Thursday, 20 August, 2009

आत्म इतिहास के सहारे प्रति इतिहास की ओर

इतिहास के एक दार्शनिक कॉलिंगवुड की पुस्तक प्कमं वि भ्पेजवतल की एक प्रसिद्ध उक्ति है कि इतिहास मूलतः इतिहासकार के दिमाग में होता है। बीती हुई घटनाओं को इतिहासकार अपनी ऐतिहासिक कल्पना शक्ति से अपने मन (उपदक) में फिर से घटते हुए ÷देख कर' उसका इतिहास लिखता है। इस बात को ध्यान में रख कर कहा जा सकता है कि हर इतिहास अपने युग के हिसाब का ही होता है। इतिहास का एक खाका होता है और उसके इर्द गिर्द वर्तमान संदर्भों से उठ कर आये इतिहास खंड जुड़ते रहते है। इस धारणा के विपरीत एक ÷पाजिटिविस्ट' आग्रह जर्मन इतिहासकार रांके के समय से ही बना रहा है जो इतिहास को पवित्र और वस्तुनिष्ठ मानता है। इस धारणा के लोग ऐतिहासिक सच की वैधता के प्रति संवेदनशील बने रहते हैं। लेकिन, हाल के वर्षों में उत्तर संरचनावादी सोच के आने के बाद और खास तौर से उत्तर आधुनिक विमर्शों के प्रभावी होने के क्रम में यह बात ज्यादा मान्य होने लगी है कि चूंकि इतिहास में जाया नहीं जा सकता इसलिए यह सच के रूप में हमें उपलब्ध नहीं हो सकता। जो इतिहास है उसकी पुनर्प्राप्ति की आकांक्षा प्रयोजनीय है लेकिन उसकी उपलब्धि असम्भव। कुल मिला कर ऐतिहासिक विवरण का ध्येय है − ऐसे सवाल पूछना जिसमें ऐतिहासिक ÷सच' (जिसे सच के रूप में कम ÷सचों' के रूप में बेहतर रूप में समझा जा सकता है) ज्यादा साफ दिखाई दे, ऐतिहासिक ÷सच' के इर्दगिर्द की चीजों पर इस तरह का रोशनी पड़े कि जो ÷सच' है वह दीखने सा लगे। इन्हीं मायनों में ऐतिहासिक अध्ययन का उद्देश्य किसी सत्य का अनुसंधान नहीं है कुछ ऐसे प्रश्न पूछना है जिसमें इतिहास के इलाकों से ज्यादा से ज्यादा हिस्सा हमें दीखे। जाहिर है, इस पूरी प्रक्रिया में हम चाहें या न चाहें अपने वर्तमान को भूतकाल पर प्रक्षेपित करते हैं। इतिहास वर्तमान से ज्यादा जुड़ा है भूतकाल से कम। भूतकाल सिर्फ तथ्य देते हैं। उन तथ्यों को किस प्रकार संयोजित करना है, कहां किसे कितनी प्रमुखता देनी है और क्या निष्कर्ष निकालने हैं यह सब बातें वर्तमान से ही तय होती हैं। एक विद्वान ने प्रस्तावित किया है कि हमारे लिए इस सीमित इतिहास से आगे बढ़ कर यह जानने की कोशिश ज्यादा जरूरी है कि घटनाओं को लोगों ने किस रूप में ÷अपने इतिहासों' में देखा है। भले ही इन इतिहासों में इतिहास की प्रामाणिकता का अभाव हो। यह ज्यादा जरूरी है कि लोगों ने भूतकाल की घटनाओं का ÷आत्म इतिहास' अपने तरीके से लिखने की कोशिश की। इन चेष्टाओं को इतिहास अगर खारिज कर दे तो भी इतिहास को इस प्रश्न का उत्तर देना पड़ेगा कि आखिरकार ये ÷आत्म इतिहास' किन मानकों पर खारिज होंगे और इन मानकों को बनाने वाले कौन हैं?भारतीय समाज के इतिहास लेखन की एक बड़ी असुविधा यह है कि समाज अभी भी सामुदायिक समूहों में बंटा है और समुदायों के इतिहास को इतिहास नहीं माना जाता। उन्नसवीं सदी के आठवें दशक से ही भारतीय समाज में सामुदायिक इतिहास लेखन की परम्परा शुरू हो गयी। तबसे लेकर आज तक लगातार विभिन्न समुदायों (जातियों) ने अपने अपने तरीके से अपना इतिहास (आत्म इतिहास) लिखा है। पहले यह बड़ी जातियों की ओर से आया बाद में उन समुदायों की ओर से भी इतिहास लेखन हुआ जिसे ÷नीची जाति' कहा जाता है।