ पलटन छोड़ा था। उसने बताया था कि देवकी दूबे विद्रोही फाज के नेता थे। अन्य सिपाहियों के नामों का जो उल्लेख उसने किया ह उसमें सूबेदार अन्तू मिसर ( मिश्र), रामदीन तिवारी, छतरधारी ओझा, रामसरन चाबे, हरकिशुन ग्वार, रामखेलावन पाण्डे, बुलीराम जसे नाम ह।
यह एक तरह से साफ ह कि 1857 के विद्रोह के बिहार अध्याय में एसी तमाम तरह की बातें ह
जिससे प्रतीत होता ह कि कुंवर सिंहआर अमर सिंह के साथ साथ कई एसे महत्त्वपूर्ण लोग ह जिसकी ओर ध्यान दिया जाना चाहिये। उदाहरणस्वरूप अली करीम, बंसुरिया बाबा, धर्मन बीबी इत्यादि का उल्लेख किया जा सकता ह। इन लोगों के बारे में जानने के बाद पता चलता ह कि किस प्रकार उस समय लोग अग्रे.जी राज के खिलाफ लड़ने के लिए आतुर थे। जो लोग इस लोक युद्ध को एक सामंती विद्रोह कहते ह उन्हें ये तथ्य सोचने के लिये बाध्य करेंगे। सच तो यह ह कि 1857 के विद्रोह के पहले से ही बिहार में अंग्रे.जों के खिलाफ आन्दोलन होने लगे थे। 1855-57 से लेकर 1857 का पटना षडयंत्र जसे उदाहरणों ने राजनतिक वातावरण को प्रभावित किया था। कालिकिंकर दत्त ने ठीक ही कहा ह कि इसका असर कुंवर सिंह पर भी पड़ा होगा। 1857 की जुलाई में जब पटना में विद्रोह शुरू हुआ उसके पहले बरकपुर में आर उससे भी पहले बंगाल में दूसरी जगहों पर जो विद्रोह शुरू हुए थे वे एक श्रृखला की कड़ियां ह। यह बात बिल्कुल सही ह कि अंग्र.जों के विरूद्ध संग्राम तो उसी दिन शुरू हो गया था जिस दिन उनका शासन शुरू हुआ था। पर यह संग्राम बहुसंख्यक भारतीयों ने किया था। कुछ समझदार लोग तो शुरू से अंत तक उनके साथ रहे।

