Thursday 20 August 2009

जसवंत सिंह की किताब

यह सचमुच बहुत आश्चर्यजनक है कि जसवंत सिंह की बर्खास्तगी के प्रसंग में देश भर में जो बहस उभर कर सामने आयी उसमें जिन्ना, पटेल, नेहरू आदि को लेकर बातें ही ज्यादा हुईं, इतिहास लेखन के बारे में बहुत कम सोचा गया. पश्चिमी देशों की नकल पर नामी गिरामी लोग किताबें लिखने लगे हैं और इस प्रक्रिया में अपनी पात्रता के बारे में नहीं सोच रहे हैं. जसवंत सिंह कोई संस्मरण लिख सकते हैं, उपन्यास, कहानी या कविता लिख सकते हैं, लेकिन भारत विभाजन पर अगर कोई पुस्तक लिखेंगे तो उस पुस्तक को उसी रूप में पढा जाना चाहिए जिस तरह से यशवंत सिन्हा यदि बंग्लादेश मुक्ति युद्ध पर लिखते तो पढा जाता. अगर आप गौर से देखें तो आपको साफ दिखेगा कि इस पुस्तक को सामने लाते हुए जसवंत सिंह अपनी पार्टी का कोई खयाल नहीं रख रहे थे. उनकी पार्टी एक कठिन दौर से गुजर रही थी पर उन्होंने यह जरूरी समझा कि वामपंथी नामवर सिंह, जेठमलानी और उदारवादी चिंतक मेघनाद देसाई को मंच पर बुलाकर जिन्ना पर अपनी लिखी पुस्तक का लोकार्पण करायें. उनकी पार्टी अगर उन्हें निकालती है तो हमें उतना ही दुख होना चाहिए जितना सोमनाथ चटर्जी को सी पी एम से निकालने पर हुआ था. सोमनाथ चटर्जी का तो फिर भी कुछ 'केस' था, जसवंत सिंह तो यह काम टाल ही सकते थे. जो लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रश्न से इसको जोड कर देख रहे हैं वे यह नहीं समझ रहे कि जसवंत सिंह का इस तरह का किताब लिखना राजनैतिक रूप से अपनी पार्टी का तर्पण करना था. वे सबकुछ जानबूझ कर ही कर रहे होंगे. ऐसे में जिन्ना के बारे में फिर से विचार करना और विभाजन के बारे में अपनी अपनी राय जाहिर करना एक बोगस बात है. जो बात सिंह कह रहे हैं वह बहुत सालों से आयशा जलाल जैसे इतिहासकार कह रहे हैं. कोई नई बात नहीं है. आप बताएं कि अर्जुन सिंह अपनी उपेक्षा से खिन्न होकर स्वतंत्रता के बाद के भारत निर्माण पर एक किताब लिखें और उसमें नेहरू को छोटा बनाकर लोहिया का गुणगान करें तो कांग्रेस पार्टी क्या करेगी? जसवंत सिंह के बहाने बी जे पी को पीटने का काम राजनैतिक दल करें यह तो ठीक है लेकिन इतिहासकारों को इस फिजूल की बहस से बचना चाहिए.

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