इस प्रसंग में हजारीप्रसाद द्विवेदी की एक बात का उल्लेख करना उचित होगा कि भारत में सबसे निचली और सबसे ऊंची जाति का पता लगाना मुश्किल है। कोई भी ऐसी जाति भारत में नहीं है जो यह मान ले कि वह सबसे नीचे है और कोई भी ऐसी जाति नहीं जिसके सबसे ऊंचे होने को बाकी जातियां मान लें। सभी जातियां अपना अपना इतिहास लिख कर यह प्रमाणित करने में जुटी रही हैं कि वे ऊंची जातियां रही हैं और अगर वे कमजोर हो गयी हैं या पिछड़ी जाति कहलाती हैं तो इसके लिए अन्य जातियों का षडयंत्र जिम्मेदार है। इस तरह के इतिहास लेखन का उद्देश्य भिन्न भिन्न समयों में बदलता रहा है लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि इसका उद्देश्य उस जाति के लोगों में गर्वबोध तैयार करना रहा है। उपेक्षित समुदायों का आत्म इतिहास (संकलन एवं सम्पादन बद्री नारायण, विष्णु महापात्र, अनंत राम मिश्र) इसी तरह के जातीय इतिहास का संकलन है। ये इतिहास उन जातियों के शिक्षित सामुदायिक इतिहासकारों, सक्रिय राजनैतिक बौद्धिकों एवं जाति के साहित्यकारों द्वारा लिखे गये हैं। (पृ.9) इस तरह के इतिहासों का प्रभाव व्यापक हुआ है। उत्तर प्रदेश एवं बिहार में 100 से ज्यादा प्रकाशक दलितों की ऐसी पुस्तिकाएं प्रकाशित कर रहे हैं। (पृ. 10)। किसी किसी पुस्तिका के तो 10-10 संस्करण 5-6 वर्षों में ही छप जाते हैं। एक एक संस्करण 5-5 हजार से कम के नहीं होते। (पृ. 12) ऐसे साहित्य का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य ब्राह्मणवादी साहित्य के प्रतिसाहित्य की रचना भी है। (पृ. 11)इस विषय में किसी बहस के पहले इस पुस्तक की मूल बातों का उल्लेख करना उचित होगा। इस पुस्तक की भूमिका में कहा गया है − ÷÷भारत में उपनिवेशवादी सत्ता अपने शासितों पर सुचारु रूप से शासन करने के लिए ÷कालोनियल डाक्यूमेण्टेशन प्रोजेक्ट' के तहत जनगणना एवं गजेटियर्स के माध्यम से भारतीय समाज में जातियों की सामाजिक अवस्थिति का सर्वे कर उन्हें लिखित कर एक अपरिवर्तनशील सामाजिक अवस्थिति में तब्दील करने लगी तो इस भय से कि अब जाति की जो हाइरेरिकल अवस्थिति तय हो जायेगी, वह बदल नहीं सकती, अनेक जातियों ने अपनी नयी पहचान के दावे करने प्रारम्भ किये।'' (पृ 14) इसके बाद जातियों के बीच दावों को लेकर विभिन्न जातियों के बीच टकराव उभरने लगे। इस प्रक्रिया में अनेक जातियों ने अपना जातीय इतिहास लिखा, जातीय पत्रिाकाएं निकालीं एवं जातीय संगठन गठित किये। हिन्दू धर्म के रक्षार्थ आर्य समाज ने अनेक अछूत, निचली, मध्य जातियों को उच्च कुलों एवं ब्राह्मण के गोत्रों से उत्पन्न बता कर ऐसा इतिहास रचा जिससे इन जातियों का संस्कृतिकरण किया जा सके। इस प्रक्रिया में सदियों से नीचे के पायदान पर ठिठके सामाजिक समूहों को अपने महत्त्व को सिद्ध करने का मौका लगभग पहली बार मिला। बाद में निचली जातियों की अस्मिता निर्माण की यह प्रक्रिया थम सी गयी। 1960 के बाद पुनः इस तरह का इतिहास रचा जाने लगा। ÷÷1984 में उत्तर प्रदेश में बी.एस.