2007 में 1857
2007 में 1857 जसे विद्रोह को याद करते हुए वर्तमान समय की अनदेखी उचित नहीं। आज के भारत में 1857 के विद्रोहियों को याद करने करने की राजनीति को भी ध्यान में रखने की .जरूरत ह। मनेजर पाण्डेय ने एक बहुत सटीक सुझाव दिया ह कि एक सूची 1857 के गद्दारों की भी तयार की जानी चाहिये ताकि पता चल सके कि कान किस ओर था। कोई भी इस तरह की सूची भारत के राष्ट्रवाद की पोल खोल सकती ह। लगभग सभी लोग जो आधुनिक राष्ट्रवाद के दार में राष्ट्रवाद को म.जबूती प्रदान करने वाले माने जाते ह उन परिवारों से आये थे जो इस लिस्ट में 'गद्दार' कालम के अंतर्गत सूचीबद्ध होंगे! यह दिलचस्प शोध का विषय हो सकता ह- कांग्रेस आर 1857। इस शोध विषय को शोधार्थी की प्रतीक्षा ह। भारत का कोई भी उदार इतिहासकार 1857 की चेतना को सहानुभूति से समझने के लिये तयार नहीं।
यह समय भारत के आपनिवेशिक शासकों के प्रति कृतज्ञ होने का समय ह। भारत में इस समय विश्र्वायन का आक्रमण हो गया ह आर लोग या तो इसके साथ चलने के लिये बाध्य हो रहे ह या फिर पिछड़ने के लिये अभिशप्त हो रहे ह। यह आक्रमण उन्नीसवीं सदी के भारतीय परम्परागत समाज पर आधुनिकता का आक्रमण जसा ही ह जिसने एसी परिस्थिति पदा कर दी थी जो या तो आधुनिक सोच, बोध को स्वीकार करके नये तरीके से सोचने आर रहने के लिये बाध्य करती थी या फिर पिछड़ने के लिये छोड़ देती थी। इस सांस्कृतिक आक्रमण के फलस्वरूप समाज एक तरह से पुनर्गठित हुआ था सोच विचार के
दृष्टिकोण में गुणात्मक परिवर्तन हुआ था आर एक नयी दुनिया बनी थी। यह नयी दुनिया बु.र्जुआ नियंत्रित दुनिया थी। आज फिर से एक आर नयी दुनिया को तयार करने की कोशिश हो रही ह। उस समय एक ''राष्ट्रीय'' स्वप्न जन्म ले सका आज एक ''वश्र्िवक'' स्वप्न हमारे सामने लाया जा रहा ह। इसे मानिये या पिछड़िये। लड़ने की कोशिश करेंगे तो मिटा दिये जायेंगे। आज जो लोग वश्र्वीकरण के हमले को आगे ले जाने वाली लहर के रूप में देखने के अभ्यस्त हो गये ह उन्हें यह बेमानी लगेगा कि कुंवर सिंह की जंगल में भटकती सेना लड़ते लड़ते प्राण देना चाहती थी, दिल्ली में सनिक यह जानते हुए भी कि उनका हारना तय ह लड़े जा रहे थे, लक्ष्मीबाई की सेना भी लड़ते हुए मरना पसन्द करती थी। उन लोगों के भीतर जो आग थी, अंग्रे.जों को इस माटी से उखाड़ फेंकने का जो स्वप्न था वह किस तरह उन्हें यह शक्ति दे रहा था। आधुनिक भारत की उस समझ का प्रतिनिधित्व करने वाले जो लोग आज वश्र्िवक जगत के महास्वप्न को लेकर चल रहे ह वे उस धारा के प्रतिनिधि ह जिनसे जुड़ा वर्ग उदार रहा ह, अच्छे बुरे की तमी.ज करना जानता ह, हिंसा पसन्द नहीं करता ह, आर उसके लिये अंग्रे.ज घृणा के योग्य नहीं अनुकरणीय रहे ह। व्ही शांताराम की एक पुरानी फिल्म में एक बूढा सड़क पर गाते हुए कहता ह - 'वह गदर नहीं था हम लोगों का स्वाधीनता संग्राम था' तो वह एक बात जोड़े जा रहा था- 'ये माटी सभी की कहानी कहेगा'। माटी की कहानी कहने वाले लोगों के लिए 1857 के संग्राम की कहानी का महत्त्व कभी कम नहीं होगा। देखने की बात तो यह ह कि उदारवादी वश्र्िवक आसमानी स्वप्न का क्या होता ह।

6 comments:

  1. बहुत बेहतरीन मित्र इतिहास की इतनी बेहतरीन जान कारी मेरी बधाई स्वीकार करे और आप हिंदी में लिखते है ,
    बहुत ख़ुशी की बात है,
    हिंदी परिवार में आप का स्वागत है ,
    उम्मीद है आप अपने लखे के द्बारा हमें अनुग्रहित करते रहेगे
    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084

    ReplyDelete
  2. Bahut Barhia... isi tarah likhte rahiye...

    http://hellomithilaa.blogspot.com
    Mithilak Gap... Maithili Me

    http://muskuraahat.blogspot.com
    Aapke Bheje Photo

    http://mastgaane.blogspot.com
    Manpasand Gaane

    ReplyDelete
  3. भाई साहब इतना बढ़ा पोथा पढ़ पाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया पर इतिहास की कुछ जानकारी तो ले ही ली। आप छोटा करके लिखा करें

    ReplyDelete
  4. चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.......भविष्य के लिये ढेर सारी शुभकामनायें.

    गुलमोहर का फूल

    ReplyDelete
  5. बहुत बहुत धन्यवाद. हितेन्द्र

    ReplyDelete