Sunday, 23 August, 2009

आलोक धन्वा से एक मुलाकात

यह लिखते हुए कुछ असमंजस की स्थिति में हूं. क्या इस तरह आलोक जी के बारे में दो बातों को सार्वजनिक करना ठीक है. पर सोचता हूं जो लोग इस ब्लाग पर आयेंगे वे समझ सकेंगे कि मैं उनके प्रति प्रेम भाव के कारण ही दो चित्र अपने ब्लाग पर डाल रहा हूं.
आलोक जी पटना में एक कमरे के फ्लैट में रहते हैं. उनको चाहने वाले भी कम नहीं हैं, लेकिन मुझे लगता रहा कि हिन्दी का इतना महान कवि एक दम अकेला छोड दिया गया है. तमाम तरह की दुश्चिंताएं उन्हें घेरे थीं और वे बार बार दुखी हो जाते थे. कुछ व्यक्तिगत प्रसंग भी आये जिसने उन्हें बहुत व्यथित किया है. मैं उनकी बातें सुनता रहा और वे तमाम मेरे सामने घूमते रहे जब कोलकाता में हम उन्हें रोक रहे थे और वे दिल्ली जा रहे थे. कितनी बडी गलती की थी आलोक जी ने!
मुझे उनका स्नेह मिलता रहा है इस बात का मुझे गर्व है. बडे प्रेम से कोलकाता का हाल पूछते रहे. इस बात से बहुत उदास थे कि बंगाल में वामपंथ की शक्ति लगातार कम होती जा रही है. जब मैनें उन्हें कहा कि अब वामपंथ के शासन को टिकाना संभव नहीं वे मेरा चेहरा गौर से देखने लगे. कुछ साल पहले हमलोग जब  उनसे बहस करते थे और कहते थे कि वामपंथ गलत हाथों में चला गया है तो वे विरोध करते थे. इस बार नहीं किया. शायद वे समझ चुके हैं कि हमलोगों की बातें सही थी, शायद. लेस्बियनिज्म के प्रश्न पर वे इसके खिलाफ बोले. कहने लगे कि यह प्रकृति के खिलाफ है, अप्राकृतिक है.
पूरी दुनिया में जिस तरह आदमी अकेला होता जा रहा है जब "आदमी को आदमी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है". वे लगभग विकल भाव से अपने पुराने साथी (एक रिक्सा वाला जो उनके साथ रोज रहता था) को याद करते रहे. खासकर एक बात को जब वह बेनी (रिक्शा वाले का नाम) कहने लगा था- " हे पैसा, हम तोरा पाछू नैं रहब, तोरा आगू रहब, कैहनें कि जे तोरा पाछू रहतै ओकरा नींद नैं आबै छै".
लगभग तीन घंटे की बातचीत के बाद जब मैं बाहर निकला तो अपने समेत सभी हिन्दी समाज के ठेकेदारों को कोस रहा था जो हिन्दी के इस महान कवि को शांति से रहने की सामान्य व्यवस्था भी नहीं करवाता और उम्मीद करता है कि एक ठो और 'कपडे के जूते' क्यों नहीं लिखते आलोक जी.

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