पी. के गठन के बाद एवं बहुजन आंदोलन के नव उभार के असर के कारण भी बड़े पैमाने पर निचली जातियों ने अपने जातीय इतिहास लिखे। फर्क यह था कि पूर्व में जहां उनके जातीय इतिहास पर आर्यसमाजियों एवं औपनिवेशिक नृत्तत्त्वशास्त्रिायों ने कार्य किया था, वहीं इस बार खुद उन्हीं के सामुदायिक बुद्धिजीवी उनका इतिहास रच रहे थे।'' (पृ 15)इस पुस्तक के समर्पण में लिखा है − ÷उनको जो अपना इतिहास खुद लिख रहे हैं।' जाहिर है, इस पुस्तक के पीछे इन इतिहास लेखकों के प्रति समर्थन का भाव है, स्वागत का भाव है। एक तरह से यह आग्रह काम कर रहा है कि इन आत्म इतिहासों को भी इतिहास के रूप में देखा जाय। यह कहा गया है कि ÷ये इतिहास अकादमिक इतिहास तो नहीं है किन्तु विभिन्न समुदाय इन्हें अपना इतिहास मानते है।' (पृ 20) अगर यह माना जाय कि भारतीय इतिहास लेखन के ऊपर सवर्णवादी, पुरुषवादी, बुर्जुवा दवाब रहे हैं तो स्पष्टतः ये आत्म इतिहास उपेक्षित जातियों की ओर से आये महत्त्वपूर्ण दस्तावेज हैं। लेकिन, इन्हें इतिहास के स्रोत के रूप में स्वीकार करने की अपनी समस्याएं हैं जिस पर अलग से विचार किया जा सकता है।इस पुस्तक में कुल आठ जातियों का इतिहास संकलित है। प्रथम इतिहास पुस्तक ÷नायि वर्ण निर्णय' (1920) में रेवती प्रसाद शर्मा ने नाइयों को ब्राह्मण तो सिद्ध किया ही है उन्हें सच्चे बनने के लिए प्रेरित किया है। इस निम्न जाति के इतिहास में हिन्दू सवर्णवादी साम्प्रदायिक सोच स्पष्ट रूप में उपस्थित है − ÷÷भारत के दुर्भाग्य से जब से यवनों का राज्य हुआ तो कौन सा अत्याचार था जो इस देशवासियों पर नहीं हुआ? जीते जी जलाया गया, खाल खिचवा कर भुस भरवा दिया गया, बहू बेटियों के बलात धर्म नष्ट किये गये, हमारे शास्त्रा फूंक फूंक कर हम्माम गरम किये गये! गांव के गांव भस्म कर दिये गये। शरीरों पर तेल छिड़क कर आग लगा दी गयी। जिन ब्राह्मणें और क्षत्रिायों में आत्मिक बल था, उन्होंने प्राण दिये परंतु धर्म न दिया।'' (पृ 44)प्राचीन ग्रंथों से लेकर आधुनिक विद्वानों के उद्धरणों से रेवती प्रसाद शर्मा ने नाइयों को ब्राह्मण का ÷सहधर्मा' प्रमाणित किया। एक जगह वे लिखते हैं − ÷÷शिव जी के दो पौत्र हुए ब्रह्मा और नापित। ब्रह्मा ने तो सृष्टि उत्पन्न करने का ठेका (बवदजतंबज) लिया और नापित ने शुद्ध होकर के संसार सागर से पार उतारने की कनजल डयूटी ली। ब्रह्मा और नाई भाई भाई हैं और ब्राह्मण ब्रह्मा के पुत्र हैं। इस हिसाब से नाई ब्राह्मण का चाचा भतीजे का सम्बंध होता है।'' (पृ 94) रेवती प्रसाद शर्मा की इस पुस्तक की मूल स्थापना है कि किसी समय हम महान आर्य संतान थे। पवित्र आर्य संतानें बाद में खंडित होती गयीं और मुसलमानों के अत्याचारों का शिकार हुईं। विक्टोरिया राज में दयानंद के बाद अब सही तरीके से अपने गौरव को फिर से पाने का सुयोग नाइयों ब्राह्मणों को मिला।दूसरी संकलित पुस्तक यशोदा देवी, एम.एल.ए. बिहार की है जिन्होंने साठ के दशक में दुसाधों का इतिहास लिख कर यह प्रमाणित किया है कि दुसाध दरअसल गहलोत राजपूत हैं और दुसाध तो राजस्थान से आये हैं। वे लिखती हैं − ÷÷दुसाध जाति अपने गौरवमय अतीत को भुला कर आज अविद्यारूपी अंधकार में भटक रही है।... स्वर्ग से भी श्रेष्ठ अपनी जननी और जन्मभूमि राजपूताना (मेवाड़) का मोह छोड़ कर बिहार के गयाजी जैसे प्रसिद्ध एवं पवित्र तीर्थस्थान को यवनों से बचाने हेतु राणा लाखा के साथ बिहार में सर्वप्रथम ÷दुसाधों' की सेना आयी थी।... दुसाध निःसंदेह सूर्यवंशी क्षत्रिायों में से गहलोत राजपूतों की एक शाखा है।'' (पृ. 105-106) इस इतिहास में यह बतलाया गया है कि प्रतापी दुसाधों को विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा किस प्रकार दबाया गया और कैसे धर्मपरायण दुसाधों ने ÷यवनों से बचाव के लिए सूअर पाल कर दरवाजे पर रखना जरूरी समझा।' (पृ. 127)आरक्षण के प्रश्न पर लेखिका ने दुसाधों को अनुसूचित जाति की सूची में रखे जाने का समर्थन किया है यह कहते हुए कि ÷अब हमें पददलित होने की वजह से ही ऊपर उठाने के लिए सूची में रखा गया था, अछूत और नीच समझ कर कदापि नहीं।' इस हिसाब से दुसाध का राजपूत होना और अनुसूचित जाति की सूची में होना दोनों एक दूसरे के विरोध में नहीं जाते थे।इस पुस्तक में भी यह देखा जा सकता है कि सवर्ण हिन्दू के देखने और दुसाध समाज के सुधारक के देखने में बहुत समानताएं हैं। लेखिका ने सुधार के लिए जो सुझाव दिये हैं वे हैं : विधवा विवाह, मद्यपान का निषेध, सिनेमा पर प्रतिबंध, शिक्षा, बाल विवाह, स्वयंवर, तिलक दहेज का विरोध। एक स्थान पर नारी के आदर्श पर लिखते हुए यशोदा देवी के विचार हैं − ÷÷सीता, सावित्री, द्रोपदी, कुंती, मीराबाई आदि के त्याग तथा पतिव्रत धर्म को कौन नहीं जानता तथा पद्मिनी आदि अनगिनत नारियों ने अपनी जान की परवाह नहीं कर खुशी खुशी से श्रेष्ठ सतीत्व के रक्षार्थ चिता में जल कर जौहर व्रत का पालन किया।'' (पृ 148)इसके बाद के इतिहासों में एक तरह का ÷पाराडाईम शिफ्ट' है। इन इतिहासों में पुराने आर्यसमाजी दबाव भी कम हुए हैं और ब्राह्मणवादी तर्कों का सहारा कम लिया गया है। इन इतिहासों में कुछ अन्य निम्न श्रेणी के समुदायों के जातीय इतिहास संकलित हैं। इन इतिहासों में दलितों के इतिहास के कुछ स्वर्णिम अध्यायों पर बल दिया गया है। स्पष्टतः बहुजन समाज के शक्तिशाली होने के बाद लिखे गये इन इतिहासों के सरोकार अलग हैं। पासी जाति पर लिखते हुए आर.के. चौधरी पुराने तरह के जातीय इतिहासों को नहीं मानते हैं। इस तरह के मिथकीय इतिहास को वे हास्यास्पद मानते हैं जिनमें कहा जाता है कि पासी की उत्पत्ति परशुराम के पसीने की बूंदों से हुई थी। वे तथ्यों और आधुनिक अध्ययनों के हवाले से अपनी बात कहते हैं। उन्होंने क्रुक्स जैसे लेखकों के हवाले से और जनगणना की रिपोर्टों के आधार पर पासियों का इतिहास लिख कर यह बतलाने का प्रयास किया है कि पासी समाज की कितनी गौरवशाली परम्परा रही है और किस प्रकार 800 साल पहले पूरे लखनऊ, इलाहाबाद और फैजाबाद मंडलों में इस जाति के राजा का शासन था। उन्होंने यह भी बताया है कि पासी राजा को बेदखल करने के लिए मुसलमानों और राजपूतों ने लगातार हमले किये। (पृ 158) अवध के अधिकांश पासियों ने मुसलमानों से बचने का रास्ता निकाला था सूअर पालन कर।इस आत्म इतिहास की भूमिका उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने लिखी है जिसमें उन्होंने लिखा है − ÷÷पासी समाज की गौरवशाली परम्परा रही है। पासी समाज के लोग एक समय अवध के बड़े भूभाग पर शासन करते थे।'' (पृ 155)... दलित वर्ग के शासकों के इतिहास का लेखन आज समय की सबसे बड़ी मांग है।'' मायावती ने जो कुछ इस पुस्तक की भूमिका में लिखा है वह 1997 तक आते आते निम्न जातीय इतिहास के सरोकारों को स्पष्ट कर देता है। अब दलित राजाओं, वीर दलित नायकों नायिकाओं के इतिहास को सामने लाना इतिहासकारों का प्रमुख प्रयोजन हो गया। लाखन पासी से लेकर ऊदा देवी तक पासी समुदास के गौरव को सामने लाना ही लेखक का उद्देश्य हो गया।इस नये प्रकार के दलित इतिहास लेखन को हरमोहन दयाल अपनी पुस्तक ÷वर्ण व्यवस्था और कुरील वंश' में नये धरातल पर ले जाते हैं। डॉ. आम्बेडकर की पुस्तक ॅीव ूमतम जीम ैीनकतें को आधार बना कर (जिसमें इस बात पर बल है कि शूद्र वास्तव में क्षत्रिाय हैं) उन्होंने कुरील वंश का इतिहास लिख कर भारतीय इतिहास लेखन में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। मौजा घाटमपुर जनपद उन्नाव के एक वंश कुरील वंश का इतिहास लिखने में लेखक लगभग सवर्णवादी सोच से मुक्त हो जाता है। लेखक ने दिखाया है कि किस प्रकार कुरील वंश के छब्बा और रामजीवन ने उन्नाव के इलाके में बेगार प्रथा को लगभग समाप्त कर दिया और किस प्रकार इस वंश के लोगों ने समाज की उन्नति में भूमिका अदा की। यह सही अर्थ में एक नये प्रकार का दलित आत्म इतिहास लेखन है जो अपने इर्द गिर्द के इतिहास का अपनी तरह से वर्णन करने की छूट देता है। इस इतिहास लेखन में इतिहास से गर्व खींच कर लाने की व्यग्रता कम है और वर्तमान समय में अपने लोगों के गुणगान करने की इच्छा अधिक। आम्बेडकर से यह सूत्र लेकर कि ऋग्वेद में दरअसल तीन ही वर्ण हैं और शूद्रों को ब्राह्मणों से भी ज्यादा मान सम्मान प्राप्त था और ब्राह्मणों की कुटिल नीति की वजह से शूद्र वर्ण अपने क्षत्रिात्व से गिर कर तीसरे वर्ण वैश्य से भी नीचे एक नया चौथा वर्ण बन गया, लेखक ने एक दिलचस्प इतिहास प्रस्तुत किया है। अगले चार अध्यायों − ÷नागवंशीः हेला की कहानी हेला की जबानी', ÷नागवंशी भगी मातादीन हेला' (सजीवन नाथ), ÷निषाद वंश के कुल गौरव' (अविनाश चौधरी), ÷मेहतर जाति का इतिहास' (एस. एल. सागर), में जिस आत्म इतिहास के दर्शन होते हैं वे भारतीय समाज के अध्ययन के लिए एक नये इतिहास दर्शन की मांग करते हैं। इस प्रकार के इतिहास में मिथक और इतिहास के बीच की दीवार टूट जाती है और लेखक अपनी आकांक्षा को इतिहास में प्रकट करता चलता है। इतिहास से लेखक क्या करना चाहता है इसे इन पंक्तियों से समझा जा सकता है − ÷÷नागवंशीश्रमण संस्कृति के इतिहास को हम दर्शायेंगे / दास बनाया इतिहास मिटा इस राज को हम बतायेंगे/ ...निज इतिहास के अभाव में, समाज अंधा लूला है/ भटक रहा शूद्र अछूत बन, गौरवशाली पथ भूला है/ ... इतिहास होता है जिनका, सम्मान से वो जीते हैं/ जिनका इतिहास मिटा, वे पशु से भी गये बीते हैं/ ...हेला जैसे नागवंशियों की बर्बादी का यही राज रहा/ जब से मिटा इतिहास, न शान मान ताज रहा/ ... जिसके हाथ लगी सत्ता, मनमाना इतिहास लिखाया/ दास गुलाम बनाने को, मेरा असली इतिहास छुपाया/ ... महत्त्व जाना इतिहास का, तो इसमें सर खपाया है/ इतिहास पाने में अपना, दिन रात को लगाया है/ ...इस अपने इतिहास को पाने की चाह में असंख्य लोगों को खोज कर लाया गया है और बतलाया गया है कि ये हेला, निषाद, मेहतर लोग ही भारतीय संस्कृति के जनक हैं। लगभग हर बड़े आख्यान के साथ किसी वैकल्पिक आख्यान को प्रस्तुत करके, अपने समाज से आये महानों (जिनमें एकलव्य, सत्यवती, साईं बाबा, रघु केवट, नारद के निषाद गुरु, हिम्मत सिंह (सिक्ख) से लेकर मातादीन हेला, ऊदा देवी, झलकारीबाई तक शामिल हैं) का उल्लेख करके ये आत्म इतिहास के आईने में अपने समुदाय का चेहरा देखते हैं। इस क्रम में सवर्णवादी इतिहास के महानों की जगह दलित समुदाय से आये नायकों का आख्यान उपस्थित होता है। 1857 के प्रसंग में इन आत्म इतिहास के लेखकों का मानना है कि ÷तमाम शहीद दलित वीरों और वीरांगनाओं को... धूर्त इतिहासकारों ने जानबूझ कर इतिहास के पन्नों में स्थान नहीं दिया।' इनके लिए मंगल पांडेय एक ÷अहंकारी ब्राह्मण' है और (1857 की) क्रांति के सूत्रधार मंगल पांडेय नहीं बल्कि मातादीन भंगी थे।' (पृ 397) इस पुस्तक को पढ़ कर किसी अकादमिक इतिहास के पंडित को यह लग सकता है कि यह इतिहास नहीं है। अपनी जगह से, अपने मन से कुछ भी लिखने को इतिहास कैसे माना जा सकता है? यह तो एक तरह का साहित्य है। इतिहास माने जाने के लिए जरूरी सबूत कहां हैं जो पेश करने पड़ते हैं। पर, यह असली मुद्दा नहीं है। यह सही है कि जो इतिहास यहां पेश किया गया है उसमें स्रोतों की प्रामाणिकता पर ध्यान कम है, पर अगर यह इतिहास नहीं माना जाता है तो फिर यह क्या है? आखिर क्यों इतनी बड़ी संख्या में लोग इसे अपना इतिहास मानना चाहते हैं? इसे इतिहास मानने के कारणों का क्या इतिहास हो सकता है? इन आत्म इतिहासों को अगर इतिहास न भी माना जाय तो भी इनके सहारे ऐतिहासिक कल्पना का इतिहास तो लिखा ही जा सकता है। और फिर इस देश के बहुसंख्यक समुदायों को इतिहास के आईने में अपनी तस्वीर देखने का हक है या नहीं? अगर है तो उसके लिए कैसे प्रयास किया जाए?अगर इसे साहित्य माना जाये तो इस संदर्भ में कुछ बातें कही जा सकती हैं। यह एक प्रसिद्ध उक्ति है कि इतिहास में तथ्यों के अलावा सब झूठ होता है और साहित्य में तथ्यों के अलावा सब कुछ सच होता है। यानि इतिहास से तथ्य लिये जायें और साहित्य से तथ्येतर विवरण। यानि, इतिहास का सच न तो इतिहास के पास है और न ही साहित्य के पास। ÷सच' शायद वह मरीचिका है जिसकी ओर जितना बढ़ेंगे वह उतना ही दूर होता जायेगा। हाइडेगर से लेकर मिशेल फूको तक बहुत सारे दार्शनिकों ने इतिहास की पूरी धारणा पर जिस संरचनात्मक दबाब को दिखाया है उसमें यही बात प्रधान है कि काल विशेष में प्रभावी सोच पद्धति (मचपेजमउम) ही वह प्रभावी माध्यम है जो हमें विशेष तरह से सोचने के लिए बाध्य करता है। एक कालखंड में उस कालखंड की प्रभावी सोच पद्धति यह निर्धारित करती है कि हम क्या सोच सकते हैं और क्या नहीं। हम क्या सोच सकते हैं और क्या नहीं यह हमारे वर्तमान समय द्वारा ही तय होता है। हेडेन व्हाइट ने भी दिखलाया है कि एक लेखक अपने समय के ÷ट्रोप' (ज्तवचम) पर ही अवस्थित होता है।दूसरी ओर, अगर हमारे लिए दलित समाज का इतिहास लेखन जरूरी हो और ऐतिहासिक स्रोतों की अनुपलब्धता हमारे लिए बाधा बन रही हो तो हमें ÷अनाल्स स्कूल' से थोड़ी सीख लेनी चाहिए। जिसे ऐतिहासिक तथ्य मान कर प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाता है वे प्रमाण सामान्यतः प्रभुत्वशाली वर्ग की मिल्कियत हैं। वे ही लेख लिखवाते हैं, अपनी गाथाओं को सुरक्षित रखवाते हैं और उनकी ही कथाएं लिखित रूप में हमारी धरोहर बन कर सुरक्षित रहती हैं। लेकिन ऐसे पात्रों का इतिहास लिखना जो प्रभुत्वहीन समुदायों से आते हैं निश्चिय ही इतिहास में दूसरे रूप में आता है। स्रोतों के अभाव में इनका इतिहास उल्टी यात्रा करता है। इस प्रसंग में मार्क ब्लॉख, लूसियेन फेब्रे जैसे फ्रांसीसी इतिहासकारों द्वारा प्रयुक्त ÷रिग्रेसिव मेथड' का उल्लेख उचित होगा। यह सब जानते हैं कि मार्क ब्लाख और फेब्रे विश्व के महानतम इतिहासकारों में से हैं। उनकी धारणा थी कि संग्रहालयीय तथ्य निर्भर राजनैतिक इतिहास एक आंशिक इतिहास है। पूर्ण इतिहास (ॅीवसम भ्पेजवतल) के लिए हर तरह के स्रोतों और पद्धतियों की मदद लेनी चाहिए। हर सीमा का अतिक्रमण करके, हर प्रकार के स्रोतों की सहायता लेकर वे पूर्ण इतिहास की ओर बढ़ना चाहते थे। वे मानते थे कि फ्रांस में सामाजिक परिवर्तन को समझने के लिए कृषक समुदाय के जीवन में हुए परिवर्तनों का अध्ययन जरूरी है। पर समस्या यह थी कि किसान का इतिहास कैसे लिखा जाये। इस समस्या के निदान के लिए जिस पद्धति का अनुसरण उन्होंने किया उसे अनजाने भूतकाल से चल कर जाने हुए वर्तमान की ऐतिहासिक प्रगतिशील धारणा के विपरीत जाते हुए (वर्तमान) से अजाने (भूतकाल) की यात्रा शुरू की। इसी पद्धति से वैकल्पिक इतिहास की वैकल्पिक व्यवस्था सम्भव हो सकी।अगर इस सूत्र को आधार बनाया जाए तो कहा जा सकता है कि दलितों के इतिहास लेखन के लिए यह बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। ÷वंचितों का आत्म इतिहास' में संकलित इतिहासों को अगर हाल के दशकों में तेजी से शक्तिशाली हुए दलित वर्गों की वर्तमान ऐतिहासिक कल्पना के रूप में भी लिया जाय और यहां से जरूरी सवालों के साथ इतिहास में जाया जाए तो सार्थक पहल होगी। सम्भव है कि जो कल्पित मान लिये गये हैं वे सच के ज्यादा नजदीक हो और जिसे अकादमिक इतिहास मान कर ÷सच्ची दास्तान' मान लिया जाता रहा हो वह आंशिक इतिहास भर हो। हमें यह समझने कि जरूरत है कि इन आत्म इतिहासों को अकादमिक स्वीकृति की जितनी जरूरत है उससे ज्यादा अकादमिक इतिहास को इन आत्म इतिहासों की है। फिलहाल तो इन आत्म इतिहासों के प्रति, जहां तक सम्भव हो, स्वीकार का भाव रखा जाए तो ज्यादा भलाई दीखती है। इससे न सिर्फ इतिहास में प्रयुक्त होने वाले स्रोतों का आह्‌लादकारी विस्तार होगा बल्कि कुछ ऐसे इलाकों की तरफ जाना सम्भव हो सकेगा जिस ओर इतिहासकार जाने से परहेज करते रहे हैं। हमारे लिए मानसिकता के इतिहास का द्वार खुल सकता है, दलितों के सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन का मार्ग और प्रशस्त हो सकेगा। यह तय है कि दलित उभार के इस वर्तमान समय में दलित वर्ग बगैर इतिहास के तो रहेगा नहीं। दलित जब समाज के इतिहासकारों से इतिहास की मांग करेंगे तो क्या यह सम्भव है कि इतिहास वैसा ही बना रह सकेगा जैसा कि वह अभी है? इतिहास को बदलना होगा और इस दिशा में दलितों के आत्म इतिहास से शुरू करके ज्यादा प्रामाणिक अकादमिक इतिहास लेखन की ओर जाना अभीष्ट होगा।यह एक जरूरी पुस्तक है और इस कार्य को हिन्दी समाज के सामने लाने के लिए बद्री नारायण, विष्णु महापात्र, अनंत राम मिश्र, वनिता सोमवंशी, अमरद्वीप सिंह, मीनू झा, निवेदिता सिंह धन्यवाद के पात्र हैं।उपेक्षित समुदायों का आत्म इतिहास : संकलन एवं सम्पादन : बद्री नारायण, विष्णु महापात्र, अनंतराम मिश्र, प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, मूल्य : 495.00 रु.
[तद्भव-17 , जनवरी 2008 में प्रकाशित ]

6 comments:

  1. YES , YE BATTEN BILUL SATYY Hai , dusadh kanhi na kanhi rajput hai ...., maine v ismain chatriya ke gun mahsus kiye hai ...........,

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    1. आपका यह वक्तव्य मैं आज देख पाया। आभार .

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  2. Pakhandi barmano ne bharat ke mul niwasiyo ko apane pakhandi tarko se khub murkh bana kar apani nich karmo ko hi sarvshresth batate rahe aur unse manwate rahe. .. lekin ab nahi murkh banana hai

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  3. Pakhandi barmano ne bharat ke mul niwasiyo ko apane pakhandi tarko se khub murkh bana kar apani nich karmo ko hi sarvshresth batate rahe aur unse manwate rahe. .. lekin ab nahi murkh banana hai

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  4. your story is great im pasi cast mr arjun pasi ,maharaj satan lakhan uda suhaldeo tamam rajao ka jikar mila etihash hi khogya apna ab wahi

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  5. पूऱी वर्ण-व्यवस्था ही ऐतिहासिक आत्ममंथन है।
    दरअसल यहॉ पर जिसकी लाठी,उसी की भैंस का हिसाब-किताब है।
    कुछ समुदायों ने मॉनिटरिंग का काम किया होगा लोगों को एकजुट या संगठित करने के लिए,
    चुकि इनके मानविय मापडंड व्यापक या कहें तो हितोचित नहीं रहे होंगे।
    इसलिए वो इनकि मानसिकता से कट कऱ ऱहे होंगें।
    जिन्हे युगांतर में तथाकथित रुप से,
    इन्होने अपने आत्म-कल्प से एक अलग हीं श्रेणी में रख दिया।
    जिन्हे ये अमानविय नजरिये से देखना शुरु कर दिए।
    चुकि ये श्रणियां इनकि व्यवस्था के तर्ज पर सटिक नहीं होंगीं।
    तो अपने मॉनिटरिं कपासिटी और बुद्धि बल से
    इन्हे और तोडा गया होगा ताकि ये संगठित ना रह सकें।
    क्योंकि कभी भी संगठन का विरोध एक व्यापक धरातल पर होता है,और एक व्यापक दृष्टिकोण के तहत एक परिपूर्ण फलप्रद नतिजे का जनक होता है।
    कालान्तर में इन्हें निचले तपके का साबित कर दिया।
    और इनसे हर-वो अधिकार छीन लिए गएं जो इनके विकास और इनकी निपुणता के सहोकार हों।
    जैसे पढने-लिखने का अधिकार साथ उठने-बैठने का अधिकार इत्यादि।
    तो ये श्रणियॉ अपना इतिहास लिख ना सकीं।
    चुकि इन्हे लिखने-पढने का अधिकार नहीं प्राप्त था।
    इसलिए इन्होनें अपनें इतिहास को लयबद्ध करना शुरु कर दिया, ताकि कालन्तर में इनकें वंसज अपनी गरिमा को भूल ना जाएँ।
    जो आज हमें लोकगीतों के प्रेरणार्थ हासिल है।
    पर आज के समाजिक व्यवस्था में जो इनके दिग्गजों कि कुर्वानी की पृष्ठभूमि है।
    कि इन्हें हर वो मानविय अधिकार प्राप्त हो सकें।
    जो इनके विकास के सहोकार हैं।
    अगर ये अपने लोकगीतों के मापडण्ड से अपने सच्चे इतिहास को पुस्तकों के ढाँचे में प्रस्तुत कर रहे हैं तो।
    इसे एक आत्मकल्पित और थोंथला इतिहास कहना सर्वथा अनुचित है।
    औऱ वैसे तो मेरे भाई इन्सान स्वयं ही एक जाति है।
    जैैसे गाय भैंस कुत्ता इत्यादि,अगर थोथला ही समझें तो सारी धर्म और वर्ण-व्यवस्था ही थोंथली है।
    जो प्रकृति की कसौटी पर कभी खडी ही नही उतर सकती।
    वैसे इतिहास कहें तो मानने का विषय है, जानने का नहीं।

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